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	<title>नरसिंह नृत्य - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot; नही &quot; to &quot; नहीं &quot;</title>
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		<updated>2013-09-02T12:48:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot; नही &amp;quot; to &amp;quot; नहीं &amp;quot;&lt;/p&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''नरसिंह नृत्य''' ब्रज (मथुरा, उत्तर प्रदेश) के प्र...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;नरसिंह नृत्य&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9C&quot; title=&quot;ब्रज&quot;&gt;ब्रज&lt;/a&gt; (&lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%AE%E0%A4%A5%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE&quot; title=&quot;मथुरा&quot;&gt;मथुरा&lt;/a&gt;, &lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6&quot; title=&quot;उत्तर प्रदेश&quot;&gt;उत्तर प्रदेश&lt;/a&gt;) के प्र...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''नरसिंह नृत्य''' [[ब्रज]] ([[मथुरा]], [[उत्तर प्रदेश]]) के प्रसिद्ध [[लोक नृत्य|लोक नृत्यों]] में से एक है। इस [[नृत्य]] में मुख्य रूप से नरसिंह लीला प्रस्तुत की जाती है। यह लीला 'नरसिंह चतुर्दशी' की रात को मथुरा और [[वृन्दावन]] के कई मुहल्ले में आयोजित होती है। नरसिंह लीला [[नृत्य]] प्रधान होती है, जिसमें कोई नाटक या संवाद नहीं होता। नरसिंह नृत्य दक्षिण के [[कथकली नृत्य]] से बहुत समानता रखता है।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==आयोजन स्थल==&lt;br /&gt;
ब्रज के जिन मुहल्लों में यह नरसिंह लीला होती हैं, वहाँ की गली का ही मंच के रूप में उपयोग किया जाता है। गली के दो छोरों पर दो तख्त डाल दिए जाते हैं और पहले तख्त से दूसरे तख्त तक लगभग डेढ़ फलांग की लम्बाई में सज्जित पात्र नृत्य करते हुए चक्कर लगाते हैं। नृत्य करने वाले पात्रों की संगत एक सामूहिक वाद्यवृंद द्वारा की जाती है, जो नर्तक के साथ ही [[वाद्य यंत्र|वाद्य]] बजाते हुए उसके पीछे चलते हैं। इस नृत्य में कई जोड़ी बड़े [[झांझ]] समान स्वर में बजाए जाते हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij708.htm |title=नरसिंह नृत्य |accessmonthday=10 अक्टूबर|accessyear=2012|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====लीला====&lt;br /&gt;
नरसिंह नृत्य में [[लवणासुर]], [[शत्रुघ्न]], [[हिरण्याक्ष]], [[वराह अवतार|वराह]], [[ब्रह्मा]], [[महादेव]] आदि [[देवता]] क्रमश: आकर गली में एक छोर से दूसरे छोर तक एक-एक करके नृत्य करते हैं और चले जाते हैं। यह क्रम थोड़े-थोड़े विराम से पूरी रात्रि चलता है। प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व लंबे-लंबे केशपाशों को बिखेरे हुए भारी मुखौटा लगाए [[ताड़का|ताड़का]] का पात्र नृत्य करता है। बाद में [[पीला रंग|पीले]] वस्त्रों में माला लिए बालक [[प्रह्लाद]] अपने सखाओं के साथ आकर नृत्य करता है। इसके उपरांत सूर्योदय हो जाने पर रात्रि आठ बजे के लगभग तख्त पर [[काग़ज़]] का बना एक विशालकाय पोला खंभ खड़ा कर दिया जाता है, जिस पर [[हिरण्यकशिपु]] तलवार चलाता है। ऐसा करते ही उसे फाड़कर उसमें से नरसिंह भगवान भयंकर मुद्रा में नृत्य करते हुए प्रकट होते हैं। यह नरसिंह वेशभूषा और अपनी नृत्य मुद्राओं से [[रौद्र रस]] को सकार करते हुए अपनी फेरी पूरी करते हैं। नृत्य समाप्त करने के उपरान्त नरसिंह हिरण्यकशिपु को पकड़कर उसे अपनी जांघो पर लिटाते हैं और इसके उपरांत उनकी आरती होती है। प्रह्लाद उनकी गोद में बैठता है और यह लीला समाप्त हो जाती है।&lt;br /&gt;
==प्राचीनता==&lt;br /&gt;
यह लीला [[मथुरा]], [[वृंदावन]] में कब से होती आ रही है, इस विषय में कुछ कहा नही जा सकता। परन्तु यह परम्परा बहुत प्राचीन है। [[पुराण|पुराणों]] में ब्रज प्रदेश को 'वराह मंडल' कहा गया है। अत: वराह और हिरण्याक्ष का [[नृत्य]] स्वयं इस लीला की प्राचीनता का द्योतक है। [[इतिहास]] से ज्ञात होता है कि मथुरा नगरी '[[मधु दैत्य|मधु]]' नामक दैत्य द्वारा बसाई गई थी और उसके अत्याचारी पुत्र 'लवण' को भगवान [[श्रीराम]] के छोटे भाई शत्रुघ्न ने मारकर इस नगर को पुन: स्थापित किया था और यहाँ अपनी राजधानी बनाई थी। ऐसी दशा में जब नरसिंह लीला में 'लवण' और शत्रुघ्न एक दूसरे के बाद नृत्य करते है, तब इस लीला की प्राचीनता स्वयं ही सिद्ध हो जाती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
====कथकली से समानता====&lt;br /&gt;
नरसिंह नृत्य दक्षिण की [[कथकली नृत्य]] शैली से बहुत साम्य रखता है। नृत्य की गति, पग-संचालन तथा नृत्य के साथ बजने वाले बड़े-बड़े झांझों का तुमुल घोष जहाँ कथकली से साम्य रखता है, वहीं भगवान नरसिंह का मुखौटा कथकली के मुखौटों से भी कहीं अधिक विशाल और भयंकर होता है। इस मुखौटे को धारण करने के लिए पात्र के मुख पर पहले चारों ओर कपड़ों के कई थान लपेटे जाते हैं, जब वह इसे धारण कर पाता है। यह इतना भारी होता है कि नृत्य करते हुए नरसिंह को साधने के लिए दो व्यक्ति उनकी कमर के इधर-उधर झुकते हुए उन्हें साधकर नृत्य कराते हैं तथा कुछ व्यक्ति हाथ में पंखे लिए मुखमंडल पर वायु का संचार करते रहते हैं।&lt;br /&gt;
==मुखौटे का पूजन==&lt;br /&gt;
नरसिंह लीला एक धार्मिक अनुष्ठान के रस में होती है। नरसिंह का मुखौटा, जिसे नरसिंह लीला में धारण कराया जाता है, मुहल्ले के किसी मन्दिर या पवित्र स्थान पर पूरे वर्ष विराजित रहता है और उसकी मूर्ति के समान ही [[पूजा]] होती है भोग आदि भी लगाया जाता है। नरसिंह लीला से पहले इस मुखौटे का विशेष रूप से पूजन होता है और हलुआ का प्रसाद पूरे मुहल्ले में बाँटा जाता है, जिससे सभी को नरसिंह लीला के आयोजन की सूचना भी मिल जाती है और व्यापक रूप से लीला की तैयारी होने लग जाती है। इस प्रकार नरसिंह नृत्य अपने आप में एक विशिष्ट परम्परा संजोए हुए है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{नृत्य कला}}&lt;br /&gt;
[[Category:लोक नृत्य]][[Category:ब्रज]][[Category:नृत्य कला]][[Category:संस्कृति कोश]][[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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