बिरजानन्द  

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स्वामी बिरजानन्द का डाक टिकट

बिरजानन्द हिन्दू समाज सुधारक थे। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और स्वामी दयानन्द सरस्वती के गुरु थे। स्वामी बिरजानन्द का मूल नाम कालीकृष्ण बसु था। वे 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना के बाद रामकृष्ण परमहंस के प्रत्यक्ष शिष्यों के बाद उसमें सम्मिलित होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। सन 1897 में स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें सन्न्यास की दीक्षा दी। स्वामी स्वरूपानन्द के साथ स्वामी बिरजानन्द ने 'रामकृष्ण मिशन' की पत्रिका 'प्रबुद्ध भारत' को लोकप्रिय बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी।

उच्च कोटि के विद्वान

स्वामी बिरजानन्द उच्च कोटि के विद्वान् थे। उन्होंने वेद-मंत्रों को नई दृष्टि से देखा था और वेदों को एक नवीन व्यवस्था प्रदान की थी। उन्होंने दयानन्द सरस्वती को वेद शास्त्रों का अभ्यास कराया। अध्ययन पूरा होने के बाद जब दयानन्द जी गुरु बिरजानन्द को गुरु दक्षिणा के रूप में थोड़ी-सी लौंग, जो गुरुजी को बहुत पसंद थी, लेकर गये तो गुरुजी ने ऐसी दक्षिणा लेने से मना कर दिया। उन्होंने दयानन्द सरस्वती से कहा कि "गुरु दक्षिणा के रूप में, मैं यह चाहता हूँ कि समाज में फैले अंध विश्वास और कुरीतियों को समाप्त करो"। गुरुजी के आदेश के अनुसार स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उत्थान में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

दयानन्द सरस्वती के गुरु

जब दयानन्द सरस्वती को सत्य को जानने की अभिलाषा हुई, तब वे घर परिवार त्यागकर सच्चे गुरु की खोज में निकल पड़े थे। भारत के अनेक स्थानों का भ्रमण करते हुए वे सन 1860 में स्वामी बिरजानन्द के आश्रम में पहुँचे। जहाँ उन्हें नई दृष्टि, सद्प्रेरणा और आत्मबल मिला। वर्षों तक भ्रमण करने के बाद जब वे भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में गुरु बिरजानन्द की कुटिया पर पहुँचे थे तो बिरजानन्द ने उनसे पूछा कि "वे कौन हैं"। तब स्वामी दयानन्द ने कहा, गुरुवर यही तो जानना चाहता हूँ कि वास्तव में, मैं कौन हूँ? प्रश्न के उत्तर से संतुष्ट होकर गुरुवर ने दयानन्द को अपना शिष्य बनाया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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