नाना फड़नवीस  

नाना फड़नवीस
नाना फड़नवीस
जन्म 12 फरवरी 1742 ई.
मृत्यु तिथि 13 मार्च 1800 ई.
प्रसिद्धि नाना फड़नवीस अपनी चतुराई और बुद्धिमत्ता के लिये बहुत प्रसिद्ध था।
युद्ध 1775 से 1783 ई. तक अंग्रेज़ों के विरुद्ध प्रथम मराठा युद्ध तथा 1784 ई. में नाना फड़नवीस ने मैसूर के शासक टीपू सुल्तान से लोहा लिया था।
शासन काल 1774 ई.-1800 ई.
संबंधित लेख शिवाजी, शाहजी भोंसले, शम्भाजी पेशवा, बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव प्रथम, बाजीराव द्वितीय, राजाराम शिवाजी, ग्वालियर, दौलतराव शिन्दे, सालबाई की सन्धि, टीपू सुल्तान, मैसूर युद्ध, आंग्ल-मराठा युद्ध, पानीपत युद्ध
अन्य जानकारी राज्य में विरोधियों के होते हुए भी नाना फड़नवीस अपनी चतुराई से समस्त विरोधों के बावजूद अपनी सत्ता बनाये रखने में सफल रहा। 1775 ई. से 1783 ई. तक उसने अंग्रेज़ों के विरुद्ध प्रथम मराठा युद्ध का संचालन किया। सालबाई की सन्धि से इस युद्ध की समाप्ति हुई थी।

नाना फड़नवीस (अंग्रेज़ी: Nana Fadnavis, जन्म: 12 फरवरी 1742 ई.- मृत्यु: 13 मार्च 1800 ई.) एक मराठा राजनेता था, जो पानीपत के तृतीय युद्ध के समय पेशवा की सेवा में नियुक्त था। वह अपनी चतुराई और बुद्धिमत्ता के लिये बहुत प्रसिद्ध है। 1800 ई. में नाना फड़नवीस की मृत्यु हो गई थी। नाना फड़नवीस ने रघुनाथराव (राघोवा) की स्वयं पेशवा बनने की सारी कोशिशें नाकाम कर दी थीं। नाना फड़नवीस का टीपू सुल्तान से भी युद्ध हुआ था। उसने मराठा साम्राज्य की शक्ति को एक छत्र के नीचे एकत्र करने की सफल चेष्टा की थी। पेशवा शासन के दौरान नाना फड़नवीस मराठा साम्राज्य के प्रभावशाली मंत्री व कूटनीतिज्ञ थे। यूरोपीयों द्वारा उन्हें मराठा मैकियावेली (सुप्रसिद्ध इतालवी कूटनीतिज्ञ निकोलो मैकियावेली पर आधारित नाम) कहा जाता था।

मराठा राज्य का संचालन

नाना फड़नवीस युद्धभूमि से जीवित लौट आया था। इसके बाद 1773 ई. में नारायणराव पेशवा की हत्या करा कर उसके चाचा राघोवा ने जब स्वयं गद्दी हथियाने का प्रयत्न किया, तो उसने उसका विरोध किया। नाना फड़नवीस ने नारायणराव के मरणोपरान्त उत्पन्न पुत्र माधवराव नारायण को 1774 ई. में पेशवा की गद्दी पर बैठाकर राघोवा की चाल विफल कर दी। नाना फड़नवीस ही अल्पवयस्क पेशवा का मुख्यमंत्री बना और 1774 से 1800 ई. में मृत्युपर्यन्त मराठा राज्य का संचालन करता रहा। किन्तु उसकी स्थिति निष्कंटक न थी, क्योंकि अन्य मराठा सरदार, विशेषकर महादजी शिन्दे उसके विरोधी थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 220।

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