आपेक्षिकता सिद्धांत  

आपेक्षिकता सिद्धांत (रिलेटिविटी थ्योरी) संक्षेप में यह है कि 'निरपेक्ष' गति तथा 'निरपेक्ष' त्वरण का अस्तित्व असंभव है, अर्थात्‌ 'निरपेक्ष गति' एवं 'निरपेक्ष त्वरण' शब्द वस्तुत: निरर्थक हैं। यदि 'निरपेक्ष गति' का अर्थ होता तो वह अन्य पिंडो की चर्चा किए बिना ही निश्चित हो सकती। परंतु सब प्रकार से चेष्टा करने पर भी किसी पिंड की 'निरपेक्ष' गति का पता निश्चित रूप से प्रयोग द्वारा प्रमाणित नहीं हो सका है और अब तो आपेक्षिकता सिद्धांत बताता है कि ऐसा निश्चित करना असंभव है। आपेक्षिकता सिद्धांत से भौतिकी में एक नए दृष्टिकोण का प्रारंभ हुआ। भौतिकी के कतिपय पुराने सिद्धांतों का दृढ़ स्थान आपेक्षिकता सिद्धांत से डिग गया और अनेक मौलिक कल्पनाओं के विषय में सूक्ष्म विचार करने की आवश्यकता दिखाई देने लगी। विज्ञान में सिद्धांत का कार्य प्राय: ज्ञात फलों को व्यवस्थित रूप से सूत्रित करना होता है और तत्पश्चात्‌ उस सिद्धांत से नए फलों का अनुमान करके प्रयोग द्वारा उन फलों की परीक्षा की जाती है। आपेक्षिकता सिद्धांत इन दोनों कायाँ में सफल रहा है।

19 वीं शताब्दी के अंत तक भौतिकी का विकास न्यूटन प्रणीत सिद्धांतों के अनुसार हो रहा था। प्रत्येक नए आविष्कार अथवा प्रायोगिक फल को इन सिद्धांतों के दृष्टिकोण से देखा जाता था और आवश्यक नई परिकल्पनाएँ बनाई जाती थीं। इनमें सर्वव्यापी ईथर का एक विशिष्ट स्थान था। ईथर के अस्तित्व की कल्पना करने के दो प्रमुख कारण थे। प्रथम तो विद्युच्चुंबकीय तरंगों के कंपन का एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रसरण होने के लिए ईथर जैसे माध्यम की आवश्यकता थी। द्वितीय, याँत्रिकी में न्यूटन के गति तथा त्वरण विषयक समीकरणों के लिए, और जिस पार्श्वभूमि पर ये समीकरण आधारित थे उसके लिए भी, एक प्रामाणिक निर्देशक (स्टैंडर्ड ऑव रेफ़रेंस) की आवश्यकता थी। प्रयोगों के फलों का यथार्थ आकलन होने के लिए ईथर पर विशिष्ट गुणधर्मो का आरोपण किया जाता था। ईथर सर्वव्यापी समझा जाता था और संपूर्ण दिशाओं में तथा पिंडों में भी उसका अस्तित्व माना जाता था। इस स्थिर ईथर में पिंड बिना प्रतिरोध के भ्रमण कर सकते हैं, ऐसी कल्पना थी। इन गुणों के कारण ईथर को निरपेक्ष मानक समझने में कोई बाधा नहीं थी। प्रकाश की गति 3´1010 सें. मी. प्रति सेकेंड है, यह ज्ञात हुआ था और प्रकाश की तरंगें 'स्थिर' ईथर के सापेक्ष इस गति से विकीरित होती हैं, ऐसी कल्पना थी। याँत्रिकी में गति, त्वरण, बल इत्यादि के लिए भी ईथर निरपेक्ष मानक समझा जाता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सं.ग्रं.-ऐल्बर्ट आइंस्टाइन : रिलेटिविटी, स्पेशल ऐंड द जेनरल थ्योरी; ऐल्बर्ट आइंस्टाइन : दि मीनिंग ऑव रिलेटिविटी; सर आर्थर एडिंगटन : द मैथिमैटिकल थ्योरी ऑव रिलेटिविटी; सी. मोलर : द थ्योरी ऑव रिलेटिविटी।
  2. डॉ. देवीदास रघुनाथराव भवालकर
  3. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 383 |
  4. सं.ग्रं.-उपर्युक्त सं.ग्रं. के नवीनतम संस्करण।

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