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	<title>अनुक्रमणी - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>यशी चौधरी: ''''अनुक्रमणी''' वेदों की रक्षा के लिए कालांतर में आचार...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<updated>2018-05-25T10:28:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अनुक्रमणी&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; वेदों की रक्षा के लिए कालांतर में आचार...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''अनुक्रमणी''' वेदों की रक्षा के लिए कालांतर में आचार्यो ने ऐसे ग्रंथों का निर्माण किया जिनमें वेदों के प्रत्येक मंत्र के ऋषि, देवता, छंद, आख्यान आदि का विशेष विवरण प्रस्तुत किया गया है। ये ग्रंथ 'अनुक्रमणी' (सूची) के नाम से प्रख्यात हैं और प्रत्येक वेद से संबद्ध हैं। अनुक्रमणी के रचयिताओं में शौनक तथा कात्यायन विशेष आचार्य हैं। षड्गुरुशिष्य के अनुसार शौनक ने ऋग्वेद की रक्षा के लिए दस ग्रंथों का निर्माण किया था जिनमें 'बहद्देवता में 'ऋक्प्रातिशाख्य' प्रख्यात तथा प्रकाशित हैं। वृहद्देवता में 'ऋग्वेदीय' प्रत्येक मंत्र के वर्ण्य देवता का विस्तृत विवेचन है, साथ ही मंत्रों से संबद्ध रोचक आख्यानों का भी। कात्यायन की 'सर्वानुक्रमणी' ऋग्वेद की प्रख्यात अनुक्रमणी है जिसपर 'षड्गुरुशिष्य' का भाष्य बहुत ही उपयोगी व्याख्यान है। माधव भट्ट ने भी 'ऋग्वेदानुक्रमणी' का प्रणयन किया था जिसके दो खंड उपलब्ध और मद्रास से प्रकाशित हैं। यजुर्वेद की अनुक्रमणी 'शुक्लयजु: सवनिक्रमसूत्र' में दी गई है जिसकी रचना का श्रेय कात्यायन (वार्तिकार कात्यायन से भिन्न व्यक्ति) को दिया जाता है। इसके ऊपर महायाज्ञिक प्रजापति के पुत्र महायाज्ञिक श्रीदेव का उपयोगी भाष्य भी प्रकाशित है। सामवेद से संबद्ध अनुक्रमणी ग्रंथों की संख्या पर्याप्त रूप से बड़ी है जिनमें उपग्रंथ सूत्र, निदान सूत्र, पंचविधान सूत्र, लघु ऋक्तंत्रसंग्रह, तथा सामसप्तलक्षण भिन्न-भिन्न स्थानों से प्रकाशित हैं, परंतु कल्पानुपद सूत्र, अनुपद सूत्र तथा उपनिदान सूत्र अभी तक प्रकाश में नहीं आए हैं। इन ग्रंथों में सामवेद के ऋषि, छंद तथा सामविधान का विवरणर प्रस्तुत किया गया है। अथर्ववेद की 'बृहत्‌ सर्वानुक्रमणी' प्रत्येक कांड के मंत्र, ऋषि, देवता, तथा छंद का पूर्ण विवरण देती है और सर्वाधिक महत्वशाली मानी जाती है। 'पंचपटलिका' तथा 'दंत्योष्ठविधि' पूर्वग्रंथ के पूरक माने जा सकते हैं। शौनक रचित 'चरणव्यूह सूत्र' भी वेदों की शाखा, चरण आदि की जानकारी के लिए विशेष उपादेय है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1|लेखक= |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक= नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी|संकलन= भारत डिस्कवरी पुस्तकालय|संपादन= |पृष्ठ संख्या=119 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संस्कृत साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:वेद]][[Category:वैदिक साहित्य]][[Category:साहित्य_कोश]][[Category:श्रुति_ग्रन्थ]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>यशी चौधरी</name></author>
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