अनुमान  

अनुमान (संस्कृत शब्द, अर्थात् किसी अन्य वस्तु की तुलना में मापना अंदाजा लगाना या अनुमान का उपकरण), भारतीय दर्शन में ज्ञान (प्रमाण) हासिल करने के साधनों में दूसरा, जो मनुष्य को प्रामाणिक मान्य परिज्ञान प्राप्त करने में समर्थ बनाता है।

  • विभिन्न दार्शनिक मतों द्वारा अलग-अलग साधन निश्चित किए गए हैं; उदाहरण के लिए बौद्धों और आरंभिक वैशेषिकों द्वारा दो (अवबोधन और अनुमान); योग और जैन मतावलंबियों द्वारा तीन (अवबोधन, अनुमान, और प्रमाण) अनुमान तर्क (न्याय) की हिन्दू विचारधारा के केंद्र में स्थित है।
  • इस विचारधारा ने एक अनुमान-वाक्य-कथन तर्क संरचना बनाई, जो सूत्र के बजाय तर्क के स्वरूप में है और यह पाँच चरणों से होकर गुजरती है:
  1. प्रतिज्ञप्ति (प्रतिज्ञा, शब्दार्थ शपथ)
  2. आधार (हेतु)
  3. दृष्टांत (उदाहरण)
  4. प्रयोग (उपनय)
  5. निष्कर्ष (निगमन)
  • अनुमान-वाक्य-कथन तर्क एक भ्रांतिपूर्ण आधार द्वारा निष्प्रभावी हो जाता है; इसे हेत्वाभास (एक आधार की प्रतीति मात्र जो वास्तविक प्रतिवाद्य आधार से भिन्न है) कहते हैं। अप्रामाणिक आधारों के कई प्रकार बताए गए हैं: सामान्य दोष, विरोधाभास, पुनरुक्ति, साक्ष्य का अभाव और असामयिकता।

अनुमान दर्शन और तर्क शास्त्र का पारिभाषिक शब्द। भारतीय दर्शन में ज्ञानप्राप्ति के साधनों का नाम प्रमाण हैं। अनुमान भी एक प्रमाण हैं। चार्वाक दर्शन को छोड़कर प्राय: सभी दर्शन अनुमान को ज्ञानप्राप्ति का एक साधन मानते हैं। अनुमान के द्वारा जो ज्ञान प्राप्त होता हैं उसका नाम अनुमिति हैं।

प्रत्यक्ष (इंद्रिय सन्निकर्ष) द्वारा जिस वस्तु के अस्तित्व का ज्ञान नहीं हो रहा हैं उसका ज्ञान किसी ऐसी वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर, जो उस अप्रत्यक्ष वस्तु के अस्तित्व का संकेत इस ज्ञान पर पहुँचने की प्रक्रिया का नाम अनुमान है। इस प्रक्रिया का सरलतम उदाहरण इस प्रकार है-किसी पर्वत के उस पार धुआँ उठता हुआ देखकर वहाँ पर आग के अस्तित्व का ज्ञान अनुमिति है और यह ज्ञान जिस प्रक्रिया से उत्पन्न होता है उसका नाम अनुमान है। यहाँ प्रत्यक्ष का विषय नहीं है, केवल धुएँ का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। पर पूर्वकाल में अनेक बार कई स्थानों पर आग और धुएँ के साथ-साथ प्रत्यक्ष ज्ञान होने से मन में यह धारणा बन गई है कि जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहीं-वहीं आग भी होती है। अब जब हम केवल धुएँ का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं और हमको यह स्मरण होता है कि जहाँ-जहाँ धुआँ है वहाँ-वहाँ आग होती है, तो हम सोचते हैं कि अब हमको जहाँ धुआँ दिखाई दे रहा हैं वहाँ आग अवश्य होगी: अतएव पर्वत के उस पार जहाँ हमें इस समय धुएँ का प्रत्यक्ष ज्ञान हो रहा है अवश्य ही आग वर्तमान होगी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 124 |

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