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	<title>सेवरी क़िला - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''सेवरी क़िला''' (अंग्रेज़ी: ''Sewri Fort'') ब्रिटिश द्वारा म...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सेवरी क़िला&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (&lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A5%80&quot; title=&quot;अंग्रेज़ी&quot;&gt;अंग्रेज़ी&lt;/a&gt;: &amp;#039;&amp;#039;Sewri Fort&amp;#039;&amp;#039;) ब्रिटिश द्वारा म...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''सेवरी क़िला''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Sewri Fort'') ब्रिटिश द्वारा [[मुम्बई]] के सिवरी में बनवाया गया था। इस दुर्ग का निर्माण 1680 में एक उत्खनित पहाड़ी पर [[मुंबई बंदरगाह]] पर दृष्टि बनाये रखने हेतु एक पहरे की [[मीनार]] के रूप में किया गया था।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
18वीं शताब्दी तक मुंबई में कई छोटे-छोटे द्वीप शामिल हुआ करते थे। 1661 में इनमें से सात द्वीपों को [[पुर्तग़ाली|पुर्तगालियों]] ने [[इंग्लैड]] के राजा चार्ल्स तृतीय को अपनी राजकुमारी से [[विवाह]] होने पर दहेज़ के रूप में दे दिया था। सेवरी का बंदरगाह एक उत्कृष्ट और योग्य बंदरगाह था, इसलिए अंग्रेजों ने [[सूरत]] से अपना तल यहाँ बदलने की योजना बनाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अफ्रीका]] से आये हुए सिद्दियों ने अपनी नौसेना के [[मुग़ल साम्राज्य]] से अच्छे सम्बन्ध बना लिये। [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] से ब्रिटिश और मुग़लों में लगातार युद्ध चल रहा था। मुग़लों की निकटता पाने हेतु सिद्दियों ने ब्रिटिश से शत्रुता कर ली। 1672 में सिद्दियों द्वारा कई हमलों के उपरान्त अंग्रेज़ों ने कई जगह से उनकी किलेबंदी कर ली और 1680 में सिवरी किले का निर्माण भी पूरा हो गया। यह मझगाँव द्वीप पर बना था जहां से यह पूर्वी समुद्र तट पर नजर रखता था। यहां 50 सिपाहियों की एक चौकी थी। उन पर एक [[सूबेदार]] था। यह टुकड़ी आठ से दस तोपों के साथ लैस थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1689 में सिद्दी जनरल याकूत खान ने 20,000 सैनिकों के साथ बॉम्बे पर आक्रमण किया। इनके पहले बेड़े ने सिवरी किले पर अधिकार कर लिया फिर मझगाँव किला और माहिम को घेर कर अधिकृत कर लिया। इसके बाद [[1772]] में किले से एक और युद्ध हुआ, जिसमें [[पुर्तग़ाली]] हमलो को पीछे हटाया गया। स्थानीय शक्तियों में कमजोरी आने पर किले को बाद में कैदियों के लिए प्रयोग किया जाने लगा था।&lt;br /&gt;
==स्थापत्य==&lt;br /&gt;
इस किले को मुख्य रूप से रक्षा की दृष्टि से बनाया गया था, इसलिए अलंकरण और आभूषण का यहां नितान्त अभाव रहा है। इसे ऊँची पत्थर की दीवारों से घेरा हुआ है और ऐसी ही एक घेरेबन्दी आतंरिक भी है जो अधिक सुरक्षा के लिए बनायी है। बाहर यह तीन दिशाओं पर घिरा है और एक 60 मीटर की चट्टान भी है। इसका प्रवेश द्वार एक पत्थर का द्वार है जो प्रांगण में ले जाता है। यहाम के सामने के दरवाजे से आक्रमण होने पर बचाव हेतु भीतरी प्रवेश द्वार मुख्य प्रवेश द्वार को सीधा रखा गया। एक लंबे गुंबददार गलियारे के साथ पंचकोना कमरे और रैखिक गुंबददार संरचनाएँ यह इस वास्तु की विशेषताएँ हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के दुर्ग}}{{महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान}}{{महाराष्ट्र के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]][[Category:भारत के दुर्ग]][[Category:महाराष्ट्र के पर्यटन स्थल]][[Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान]][[Category:ऐतिहासिक स्थल]][[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]][[Category:इतिहास कोश]][[Category:औपनिवेशिक काल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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