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	<title>प्रहस्त - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>गोविन्द राम 10 अगस्त 2016 को 09:28 बजे</title>
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				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;09:28, 10 अगस्त 2016 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l1&quot;&gt;पंक्ति 1:&lt;/td&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;'''प्रहस्त''' [[लंका]] के [[रावण|राजा रावण]] का मंत्री और वीर सेनापति था। युद्ध में अकम्पन की मृत्यु हो जाने के बाद रावण ने अपने वीर सेनापति प्रहस्त को युद्ध के लिए भेजा था। प्रहस्त ने [[राम]] की वानर सेना के साथ बड़ा ही भयंकर युद्ध किया। उसकी [[राक्षस]] सेना ने एक बार के लिए वानरों को भी भयभीत कर दिया। इस समय असंख्य वानर वीर वीरगति को प्राप्त हुए। वानर सेनापति [[नील]] और प्रहस्त का युद्ध भी बहुत भयंकर था। नील ने एक बड़ी सी शिला उठाकर प्रहस्त के सिर पर दे मारी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;'''प्रहस्त''' [[लंका]] के [[रावण|राजा रावण]] का मंत्री और वीर सेनापति था। युद्ध में अकम्पन की मृत्यु हो जाने के बाद रावण ने अपने वीर सेनापति प्रहस्त को युद्ध के लिए भेजा था। प्रहस्त ने [[राम]] की वानर सेना के साथ बड़ा ही भयंकर युद्ध किया। उसकी [[राक्षस]] सेना ने एक बार के लिए वानरों को भी भयभीत कर दिया। इस समय असंख्य वानर वीर वीरगति को प्राप्त हुए। वानर सेनापति [[नील]] और प्रहस्त का युद्ध भी बहुत भयंकर था। नील ने एक बड़ी सी शिला उठाकर प्रहस्त के सिर पर दे मारी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{&lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;tocright&lt;/del&gt;}}&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;नोट&lt;/ins&gt;}} &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;'''प्रहस्त''' अथवा '''प्रहस्थ''' को कई लेखों में [[रावण]] का पुत्र भी माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://therednews.com/News/2531/how-much-you-know-about-king-rawana रावण के पुत्र (The Rednews)]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==रावण का आदेश==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==रावण का आदेश==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकम्पन की मृत्यु से रावण को भारी आघात पहुँचा था। रात्रि को वह शान्ति से विश्राम भी न कर सका। दूसरे दिन उसने मन्त्रियों को बुलाकर कहा, &amp;quot;वानरों की सेना हमारी कल्पना से भी अधिक शक्तिशाली और पराक्रमी सिद्ध हुई है। पिछले चार दिनों में हमारी बहुत सी सेना मारी जा चुकी है। सैनिकों का मनोबल टूटने लगा है। नागरिकों को शत्रु के घेरे के कारण बाहर से उपलब्ध होने वाली खाद्य सामग्री प्राप्त नहीं हो रही है। वे अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। चार दिन के युद्ध को देखकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि शत्रु पर विजय प्राप्त करना साधारण राक्षसों के लिये सम्भव नहीं है। इसलिये हे वीर प्रहस्त! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि शत्रु को परास्त करने के लिये [[कुम्भकर्ण]], [[मेघनाद]], तुम्हें अथवा मुझे ही आगे आना पड़ेगा। अतः आज युद्ध का नेतृत्व तुम करो। तुम युद्ध कला विशारद हो। ये वानर चंचल और वीर तो हैं, परन्तु प्रशिक्षित नहीं हैं। तुम युद्ध नीति से उन पर विजय प्राप्त कर सकते हो। इसलिये हे वीर! तुम शीघ्र जाकर [[राम]]-[[लक्ष्मण]] सहित समस्त शत्रुओं का संहार कर मुझे निश्‍चिंत करो।&amp;quot;&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://vramayan.blogspot.in/2010/03/11.html |title=प्रहस्त का वध, युद्धकाण्ड-11|accessmonthday= 08 जनवरी|accessyear=2014 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकम्पन की मृत्यु से रावण को भारी आघात पहुँचा था। रात्रि को वह शान्ति से विश्राम भी न कर सका। दूसरे दिन उसने मन्त्रियों को बुलाकर कहा, &amp;quot;वानरों की सेना हमारी कल्पना से भी अधिक शक्तिशाली और पराक्रमी सिद्ध हुई है। पिछले चार दिनों में हमारी बहुत सी सेना मारी जा चुकी है। सैनिकों का मनोबल टूटने लगा है। नागरिकों को शत्रु के घेरे के कारण बाहर से उपलब्ध होने वाली खाद्य सामग्री प्राप्त नहीं हो रही है। वे अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। चार दिन के युद्ध को देखकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि शत्रु पर विजय प्राप्त करना साधारण राक्षसों के लिये सम्भव नहीं है। इसलिये हे वीर प्रहस्त! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि शत्रु को परास्त करने के लिये [[कुम्भकर्ण]], [[मेघनाद]], तुम्हें अथवा मुझे ही आगे आना पड़ेगा। अतः आज युद्ध का नेतृत्व तुम करो। तुम युद्ध कला विशारद हो। ये वानर चंचल और वीर तो हैं, परन्तु प्रशिक्षित नहीं हैं। तुम युद्ध नीति से उन पर विजय प्राप्त कर सकते हो। इसलिये हे वीर! तुम शीघ्र जाकर [[राम]]-[[लक्ष्मण]] सहित समस्त शत्रुओं का संहार कर मुझे निश्‍चिंत करो।&amp;quot;&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://vramayan.blogspot.in/2010/03/11.html |title=प्रहस्त का वध, युद्धकाण्ड-11|accessmonthday= 08 जनवरी|accessyear=2014 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>गोविन्द राम</name></author>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''प्रहस्त''' लंका के राजा रावण का मंत्री और वीर...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2014-01-08T11:57:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;प्रहस्त&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%B2%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%BE&quot; title=&quot;लंका&quot;&gt;लंका&lt;/a&gt; के &lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A3&quot; title=&quot;रावण&quot;&gt;राजा रावण&lt;/a&gt; का मंत्री और वीर...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''प्रहस्त''' [[लंका]] के [[रावण|राजा रावण]] का मंत्री और वीर सेनापति था। युद्ध में अकम्पन की मृत्यु हो जाने के बाद रावण ने अपने वीर सेनापति प्रहस्त को युद्ध के लिए भेजा था। प्रहस्त ने [[राम]] की वानर सेना के साथ बड़ा ही भयंकर युद्ध किया। उसकी [[राक्षस]] सेना ने एक बार के लिए वानरों को भी भयभीत कर दिया। इस समय असंख्य वानर वीर वीरगति को प्राप्त हुए। वानर सेनापति [[नील]] और प्रहस्त का युद्ध भी बहुत भयंकर था। नील ने एक बड़ी सी शिला उठाकर प्रहस्त के सिर पर दे मारी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==रावण का आदेश==&lt;br /&gt;
अकम्पन की मृत्यु से रावण को भारी आघात पहुँचा था। रात्रि को वह शान्ति से विश्राम भी न कर सका। दूसरे दिन उसने मन्त्रियों को बुलाकर कहा, &amp;quot;वानरों की सेना हमारी कल्पना से भी अधिक शक्तिशाली और पराक्रमी सिद्ध हुई है। पिछले चार दिनों में हमारी बहुत सी सेना मारी जा चुकी है। सैनिकों का मनोबल टूटने लगा है। नागरिकों को शत्रु के घेरे के कारण बाहर से उपलब्ध होने वाली खाद्य सामग्री प्राप्त नहीं हो रही है। वे अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। चार दिन के युद्ध को देखकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि शत्रु पर विजय प्राप्त करना साधारण राक्षसों के लिये सम्भव नहीं है। इसलिये हे वीर प्रहस्त! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि शत्रु को परास्त करने के लिये [[कुम्भकर्ण]], [[मेघनाद]], तुम्हें अथवा मुझे ही आगे आना पड़ेगा। अतः आज युद्ध का नेतृत्व तुम करो। तुम युद्ध कला विशारद हो। ये वानर चंचल और वीर तो हैं, परन्तु प्रशिक्षित नहीं हैं। तुम युद्ध नीति से उन पर विजय प्राप्त कर सकते हो। इसलिये हे वीर! तुम शीघ्र जाकर [[राम]]-[[लक्ष्मण]] सहित समस्त शत्रुओं का संहार कर मुझे निश्‍चिंत करो।&amp;quot;&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://vramayan.blogspot.in/2010/03/11.html |title=प्रहस्त का वध, युद्धकाण्ड-11|accessmonthday= 08 जनवरी|accessyear=2014 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====युद्ध के लिए प्रस्थान====&lt;br /&gt;
स्वयं पर [[रावण]] का इतना विश्‍वास देखकर प्रहस्त ने कहा, &amp;quot;आज मैं अपने अतुल पराक्रम से शत्रु सेना का विनाश करके आप को निश्‍चिंत कर दूँगा। आज मेरे कृपाण के शौर्य से मैं रणचण्डी को प्रसन्न करके [[चील]], [[कौवा|कौवों]], [[गीदड़|गीदड़ों]] आदि को शत्रु का माँस खिलाकर तृप्त करूँगा।&amp;quot; इतना कहकर वह भयानक राक्षसों की सेना को लेकर युद्ध स्थल की ओर चल दिया। प्रहस्त को दल-बल के साथ आते देख [[श्रीराम]] ने [[विभीषण]] से पूछा- &amp;quot;यह विशाल देह वाला सेनापति कौन है?&amp;quot; विभीषण ने उत्तर दिया- &amp;quot;हे रघुकुलतिलक! यह रावण का मन्त्री और वीर सेनापति प्रहस्त है। [[लंका]] की सेना का तीसरा भाग इसके अधिकार में है। यह बड़ा बलवान, पराक्रमी तथा युद्धकला विशारद है।&amp;quot; यह सुनकर श्रीराम ने [[सुग्रीव]] से कहा- &amp;quot;हे वानराधिपति! ऐसा प्रतीत होता है कि रावण को इस पर बहुत विश्‍वास है। तुम इसे मारकर रावण का विश्‍वास भंग करो। इसके मरने पर रावण का मनोबल गिर जायेगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
==रणकौशल==&lt;br /&gt;
वानरराज सुग्रीव ने श्रेष्ठ वानर सेनापतियों को यथोचित आज्ञा दी, जो बड़े वेग से राक्षसों पर टूट पड़े। [[राक्षस]] भी तोमर, [[त्रिशूल अस्त्र|त्रिशूल]], [[गदा शस्त्र|गदा]] आदि से वानर सेना पर आक्रमण करने लगे। प्रहस्त ने स्वयं और उसके सेनानायकों ने अपने अप्रतिम रणकौशल से भयंकर दृश्य उपस्थित कर दिया और सहस्त्रों वानरों का सफाया करके रणभूमि को शवागार बना दिया। यह देखकर अनेक महारथी वानर अपनी पूरी शक्ति से राक्षसों से जूझने लगे। उन्होंने भी भयानक प्रतिशोध लेकर सहस्त्रों राक्षसों को सदा के लिये समरभूमि में सुला दिया। एक ओर राक्षसों की तलवार से कट-कट कर सैकड़ों वानर भूमि पर धराशायी हो रहे थे, तो दूसरी ओर वानरों के घूँसों और थप्पड़ों की मार से सहस्त्रों राक्षस [[रक्त]] की उल्टियाँ कर रहे थे। कभी वीरों की गर्जना से भूमि काँप उठती और कभी आहतों के चीत्कार से [[आकाश]] थर्रा उठता।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==वीरगति==&lt;br /&gt;
वानर वीर द्विविद ने महावीर नरात्तक के हाथों अपने सैनिकों की दुर्गति होती देखी तो एक भारी शिला का वार करके उसका प्राणान्त कर दिया। द्विविद के इस शौर्य से उत्साहित होकर दुर्मुख ने प्रहस्त के प्रमुख सेनापति समुन्नत को मार गिराया। उधर [[जांबवान]] ने एक भारी शिला से प्रहार करके महानाद का अन्त कर दिया। फिर तारा नामक वानर ने अपने नाखूनों से कम्भानु का पेट चीरकर उसे [[यमलोक]] भेज दिया। कुछ ही क्षणों में इन चार सेनानायकों को मरते देखकर प्रहस्त ने क्रोध करके चारों दिशाओं में [[बाण अस्त्र|बाण]] छोड़ने आरम्भ कर दिये। इस आकस्मिक आक्रमण से अत्यधिक क्रुद्ध होकर वानर सेना अपने प्राणों का मोह छोड़कर शत्रुओं पर पिल पड़ी। उधर सेनापति [[नील]] [[पर्वत]] की एक शिला उठाकर प्रहस्त को मारने के लिये दौड़ा। मार्ग में ही प्रहस्त ने अपने बाणों से उस शिला की धज्जियाँ उड़ा दीं। इस पर नील ने एक दूसरी शिला उठाकर उसके रथ पर दे मारी, जिससे उसका रथ टूट गया और घोड़े मर गये। रथ के टूटते ही प्रहस्त हाथ में मूसल लेकर नील को मारने के लिये दौड़ा। दोनों परस्पर भिड़ गये। अवसर पाकर प्रहस्त ने मूसल नील के सिर पर दे मारा, जिससे उसका सिर फट गया और [[रक्त]] बहने लगा। इससे नील को और भी क्रोध आ गया। उसने फुर्ती से एक शिला उठाकर प्रहस्त के सिर पर पूरे वेग से दे मारी, जिससे उसका सिर चूर-चूर हो गया और वह मर गया। प्रहस्त के मरते ही उसकी सेना ने पलायन कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{रामायण}}{{पौराणिक चरित्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]][[Category:पौराणिक चरित्र]][[Category:पौराणिक कोश]][[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
	</entry>
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