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	<title>टिकुली कला - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-06-21T15:28:49Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: 'टिकुली कला '''टिकुली कला''' (अंग्रे...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<updated>2021-03-01T12:20:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Tikuli-Art.jpg&quot; title=&quot;चित्र:Tikuli-Art.jpg&quot;&gt;thumb|250px|टिकुली कला&lt;/a&gt; &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;टिकुली कला&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (अंग्रे...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Tikuli-Art.jpg|thumb|250px|टिकुली कला]]&lt;br /&gt;
'''टिकुली कला''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Tikuli Art'') [[बिहार]] की बेहतरीन शिल्प-कलाओं में से एक है। इसका अपना एक समृद्ध और पारंपरिक [[इतिहास]] है। ‘टिकुली’ शब्द ‘बिन्दी’ का स्थानीय शब्द है। कहा जाता है कि बिहार में टिकुली कला करीब 800 वर्ष पूर्व [[पटना]] में शुरू हुई थी। ये खूबसूरती से तैयार किए गए चित्र होते थे। पटना उसके निर्माण एवं विक्रय का समृद्ध केंद्र था। [[मध्य काल]] में मुग़लों ने इस कला में खास दिलचस्पी दिखायी और उसे राजकीय संरक्षण दिया, जिससे उसके प्रचार-प्रसार में काफी सहायता मिली।&lt;br /&gt;
==दुर्लभ कला==&lt;br /&gt;
बिहार की इस दुर्लभ कला को साकार करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल थी और उसे बनाने के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती थी। लेकिन, बिहार की इस पारंपरिक कला को [[मुग़ल साम्राज्य]] के पतन और अंग्रेजों के आगमन से गंभीर झटका लगा। अंग्रेजी शासन के दौर में टिकुली सहित कई स्वदेशी कलात्मक वस्तुएं मशीनों द्वारा निर्मित होने लगीं, जिससे हजारों पारंपरिक कलाकार बेरोजगार हुए। मशीन निर्मित टिकुली के बीच असली टिकुली कला कहीं खो गई।&amp;lt;ref name=&amp;quot;pp&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.folkartopedia.com/present-form-of-tikuli-art-traditional-or-accidental-hindi-sk/ |title=टिकुली कला का वर्तमान स्वरूप: परंपरा या आधुनिक घटना?|accessmonthday=01 मार्च|accessyear=2020 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= folkartopedia.com|language=हिंदी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पुनर्जीवन==&lt;br /&gt;
आजादी के बाद चित्राचार्य पद्मश्री उपेंद्र महारथी की कोशिशों से यह कला कुछ हद तक पुनर्जीवित हुई। [[जापान]] प्रवास के दौरान उन्हें हार्ड-बोर्ड पर टिकुली कला को पारंपरिक शैली में उतारने का खयाल आया, ताकि बाजार के साथ भी उसे जोड़ा जा सके। उन्होंने इसके निर्माण की एक प्रकिया विकसित की। प्रक्रिया यह थी कि मासोंनाइट बोर्ड पर इनेमल पेंट की एक-के-बाद एक 12 परतें चढ़ायी जाये और सूखने पर उसे काठ (लकड़ी) कोयले से घिसकर कांच समान चमकीला बना उस पर चित्रकांन किया जाये। चित्र किस तरह के बनाये जाएं, इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं लिखा।   &lt;br /&gt;
==प्रामाणिक शैली==&lt;br /&gt;
टिकुली शिल्प या कला का मौजूदा चलन करीब चार दशक पुरानी घटना है। [[1982]] में एशियाड गेम्स के प्रतियोगियों और अतिथितियों को सम्मानित करने हेतु उन्हें एक-एक चित्र दिया जाना था। तब पूर्व लिखित प्रक्रिया के तहत तैयार मार्सोनाईट बोर्ड पर [[मधुबनी चित्रकला|मधुबनी पेंटिंग]] की प्रथम पद्मश्री जगदंबा देवी की चित्र-शैली में चित्र उकेर गया और उन चित्रों से उपहार स्वरूप देकर खिलाड़ियों और अतिथियों को सम्मानित किया गया। तब से जगदंबा देवी की चित्र शैली टिकुली कला की प्रामाणिक शैली मान ली गयी और अब वह बाजार का हिस्सा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके दो दुष्परिणाम हुए। पहला, पारंपरिक टिकली कला विलुप्त हो गयी और दूसरा, कला बाजार ने जगदम्बा देवी शैली के चित्रों को मिथिला चित्र मानने से ही इनकार कर दिया। टिकुली कला के नाम पर आज बिहार सरकार हर वर्ष लाखों रुपये खर्च कर रही है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि टिकुली कला पर गंभीर शोध हो, ताकि न केवल वह कला पुनर्जीवित हो सके, बल्कि मिथिला कला में जगदंबा देवी शैली को भी जीवनदान मिल सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{चित्रकला शैलियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार]][[Category:कला कोश]][[Category:चित्रकला]][[Category:बिहार की संस्कृति]][[Category:हस्तशिल्प उद्योग]][[Category:हस्तशिल्प कला]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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