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| {"दुनिया में प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त संसाधन है, न कि उसके लालच के लिए।" उपर्युक्त कथक किसके नाम से जाना जाता है?(नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-39, प्रश्न-2 | | {[[भारतीय संविधान]] को निम्नलिखित में से कौन-सी अनुसूची राज्यसभा में स्थानों के आवंटन से संबंधित है? |
| |type="()"} | | |type="()"} |
| -[[कार्ल मार्क्स]] | | -[[भारत का संविधान- तीसरी अनुसूची |तीसरी अनुसूची]] |
| -माओत्से तुंग | | +[[भारत का संविधान- चौथी अनुसूची|चौथी अनुसूची]] |
| +[[महात्मा गांधी]]
| | -[[भारत का संविधान- पांचवीं अनुसूची|पांचवीं अनुसूची]] |
| -हो ची मिन्ह | | -[[भारत का संविधान- छठी अनुसूची|छठीं अनुसूची]] |
| ||[[महात्मा गांधी |महात्मा गांधी जी]] का मानना था कि मनुष्य को भौतिक वस्तुओं का उतना ही उपभोग करना चाहिए जितना की उसके शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अनिवार्य हो इससे सभी की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकेगी। इसी संदर्भ में इनका कथन है कि "इस धरती पर इतने संसाधन तो है जिनसे सबकी अनिवार्य आवश्यकताएं पूरी हो सकें, परंतु इतने संसाधन नहीं हैं जिनसे किसी की लालसा की शांति की जा सके।" | | ||[[भारतीय संविधान]] की चौथी अनुसूची [[राज्य सभा]] में स्थानों के आवंटन से संबंधित है। |
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| {'समाजवाद' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम निम्नलिखित में से किसके द्वारा किया गया? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-55,प्रश्न-28
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| -लेनिन
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| +रॉबर्ट ऑवन
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| -[[कार्ल मार्क्स]]
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| -हीगल
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| ||'समाजवाद' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग रॉबर्ट ओवेन (1771-1858) ने किया था, जो एक ब्रिटिश उद्योगपति, मानव प्रेमी एवं सहकारिता आंदोलन का अग्रदूत था। राबर्ट ओवेन द्वारा लिखित पुस्तकें क्रमश; 'ए न्यू व्यू ऑफ सोसाइटी', 'एसेज ऑन फॉर्मेशन ऑफ कैरेक्टर', 'सोशल सिस्टम', 'द बुक ऑफ द न्यू मोरल वर्ल्ड एवं द फ्यूचर ऑफ द ह्यूमन रेस' है।
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| {"नागरिकों और प्रजाजनों पर विधि से अमर्यादित सर्वोच्च शक्ति" संप्रभुता की यह परिभाषा किसने दी है- (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-27,प्रश्न-29
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| +बोदां
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| -ऑस्टिन
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| -मैक्यावेली
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| -हॉब्स
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| ||बोदां ने संप्रभुता को परिभाषित करते हुए लिखा है कि "यह नागरिकों और प्रजाजनों पर विधि से अमर्यादित सर्वोच्च शक्ति है।" बोदां ने संप्रभुता पर कानूनी दृष्टिकोण से विचार किया है। ज्ञातव्य है कि प्रभुसत्ता का कानूनी दृष्टिकोण सबसे पहले बोदां और हॉब्स ने स्पष्ट किया और बाद में बेंथम और आस्टिन ने इसकी विस्तृत व्याख्या की।
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| {हीगल ने नागरिक समाज को देखा- (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-72,प्रश्न-50
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| -विशिष्टता के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में
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| -स्वतंत्रता के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में
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| +सार्विकता के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में
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| -सामंजस्य के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में
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| ||हीगल ने नागरिक समाज को सार्विकता के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में देखा है। हीगल के राजनीतिक दर्शन का आधार 'विश्वात्मा' का विचार है। विश्व में पायी जाने वाली समस्त जड़ और चेतन वस्तुएँ इसी विश्वात्मा से नि:सृत हुई हैं। विश्वात्मा का धीरे-धीरे विकास होता रहता है। सर्वप्रथम जड़ जगत में इतनी अभिव्यक्ति होती है फिर परिवार, समाज जैसी सामाजिक संस्थाओं में इसका प्रकटीकरण होता है। अन्त में विश्वात्मा 'राज्य' के रूप में प्रकट होती है।
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| {यह कथन किसका है कि "स्वतंत्रता और समानता न तो एक-दूसरे के विरोधी हैं और न ही पृथक वे एक आदर्श के दो रूप हैं"? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-86,प्रश्न-17
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| -पैरटो
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| -मेंटरलैंड
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| +हर्बर्ट डीन
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| -डेविड ह्मूम
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| ||वर्तमान कल्याणकारी राज्य में स्वतंत्रता एवं समानता को एक-दूसरे का विरोधी न मानकर पूरक माना जाता है। दोनों का उद्देश्य एक ही है वह है व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास् जैसा कि हबर्ट डीन लिखते हैं, "स्वतंत्रता और समानता न तो विरोधी है और न ही पृथक परंतु एक ही आदर्श के दो पक्ष है।" गेन्स के अनुसार "स्वतंत्रता और समानता में कोई विरोध नहीं है। हमें इस तरह के समाज का निर्माण करना चाहिए जो इतनी समानता प्रदान करें कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरों पर किसी भी प्रकार की असमानता थोपे बिना अपनी जीवन को नियंत्रित करने के लिए स्वतंत्र हो।"
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| {किसने एकात्मक राज्य की परिभाषा "एक केंद्रीय सरकार के अंतर्गत संगठित" राज्य के रूप में दी? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-95,प्रश्न-10
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| |type="()"}
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| +स्ट्रांग
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| -गार्नर
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| -विलोबी
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| -फाइनर
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| ||बहुत से देशों (जैसे- ब्रिटेन,फ्रांस,चीन) में एकात्मक शासन विद्यमान है जिसकी मुख्य विशेषता एक केंद्रीय शासन के हाथों में सारी शक्तियों का केंद्रीकरण है। सी.एफ. स्ट्रांग के अनुसार "एकात्मक राज्य वह है जो एक केंद्रीय सरकार के अधीन संगठित होता है। तथा केंद्रीय सरकार अपने अंगों को विशेष शक्ति प्रदान करने वाले किसी भी कानून द्वारा आरोपित प्रतिबंधों से मुक्त होने के नाते समग्र राजनीतिक संगठन पर सर्वोच्च होती है।"
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| {निम्नलिखित में से कौन एक एकात्मक राज्य है? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-96,प्रश्न-11 | | {'पैकेज डील' का संबंध है: (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-121,प्रश्न-25 |
| |type="()"} | | |type="()"} |
| -यू.एस.ए.
| | -[[भारत]]-[[चीन]] वार्ता से |
| -[[भारत]] | | -[[भारत]]-[[पाक]] वार्ता से |
| -[[ऑस्ट्रेलिया]] | | +[[संयुक्त राष्ट्र संघ]] की सदस्यता से |
| +[[यू. के.|यू.के.]]
| | -कॉमनवेल्थ की सदस्यता से |
| ||एकात्मक राज्य में सरकार की एक ही इकाई होती है जिसका क्षेत्राधिकार पूरा प्रदेश होता है। [[प्रदेश]] को छोटी-छोटी सरकारी इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है, जिन्हें सीमित शक्तियां प्राप्त होती हैं। ये शक्तियां उन्हें [[केंद्र सरकार]] द्वारा प्रदान की जाती है। अत: सरकारी विभागों के अपने क्षेत्रीय कार्यालय होते हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य प्रशासनिक सुविधा प्राप्त करना होता है। नगर के कार्यों के निष्पादन के लिए स्थानीय संस्थाएं होती हैं और सरकारी निर्णयों को लागू करने हेतु संबंधित विभागों के क्षेत्रीय अभिकरण होते हैं। यू.के. की काउंटीज तथा [[फ्रांस]] के विभाग इस प्रकार की स्थानीय सरकार की प्रशासनिक इकाइयों के उदाहरण हैं। अत: यू.के. एक एकात्मक राज्य है।
| | ||पैकेज डील का संबंध संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता से था। |
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| {दबाव समूह के विषय में क्या सत्य नहीं है? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-108,प्रश्न-26
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| |type="()"}
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| -वे संगठित होते हैं।
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| -वे राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं।
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| -वे सरकार पर दबाव डालते हैं।
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| +वे चुनाव लड़ते हैं।
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| ||दबाव समूह अपने हितों की पूर्ति हेतु चुनाव नहीं लड़ते, बल्कि परोक्ष रूप से नीति-निर्माताओं को प्रभावित करते हैं।
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| {[[भारत]] में 'इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की स्थापना किस रिपोर्ट की सिफारिश के आधार पर हुई? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-131,प्रश्न-16
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| |type="()"}
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| -गोरेवाला रिपोर्ट
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| -संथानम रिपोर्ट
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| +एपलबी रिपोर्ट
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| -आयंगर रिपोर्ट
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| ||वर्ष 1953 में लोक प्रशासन के प्रबुद्ध अमेरिकी विद्वान डीन पाल एपलबी ने भारतीय लोक सेवा के संदर्भ में अपनी अनुशंसाएं [[भारत सरकार]] को सौंपी। उनकी अनुशंसा के अनुसार 1954 में [[नई दिल्ली]] में भारतीय लोक 'इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन' की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य भारत में लोक प्रशासन के विधिवत अध्ययन एवं अनुसंधान को प्रोत्साहित करना तथा सरकारी कर्मचारियों को समुचित प्रशिक्षण प्रदान करना है।
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| {निम्नलिखित में से कौन तृतीय विश्व के सदस्य हैं? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-114,प्रश्न-25 | | {सर आइवर जेनिंग्स द्वारा लिखित पुस्तक कौन नहीं है? (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-205,प्रश्न-34 |
| |type="()"} | | |type="()"} |
| -[[जापान]], कनाडा, पूर्व सोवियत संघ | | -सम कैरेक्टरस्टिक्स ऑफ़ दि इंडियन कांस्टीट्यूशन |
| -[[अमेरिका]], [[जर्मनी]], नीदरलैंड | | -दी लॉ एंड दी कांस्टीट्यूशन |
| +[[भारत]], नाइजीरिया, [[श्रीलंका]] | | +माडर्न कांस्टीट्यूशन |
| -भारत, [[जापान]], कनाडा | | -कैबिनेट गवर्नमेंट |
| ||'तीसरी दुनिया' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी जनांकिकीयविद् मानवशास्त्री एवं इतिहासकार अल्फ्रेड सॉवी ने फ्रांसीसी पत्रिका फल 'आब्जर्वफीयूर' में अपने एक प्रकाशित लेख में 14 अगस्त, 1952 को किया। तीसरी दुनिया के देशों में [[अफ्रीका]], लैटिन [[अमेरिका]], ओशीनिया तथा एशिया क्षेत्र के देश आते हैं जो यूरोपीय देशों के उपनिवेश रह चुके हैं। इनमें तटस्थ तथा गुट निरपेक्षा देश शामिल हैं। पहली दुनिया के देशों में [[संयुक्त राज्य अमेरिका]], [[ब्रिटेन]] तथा उनके गठबंधन देश तथा दूसरी दुनिया में सोवियत संघ, [[चीन]] तथा उनके गठबंधन देश शामिल हैं। तीसरी दुनिया के देशों में [[भारत]], [[पाकिस्तान]], [[बांग्लादेश]], [[श्रीलंका]], नाइजीरिया इत्यादि शामिल हैं। | | ||'मॉडर्न कांस्टीट्यूशन' नामक पुस्तक के.सी. व्हीयर द्वारा लिखी गई है। शेष पुस्तकों को सर आइवर जेनिंग्स द्वारा लिखा गया है। |
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| {परमाणु अप्रसार संधि अस्तित्व में आई: (नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-114,प्रश्न-26 | | {यदि राज्य सभा किसी संविधान संशोधन विधेयक पर लोक सभा से असहमत हो तो ऐसी स्थिति में-(नागरिक शास्त्र ,पृ.सं-141,प्रश्न-25 |
| |type="()"} | | |type="()"} |
| +1968 में | | +संशोधन विधेयक पारित नहीं माना जाता |
| -1970 में | | -दोनों सदनों की संयुक्त बैठक द्वारा इसका निर्णय होगा |
| -1962 में | | -लोक सभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से यह विधेयक पारित कर दिया जाएगा |
| -1972 में | | -लोक सभा राज्य सभा के मत को अस्वीकृत कर देगी |
| ||1 जुलाई, 1968 को [[अमेरिका]] एवं अन्य 61 देशों ने परमाणु अप्रसार संधि (Non-Proliferation Treaty) पर हस्ताक्षर किए परंतु यह संधि वास्तव में 5 मार्च, 1970 को प्रभावी हुई। | | ||संविधान संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से स्वीकृत किया जाना आवश्यक है। दोनों सदनों में असहमति की स्थिति में विधेयक अंतिम रूप से समाप्त हो जाएगा क्योंकि संविधान संशोधन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की संविधान में कोई व्यवस्था नहीं हैं। |
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