वैशेषिक दर्शन की तत्त्व मीमांसा  

  • महर्षि कणाद ने वैशेषिकसूत्र में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय नामक छ: पदार्थों का निर्देश किया और प्रशस्तपाद प्रभृति भाष्यकारों ने प्राय: कणाद के मन्तव्य का अनुसरण करते हुए पदार्थों का विश्लेषण किया।
  • शिवादित्य (10वीं शती) से पूर्ववर्ती आचार्य चन्द्रमति के अतिरिक्त प्राय: अन्य सभी प्रख्यात व्याख्याकारों ने पदार्थों की संख्या छ: ही मानी, किन्तु शिवादित्य ने सप्तपदार्थी में कणादोक्त छ: पदार्थों में अभाव को भी जोड़ कर सप्तपदार्थवाद का प्रवर्तन करते हुए वैशेषिक चिन्तन में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। यद्यपि चन्द्रमति (6ठी शती) ने दशपदार्थी (दशपदार्थशास्त्र) में कणादसम्मत छ: पदार्थो में शक्ति, अशक्ति, सामान्य-विशेष और अभाव को जोड़कर दश पदार्थों का उल्लेख किया था, किन्तु चीनी अनुवाद के रूप में उपलब्ध इस ग्रन्थ का और इसमें प्रवर्तित दशपदार्थवाद का वैशेषिक के चिन्तन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। हाँ, ऐसा प्रतीत होता है कि अभाव के पदार्थत्व पर चन्द्रमति के समय से लेकर शिवादित्य के समय तक जो चर्चा हुई, उसको मान्यता देते हुए ही शिवादित्य ने अभाव का पदार्थत्व तो प्रतिष्ठापित कर ही दिया। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि कणाद ने आरम्भ में मूलत: द्रव्य, गुण और कर्म ये तीन ही पदार्थ माने थे। शेष तीन का प्रवर्तन बाद में हुआ। अधिकतर यही मत प्रचलित है, फिर भी संक्षेपत: छ: पदार्थों का परिगणन कणाद ने ही कर दिया था।
  • विभिन्न विद्वानों द्वारा किये गये अनुसन्धानों द्वारा जो तथ्य सामने आये हैं, उनके अनुसार वैशेषिक तत्त्व-मीमांसा में प्रमुख रूप से चार मत प्रचलित हुए, जिन्हें
  1. त्रिपदार्थवाद
  2. षट्पदार्थवाद
  3. दशपदार्थवाद तथा
  4. सप्तपदार्थवाद कहा जा सकता है।

न्याय और वैशेषिक समान तन्त्र माने जाते हैं। वैशेषिकसूत्र और न्यायसूत्र की रचना से पूर्व संभवत: आन्वीक्षिकी के अन्तर्गत इन दोनों शास्त्रों का समावेश होता रहा, किन्तु कालान्तर में न्यायशास्त्र में प्रमाणों के विवेचन को और वैशेषिक शास्त्र में प्रमेयों के विश्लेषण को प्रमुखता दी गई जिससे कि दोनों का विकास पृथक्-पृथक् रूप में हुआ। बाद के कतिपय प्रकरण ग्रन्थों में फिर इन दोनों शास्त्रों का समन्वय करने का प्रयास किया गया, पर वस्तुत: ऐसे उत्तरकालीन ग्रन्थों में भी कुछ न्यायप्रधान हैं और कुछ वैशेषिकप्रधान। न्याय के आचार्यों ने गौतम प्रवर्तित सोलह पदार्थों में वैशेषिकसम्मत सात प्रदार्थों का, तथा वैशेषिक के व्याख्याकारों ने वैशेषिकसम्मत सात पदार्थों में न्यायसम्मत सोलह पदार्थों का अन्तर्भाव करते हुए इन दोनों दर्शनों में समन्वय करने का प्रयत्न किया, किन्तु इससे इन दोनों दर्शनों की अपनी-अपनी विशिष्टता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा और दोनों शास्त्रों का पृथक्-पृथक् प्राधान्य आज भी बना हुआ है।

पदार्थ

वैशेषिक दर्शन में तत्त्व शब्द के स्थान पर पदार्थ शब्द को प्रयुक्त किया गया है। पदार्थ शब्द का व्युत्पत्तिमूलक[1] आशय यह है कि कोई भी ऐसी वस्तु, जिसकों कोई नाम दिया जा सके अर्थात जो शब्द से संकेतित की जा सके और इन्द्रिय-ग्राह्य हो वह अर्थ कहलाती है।[2] कतिपय विद्वानों के अनुसार जिस प्रकार हाथी के पद (चरण-चिह्न) को देखकर हाथी का ज्ञान किया जा सकता है, उसी प्रकार पद (शब्द) से अर्थ का ज्ञान होता है। वैशेषिकसूत्र में पदार्थ का लक्षण उपलब्ध नहीं होता। पदार्थ शब्द का प्रयोग भी सूत्रकार ने केवल एक बार किया है।[3]

  • प्रशस्तपाद (चतुर्थ शती) के अनुसार पदार्थ वह है जिसमें अस्तित्व, अभिधेयत्व और ज्ञेयत्व हो।[4]
  • ये तीनों ही लक्षण-साधर्म्य के आधायक हैं, अर्थात पदार्थों के ये तीन समान धर्म हैं। प्रशस्तपाद का यह भी कहना है कि नित्य द्रव्यों के अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थ किसी पर आश्रित रहते हैं। आश्रित का अर्थ है परतन्त्र रूप से रहना, न कि समवाय सम्बन्ध से। प्रशस्तपाद द्वारा प्रयुक्त अस्तित्व, अभिधेयत्व और ज्ञेयत्व इन तीन शब्दों का विश्लेषण उत्तरवर्ती आचार्यों ने अपनी-अपनी दृष्टि से किया। उनमें से कतिपय आचार्यों के निम्नलिखित कथन ध्यान देने योग्य हैं—

अस्तित्व

  • श्रीधर (10वीं शती) का यह कथन है कि किसी वस्तु का जो स्वरूप है, वही उसका अस्तित्व है।[5] जबकि व्योमशिवाचार्य (9वीं शती) के विचार में 'अस्ति' या 'सत्' इस प्रकार का ज्ञान ही अस्तित्व कहलाता है।
  • न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य (12वीं शती) सत्तासंबन्धबुद्धि को ही अस्तित्व कहते हैं।
  • जगदीश तर्कालंकार (16वीं शती) ने सूक्ति नामक टीका में भावत्वविशिष्ट स्वरूपसत्त्व को ही 'अस्तित्व' कहा है।
  • सामान्यतया अस्तित्व और सत्ता को पर्यायवाची माना जा सकता है, किन्तु वैशेषिक दर्शन के अनुसार इनमें भेद है। अस्तित्व सत्ता की अपेक्षा अधिक व्यापक है, क्योंकि सत्ता में भी अस्तित्व है। अस्तित्व किसी वस्तु का अपना स्वरूप है, यह सत्ता सामान्य की तरह समवाय सम्बन्ध से वस्तु में नहीं रहता। वह तो वस्तु का अपना ही विशेष रूप है।
  • वैशेषिकों के अनुसार सत्ता केवल द्रव्य, गुण और कर्म इन तीन में ही समवाय सम्बन्ध से रहती है। इन तीन में रहने के कारण उसको सामान्य कहा जाता है, न कि अधिक व्यापकता के कारण। इस प्रकार सत्ता 'सामान्य' का और 'अस्तित्व' स्वरूप-विशेष का द्योतक है। अस्तित्व व्यापक है और सत्ता व्याप्य।

अभिधेयत्व
अभिधान का आशय है- नाम या शब्द। शब्दों से जिसका उल्लेख हो सके, वह अभिधेय है।

  • उदयनाचार्य ने अभिधेय को ही पदार्थ माना है।[6]
  • अन्नंभट्ट भी प्रमुखतया अभिधेयत्व को ही पदार्थों का सामान्य लक्षण मानते हैं।[7] संसार में जो भी वस्तु है, उसका कोई नाम है। अत: वह अभिधेय है। जो अभिधेय है, वह प्रमेय है और जो प्रमेय है, वह पदार्थ है। कोई भी अर्थ (वस्तु) जो संज्ञा से संज्ञित हो, पदार्थ कहलाता है।

ज्ञेयत्व

  • शिवादित्य के अनुसार पदार्थ वे हैं, जो प्रमिति के विषय हों।[8] पदार्थ अज्ञेय नहीं, अपितु ज्ञेय हैं। विश्व के सभी पदार्थ घट-पट आदि, जिनका अस्तित्व है, वे ज्ञेय अर्थात ज्ञानयोग्य भी हैं। अज्ञेय विषय की सत्ता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। जिसका अस्तित्व है वह सत है, जो सत है वह ज्ञेय है, और जो ज्ञेय है वह अभिधेय है।
  • वस्तुत: अस्तित्व, अभिधेयत्व और ज्ञेयत्व में से किसी एक लक्षण से भी पदार्थ की परिभाषा की जा सकती है, क्येंकि अस्ति या सत शब्द द्वारा उल्लिखित भाव पदार्थों के संदर्भ में अभिधेयत्व और ज्ञेयत्व कोई भिन्न संकल्पनाएं नहीं हैं। वस्तुत: अस्तित्व, अभिधेयत्व और ज्ञेयत्व ये भाव पदार्थों के समान धर्म है। ऐसा प्रतीत होता है कि पदार्थ की परिभाषा में 'अस्तित्व' शब्द के समावेश से यह संकेतित किया गया है कि वस्तु वैसी है, जैसा उसका स्वरूप है, न कि वैसी, जैसी हम उसे कल्पित करते हैं। इससे विज्ञानवाद का निरसन होता है और शून्यवाद का भी प्रत्याख्यान हो जाता है। ज्ञेयत्व से संशयवाद और अज्ञेयवाद तथा अभिधेयत्व से यह बताया गया है कि वस्तुज्ञान की अभिव्यक्ति आवश्यक है। प्रतीत होता है कि प्रशस्तपाद भी इस बात से परिचित थे कि इन तीनों लक्षणों में से किसी एक से भी पदार्थ को परिभाषित किया जा सकता है, किन्तु उन्होंने अपने पूर्ववर्ती या समसामयिक आचार्यों की विभिन्न शंकाओं के समाधान के लिए तीनों को एक साथ रखकर यह प्रतिपादित किया कि -
  1. पदार्थ सत है,
  2. पदार्थ अभिधेय है और
  3. पदार्थ ज्ञेय है। फिर भी परवर्ती कई ग्रन्थकारों ने इनमें से किसी एक को भी पदार्थ का समग्र लक्षण मानकर काम चला लिया।
  • उदयनाचार्य और अन्नंभट्ट ने अभिधेयत्व को और शिवादित्य ने ज्ञेयत्व और प्रमेयत्व को प्रमुखता दी। 'अस्तित्व' को छोड़ने का कारण संभवत: यह था कि इनके समय तक अभाव की सत्पम पदार्थ के रूप में प्रतिष्ठा हो रही थी या हो चुकी थी। यद्यपि वस्तुओं के धर्म उनसे पृथक् नहीं होते, फिर भी धर्म और धर्मी के भेद से उनमें पार्थक्य माना जाता है। द्रव्यादि छ: पदार्थों में अस्तित्व, अभिधेयत्व और ज्ञेयत्व ये तीन समान धर्म हैं। किन्तु श्रीधर का इस संदर्भ में यह कथन है कि ये तीनों अवस्था-भेद से पृथक् हैं, मूलत: तो वे वस्तु के स्वरूप के ही द्योतक हैं।[9] वस्तुत: ये तीनों शब्द एक ही वस्तु के तीन पक्षों का आख्यान करते हैं। यह ज्ञातव्य है कि अस्तित्व और अभाव की संकल्पनाओं में पारस्परिक विरोध का प्रत्याख्यान करते हुए श्रीधर ने यह बताया कि सत्ता केवल द्रव्य, गुण और कर्म में रहती है, जबकि अस्तित्व अन्य सभी पदार्थों में, और यहाँ तक कि अभाव में भी रहता है। विश्वनाथ पंचानन ने भी अस्तित्व को अभावसहित सातों पदार्थों का साधर्म्य माना। अत: सत्ता और अस्तित्व दो भिन्न-भिन्न संकल्पनाएँ हैं।[10] यद्यपि श्रीधर द्वारा निरूपित 'अस्तित्व' के अर्थ को ग्रहण करने पर अभाव के पदार्थत्व का समाधान हो सकता है। पर शंकर मिश्र ने इस समस्या का समाधान यह कहकर किया कि ज्ञेयत्व और अभिधेयत्व तो छ: पदार्थों के उपलक्षण मात्र हैं, वस्तुत: उनमें सातों पदार्थों का साधर्म्य है। इतने सारे आख्यान-प्रत्याख्यानों के रहते हुए भी पदार्थ के लक्षण में 'अस्तित्व' की संघटकता अभाव के परिप्रेक्ष्य में अभी भी विवादास्पद बनी हुई है। फिर भी संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रशस्तपाद के अनुसार जो सत्, अभिधेय और ज्ञेय है, उसी को पदार्थ कहा जा सकता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पदानाम् अर्थ: अभिधेय: पदार्थ:
  2. ऋच्छन्तीन्द्रियाणि यं सोऽर्थ:
  3. वैशेषिक सूत्र 1.1.4
  4. षण्णामपि पदार्थानां साधर्म्यम् अस्तित्व-अभिधेयत्व-ज्ञेयत्वानि। आश्रितत्वं चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्य।-प्रशस्तपादभाष्यम्।
  5. यस्य वस्तुनो यत् स्वरूपं तदेव तस्यास्तित्वम्।-न्याय कन्दली पृ. 41
  6. अभिधेयत्वम् अभिधानयोग्यता। शब्देन संकेतलक्षण: सम्बन्ध: कि.; अभिधेय: पदार्थ:।-लक्षणावली
  7. अभिधेयत्वं पदार्थसामान्यलक्षणम्, त.दी. पृ.2
  8. प्रमितिविषया: पदार्था:-सप्तपदार्थी
  9. न्यायकन्दली पृ. 41
  10. न्यायकन्दली पृ. 42
  11. अर्थ इति द्रव्यगुणकर्मसु, वैशेषिक सूत्र, 8.2.3
  12. सदिति यतो द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता, वैशेषिक सूत्र 1.2.7
  13. IP, Radhakrishnan, Vol II p.186
  14. प्रशस्तपादभाष्यम्, आरम्भ:
  15. Frauwallner, HIP Vol. II pp 79-80
  16. न्यायसिध्दान्तमुक्तावली पृ. 40
  17. प्रकरणपञ्जिका, पृ. 78
  18. सादृश्यम् उपाधिरूपं सामान्यम् स.प.पृ. 46
  19. तदेतत्सादृश्यमेतास्वेकां विद्यामासादयन्नतिरिच्यते। अनासादयन्न पदार्थीभूय स्थातुमुत्सहते, न्या.कृ.पृ. 399
  20. सादृश्यमपि न पदार्धान्तरं, किन्तु तद्भिन्नत्वे सति तद्गतभूयोधर्मत्वम्, न्या.सि.मु.,पृ.29-30
  21. विशेषोऽपि न पदार्थान्तर:, मानाभावात, रघु. पदार्थतत्त्वनिर्णय:, पृ. 43
  22. द्रष्टव्य- भारतीय न्यायशास्त्र (डा.चक्रधर बिजलवान) पृ. 438
  23. क्रियागुणवत् समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम्, वैशेषिक सूत्र 1.1.5
  24. गुणाश्रयो द्रव्यम्, न्या. ली., पृ. 7; त. भा. पृ. 5
  25. तत्र गुणात्यन्ताभावानधिकरणं द्रव्यम् ल.व., पृ. 2
  26. तत्त्वसंग्रह:, श्लो. 564-574
  27. न च द्वाभ्याम् इन्द्रियाभ्याम् एकार्थग्रहणम् विना प्रतिसन्धानं न्याय्यम्; व्यो. पृ. 44
  28. तत्र समवायिकारणं द्रव्यम्, त.भा.पृ. 239
  29. कालाकाशादीनां संयोगविभागजनकत्वेन कर्मवत् सत्तेतरजातिमत्त्वसिद्धे:, न्या.ली. पृ. 94-97
  30. द्रव्यत्वजातिमत्त्वं गुणवत्त्वं वा द्रव्यसामान्यलक्षणम्, त.दी. पृ. 4
  31. चित्सुखी, पृ. 302
  32. वैशेषिकसूत्र 1.1.5
  33. प्र. भा. पृ. 4
  34. पृथिव्यप्तेजोवाय्यवात्मान इति पञ्चैव द्रव्याणि, व्योमादेरीश्वरात्मन्येवान्तर्भूतत्वात् मनसश्चासमवेतभूतेऽन्तर्भावादित्याहुर्नवीना:, दिनकरी न्या.सि.मु. पृ.46
  35. पदार्थमण्डन
  36. रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथ्वी, वैशेषिकसूत्र, 2.1.1
  37. क्षितावेव गन्ध:, प्र. भा. पृ. 29
  38. इन्द्रियं घ्राणत्वलक्षणम् भा. ष. का. 8
  39. शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तमात्मोपभोगसाधनं विषय:; न्या.क. पृ. 82
  40. तत्र गन्धवती पृथ्वी, त.सं.
  41. रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवा: हिनग्धा:, वै.सू. 2.1.2
  42. द्रवत्वं सांसिद्धकिरूपेण जलस्याधारणम्, सेतु पृ. 241
  43. किरणावली, पृ. 67-68
  44. धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री, न्या.सि.मु. व्याख्या, पृ. 200
  45. वै. सू. 2.1.3
  46. प्र. भा.
  47. C.F.-Sources of Energy: Bhauma=Celestial; Divya=Chemical or Terrestrial; Udarya= Abdominal; Akaraja=Minerar
  48. न्या.सि.मु. पृ. 133-136
  49. उष्णस्पर्शवत्तेज:, त.सं.
  50. स्पर्शवान् वायु:, वै.सू. 2.1.4
  51. प्र.भा. (वायु-निरूपण
  52. न्या.सि.मु. पृ. 44
  53. न्या.म. भाग-2 पृ. 48
  54. व्योमवती, पृ. 274; प.त.नि.पृ. 52-53; प.मां., पृ. 20
  55. त आकाशे न विद्यन्ते, वै.सू. 2.1.5
  56. शब्दगुणकमाकाशम्, त. सं.
  57. एकद्रव्यत्वान्न द्रव्यम्, वै.सू., 2.2.23
  58. अतीतानागतहेतु: काल:, स चैको विभुर्नित्यश्च, त.सं.
  59. अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिंगानि, वै.सू.
  60. युवस्थविरयों: शरीरावस्थाभेदेन तत्कारणतया कालसंयोगेऽनुमिते सति पश्चात्तयो: कालविशिष्टावगति:, न्या. क. पृ. 158
  61. एवं कालोऽपि सर्वत्राभिन्नाकारवर्तमानप्रत्ययवेद्य:, न्यायलीलावती, पृ. 310
  62. नित्येष्वभावात् अनित्येषु भावात् कारणं कालाख्येति, वै.सू. 2.2.9
  63. पदार्थतत्त्वनिर्णय:, पृ. 23
  64. प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिक्, सा चैका, नित्या विभ्वी च, त.सं.
  65. वै.सू. 2.2.10-16
  66. प्र.पा.भा., पृ. 56
  67. प.त.नि.
  68. प.म.
  69. वै.सू. 2.2.4-21
  70. प्र.पा.भा., पृ. 59-66
  71. वै.सू. उपस्कार
  72. न्या. मं., भाग-2 पृ.6
  73. ज्ञानाधिकरणमात्मा, त. सं.
  74. न्या. क. पृ. 139
  75. वै.सू. 3.2.1.-3
  76. प्र.पा.भा. पृ. 69
  77. न्या.भा. 1.1.6
  78. न्या. क., पृ. 223
  79. वै.सू. 4.1.6
  80. द्रव्याश्रय्यगुणवान् संयोगाविभागेष्वकारणमनपेक्ष इति गुणलक्षणम्, वै.से. 1.1.16
  81. रूपादीनां गुणानां सर्वेषां गुणत्वाभिसम्बन्धों द्रव्याश्रितत्वं निर्गुणत्वं निष्क्रियत्वम्, प्र.पा.भा., पृ. 69
  82. सामान्यवान् असमवायिकारणम् अस्पन्दात्मा गुण: स च द्रव्याश्रित एव, त.भा. पृ. 260
  83. तर्कदीपिका, पृ. 16
  84. बुद्धिरुपलब्धिज्ञानं प्रत्यय इति पर्याय:, प्र. भा. पृ. 130
  85. आत्माश्रय: प्रकाशों बुद्धि:, स.ष. पृ. 76
  86. एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षकारणमिति कर्मलक्षणम्, वै.सू. 1.1.17
  87. अनुवृत्तिप्रत्ययहेतु: सामान्यम्, त.भा. पृ. 224
  88. नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वं सामान्यम् न्या.सि. मु.
  89. नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्, त.सं.
  90. सामान्यं विशेष इति बुध्यपेक्षम्, वै.सू. 1.2.3
  91. प्र. पा. भा. श्रीनिवास व्याख्या पृ. 250
  92. इहेदमिति यत: कार्यकारणयो: स समवाय:, वै.सू. 7.2.24
  93. अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां य: सम्बन्ध: इहप्रत्ययहेतु: स समवाय:, प्र.पा.भा. (श्रीनिवास संस्करण) पृ. 256
  94. नञ्पदप्रतीतिविषयत्वम् अभावत्वम् त.भा.
  95. स चासमवायत्वे सत्यसमवाय:, स.द.स. पृ. 444
  96. अभावोऽप्यनुमानमेव, प्र.भा. पृ. 180


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