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	<title>ऋग्वेद और दास - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;पृथक &quot; to &quot;पृथक् &quot;</title>
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VIII. 60; देखें, दीघ निकाय, अगञ्ञसुत्त, ‘वर्णाश्रमव्यवस्थाश्च न तदासन्नसंकर: न लिप्सन्ति हि तेऽन्योन्यन्नानुगृहणन्ति चैव हि’।&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु अति प्राचीन काल में भी सैनिकों, नेताओं और पुरोहितों के मंथर उदभव के साथ-साथ खेतिहर किसान और हस्तकलाओं का व्यवसाय करने वाले कारीगर या शिल्पी जैसे वर्गों का भी उदभव हुआ। बुनकर (जुलाहे), चर्मकार, बढ़ई और चित्रकार के लिए एक ही ढंग के शब्दों का प्रयोग उनके भारोपीय उदभव का संकेत देता है।&amp;lt;ref&amp;gt;कार्ल डार्लिंग : ‘ए डिक्शनरी ऑफ़ सिलेक्टेड सिनोनिम्स इन द प्रिंसिपल इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज’, चर्म (चर्मन् के लिए देखें पृष्ठ 40, बुनाई के लिए पृष्ठ 408, तक्षन् के लिए पृष्ठ 589-90 और वेणीकार के लिए पृष्ठ 621-22; चाइंल्ड : द एरियंस, पृष्ठ 86.)&amp;lt;/ref&amp;gt; रथ के लिए एक भारोपीय शब्द के व्यापक प्रयोग से पता चलता है कि भारोपीय लोग रथ का निर्माण करना जानते रहे होंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;चाइल्ड : द एरियंस, पृष्ठ 86 और 92.&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु ऋग्वेद में जहाँ पहले के अनेकानेक परिच्छेदों में बढ़ई के कार्य की चर्चा हुई है, वहीं रथकार शब्द का प्रयोग नहीं दिखाई पड़ता।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, IV. 35.6, 36.5; VI. 32.1.&amp;lt;/ref&amp;gt; अथर्ववेद से संकेत मिलता है कि रथनिर्माता (रथकार) और धातुकर्म करने वाले (कर्मार) को समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इसी ग्रन्थ के आरम्भिक भाग में नवनिर्वाचित राजा पर्णमणि (पादपीयताबीज) से प्रार्थना करता है कि वह आसपास रहने वाले कुशल रथ निर्माताओं और धातुकर्म करने वालों के बीच उसकी स्थिति सुदृढ़ करने में सहायक हों। प्रार्थना का उद्देश्य शिल्पियों को राजा का सहायक बनाना है&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद, III 5.6; ‘ये धीवानो रथकारा: कर्मारा ये मनीषिण: उपस्तीन्पर्ण मह्यं त्वम् सर्वानकृण्वभितो जनान्’। यहाँ ब्लूमफ़ील्ड के अनुवाद का अनुसरण किया गया है। व्हिटने ने ब्लूमफ़ील्ड जैसा ही अनुवाद प्रस्तुत किया है, किन्तु उन्होंने सायण के विचारानुसार उपस्तिन् को प्रजा के अर्थ में लिया है। सायण धीवान: और मनीषिण: को अलग-अलग संज्ञा मानते हैं, जिनका अर्थ मछुआ और बुद्धिजीवी किया गया है। पैप्प. ग्रन्थ में थोड़ा सा पाठभेद है, ‘ये तक्षाणो रथकारा: कर्मारा ये मनीषिण:, सर्वांस तान्पर्ण रंघयोपस्तिं कृणु मेदिनम्’। III. 13.7.&amp;lt;/ref&amp;gt; और इस दृष्टि से वे राजाओं, राजविधाताओं, सूतों और दलपतियों (ग्रामणी) के समकक्ष मालूम पड़ते हैं, &amp;lt;ref&amp;gt;‘वेदिक इंडेक्स’, I. पृष्ठ 247; सम्भवत: वह असैनिक और सैनिक, दोनों प्रकार के कार्यों के लिए गाँव का प्रधान था।&amp;lt;/ref&amp;gt; जो सब राजा के आसपास रहते हैं और जो राजा के सहायक माने जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अथर्ववेद, III. 5.7.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सारांश यह कि ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में वर्णित समाज में गहरे वर्गभेद का अभाव था, जैसा सामान्यतया प्रारम्भिक आदिम समाजों में देखने को मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;लैंटमैन : ‘द ओरिजिन्स ऑफ़ सोशल इनइक्वेलिटीज़ ऑफ़ द सोशल क्लासेज’,, पृष्ठ 5-12 में दिए गए उदाहरण। उन्होंने पूर्व भारत के नागाओं और कूकियों में वर्गभेद के अभाव का भी उल्लेख किया है (पृष्ठ 11)।&amp;lt;/ref&amp;gt; प्राय: पुराणों में वर्णव्यवस्था की उत्पत्ति के विषय में जो अनुमान किये गए हैं, वे उस स्थिति का ही उल्लेख करते हैं। इन अनुमानों के अनुसार त्रेता युग का आरम्भ होने तक न तो कोई वर्णव्यवस्था थी, न कोई व्यक्ति लालची था और न ही लोगों में दूसरे की वस्तु चुरा लेने की प्रवृत्ति थी।&amp;lt;ref&amp;gt;वायु पुराण, I. 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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;उत्तरार्द्ध&quot; to &quot;उत्तरार्ध&quot;</title>
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'किं ते कृण्वंति की कटेषु गावो नाशीरं दुर्हे न तपन्ति धर्मम्', जाति और भाषा की दृष्टि से दहे ईरानियों के बहुत निकट रहे होंगे, किन्तु यह बहुत स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं हो पाया है; वही, त्सिम्मर ने हेरोडोट्स के दआई या दाअई, i. 126 को तूरानियन जनजाति का बताया है।&amp;lt;/ref&amp;gt; से उनको अभिन्न दिखाया गया है। इन सब तथ्यों से दासों और दस्युओं का अन्तर स्पष्ट है : दस्युओं और वैदिक आर्यों में समानता की बात बहुत ही कम आती है।&amp;lt;ref&amp;gt;शेफर : ‘एथनोग्राफ़ी इन एनशिएंट इण्डिया’, पृष्ठ 32, कहा गया है कि सामाजिक स्तर पर दास और आर्य का स्थान दस्यु भीलों से ऊपर था।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके विपरीत, दास सम्भवत: उन मिश्रित भारतीय आर्यों के अग्रिम दस्ते थे, जो उसी समय भारत आए, जब केसाइट बेबीलोनिया पहुँचे थे (1750 ई. पू.)। पुरातात्विकों का अनुमान है कि उत्तर फ़ारस से भारत की ओर लोगों का प्रस्थान या तो निरन्तर होता रहा अथवा उनका आगमन मुख्यत: दो बार हुआ था, जिनमें पहला आगमन 2000 ई. पू. के तुरन्त बाद हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;स्टुअर्ट पिगाट : एंटिक्विटी, जिल्द XXIV, सं. 96, 218 लाल : एनशिएंट इण्डिया, दिल्ली, सं. 9, पृष्ठ 90-91. लाल का कथन है कि दूसरी सहस्राब्दी ई. पू. के पूर्वार्द्ध में शाही टुंप (आधनिक बलूचिस्तान) में और दूसरी सहस्राब्दी ई. पू. के &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;उत्तरार्द्ध &lt;/del&gt;में फ़ोर्ट मुनरो (अफ़ग़ानिस्तान) में लोग झुंड के झुंड आए।&amp;lt;/ref&amp;gt; शायद इसी कारण से आर्यों ने दासों के प्रति मेल-मिलाप की नीति अपनाई और दिवोदास, बलबुथ एवं एवं तरुक्ष जैसे उनके सरदार आर्यों के दल में आसानी से आत्मसात किए जा सके। अंतर्जातीय संघर्षों में अधिकतर आर्यों के सहायक के रूप में दासों के उल्लेख का भी यही कारण है। इससे लगता है कि ग़ुलाम के अर्थ में दास शब्द का प्रयोग भारत के आर्येतर निवासियों के बीच नहीं, बल्कि भारतीय आर्यों से सम्बद्ध लोगों के बीच प्रचलित था। ऋग्वेद के उत्तरवर्ती काल में दास शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में होने लगा था, जिससे न केवल मूल भारोपीय दासों के वंशजों, बल्कि दस्यु और राक्षस जैसे आर्य पूर्व लोगों और आर्य समुदाय के उन सदस्यों का भी बोध होता होगा, जो अपने आन्तरिक संघर्षों के कारण अकिंचनता या ग़ुलामी की स्थिति में पहुँच गए थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;दास कौन थे? साधारणत: दासों और दस्युओं को एक मान लिया जाता है। किन्तु दस्युहत्या शब्द के प्रयोग तो हैं, पर दासहत्या शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। आर्यों के अंतर्जातीय युद्धों में दासों को सहायक सेना के रूप में दिखाया गया है। अपव्रत, अन्यव्रत आदि के रूप में उनका वर्णन नहीं किया गया है। तीन स्थलों पर ‘दासों विशों’ का उल्लेख किया गया है; &amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, II. 11.4, IV. 28.4 और VI. 25.2; दत्त : ‘स्टडीज़ इन हिन्दू सोशल पालिटी’, पृष्ठ 334, बी.एन. दत्त का विचार है कि ऋग्वेद VI. 25.2 में दासविश् का जो उल्लेख हुआ है, उसका तात्पर्य यह है कि दास को वैश्य कोटि में रखा गया है। किन्तु चूँकि उस समय वैश्य समाज के एक वर्ग के रूप में नहीं थे, इसीलिए यहाँ विश् को एक जनजाति विशेष माना जा सकता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और सबसे बढ़कर तो यह कि एक सीथियन जनजाति - ईरानी दहे&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, VI, I, 357, ऋग्वेद, III. 53.14. 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इस सम्बन्ध में महाभारत की एक अनुश्रुति महत्त्वपूर्ण है : ‘ब्रह्मा ने वेद के प्रतीकस्वरूप सरस्वती का निर्माण पहले चारों वर्णों के लिए किया, किन्तु शूद्र धनलिप्सा में पड़कर आज्ञानांधकार में डूब गए और वेद के प्रति उनका अधिकार जाता रहा।’ &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, शान्ति पर्व, 181.15, ‘वर्णश्चत्वार : एते हि येषां ब्राह्मी सरस्वती, विहिता ब्रह्मणा पूर्वा लोभात्वज्ञानतां गत:’।&amp;lt;/ref&amp;gt; वेबर की दृष्टि में इस कंडिका से यह ध्वनित होता है कि प्राचीन युग में शूद्र आर्यों की भाषा बोलते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;वेबर, इंडिश स्टुडियेन, II, 94 पाद टिप्पणी&amp;lt;/ref&amp;gt; सम्भव है कि कुछ स्वस्थानिक जनजातियों ने अपनी बोली के बदले आर्यों की बोली अपना ली हो, जैसे आधुनिक युग में बिहार की कई जनजातियों ने अपनी भाषा को छोड़कर कुर्माली और सदाना जैसी आर्य बोलियाँ अपना ली हैं। किन्तु उन्होंने जिन लोगों की भाषा अपनाई, उनकी अपेक्षा इन आदिवासियों की संख्या अवश्य ही कम रही होगी। आधुनिक युग में भी, जबकि आर्यभाषा बोलने वालों को अपनी भाषा और संस्कृति का प्रसार करने के लिए अधिक सुविधाएँ प्राप्त हैं, वे आर्येतर भाषाओं को मिटा नहीं पाए हैं। इन आर्येतर भाषाओं में कुछ तो अपनी सशक्त वर्णनशीलता सिद्ध कर चुकी हैं।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; 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इस सम्बन्ध में महाभारत की एक अनुश्रुति महत्त्वपूर्ण है : ‘ब्रह्मा ने वेद के प्रतीकस्वरूप सरस्वती का निर्माण पहले चारों वर्णों के लिए किया, किन्तु शूद्र धनलिप्सा में पड़कर आज्ञानांधकार में डूब गए और वेद के प्रति उनका अधिकार जाता रहा।’ &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, शान्ति पर्व, 181.15, ‘वर्णश्चत्वार : एते हि येषां ब्राह्मी सरस्वती, विहिता ब्रह्मणा पूर्वा लोभात्वज्ञानतां गत:’।&amp;lt;/ref&amp;gt; वेबर की दृष्टि में इस कंडिका से यह ध्वनित होता है कि प्राचीन युग में शूद्र आर्यों की भाषा बोलते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;वेबर, इंडिश स्टुडियेन, II, 94 पाद टिप्पणी&amp;lt;/ref&amp;gt; सम्भव है कि कुछ स्वस्थानिक जनजातियों ने अपनी बोली के बदले आर्यों की बोली अपना ली हो, जैसे आधुनिक युग में बिहार की कई जनजातियों ने अपनी भाषा को छोड़कर कुर्माली और सदाना जैसी आर्य बोलियाँ अपना ली हैं। किन्तु उन्होंने जिन लोगों की भाषा अपनाई, उनकी अपेक्षा इन आदिवासियों की संख्या अवश्य ही कम रही होगी। आधुनिक युग में भी, जबकि आर्यभाषा बोलने वालों को अपनी भाषा और संस्कृति का प्रसार करने के लिए अधिक सुविधाएँ प्राप्त हैं, वे आर्येतर भाषाओं को मिटा नहीं पाए हैं। इन आर्येतर भाषाओं में कुछ तो अपनी सशक्त वर्णनशीलता सिद्ध कर चुकी हैं।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;गुलाम&quot; to &quot;ग़ुलाम&quot;</title>
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		<updated>2015-04-06T14:03:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;गुलाम&amp;quot; to &amp;quot;ग़ुलाम&amp;quot;&lt;/p&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>गोविन्द राम 27 मार्च 2015 को 14:12 बजे</title>
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इतना ही नहीं वेदों और महाकाव्यों की परम्परा से पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं, जिनसे पता चलता है कि इन्द्र ब्राह्मणघाती थे और उनका मुख्य दुश्मन ‘वृत्र’ ब्राह्मण था।&amp;lt;ref&amp;gt;डब्ल्यू, रयूबेन : ‘इन्द्राज़ फाइट अगेन्स्ट वृत्र इन द महाभारत’ (एस. के. बेल्वल्कर कमेमोरेशन वॉल्यूम, पृष्ठ 116-8), धर्मानंद कोसंबी, ‘भगवान बुद्ध’, पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt; इससे यह परिकल्पना पुष्ट होती है कि विकसित पुरोहित प्रथा आर्यों के पहले की प्रथा थी, जिससे निष्कर्ष निकल सकता है कि जो लोग पराजित हुए वे सभी दास या शूद्र नहीं बना लिए गए। अतएव, यद्यपि ब्राह्मणवाद भारोपीय संस्था था, फिर भी आर्य विजेताओं के पुरोहित वर्ग में अधिकांश विजित जाति के लोग लिये गए होंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी, बम्बई, न्यू सीरीज, XXII. 35)&amp;lt;/ref&amp;gt; उनका अनुपात क्या रहा होगा, यह बताने के लिए कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यपूर्व पुरोहितों को इस नए समाज में स्थान मिला था। यह सोचना ग़लत होगा कि सभी काले लोगों को शूद्र बना लिया गया था, क्योंकि ऐसे प्रसंग आए हैं, जिनमें काले ऋषियों की भी चर्चा है। ऋग्वेद में ‘अश्विनी’ के सम्बन्ध में जो वर्णन किया गया है, उसके अनुसार उन्होंने काले वर्ण के (श्यावाय) कण्व को गौरवर्ण की स्त्रियाँ प्रदान की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद I. 117-8. किन्तु सायण ‘श्यावाय’ को ‘कुष्ठरोगेण श्यामवर्णाय’ बताते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; सम्भवत: कण्व को कृष्ण भी कहा गया है&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, VIII. 85.3-4. ऋग्वेद, VIII. 50.10 में भी कण्व का उल्लेख है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और वे इन युग्म देवों को सम्बोधित सूक्तों (ऋग्वेद के मंडल आठ, सूक्त पचासी और छियासी) के द्रष्टा हैं। शायद कण्व को ही पुन: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कृष्ण ऋषि के रूप में चित्रित किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 116-23; ऋग्वेद I. 117.7 । पार्जिटर मानते हैं कि काण्वायन ही वास्तविक ब्राह्मण हैं : डायनेस्टीज़ ऑफ़ द कलि एज, पृष्ठ 35.&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार ऋग्वेद की एक ऋचा में गायक के रूप में वर्णित ‘दीर्घतमस’ काले रंग का रहा होगा, अगर यह नाम उसे काले वर्ण के कारण मिला हो।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 158.6. अंबेडकर : हू वेयर दि शूद्राज़?, पृष्ठ 77.&amp;lt;/ref&amp;gt; यह महत्त्वपूर्ण है कि ऋग्वेद के कई अनुच्छेदों में वह केवल मातृमूलक नाम ‘मामतेय’ से ही चर्चित है। बाद की एक अनुश्रुति यह भी है कि उसने उशिज से विवाह किया, जो एक दास की लड़की थी और उससे काक्षीवंत् उत्पन्न हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;‘वैदिक इंडेक्स’, I. 366.। शतपथ ब्राह्मण, XIV. 9.4.15 में एक ऐसी माँ का वर्णन आया है, जो काले रंग के बालक की आकांक्षा रखती है, जिसे वेद का ज्ञान हो।&amp;lt;/ref&amp;gt; पुन: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में ऋषि दिवोदास को, जिनके नाम से ध्वनित होता है कि वे दास वंश के थे, &amp;lt;ref&amp;gt;वैदिक इंडेक्स, I. 363., हिलब्रांट का सुझाव&amp;lt;/ref&amp;gt; नई ऋचाओं का रचयिता बताया गया है&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 130.10.&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा दसवें मंडल में उसके सूक्त बयालिस-चौवालिस के लेखक अंगिरस को कृष्ण कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ एशियाटिक सोसायटी, बम्बई न्यू सीरीज, XXVI. 44.)&amp;lt;/ref&amp;gt; चूँकि ऊपर बताए गए अधिकांश निर्देश ऋग्वेद के परवर्ती भागों में पड़ते हैं, इसीलिए यह स्पष्ट होगा कि ऋग्वैदिक काल के अन्तिम चरण में नवगठित आर्य समुदाय में कुछ काले ऋषियों और दास पुरोहितों का प्रवेश हो रहा था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;कहा गया है कि ब्राह्मणवाद आर्यों से पूर्व की संस्था है।&amp;lt;ref&amp;gt;पार्जिटर : ‘एनशिएंट इण्डियन हिस्टारिकल ट्रेडीशन’, पृष्ठ 306-8.&amp;lt;/ref&amp;gt; सारे पुरोहित वर्ग के विषय में यह कहना कठिन है। लैटिन फ्लामेन रोमन राजाओं द्वारा स्थापित एक प्रकार के पुरोहित पद का अभिधान है, जिसका समीकरण ब्राह्मण शब्द से किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ड्युमेजिल : ‘फ्लामेन ब्राह्मण’, अध्याय II. और III. एक अन्य निर्देश के लिए देखें, पाल थिमे; (साइटशिफ्ट डेर डोय्वेन मेर्गेनलैंडिशेनगेज़ेलशाफ्ट, बर्लिन, एन. एफ. 27 पृष्ठ 91-129)&amp;lt;/ref&amp;gt; इस समानता के अतिरिक्त वेदकालीन भारत के [[अथर्वन]] पुरोहित और ईरान के अथर्वन की सुपरिचित समानता है। किन्तु फिर भी एक प्रमुख आपत्ति का उत्तर देना शेष रह जाता है। कीथ का कहना है कि ऋग्वैदिक मान्यता और वैदिक देवताओं की अपेक्षाकृत बहुलता पुरोहितों के कठिन प्रयास और अपरिमित [[समन्वयवाद]] का परिणाम रही होगी।&amp;lt;ref&amp;gt;ई. जे. रैप्सन : द कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया, I. 103&amp;lt;/ref&amp;gt; इतना ही नहीं वेदों और महाकाव्यों की परम्परा से पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं, जिनसे पता चलता है कि इन्द्र ब्राह्मणघाती थे और उनका मुख्य दुश्मन ‘वृत्र’ ब्राह्मण था।&amp;lt;ref&amp;gt;डब्ल्यू, रयूबेन : ‘इन्द्राज़ फाइट अगेन्स्ट वृत्र इन द महाभारत’ (एस. के. बेल्वल्कर कमेमोरेशन वॉल्यूम, पृष्ठ 116-8), धर्मानंद कोसंबी, ‘भगवान बुद्ध’, पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt; इससे यह परिकल्पना पुष्ट होती है कि विकसित पुरोहित प्रथा आर्यों के पहले की प्रथा थी, जिससे निष्कर्ष निकल सकता है कि जो लोग पराजित हुए वे सभी दास या शूद्र नहीं बना लिए गए। अतएव, यद्यपि ब्राह्मणवाद भारोपीय संस्था था, फिर भी आर्य विजेताओं के पुरोहित वर्ग में अधिकांश विजित जाति के लोग लिये गए होंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी, बम्बई, न्यू सीरीज, XXII. 35)&amp;lt;/ref&amp;gt; उनका अनुपात क्या रहा होगा, यह बताने के लिए कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यपूर्व पुरोहितों को इस नए समाज में स्थान मिला था। यह सोचना ग़लत होगा कि सभी काले लोगों को शूद्र बना लिया गया था, क्योंकि ऐसे प्रसंग आए हैं, जिनमें काले ऋषियों की भी चर्चा है। ऋग्वेद में ‘अश्विनी’ के सम्बन्ध में जो वर्णन किया गया है, उसके अनुसार उन्होंने काले वर्ण के (श्यावाय) कण्व को गौरवर्ण की स्त्रियाँ प्रदान की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद I. 117-8. किन्तु सायण ‘श्यावाय’ को ‘कुष्ठरोगेण श्यामवर्णाय’ बताते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; सम्भवत: कण्व को कृष्ण भी कहा गया है&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, VIII. 85.3-4. ऋग्वेद, VIII. 50.10 में भी कण्व का उल्लेख है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और वे इन युग्म देवों को सम्बोधित सूक्तों (ऋग्वेद के मंडल आठ, सूक्त पचासी और छियासी) के द्रष्टा हैं। शायद कण्व को ही पुन: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कृष्ण ऋषि के रूप में चित्रित किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 116-23; ऋग्वेद I. 117.7 । पार्जिटर मानते हैं कि काण्वायन ही वास्तविक ब्राह्मण हैं : डायनेस्टीज़ ऑफ़ द कलि एज, पृष्ठ 35.&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार ऋग्वेद की एक ऋचा में गायक के रूप में वर्णित ‘दीर्घतमस’ काले रंग का रहा होगा, अगर यह नाम उसे काले वर्ण के कारण मिला हो।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 158.6. अंबेडकर : हू वेयर दि शूद्राज़?, पृष्ठ 77.&amp;lt;/ref&amp;gt; यह महत्त्वपूर्ण है कि ऋग्वेद के कई अनुच्छेदों में वह केवल मातृमूलक नाम ‘मामतेय’ से ही चर्चित है। बाद की एक अनुश्रुति यह भी है कि उसने उशिज से विवाह किया, जो एक दास की लड़की थी और उससे काक्षीवंत् उत्पन्न हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;‘वैदिक इंडेक्स’, I. 366.। शतपथ ब्राह्मण, XIV. 9.4.15 में एक ऐसी माँ का वर्णन आया है, जो काले रंग के बालक की आकांक्षा रखती है, जिसे वेद का ज्ञान हो।&amp;lt;/ref&amp;gt; पुन: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में ऋषि दिवोदास को, जिनके नाम से ध्वनित होता है कि वे दास वंश के थे, &amp;lt;ref&amp;gt;वैदिक इंडेक्स, I. 363., हिलब्रांट का सुझाव&amp;lt;/ref&amp;gt; नई ऋचाओं का रचयिता बताया गया है&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 130.10.&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा दसवें मंडल में उसके सूक्त बयालिस-चौवालिस के लेखक अंगिरस को कृष्ण कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ एशियाटिक सोसायटी, बम्बई न्यू सीरीज, XXVI. 44.)&amp;lt;/ref&amp;gt; चूँकि ऊपर बताए गए अधिकांश निर्देश ऋग्वेद के परवर्ती भागों में पड़ते हैं, इसीलिए यह स्पष्ट होगा कि ऋग्वैदिक काल के अन्तिम चरण में नवगठित आर्य समुदाय में कुछ काले ऋषियों और दास पुरोहितों का प्रवेश हो रहा था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>गोविन्द राम</name></author>
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		<title>गोविन्द राम 9 दिसम्बर 2014 को 08:54 बजे</title>
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इतना ही नहीं वेदों और महाकाव्यों की परम्परा से पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं, जिनसे पता चलता है कि इन्द्र ब्राह्मणघाती थे और उनका मुख्य दुश्मन ‘वृत्र’ ब्राह्मण था।&amp;lt;ref&amp;gt;डब्ल्यू, रयूबेन : ‘इन्द्राज़ फाइट अगेन्स्ट वृत्र इन द महाभारत’ (एस. के. बेल्वल्कर कमेमोरेशन वॉल्यूम, पृष्ठ 116-8), धर्मानंद कोसंबी, ‘भगवान बुद्ध’, पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt; इससे यह परिकल्पना पुष्ट होती है कि विकसित पुरोहित प्रथा आर्यों के पहले की प्रथा थी, जिससे निष्कर्ष निकल सकता है कि जो लोग पराजित हुए वे सभी दास या शूद्र नहीं बना लिए गए। अतएव, यद्यपि ब्राह्मणवाद भारोपीय संस्था था, फिर भी आर्य विजेताओं के पुरोहित वर्ग में अधिकांश विजित जाति के लोग लिये गए होंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी, बम्बई, न्यू सीरीज, XXII. 35)&amp;lt;/ref&amp;gt; उनका अनुपात क्या रहा होगा, यह बताने के लिए कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यपूर्व पुरोहितों को इस नए समाज में स्थान मिला था। यह सोचना ग़लत होगा कि सभी काले लोगों को शूद्र बना लिया गया था, क्योंकि ऐसे प्रसंग आए हैं, जिनमें काले ऋषियों की भी चर्चा है। ऋग्वेद में ‘अश्विनी’ के सम्बन्ध में जो वर्णन किया गया है, उसके अनुसार उन्होंने काले वर्ण के (श्यावाय) कण्व को गौरवर्ण की स्त्रियाँ प्रदान की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद I. 117-8. किन्तु सायण ‘श्यावाय’ को ‘कुष्ठरोगेण श्यामवर्णाय’ बताते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; सम्भवत: कण्व को कृष्ण भी कहा गया है&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, VIII. 85.3-4. ऋग्वेद, VIII. 50.10 में भी कण्व का उल्लेख है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और वे इन युग्म देवों को सम्बोधित सूक्तों (ऋग्वेद के मंडल आठ, सूक्त पचासी और छियासी) के द्रष्टा हैं। शायद कण्व को ही पुन: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कृष्ण ऋषि के रूप में चित्रित किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 116-23; ऋग्वेद I. 117.7 । पार्जिटर मानते हैं कि काण्वायन ही वास्तविक ब्राह्मण हैं : डायनेस्टीज़ ऑफ़ द कलि एज, पृष्ठ 35.&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी प्रकार ऋग्वेद की एक ऋचा में गायक के रूप में वर्णित ‘दीर्घतमस’ काले रंग का रहा होगा, अगर यह नाम उसे काले वर्ण के कारण मिला हो।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 158.6. अंबेडकर : हू वेयर दि शूद्राज़?, पृष्ठ 77.&amp;lt;/ref&amp;gt; यह महत्त्वपूर्ण है कि ऋग्वेद के कई अनुच्छेदों में वह केवल मातृमूलक नाम ‘मामतेय’ से ही चर्चित है। बाद की एक अनुश्रुति यह भी है कि उसने उशिज से विवाह किया, जो एक दास की लड़की थी और उससे काक्षीवंत् उत्पन्न हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;‘वैदिक इंडेक्स’, I. 366.। शतपथ ब्राह्मण, XIV. 9.4.15 में एक ऐसी माँ का वर्णन आया है, जो काले रंग के बालक की आकांक्षा रखती है, जिसे वेद का ज्ञान हो।&amp;lt;/ref&amp;gt; पुन: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में ऋषि दिवोदास को, जिनके नाम से ध्वनित होता है कि वे दास वंश के थे, &amp;lt;ref&amp;gt;वैदिक इंडेक्स, I. 363., हिलब्रांट का सुझाव&amp;lt;/ref&amp;gt; नई ऋचाओं का रचयिता बताया गया है&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 130.10.&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा दसवें मंडल में उसके सूक्त बयालिस-चौवालिस के लेखक अंगिरस को कृष्ण कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ एशियाटिक सोसायटी, बम्बई न्यू सीरीज, XXVI. 44.)&amp;lt;/ref&amp;gt; चूँकि ऊपर बताए गए अधिकांश निर्देश ऋग्वेद के परवर्ती भागों में पड़ते हैं, इसीलिए यह स्पष्ट होगा कि ऋग्वैदिक काल के अन्तिम चरण में नवगठित आर्य समुदाय में कुछ काले ऋषियों और दास पुरोहितों का प्रवेश हो रहा था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;कहा गया है कि ब्राह्मणवाद आर्यों से पूर्व की संस्था है।&amp;lt;ref&amp;gt;पार्जिटर : ‘एनशिएंट इण्डियन हिस्टारिकल ट्रेडीशन’, पृष्ठ 306-8.&amp;lt;/ref&amp;gt; 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		<author><name>गोविन्द राम</name></author>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद 30 मई 2014 को 10:00 बजे</title>
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद 19 फ़रवरी 2014 को 13:27 बजे</title>
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इतना ही नहीं वेदों और महाकाव्यों की परम्परा से पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं, जिनसे पता चलता है कि इन्द्र ब्राह्मणघाती थे और उनका मुख्य दुश्मन ‘वृत्र’ ब्राह्मण था।&amp;lt;ref&amp;gt;डब्ल्यू, रयूबेन : ‘इन्द्राज़ फाइट अगेन्स्ट वृत्र इन द महाभारत’ (एस. के. बेल्वल्कर कमेमोरेशन वॉल्यूम, पृष्ठ 116-8), धर्मानंद कोसंबी, ‘भगवान बुद्ध’, पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt; इससे यह परिकल्पना पुष्ट होती है कि विकसित पुरोहित प्रथा आर्यों के पहले की प्रथा थी, जिससे निष्कर्ष निकल सकता है कि जो लोग पराजित हुए वे सभी दास या शूद्र नहीं बना लिए गए। अतएव, यद्यपि ब्राह्मणवाद भारोपीय संस्था था, फिर भी आर्य विजेताओं के पुरोहित वर्ग में अधिकांश विजित जाति के लोग लिये गए होंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी, बम्बई, न्यू सीरीज, XXII. 35)&amp;lt;/ref&amp;gt; उनका अनुपात क्या रहा होगा, यह बताने के लिए कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यपूर्व पुरोहितों को इस नए समाज में स्थान मिला था। यह सोचना ग़लत होगा कि सभी काले लोगों को शूद्र बना लिया गया था, क्योंकि ऐसे प्रसंग आए हैं, जिनमें काले ऋषियों की भी चर्चा है। ऋग्वेद में ‘अश्विनी’ के सम्बन्ध में जो वर्णन किया गया है, उसके अनुसार उन्होंने काले वर्ण के (श्यावाय) कण्व को गौरवर्ण की स्त्रियाँ प्रदान की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद I. 117-8. किन्तु सायण ‘श्यावाय’ को ‘कुष्ठरोगेण श्यामवर्णाय’ बताते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; 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पुन: ऋग्वेद के प्रथम मंडल में ऋषि दिवोदास को, जिनके नाम से ध्वनित होता है कि वे दास वंश के थे, &amp;lt;ref&amp;gt;वैदिक इंडेक्स, I. 363., हिलब्रांट का सुझाव&amp;lt;/ref&amp;gt; नई ऋचाओं का रचयिता बताया गया है&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, I. 130.10.&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा दसवें मंडल में उसके सूक्त बयालिस-चौवालिस के लेखक अंगिरस को कृष्ण कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबी : जर्नल ऑफ़ द बाम्बे ब्रांच ऑफ़ एशियाटिक सोसायटी, बम्बई न्यू सीरीज, XXVI. 44.)&amp;lt;/ref&amp;gt; चूँकि ऊपर बताए गए अधिकांश निर्देश ऋग्वेद के परवर्ती भागों में पड़ते हैं, इसीलिए यह स्पष्ट होगा कि ऋग्वैदिक काल के अन्तिम चरण में नवगठित आर्य समुदाय में कुछ काले ऋषियों और दास पुरोहितों का प्रवेश हो रहा था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;कहा गया है कि ब्राह्मणवाद आर्यों से पूर्व की संस्था है।&amp;lt;ref&amp;gt;पार्जिटर : ‘एनशिएंट इण्डियन हिस्टारिकल ट्रेडीशन’, पृष्ठ 306-8.&amp;lt;/ref&amp;gt; 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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;सिक़्क़े&quot; to &quot;सिक्के&quot;</title>
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		<updated>2013-03-03T11:03:42Z</updated>

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'किं ते कृण्वंति की कटेषु गावो नाशीरं दुर्हे न तपन्ति धर्मम्', जाति और भाषा की दृष्टि से दहे ईरानियों के बहुत निकट रहे होंगे, किन्तु यह बहुत स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं हो पाया है; वही, त्सिम्मर ने हेरोडोट्स के दआई या दाअई, i. 126 को तूरानियन जनजाति का बताया है।&amp;lt;/ref&amp;gt; से उनको अभिन्न दिखाया गया है। इन सब तथ्यों से दासों और दस्युओं का अन्तर स्पष्ट है : दस्युओं और वैदिक आर्यों में समानता की बात बहुत ही कम आती है।&amp;lt;ref&amp;gt;शेफर : ‘एथनोग्राफ़ी इन एनशिएंट इण्डिया’, पृष्ठ 32, कहा गया है कि सामाजिक स्तर पर दास और आर्य का स्थान दस्यु भीलों से ऊपर था।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके विपरीत, दास सम्भवत: उन मिश्रित भारतीय आर्यों के अग्रिम दस्ते थे, जो उसी समय भारत आए, जब केसाइट बेबीलोनिया पहुँचे थे (1750 ई. पू.)। पुरातात्विकों का अनुमान है कि उत्तर फ़ारस से भारत की ओर लोगों का प्रस्थान या तो निरन्तर होता रहा अथवा उनका आगमन मुख्यत: दो बार हुआ था, जिनमें पहला आगमन 2000 ई. पू. के तुरन्त बाद हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;स्टुअर्ट पिगाट : एंटिक्विटी, जिल्द XXIV, सं. 96, 218 लाल : एनशिएंट इण्डिया, दिल्ली, सं. 9, पृष्ठ 90-91. लाल का कथन है कि दूसरी सहस्राब्दी ई. पू. के पूर्वार्द्ध में शाही टुंप (आधनिक बलूचिस्तान) में और दूसरी सहस्राब्दी ई. पू. के उत्तरार्द्ध में फ़ोर्ट मुनरो (अफ़ग़ानिस्तान) में लोग झुंड के झुंड आए।&amp;lt;/ref&amp;gt; शायद इसी कारण से आर्यों ने दासों के प्रति मेल-मिलाप की नीति अपनाई और दिवोदास, बलबुथ एवं एवं तरुक्ष जैसे उनके सरदार आर्यों के दल में आसानी से आत्मसात किए जा सके। अंतर्जातीय संघर्षों में अधिकतर आर्यों के सहायक के रूप में दासों के उल्लेख का भी यही कारण है। इससे लगता है कि ग़ुलाम के अर्थ में दास शब्द का प्रयोग भारत के आर्येतर निवासियों के बीच नहीं, बल्कि भारतीय आर्यों से सम्बद्ध लोगों के बीच प्रचलित था। ऋग्वेद के उत्तरवर्ती काल में दास शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में होने लगा था, जिससे न केवल मूल भारोपीय दासों के वंशजों, बल्कि दस्यु और राक्षस जैसे आर्य पूर्व लोगों और आर्य समुदाय के उन सदस्यों का भी बोध होता होगा, जो अपने आन्तरिक संघर्षों के कारण अकिंचनता या ग़ुलामी की स्थिति में पहुँच गए थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;दास कौन थे? साधारणत: दासों और दस्युओं को एक मान लिया जाता है। किन्तु दस्युहत्या शब्द के प्रयोग तो हैं, पर दासहत्या शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। आर्यों के अंतर्जातीय युद्धों में दासों को सहायक सेना के रूप में दिखाया गया है। अपव्रत, अन्यव्रत आदि के रूप में उनका वर्णन नहीं किया गया है। तीन स्थलों पर ‘दासों विशों’ का उल्लेख किया गया है; &amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, II. 11.4, IV. 28.4 और VI. 25.2; दत्त : ‘स्टडीज़ इन हिन्दू सोशल पालिटी’, पृष्ठ 334, बी.एन. दत्त का विचार है कि ऋग्वेद VI. 25.2 में दासविश् का जो उल्लेख हुआ है, उसका तात्पर्य यह है कि दास को वैश्य कोटि में रखा गया है। किन्तु चूँकि उस समय वैश्य समाज के एक वर्ग के रूप में नहीं थे, इसीलिए यहाँ विश् को एक जनजाति विशेष माना जा सकता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और सबसे बढ़कर तो यह कि एक सीथियन जनजाति - ईरानी दहे&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, VI, I, 357, ऋग्वेद, III. 53.14. 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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;सिक्के&quot; to &quot;सिक़्क़े&quot;</title>
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		<updated>2013-02-11T14:37:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;सिक्के&amp;quot; to &amp;quot;सिक़्क़े&amp;quot;&lt;/p&gt;
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'किं ते कृण्वंति की कटेषु गावो नाशीरं दुर्हे न तपन्ति धर्मम्', जाति और भाषा की दृष्टि से दहे ईरानियों के बहुत निकट रहे होंगे, किन्तु यह बहुत स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं हो पाया है; वही, त्सिम्मर ने हेरोडोट्स के दआई या दाअई, i. 126 को तूरानियन जनजाति का बताया है।&amp;lt;/ref&amp;gt; से उनको अभिन्न दिखाया गया है। इन सब तथ्यों से दासों और दस्युओं का अन्तर स्पष्ट है : दस्युओं और वैदिक आर्यों में समानता की बात बहुत ही कम आती है।&amp;lt;ref&amp;gt;शेफर : ‘एथनोग्राफ़ी इन एनशिएंट इण्डिया’, पृष्ठ 32, कहा गया है कि सामाजिक स्तर पर दास और आर्य का स्थान दस्यु भीलों से ऊपर था।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके विपरीत, दास सम्भवत: उन मिश्रित भारतीय आर्यों के अग्रिम दस्ते थे, जो उसी समय भारत आए, जब केसाइट बेबीलोनिया पहुँचे थे (1750 ई. पू.)। पुरातात्विकों का अनुमान है कि उत्तर फ़ारस से भारत की ओर लोगों का प्रस्थान या तो निरन्तर होता रहा अथवा उनका आगमन मुख्यत: दो बार हुआ था, जिनमें पहला आगमन 2000 ई. पू. के तुरन्त बाद हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;स्टुअर्ट पिगाट : एंटिक्विटी, जिल्द XXIV, सं. 96, 218 लाल : एनशिएंट इण्डिया, दिल्ली, सं. 9, पृष्ठ 90-91. लाल का कथन है कि दूसरी सहस्राब्दी ई. पू. के पूर्वार्द्ध में शाही टुंप (आधनिक बलूचिस्तान) में और दूसरी सहस्राब्दी ई. पू. के उत्तरार्द्ध में फ़ोर्ट मुनरो (अफ़ग़ानिस्तान) में लोग झुंड के झुंड आए।&amp;lt;/ref&amp;gt; शायद इसी कारण से आर्यों ने दासों के प्रति मेल-मिलाप की नीति अपनाई और दिवोदास, बलबुथ एवं एवं तरुक्ष जैसे उनके सरदार आर्यों के दल में आसानी से आत्मसात किए जा सके। अंतर्जातीय संघर्षों में अधिकतर आर्यों के सहायक के रूप में दासों के उल्लेख का भी यही कारण है। इससे लगता है कि ग़ुलाम के अर्थ में दास शब्द का प्रयोग भारत के आर्येतर निवासियों के बीच नहीं, बल्कि भारतीय आर्यों से सम्बद्ध लोगों के बीच प्रचलित था। ऋग्वेद के उत्तरवर्ती काल में दास शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में होने लगा था, जिससे न केवल मूल भारोपीय दासों के वंशजों, बल्कि दस्यु और राक्षस जैसे आर्य पूर्व लोगों और आर्य समुदाय के उन सदस्यों का भी बोध होता होगा, जो अपने आन्तरिक संघर्षों के कारण अकिंचनता या ग़ुलामी की स्थिति में पहुँच गए थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;दास कौन थे? साधारणत: दासों और दस्युओं को एक मान लिया जाता है। किन्तु दस्युहत्या शब्द के प्रयोग तो हैं, पर दासहत्या शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। आर्यों के अंतर्जातीय युद्धों में दासों को सहायक सेना के रूप में दिखाया गया है। अपव्रत, अन्यव्रत आदि के रूप में उनका वर्णन नहीं किया गया है। तीन स्थलों पर ‘दासों विशों’ का उल्लेख किया गया है; &amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, II. 11.4, IV. 28.4 और VI. 25.2; दत्त : ‘स्टडीज़ इन हिन्दू सोशल पालिटी’, पृष्ठ 334, बी.एन. दत्त का विचार है कि ऋग्वेद VI. 25.2 में दासविश् का जो उल्लेख हुआ है, उसका तात्पर्य यह है कि दास को वैश्य कोटि में रखा गया है। किन्तु चूँकि उस समय वैश्य समाज के एक वर्ग के रूप में नहीं थे, इसीलिए यहाँ विश् को एक जनजाति विशेष माना जा सकता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; और सबसे बढ़कर तो यह कि एक सीथियन जनजाति - ईरानी दहे&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद, VI, I, 357, ऋग्वेद, III. 53.14. 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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>फ़ौज़िया ख़ान 8 अगस्त 2012 को 11:09 बजे</title>
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		<author><name>फ़ौज़िया ख़ान</name></author>
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