अंतर्राष्ट्रीय विधि निजी  

अंतर्राष्ट्रीय विधि,निजी परिभाषा–निजी अंतर्राष्ट्रीय कानून से तात्पर्य उन नियमों से है जो किसी राज्य द्वारा ऐसे वादों का निर्णय करने के लिए चुने जाते हैं जिनमें कोई विदेशी तत्व होता है। इन नियमों का प्रयोग इस प्रकार के वाद विषयों के निर्णय में होता है जिनका प्रभाव किसी ऐसे तथ्य, घटना अथवा संव्यवहार पर पड़ता है जो किसी अन्य देशीय विधि प्रणाली से इस प्रकार संबद्ध है कि उस प्रणाली का अवलंबन आवश्यक हो जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय कानून, निजी एवं सार्वजनिक–निजी अंतर्राष्ट्रीय कानून नाम से ऐसा बोध होता है कि यह विषय अंतर्राष्ट्रीय कानून की ही शाखा है। परंतु वस्तुत ऐसा है नहीं। निजी और सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून में किसी प्रकार की पारस्परिकता नहीं है।

इतिहास

रोमन साम्राज्य में वे सभी परिस्थितियाँ विद्यमान थीं जिनमें अंतर्राष्ट्रीय कानून की आवश्यकता पड़ती है। परंतु पुस्तकों से इस बात का पूरा आभास नहीं मिलता कि रोम-विधि-प्रणाली में उनका किस प्रकार निर्वाह हुआ। रोम राज्य के पतन के पश्चात्‌ स्वीय विधि (पर्सनल लॉ) का युग आया जो प्राय १०वीं शताब्दी के अंत तक रहा। तदुपरांत पृथक प्रादेशिक विधि प्रणाली का जन्म हुआ। 13वीं शताब्दी में निजी अंतर्राष्ट्रीय कानून को निश्चित रूपरेखा देने के लिए आवश्यक नियम बनाने का भरपूर प्रयत्न इटली में हुआ। १६वीं शताब्दी के फ्रांसीसी न्यायज्ञों ने संविधि सिद्धांत (स्टैच्यूट-थ्योरी) का प्रतिपादन किया और प्रत्येक विधि नियम में उसका प्रयोग किया। वर्तमान युग में निजी अंतर्राष्ट्रीय कानून तीन प्रमुख प्रणालियों में विभक्त हो गया-
(1) संविधि प्रणाली।
(2) अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली।
(3) प्रादेशिक प्रणाली।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

सं. ग्रं.–चेशायर: प्राइवेट इंटरनैशनल लॉ; जॉन वेस्टलेक: ए ट्रीटिज आन प्राइवेट इंटरनैशनल लॉ।
  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 41 |
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