किनाराम बाबा  

किनाराम बाबा
किनाराम बाबा
पूरा नाम किनाराम बाबा
जन्म विक्रम संवत 1758 के लगभग
जन्म भूमि वाराणसी
मृत्यु 1800 विक्रम संवत
कर्म भूमि भारतीय
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी औघड़ शक्ति का साधक होता है। चंडी, तारा, काली यह सब शक्ति के ही रूप हैं, नाम हैं। यजुर्वेद के रुद्राध्याय में रुद्र की कल्याणकारी मूर्ति को शिवी की संज्ञा दी गई है, शिवा को ही अघोरा कहा गया है। रुद्र अघोरा शक्ति से संयुक्त होने के कारण ही शिव हैं। बाबा किनाराम ने इसी अघोरा शक्ति की साधना की थी।
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किनाराम बाबा(अंग्रेज़ी-Keenaram Baba) उत्तर भारतीय परंपरा के संत थे, जिनका यश परवर्त्ती काल में सम्पूर्ण भारत में फैल गया। ये आध्यात्मिक संस्कार के अत्यंत प्रबल तथा प्रकाण्ड विद्वान् थे। उन्होंने उत्तराखंड हिमालय में बहुत वर्षों तक कठोर तपस्या करने के बाद किनाराम वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट के श्मशान पर रहने वाले औघड़ बाबा कालूराम के पास पहुँचे। कालूराम जी बड़े प्रेम से दाह किए हुए शवों की बिखरी पड़ी खोपड़ियों को अपने पास बुला-बुलाकर चने खिलाते थे। किनाराम को यह व्यर्थ का खिलवाड़ लगा और उन्होंने अपनी सिद्धि शक्ति से खोपड़ियों का चलना बंद कर दिया। कालूराम ने ध्यान लगाकर समझ लिया कि यह शक्ति केवल किनाराम में है।[1]

जन्म तथा शिक्षा

किनाराम का जन्म वाराणसी के चंदोली तहसील के ग्राम रामगढ़ में एक कुलीन रघुवंशी क्षत्रिय परिवार में विक्रम संवत 1758 के लगभग हुआ था। किनाराम की द्विरागमन के पूर्व ही पत्नी का देहान्त हो गया। उसके कुछ दिन बाद उदास होकर किनाराम घर से निकल गये और गाज़ीपुर ज़िले के कारो नामक गाँव के संयोजी वैष्णव महात्मा शिवादास कायस्थ की सेवा टहल में रहने लगे और कुछ दिनों के बाद उन्हीं के शिष्य हो गये। कुछ वर्ष गुरुसेवा करके उन्होंने गिरनार पर्वत की यात्रा की। वहाँ पर किनाराम ने भगवान दत्तात्रेय का दर्शन किया और उनसे अवधूत वृत्ति की शिक्षा लेकर उनकी आज्ञा से काशी लौटे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

पाण्डेय, डॉ. राजबली हिन्दू धर्मकोश (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, पृष्ठ सं 187।

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 किनाराम बाबा (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 9 अगस्त, 2015।
  2. कृमिकुंड
  3. वाराणसी
  4. गाजीपुर

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