राइट टू रिजेक्ट  

राइट टू रिजेक्ट
राइट टू रिजेक्ट
विवरण भारत में चुनावों का आयोजन भारतीय संविधान के तहत बनाये गये 'भारतीय निर्वाचन आयोग' द्वारा किया जाता है।
स्थापना 25 जनवरी, 1950
अधिकार क्षेत्र भारत
मुख्यालय नई दिल्ली
विशेष नकारात्मक मतदान की अवधारणा 13 देशों में प्रचलित है और भारत में भी सांसदों को संसद भवन में मतदान के दौरान ‘अलग रहने’ के लिए बटन दबाने का विकल्प मिलता है।
अन्य जानकारी भारत में राइट टू रिकॉल (चुने हुए जन-प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार) की बात सबसे पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 4 नवंबर 1974 को संपूर्ण क्रांति के दौरान कही थी।

राइट टू रिजेक्ट अर्थात नकारात्मक मतदान का मतलब है अगर कोई व्यक्ति वोट देते समय मौजूदा उम्‍मीदवारों में से किसी को नहीं चुनना चाहता है तो वह 'नन ऑफ दीज' बटन का प्रयोग कर सकता है। इस अधिकार का अर्थ मतदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में वह सुविधा और अधिकार देना जिसका इस्तेमाल करते हुए वे उम्मीदवारों को नापसंद कर सकें। यदि मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं हो तो वह इस विकल्प को चुन सकता है।[1]

आंदोलन

2009 में अण्णा हज़ारे की टीम ने दिल्ली में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन करते समय सरकार से राइट टू रिजेक्‍ट और राइट टू रिकॉल जैसे विषय पर संसद में प्रस्‍ताव पारित कर इन्हें लागू करने की मांग की थी, जिसका सरकार को छोड़ सभी दलों ने समर्थन किया था। 2009 में ही भारतीय चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव में राइट टू रिजेक्‍ट विकल्प को लागू करने की मांग की थी, जिसका सरकार ने काफ़ी विरोध किया था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 क्‍या है राइट टू रिजेक्‍ट..? (हिन्दी) वेबदुनिया हिंदी। अभिगमन तिथि: 21 मई, 2014।

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