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	<title>सोलह कला - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद 25 जून 2016 को 08:17 बजे</title>
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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		<title>गोविन्द राम: 'लगभग तीसरी-चौथी शताब्दी (ईसवी) तक कला का प्रयोग 'अंश', '...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2014-07-08T07:28:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;लगभग तीसरी-चौथी शताब्दी (ईसवी) तक कला का प्रयोग &amp;#039;अंश&amp;#039;, &amp;#039;...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;लगभग तीसरी-चौथी शताब्दी (ईसवी) तक कला का प्रयोग 'अंश', 'भाग' या 'खण्ड' के लिए हुआ। [[सूर्य]] की गति को बारह भागों में बाँटा गया जिसे [[राशि]] भी कहा गया। राशि का अर्थ भी हिस्से या [[अंग्रेज़ी]] में कहें तो 'Portion' से ही था। सूर्य की गति को बारह कलाओं या राशियों में बाँटा गया और [[चन्द्रमा]] को सोलह कलाओं में। तीसरी-चौथी शताब्दी के बाद कला शब्द का अर्थ 'Art' के लिए होने लगा। जिसका कारण वात्सायन और जयमंगल द्वारा मनुष्य की विभिन्न रङ्ग (रंग) क्षमताओं, विधाओं और सेवाओं को श्रेणीबद्ध कर देना रहा। जयमंगल ने इन्हें 64 श्रेणियों में विभक्त किया। जिन्हें चौंसठ योगिनी के रूप में भी प्रसिद्धि, वज्रयानियों के प्रभाव से निर्मित [[खजुराहो]] आदि में मिली। &lt;br /&gt;
==सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण==&lt;br /&gt;
जिन सोलह कला का उल्लेख [[कृष्ण]] के लिए हुआ उसका संदर्भ अंश है न कि कोई 'आर्ट'। इसके लिए [[वैदिक]] और पौराणिक दो मान्यता हैं। पूर्णावतार, ईश्वर के सोलह अंश (कला) से पूर्ण होता है। सामान्य मनुष्य में पाँच अशों (कलाओं) का समावेश होता है यही मनुष्य योनि की पहचान भी है। पाँच कलाओं से कम होने पर पशु, वनस्पति आदि की योनि बनती है और पाँच से आठ कलाओं तक श्रेष्ठ मनुष्य की श्रेणी बनती है। [[अवतार]] नौ से सोलह कलाओं से युक्त होते हैं। पन्द्रह तक अंशावतार ही हैं। [[राम]] बारह और कृष्ण सोलह कलाओं से पूर्ण हैं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
एक मान्यता यह भी है कि [[राम]] [[सूर्यवंश|सूर्यवंशी]] हैं तो सूर्य की बारह कलाओं के कारण, बारह कलायुक्त अंशावतार हुए। [[कृष्ण]] [[चंद्रवंश|चंद्रवंशी]] हैं तो चन्द्रमा की सोलह कलाओं से युक्त होने के कारण पूर्णावतार हैं।&lt;br /&gt;
'कला' की तरह ही अनेक ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ कालान्तर में बदल गए। जिनमें से एक शब्द 'संग्राम' भी है। प्राचीन काल में विभिन्न ग्रामों के सम्मेलन को संग्राम कहते थे। इन सम्मेलनों में अक्सर झगड़े होते थे और युद्ध जैसा रूप धारण कर लेते थे। धीरे-धीरे संग्राम शब्द युद्ध के लिए प्रयुक्त होने लगा। 'शास्त्र' शब्द को कला ने बहुत सहजता के साथ बदल दिया पाक शास्त्र , सौंदर्य शास्त्र, शिल्प शास्त्र आदि सब क्रमश: पाक कला, सौन्दर्य कला, शिल्प कला आदि हो गए।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=https://www.facebook.com/aditya.bharatkosh |title=सोलह कला |accessmonthday=8 जुलाई |accessyear=2014 |last=चौधरी |first=आदित्य |authorlink= |format= |publisher= |language=हिंदी }} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==परमात्मा की षोडश कलाशक्ति==&lt;br /&gt;
परमात्मा की षोडश कलाशक्ति जड़-चेतनात्मक समस्त संसार में व्याप्त है। एक जीव जितनी मात्रा में अपनी योनी के अनुसार होता है, उतनी ही मात्रा में परमात्मा की कला जीवाश्रय के माध्यम से विकसित होती है। अत: एक योनिज जीव अन्य योनि के जीव से उन्नत इसलिए है कि उसमें अन्य योनिज जीवों से भगवतकला का विकास अधिक मात्रा में होता है। चेतन सृष्टि में उदभिज्ज सृष्टि ईश्वर की प्रथम रचना है, इसीलिए अन्नमयकोषप्रधान उदभिज्ज योनि में परमात्मा की षोडश कलाओं में से एक कला का विकास रहता है। इसमें श्रुतियाँ भी सहमत हैं, यथा-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाभूत् साऽन्ने-नोपसमाहिता प्रज्वालीत्।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
(परमात्मा की सोलह कलाओं में एक कला अन्न में मिलकर अन्नमश कोष के द्वारा प्रकट हुई।)&lt;br /&gt;
====कलाएँ====&lt;br /&gt;
अत: स्पष्ट है, उदभिज्ज योनि द्वारा परमात्मा की एक कला का विकास होता है। इसी क्रम में परवर्ती जीवयोनि स्वेदज में ईश्वर की दो कला, अण्डज में तीन और जरायुज के अन्तर्गत पशु योनि में चार कलाओं का विकास होता है। इसके अनन्तर जरायुज मनुष्य योनि में पाँच कलाओं का विकास होता है। किन्तु यह साधारण मनुष्य तक ही सीमित है। जिन मनुष्यों में पाँच से अधिक आठ कला तक का विकास होता है, वे साधारण मनुष्यकोटि में न आकर विभूति कोटि में ही परिगणित होते हैं। क्योंकि पाँच कलाओं से मनुष्य की साधारण शक्ति का ही विकास होता है, और इससे अधिक छ: से लेकर आठ कलाओं का विकास होने पर विशेष शक्ति का विकास माना जाता है, जिसे विभूति कोटि में रखा गया है।&lt;br /&gt;
====कला विकास====&lt;br /&gt;
इस प्रकार एक कला से लेकर आठ कला तक शक्ति का विकास लौकिक रूप में होता है। नवम कला से लेकर षोडश कला तक का विकास अलौकिक विकास है, जिसे जीवकोटि नहीं अपितु अवतार कोटि कहते हैं। अत: जिन केन्द्रों द्वारा परमात्मा की शक्ति नवम कला से लेकर षोडश कला तक विकसित होती है, वे सभी केन्द्र जीव न कहलाकर [[अवतार]] कहे जाते हैं। इनमें नवम कला से पन्द्रह कला तक का विकास अंशावतार कहलाता है एवं षोडश कलाकेन्द्र पूर्ण अवतार का केन्द्र है। इसी कला विकास के तारतम्य से चेतन जीवों में अनेक विशेषताएँ देखने में आती हैं। यथा पाँच कोषों में से अन्नमय कोष का उदभिज्ज योनि में अपूर्व रूप से प्रकट होना एक कला विकास का ही प्रतिफल है। अत: औषधि, वनस्पति, वृक्ष तथा लताओं में जो जीवों की प्राणाधायक एवं पुष्टि प्रदायक शक्ति है, यह सब एक कला के विकास का ही परिणाम है।&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक- ‘हिन्दू धर्मकोश’ | पृष्ठ संख्या-54 &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कृष्ण2}}&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]][[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>गोविन्द राम</name></author>
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