विज्ञान उद्देशिका -अज़ीज़ राय  

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संक्षिप्त परिचय
अज़ीज़ राय
लेखक अज़ीज़ राय
जन्म 2 मई, 1990
निवास भोपाल, मध्य प्रदेश
भाषा हिन्दी

हम, मानव जाति के सदस्य, विज्ञान को एक (खोजपूर्ण, ज्ञानवर्धक, निर्णायक और भविष्य निर्माणक) विषय के रूप में विकसित करने के लिए, विज्ञान का पद्धति तथा तकनीकी ज्ञान के रूप में उपयोग करते हैं। विज्ञान का उपयोग : समस्त मानव जाति के हित में हो यह सुनिश्चित करने, वैकल्पिक युक्तियों और साधनों की खोज और उनके नि:संकोच उपयोग के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा की व्यवस्था तथा आपसी समझ विकसित करने और समस्याओं के समाधान के लिए तुलनात्मक मापदंडों समानता-असमानता और सामान्य-असामान्य (परिस्थिति वाले कारणों, घटनाओं और उनके प्रभावों) को परिभाषित करने, वैज्ञानिक पद्धतियों और मापन की प्रक्रियाओं से प्राप्त होने वाले ज्ञान को तब स्वीकार करते हैं, जब वह ज्ञान स्वतंत्र रूप से एक से अधिक विधियों में निहित और प्रयोगात्मक कार्यों द्वारा प्रमाणित होता है। हम समस्त मानव जाति के विकास के लिए ज्ञान के यथार्थ को जानने और प्रतिकूल प्रभाव रहित प्रायोगिक कार्यों द्वारा, विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समाज बनाने का दृढ़ संकल्प करते हैं।

विज्ञान उद्देशिका का विस्तार

"हम, मानव जाति के सदस्य" अर्थात विज्ञान हम मनुष्यों के लिए है। न ही वनस्पति जगत और न ही शेष जंतु जगत विज्ञान का उपयोग करता है।

"विज्ञान को एक विषय के रूप में" अर्थात विज्ञान के बारे में चर्चा की जाती है। असमंजस की स्थिति में उसकी विधियों और खोजों के विषय में प्रश्न उठाए जा सकते हैं। विज्ञान में प्रश्न उठाने को लेकर समय और उम्र की कोई सीमा नहीं होती है।

"विज्ञान का पद्धति तथा तकनीकी ज्ञान के रूप में उपयोग" अर्थात विज्ञान एक (खोज) पद्धति है। भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यावहारिक उपयोग की प्रक्रिया विज्ञान के अंतर्गत आती है।

"विज्ञान एक खोजपूर्ण, ज्ञानवर्धक, निर्णायक और भविष्य निर्माणक विषय के रूप में विकसित" अर्थात विज्ञान खोजने, ज्ञान में वृद्धि करने, निर्णय लेने तथा भविष्य को प्रभावित और निर्मित करने में मानव जाति के लिए उपयोगी और सहयोगी सिद्ध होता है। इसीलिए विज्ञान की प्रकृति ज्ञान को सतत हासिल करने तथा उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करने के बाद उसे संचित करने की होती है।

"विज्ञान का उपयोग मानव जाति के हित में" अर्थात विज्ञान का उपयोग व्यापक दृष्टि में मानव जाति के हित के लिए हो, इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा दी जानी चाहिए।

"वैकल्पिक युक्तियों और साधनों की खोज और उनका नि:संकोच उपयोग" अर्थात भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक ही विधि या प्रक्रिया के उपयोग से एक समान परिणाम प्राप्त करना मुश्किल होता है। इसके अलावा निष्कर्ष को लेकर एक मत होना भी मुश्किल होता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा वैकल्पिक युक्तियों और साधनों की खोज की वकालत करती है। उनके नि:संकोच उपयोग को बढ़ावा देने की बात कहती है। ताकि परीक्षण विधि द्वारा व्यक्ति अपने-अपने मतों (निष्कर्ष) को प्रमाणित कर सके।

"वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा" अर्थात ऐसी शिक्षा जो मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर के समाधान को पहचानने और उनको परखने वाले मापदंडों का उपयोग करना सिखाती है। उन मापदंडों की रचना करना सिखाती है। प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीकों से हमारा परिचय कराती है। ऐसी शिक्षा न केवल हम मनुष्यों के लिए क्या अच्छा-बुरा और सही-गलत है, का ज्ञान कराती है। बल्कि हम मनुष्यों में आपसी समझ विकसित करती है और समाज में सामंजस्य स्थापित करती है।

"समस्याओं के समाधान के लिए तुलनात्मक मापदंडों को परिभाषित करने" अर्थात "एक समान परिस्थितियों में एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं।" विज्ञान की इस अभिधारणा को ध्यान में रखकर के समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है। ताकि समस्याओं का समाधान समस्या को परिभाषित करके, मापदंडों की पहचान द्वारा सरलता से ढूंढा जाता है।

"कारण, घटना और उनके प्रभाव" अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा समस्याओं के समाधान के बारे में यह सीख देती है कि "देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।" क्योंकि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो यह ज़रूरी नहीं है। इसलिए कारण, घटना और उनके प्रभावों के बीच अंतर्संबंध स्थापित करना, विज्ञान की प्रमुख उपलब्धि होती है।

"वैज्ञानिक पद्धतियों और मापन की प्रक्रियाओं से" अर्थात विज्ञान में अस्पष्ट और अपरिभाषित ज्ञान का कोई स्थान नहीं होता है। जिस ज्ञान को हम भौतिक राशियों के रूप में व्यक्त कर सकते हैं, जिसे मापा जा सकता हो, जिसको प्रमाणित करने के लिए उस ज्ञान के आधार पर भविष्यवाणियां की जा सकती हैं और जिसकी जाँच-पड़ताल करना संभव हो, ऐसा ज्ञान ही विज्ञान में स्वीकारने योग्य होता है।

"एक से अधिक विधियों में निहित और प्रयोगात्मक कार्यों द्वारा" अर्थात जिस ज्ञान को एक से अधिक विधियों या स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए, संबंधित प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जाता है। ऐसा ज्ञान विज्ञान में अधिक विश्वसनीय माना जाता है। इसलिए समय के साथ इस ज्ञान में सिर्फ संशोधन और विस्तार की आवश्यकता होती है।

"मानव जाति के विकास के लिए" अर्थात न सिर्फ ज्ञान में वृद्धि के लिए अपितु उस ज्ञान के उपयोग और गुणवत्ता में वृद्धि के लिए ज्ञान के यथार्थ को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए।

"प्रतिकूल प्रभाव रहित प्रायोगिक कार्यों द्वारा" अर्थात प्रयोग के दौरान ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, जो प्रयोगों को प्रभावित कर सकता है तथा प्रयोगों के निष्कर्ष निकालते समय "पूर्वधारणाओं और व्यक्तिगत भावनाओं" को जबरन निष्कर्ष में शामिल नहीं करना चाहिए।

"विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समाज बनाने" अर्थात स्वयं अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर, विज्ञान और तकनीक के सहयोग से ऐसे समाज का उदाहरण प्रस्तुत करना है। जिसे आदर्श समाज के रूप में व्यव्हार में हासिल किया जा सकता है।

उद्देशिका में सम्मिलित पारिभाषिक शब्दावली
  1. विज्ञान : खोज करने की पद्धति को विज्ञान कहते हैं।
  2. तकनीक : विज्ञान को उपयोग में लाने की प्रक्रिया को तकनीक कहते हैं।


उद्देशिका द्वारा आदर्श समाज का चित्रण
  1. समस्त मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।
  2. वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज सदैव करते रहना चाहिए।
  3. नए और वैकल्पिक साधनों का उपयोग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
  4. शिक्षा और दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना चाहिए।
  5. हम मनुष्यों को आपसी समझ विकसित करने के लिए हरदम प्रयास करते रहना चाहिए।


वैज्ञानिक कार्यशैली
  1. समस्या का समाधान ढूँढना समस्या को परिभाषित करते ही सरल हो जाता है।
  2. समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है।
  3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रमाणित ज्ञान को ही स्वीकार करने की बात कहता है।
  4. प्रमाणित ज्ञान, जब एक से अधिक विधियों या एक से अधिक बार के प्रयोगों (आंकड़ों) पर आधारित होता है, तब वह ज्ञान समाज में स्वीकारने योग्य होता है।
  5. जब सभी प्रयोग और प्रमाण के लिए उपयोग में लाई गईं सभी विधियाँ एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं, तब उस प्रमाणित ज्ञान की विश्वसनीयता समाज में और अधिक बढ़ जाती है।


उद्देशिका में वर्णित अपेक्षाएं
  1. ज्ञान के यथार्थ को जानने का प्रयास होना चाहिए।
  2. प्रायोगिक निष्कर्ष में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं करना चाहिए।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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