"प्रयोग:दीपिका3": अवतरणों में अंतर
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
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{ | {निम्न में से कौन-सा कार्य नौकरशाही का नहीं है? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-135,प्रश्न-44 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
- | -कानून और व्यवस्था बनाए रखने में मदद करना | ||
- | +अध्यादेशों की घोषणा करना | ||
-राष्ट्रीय बजट को बनाने में मदद करना | |||
- | -अंतर्राष्ट्रीय संधियों को तैयार करने में मदद करना | ||
||[[ | ||कानून और व्यवस्था बनाए रखने में मदद करना, राष्ट्रीय बजट को बनाने में मदद करना तथा अंतर्राष्ट्रीय संधियों को तैयार करने में मदद करना ये सभी नौकरशाही के अंतर्गत आने वाले कार्य हैं जबकि अध्यादेशों की घोषणा करना, [[राष्ट्रपति]] की अध्यादेश प्रस्थापित करने की शक्ति (अनुच्छेद 123) तथा [[राज्यपाल]] की अध्यादेश जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 213) के अंतर्गत आता है। | ||
{ | {फ्रांसिस फुकुयामा के अनुसार- (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-39, प्रश्न-17 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
+पश्चिमी उदारवाद की निर्णायक विजय हो गयी है | |||
- | -आतंकवाद की निर्णायक विजय होगी | ||
- | -उदारवाद प्रति-आतंकवाद में परिवर्तित हो जाएगा | ||
-उपर्युक्त में कोई नहीं | |||
|| | ||पूर्व सोवियत संघ के विघटन तथा शीत युद्ध की समाप्ति (जिसमें पश्चिमी उदारवादी विचारधारा तथा सोवियत संघ की साम्यवादी विचारधारा के बीच संघर्ष चल रहा था) के बाद फ्रांसिस फुकुयामा ने अपने पुस्तक The End of History and the last Man' में यह विचार व्यक्त किया कि अब पश्चिमी उदारवाद की निर्णायक विजय हो गई है। | ||
{ | {'समाजवाद' शब्द का प्रथम बार उपयोग करने वाला था- (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-55,प्रश्न-27 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
+राबर्ट ओवेन | |||
+ | -[[कार्ल मार्क्स|मार्क्स]] | ||
-एंजिल्स | |||
-[[ | -सेंट साइमन | ||
|| | ||'समाजवाद' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग रॉबर्ट ओवेन (1771-1858) ने किया था, जो एक ब्रिटिश उद्योगपति, मानव प्रेमी एवं सहकारिता आंदोलन का अग्रदूत था। राबर्ट ओवेन द्वारा लिखित पुस्तकें क्रमश; 'ए न्यू व्यू ऑफ सोसाइटी', 'एसेज ऑन फॉर्मेशन ऑफ कैरेक्टर', 'सोशल सिस्टम', 'द बुक ऑफ द न्यू मोरल वर्ल्ड एवं द फ्यूचर ऑफ द ह्यूमन रेस' है। | ||
{ | {"जितनी प्रभुसत्ताएं होती हैं, उतने ही राज्य होते हैं।" यह विचार किस लेखक का है? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-26,प्रश्न-26 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
- | +गैटिल | ||
-डायसी | |||
- | -गार्नर | ||
- | -मैकाइवर | ||
|| | ||"संप्रभुता ही वह तत्त्व है जो राज्य को अन्य समुदायों से पृथक करता है। संप्रभुता अविभाज्य होती है, इसका विभाजन नहीं किया जा सकता। इसी संदर्भ में गैटिल ने लिखा है कि "यदि संप्रभुता परमपूर्ण नहीं है तो किसी राज्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है, यदि संप्रभुता परमपूर्ण नहीं है तो किसी राज्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है, यदि संप्रभुता विभाजित है तो एक से अधिक राज्यों का अस्तित्व हो जाता है।" अर्थात जितनी संप्रभुताएं होंगी उतने राज्य हो जायेंगे। मैकाइवर एक बहुलवादी विचारक है। इसके अनुसार राज्य में संप्रभुता विभिन्न संघों में विभाजित होती है अर्थात संप्रभुता के विभाजन से राज्य का विभाजन नहीं होगा। | ||
{ | {"जैसे ही हम ऑस्टिन की रूखी, पर वैधानिक धारणा से दूर जाते हैं वैसे ही हम भ्रम में पड़ जाते हैं"। यह टिप्पणी किसने की थी? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-72,प्रश्न-49 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
- | -लॉक | ||
+ | -गेटेल | ||
- | +लीकॉक | ||
-हॉलैण्ड | |||
|| | ||ऑस्टिन की संप्रभुता की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए लीकॉक ने कहा था कि "जिसे ही हम ऑस्टिन की रूखी पर वैधानिक धारणा से दूर जाते हैं वैसे ही हम भ्रम में पड़ जाते हैं"। | ||
{ | {स्वतंत्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं। इस विचार के समर्थक कौन सिद्धांत हैं? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-85,प्रश्न-16 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
- | -प्रो. जोड़ | ||
- | -डॉ. आशीर्वादी लाल | ||
- | +रूसो | ||
-मिल | |||
|| | ||रूसो को 'स्वतंत्रता एवं समानता एक-दूसरे के पूरक हैं' का समर्थक विद्वान माना जाता है। वस्तुत: 19वीं सदी के उत्तरार्ध में समाजवादी तथा सकारात्मक उदारवादी लेखकों द्वारा उठाई गई आर्थिक और सामाजिक समानता की मांग ने समानता को स्वतंत्रता तथा समानता एक-दूसरे के पूरक हैं। इस विचार के प्रमुख समर्थक हैं- रूसो, मेटलैंड, ग्रीन हाबहाउस, लास्की, टॉनी, बार्कर आदि। | ||
{ | {यू.एस.ए. में दबाव समूहों की सर्वाधिक पसंद की प्रविधि है- (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-108,प्रश्न-25 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
-बहिष्कार | -बहिष्कार एवं धरना | ||
+लॉबी प्रचार | +लॉबी प्रचार | ||
- | -पूर्ण हड़ताल | ||
-शांतिपूर्ण | -शांतिपूर्ण आंदोलन | ||
||[[अमेरिका]] में दबाव समूहों द्वारा लॉबी प्रचार विधि का प्रयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत [[विधानमंडल]] के सदस्यों को प्रभावित कर अपने दित में कानून का निर्माण कराया जाता है। | ||[[अमेरिका]] में दबाव समूहों द्वारा लॉबी प्रचार विधि का प्रयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत [[विधानमंडल]] के सदस्यों को प्रभावित कर अपने दित में कानून का निर्माण कराया जाता है। | ||
{ | {[[भारत]] जैसे विकासशील समाज में लोक प्रशासन की प्रत्यक्ष भूमिका निम्नलिखित में से कौन-सी है: (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-131,प्रश्न-15 | ||
|type="()"} | |||
-राजस्व जुटाना | |||
+विधि और व्यवस्था | |||
-सामाजिक-आर्थिक पुनर्निमाण | |||
-सहभागितापूर्ण प्रबंध | |||
||भारत जैसे विकासशील समाज में लोक प्रशासन की प्रत्यक्ष भूमिका विकास संबंधी तथा उन्नति संबंधी कार्यों के लिए विधि एवं व्यवस्था से समंवित पारंपरिक प्रशासन की है। | |||
{तीसरी दुनिया से तात्पर्य है- (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-114,प्रश्न-24 | |||
|type="()"} | |type="()"} | ||
- | -तेल उत्पादक अरब राष्ट्र | ||
- | -पूर्वी यूरोप के देश | ||
- | -अफ्रीकी देश | ||
+ | +[[एशिया]], [[अफ्रीका]] तथा लैटिन [[अमेरिका]] के देश जो पहले गुलाम थे | ||
|| | ||'तीसरी दुनिया' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी जनांकिकीयविद् मानवशास्त्री एवं इतिहासकार अल्फ्रेड सॉवी ने फ्रांसीसी पत्रिका फल 'आब्जर्वफीयूर' में अपने एक प्रकाशित लेख में 14 अगस्त, 1952 को किया। तीसरी दुनिया के देशों में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, ओशीनिया तथा एशिया क्षेत्र के देश आते हैं जो यूरोपीय देशों के उपनिवेश रह चुके हैं। इनमें तटस्थ तथा गुट निरपेक्षा देश शामिल हैं। पहली दुनिया के देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन तथा उनके गठबंधन देश तथा दूसरी दुनिया में [[सोवियत संघ]], [[चीन]] तथा उनके गठबंधन देश शामिल हैं। तीसरी दुनिया के देशों में [[भारत]], [[पाकिस्तान]], [[बांग्लादेश]], [[श्रीलंका]], नाइजीरिया इत्यादि शामिल हैं। | ||
{ | {नौकरशाही है- (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-135,प्रश्न-45 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
-[[ब्रिटेन]] की देन | |||
- | -मध्यवर्गीय सामंतो की कृति | ||
- | -प्राचीन रोम की देन | ||
+एक आधुनिक विकास | |||
|| | ||नौकरशाही एक आधुनिक विकास का आयाम (व्यवस्था) है। व्यापक दृष्टिकोण में, नौकरशाही से एक ऐसी व्यवस्था का बोध होता है जहां कर्मचारियों को अनुभाग, प्रभाग एवं विभाग आदि श्रेणी शृंखला में विभक्त कर दिया जाता है। इसमें प्रशासकीय सत्ता का लक्ष्य व्यापक जनहित में होता है। | ||
{ | {"दुनिया में प्रत्येक मन्युष्य की आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त संसाधन है, न कि उसके लालच के लिए।" उपर्युक्त कथक किसके नाम से जाना जाता है?(नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-39, प्रश्न-2 | ||
|type="()"} | |type="()"} | ||
- | -[[कार्ल मार्क्स]] | ||
+ | -माओत्से तुंग | ||
- | +[[महात्मा गांधी]] | ||
-हो ची मिन्ह | |||
|| | ||[[महात्मा गांधी |महात्मा गांधी जी]] का मानना था कि मनुष्य को भौतिक वस्तुओं का उतना ही उपभोग करना चाहिए जितना की उसके शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अनिवार्य हो इससे सभी की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकेगी। इसी संदर्भ में इनका कथन है कि "इस धरती पर इतने संसाधन तो है जिनसे सबकी अनिवार्य आवश्यकताएं पूरी हो सकें, परंतु इतने संसाधन नहीं हैं जिनसे किसी की लालसा की शांति की जा सके।" | ||
</quiz> | </quiz> | ||
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12:30, 13 फ़रवरी 2018 का अवतरण
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