अंकगणित  

अंकगणित (अँग्रेजी में अरिथमेटिक) गणित की वह शाखा है जिसमें केवल अंकों और संख्याओं से गणना की जाती है। इसमें न संकेताक्षरों का प्रयोग होता है और न ऋण संख्याओं का ही, किंतु अंकगणित के नियमों की व्याख्या में संकेताक्षरों का प्रयोग होने लगा है। बहुधा ऐसा माना गया है कि अंकगणित का विषय विस्तार अभिगणना (काम्प्युटेशन) तक सीमित है और विषय के प्रतिपादन में तर्क की विशेष महत्ता नहीं होती। अंकगणित का तर्कयुक्त विवेचन एक अलग विषय है जिसे संख्या सिद्धांत (थ्योरी ऑव नंबर्स) कहते हैं। कुछ गणितज्ञ अब अंकगणित और संख्या सिद्धांत को समानार्थक मानने लगे हैं।

दो समूहों में वस्तुओं की संख्या तब समान कही जाती है जब एक समूह की प्रत्येक वस्तु के लिए दूसरे समूह में एक जोड़ीदार वस्तु मिल सके। इस प्रकार यदि अनुक्रम 1, 2, 3, . . ., म की प्रत्येक संख्या की जोड़ी किसी समूह की एक-एक वस्तु से बनाई जा सके तो उस समूह में वस्तुओं की संख्या म है। इस संख्या का ज्ञान प्राप्त करना वस्तुओं की गणना करना, अर्थात्‌ गिनना, कहा जाता है। गिनने की विधि से जो संख्याएँ मिलती हैं उन्हें प्राकृतिक संख्याएँ अथवा पूर्ण संख्याएँ कहते हैं।

घन पूर्ण संख्या संबंधी मूल नियम: यदि एक समूह में क वस्तुएँ और दूसरे समूह में ख वस्तुएँ हैं तो दोनों समूहों में मिलकर क + ख वस्तुएँ हैं। क + ख को क और ख का योगफल, अथवा योग, बनाते हैं। योगफल ज्ञात करने को जोड़ना कहते हैं। चिह्न + ख को धन कहते हैं। गिनने की प्रक्रिया से स्पष्ट है कि योग के लिए निम्नलिखित मूल नियम ठीक है:

योग का क्रम विनिमेय (कंप्यूटेटिव) नियम: क + ख = ख + क।

योग का साहचर्य (ऐसोशिएटिव) नियम: क + ख = (ख + ग) = (क + ख) + ग।

यदि च कोई ऐसी घन पूर्ण संख्या है कि क = ख+ च, तो कहा जाता है कि क, ख से बड़ी है (और इस क > ख लिखते हैं); साथ ही ख, क से कम है (और इसे ख < क लिखते हैं। इस प्रकार यदि क और ख कोई दो धन पूर्ण संख्याएँ हैं तो या तो क = ख, या क > ख या क < ख।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सं. ग्रं. __निकोमेकस ऑव गेरेसा: इंट्रोडक्शन टु अरिथमेटिक, अनुवादक एम.एस. डीओग और एफ.ई. रॉबिंस; एस.सी. कापिंस्की: स्टडीज़ इन ग्रीक अरिथमेटिक (यूनिवर्सिटी ऑव मिलियन प्रेस) 1938; डी.ई. स्मिथ: ए सोर्स-बुक इन मैथिमेटिक्स; विभूति भूषण दत्त और अवधेश नारायण सिंह: हिस्ट्री ऑव हिंदू मैथिमेटिक्स; एच.डी. लारसेन: अरिथमेटिक फ़ॉर कॉलेजेज़। (हरिचंद्र गुप्त)

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