<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88</id>
	<title>सदन कसाई - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;action=history"/>
	<updated>2026-06-15T04:44:46Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;diff=544735&amp;oldid=prev</id>
		<title>नवनीत कुमार 24 दिसम्बर 2015 को 11:54 बजे</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;diff=544735&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2015-12-24T11:54:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;11:54, 24 दिसम्बर 2015 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l35&quot;&gt;पंक्ति 35:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 35:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|शीर्षक 5=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|शीर्षक 5=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|पाठ 5=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|पाठ 5=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|अन्य जानकारी=सदन कसाई को भगवन्नाम-जप और [[हरि]] कीर्तन प्रिय था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। बहुत काल तक नाम-कीर्तन, गुणगान तथा भगवान के ध्‍यान में तल्‍लीन रहते हुए उन्‍होंने [[जगन्नाथ पुरी]] में निवास किया।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|अन्य जानकारी=सदन कसाई को भगवन्नाम-जप और [[हरि]] कीर्तन प्रिय था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे। &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;[[&lt;/ins&gt;भगवान&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;]] &lt;/ins&gt;का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। बहुत काल तक नाम-कीर्तन, गुणगान तथा भगवान के ध्‍यान में तल्‍लीन रहते हुए उन्‍होंने [[जगन्नाथ पुरी]] में निवास किया।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|बाहरी कड़़ियाँ=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|बाहरी कड़़ियाँ=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|अद्यतन=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;|अद्यतन=&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>नवनीत कुमार</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;diff=544734&amp;oldid=prev</id>
		<title>नवनीत कुमार: '{{सूचना बक्सा प्रसिद्ध व्यक्तित्व |चित्र=Blankimage.jpg |चित...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88&amp;diff=544734&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2015-12-24T11:50:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;{{सूचना बक्सा प्रसिद्ध व्यक्तित्व |चित्र=Blankimage.jpg |चित...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा प्रसिद्ध व्यक्तित्व&lt;br /&gt;
|चित्र=Blankimage.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=सदन कसाई&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=&lt;br /&gt;
|मृत्यु=&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=जगन्नाथ पुरी&lt;br /&gt;
|अभिभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|गुरु=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=भारत&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|खोज=&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=[[भक्त]] &lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[जगन्नाथ मंदिर पुरी]], [[जगन्नाथ पुरी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=&lt;br /&gt;
|पाठ 3=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=&lt;br /&gt;
|पाठ 4=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=&lt;br /&gt;
|पाठ 5=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=सदन कसाई को भगवन्नाम-जप और [[हरि]] कीर्तन प्रिय था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। बहुत काल तक नाम-कीर्तन, गुणगान तथा भगवान के ध्‍यान में तल्‍लीन रहते हुए उन्‍होंने [[जगन्नाथ पुरी]] में निवास किया।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''सदन''' भगवान [[जगन्नाथ मंदिर पुरी|श्री जगन्नाथ जी]] के परम [[भक्त]] थे। इनको बचपन से ही भगवन्नाम-जप और [[हरि]] कीर्तन प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। ये जाति से कसाई थे, फिर भी इनका हृदय दया से पूर्ण था। जीव-वध के नाम से ही इनका शरीर काँपने लगता था। आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, स्‍वयं अपने हाथ से पशु-वध नहीं करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;जाति पाँति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
प्राचीन समय में सदन नामक कसाई जाति के एक भक्त हुए थे। बचपन से भगवन्नाम-जप और हरि कीर्तन इन्‍हें प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। यद्यपि ये जाति से कसाई थे, फिर भी इनका हृदय दया से पूर्ण था। जीव-वध के नाम से ही इनका शरीर काँपने लगता था। आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, स्‍वयं अपने हाथ से पशु-वध नहीं करते थे। इस काम में भी इनका मन लगता नहीं था, पर मन मारकर जाति-व्‍यवसाय होने से करते थे। सदा नाम-जप, भगवान के गुण-गान और लीलामय पुरुषोत्तम के चिन्‍तन में लगे रहते थे। सदन का मन श्री हरि के चरणों में रम गया था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान अपने भक्त से दूर नहीं रहा करते। भक्त को जैसे उनके बिना चैन नहीं, वैसे ही उन्‍हें भी भक्त के बिना चैन नहीं। सदन के घर में भगवान शालग्राम रूप में विराजमान थे। सदन को इसका पता नहीं था। वे तो शालग्राम को पत्‍थर का एक बाट समझते थे और उनसे मांस तौला करते थे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;bc&amp;quot;&amp;gt; ''पुस्तक''- भक्त चरितांक | ''प्रकाशक''- गीता प्रेस, गोरखपुर | ''विक्रमी संवत''- 2071 (वर्ष-2014) | ''पृष्ठ संख्या''- 684&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==साधु का स्‍वप्‍न==&lt;br /&gt;
एक दिन एक साधु सदन की दुकान के सामने से जा रहे थे। दृष्टि पड़ते ही वे शालग्राम जी को पहचान गये। मांस-विक्रेता कसाई के यहाँ अपवित्र स्‍थल में शालग्राम जी को देखकर साधु को बड़ा क्‍लेश हुआ। सदन से माँगकर वे शालग्राम को ले गये। सदन ने भी प्रसन्नतापूर्वक साधु को अपना वह चमकीला बाट दे दिया। साधु बाबा कुटिया पर पहुँचे। उन्‍होंने विधिपूर्वक शालग्राम जी की पूजा की; परंतु भगवान को न तो पदार्थों की अपेक्षा है न मंत्र या विधि की। वे तो प्रेम के भूखे हैं, प्रेम से रीझते हैं। रात में उन साधु को स्‍वप्‍न में भगवान ने कहा- &amp;quot;तुम मुझे यहाँ क्‍यों ले आये? मुझे तो अपने [[भक्त]] सदन के घर में ही बड़ा सुख मिलता था। जब वह मांस तौलने के लिये मुझे उठाता था, तब उसके शीतल स्‍पर्श से मुझे अत्‍यन्‍त आनन्‍द मिलता था। जब वह ग्राहकों से बातें करता था, तब मुझे उसके शब्‍द बड़े मधुर स्‍तोत्र जान पड़ते थे। जब वह मेरा नाम लेकर कीर्तन करता, नाचने लगता था, तब आनन्‍द के मारे मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता था। तुम मुझे वहीं पहुँचा दो। मुझे सदन के बिना एक क्षण कल नहीं पड़ती।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साधु महराज जगे। उन्‍होंने शालग्राम जी को उठाया और सदन के घर जाकर उसे दे आये। साथ ही उसको भगवत्‍कृपा का महत्त्व भी बता आये। सदन को जब पता लगा कि उनका यह बटखरा तो भगवान शालग्राम हैं, तब उन्‍हें बड़ा पश्‍चात्ताप हुआ। वे मन-ही-मन कहने लगे- &amp;quot;देखो, मैं कितना बड़ा पापी हूँ। मैंने भगवान को निरादरपूर्वक अपवित्र मांस के तराजू का बाट बना रखा। प्रभो ! अब मुझे क्षमा करो।&amp;quot; अब सदन को अपने व्‍यवसाय से घृणा हो गयी।&lt;br /&gt;
==प्रभु की लीला==&lt;br /&gt;
सदन कसाई शालग्राम जी को लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्र श्री [[जगन्नाथ पुरी]] को चल पड़े। मार्ग में सन्‍ध्‍या-समय सदन जी एक गाँव में एक गृहस्‍थ के घर ठहरे। उस घर में स्‍त्री-पुरुष दो ही व्‍यक्ति थे। स्‍त्री का आचरण अच्‍छा नहीं था। वह अपने घर ठहरे हुए इस स्‍वस्‍थ, सुन्‍दर, सबल पुरुष पर मोहित हो गयी। आधी रात के समय सदन जी के पास आकर वह अनेक प्रकार की अशिष्‍ट चेष्‍टाएं करने लगी। सदन जी तो भगवान के परम भक्त थे। उन पर काम की कोई चेष्‍टा सफल न हुई। वे उठकर, हाथ जोड़कर बोले- &amp;quot;तुम मेरी माता हो ! अपने बच्‍चे की परीक्षा मत लो, माँ ! मुझे तुम आशीर्वाद दो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान के सच्‍चे [[भक्त]] पर-स्‍त्री को माता ही देखते हैं। स्‍त्री का मोहक रूप उनको भ्रम में नहीं डालता। वे हड्डी, मांस, चमड़ा, मल-मूत्र, थूक-पीब की पुतली को सुन्‍दर मानने की मूर्खता कर ही नहीं सकते; परंतु जो काम के वश हो जाता है, उसकी बुद्धि मारी जाती है। वह न सोच-समझ पता, न कुछ देख पाता। वह निर्लज्‍ज और निर्दय हो जाता है। उस कामातुरा स्‍त्री ने समझा कि मेरे पति के भय से ही यह मेरी बात नहीं मानता। वह गयी और तलवार लेकर सोते हुए अपने पति का सिर उसने काट दिया। कामान्‍ध कौन-सा पाप नहीं कर सकता। अब वह कहने लगी- &amp;quot;प्‍यारे ! अब डरो मत। मैंने अपने खूसट पति का सिर काट डाला है। हमारे सुख का कण्‍टक दूर हो गया। अब तुम मुझे स्‍वीकार करो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदन भय से काँप उठे। स्‍त्री ने अनुनय-विनय करके जब देख लिया कि उसकी प्रार्थना स्‍वीकार नहीं हो सकती, तब द्वार पर आकर छाती पीट-पीटकर रोने लगी। लोग उसका रुदन सुनकर एकत्र हो गये। उसने कहा- &amp;quot;इस यात्री ने मेरे पति को मार डाला है और यह मेरे साथ बलात्‍कार करना चाहता था।&amp;quot; लोगों ने सदन को खूब भला बुरा कहा, कुछ ने मारा भी; पर सदन ने कोई सफाई नहीं दी। मामला न्‍यायाधीश के पास गया। सदन तो अपने प्रभु की लीला देखते हुए अन्‍त तक चुप ही बने रहे। अपराध सिद्ध हो गया। न्‍यायाधीश की आज्ञा से उनके दोनों हाथ काट लिये गये।&lt;br /&gt;
;पुजारी को भगवान का आदेश&lt;br /&gt;
सदन के हाथ कट गये, रुधिर की धारा चलने लगी; उन्‍होंने इसे अपने प्रभु की कृपा ही माना। उनके मन में भगवान के प्रति तनिक भी रोष नहीं आया। भगवान के सच्‍चे भक्त इस प्रकार निरपराध कष्‍ट पाने पर भी अपने स्‍वामी की दया ही मानते हैं। भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए सदन [[जगन्नाथ पुरी]] चल पड़े। उधर पुरी में प्रभु ने पुजारी को स्‍वप्‍न में आदेश दिया- &amp;quot;मेरा भक्त सदन मेरे पास आ रहा है। उसके हाथ कट गये हैं। पालकी लेकर जाओ और उसे आदरपूर्वक ले आओ।&amp;quot; पुजारी पालकी लिवाकर गये और आग्रहपूर्वक सदन को उसमें बैठाकर ले आये।&lt;br /&gt;
;चमत्कारिक प्रसंग&lt;br /&gt;
सदन ने जैसे ही [[जगन्नाथ मंदिर पुरी|श्री जगन्नाथ जी]] को दण्‍डवत करके कीर्तन के लिये भुजाएँ उठायी, उनके दोनों हाथ पूर्ववत ठीक हो गये। प्रभु की कृपा से हाथ ठीक तो हुए, पर मन में शंका बनी ही रही कि वे क्‍यों काटे गये। भगवान के राज्‍य में कोई निरपराध तो दण्‍ड पाता नहीं। रात में स्‍वप्‍न में भगवान ने सदन जी को बताया- &amp;quot;तुम पूर्वजन्‍म में काशी में सदाचारी विद्वान ब्राह्मण थे। एक दिन एक गाय कसाई के घेरे से भागी जाती थी। उसने तुम्‍हें पुकारा। तुमने कसाई को जानते हुए भी गाय के गले में दोनों हाथ डालकर उसे भागने से रोक लिया। वही गाय वह स्‍त्री थी और कसाई उसका पति था। पूर्वजन्‍म का बदला लेने के लिये उसने उसका गला काटा। तुमने भयातुरा गाय को दोनों हाथों से पकड़कर कसाई को सौंपा था, इस पाप से तुम्‍हारे हाथ काटे गये। इस दण्‍ड से तुम्‍हारे पाप का नाश हो गया।&amp;quot;&lt;br /&gt;
==परमधाम गमन==&lt;br /&gt;
सदन ने भगवान की असीम कृपा का परिचय पाया। वे भगवत्‍प्रेम में विह्वल हो गये। बहुत काल तक नाम-कीर्तन, गुणगान तथा भगवान के ध्‍यान में तल्‍लीन रहते हुए उन्‍होंने पुरुषोत्तम क्षेत्र में निवास किया और अन्‍त में श्री जगन्‍नाथ जी के चरणों में देह त्‍यागकर वे परमधाम पधारे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;bc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==                                            &lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कृष्ण2}}&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण]][[Category:भक्ति_साहित्य]][[Category:भक्ति काल]][[Category:सगुण_भक्ति]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>नवनीत कुमार</name></author>
	</entry>
</feed>