विलायत ख़ाँ  

वादन की नई शैली का विकास

विलायत ख़ाँ के सितार वादन में तंत्रकारी कौशल के साथ-साथ गायकी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। सितार को गायकी अंग से जोड़कर उन्होंने अपनी एक नई वादन शैली की नींव रखी थी। वादन करते समय उनके मिज़राब के आघात से 'दा' के स्थान पर 'आ' की ध्वनि का स्पष्ट आभास होता था। उनका यह प्रयोग वादन को गायकी अंग से जोड़ देता है। विलायत ख़ाँ ने सितार के तारों में भी प्रयोग किए थे। सबसे पहले उन्होंने सितार के जोड़ी के तारॉ में से एक तार निकाल कर एक पंचम स्वर का तार जोड़ा। पहले उनके सितार में पाँच तार हुआ करते थे। बाद में एक और तार जोड़ कर संख्या छ: हो गई थी। अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ माँगते थे कि इस परीक्षा में भी वे सफलता पायें।

फ़िल्मों में संगीत

उस्ताद विलायत ख़ाँ ने कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों में भी संगीत दिया था। 1958 में निर्मित सत्यजीत रे की बांग्ला फ़िल्म 'जलसाघर', 1969 में मर्चेन्ट आइवरी की फ़िल्म 'दि गुरु' और 1976 में मधुसूदन कुमार द्वारा निर्मित हिन्दी फ़िल्म 'कादम्बरी' उस्ताद विलायत ख़ाँ के संगीत से सुसज्जित था। वे वास्तव में सरल, सहज और सच्चे कला साधक थे।[1]

पुरस्कार व सम्मान

सितार वादन व संगीत के क्षेत्र में विलायत ख़ाँ के विशेष योगदान के लिए उन्हें 1964 में 'पद्मश्री' और 1968 में 'पद्मविभूषण' सम्मान दिये गए थे, किंतु उन्होंने ये कहते हुए कि भारत सरकार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान का समुचित सम्मान नहीं किया, दोनों सम्मान ठुकरा दिए।

निधन

एक सितार वादक के रूप विलायत ख़ाँ ने पाँच दशक से भी अधिक समय तक अपना जादू बिखेरा। सितार के इस महान् वादक को फेफड़े के कैंसर ने अपनी चपेट में ले लिया था। इसके इलाज के लिए वे मुंबई के 'जसलोक अस्पताल' में भर्ती हुए थे। यहीं पर उन्होंने अपने जीवन की अंतिम साँसें लीं। 13 मार्च, 2004 को उनका निधन हुआ।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 विलायत ख़ाँ (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 15 अक्टूबर, 2012।

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