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	<title>बंग भंग - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;फांसी&quot; to &quot;फाँसी&quot;</title>
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ने लिखा कि &quot;ब्रिटिश सरकार इस खुशफहमी में न रहे कि देश इस राक्षसी योजना को बिना किसी संघर्ष के चुपचाप स्वीकार कर लेगा। इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि हम ऐसे अप्रत्याशित आंदोलन के कगार पर खड़े हैं जो अपनी व्यापकता और तीव्रता में इस प्रान्त के अब तक के इतिहास में अद्वितीय होगा।&quot; 8 जुलाई को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में तीन शीर्ष नरमदली प्रतिनिधियों [[अम्बिका चरण मज़ूमदार|अम्बिका चरण मज़ूमदार]], भूपेन्द्र नाथ बसु और जोगेशचन्द्र चौधरी ने बंगाल के ले. गवर्नर फ्रेजर की उपस्थिति में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि किसी मामूली अपराधी को सजा देने के पहले अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है किन्तु बंगाल को वह मौका भी नहीं दिया गया और करोड़ों बंगालियों के भविष्य को &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;फांसी &lt;/del&gt;पर लटकाने की घोषणा कर दी गई। अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय इसके कि इस अन्याय के विरुद्ध हम अपनी एकता के बल पर शान्तिपूर्ण संघर्ष में बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहें। किन्तु कर्जन को विश्वास था कि बंगाल गरजेगा पर बरसेगा नहीं। उसे अन्दाजा नहीं था कि बंगाल राष्ट्रीयता के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उसका पूरी तरह मानसिक और बौद्धिक रूपान्तरण हो चुका है। बंगाल की युवा पीढ़ी [[स्वामी विवेकानन्द]] के सन्देश को आत्मसात कर चुकी है। 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके स्वामी विवेकानन्द ने नारायण को नर सेवा से जोड़ दिया था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक उनकी यात्रा और गर्जना ने बंगाली मानस को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर दिया था। अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी जी के भारी प्रभाव का साक्षात्कार करके [[विपिन चन्द्र पाल]] जैसे नरमदलीय ब्राहृ समाजी चिन्तक ब्रिटिश भक्ति की भाषा छोड़कर एक नए महान् सांस्कृतिक भारत के निर्माण का सपना देखने लगे थे। अपनी अमरीका यात्रा से [[भारत]] वापस लौटते ही उन्होंने 1901 में &quot;न्यू इंडिया&quot; नामक एक साप्ताहिक प्रारम्भ करके अपने सपने को शिक्षित बंगाल तक पहुंचाना शुरू कर दिया था। 1898 में एक ब्रिटिश महिला स्वामी विवेकानन्द से प्रभावित होकर उनकी शिष्या बनकर भारत आ गई थी। [[सिस्टर निवेदिता|भगिनी निवेदिता]] नाम धारण कर उसने भारत को ही अपनी कर्मभूमि, मोक्षभूमि बना लिया था। जिस वर्ष 1902 में स्वामी विवेकानन्द अपना भौतिक शरीर त्याग कर विचार रूप में बंगाल के मन-प्राण पर छा गए, उसी वर्ष एक अन्य मनीषी सतीशचन्द्र मुखोपाध्याय ने &quot;डान सोसायटी&quot; की स्थापना की, जिसने बंगाल के किशोर और युवा अन्त:करणों को भारत के प्राचीन गौरव और राष्ट्रीय स्वाभिमान का पाठ पढ़ाना शुरू किया। बंगाल अपने क्षेत्रीय अभिमान से आगे बढ़कर अखिल भारतीय राष्ट्रीयता का अंग ही नहीं, बल्कि उसका बौद्धिक नेतृत्व करने लगा था। [[महाराष्ट्र]] का एक युवक सखाराम गणेश देऊस्कर बंगाल को अपनी कर्मभूमि बनाकर बंगाल और महाराष्ट्र के बीच राष्ट्रीय एकता का पुल बना रहा था। 1902 में पहली बार शिवाजी उत्सव का आयोजन हुआ जिसमें विपिनचन्द्र पाल ने अपनी ओजस्वी वाणी में शिवाजी के संकल्प, रणनीति और वीरता के आदर्श को बंगाल की जनता के सामने रखा। [[1904]] में शिवाजी उत्सव के लिए [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर|कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] ने &quot;शिवाजी&quot; शीर्षक अपनी प्रसिद्ध कविता प्रस्तुत की। उसी वर्ष रवीन्द्रनाथ ने &quot;स्वदेशी समाज&quot; नामक निबन्ध में भारत के सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का चित्र प्रस्तुत किया। अन्य बंगाली साहित्यकारों ने भी भारत के अन्य भागों के वीर और राष्ट्रभक्त चरित्रों-जैसे [[राणा प्रताप]], [[गुरु गोविन्द सिंह]] आदि को केन्द्र बनाकर प्रेरणादायी रचनाएं कीं। विदेश यात्रा से लौटकर ब्राहृ बांधव उपाध्याय ने नवम्बर, 1908 में सांध्य दैनिक &quot;संध्या&quot; शुरू करके फिरंगी सभ्यता पर व्यंग्यात्मक प्रहार प्रारंभ कर दिए थे। कर्जन समझ नहीं पाया था कि 1905 का बंगाल वह नहीं था जो मुग़लों-पठानों के शासनकाल में था। अब वह अखिल भारतीय राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत बन चुका था। श्री अरविन्द ने अपने छोटे से निबन्ध &quot;बंकिम-तिलक-दयानंद&quot; में बंगाल के इस रूपान्तरण की अखिल भारतीय पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है।&amp;lt;ref name=&quot;panchjanya&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; 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8 जुलाई को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में तीन शीर्ष नरमदली प्रतिनिधियों [[अम्बिका चरण मज़ूमदार|अम्बिका चरण मज़ूमदार]], भूपेन्द्र नाथ बसु और जोगेशचन्द्र चौधरी ने बंगाल के ले. गवर्नर फ्रेजर की उपस्थिति में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि किसी मामूली अपराधी को सजा देने के पहले अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है किन्तु बंगाल को वह मौका भी नहीं दिया गया और करोड़ों बंगालियों के भविष्य को &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;फाँसी &lt;/ins&gt;पर लटकाने की घोषणा कर दी गई। अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय इसके कि इस अन्याय के विरुद्ध हम अपनी एकता के बल पर शान्तिपूर्ण संघर्ष में बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहें। किन्तु कर्जन को विश्वास था कि बंगाल गरजेगा पर बरसेगा नहीं। उसे अन्दाजा नहीं था कि बंगाल राष्ट्रीयता के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उसका पूरी तरह मानसिक और बौद्धिक रूपान्तरण हो चुका है। बंगाल की युवा पीढ़ी [[स्वामी विवेकानन्द]] के सन्देश को आत्मसात कर चुकी है। 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके स्वामी विवेकानन्द ने नारायण को नर सेवा से जोड़ दिया था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक उनकी यात्रा और गर्जना ने बंगाली मानस को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर दिया था। अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी जी के भारी प्रभाव का साक्षात्कार करके [[विपिन चन्द्र पाल]] जैसे नरमदलीय ब्राहृ समाजी चिन्तक ब्रिटिश भक्ति की भाषा छोड़कर एक नए महान् सांस्कृतिक भारत के निर्माण का सपना देखने लगे थे। अपनी अमरीका यात्रा से [[भारत]] वापस लौटते ही उन्होंने 1901 में &quot;न्यू इंडिया&quot; 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ने लिखा कि &quot;ब्रिटिश सरकार इस खुशफहमी में न रहे कि देश इस राक्षसी योजना को बिना किसी संघर्ष के चुपचाप स्वीकार कर लेगा। इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि हम ऐसे अप्रत्याशित आंदोलन के कगार पर खड़े हैं जो अपनी व्यापकता और तीव्रता में इस प्रान्त के अब तक के इतिहास में अद्वितीय होगा।&quot; 8 जुलाई को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में तीन शीर्ष नरमदली प्रतिनिधियों [[अम्बिका चरण मज़ूमदार|अम्बिका चरण मज़ूमदार]], भूपेन्द्र नाथ बसु और जोगेशचन्द्र चौधरी ने बंगाल के ले. गवर्नर फ्रेजर की उपस्थिति में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि किसी मामूली अपराधी को सजा देने के पहले अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है किन्तु बंगाल को वह मौका भी नहीं दिया गया और करोड़ों बंगालियों के भविष्य को फांसी पर लटकाने की घोषणा कर दी गई। अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय इसके कि इस अन्याय के विरुद्ध हम अपनी एकता के बल पर शान्तिपूर्ण संघर्ष में बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहें। किन्तु कर्जन को विश्वास था कि बंगाल गरजेगा पर बरसेगा नहीं। उसे अन्दाजा नहीं था कि बंगाल राष्ट्रीयता के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उसका पूरी तरह मानसिक और बौद्धिक रूपान्तरण हो चुका है। बंगाल की युवा पीढ़ी [[स्वामी विवेकानन्द]] के सन्देश को आत्मसात कर चुकी है। 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके स्वामी विवेकानन्द ने नारायण को नर सेवा से जोड़ दिया था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक उनकी यात्रा और गर्जना ने बंगाली मानस को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर दिया था। अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी जी के भारी प्रभाव का साक्षात्कार करके [[विपिन चन्द्र पाल]] जैसे नरमदलीय ब्राहृ समाजी चिन्तक ब्रिटिश भक्ति की भाषा छोड़कर एक नए महान् सांस्कृतिक भारत के निर्माण का सपना देखने लगे थे। अपनी अमरीका यात्रा से [[भारत]] वापस लौटते ही उन्होंने 1901 में &quot;न्यू इंडिया&quot; नामक एक साप्ताहिक प्रारम्भ करके अपने सपने को शिक्षित बंगाल तक पहुंचाना शुरू कर दिया था। 1898 में एक ब्रिटिश महिला स्वामी विवेकानन्द से प्रभावित होकर उनकी शिष्या बनकर भारत आ गई थी। [[सिस्टर निवेदिता|भगिनी निवेदिता]] नाम धारण कर उसने भारत को ही अपनी कर्मभूमि, मोक्षभूमि बना लिया था। जिस वर्ष 1902 में स्वामी विवेकानन्द अपना भौतिक शरीर त्याग कर विचार रूप में बंगाल के मन-प्राण पर छा गए, उसी वर्ष एक अन्य मनीषी सतीशचन्द्र मुखोपाध्याय ने &quot;डान सोसायटी&quot; की स्थापना की, जिसने बंगाल के किशोर और युवा अन्त:करणों को भारत के प्राचीन गौरव और राष्ट्रीय स्वाभिमान का पाठ पढ़ाना शुरू किया। बंगाल अपने क्षेत्रीय अभिमान से आगे बढ़कर अखिल भारतीय राष्ट्रीयता का अंग ही नहीं, बल्कि उसका बौद्धिक नेतृत्व करने लगा था। [[महाराष्ट्र]] का एक युवक सखाराम गणेश देऊस्कर बंगाल को अपनी कर्मभूमि बनाकर बंगाल और महाराष्ट्र के बीच राष्ट्रीय एकता का पुल बना रहा था। 1902 में पहली बार शिवाजी उत्सव का आयोजन हुआ जिसमें विपिनचन्द्र पाल ने अपनी ओजस्वी वाणी में शिवाजी के संकल्प, रणनीति और वीरता के आदर्श को बंगाल की जनता के सामने रखा। [[1904]] में शिवाजी उत्सव के लिए [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर|कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] ने &quot;शिवाजी&quot; शीर्षक अपनी प्रसिद्ध कविता प्रस्तुत की। उसी वर्ष रवीन्द्रनाथ ने &quot;स्वदेशी समाज&quot; नामक निबन्ध में भारत के सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का चित्र प्रस्तुत किया। अन्य बंगाली साहित्यकारों ने भी भारत के अन्य भागों के वीर और राष्ट्रभक्त चरित्रों-जैसे [[राणा प्रताप]], [[गुरु गोविन्द सिंह]] आदि को केन्द्र बनाकर प्रेरणादायी रचनाएं कीं। विदेश यात्रा से लौटकर ब्राहृ बांधव उपाध्याय ने नवम्बर, 1908 में सांध्य दैनिक &quot;संध्या&quot; शुरू करके फिरंगी सभ्यता पर &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;व्यंगात्मक &lt;/del&gt;प्रहार प्रारंभ कर दिए थे। कर्जन समझ नहीं पाया था कि 1905 का बंगाल वह नहीं था जो मुग़लों-पठानों के शासनकाल में था। अब वह अखिल भारतीय राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत बन चुका था। श्री अरविन्द ने अपने छोटे से निबन्ध &quot;बंकिम-तिलक-दयानंद&quot; में बंगाल के इस रूपान्तरण की अखिल भारतीय पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है।&amp;lt;ref name=&quot;panchjanya&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; 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8 जुलाई को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में तीन शीर्ष नरमदली प्रतिनिधियों [[अम्बिका चरण मज़ूमदार|अम्बिका चरण मज़ूमदार]], भूपेन्द्र नाथ बसु और जोगेशचन्द्र चौधरी ने बंगाल के ले. गवर्नर फ्रेजर की उपस्थिति में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि किसी मामूली अपराधी को सजा देने के पहले अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है किन्तु बंगाल को वह मौका भी नहीं दिया गया और करोड़ों बंगालियों के भविष्य को फांसी पर लटकाने की घोषणा कर दी गई। अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय इसके कि इस अन्याय के विरुद्ध हम अपनी एकता के बल पर शान्तिपूर्ण संघर्ष में बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहें। किन्तु कर्जन को विश्वास था कि बंगाल गरजेगा पर बरसेगा नहीं। उसे अन्दाजा नहीं था कि बंगाल राष्ट्रीयता के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उसका पूरी तरह मानसिक और बौद्धिक रूपान्तरण हो चुका है। बंगाल की युवा पीढ़ी [[स्वामी विवेकानन्द]] के सन्देश को आत्मसात कर चुकी है। 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके स्वामी विवेकानन्द ने नारायण को नर सेवा से जोड़ दिया था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक उनकी यात्रा और गर्जना ने बंगाली मानस को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर दिया था। अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी जी के भारी प्रभाव का साक्षात्कार करके [[विपिन चन्द्र पाल]] जैसे नरमदलीय ब्राहृ समाजी चिन्तक ब्रिटिश भक्ति की भाषा छोड़कर एक नए महान् सांस्कृतिक भारत के निर्माण का सपना देखने लगे थे। अपनी अमरीका यात्रा से [[भारत]] वापस लौटते ही उन्होंने 1901 में &quot;न्यू इंडिया&quot; 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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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ने लिखा कि &quot;ब्रिटिश सरकार इस खुशफहमी में न रहे कि देश इस राक्षसी योजना को बिना किसी संघर्ष के चुपचाप स्वीकार कर लेगा। इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि हम ऐसे अप्रत्याशित आंदोलन के कगार पर खड़े हैं जो अपनी व्यापकता और तीव्रता में इस प्रान्त के अब तक के इतिहास में अद्वितीय होगा।&quot; 8 जुलाई को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में तीन शीर्ष नरमदली प्रतिनिधियों [[अम्बिका चरण मज़ूमदार|अम्बिका चरण मज़ूमदार]], भूपेन्द्र नाथ बसु और जोगेशचन्द्र चौधरी ने बंगाल के ले. गवर्नर फ्रेजर की उपस्थिति में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि किसी मामूली अपराधी को सजा देने के पहले अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है किन्तु बंगाल को वह मौका भी नहीं दिया गया और करोड़ों बंगालियों के भविष्य को फांसी पर लटकाने की घोषणा कर दी गई। अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय इसके कि इस अन्याय के विरुद्ध हम अपनी एकता के बल पर शान्तिपूर्ण संघर्ष में बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहें। किन्तु कर्जन को विश्वास था कि बंगाल गरजेगा पर बरसेगा नहीं। उसे अन्दाजा नहीं था कि बंगाल राष्ट्रीयता के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उसका पूरी तरह मानसिक और बौद्धिक रूपान्तरण हो चुका है। बंगाल की युवा पीढ़ी [[स्वामी विवेकानन्द]] के सन्देश को आत्मसात कर चुकी है। 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके स्वामी विवेकानन्द ने नारायण को नर सेवा से जोड़ दिया था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक उनकी यात्रा और गर्जना ने बंगाली मानस को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर दिया था। अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी जी के भारी प्रभाव का साक्षात्कार करके [[विपिन चन्द्र पाल]] जैसे नरमदलीय ब्राहृ समाजी चिन्तक ब्रिटिश भक्ति की भाषा छोड़कर एक नए &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;महान &lt;/del&gt;सांस्कृतिक भारत के निर्माण का सपना देखने लगे थे। अपनी अमरीका यात्रा से [[भारत]] वापस लौटते ही उन्होंने 1901 में &quot;न्यू इंडिया&quot; नामक एक साप्ताहिक प्रारम्भ करके अपने सपने को शिक्षित बंगाल तक पहुंचाना शुरू कर दिया था। 1898 में एक ब्रिटिश महिला स्वामी विवेकानन्द से प्रभावित होकर उनकी शिष्या बनकर भारत आ गई थी। [[सिस्टर निवेदिता|भगिनी निवेदिता]] नाम धारण कर उसने भारत को ही अपनी कर्मभूमि, मोक्षभूमि बना लिया था। जिस वर्ष 1902 में स्वामी विवेकानन्द अपना भौतिक शरीर त्याग कर विचार रूप में बंगाल के मन-प्राण पर छा गए, उसी वर्ष एक अन्य मनीषी सतीशचन्द्र मुखोपाध्याय ने &quot;डान सोसायटी&quot; की स्थापना की, जिसने बंगाल के किशोर और युवा अन्त:करणों को भारत के प्राचीन गौरव और राष्ट्रीय स्वाभिमान का पाठ पढ़ाना शुरू किया। बंगाल अपने क्षेत्रीय अभिमान से आगे बढ़कर अखिल भारतीय राष्ट्रीयता का अंग ही नहीं, बल्कि उसका बौद्धिक नेतृत्व करने लगा था। [[महाराष्ट्र]] का एक युवक सखाराम गणेश देऊस्कर बंगाल को अपनी कर्मभूमि बनाकर बंगाल और महाराष्ट्र के बीच राष्ट्रीय एकता का पुल बना रहा था। 1902 में पहली बार शिवाजी उत्सव का आयोजन हुआ जिसमें विपिनचन्द्र पाल ने अपनी ओजस्वी वाणी में शिवाजी के संकल्प, रणनीति और वीरता के आदर्श को बंगाल की जनता के सामने रखा। [[1904]] में शिवाजी उत्सव के लिए [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर|कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] ने &quot;शिवाजी&quot; शीर्षक अपनी प्रसिद्ध कविता प्रस्तुत की। उसी वर्ष रवीन्द्रनाथ ने &quot;स्वदेशी समाज&quot; नामक निबन्ध में भारत के सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का चित्र प्रस्तुत किया। अन्य बंगाली साहित्यकारों ने भी भारत के अन्य भागों के वीर और राष्ट्रभक्त चरित्रों-जैसे [[राणा प्रताप]], [[गुरु गोविन्द सिंह]] आदि को केन्द्र बनाकर प्रेरणादायी रचनाएं कीं। विदेश यात्रा से लौटकर ब्राहृ बांधव उपाध्याय ने नवम्बर, 1908 में सांध्य दैनिक &quot;संध्या&quot; शुरू करके फिरंगी सभ्यता पर व्यंगात्मक प्रहार प्रारंभ कर दिए थे। कर्जन समझ नहीं पाया था कि 1905 का बंगाल वह नहीं था जो मुग़लों-पठानों के शासनकाल में था। अब वह अखिल भारतीय राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत बन चुका था। श्री अरविन्द ने अपने छोटे से निबन्ध &quot;बंकिम-तिलक-दयानंद&quot; में बंगाल के इस रूपान्तरण की अखिल भारतीय पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है।&amp;lt;ref name=&quot;panchjanya&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; 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8 जुलाई को बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल में तीन शीर्ष नरमदली प्रतिनिधियों [[अम्बिका चरण मज़ूमदार|अम्बिका चरण मज़ूमदार]], भूपेन्द्र नाथ बसु और जोगेशचन्द्र चौधरी ने बंगाल के ले. गवर्नर फ्रेजर की उपस्थिति में अपनी पीड़ा व्यक्त की कि किसी मामूली अपराधी को सजा देने के पहले अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है किन्तु बंगाल को वह मौका भी नहीं दिया गया और करोड़ों बंगालियों के भविष्य को फांसी पर लटकाने की घोषणा कर दी गई। अब हमारे सामने कोई रास्ता नहीं बचा सिवाय इसके कि इस अन्याय के विरुद्ध हम अपनी एकता के बल पर शान्तिपूर्ण संघर्ष में बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहें। किन्तु कर्जन को विश्वास था कि बंगाल गरजेगा पर बरसेगा नहीं। उसे अन्दाजा नहीं था कि बंगाल राष्ट्रीयता के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। उसका पूरी तरह मानसिक और बौद्धिक रूपान्तरण हो चुका है। बंगाल की युवा पीढ़ी [[स्वामी विवेकानन्द]] के सन्देश को आत्मसात कर चुकी है। 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके स्वामी विवेकानन्द ने नारायण को नर सेवा से जोड़ दिया था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक उनकी यात्रा और गर्जना ने बंगाली मानस को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव से अनुप्राणित कर दिया था। अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी जी के भारी प्रभाव का साक्षात्कार करके [[विपिन चन्द्र पाल]] जैसे नरमदलीय ब्राहृ समाजी चिन्तक ब्रिटिश भक्ति की भाषा छोड़कर एक नए &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; 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शीर्षक अपनी प्रसिद्ध कविता प्रस्तुत की। उसी वर्ष रवीन्द्रनाथ ने &quot;स्वदेशी समाज&quot; नामक निबन्ध में भारत के सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का चित्र प्रस्तुत किया। अन्य बंगाली साहित्यकारों ने भी भारत के अन्य भागों के वीर और राष्ट्रभक्त चरित्रों-जैसे [[राणा प्रताप]], [[गुरु गोविन्द सिंह]] आदि को केन्द्र बनाकर प्रेरणादायी रचनाएं कीं। विदेश यात्रा से लौटकर ब्राहृ बांधव उपाध्याय ने नवम्बर, 1908 में सांध्य दैनिक &quot;संध्या&quot; शुरू करके फिरंगी सभ्यता पर व्यंगात्मक प्रहार प्रारंभ कर दिए थे। कर्जन समझ नहीं पाया था कि 1905 का बंगाल वह नहीं था जो मुग़लों-पठानों के शासनकाल में था। अब वह अखिल भारतीय राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत बन चुका था। श्री अरविन्द ने अपने छोटे से निबन्ध &quot;बंकिम-तिलक-दयानंद&quot; में बंगाल के इस रूपान्तरण की अखिल भारतीय पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है।&amp;lt;ref name=&quot;panchjanya&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;बाजार&quot; to &quot;बाज़ार&quot;</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;बाजार&amp;quot; to &amp;quot;बाज़ार&amp;quot;&lt;/p&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>गोविन्द राम 13 फ़रवरी 2013 को 07:40 बजे</title>
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		<author><name>गोविन्द राम</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;कर्जन&quot; to &quot;कर्ज़न&quot;</title>
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		<updated>2011-08-09T12:28:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;कर्जन&amp;quot; to &amp;quot;कर्ज़न&amp;quot;&lt;/p&gt;
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		<title>लक्ष्मी गोस्वामी 28 जून 2011 को 12:15 बजे</title>
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		<author><name>लक्ष्मी गोस्वामी</name></author>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: /* राष्ट्रीय शोक दिवस */</title>
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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