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	<title>समाज गायन - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''समाज गायन''' में दर्जनभर और उससे अधिक लोग भाग लेते ह...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<updated>2016-03-09T06:12:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;समाज गायन&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; में दर्जनभर और उससे अधिक लोग भाग लेते ह...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''समाज गायन''' में दर्जनभर और उससे अधिक लोग भाग लेते हैं। प्रमुख गायक को 'मुखिया' कहा जाता है जबकि उसका अनुसरण करने वाले 'सेला' कहलाते हैं। गायन के समय आसपास बैठे [[भक्त|भक्तों]] का समूह समाज शब्द से जाना जाता है। प्राचीन मंदिरों में उनके अलग-अलग 'समाजी' अर्थात 'समाज गायन करने वाले' होते हैं। ये लोग अपनी-अपनी आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार गायन करते हैं। [[संगीत]] के लिए [[हारमोनियम]] और [[ढोलक]] का प्रयोग किया जाता है।&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिकता==&lt;br /&gt;
पांच सौ सालों से [[वृंदावन]] के मंदिर और देवालयों में 'समाज गायन' किया जा रहा है। [[स्वामी हरिदास|संगीत सम्राट स्वामी हरिदास]] और [[चैतन्य महाप्रभु]] के शिष्य षटगोस्वामियों के काल से विशेष पर्वों पर पदों का गायन किया जाता है। यही कारण है कि मंदिर संस्कृति में आज भी समाज गायन प्रचलित है। शहर के 'राधाबल्लभ', 'प्रिया बल्लभ', 'राधिका बल्लभ', 'भट्टजी मंदिर', 'गोरेलाल', 'रसिक बिहारी' और 'गोपी बल्लभ मंदिरों' समेत तमाम प्राचीन मंदिरों में समाज गायन की परंपरा है। स्थानीय 'ब्रज संस्कृति शोध संस्थान' और 'वृंदावन शोध संस्थान' में समाज गायन से संबंधित पांडुलिपियां संग्रहीत हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://news.raftaar.in/jagran-news-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AF%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A8/detail/52e3f7ad375ec082b3f774de2fe9bb83|title= देवालयी संस्कृति की देन है समाज गायन|accessmonthday= 9 मार्च|accessyear= 2016|last= |first= |authorlink= |format= |publisher=रफ्तार |language= हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==शब्द, भाव और अंतर्नाद==&lt;br /&gt;
विशेष बात यह कि सैकड़ों साल पुराने पदों में उस काल के शब्द, भाव और अंतर्नाद होता है। इन पदों का '[[जन्माष्टमी]]', '[[राधाष्टमी]]', '[[होली]]', 'खिचड़ी उत्सव', आचार्यों के जन्म दिन के अलावा ब्याहुला पर गायन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बरसाना]] में [[लट्ठमार होली]] के अवसर पर [[कृष्ण|कान्हा]] के घर [[नन्दगाँव]] से उनके सखा स्वरूप आते हैं। बरसानावासी [[राधा|राधा जी]] के पक्ष वाले 'समाज गायन' में भक्तिरस के साथ चुनौती पूर्ण पंक्तियां प्रस्तुत करके विपक्ष को मुक़ाबले के लिए ललकारते हैं। लट्ठमार होली से पूर्व नन्दगाँव व बरसाना के गोस्वामी समाज के बीच ज़ोरदार मुक़ाबला होता है। नन्दगाँव के हुरियारे सर्वप्रथम पीली पोखर पर जाते हैं। यहाँ स्थानीय गोस्वामी समाज अगवानी करता है। मेहमान-नवाजी के बाद मन्दिर परिसर में दोनों पक्षों द्वारा 'समाज गायन' का मुक़ाबला होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|होली|लट्ठमार होली|बरसाना}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गायन शैली}}{{संगीत के अंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:गायन शैली]][[Category:संगीत]][[Category:गायन]][[Category:संगीत कोश]][[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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