तिरूपति में विष्णु  

हमारे प्राचीन ग्रन्थों में विनम्रता का मनुष्यों का ही नहीं देवताओं का भी सर्वोच्च गुण माना गया है। इसका अर्थ है कि अपनी हानि होने पर भी अपनी शिष्टता तथा सभ्यता को न खोना तथा दूसरों का किसी प्रकार भी अपमान न करना, मीठी वाणी बोलते हुए दूसरे का स्वागत-सत्कार करना। महर्षि भृगु वेदों के काल में हुए हैं तथा सप्तर्षि मण्डल में से एक हैं। वे अत्यन्त बुद्धिमान तथा सामर्थ्यवान ऋषि माने जाते थे। वे मन्त्र योगी तथा सिद्ध पुरुष थे। उनकी पहुंच पृथ्वी पर ही नहीं सभी लोकों में समान थीं। वे अपनी मनः शक्ति से क्षणमात्र में कहीं भी पहुंच सकते थे।

एक बार कुछ ऋषियों में यह विचार उत्पन्न हुआ कि तीनों देवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश में सबसे बड़ा कौन है? इसे कैसे जाना जाए तथा इसकी परीक्षा कौन ले। सभी की दृष्टि भृगु ऋषि पर पड़ी, क्योंकि वे ही इतने साहस वाले थे कि देवताओं की परीक्षा ले सकें। महर्षि भृगु भी अन्य ऋषियों का आशय समझ गए और वे इस काम के लिए तैयार हो गए। ऋषियों से विदा लेकर वे सर्वप्रथम अपने पिता ब्रह्म के पास, जिनके वे मानसपुत्र थे, पहुंचे। ब्रह्मा जी की परीक्षा के लिए उन्होंने उन्हें प्रणाम नहीं किया इससे ब्रह्मा जी अत्यन्त कुपित हुए और बजाय उन्हें प्रिय वचनों द्वारा शिष्टता सिखाने के अपना कमण्डल लेकर उन्हें मारने (शाप) के लिए भागे। भृगु ऋषि चुपचाप वहां से चले आए। फिर वे शिव जी महाराज के पास पहुंचे। यहाँ भी उन्होंने यही धृष्टता की तथा बिना अन्दर आने की सूचना भेजे स्वंय प्रवेश कर गए। शिव जी महाराज भी उन पर बहुत क्रोधित हुए तथा अपना त्रिशूल लेकर उन पर दौड़े। उस समय माता पार्वती उनकी जंघा पर विराजमान थीं। महर्षि भृगु इनसे भी संतुष्ट नहीं हुए। अंत में वे भगवान विष्णु के पास क्षीर सागर पहुंचे। यहाँ उन्होंने क्या देखा कि विष्णु जी शेष शय्या पर लेटे हुए निद्रा ले रहे हैं और देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही है। महर्षि भृगु दो जगह डांट खाकर आ रहे थे। इसलिए उन्हें स्वाभाविक रूप से क्रोध आ रहा था। विष्णु जी को सोते हुए देखकर उनका पारा और गरम हो गया और उन्होंने विष्णु जी की छाती में एक लात मारी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अथर्ववेद 1/34/2

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