ऊष्मा  

ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है, जो दो वस्तुओं के बीच उनके तापान्तर के कारण एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानान्तरित होती है। स्थानान्तरण के समय ही ऊर्जा ऊष्मा कहलाती है। वस्तु का ताप, वस्तु में ऊष्मा की मात्रा तथा वस्तु के पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है, जबकि किसी वस्तु में निहित ऊष्मा उस वस्तु के द्रव्यमान व ताप पर निर्भर करती है। ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है, जिसे कार्य में बदला जा सकता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सबसे पहले रमफोर्ड ने दिया। बाद में डेवी ने दो बर्फ़ के टुकड़े को आपस में घिसकर पिघला दिया। चुँकि बर्फ़ को पिघलने के लिए ऊष्मा का और कोई स्रोत नहीं था, अतः यह माना गया कि बर्फ़ को घिसने में किया कार्य बर्फ़ पिघलने के लिए ली गई आवश्यक ऊष्मा में बदल गया। बाद में जूल ने अपने प्रयोगों से इस बात की पुष्टि की कि "ऊष्मा ऊर्जा का ही एक रूप है।" जूल ने बताया कि जब कभी कार्य ऊष्मा में बदलती है, या ऊष्मा कार्य में बदलती है, तो किए गए कार्य व उत्पन्न ऊष्मा का अनुपात एक स्थिरांक होता है, या ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक कहते हैं तथा इसको से सूचित करते हैं। उष्मा (अंग्रेजी में हीट) की प्रकृति का अध्ययन तथा पदार्थों पर उसका प्रभाव जितना मानव हित से संबंधित है उतना कदाचित्‌ और कोई वैज्ञानिक विषय नहीं। उष्मा से प्राणिमात्र का भोजन बनता है। वसंत ऋतु के आगमन पर उष्मा के प्रभाव से ही कली खिलकर फूल हो जाती है तथा वनस्पति क्षेत्र में एक नए जीवन का संचार होता है। इसी के प्रभाव से अंडे से बच्चा बनता है। इन कारणों से यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पुरातन काल में इस बलवान्‌, प्रभावशील तथा उपयोगी अभिकर्ता से मानव प्रभावित हुआ तथा उसकी पूजा और अर्चना करने लगा। कदाचित्‌ इसी कारण मानव ने सूर्य की पूजा की। पृथ्वी पर उष्मा के लगभग संपूर्ण महत्वपूर्ण प्रभावों का स्रोत सूर्य है। कोयला, तेल, पेट्रोल, जिनसे हमें उष्मा प्राप्त होती है, प्राचीन युगों से संचित धूप का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इतिहास-उष्मा के सामान्य प्रभावों का स्पष्टीकरण करने के हेतु अग्नि-परमाणुओं का अविष्कार किया गया, जो पदार्थ के रध्राेंं के बीच प्रचंड गति से दौड़ते हुए तथा उसके अणुओं को तितर-बितर करते हुए माने गए थे। विचार था कि इसके फलस्वरूप ठोस पदार्थ द्रव में तथा द्रव वाष्प में परिवर्तित होते हैं।

विज्ञान के आरंभिक युग से लेकर वर्ममान शताब्दी के प्रारंभ तक उष्मा की प्रकृति के संबंध में दो प्रतिद्वंद्वी परिकल्पानएँ साधारणतया चली आई हैं। एक तो है उषिक सिद्धांत (कैलोरिक थ्योरी) जिसके अनुसार उष्मा को एक अति सूक्ष्म लचीला द्रव माना गया था जो पदार्थो के रध्राेंं में प्रवेश करके उनके अणुओं के बीच के स्थान को भर लेता है। दूसरा है प्राचीन यूनानियों द्वारा चलाया गया सिद्धांत जिसमें उष्मा के आधुनिक सिद्धांत का अंकुर पाया जाता है। इसके अनुसार उष्मा पदार्थ के कणों के द्रुत कंपन के कारण होती हैं; अत: इस मत के अनुसार उष्मा का कारण गति है। इस सिद्धांत के पोषक बहुत दिनों तक अल्प मत में रहे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 150-56 |
  2. सं.ग्रं.-जे.सी.मैक्सवेल : थ्योरी ऑव हीट, 11वाँ संस्करण, 1894; पी.एस. एप्स्टाइन : थर्मोडायनामिक्स (1937); आर.एच. फ़ाउलर और ई.ए. गुगेनहाइम : स्टैटिस्टिकल थर्मोडायनामिक्स (1937); जे. जीन्स : द डायनैमिकल थ्योरी ऑव गैसेज़ (1921); साहा और श्रीवास्तव : हीट। इस संबंध में अग्रलिखित लेख भी इस विश्वकोश में द्र. : उष्मागतिकी, उष्मामिति, उष्मायन, ऊर्जा, क्वांटम यांत्रिकी, क्वांटम सांख्यिकी, तापमान, तापविद्युत्‌, वाष्पायन, विकिरण।

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