सूर्य ग्रहण  

सूर्य ग्रहण
सूर्य ग्रहण के कई दृश्य
विवरण सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है जब चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य के मध्य से होकर गुजरता है तथा पृथ्वी से देखने पर सूर्य पूर्ण अथवा आंशिक रूप से चन्द्रमा द्वारा आच्छादित होता है।
पूर्ण सूर्य ग्रहण कभी-कभी ही ऐसा होता है कि चाँद सूरज को पूरी तरह ढक लेता है। इसे पूर्ण-ग्रहण कहते हैं। पूर्ण-ग्रहण धरती के बहुत कम क्षेत्र में ही देखा जा सकता है।
आंशिक सूर्य ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण में सूर्य का कुछ भाग ग्रहण ग्रास में तथा कुछ भाग ग्रहण से अप्रभावित रहता है तो पृथ्वी के उस भाग विशेष में लगा ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण कहलाता है।
वलयाकार सूर्य ग्रहण वलयाकार सूर्य ग्रहण में जब चन्द्रमा पृथ्वी के काफ़ी दूर रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है। सूर्य के बाहर का क्षेत्र प्रकाशित होने के कारण कंगन या वलय के रूप में चमकता दिखाई देता है। कंगन आकार में बने सूर्य ग्रहण को ही वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं।
विशेष खगोल शास्त्र के अनुसार 18 वर्ष 18 दिन की समयावधि में 41 सूर्य ग्रहण और 29 चन्द्रग्रहण होते हैं। एक वर्ष में 5 सूर्यग्रहण तथा 2 चन्द्रग्रहण तक हो सकते हैं।
धार्मिक मान्यता सूर्य अथवा चन्द्र ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन-शक्ति कमज़ोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है।
संबंधित लेख चन्द्र ग्रहण, सुपरमून, ब्लू मून, ब्लड मून
अन्य जानकारी सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है। जब चन्द्रमा क्षीणतम हो और सूर्य पूर्ण क्षमता संपन्न तथा दीप्त हो।

सूर्य ग्रहण (अंग्रेज़ी:Solar Eclipse) एक खगोलीय घटना है जब चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य के मध्य से होकर गुजरता है तथा पृथ्वी से देखने पर सूर्य पूर्ण अथवा आंशिक रूप से चन्द्रमा द्वारा आच्छादित होता है। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से जब सूर्यपृथ्वी के बीच में चन्द्रमा आ जाता है तो चन्द्रमा के पीछे सूर्य का बिम्ब कुछ समय के लिए ढक जाता है, उसी घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। पृथ्वी सूरज की परिक्रमा करती है और चाँद पृथ्वी की। कभी-कभी चाँद, सूरज और धरती के बीच आ जाता है। फिर वह सूरज की कुछ या सारी रोशनी रोक लेता है जिससे धरती पर साया फैल जाता है। इस घटना को 'सूर्य ग्रहण' कहा जाता है। यह घटना सदा सर्वदा अमावस्या को ही होती है।

पूर्ण ग्रहण

अक्सर चाँद, सूरज के सिर्फ़ कुछ हिस्से को ही ढकता है। यह स्थिति 'खण्ड-ग्रहण' कहलाती है। कभी-कभी ही ऐसा होता है कि चाँद सूरज को पूरी तरह ढक लेता है। इसे 'पूर्ण-ग्रहण' कहते हैं। पूर्ण-ग्रहण धरती के बहुत कम क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। ज़्यादा से ज़्यादा दो सौ पचास (250) किलोमीटर के क्षेत्र में। इस क्षेत्र के बाहर केवल 'खंड-ग्रहण' दिखाई देता है। पूर्ण-ग्रहण के समय चाँद को सूरज के सामने से गुजरने में दो घंटे लगते हैं। चाँद सूरज को पूरी तरह से, ज़्यादा से ज़्यादा, सात मिनट तक ढकता है। इन कुछ क्षणों के लिए आसमान में अंधेरा हो जाता है, या यूँ कहें कि दिन में रात हो जाती है।

ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से सूर्य ग्रहण

ग्रहण प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार है। ज्योतिष के दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो अभूतपूर्व अनोखा, विचित्र ज्योतिष ज्ञान, ग्रह और उपग्रहों की गतिविधियाँ एवं उनका स्वरूप स्पष्ट करता है। सूर्य ग्रहण[1] तब होता है, जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चन्द्रमा द्वारा आवृत[2] हो जाए। इस प्रकार के ग्रहण के लिये चन्दमा का पृथ्वी और सूर्य के बीच आना आवश्यक है। इससे पृथ्वी पर रहने वाले लोगों को सूर्य का आवृत भाग नहीं दिखाई देता है।

सूर्य ग्रहण होने के लिये निम्न शर्ते पूरी होनी आवश्यक हैं-
  1. पूर्णिमा या अमावस्या होनी चाहिये।
  2. चन्दमा का रेखांश राहु या केतु के पास होना चाहिये।
  3. चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिए।[3]

उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से मिलाने वाली रेखाओं को रेखांश कहा जाता है तथा भूमध्य रेखा के चारों ओर वृताकार में जाने वाली रेखाओं को अक्षांश के नाम से जाना जाता है। सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है। जब चन्द्रमा क्षीणतम हो और सूर्य पूर्ण क्षमता संपन्न तथा दीप्त हो। चन्द्र और राहु या केतु के रेखांश बहुत निकट होने चाहिए। चन्द्र का अक्षांश लगभग शून्य होना चाहिये और यह तब होगा जब चंद्र रवि मार्ग पर या रवि मार्ग के निकट हो, सूर्य ग्रहण के दिन सूर्य और चन्द्र के कोणीय व्यास एक समान होते हैं। इस कारण चन्द्र सूर्य को केवल कुछ मिनट तक ही अपनी छाया में ले पाता है। सूर्य ग्रहण के समय जो क्षेत्र ढक जाता है उसे पूर्ण छाया क्षेत्र कहते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सूर्योपराग
  2. व्यवधान / बाधा
  3. सूर्यग्रहण कब, क्यों और कैसे ? (हिन्दी) (ए.एस.पी) सूर्य ग्रहण।
  4. सूर्य ग्रहण का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) ज्योतिष की सार्थकता।
  5. पत्र
  6. जुड़
  7. ग्रहण विधि निषेध (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) ज्योतिष की सार्थकता।
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