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	<title>सरस साहित्य - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''सरस साहित्य''' सामान्यत: ललित साहित्य का [[पर्यायवाच...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सरस साहित्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; सामान्यत: ललित साहित्य का [[पर्यायवाच...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''सरस साहित्य''' सामान्यत: ललित साहित्य का [[पर्यायवाची शब्द|पर्यायवाची]] है और [[कथा]], [[नाटक]], [[काव्य]] आदि के लिए ही उसका प्रयोग होता है। परंतु अंतर यह है कि उसमें काव्य की आत्मा '[[रस]]' की ओर अधिक ध्यान दिया जाता है, भाषालालित्य की ओर उतना नहीं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हिन्दी साहित्य कोश, भाग 1|लेखक= |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी|संकलन= भारतकोश पुस्तकालय|संपादन= डॉ. धीरेंद्र वर्मा|पृष्ठ संख्या=735|url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==सरस तथा ललित साहित्य==&lt;br /&gt;
जिन रचनाओं में बौद्धिक उत्कर्ष या विचारों का ऊहापोह है, उन्हें प्राय: सरस साहित्य नहीं कहा जाता। इस प्रकार सरस साहित्य की सीमा ललित साहित्य की सीमा से कम हो जाती है। परंतु यहाँ 'सरस' शब्द में जिस 'रस' शब्द की प्रतिष्ठा है, वह शास्त्रीय अथवा लोकोत्तर संवेदना से कुछ भिन्न स्तर की वस्तु है। इसलिए मनोरंजन अथवा सहृदयतापूर्ण रचनाओं को भी सरस कहा जाता है। प्रेम के उभय पक्षों के चित्रण से लोकप्रिय प्रेम-रोमांस की सृष्टि होती है, जो सरस सहित्य के अंतर्गत आती है। वास्तव में [[साहित्य]] की परिपूर्णता उसकी सरसता में है और शब्दार्थ के जिस सहभाव की कल्पना साहित्य में है, उसमें रमणीयता और सरसता का समावेश अनिवार्य है। पश्चिमी वैज्ञानिक विवेचन-शास्त्र को तर्कबद्ध और प्रमाणशुद्ध ही मानता है। अत: पश्चिमी दृष्टि [[काव्य]] और शास्त्र अथवा सरस और गम्भीर&amp;lt;ref&amp;gt;अत: 'उपयोगी'&amp;lt;/ref&amp;gt; साहित्य को दो विरोधी सरणियाँ मानकर चलती है।&lt;br /&gt;
==अभिव्यंजना का अंतर==&lt;br /&gt;
वास्तव में सरस साहित्य और उपयोगी साहित्य में मुख्य अंतर अभिव्यंजना का है। शास्त्रज्ञ और तत्त्वज्ञ का आग्रह विशुद्ध सत्य के प्रति है, अत: वह तथ्य को ही प्रधानता देता है। कहीं-कहीं अपने तथ्य को सुस्पष्ट और प्रभावशाली बनाने के लिए वह उदाहरण, [[उपमा अलंकार|उपमा]] आदि [[अलंकार|अलंकारों]] से भी काम अवश्य ले लेता है, परंतु अलंकृति की ओर उसकी दृष्टि नहीं होती। वह सोलह आने सत्य का उपासक है। परंतु [[उपन्यासकार]], नाटककार और काव्यप्रणेता किसी भी निरपेक्ष सत्य का दावा नहीं करते। वे अपनी अनुभूति को वाचकों तक पहुँचाना चाहते हैं। अनुभूति स्वयं रसात्मक वस्तु है और उसे प्रस्तुत करते समय मानस के कोमल उपकरणों से भी सहायता लेना आवश्यक हो जाता है। फलस्वरूप, वाचक सत्य से कुछ अधिक प्राप्त करता है। वह रसिक बन जाता है और रसग्रहण के द्वारा लेखक की अन्यतम संवेदना से तादात्म्य स्थापित करता है। कल्पना और भावोद्रेक द्वारा स्वप्न लोक का निर्माण सरस साहित्य की विशेषता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{साहित्यिक शब्दावली}}&lt;br /&gt;
[[Category:पद्य साहित्य]][[Category:काव्य कोश]][[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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