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	<title>विंध्यशक्ति - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''विंध्यशक्ति''' 'वाकाटक वंश' (300 से 500 ईसवी लगभग) का संस्...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2013-04-13T07:03:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;विंध्यशक्ति&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &amp;#039;&lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%95_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6&quot; title=&quot;वाकाटक वंश&quot;&gt;वाकाटक वंश&lt;/a&gt;&amp;#039; (300 से 500 ईसवी लगभग) का संस्...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''विंध्यशक्ति''' '[[वाकाटक वंश]]' (300 से 500 ईसवी लगभग) का संस्थापक था। शिलालेख में उसे 'वाकाटक वंशकेतु' कहा गया है। वह 'विष्णु वृद्धि' गोत्र का [[ब्राह्मण]] था। विंध्यशक्ति की तुलना देवराज [[इन्द्र]] एवं [[विष्णु]] से की जाती थी। सम्भवतः वाकाटकों का दक्कन प्रदेश में तीसरी शताब्दी से लेकर पाँचवीं शताब्दी तक शासन रहा था। विंध्यशक्ति का पुत्र एवं उत्तराधिकारी '[[प्रवरसेन|हरितिपुत्र प्रवरसेन]]' ही एक मात्र ऐसा वाकाटक राजा था, जिसे सम्राट की पदवी मिली थी। उसके समय में वाकाटक राज्य का विस्तार [[बुन्देलखण्ड]] से प्रारम्भ होकर दक्षिण में [[हैदराबाद]] तक विस्तार ले चुका था।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==कुषाणों का पतन==&lt;br /&gt;
278 ई. के लगभग [[पाटलिपुत्र]] से भी [[कुषाण|कुषाणों]] का शासन समाप्त हो चुका था। इसका श्रेय 'वाकाटक वंश' के प्रवर्तक विंध्यशक्ति को है। पर इस समय वाकाटक लोग [[भारशिव वंश|भारशिवों]] के सामन्त थे। भारशिव राजाओं की प्रेरणा से ही विंध्यशक्ति ने पाटलिपुत्र से मुरुण्ड शासकों का उच्छेद कर उसे कान्तिपुर के साम्राज्य के अन्तर्गत कर लिया था। सम्भवतः वाकाटकों का दक्कन प्रदेश में तीसरी शताब्दी से लेकर 5वीं शताब्दी तक शासन रहा था। &lt;br /&gt;
==पौराणिक प्रमाण==&lt;br /&gt;
वाकाटक शक्ति के संस्थापक विंध्यशक्ति के पूर्वजों एवं उसके उदगम स्थान के विषय में कोई जानकारी नहीं है। उसके नाम के कारण उसका सम्बन्ध [[विंध्यप्रदेश|विंध्य क्षेत्र]] के किसी स्थान के साथ जुड़ा प्रतीत होता है। वंश का नाम सम्भवतः व्यक्ति या अधिक सम्भवतः किसी वाटक नामक क्षेत्र से जुड़ा है। पौराणिक प्रमाणों से प्रतीत होता है कि विंध्यशक्ति ने पूर्वी [[मालवा]] में अपनी शक्ति तीसरी शताब्दी में दृढ़ की, जबकि [[शक]] [[महाक्षत्रप|महाक्षत्रपों]] की शक्ति का पतन और [[विदिशा]] के '[[नाग वंश]]' जैसी देशी शक्तियों का उदय हो रहा था। यह भी सम्भव है कि विंध्यशक्ति ने विंध्य पार अपनी शक्ति का विस्तार [[सातवाहन साम्राज्य|सातवाहनों]] की क़ीमत पर किया हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाकाटक शासकों के अधिकतर लेख प्रमाणों एवं [[पुराण|पुराणों]] के आधार पर यह कहा जाता है कि वाकाटक शासन तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रारम्भ हुआ और पाँचवीं शताब्दी के अन्त तक चलता रहा। विंध्यशक्ति विष्णुवृद्धि गोत्र का [[ब्राह्मण]] था। यह निश्चय नहीं है कि उसने भी सेनानी [[पुष्यमित्र शुंग|पुष्यमित्र]] की ही भाँति राजकीय उपाधियों के बग़ैर शासन किया अथवा उपाधियाँ धारण कीं। उसके उत्तराधिकारी (उसके पुत्र) [[प्रवरसेन प्रथम]] ने 'महाराज' की उपाधि धारण की। उसके पारिवारिक लेख-प्रमाणों से ज्ञात होता है कि एकमात्र वही ऐसा [[वाकाटक राजवंश|वाकाटक]] राजा था, जिसे सम्राट की उपाधि से सम्बोधित किया जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{वाकाटक वंश}}{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
[[Category:वाकाटक साम्राज्य]][[Category:भारत के राजवंश]][[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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