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	<title>सभा और समिति - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''सभा और समिति''' प्राचीन भारत में जनतांत्रिक संस्था...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2015-03-27T10:48:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;सभा और समिति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4&quot; title=&quot;प्राचीन भारत&quot;&gt;प्राचीन भारत&lt;/a&gt; में जनतांत्रिक संस्था...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''सभा और समिति''' [[प्राचीन भारत]] में जनतांत्रिक संस्थाएँ थीं। [[वैदिक काल|वैदिक युग]] की अनेक जनतांत्रिक संस्थाओं में 'सभा' और 'समिति' काफ़ी महत्त्वपूर्ण थीं। [[अथर्ववेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;सातवाँ, 13.1&amp;lt;/ref&amp;gt; में इन दोनों को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन वैदिक समाज को ये संस्थाएँ अपने विकसित रूप में प्राप्त हुई थीं। उसका तात्पर्य सभास्थल और सभा की बैठक, दोनों ही से था।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==स्वरूप==&lt;br /&gt;
[[अथर्ववेद]] के उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि 'सभा' और 'समिति' का अलग-अलग अस्तित्व था। सभा में [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]], अभिजात लोगों ओर धनी मानी वर्ग के व्यक्तियों का जोर साधारण व्यक्तियों से संभवत: अधिक था। उसके सदस्यों को 'सुजात' अर्थात् कुलीन कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]], सप्तम 1.4&amp;lt;/ref&amp;gt; 'मैत्रायणीसंहिता'&amp;lt;ref&amp;gt;चर्तुथ 7.4&amp;lt;/ref&amp;gt; के एक संदर्भ से ज्ञात होता है कि सभा की सदस्यता स्त्रियों के लिए उन्मुक्त नहीं थी। यह कहा जा सकता है कि सामूहिक रूप में सभा का महत्व बहुत अधिक था। उसके सदस्यों को 'सभासद', अध्यक्ष को 'सभापति' और द्वाररक्षक को 'सभापाल' कहते थे। सभासदों की बड़ी प्रतिष्ठा होती थी, किंतु वह प्रतिष्ठा खोखली नहीं थी और सभासदों की योग्यताएँ निश्चित थीं।&lt;br /&gt;
====ग्रंथों का उल्लेख====&lt;br /&gt;
*एक [[जातक कथा|बौद्ध जातक]] के अनुसार वह सभा सभा नहीं, जहाँ संत लोग न हों और वे संत नहीं जो [[धर्म]] का भाषण न करते हों। पुन: वे ही लोग संत कहलाने के अधिकारी थे, जो राग, द्वेष&amp;lt;ref&amp;gt;अथवा दोष उ पाप&amp;lt;/ref&amp;gt; और मोह को छोड़कर धर्म का भाषण करते हों-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;न सा सभा यत्थ न संति संतो, न ते संतों ये न भणन्ति धम्मं। रागं च दोषं च पहाय मोहं धम्म भणन्ता व भवन्ति संते।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, फॉसबॉल का रोमन लिपि संस्करण, जिल्द 5, पृष्ठ 509&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*सभासदों के लिए ये गुण अत्यंत अपेक्षित थे और कुछ हेर-फेर के साथ '[[वाल्मीकि रामायण]]'&amp;lt;ref&amp;gt;[[उत्तर काण्ड वा. रा.|उत्तर कांड]], 3.33&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा '[[महाभारत]]' में भी उन्हें गिनाया गया है, यथा- &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा:, न ते वृद्धा: ये न वदन्ति धर्मम्। नाऽसौ धर्मों यत्र न सत्यमस्ति, न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम।।&amp;quot;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*न्याय का इच्छुक व्यक्ति सभाचर और सभा से छूटा हुआ अभियुक्त दोषमुक्त, प्रसन्न और सानंद कहा गया है। न्याय वितरण के अतिरिक्त सभा में आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक प्रश्नों पर भी विचार होते थे। कभी-कभी लोग वहाँ इकट्ठे होकर जुए के [[खेल]] द्वारा अपना मनोरंजन भी किया करते थे।&lt;br /&gt;
==अंत==&lt;br /&gt;
सभा का यह स्वरूप [[उत्तर वैदिक काल]] का अंत होते होते (600 ई. पू.) समाप्त हो गया। राज्यों की सीमाएँ बढ़ीं और राजाओं के अधिकार विस्तृत होने लगे। उसी क्रम में सभा ने राजसभा अर्थात् राजा के दरबार का रूप धारण कर लिया। धीरे-धीरे उसकी नियंत्रात्मक शक्ति जाती रही और साथ ही साथ उसे जनतंत्रात्मक स्वरूप का भी अंत हो गया। राजसभा में अब केवल राजपुरोहित, राज्याधिकारी, कुछ मंत्री और राजा अथवा राज्य के कुछ कृपापात्र ही शेष रह गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:प्राचीन भारत का इतिहास]][[Category:संस्कृति]][[Category:इतिहास]][[Category:इतिहास कोश]][[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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