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	<title>अपौरुषेयतावाद - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-07-11T14:38:45Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>यशी चौधरी: ''''अपौरुषेयतावाद''' वेद के आविर्भाव के विषय में नैयाय...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<updated>2018-05-26T12:06:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अपौरुषेयतावाद&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; वेद के आविर्भाव के विषय में नैयाय...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''अपौरुषेयतावाद''' वेद के आविर्भाव के विषय में नैयायिकों और तद्भिन दार्शनिकों के, विशेषत: मीमांसकों के, मत में बड़ा पार्थक्य है। न्याय का मत है कि ईश्वर द्वारा रचित होने के कारण वेद 'पौरुषेय' है, परंतु सांख्य, वेदांत और मीमांसा मत में वेद का उन्मेष स्वत: ही होता है; उसके लिए किसी भी व्यक्ति का, यहाँ तक कि सर्वज्ञ ईश्वर का भी प्रयत्न कार्यसाधक न हीं हे। पुरुष द्वारा उच्चरितमात्र होने से भी कोई वस्तुपौरुषेय नहीं होती, प्रत्युत्‌ दृष्टि के समान अदृष्ट में भी बुद्धिपूर्वक निर्माण होन पर ही 'पौरुषेयता' आती है (यस्मिझदृष्टेऽपि कृतबुद्धिरुपजाएतेे तत्‌ पौरुषेयम्‌---सांख्य सूत्र 5150)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुति के अनुसार ऋग्वेद आदि 'उस महाभूत के नि:श्वास' हैं। श्वास प्रश्वास तो स्वत: आविर्भूत होते हैं। उनके उत्पादन में पुरुष के कोई बुद्धि नहीं होती। अत: उस महाभूत के नि:श्वास रूप ये वेद अदृष्टवशात्‌ अबुद्धिपूर्वक स्वयं आविर्भूत होते हैं। मीमांसा मत में शब्द नित्य होता है। शब्द अश्रुत होने पर भी लुप्त नहीं होता; क्रमश: विकीर्ण होने पर, बहुत स्थानों में फैल जाने पर, वह लघु और अश्रुत हो जाता हैं, परंतु कथापि लुप्त नहीं होता। 'शब्द करो' कहते ही आकाश में अंतर्हिंत शब्द तालु और जिह्वा के संयोग से आविर्भूत मात्र हो जाता हैं, उत्पन्न नहीं होता (मीमांसा सूत्र 1/1/14)। वेद नित्य शब्द की राशि होने से नित्य हैं, किसी भी प्रकार उत्पाद्य या कार्य नहीं है। तैत्तिरीय, काठक आदि नामों का संबंध भिन्न-भिन्न वैदिक संहिताओं के साथ अवश्य मिलता हैं, परंतु यह आख्या प्रवचन के कारण ही हैं, ग्रंथरचना के कारण नहीं (मी. सू. 1/1/30)। वेदों में स्थान--स्थान पर उपलब्ध बबर प्रावाहणि आदि के समान शब्द किसी व्यक्तिविशेष के वाचक न होकर नित्य पदार्थ के निर्देशक हैं (मी. सू. 1/1/31)। आध्यात्मिक ज्ञान के प्रतिपादक होनेवाले वेदों में लौकिक इतिहास खोजने का प्रयत्न एकदम व्यर्थ हैं। इस प्रकार स्वत: आविर्भूत वेद किसी पुरूष की रचना न होने से 'अपौरूषेय' हैं। इसी सिद्धांत का नाम 'अपौरुषेयतावाद' है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1|लेखक= |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक= नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी|संकलन= भारत डिस्कवरी पुस्तकालय|संपादन= |पृष्ठ संख्या=148 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:दर्शन]][[Category:मीमांसा दर्शन]][[Category:दर्शन कोश]][[Category:हिन्दू दर्शन]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>यशी चौधरी</name></author>
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