सम्पादन- आधुनिक हिंदी लघुकथाएँ, कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर, कुण्डलिया कानन
हल्दी-घाटी किधर पिताजी, मैं भी लड़ने जाऊँगा । घोड़ा, भाला मुझे दिला दो, मैं राणा बन जाऊँगा ।। बैरी के छक्के छूटेंगे, जब भाला चमकाऊँगा । शत्रु भाग जायेंगे डर कर समर-भूमि जब जाऊँगा ।। इतने पर भी डटे रहे वह तो फिर रण होगा भारी । कट कर शीश अनेक गिरेंगे , देखेगी दुनिया सारी ।। चाहे शीश कटे मेरा भी तनिक नहीं घबराऊँगा । पिता, आपका वीर-पुत्र हूँ, वर दो, लड़ने जाऊँगा ।।
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