ओदिसी  

ओदिसी होमर कृत दो प्रख्यात यूनानी महाकाव्यों में से एक महाकाव्य। ईलियद (द्रं.) में होमर ने ट्राजन युद्ध तथा उसके बाद की घटनाओं का वर्णन किया है जबकि ओदिसी में ट्राय के पतन के बाद ईथाका के राजा ओदिसियस की, जिसे यूलिसीज़ नाम से भी जाना जाता है, उस रोमांचक यात्रा का वर्णन है जिसमें वह अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए, 10 वर्ष बाद अपने घर पहुँचता है।

ओदिसी 24 अनुवाकों में विभक्त है और इसका घटनाकाल 42 दिन का है। आरंभिक अनुवाक्‌ में देवताओं की सभा में ओदिसियस की संरक्षिका एथीना जीयस से शिकायत करती है कि ओदिसियस 10 वर्ष पूर्व ट्राय से रवाना हुआ था किंतु अभी तक घर नहीं पहुँच सका है; कारण, केलिप्सो नामक राक्षसी ने उसे ऑजीजिया नामक द्वीप में रोक रखा है जबकि ईथाका में पिनलापी (ओदिसियस की पत्नी) के पाणिग्रहणार्थी ऊधम ही नहीं मचा रहे हैं बल्कि ओदिसियस की संपत्ति भी चट कर रहे हैं। जीयस एथीना को यथाविवेक कार्य करने की अनुमति दे देता है और वह ओदिसियस के पुत्र टेलेमैकस के संमुख मेंटर (टेलेमैकस का शिक्षक) के रूप में उपस्थित होकर उसे परामर्श देती है कि वह अपने घर में पिनलोपी के पाणिग्रहणथियों का प्रवेश रोक दे तथा स्वयं अपने पिता का पता लगाने के लिए यात्रा करे। द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ अनुवाकों में टेलेमैकस संबधी कथा चलती है। टेलेमैकस एक सभा का आयोजन कर उसमें पिनलोपी के पाणिग्रहणर्थियों की भर्त्सना करता है और मेंटर रूपी एथीना की सहायता से एक जहाज प्राप्त करके अपनी माँ को बताए बिना ही यात्रा पर चल पड़ता है। मेंटर के साथ वह पाइलॉस पहुँचकर वृद्ध नेस्टर से मिलता है जहाँ उसे ट्राजन युद्ध के असल विवरण ज्ञात होते हैं। पाइलॉस से वह स्पार्टा जाता है। वहाँ मेने लाउस की पत्नी हेलेन (द्र. 'ईलियद') से मिलता है और घर लौटने की तैयारी करने लगता है। उसके तुरंत बाद कवि ईथाका स्थित ओदिसियस के प्रासाद की घटनाएँ प्रस्तुत करता है। एक ओर पिनलोपी अपने पुत्र के एकाएक लुप्त हो जाने से संत्रस्त है और दूसरी ओर उसके पाणिग्रहणार्थी बंदरगाह पर एनटीनस की देखरेख में एक जहाज भेजकर व्यवस्था करते हैं कि टेलेमैकस जैसे ही लौटे, उसकी हत्या कर दी जाय ताकि ओदिसियस की संपत्ति और पिनलोपी पर उनका कब्जा हो सके।

पाँचवें अनुवाक्‌ में पुन: देवताओं की सभा का दृश्य है जिसमें एथीना एक बार फिर ओदिसियस की मुक्ति का प्रयत्न करती है। जीयस हरमीज को कैलिप्सो के पास भेजता है और उसके कहने से वह वृक्षों के लट्ठों का बेड़ा बनाकर ओदिसियस को ईथाका की ओर रवाना कर देती है। 17 दिन तक तारों की सहायता से यात्रा करने के बाद जैसे ही ओदिसियस फ़ियैशिया द्वीप के निकट पहुँचता है, समुद्र के देवता पोसीदोन के क्रोध के कारण उसका बेड़ा टूट जाता है और वह लहरों में डूबने उतराते लगता है। तभी समुद्र की अप्सरा लिउकोथिया उसे एक प्राणरक्षक रूमाल देती है जिसके सहारे वह अंतत: फ़ियैशिया पहुँचता है।

छठे अनुवाक्‌ में फ़ियैशिया के राजा एलसिनस की बेटी नउसिकाआ स्वप्न में एथीना से आदेश पाकर अगली सुबह समुद्रतट पर अपने कपड़े धोने जाती है जहाँ उसकी भेंट नंगे ओदिसियस से होती है। सातवें अनुवाक्‌ में वह उसे कपड़ा पहनाकर घर ले आती है। आठवें अनुवाक्‌ में राजा एलसिनस दरबार में ओदिसियस का स्वागत करता है। इस अवसर पर भाट ट्राजन-युद्ध-संबंधी गीत गाता है तो ओदिसियस विचलित होकर रोने लगता है। राजा उससे रोने का कारण पूछता है तो ओदिसियस को अपना वास्तविक परिचय देना पड़ता है। अगले तीन अनुवाकों में ओदिसियसट्राय के पतन के बाद की अपनी 10 वर्ष की रोमांचक यात्रा का विवरण सबको सुनाता है। 12वें अनुवाक में ओदिसियमस फ़ियैशिया के जादुई जहाज पर ईथाका पहुँचता है जहाँ एथीना एक गड़ेरिए के रूप में उससे मिलती है और उसे भिखारी के रूप में परिवर्तित कर देती है ताकि उसकी पत्नी के पाणिग्रहणार्थी उसे पहचानकर कोई हानि न पहुँचा सकें। 13वें अनुवाक्‌ में एथीना ओदिसियस को उसके शूकरपाल के यहाँ भेजकर स्वयं स्पार्टा जाती है और टेलेमैकस को शीघ्रता से ईथाका लौटने का आदेश देती है। 14वें अनुवाक्‌ में ओदिसियस तथा शूकरपाल की बातचीत है। 15वें अनुवाक्‌ में टेलेमैकस अपनी माँ के पाणिग्रहणार्थियों के षड्यंत्र से बचकर सुरक्षित घर लौट आता है। 16वें अनुवाक्‌ में टेलेमैकस शूकरपाल के घर में अपने पिता को पहचान लेता है। पश्चात्‌ पितापुत्र पिनलोपी के पाणिग्रहणार्थियों से छुटकारा पाने की योजना बनाते हैं। 17वें तथा 18वें अनुवाक्‌ में भिक्षुकवेशी ओदिसियस अपने प्रासाद में पहुँचता है जहाँ उसका पुराना कुत्ता एरगस उसे पहचानकर खुशी के मारे दम तोड़ देता है। इसी समय ओदिसियस प्रासाद में उपस्थित पिनलोपी के पाणिग्रहणार्थियों का औद्धत्य देखता है जिससे आगे चलकर उन्हें मारने के उसके भयंकर कृत्य की उचित भूमिका भी बन जाती है। 19वें अनुवाक्‌ में ओदिसिय तथा पिनलोपी की आमने सामने बातचीत होती है परंतु पिनलोपी अपने पति को पहचान नहीं पाती, जबकि उसकी पुरानी धाय यूरीक्लिया उसके पैर में बचपन में बने क्षतचिह्न को देखकर उसे पहचान जाती है। 20 वें अनुवाक्‌ में ओदिसियस गुस्से के कारण रात भर जागकर अनेक बातें सोचता रहता है। 21 वें अनुवाक्‌ में पिनलोपी अपने पाणिग्रहणार्थियों को चुनौती देती है कि वे सब पारी पारी ओदिसियस के धनुष का चिल्ला चढ़ाकर इस तरह तीर चलाएँ कि वह विशाल वृक्ष में टँगे 12 छल्लों के बीच से निकल जाए। सब असफल होते हैं किंतु भिक्षुकवेशी ओदिसियस छल्लों के बीच से तीर निकाल देता है। 22 वें अनुवाक्‌ में महाकाव्य का चरमोत्कर्ष है। ओदिसियस पिनलोपी के सारे पाणिग्रहणार्थियों को तीरों से बेधकर मार देता है। कोई भी एक, बचकर निकल नहीं पाता, क्योंकि विशाल कक्ष के सभी दरवाजें पहले ही बंद कर दिए गए थे 23वें अनुवाक्‌ में पिनलोपी अपने पति को पहचानती है और दोनों के मिलन का हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी दृश्य सामने आता है। महा काव्य के अंतिम अथवा 24वें अध्याय में, जिसे कुछ आलोचक प्रक्षिप्त मानते हैं, देवदूत मरकरी पिनलोपी के सभी पाणिग्रहणार्थियों की आत्माओं को नरक के निचले एवं निकृष्ट प्रदेशों में ले जाता है जहाँ उन्हें विभिन्न प्रकार के त्रासमय दंड दिए जाते हैं। इसी बीच ओदिसियस नगर के बाहर खेतों में जाकर अपने पिता लैरटीज़ से मिलता है। अंत में ओदिसियस के घर लौट आने के उपलक्ष में शानदार दावत होती है और इथाका में सुखशांति स्थापित होने की सूचना के साथ ग्रंथ का समापन हो जाता है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 297 |

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