पंचगव्य  

पंचगव्य

पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध (गोदुग्ध), दही (गोदधि), घी (गोघृत), मूत्र (गोमूत्र), एवं गोबर (गोमय) के विशेष अनुपात के सम्मिश्रण से किया जाता है। पंचगव्य का निर्माण देसी मुक्त वन विचरण करने वाली गायों से प्राप्त उत्पादों द्वारा ही करना चाहिए।

पंचगव्य का धार्मिक महत्व

इसे विविध रूपों में प्रयोग किया जाता है। हिन्दुओं के कोई भी मांगलिक कार्य इनके बिना पूरे नहीं होते। भारत के गांव-गांव और शहर-शहर में आज भी मांगलिक उत्सवों, पूजा-पाठ में प्रसाद के रूप में पंचगव्य वितरण को ही प्रधानता दी जाती है। गृह शुद्धि और शरीर शुद्धि के लिए पंचगव्यों का प्रयोग किया जाता है। "धर्मशास्त्र" के अनुसार किसी पाप के प्रायश्चित के रूप में पंचगव्यों को पान करने का विधान है। पंचगव्य का पान करने से पहले बोलें - "हे सूर्यदेव! हे अग्निदेव! आप तन, मन, बुद्धि और हड्डियों तक के रोगों को नष्ट करने वाले हैं। मैं इसका पान करता हूँ।" ऐसा 3 बार बोलें। फिर 2-3 घंटे तक कुछ नहीं खाना-पीना चाहिये।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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