प्लेग  

लक्षण

प्लेग का लक्षण

प्लेग की बीमारी के जीवाणु सबसे पहले ख़ून को प्रभावित करते हैं जिसके कारण रोगी को जाड़ा देकर तेज़ बुखार जकड़ लेता है और अनियमित ढंग से घटता-बढ़ता है। इस प्रकार की बीमारी होने पर कुछ समय में ही बुखार बहुत ही विशाल रूप ले लेता है और रोगी के हाथ - पांव में अकड़न होने लगती है। इस रोग के होने पर रोगी के सिर में तेज़ दर्द, पसलियों का दर्द, उल्टियां एवं दस्त होते रहते हैं। इसके साथ-साथ रोगी की आँखें लाल हो जाती है और कफ व पेशाब के साथ ख़ून निकलने लगता है। इस रोग के होने पर रोगी को बेचैनी बढ़ जाती है। हृदयदौर्बल्य तथा अवसन्नता, तिल्ली बढ़ना और रक्तस्त्रावी दाने निकलना, जिससे शरीर काला पड़ जाता है और रोग का काली मौत नाम सार्थक होता है। प्लेग की बीमारी पनपने में एक से सात दिन लग सकते हैं।[4]

प्रकार

प्लेग 4 मुख्य प्रकार का होता है -

  1. ब्यूबोनिक - जब प्लेग के रोग में रोगी को गिल्टी निकल आती है तो उसे बेबक्यूनिंग कहते हैं।
  2. न्यूब्योनिक - प्लेग रोग होने पर रोगी के फेफड़ों में जलन उत्पन्न होने लगता है तो उसे न्यूब्योनिक कहते हैं।
  3. सेप्टिसम - प्लेग रोग से ग्रस्त रोगी का जब ख़ून दूषित होकर ख़राब हो जाता है तो सेप्टिसम कहते हैं।
  4. इंटेसटिनल - जब प्लेग रोग से ग्रस्त रोगी की अन्तड़ियों में विकार उत्पन्न होने लगता है तो इंटेसटिनल कहते हैं।
  • और दूसरे प्रकार भी -

1. रक्तपूतित प्लेग घातक प्रकार है, जिसमें रक्त में जीवाणु वर्तमान होते हैं,
2. कोशिका त्वचीय प्लेग, जिसमें त्वचा पर कारबंकल से फोड़े निकल आते हैं,
3. स्फोटकीय प्लेग, जिसमें शरीर में दाने निकलते हैं,
4. गुटिका प्लेग, जिसमें रोग कंठ में होता है,
5. अवर्धित प्लेग तथा जो प्लेग का हल्का आक्रमण है और जिसमें केवल गिल्टी निकलती है,
6. प्रमस्तिष्कीय प्लेग[2]

ब्यूबोनिक प्लेग (गिल्टी प्लेग) -
ब्यूबोनिक प्लेग के लक्षण

जब किसी व्यक्ति को प्लेग रोग हो जाता है तो उसकी जांघ, गर्दन आदि अंगों की ग्रन्थियों में दर्द के साथ सूजन हो जाती है, इस रोग से पीड़ित रोगी की गिल्टी एक के बाद दूसरी फिर तीसरी सूजती है और फिर फूटती है। कभी-कभी एक साथ कई गिल्टियां निकल आती है और दर्द करने लगती है। जिसे ब्यूबोज कहते हैं और बुख़ार आता है। यदि गिल्टियां 4-5 दिनों में फूट जाती है और बुखार उतर जाता है तो उसे अच्छा समझना चाहिए नहीं तो इस रोग का परिणाम और भी ज़्यादा खतरनाक हो सकता है। लेकिन कुछ समय में ये 7-10 दिनों के बाद फूटती है। इस प्रकार का प्लेग रोग अधिक होता है। ब्यूबॉनिक प्लेग मुख्यतया चूहों के शरीर पर पलने वाले पिस्सुओं के काटने की वजह से फैलती है। ये बीमारी केवल मरीज़ के संपर्क में आने से तो नहीं लगती लेकिन मरीज़ की ग्रंथियों से निकले द्रव्यों के सीधे संपर्क में आने से ब्यूबॉनिक प्लेग हो सकता है।

न्यूमोनिक प्लेग -
न्यूमोनिक प्लेग के लक्षण

न्यूमॉनिक प्लेग की वारदातें अपेक्षाकृत कम होती हैं, न्यूमोनिक प्लेग रोग जब किसी व्यक्ति को हो जाता है तो इसका आक्रमण सबसे पहले फेफड़ों पर होता है जो फेफड़ों का इन्फेक्शन होता है। इसके परिणाम स्वरूप निमोनिया पनपकर तेज़ीसे फैलता है और रोगी व्यक्ति को कई प्रकार के रोग हो जाते हैं जैसे- खांसी, सांस लेने में कष्ट, सॉंस का भारीपन, छाती में दर्द, दम फूलना, शरीर में ठंड लगकर सिर में दर्द होना, नाड़ी में तेज़ दर्द, कलेजे में दर्द, प्रलाप, पीठ में दर्द तथा फेफड़ों से रक्त का स्राव होना आदि और चिकित्सा न किये जाने पर तीव्र श्वसन फेलयर हो जाता है। न्यूमोनिक प्लेग रोग गिल्टी वाले प्लेग रोग से बहुत अधिक घातक होता है तथा रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक परेशान करता है। आमतौर पर यह कम घातक होता है किन्तु यह खतरनाक और चिकित्सा न करने पर घातक होता है। न्यूमॉनिक प्लेग ज़्यादा संक्रामक है। ये बीमारी रोगी के सीध संपर्क में आने से उसकी सांसों या खांसी से निकले बैक्टीरिया के संक्रमण से हो सकता है।

सेप्टीसिमिक प्लेग (शरीर में सड़न पैदा करने वाला प्लेग) -

जब यह प्लेग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो रोगी के शरीर के कई अंग सिकुड़ कर सड़ने लगते हैं और रोगी के शरीर का ख़ून ज़हरीला हो जाता है। रोगी की शारीरिक क्रियाएं बंद हो जाती हैं। इस रोग के होने के कारण रोगी को बहुत अधिक परेशानी होती है। जब यह प्लेग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो वह व्यक्ति 2-3 दिनों से अधिक जीवित नहीं रह पाता है।

इंटेस्टिनल प्लेग (आंत्रिक प्लेग) -

इस रोग का प्रकोप रोगी व्यक्ति की आंतों पर होता है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लग जाता है और उसके पेट और कमर में दर्द होने लगता है तथा उसे दस्त भी होने लगते हैं। जब रोगी व्यक्ति को यह रोग होने वाला होता है तो उसकी तबियत गिरी-गिरी सी रहने लगती है तथा उसके शरीर में सुस्ती और कमज़ोरी बढ़ जाती है। रोगी की यह अवस्था 1 घण्टे से लेकर 7 दिनों तक रह सकती है। फिर इसके बाद रोग का प्रकोप और भी तेज़ हो जाता है। जब रोगी की अवस्था ज़्यादा गम्भीर हो जाती है तो उसे ठंड लगने लगती है तथा तेज़ बुखार हो जाता है, रोगी के सिर में दर्द होता है, रोगी के हाथ-पैर ऐठने लगते हैं। रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द होता है तथा उसे बहुत अधिक कमज़ोरी आ जाती है। रोगी व्यक्ति के गालों का रंग पीला पड़ जाना, आंखों के आगे गड्ढें हो जाना, नाड़ी और श्वास में तीव्रता, भूख कम हो जाना, आवाज़ धीमा हो जाना, चैतना शून्य, प्रलाप, पेशाब का कम बनना या बिल्कुल न बनना, मुंह तथा जननेन्द्रियों से रक्तस्राव होना, अनिंद्रा तथा जीभ का लाल हो जाना तथा सूजन हो जाना आदि लक्षण रोगी में दिखने लगता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 प्लेग (हिन्दी) (पी.एच.पी) wapedia। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 प्लेग (हिन्दी) (पी.एच.पी) JKhealthworld.com। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011
  3. 3.0 3.1 प्लेग (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) HELP। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011
  4. 4.0 4.1 प्लेग (हिन्दी) (पी.एच.पी) JKhealthworld.com। अभिगमन तिथि: 28 फ़रवरी, 2011

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