<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D</id>
	<title>रामावतारम् - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D&amp;action=history"/>
	<updated>2026-06-28T17:08:42Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D&amp;diff=647487&amp;oldid=prev</id>
		<title>दिनेश: ''''रामावतारम्‌''' के रचयिता कंवन चोल राजा...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D&amp;diff=647487&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2020-06-23T11:02:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;रामावतारम्‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; के रचयिता कंवन &lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%9A%E0%A5%8B%E0%A4%B2_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6&quot; title=&quot;चोल राजवंश&quot;&gt;चोल&lt;/a&gt; राजा...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''रामावतारम्‌''' के रचयिता कंवन [[चोल राजवंश|चोल]] राजा [[कुलोतुंग तृतीय]] के दरबार में थे। उन्होंने [[रामायण]] की रचना अपने संरक्षक सदयप्पा वल्लाल के प्रोत्साहन से की। उनका जन्म तिरॅवेन्नैनलुर, जिला [[तंजौर]] में हुआ। उनका संरक्षण कृपालु सदयप्पा ने किया जिनका उल्लेख [[कंबन]] की रचनाओं में बहुधा मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कंबन विरुतम काव्य में दक्ष थे। उनकी समृद्धि उस काल में हुई जब भक्तिपंथ नयनमरों तथा आलवरों द्वारा लोकप्रिय हे रहा था। उत्कट [[वैष्णव]] होते हुए भी कंबन का दृष्टिकोण यथेष्ट उदार था। उन्होंने [[शिव|भगवान्‌ शिव]] की प्रशंसा अपनी रामायण में की है। उनके युग में कई उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना हुई किंतु उनकी रचित रामायण उनमें सर्वोपरि है।&lt;br /&gt;
*कंबन कृत रामायण में एक हजार पद हैं। उन्होंने उत्तर कांड के विषय में कुछ नहीं लिखा और उनकी रामायण [[राम]] के राज्याभिषेक पर समाप्त हो जाती है। परंपरा के विरुद्ध रामायण की मुक्ति राजदरबार में न होकर श्रीरंगम के पावन स्थल पर होती है। कंबन ने अपनी रचना को रामावतानम्‌ तथा रामकथा की संज्ञा दी। स्मरण रहे कि नेपाली रामायण का नाम भी रामावतारम्‌ है।&lt;br /&gt;
*कंबन का काव्य उपमा तथा अर्थ की गूढ़ता में अतुलनीय है। यद्यपि कंबन ने [[वाल्मीकि रामायण]] का अनुसरण किया, तथापि यह कहना अनुचित होगा कि यह [[संस्कृत]] का अनुवाद मात्र है। [[रामायण]] के चरित्रों के चित्रण में कंबन ने तमिल संस्कृति, परंपरा तथा रीति रिवाज ग्रहण किया। एक तमिल परंपरा एंव रुचि को ग्रहण करने के कारण कंबन चरित्रचित्रण में वाल्मीकि रामायण से विलग हो गए हैं। उदाहरणार्थ [[वाल्मीकि]] के अनुसार [[सुग्रीव]] ने [[बालि]] की विधवा से [[विवाह]] किया जब कि कंबन के अनुसार रत्न तथा सौभाग्य के बिना वह माता जैसी लगती थी।&lt;br /&gt;
*वाल्मीकि के अनुसार [[रावण]] ने [[सीता]] का हरण [[पंचवटी]] से किया लेकिन कंबन का कथन है कि रावण ने संपूर्ण आश्रम [[पृथ्वी]] पर से उठा लिया था। [[ब्रह्मा]] के शाप के कारण उसने सीता का स्पर्श नहीं किया। वाल्मीकि ने कहा है कि राक्षस ने सीता को [[लंका]] में कैद किया। कंबन एक बात और जोड़ के कहते हैं कि सीता लंकेश के हृदय में भी कैद थीं।&lt;br /&gt;
*कंबन [[अंगद]] के शरणस्थल के विषय में भी लिखते हैं, जबकि इसका कोई उल्लेख वाल्मीकि ने नहीं किया। वाल्मीकि मौन हैं पर कंबन ने [[राम]] तथा [[सीता]] के प्रथम प्रेम के जन्म का भी वर्णन किया है जो राम सीता के प्रथम साक्षात्कार के समय हुआ जब राम [[विश्वामित्र]] [[लक्ष्मण]] के साथ [[मिथिला]] की सड़क पर जा रहे थे।&lt;br /&gt;
*कंबन के राजनीतिक विचार, जो रामावतारम्‌ में पाए जाते हैं और भी महत्वपूर्ण हैं। वह दो प्रकार के शासन का वर्णन करते हैं। पहला न्याययुक्त शासन जो सत्कार्यों पर आधारित होता है। दूसरा शक्तिशासन जिसका आधार साहस होता है। अयोध्या में न्याययुक्त शासन था जबकि लंका में शक्तिशासन था। न्याययुक्त शासक अपने मंत्रियों की मंत्रणा मानता है जबकि शक्तिशासक उसकी उपेक्षा करता है। कंबन अनुभव करते हैं कि एक आदर्श शासक का उद्देश्य सर्वहित होना चाहिए।&lt;br /&gt;
*मुदालियर की कंबन रामायण व्याख्या उत्कृष्ठ है। कंबन की सर्वोत्तम रचनाओं के रचनाकाल के विषय में मतैक्य नहीं है। राघव आयंगर की बहुमूल्य खोजों के आधार पर यह मान लिया गया है कि रामवतारम्‌ 1178 ई. में समाप्त हुआ और इसका प्रकाशन 1185 में हुआ।&lt;br /&gt;
*महान्‌ तमिल विद्वान्‌ प्रो. सेल्वकेसवरयर ने ठीक ही कहा है कि &amp;quot;[[तमिल भाषा]] के केवल दो लौह स्तंभ हैं। वे है [[कंबन]] और [[तिरुवल्लुवर]]।&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाकाव्य}}{{तमिल साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:तमिल साहित्य]][[Category:साहित्य कोश]][[Category:महाकाव्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>दिनेश</name></author>
	</entry>
</feed>