ज्योति खरे  

ज्योति खरे
ज्योति खरे
पूरा नाम ज्योति खरे
जन्म 5 जुलाई, 1956
जन्म भूमि जबलपुर, मध्य प्रदेश
अभिभावक श्री गुलाब राय खरे और श्रीमती प्रमिला देवी खरे
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र लेखक, कवि
मुख्य रचनाएँ 'होना तो कुछ चाहिए'
भाषा हिन्दी, अंग्रेज़ी
शिक्षा स्नातकोत्तर (हिन्दी साहित्य)
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी ज्योति खरे भारत की लगभग सभी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन और सोशल मीडिया आदि संचार माध्यमों में समान रूप से सक्रिय हैं।
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ज्योति खरे (अंग्रेज़ी: Jyoti Khare, जन्म: 5 जुलाई, 1956, जबलपुर) भारत के प्रतिष्ठित कवियों में माने जाते हैं। वे विगत तीस वर्षों से हिन्दी भाषा की साहित्यिक साधना में रत हैं और भारत की लगभग सभी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन और सोशल मीडिया आदि संचार माध्यमों में समान रूप से सक्रिय हैं। ज्योति खरे की प्रतिष्ठा सोशल मीडिया आदि माध्यमों से देश के कोने-कोने में फैले उनके हज़ारों प्रशंसकों के प्रेम-प्रदर्शनों द्वारा स्वतः ही स्पष्ट हो जाती है।

जीवन परिचय

ज्योति खरे का जन्म 5 जुलाई, 1956 को श्री गुलाब राय खरे और श्रीमती प्रमिला देवी खरे के घर जबलपुर, मध्य प्रदेश में हुआ था। ये पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। बाद में श्री गुलाब राय खरे का स्थानान्तरण कटनी हो गया, जिसकी वजह से परिवार कटनी में ही बस गया। गुलाब राय खरे रेलवे में कार्यरत थे। वे एक विशुद्ध कामरेड थे और यूनियन में खासा प्रभाव रखते थे। ऐसे में ज्योति खरे को सादगी, परिश्रम, ईमानदारी, अध्ययन-वृत्ति और नेतृत्व आदि गुण बचपन में नैसर्गिक रूप से घर में ही मिले। चूँकि, श्री गुलाब राय खरे में ना तो संचय वृत्ति ही थी, ना ही अनुचित तरीके से धनोपार्जन को वे उचित समझते थे, इसीलिए इनकी माता को गृहस्थी चलाने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती थी. अपने बारे में बताते हुए उन्होंने लिखा है – “...अम्मा ने सिखाया कि भोग रहे यथार्थ को सहना पड़ता है। सम्मान और अपमान होते क्षणों में मौन रहकर समय को परखना पड़ता है।”

1985 में स्नातकोत्तर करने के साल भर बाद ही 13 फ़रवरी, 1986 को सुश्री सुनीता वर्मा से उनका विवाह हो गया, जिनसे उन्हें शुभांश खरे पुत्र एवं अवनि खरे पुत्री हैं। आज लगभग साठ वर्षों के अपने संघर्षों से भरे किन्तु गरिमामय जीवन को बताते हुए वो जैसे पलट कर देखते हैं, और अपने तमाम कष्टों पर हँस रही अपनी आँखों में कहीं दूर डूबकर बताते हैं “...आदमी के भीतर पल रहे आदमी का यही सच है। और आदमी होने का सुख भी यही है।”

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