शालिग्राम  

शालिग्राम / 'सालिग्राम'

पद्म पुराण के अनुसार चार भुजाधारी भगवान विष्णु के दाहिनी एवं ऊर्ध्व भुजा के क्रम से अस्त्र विशेष ग्रहण करने पर केशव आदि नाम होते हैं अर्थात, दाहिनी ओर का ऊपर का हाथ, दाहिनी ओर का नीचे का हाथ, बायीं ओर का ऊपर का हाथ और बायीं ओर का नीचे का हाथ- इस क्रम से चारों हाथों में शंख, चक्र आदि आयुधों को क्रम या व्यतिक्रमपूर्वक धारण करने पर भगवान की भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ होती हैं। उन्हीं संज्ञाओं का निर्देश करते हुए यहाँ भगवान का पूजन बतलाया जाता है।

  • उपर्युक्त क्रम से चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले विष्णु का नाम 'केशव' है।
  • पद्म, गदा, चक्र और शंख के क्रम से शस्त्र धारण करने पर उन्हें 'नारायण' कहते हैं।
  • क्रमश: चक्र, शंख, पद्म और गदा ग्रहण करने से वे 'माधव' कहलाते हैं।
  • गदा, पद्म, शंख और चक्र-इस क्रम से आयुध धारण करने वाले भगवान का नाम 'गोविन्द' है।
  • पद्म, शंख, चक्र और गदाधारी विष्णु रूप भगवान को प्रणाम है।
  • शंख, पद्म, गदा और चक्र धारण करने वाले मधुसूदन-विग्रह को नमस्कार है।
  • गदा, चक्र, शंख और पद्म से युक्त त्रिविक्रम को तथा
  • चक्र, गदा, पद्म और शंखधारी वामन मूर्ति को प्रणाम है।
  • चक्र, पद्म और गदा धारण करने वाले श्रीधर रूप को नमस्कार है।
  • चक्र, गदा, शंख तथा पद्मधारी हृषीकेश! आपको प्रणाम है।
  • पद्म, शंख, गदा और चक्र ग्रहण करने वाले पद्मनाभ विग्रह को नमस्कार है।
  • शंख, गदा, चक्र और पद्मधारी दामोदर! आपको मेरा प्रणाम है।
  • शंख, कमल, चक्र तथा गदा धारण करने वाले संकर्षण को नमस्कार है।
  • चक्र, शंख गदा तथा पद्म से युक्त भगवान वासुदेव! आपको प्रणाम है।
  • शंख, चक्र, गदा और कमल आदि के द्वारा प्रद्युम्नमूर्ति धारण करनेवाले भगवान को नमस्कार है।
  • गदा, शंख, कमल तथा चक्रधारी अनिरुद्ध को प्रणाम है।
  • पद्म, शंख, गदा और चक्र से चिह्नित पुरुषोत्तम रूप को नमस्कार है।
  • गदा, शंख, चक्र और पद्म ग्रहण करने वाले अधोक्षज को प्रणाम है।
  • पद्म, गदा, शंख और चक्र धारण करने वाले नृसिंह भगवान को नमस्कार है।
  • पद्म, चक्र, शंख और गदा लेने वाले अच्युतस्वरूप को प्रणाम है।
  • गदा, पद्म, चक्र और शंखधारी श्रीकृष्ण विग्रह को नमस्कार है।

शालिग्राम का स्वरूप और महिमा का वर्णन

  • जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान श्री गदाधर का स्वरूप समझना चाहिये।
  • संकर्षण मूर्ति में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है।
  • प्रद्युम्न के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है।
  • अनिरुद्ध की मूर्ति गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नील वर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है।
  • भगवान नारायण श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है।
  • भगवान नृसिंह की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं। ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है। वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं।
  • जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों; वह वाराह भगवान का स्वरूप है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है। भगवान वाराह भी सबकी रक्षा करने वाले हैं। कच्छप की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है। उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है। उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है।
  • श्रीधर की मूर्ति में पाँच रेखाएँ होती हैं
  • वनमाली के स्वरूप में गदा का चिह्न होता है।
  • गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह वामन मूर्ति की पहचान है।
  • जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान अनन्त की प्रतिमा है।
  • दामोदर की मूर्ति स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है। उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है। भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं।
  • जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को ब्रह्मा की मूर्ति समझनी चाहिये।
  • जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह श्रीकृष्ण का स्वरूप है। वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है।
  • हयग्रीव मूर्ति अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है।
  • भगवान वैकुण्ठ कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं। उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है। वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है।
  • मत्स्य भगवान की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है। उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है।
  • जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान श्री रामचन्द्रजी का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं।
  • द्वारकापुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप भगवान गदाधर को नमस्कार है, उनका दर्शन बड़ा ही उत्तम है।
  1. भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं।
  2. लक्ष्मीनारायण दो चक्रों से
  3. त्रिविक्रम तीन से
  4. चतुर्व्यूह चार से
  5. वासुदेव पाँच से
  6. प्रद्युम्न छ: से
  7. संकर्षण सात से
  8. पुरुषोत्तम आठ से
  9. नवव्यूह नव से
  10. दशावतार दस से
  11. अनिरुद्ध ग्यारह से
  12. द्वादशात्मा बारह चक्रों से युक्त होकर जगत की रक्षा करते हैं।
  13. इससे अधिक चक्र चिह्न धारण करने वाले भगवान का नाम अनन्त है।
  • दण्ड, कमण्डलु और अक्षमाला धारण करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा तथा
  • पाँच मुख और दस भुजाओं से सुशोभित वृषध्वज महादेव जी अपने आयुधों सहित शालग्रामशिला में स्थित रहते हैं।
  • गौरी, चण्डी, सरस्वती और महालक्ष्मी आदि माताएँ, हाथ में कमल धारण करनेवाले सूर्यदेव, हाथी के समान कंधेवाले गजानन गणेश, छ: मुखों वाले स्वामी कार्तिकेय तथा और भी बहुत-से देवगण शालिग्राम प्रतिमा में मौजूद रहते हैं, अत: मन्दिर में शालिग्राम शिला की स्थापना अथवा पूजा करने पर ये उपर्युक्त देवता भी स्थापित और पूजित होते हैं। जो पुरुष ऐसा करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। तवाहमिति माँ मत्वा क्षमस्व मधुसूदन॥ (पद्म पुराण,79।44)
  2. या दृष्टा निखिलाघसंशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी।
    प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम:॥ (पद्मपुराण)
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