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'''क्षेमेन्द्र''' कश्मीरी महाकवि थे। वे [[संस्कृत]] के विद्वान् तथा प्रतिभा संपन्न [[कवि]] थे। उनका जन्म [[ब्राह्मण]] कुल में हुआ था। क्षेमेन्द्र ने प्रसिद्ध आलोचक तथा तंत्रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् [[अभिनवगुप्त]] से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इनके पुत्र सोमेन्द्र ने [[पिता]] की रचना 'बोधिसत्त्वावदानकल्पलता' को एक नया पल्लव जोड़कर पूरा किया था। क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहास कथा के धनी थे। संस्कृत में उनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त परिहास कथा लेखक सम्भवत: और कोई नहीं है।
 
'''क्षेमेन्द्र''' कश्मीरी महाकवि थे। वे [[संस्कृत]] के विद्वान् तथा प्रतिभा संपन्न [[कवि]] थे। उनका जन्म [[ब्राह्मण]] कुल में हुआ था। क्षेमेन्द्र ने प्रसिद्ध आलोचक तथा तंत्रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् [[अभिनवगुप्त]] से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इनके पुत्र सोमेन्द्र ने [[पिता]] की रचना 'बोधिसत्त्वावदानकल्पलता' को एक नया पल्लव जोड़कर पूरा किया था। क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहास कथा के धनी थे। संस्कृत में उनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त परिहास कथा लेखक सम्भवत: और कोई नहीं है।
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==रचना काल==
 
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क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रंथों के रचना काल का उल्लेख किया है, जिससे इनके आविर्भाव के समय का परिचय मिलता है। [[कश्मीर]] के नरेश अनंत (1028-1063 ई.) तथा उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजा कलश (1063-1089 ई.) के राज्य काल में क्षेमेन्द्र का जीवन व्यतीत हुआ। क्षेमेन्द्र के [[ग्रंथ]] 'समयमातृका' का रचना काल 1050 ई. तथा इनके अंतिम ग्रंथ दशावतारचरित का निर्माण काल इनके ही लेखानुसार 1066 ई. है। इसके फलस्वरूप एकादश शती का मध्य कल<ref>लगभग 1025-1066 ई.</ref> क्षेमेन्द्र के आविर्भाव का समय माना जा सकता है।
 
क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रंथों के रचना काल का उल्लेख किया है, जिससे इनके आविर्भाव के समय का परिचय मिलता है। [[कश्मीर]] के नरेश अनंत (1028-1063 ई.) तथा उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजा कलश (1063-1089 ई.) के राज्य काल में क्षेमेन्द्र का जीवन व्यतीत हुआ। क्षेमेन्द्र के [[ग्रंथ]] 'समयमातृका' का रचना काल 1050 ई. तथा इनके अंतिम ग्रंथ दशावतारचरित का निर्माण काल इनके ही लेखानुसार 1066 ई. है। इसके फलस्वरूप एकादश शती का मध्य कल<ref>लगभग 1025-1066 ई.</ref> क्षेमेन्द्र के आविर्भाव का समय माना जा सकता है।
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इन कृतियों में उस युग का वातावरण अपने पूर्ण वैभव के साथ हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। क्षेमेन्द्र विदग्धी [[कवि]] होने के अतिरिक्त जनसाधारण के भी कवि थे, जिनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध मनोरंजन के साथ-साथ जनता का चरित्र निर्माण करना भी था। 'कलाविलास', 'चतुर्वर्गसंग्रह', '[[चारुचर्या (क्षेमेन्द्र)|चारुचर्या]]', 'समयमातृका' आदि लघु काव्य इस दिशा में इनके सफल उद्योग के समर्थ प्रमाण हैं।
 
इन कृतियों में उस युग का वातावरण अपने पूर्ण वैभव के साथ हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। क्षेमेन्द्र विदग्धी [[कवि]] होने के अतिरिक्त जनसाधारण के भी कवि थे, जिनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध मनोरंजन के साथ-साथ जनता का चरित्र निर्माण करना भी था। 'कलाविलास', 'चतुर्वर्गसंग्रह', '[[चारुचर्या (क्षेमेन्द्र)|चारुचर्या]]', 'समयमातृका' आदि लघु काव्य इस दिशा में इनके सफल उद्योग के समर्थ प्रमाण हैं।
 
 
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
 
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==

12:20, 15 फ़रवरी 2020 के समय का अवतरण

क्षेमेन्द्र कश्मीरी महाकवि थे। वे संस्कृत के विद्वान् तथा प्रतिभा संपन्न कवि थे। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। क्षेमेन्द्र ने प्रसिद्ध आलोचक तथा तंत्रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् अभिनवगुप्त से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इनके पुत्र सोमेन्द्र ने पिता की रचना 'बोधिसत्त्वावदानकल्पलता' को एक नया पल्लव जोड़कर पूरा किया था। क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहास कथा के धनी थे। संस्कृत में उनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त परिहास कथा लेखक सम्भवत: और कोई नहीं है।

रचना काल

क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रंथों के रचना काल का उल्लेख किया है, जिससे इनके आविर्भाव के समय का परिचय मिलता है। कश्मीर के नरेश अनंत (1028-1063 ई.) तथा उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजा कलश (1063-1089 ई.) के राज्य काल में क्षेमेन्द्र का जीवन व्यतीत हुआ। क्षेमेन्द्र के ग्रंथ 'समयमातृका' का रचना काल 1050 ई. तथा इनके अंतिम ग्रंथ दशावतारचरित का निर्माण काल इनके ही लेखानुसार 1066 ई. है। इसके फलस्वरूप एकादश शती का मध्य कल[1] क्षेमेन्द्र के आविर्भाव का समय माना जा सकता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. लगभग 1025-1066 ई.

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