शमशेर बहादुर सिंह की काव्य भाषा में बिम्ब विधान  

स्वान्त्र्योत्तर हिन्दी कविता में जैसे विषय बदले, वस्तु बदली और कवि की जीवन-दृष्टि बदली वैसे ही शिल्प के क्षेत्र में रूप-विधान के नये आयाम भी विकसित हुए। कविता की समीक्षा के मानदण्डों में एक बारगी युगान्तर आया और नये ढंग पर कविता की इमारत खड़ी की गई। कवि की अनुभूतियाँ नये अप्रस्तुतों और प्रतीकों को खोजते-खोजते बिम्ब के नये धरातलों को उद्‌घाटित करने में समर्थ हुई। कविता की जीवन्तता में प्राणशक्ति के रूप में बिम्ब ने अपना स्थान और महत्व पाया।
          प्रतीक और अप्रस्तुत तो प्रारम्भ से ही कविता की समीक्षा के प्रतिमानों के रूप में स्वीकृत थे, अब बिम्ब भी कविता के मूल्यांकन की कसौटी के रूप में स्वीकारा जाने लगा। यों तो बिम्बों के निर्माण और चयन की प्रक्रिया संस्कृत साहित्य में ही प्रचलित थी, किन्तु तत्कालीन कवियों और समीक्षकों ने, बल्कि आज़ादी से पहले तक हिन्दी के समीक्षकों ने भी बिम्ब को काव्य का प्राणतत्व नहीं माना था। आज़ादी के बाद कई नये संदर्भ, कई नये शैल्पिक प्रतिमान सामने आये। इसका कारण पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव तो था ही, विदेशों में चल रहा बिम्बवादी आन्दोलन भी था। छायावादियों ने भी अप्रत्यक्षतः शिल्प के अंग के रूप में ‘चित्रत्व’ को स्वीकार कर लिया था। सुमित्रानन्दन पन्त ने जब काव्य-भाषा के विवेचन के दौरान चित्रभाषा के प्रयोग की बात कही थी तो प्रकारानतर से बिम्ब को ही काव्य-शिल्प के अंग और आलोचना के प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया था। आचार्य शुक्ल भी बिम्ब को स्वीकृति दे चुके थे। उन्होंने ‘चिन्तामणि’ के एक निबन्ध में लिखा था, “काव्य का काम है कल्पना में बिम्ब या मूर्तभावना उपस्थित करना”[1] : स्पष्ट शब्दों में काव्य कल्पना-चित्र नहीं है, वरन् अनुभूतियों का मूर्तिकरण है।
बिम्ब काव्य-भाषा की तीसरी आँख है, जो मात्र गोचर ही नहीं, किसी अगोचर तत्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व (कालिदास-पहले से जो अवबोधन हो उसकी स्मृति)-रूप से, एक ओर कारयित्री और दूसरी ओर भावयित्री भाषा के लिए उपलब्ध करती है।
बिम्ब शब्द का अर्थ छाया, प्रतिच्छाया, अनुकृति या शब्दों के द्वारा भावांकन है। बिम्ब अंग्रेजी के इमेज शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। सी०डी० लेविस के अनुसार-

“The poetic image is more or less a sensuous picture in words, to some degree metaphorical, with an undernote and some human emotion, in its context but also charged with releasing into the reader a special poetic emotion or passion.”

अर्थात् काव्यात्मक बिम्ब एक संवेदनात्मक चित्र है जो एक सीमा तक अलंकृत-रूपतामक भावात्मक और आवेगात्मक होता है। लीविस ने बिम्ब को भावगर्भित चित्र ही माना है।[2]

डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, “बिम्ब किसी अमूर्त विचार अथवा भावना की पुनर्निर्मिति।[3]
एज़रा पाउण्ड के अनुसार, “बिम्ब वह है जो किसी बौद्धिक तथा भावात्मक संश्लेष को समय के किसी एक बिन्दु पर संभव करता है।”[4]
          हिन्दी की नयी कविता-धारा के कवि पश्चिम के काव्य और काव्यान्दोलनों से परिचित थे। ‘तार सप्तक’ में प्रभाकर माचवे ने अपनी कविता को ‘इम्प्रेशनिस्ट’ अथवा बिम्बवादी घोषित किया। फिर भी तीसरी सप्तक के कवि केदारनाथ सिंह से पहले बिम्ब-विधान को किसी ने अपने वक्तव्य में प्रमुखता नहीं दी थी। केदारनाथ सिंह ने घोषित किया कि “कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूँ बिम्ब-विधान पर।”[5]
          एक आधुनिक कवि की श्रेष्ठता की परीक्षा की कसौटी जहाँ अज्ञेय ‘शब्दों का आविष्कार’ को मानते हैं, वहीं केदारनाथ सिंह ‘बिम्बों की आविष्कृति’ को। अपनी पुस्तक ‘आधुनिक हिन्दी में बिम्ब विधान का विकास’ में उन्होंने बिम्ब के प्रतिमान पर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के साहित्य की परीक्षा की है। शमशेर की कृतियों में बिम्ब अधिक सजीव और ऐन्द्रिय हैं। उनके समकालीन रचनाकार बच्चन, अज्ञेय, अंचल, दिनकर, नरेन्द्र शर्मा की कृतियाँ अपनी बिम्बात्मक गुणात्मकता के कारण ही मूल्यवान हैं। शमशेर के काव्य में बिम्ब अधिक संश्लिष्ट और गहराई लिए हुए है। भले ही उसका क्षेत्र सीमित हो किन्तु इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि वे अनुभूति और विचार से संबद्ध होने के कारण अपना औचित्य लिए हुए हैं।
          शमशेर के बिम्ब रंग-ध्वनि-गंधपूर्ण हैं। उनके काव्य में नारी की मांसलता और प्रकृति की सुन्दरता के साथ कहीं-कहीं उनके बिम्ब यथार्थपरक स्वच्छन्द दृष्टि के सूचक हैं। शमशेर की कविता में लौकिक बिम्बों के साथ-साथ अलौकिक से बिम्बों की सृष्टि भी हुई है। शमशेर के काव्य में वस्तु या प्राकृतिक उपादानों का मूर्तकरण-मानवीकरण हुआ है, जो एक प्रकार की बिम्बात्मकता ही है। शमशेर कविता में जहाँ कल्पना है, वहाँ बिम्ब अधिक प्रभावशाली हैं। “कल्पना वह शक्ति है जो सर्वप्रथम कवि का वर्ण्य-विषय या वस्तु से सीधा साक्षात्कार कराती है।”[6]
          शमशेर की काव्य-भाषा प्रधानतः बिम्बात्मक है। सतर्कता के कारण वे बिम्बों का चयन बड़ी कुशलतापूर्वक कर सकते हैं। उनकी कुछ कविताएँ और कुछ और कविताएँ कृतियों के अलावा ‘काल तुमसे होड़ है मेरी’, ‘बात बोलेगी’ में भाषिक संवेदना के साथ बिम्बों-प्रतीकों का कौशल बहुत प्रभावशाली है। इस वैशिष्ट्य के बावजूद अपनी बनावट में शमशेर की कविता बिम्बों-प्रतीकों, रूपकों-उपमानों के सूक्ष्म संवेदन और चिन्तन-मनन की गहराई में डूब कर बखूबी समझी जा सकती है। उनकी काव्यात्मक संवेदना और रचनात्मक चेतना जिन वर्ण्य-विषयों को छूती है वे बिम्ब बनते हैं। उनके बिम्ब-विधान को अग्रांकित कोटियों में रख सकते हैं:-

  1. प्रकृति-बिम्ब
  2. गंध बिम्ब
  3. आस्वाद्य बिम्ब
  4. नाद बिम्ब
  5. दृश्य बिम्ब
  6. स्पर्श बिम्ब
  7. आद्य बिम्ब
  8. स्मृति बिम्ब
  9. भाव बिम्ब
  10. अप्रस्तुत बिम्ब

प्रकृति बिम्ब

शमशेर की कविता में प्रायः प्रकृति बिम्बों के साथ अन्य छोटे-छोटे बिम्बों का सुन्दर समन्वय हुआ है। उनके बिम्ब जन-जीवन के साधारण व्यापार को भी कहीं असाधारण अर्थवत्त प्रदान करते हैं। उनके प्रकृति बिम्बों में संश्लिष्ट रोमानी बिम्बों की मोहकता एवं मार्मिकता है। ये या ऐसे बिम्ब कहीं-कहीं कल्पनाजनित होकर भी अंततः यथार्थ से रूबरू कराते हैं, कहीं यथार्थपरक होकर भी कल्पना से लगते हैं। उनमें सघनता संश्लिष्टता है-वे वैज्ञानिक और आधुनिक जीवन से सम्बद्ध हैं। ‘एक नीला दरिया बरस रहा’, ‘सारनाथ की एक शाम’, ‘सागर तट सौन्दर्य’, ‘एक पीली शाम’, ‘ऊषा’, ‘पूर्णिमा का चाँद’, शाम होने को हुई, ‘सुबह रात्रि’, गीली मुलायम लटें’, ‘बसन्त आया’ आदि कविताएँ ऐसी हैं। ‘एक नीला आइना बेठोस’, ‘सूर्यास्त’ और ‘सागर तट’ कविता पंक्तियों में प्रकृति बिम्बों का बड़ा उदात्त चित्रण है-

(i) एक नीला आइना
               बेठोस सी यह चाँदनी
      और अन्दर चल रहा हूँ मैं
               उसी के महातल के मौन में।
मौन में इतिहास का कन किरन जीवित, एक, बस।[7]

“शमशेर के प्रकृति चित्रण में अतियथार्थवादी झलक बार-बार मिलती है। प्रकृति जितनी उनसे बाहर है, उतनी ही भीतर है। यह चित्रण यथार्थ है तो दूसरा अतियथार्थ। कविता में वर्णन की परम्परा और अनुभव का उन्मेष दोनों घुलते-मिलते हैं, पर शमशेर के यहाँ महत्व दूसरे का है। शायद यही कारण है कि प्रकृति चित्रण में उनका लगाव जितना जल था कि आकाश से है उतना मिट्टी से नहीं।”७

(ii) पी गया हूँ दृश्य वर्षा काः
           हर्ष बादल का
           हृदय में भर कर हुआ हूँ। हवा सा हल्का।
           धुन रही थीं सर
           व्यर्थ व्याकुल मत्त लहरें[8]

शमशेर में विराट प्रकृति आत्मीय कैसे हो उठती है, इसका अच्छा साक्ष्य उन की प्रसिद्ध कविता ‘सागर तट’ प्रस्तुत करती है। जल, पर्वत और वर्षा का व्यापक सन्दर्भ लेकर कवि ने उनसे एक घरेलू बिम्ब की रचना की है। प्रेम की मनोभूति पर इनकी अंतर्प्रक्रिया कल्पना को हौले से सक्रिय करती है-

(iii) चाँदनी में धुल गये हैं
               बहुत से तारे बहुत कुछ
               धुल गया हूँ मैं। बहुत कुछ अब।
               चल रहा है जो। शान्त सा इंगित सा
                न जाने किधर......... [9]

(iv) व्योम में फैले हुए मेहराब के विस्तार
       स्तूप औ, मीनार नभ को थामने के लिए
       उठते हुए।
       विकटतम थे अति विकटतम
       विगत के सोपान पर्वत श्रृंग[10]

(v)
पंक्तियों में टूटती-गिरती
चाँदनी में लौटती लहरें
बिजलियों-सी कौधती लहरें
मछलियों-सी बिछल पड़ती तड़पती लहरें
बार-बार[11]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चिन्तामणि - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पृ. 228
  2. सी.डी. लेविस - पोयटिक इमेज, पृ. 22
  3. हैलेः डॉ० नगेन्द्र द्वारा उद्धृत काव्यात्मक बिम्ब, पृ. 5
  4. रेनेवेलेक एण्ड अस्टिन वारेन - थिअरी ऑफ लिटरेचर, पृ.187
  5. कविता की तीसरी आँख - प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ. 30
  6. गिरिजा कुमार माथुरः काव्य दृष्टि और अभिव्यंजना -डॉ. राहुल, पृ. 153
  7. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 21 )
  8. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 37)
  9. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 21)
  10. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 33)
  11. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 38)
  12. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 40)
  13. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 41)
  14. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 144)
  15. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 154)
  16. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 68)
  17. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 36)
  18. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 36)
  19. (वही, पृष्ठ- 57)
  20. (शमशेरः प्रतिनिधि कवितायें, पृष्ठ- 19)
  21. (शमशेर प्रति० कवि पृष्ठ- 19)
  22. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 51)
  23. (शमशेर की प्रतिनिधि कविताएँ, पृष्ठ- 102)
  24. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 49)
  25. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 51)
  26. (कुछ और कविताऍं, पृष्ठ- 158)
  27. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 32)
  28. (वही, पृष्ठ- 70)
  29. (वही, पृष्ठ- 85)
  30. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 44)
  31. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 128)
  32. (वही, पृष्ठ- 131)
  33. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 64)
  34. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 48)
  35. (वही, पृष्ठ- 21)
  36. (वही, पृष्ठ- 62)
  37. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 37)
  38. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 87)
  39. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 32)
  40. (वही, पृष्ठ- 41)
  41. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 60)
  42. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 20)
  43. (वही, पृष्ठ- 43)
  44. (चुका भी हूँ मै नहीं, पृष्ठ- 36)
  45. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 71)
  46. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 35)
  47. (वही, पृष्ठ- 45)
  48. (वही, पृ०. 62)
  49. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 32)
  50. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 71)
  51. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 36)
  52. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 142)
  53. आचार्य शुक्ल - चिन्तामणि प्रथम भाग, पृष्ठ- 153
  54. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 53)
  55. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 153)
  56. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 42)
  57. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 87)
  58. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 62)
  59. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 15)
  60. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 50)
  61. (वही, पृष्ठ- 31)
  62. (वही, पृष्ठ- 107)
  63. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 38)
  64. आधुनिक हिन्दी कविता में शिल्प - कैलाश वाजपेयी, पृष्ठ-284
  65. शमशेरः कवि से बड़े आदमी - सं० महावीर अग्रवाल, पृष्ठ- 113
  66. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 24)
  67. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 17)
  68. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 108)
  69. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 87)
  70. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 155)
  71. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 154)
  72. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 63)
  73. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 65)
  74. शमशेरः कवि से बड़े आदमी - सं० महावीर अग्रवाल, पृष्ठ- 113

मौर्य, डॉ. मानवी (कुशवाहा)। शमशेर बहादुर सिंह की काव्य भाषा में बिम्ब विधान (हिन्दी) साहित्यकुञ्ज। अभिगमन तिथि: 30 जनवरी, 2015।

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=शमशेर_बहादुर_सिंह_की_काव्य_भाषा_में_बिम्ब_विधान&oldid=605257" से लिया गया