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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[राजा रवि वर्मा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Raja Ravi Varma&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.columbia.edu&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=राजा रवि वर्मा (1848-1906) [[केरल]] प्रदेश के विख्यात चित्रकार थे। उन्होंने भारतीय साहित्य और संस्कृति के पात्रों का चित्रण किया।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{nil}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-03T12:24:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग]]&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वरम मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhimshankar.jpg|[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Bheemashankar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Kashi-Vishwanath.jpg|[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Omkareshwar.jpg|[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Omkareshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Trimbakeshwar.jpg|[[त्र्यंम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यंम्बकेश्वर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Grishneshwar-Temple.jpg|घुश्मेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Ghushmeshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Nageshwar-Temple.jpg|नागेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Nageshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Somnath-Temple.jpg|सोमनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Vaidyanath-Temple.jpg|वैद्यनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Vaidyanath Temple&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&amp;diff=18237"/>
		<updated>2010-05-03T12:24:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Vaidyanath-Temple.jpg|वैद्यनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Vaidyanath Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री वैद्यनाथ / Shri Vaidyanath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
ज्योतिर्लिंगों की गणना में श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का नौवाँ स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथधाम कहा जाता है। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त, पूर्व में [[बिहार]] प्रान्त के [[सन्थाल]] परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचे==&lt;br /&gt;
यह जसीडीह रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है तथा सड़क मार्ग से भी यहाँ पहुँचने की अच्छी व्यवस्था है। &lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] में ‘परल्यां वैद्यनाथं च’ ऐसा उल्लेख मिलता है, जिसके आधार पर कुछ लोग वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का स्थान परलीग्राम को बताते हैं। 'परलीग्राम' निज़ाम [[हैदराबाद]] क्षेत्र के अंतर्गत पड़ता है। हैदराबाद शहर से जो रेलगार्ग परभनी जंक्शन की ओर जाता है, उस परभनी जंक्शन से परली स्टेशन के लिए रेल की एक उप शाखा जाति है। इसी परली स्टेशन से थोड़ी ही दूरी पर परलीग्राम है, जिसके पास ही ‘श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग अवस्थित है। यहाँ का मन्दिर अत्यन्त पुराना है, जिसका जीर्णोद्धार [[रानी अहल्याबाई]] ने कराया था। यह मन्दिर एक पहाड़ी के ऊपर निर्मित है। पहाड़ी से नीचे एक छोटी नदी भी बहती है तथा एक छोट-सा शिवकुण्ड भी है। पहाड़ी के ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। लोगों की मान्यता है कि परली ग्राम के पास स्थित वैद्यनाथ ही वास्तविक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
मान्य ग्रन्थ प्राचीन  [[शिव पुराण]] के अनुसार झारखण्ड प्रान्त के जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप स्थित देवघर का श्री वैद्यनाथ शिवलिंग ही वास्तविक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
वैद्यनाथावतारो हि नवमस्तत्र कीर्तित:।&lt;br /&gt;
आविर्भूतो रावणार्थं बहुलीलाकर: प्रभु:।।&lt;br /&gt;
तदानयनरूपं हि व्याजं कृत्वा महेश्वर:।&lt;br /&gt;
ज्योतिर्लिंगस्वरूपेण चिताभूमौ प्रतिष्ठित:।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथेश्वरो नाम्ना प्रसिद्धोऽभूज्जगत्त्रये।&lt;br /&gt;
दर्शनात्पूजनाद्भभक्या भुक्तिमुक्तिप्रद: स हि।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्री शिव पुराण शत रूद्र सं. 42/38-40&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;    &lt;br /&gt;
==वैद्यनाथ नौवाँ ज्योतिर्लिंग==                 &lt;br /&gt;
श्री शिव महापुराण के उपर्युक्त [[द्वादश ज्योतिर्लिंग]] की गणना के क्रम मे श्री वैद्यनाथ को नौवाँ ज्योतिर्लिंग बताया गया है। स्थान का संकेत करते हुए लिखा गया है कि ‘चिताभूमौ प्रतिष्ठित:’। इसके अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी ‘वैद्यनाथं चिताभूमौ’ ऐसा लिखा गया है। ‘चिताभूमौ’ शब्द का विश्लेषण करने पर परली के वैद्यनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नहीं आते हैं, इसलिए उन्हें वास्तविक वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मानना उचित नहीं है। सन्थाल परगना जनपद के जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप देवघर पर स्थित स्थान को चिताभूमि कहा गया है। जिस समय भगवान [[शंकर]] [[सती]] के शव को अपने कन्धे पर रखकर इधर-उधर उन्मत्त की तरह घूम रहे थे, उसी समय इस स्थान पर सती का हृत्पिण्ड अर्थात हृदय भाग गलकर गिर गया था। भगवान शकर ने सती के उस हृत्पिण्ड का दाह-संस्कार उक्त स्थान पर किया था, जिसके कारण इसका नाम ‘चिताभूमि’ पड़ गया। श्री शिव पुराण में एक निम्नलिखित श्लोक भी आता है, जिससे वैद्यनाथ का उक्त चिताभूमि में स्थान माना जाता है। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रत्यक्षं तं तदा दृष्टवा प्रतिष्ठाप्य च ते सुरा:।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथेति सम्प्रोच्य नत्वा नत्वा दिवं ययु:।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्थात ‘देवताओं ने भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन किया और उसके बाद उनके लिंग की प्रतिष्ठा की। देवगण उस लिंग को ‘वैद्यनाथ’ नाम देकर उसे नमस्कार करते हुए स्वर्गलोक को चले गये।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैद्यनाथ की स्थापना==&lt;br /&gt;
वैद्यनाथ लिंग की स्थापना के सम्बन्ध में लिखा है कि एक बार राक्षसराज [[रावण]] ने [[हिमालय]] पर स्थिर होकर भगवान [[शिव]] की घोर तपस्या की। उस राक्षस ने अपना एक-एक सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दिया। इस प्रकिया में उसने अपने नौ सिर चढ़ा दिया तथा दसवें सिर को काटने के लिए जब वह उद्यत (तैयार) हुआ, तब तक भगवान शंकर प्रसन्न हो उठे। प्रकट होकर भगवान शिव ने रावण के दसों सिरों को पहले की ही भाँति कर दिया। उन्होंने रावण से वर माँगने के लिए कहा। रावण ने भगवान शिव से कहा कि मुझे इस शिवलिंग को ले जाकर [[लंका]] में स्थापित करने की अनुमति प्रदान करें। शंकरजी ने रावण को इस प्रतिबन्ध के साथ अनुमति प्रदान कर दी कि यदि इस लिंग को ले जाते समय रास्ते में धरती पर रखोगे, तो यह वहीं स्थापित (अचल) हो जाएगा। जब रावण शिवलिंग को लेकर चला, तो मार्ग में ‘चिताभूमि’ में ही उसे लघुशंका (पेशाब) करने की प्रवृत्ति हुई। उसने उस लिंग को एक अहीर को पकड़ा दिया और लघुशंका से निवृत्त होने चला गया। इधर शिवलिंग भारी होने के कारण उस अहीर ने उसे भूमि पर रख दिया। वह लिंग वहीं अचल हो गया। वापस आकर रावण ने काफी ज़ोर लगाकर उस शिवलिंग को उखाड़ना चाहा, किन्तु वह असफल रहा। अन्त में वह निराश हो गया और उस शिवलिंग पर अपने अँगूठे को गड़ाकर (अँगूठे से दबाकर) लंका के लिए खाली हाथ ही चल दिया। इधर [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]] [[इन्द्र]] आदि देवताओं ने वहाँ पहुँच कर उस शिवलिंग की विधिवत पूजा की। उन्होंने शिव जी का दर्शन किया और लिंग की प्रतिष्ठा करके स्तुति की। उसके बाद वे स्वर्गलोक को चले गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुकूल फल देने वाला है। इस वैद्यनाथ धाम में मन्दिर से थोड़ी ही दूरी पर एक विशाल सरोवर है, जिस पर पक्के घाट बने हुए हैं। भक्तगण इस सरोवर में स्नान करते हैं। यहाँ तीर्थपुरोहितों (पण्डों) के हजारों घाट हैं, जिनकी आजीविका मन्दिर से ही चलती है। परम्परा के अनुसार पण्डा लोग एक गहरे कुएँ से जल भरकर ज्योतिर्लिंग को स्नान कराते हैं। अभिषेक के लिए सैकड़ों घड़े जल निकाले जाते हैं। उनकी पूजा काफी लम्बी चलती है। उसके बाद ही आम जनता को दर्शन-पूजन करने का अवसर प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह ज्योतिर्लिंग रावण के द्वारा दबाये जाने के कारण भूमि में दबा है तथा उसके ऊपरी सिरे में कुछ गड्ढा सा बन गया है। फिर भी इस शिवलिंग मूर्ति की ऊँचाई लगभग ग्यारह अंगुल है। [[श्रावण|सावन]] के महीने में यहाँ मेला लगता है और भक्तगण दूर-दूर से काँवर में जल लेकर बाबा वैद्यनाथ धाम (देवघर) आते हैं। वैद्यनाथ धाम में अनेक रोगों से छुटकारा पाने हेतु भी बाबा का दर्शन करने श्रद्धालु आते हैं। ऐसी प्रसिद्धि है कि श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की लगातार आरती-दर्शन करने से लोगों को रोगों से मुक्ति मिलती है।&lt;br /&gt;
==कोटि रूद्र संहिता के अनुसार==&lt;br /&gt;
श्री शिव महापुराण के कोटि रूद्र संहिता में श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार लिखी गई है– &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राक्षसराज रावण अभिमानी तो था ही, वह अपने अहंकार को भी शीघ्र प्रकट करने वाला था। एक समय वह कैलास पर्वत पर भक्तिभाव पूर्वक भगवान शिव की आराधना कर रहा था। बहुत दिनों तक आराधना करने पर भी जब भगवान शिव उस पर प्रसन्न नहीं हुए, तब वह पुन: दूसरी विधि से तप-साधना करने लगा। उसने सिद्धिस्थल हिमालय पर्वत से दक्षिण की ओर सघन वृक्षों से भरे जंगल में पृथ्वी को खोदकर एक गड्ढा तैयार किया। राक्षस कुल भूषण उस रावण ने गड्ढे में [[अग्नि]] की स्थापना करके हवन (आहुतियाँ) प्रारम्भ कर दिया। उसने भगवान शिव को भी वहीं अपने पास ही स्थापित किया था। तप के लिए उसने कठोर संयम-नियम को धारण किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह गर्मी के दिनों में पाँच अग्नियों के बीच में बैठकर पंचाग्नि सेवन करता था, तो वर्षाकाल में खुले मैदान में चबूतरे पर सोता था और शीतकाल (सर्दियों के दिनों में) में आकण्ठ (गले के बराबर) जल के भीतर खड़े होकर साधना करता था। इन तीन विधियों के द्वारा रावण की तपस्या चल रही थी। इतने कठोर तप करने पर भी भगवान महेश्वर उस पर प्रसन्न नहीं हुए। ऐसा कहा जाता है कि दुष्ट आत्माओं द्वारा भगवान को रिझाना बड़ा कठिन होता है। कठिन तपस्या से जब रावण को सिद्धि नहीं प्राप्त हुई, तब रावण अपना एक-एक सिर काटकर शिव जी की पूजा करने लगा। वह शास्त्र विधि से भगवान की पूजा करता और उस पूजन के बाद अपना एक मस्तक काटता तथा भगवान को समर्पित कर देता था। इस प्रकार क्रमश: उसने अपने नौ मस्तक काट डाले। जब वह अन्तिम अपना दसवाँ मस्तक काटना ही चाहता था, तब तक भक्त वत्सल भगवान महेश्वर उस पर सन्तुष्ट और प्रसन्न हो गये। उन्होंने साक्षात प्रकट होकर रावण के सभी मस्तकों को स्वस्थ करते हुए उन्हें पूर्ववत जोड़ दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान ने राक्षसराज रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम बल और पराक्रम प्रदान किया। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद ग्रहण करने के बाद नतमस्तक होकर विनम्रभाव से उसने हाथ जोड़कर कहा– ‘देवेश्वर! आप मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आपकी शरण में आया हूँ और आपको लंका में ले चलता हूँ। आप मेरा मनोरथ सिद्ध कीजिए।’ इस प्रकार रावण के कथन को सुनकर भगवान शंकर असमंजस की स्थिति में पड़ गये। उन्होंने उपस्थित धर्मसंकट को टालने के लिए अनमने होकर कहा– ‘राक्षसराज! तुम मेरे इस उत्तम लिंग को भक्तिभावपूर्वक अपनी राजधानी में ले जाओ, किन्तु यह ध्यान रखना- रास्ते में तुम इसे यदि पृथ्वी पर रखोगे, तो यह वहीं अचल हो जाएगा। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो’–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रसन्नोभव देवेश लंकां च त्वां नयाम्यहम्।&lt;br /&gt;
सफलं कुरू मे कामं त्वामहं शरणं गत:।।&lt;br /&gt;
इत्युक्तश्च तदा तेन शम्भुर्वै रावणेन स:।&lt;br /&gt;
प्रत्युवाच विचेतस्क: संकटं परमं गत:।।&lt;br /&gt;
श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ वचो मे सारवत्तया।&lt;br /&gt;
नीयतां स्वगृहे मे हि सदभक्त्या लिंगमुत्तमम्।।&lt;br /&gt;
भूमौ लिंगं यदा त्वं च स्थापयिष्यसि यत्र वै।&lt;br /&gt;
स्थास्यत्यत्र न सन्देहो यथेच्छसि तथा कुरू।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्री शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 28/12-15&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &lt;br /&gt;
भगवान शिव द्वारा ऐसा कहने पर ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहता हुआ राक्षसराज रावण उस शिवलिंग को साथ लेकर अपनी राजधानी लंका की ओर चल दिया। भगवान शंकर की मायाशक्ति के प्रभाव से उसे रास्ते में जाते हुए मूत्रोत्सर्ग (पेशाब करने) की प्रबल इच्छा हुई। सामर्थ्यशाली रावण मूत्र के वेग को रोकने में असमर्थ रहा और शिवलिंग को एक ग्वाल के हाथ में पकड़ा कर स्वयं पेशाब करने के लिए बैठ गया। एक मुहूर्त बीतने के बाद वह ग्वाला शिवलिंग के भार से पीड़ित हो उठा और उसने लिंग को पृथ्वी पर रख दिया। पृथ्वी पर रखते ही वह मणिमय शिवलिंग वहीं पृथ्वी में स्थिर हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब शिवलिंग लोक-कल्याण की भावना से वहीं स्थिर हो गया, तब निराश होकर रावण अपनी राजधानी की ओर चल दिया। उसने राजधानी में पहुँचकर शिवलिंग की सारी घटना अपनी पत्नी [[मन्दोदरी]] से बतायी। देवपुर के [[इन्द्र]] आदि देवताओं और ऋषियों ने लिंग सम्बन्धी समाचार को सुनकर आपस में परामर्श किया और वहाँ पहुँच गये। भगवान शिव में अटूट भक्ति होने के कारण उन लोगों ने अतिशय प्रसन्नता के साथ शास्त्र विधि से उस लिंग की पूजा की। सभी ने भगवान शंकर का प्रत्यक्ष दर्शन किया–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
तस्मिँल्लिंगे स्थिते तत्र सर्वलोकहिताय वै।&lt;br /&gt;
रावण: स्वगृहं गत्वा वरं प्राप्य महोत्तमम्।।&lt;br /&gt;
तच्छुत्वा सकला देवा: शक्राद्या मुनयस्तथा।&lt;br /&gt;
परस्परं समामन्त्र्य शिवसक्तधियोऽमला:।।&lt;br /&gt;
तस्मिन् काले सुरा: सर्वे हरिब्रह्मदयो मुने।&lt;br /&gt;
आजग्मुस्तत्र सुप्रीत्या पूजां चक्रुर्विशेषत:।।&lt;br /&gt;
प्रत्यक्षं तं तदा दृष्टवा प्रतिष्ठाप्य च ते सुरा:।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथेति संप्रोच्य नत्वा – नत्वा दिवं ययु:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्री शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 28/22-25&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
                   &lt;br /&gt;
इस प्रकार रावण की तपस्या के फलस्वरूप श्री वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे देवताओं ने स्वयं प्रतिष्ठित कर पूजन किया। जो मनुष्य श्रद्धा भक्तिपूर्वक भगवान श्री वैद्यनाथ का अभिषेक करता है, उसका शारीरिक और मानसिक रोग अतिशीघ्र नष्ट हो जाता है। इसलिए वैद्यनाथधाम में रोगियों व दर्शनार्थियों की विशेष भीड़ दिखाई पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:छत्तीसगढ़ राज्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:छत्तीसगढ़ राज्य के धार्मिक स्थल ]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>चित्र:Vaidyanath-Temple.jpg</title>
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&lt;hr /&gt;
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		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>सोमनाथ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5&amp;diff=18231"/>
		<updated>2010-05-03T11:59:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग / Somanath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग [[गुजरात]] (सौराष्ट्र) के [[काठियावाड़]] क्षेत्र के अन्तर्गत प्रभास में विराजमान हैं। इसी क्षेत्र में लीला पुरूषोत्तम भगवान [[कृष्ण|श्रीकृष्णचन्द्र]] ने [[यदु वंश]] का संहार कराने के बाद अपनी नर लीला समाप्त कर ली थीं। ‘जरा’ नामक व्याध (शिकारी) ने अपने बाणों से उनके चरणों (पैर) को बींध डाला था। [[शिव पुराण]] में भगवान सोमनाथ  का परिचय इस प्रकार दिया है-&lt;br /&gt;
==शिव पुराण में श्री सोमनाथ==&lt;br /&gt;
[[द्वादश ज्योतिर्लिंग]] में सोमनाथ की गणना प्रथम है। इनके आविर्भाव का प्रकरण प्रजापति [[दक्ष]] और [[चंद्र देवता|चन्द्रमा]] के साथ जुड़ा है। जब प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्विनी आदि सभी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ कर दिया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी के रूप में दक्ष कन्याओं को प्राप्त कर चन्द्रमा बहुत शोभित हुए और दक्षकन्याएँ भी अपने स्वामी के रूप में चन्द्रमा को प्राप्त कर शोभायमान हो उठी। चन्द्रमा की उन सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी उन्हें अतिशय प्रिय थी, जिसको वे विशेष आदर तथा प्रेम करते थे। उनका इतना प्रेम अन्य पत्नियों से नहीं था। चन्द्रमा की उदासीनता और उपेक्षा का देखकर रोहिणी की अपेक्षा शेष स्त्रियाँ बहुत दुःखी हुई। वे सभी स्त्रियाँ अपने पिता दक्ष की शरण में गयीं और उनसे अपने कष्टों का वर्णन किया। अपनी पुत्रियों की व्यथा और चन्द्रमा के दुर्व्यवहार को सुनकर दक्ष भी बड़े दुःखी हुए। उन्होंने चन्द्रमा से भेंट की और शान्तिपूर्वक कहा- ‘कलानिधे! तुमने निर्मल व पवित्र कुल में जन्म लिया है, फिर भी तुम अपनी पत्नियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हो। तुम्हारे आश्रय में रहने वाली जितनी भी स्त्रियाँ हैं, उनके प्रति तुम्हारे मन मे कम और अधिक, ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों है? तुम किसी को अधिक प्यार करते हो और किसी को कम प्यार देते हो, ऐसा क्यों करते हो? अब तक जो व्यवहार किया है, वह ठीक नहीं है, फिर अब आगे ऐसा दुर्व्ववहार तुम्हें नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति आत्मीयजनों के साथ विषमतापूर्ण व्यवहार करता है, उसे नर्क में जाना पड़ता है।’ इस प्रकार प्रजापति दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक समझाया और ऐसा सोच लिया कि चन्द्रमा में सुधार हो जाएगा। उसके बाद प्रजापति दक्ष वापस चले गये।&lt;br /&gt;
*शिव महापुराण के कोटिरूद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में लिखा है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमले च कुले त्वं हि समुत्पन्नः कलानिधे।&lt;br /&gt;
आश्रितेषु च सर्वेषु न्यूनाधिक्यं कथं तव।।&lt;br /&gt;
कृतं चेतत्कृतं तच्च् न कर्त्तव्यं त्वया पुनः।&lt;br /&gt;
वर्तनं    विषमत्वेन    नरकप्रदमीरितम्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रबल भावी के कारण विवश चन्द्रमा ने अपने ससुर प्रजापति दक्ष की बात नहीं मानी। रोहिणी के प्रति अतिशय आसक्ति के कारण उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की तथा अपनी अन्य पत्नियों का कुछ भी ख्याल नहीं रखा और उन सभी से उदासीन रहे। दुबारा समाचार प्राप्त कर प्रजापति दक्ष बड़े दुःखी हुए। वे पुनः चन्द्रमा के पास आकर उन्हें उत्तम नीति के द्वारा समझने लगे। दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की । बार-बार आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने अवहेलनापूर्वक जब दक्ष की बात नहीं मानी, तब उन्होंने शाप दे दिया। दक्ष ने कहा कि मेंरे आग्रह करने पर भी तुमने मेरी अवज्ञा की है, इसलिए तुम्हें क्षयरोग हो जाय-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रयतां  चन्द्र  यत्पूर्व  प्रार्थितो बहुधा  मया।,&lt;br /&gt;
न मानितं त्वया यस्मात्तस्मात्त्वं च क्षयी भव&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संख्या 14-18&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
दक्ष द्वारा शाप देने के साथ ही क्षण भर में चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गये। उनके क्षीण होते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी देवगण तथा ऋषिगण भी चिंतित हो गये। परेशान चन्द्रमा ने अपनी अस्वस्थता तथा उसके कारणों की सूचना [[इन्द्र]] आदि देवताओं तथा ऋषियों को दी। उसके बाद उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता तथा [[वसिष्ठ]] आदि ऋषिगण [[ब्रह्मा]]जी की शरण में गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि जो घटना हो गई है, उसे तो भुगतना ही है, क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नहीं जा सकता। उसके बाद ब्रह्माजी ने उन देवताओं को एक उत्तम उपाय बताया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा ने कहा कि चन्द्रमा देवताओं के साथ कल्याणकारक शुभ प्रभास क्षेत्र में चले जायें। वहाँ पर विधिपूर्वक शुभ [[महामृत्युंजय मन्त्र|मुत्युंजय-मत्रं]] का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान [[शिव]] की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें। इनकी आराधना और तपस्या से जब भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाएँगे, तो वे इन्हें क्षय रोग से मुक्त कर देगें। पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा को स्वीकार कर देवताओं और ऋषियों के सरंक्षण मे चन्द्रमा देवमण्डल सहित प्रभास क्षेत्र में पहुँच गये। वहाँ चन्द्रदेव ने मृत्युंजंय भगवान। की अर्चना-वन्दना और अनुष्ठान प्रारम्भ किया। वे मृत्युंजय-मंत्र का जप तथा भगवान। शिव की उपासना में तल्लीन हो गये। ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की ओर वृषभध्वज का पूजन किया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Somnath-Temple.jpg|सोमनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित से वहाँ निरन्तर खड़े रहे। उनकी उत्कट तपस्या से भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने चन्द्रमा से कहा- 'चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जिसके लिए यह कठोर तप कर रहे हो, उस अपनी अभिलाषा को बताओ। मै तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें उत्तम वर प्रदान करूँगा।’ चन्द्रमा ने प्रार्थना करते हुए विनयपूर्वक कहा- ‘देवेश्वर! आप मेरे सब अपराधों को क्षमा करें और मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कर दें।’ भगवान शिव ने कहा– 'चन्द्रदेव! तुम्हारी कल प्रतिदिन एक पक्ष में क्षीण हुआ करेगी, जबकि दूसरे पक्ष में प्रतिदिन वह निरन्तर बढ़ती रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ और लोक-सम्मान के योग्य ही जाओगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव का कृपा-प्रसाद प्राप्त कर चन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्तिभाव पूर्वक शंकर की स्तुति की। ऐसी स्थिति में निराकार शिव उनकी दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हो गये तथा प्रभास क्षेत्र के महत्व को बढाने हेतु देवताओं के सम्मान तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए स्वयं ‘सोमेश्वर’ कहलने लगे। चन्द्रमा के नाम पर सोमनाथ बने भगवान शिव संसार में ‘सोमनाथ’ के नाम से भी प्रसि) हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमनाथ भगवान की पूजा और उपासना करने से उपासक भक्त के क्षय तथा कोढ़ आदि रोग सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है। यशस्वी चन्द्रमा के कारण ही सोमेश्वर भगवान शिव इस भूतल को परम पवित्र करते हुए प्रभास क्षेत्र मे विराजते हैं। उस प्रभास क्षेत्र में सभी देवताओं ने मिलकर एक सोमकुण्ड की भी स्थापना की है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस कुण्ड में शिव तथा ब्रह्मा का सदा निवास रहता है। इस पृथ्वी पर यह चन्द्रकुण्ड मनुष्यों के पाप नाश करने वाले के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ‘पापनाशक-तीर्थ’ भी कहते हैं। जो मनुष्य इस चन्द्रकुण्ड में स्नान करता है, वह सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। इस कुण्ड में बिना नागा किये छः माह तक स्नान करने से क्षय आदि दुःसाध्य और असाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं। मुनष्य जिस किसी भी भावना या इच्छा से इस परम पवित्र और उत्तम तीर्थ का सेवन करता है, तो वह बिना संशय ही उसे प्राप्त कर लेता है। शिव महापुराण की कोटिरूद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में उपर्युक्त आशय वर्णित है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
चन्द्रकुण्डं  प्रसिद्ध  च पृथिव्यां पापनाशनम्।&lt;br /&gt;
तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।&lt;br /&gt;
रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।&lt;br /&gt;
ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।&lt;br /&gt;
प्रभासं  च  परिक्रम्य  पृथिवीक्रमसं  भवम्।&lt;br /&gt;
फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।&lt;br /&gt;
सोमलिंग  नरो   दृष्टा  सर्वपापात्प्रमुच्यते ।&lt;br /&gt;
लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव देवताओं की प्रार्थना पर लोक कल्याण करने हेतू प्रभास क्षेत्र में हमेशा-हमेशा के लिए विराजमान हो गये। इस प्रकार शिव-महापुराण में सोमेश्वर महादेव अथवा सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति का वर्णन है। इसके अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में लिखी कथा भी इसी से मिलती-जुलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास से==&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय इतिहास और आधुनिक भारत के इतिहास में भी सोमनाथ-मन्दिर को सन 1024 में [[महमूद ग़ज़नवी]] ने भ्रष्ट कर दिया था। मूर्ति भंजक (मूर्ति का तोड़ने वाला व मूर्तिपूजा विरोधी) होने के कारण तथा सोने-चाँदी को लूटने के लिए उसने मन्दिर में तोड़-फोड़ की थी। मन्दिर के हीरे-जवाहरातों को लूट कर वह अपने देश ग़ज़नी लेकर चला गया। उक्त सोमनाथ-मन्दिर का भग्नावशेष आज भी समुद्र के किनारे विद्यमान है। इतिहास के अनुसार बताया जाता है कि जब महमूद ग़ज़नवी उस शिवलिंग को नहीं तोड़ पाया, तब उसने उसके अगल-बगल मे भीषण आग लगवा दी। सोमनाथ मन्दिर में नीलमणि के छप्प्न खम्भे लगे हुए थे। उन खम्भों में हीरे-मोती तथा विविध प्रकार के रत्न जड़े हुए थे। उन बहुमूल्य रत्नों को लुटेरों ने लूट लिया और मन्दिर को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।&lt;br /&gt;
==पुन: प्रतिष्ठा==&lt;br /&gt;
महमूद के मन्दिर लूटने के बाद राजा भीमदेव ने पुनः उसकी प्रतिष्ठा कीं। सन 1093. में सिद्धराज जयसिंह ने भी मन्दिर की प्रतिष्ठा और उसके पवित्रीकरण में भरपूर सहयोग किया। 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल ने जैनाचार्य हेमचन्द्र सरि के साथ सोमनाथ की यात्रा की थी। उन्होंने भी मन्दिर का बहुत कुछ सुधार करवाया था। इसी प्रकार सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ-मन्दिर का सौन्द्रयीकरण कराया था। उसके बाद भी मुसलमानों ने बहुत दुराचार किया और मन्दिर को नष्ट-भ्रष्ट करते रहे। [[अलाऊद्दीन ख़िलजी]] ने सन 1297 ई. में पुनः सोमनाथ-मन्दिर का ध्वंस किया। उसके सेनापति नुसरत खाँ ने जी-भर मन्दिर को लूटा। सन 1395 ई. में गुजरात का सुल्तान मुजफ्फरशाह भी मन्दिर का विध्वंस करने में जुट गया। अपने पितामह के पदचिन्ह्वों पर चलते हुए अहमदशाह ने पुनः सन 1413 ई. में सोमनाथ-मन्दिर को तोड़ डाला। प्राचीन स्थापत्यकला जो उस मन्दिर में दृष्टिगत होती थी, उन सबको उसने तहस-नहस कर डाला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वतन्त्रता के बाद==&lt;br /&gt;
भारतीय स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद राष्ट्र के प्रथम राष्ट्रपति [[डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद|डा॰ राजेन्द्र प्रसाद]] ने देश के स्वाभिमान को जाग्रत करते हुए पुनः सोमनाथ मन्दिर क भव्य निर्माण कराया आज पुनः भारतीय-संस्कृति और सनातन-धर्म की ध्वजा के रूप में सोमेश्वर ज्योतिर्लिंग ‘सोमनाथ मन्दिर’ के रूप में शोभायमान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचें==&lt;br /&gt;
सोमनाथ का मन्दिर जिस स्थान पर स्थित है, उसे वेरावल, सोमनाथपाटण, प्रभास और प्रभासपाटण आदि नामों से जाना जाता है। सौराष्ट्र के पश्चिमी रेलवे की [[राजकोट]]-वेरीवल तथा खिजडिया वेरावल लाइनें हैं। इन दोनों ओर से वेरावल पहुँचा जाता है। वेरावल रेलवे स्टेशन से प्रभास पाटल पाँच किलोमीटर की दूरी पर है। स्टेशन से बस, टैक्सी आदि के द्वारा प्रभासपाटाण पहुँचा जा सकता है।&lt;br /&gt;
==समुद्रका अग्निकुण्ड==&lt;br /&gt;
सोमनाथ में धर्मयात्रियों के लिए अनेक पवित्र और दर्शनीय स्थान विद्यमान हैं। प्रभासपाटाण नगर के बाहर ही एक ‘समुद्रका’ नामक अग्निकुण्ड हैं सर्वप्रथम यात्रीगण इसी कुण्ड में स्नान करते हैं, उसके बाद वे प्राची त्रिवेणी में स्नान करने के लिए जाते हैं। सोमनाथ का मूल मन्दिर जो आततायियों द्वारा बार-बार नष्ट किया गया था, वह आज भी अपने मूलस्थान समुद्र के किनारे ही है। स्वाधीन भारत के प्रथम गृहमन्त्री [[सरदार वल्लभभाई पटेल]] ने यहाँ भव्यमन्दिर का निर्माण कराया था। सोमनाथ के मूल मन्दिर से कुछ ही दूरी पर [[अहल्याबाई]] द्वारा बनवाया गया सोमनाथ का मन्दिर है।&lt;br /&gt;
==भू-गर्भ में==&lt;br /&gt;
यहाँ भू-गर्भ में (भूमि के नीचे) सोमनाथ लिंग की स्थापना की गई है। भू-गर्भ में होने के कारण यहाँ प्रकाश का अभाव रहता है। इस मन्दिर में [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[सरस्वती देवी]], [[लक्ष्मी]], [[गंगा नदी|गंगा]] और [[नन्दी]] की भी मूर्तियाँ स्थापित हैं। भूमि के ऊपरी भाग में शिवलिंग से ऊपर अहल्येश्वर मूर्ति है। मन्दिर के परिसर में [[गणेश]]जी का मन्दिर है और उत्तर द्वार के बाहर अघोरलिंग की मूर्ति स्थापित की गई है। प्रभावनगर में अहल्याबाई मन्दिर के पास ही महाकाली का मन्दिर है। इसी प्रकार गणेशजी, भद्रकाली तथा भगवान [[विष्णु]] का मन्दिर नगर में विद्यमान है। नगर के द्वार के पास गौरीकुण्ड नामक सरोवर है। सरोवर के पास ही एक प्राचीन शिवलिंग है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राची त्रिवेणी==&lt;br /&gt;
नगर के द्वार से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर प्राची त्रिवेणी है। उससे पहले ही रास्ते में ब्रह्माकुण्ड नामक बावडी मिलती है। वहीं पर ब्रह्माकण्डलु नामक तीर्थ और ब्रह्मेश्वर शिवमन्दिर भी स्थित है। इससे आग्र चलने पर ‘आदिप्रभास’ तथा ‘जलप्रभास’ नामक दो कुण्डों का दर्शन होता है। [[हिरण्या नदी|हिरण्या]], [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] और [[कपिला नदी|कपिला]] नाम वाली तीन नदियों नगर से पूरब की दिशा में समुद्र में जाकर मिलती है। नगर से पूरब में इन तीनों नदियों का संगम होने के कारण ही इसे ‘प्राची त्रिवेणी’ कहा जाता है।&lt;br /&gt;
सबसे पहले ‘कपिला’ सरस्वती में मिलती है, उसके बाद ‘सरस्वती’ हिरण्या में मिलती है, फिर ‘हिरण्या’ समुद्र मे जा मिलती है। प्राचीन त्रिवेणी संगम से कुछ ही दूर पर [[सूर्य देवता|सूर्य]] भगवान का मन्दिर है। उससे आग चलने पर हिंगलाज भवानी और महादेव सिद्धनाथ का मन्दिर एक गुफा के भीतर प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ से बलदेव जी शेषरूप धारण करके पाताल में गये थे। वहीं समीप में ही श्री [[वल्लभाचार्य]]जी की बैठक है, जहाँ त्रिवेणी माता, महाकालेश्वर, श्रीराम, श्रीकृष्णऔर भीमेश्वर के मन्दिर हैं। इस स्थान को ‘देहोत्सर्ग-तीर्थ' भी कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को जब भालक-तीर्थ में बाण लगा था, उसके बाद वे यहाँ पर आ गये थे और फिर अन्तर्धान हो गये थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल्पभेद की कथा के अनुसार श्रीकृष्णचन्द्र के शरीर का यहीं अग्नि-संस्कार किया गया था। देहोत्सर्ग तीर्थ से कुछ आगे चलकर हिरण्या नदी के किनारे यादवस्थली मिलती है। ऐसी मान्यता है कि इस यादवस्थली पर ही आपस में लड़ते हुए यादवगण नष्ट हो गये थे।&lt;br /&gt;
==बाणतीर्थ==&lt;br /&gt;
वेरोवल रेलवे स्टेशन से सोमनाथ आते समय रास्ते में समुद्र के किनारे बाणतीर्थ अवस्थित है। इस तीर्थ में शशिभूषण महादेव का प्राचीन मन्दिर है। समुद्र के किनारे बाणतीर्थ से पश्चिम की ओर चन्द्रभाग तीर्थ है। इस तीर्थ में बालू (रेत) के ऊपर ही कलिलेश्वर महादेव का स्थान है। बाणतीर्थ से लगभग पाँच किलोमीटर पर भालुपुर गाँव के पास भालक-तीर्थ है। यहाँ पर पास-पास मे ही भालकुण्ड और पद्मकुण्ड नामक सरोवर हैं। यहीं पर एक पीपल-वृक्ष के नीचे भालेश्वर शिव का स्थान है। इस पेड़ को मोक्ष-पीपल भी कहा जाता है। ऐसी प्रसिद्धि है कि इसी वृक्ष के (पीपल) नीचे बैठे श्रीकृष्णचन्द्र को उनके चरण में ‘जरा’ नामक व्याध ने बाण मारा था। कहा जाता है कि उनके चरणों से बाण निकाल कर इसी भालकुण्ड में फैंक दिया था। भालकुण्ड के पास दुर्गकूट में गणेश जी का भी मन्दिर है। यहाँ एक कर्दमकुण्ड भी है, जहाँ पर कर्देश्वर-महादेव का मन्दिर है। कुछ लोग बाण तीर्थ को ही भालक तीर्थ भी कहते है। [[पुराण]] की एक  विशेष कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी को खोदकर प्रभास क्षेत्र में मुर्गी के अण्डे बराबर स्वयम्भू स्पर्शलिंग सोमनाथ के दर्शन किये उसके बाद उन्होंने उस लिंग को कुशा तथा मधु से ढँककर उस पर ब्रह्मशिला रख दी। उसी ब्रह्मशिला के उपर ब्रह्मा ने सोमनाथ के बृहद्लिंग की प्रतिष्ठा की। चन्द्रमा इसी बृहद्लिंग की अर्चना-वन्दना करने के बाद प्रजापति दक्ष के शाप से मुक्त हुऐ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात_के_ऐतिहासिक_नगर]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>नागेश्वर ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-03T11:58:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Nageshwar-Temple.jpg|नागेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Nageshwar Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री नागेश्वर / Shri Nageshwar'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग [[गुजरात]] प्रान्त के [[द्वारका]] पुरी से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यह स्थान गोमती द्वारका से बेट द्वारका जाते समय रास्ते में ही पड़ता है। द्वारका से नागेश्वर-मन्दिर के लिए बस,टैक्सी आदि सड़क मार्ग के अच्छे साधन उपलब्ध होते हैं। रेलमार्ग में [[राजकोट]] से [[जामनगर]] और जामनगर रेलवे से द्वारका पहुँचा जाता है। &lt;br /&gt;
==पौराणिक इतिहास==&lt;br /&gt;
इस प्रसिद्ध शिवलिंग की स्थापना के सम्बन्ध मे इतिहास प्रकार है–&lt;br /&gt;
एक धर्मात्मा, सदाचारी और [[शिव]] जी का अनन्य वैश्य भक्त था, जिसका नाम ‘सुप्रिय’ था। जब वह नौका (नाव) पर सवार होकर समुद्र के जलमार्ग से कहीं जा रहा था, उस समय ‘दारूक’ नामक एक भयंकर बलशाली राक्षस ने उस पर आक्रमण कर दिया। राक्षस दारूक ने सभी लोगों सहित सुप्रिय का अपहरण कर लिया और अपनी पुरी में ले जाकर उसे बन्दी बना लिया। चूँकि सुप्रिय शिव जी का अनन्य भक्त था, इसलिए वह हमेशा शिव जी की आराधना में तन्मय रहता था। कारागार में भी उसकी आराधना बन्द नहीं हुई और उसने अपने अन्य साथियों को भी शंकर जी की आराधना के प्रति जागरूक कर दिया। वे सभी शिवभक्त बन गये। कारागार में शिवभक्ति का ही बोल-बाला हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब इसकी सूचना राक्षस दारूक को मिली, तो वह क्रोध में उबल उठा। उसने देखा कि कारागार में सुप्रिय ध्यान लगाए बैठा है, तो उसे डाँटते हुए बोला– ‘अरे वैश्य! तू आँखें बन्द करके मेरे विरूद्ध कौन-सा षड्यन्त्र रच रहा है?’ वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता हुआ धमका रहा था, इसलिए उस पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घमंडी राक्षस दारूक ने अपने अनुचरों को आदेश दिया कि सुप्रिय को मार डालो। अपनी हत्या के भय से भी सुप्रिय डरा नहीं और वह भयहारी, संकटमोचक भगवान शिव को ही पुकारने में ही लगा रहा। उस समय अपने भक्त की पुकार पर भगवान शिव ने उसे कारागार में ही दर्शन दिया। कारागार में एक ऊँचे स्थान पर चमकीले सिंहासन पर स्थित भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में उसे दिखाई दिये। शंकरजी ने उस समय सुप्रिय वैश्य का अपना एक पाशुपतास्त्र भी दिया और उसके बाद वे अन्तर्धान (लुप्त) हो गये। पाशुपतास्त्र (अस्त्र) प्राप्त करने के बाद सुप्रिय ने उसक बल से समचे राक्षसों का संहार कर डाला और अन्त में वह स्वयं शिवलोक को प्राप्त हुआ। भगवान् शिव के निर्देशानुसार ही उस शिवलिंग का नाम ‘नागेश्वर ज्योतिर्लिंग’ पड़ा। ‘नागेश्वर ज्योतिर्लिंग’ के दर्शन करने के बाद जो मनुष्य उसकी उत्पत्ति और माहात्म्य सम्बन्धी कथा का सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण भौतिक और आध्यात्मिक सुखों को प्राप्त करता है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
एतद् य: श्रृणुयान्नित्यं नागेशद्भवमादरात्।&lt;br /&gt;
सर्वान् कामनियाद् धीमान् महापातकनशनान्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त नागेश्वर नाम से दो अन्य शिवलिंगों की भी चर्चा ग्रन्थों में प्राप्त होती है। मतान्तर से इन लिंगों को भी कुछ लोग ‘नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहते हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग निजाम [[हैदराबाद]], [[आन्ध्र प्रदेश]] ग्राम में अवस्थित हैं मनमाड से द्रोणाचलम तक जाने वाली रेलवे पर परभनी नामक प्रसिद्ध स्टेशन है। परभनी से कुछ ही दूरी पर पूर्णा जंक्शन है, जहाँ से रेलमार्ग पर ‘चारेंडी’ नामक स्टेशन है, जहाँ से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी ‘औढ़ाग्राम’ है। स्टेशन से मोटरमार्ग द्वारा ‘औढ़ाग्राम’ पहुँचा जाता है।&lt;br /&gt;
*इसी प्रकार [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[अल्मोड़ा]] जनपद मे एक ‘योगेश या ‘जागेश्वर शिवलिंग’ अवस्थित है, जिसे नागेश्वर ज्योतिर्लिंग’ बताया जाता है। यह स्थान अल्मोड़ा से लगभग 25 किलोमीटर उत्तर पूर्व की ओर है, जिसकी दूरी [[नैनीताल]] से लगभग 100 किलोमीटर है। यद्यपि [[शिव पुराण]] के अनुसार समुद्र के किनारे [[द्वारका]] पुरी के पास स्थित शिवलिंग ही ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रमाणित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक कारण==&lt;br /&gt;
‘जागेश्वर शिवलिंग को नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहने या मानने के कुछ प्रमुख ऐतिहासिक कारण इस प्रकार हैं-–&lt;br /&gt;
*द्वादश ज्योतिर्लिंगों के पाठ में ‘नागेश दारूकावने’ ऐसा उल्लेख मिलता है। अल्मोड़ा के समीप स्थित शिवलिंग जागेश्वर के नाम से जाना जाता है। ऐसी स्थिति में ‘योगेश’ किस प्रकार नागेश बन गये? इस सन्दर्भ में ध्यान देने योग्य बात यह है कि कश्मीर प्रान्त के पहाड़ियों तथा विभिन्न मैदानी क्षेत्रों से अनेक उनमें पौण्ड्रक, द्रविड, कम्बोज, यवन, शक पल्लव, राद, किरात, दरद, नाग और खस आदि प्रमुख थीं। [[महाभारत]] के अनुसार ये सभी जातियाँ बहुत पराक्रमी तथा सभ्यता-सम्पन्न थीं। जब [[पाण्डव|पाण्डवों]] को इन लोगों से संघर्ष करना पड़ा तब उन्हें भी ज्ञान हुआ कि ये सभी क्षत्रिय धर्म और उसके गुणों से सम्पन्न हैं।&lt;br /&gt;
*इतिहास के पन्नों को देखने से यह भी ज्ञात होता है कि [[कुमाऊँ]] की अनार्य जातियों ने भी ब्राह्मण धर्म मे प्रवेश पाने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहीं। [[वसिष्ठ]] और [[विश्वामित्र]] के बीच वर्षो तक चला संघर्ष इसी आशय का प्रतीक है। श्री ओकले साहब ने उपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘पवित्र हिमालय’ में लिखा है कि कश्मीर और [[हिमालय]] के [[गढ़वाल]] क्षेत्र में नाग लोगों की एक जाति रहती है। ओकले के अनुसार सर्प की पूजा करने के कारण ही उन्हें ‘नाग’ कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*राई डेविडस् जो एक प्रसिद्ध बौद्ध लेखक थे, उनका मत है कि पुराने बौद्ध काल में चित्रों और मूर्तियों में मनुष्य तथा साँप के जुड़े हुए स्वरूप में नाग पूजा को अंकित किया गया है। यह प्रथा आज भी गढ़वाल तथा कुमाऊँ में प्रचलित है। &lt;br /&gt;
*एटकिंशन नामक विद्वान का भी यही अभिमत है, जिन्होंने ‘हिमालय डिस्ट्रिक्स’ नामक ग्रन्थ लिखा है, गढ़वाल के अधिकांशत: मन्दिरों में आज भी नागपूजा होती चली आ रही है। &lt;br /&gt;
*जागेश्वर शिवमन्दिर जहाँ अवस्थित है, उसके आसपास में आज भी वेरीनाग, धौलेनाग, कालियनाग आदि स्थान विद्यमान हैं, जिनमें ‘नाग’ शब्द उस नाग जाति की याद दिलाता है। उनके आधार पर यह बात तर्क संगत लगती है कि इन नाग-मन्दिरों के बीच ‘नागेश’ नामक कोई बड़ा मन्दिर प्राचीनकाल से कुमाऊँ में विद्यमान है। पौराणिक धर्म और भूत-प्रेतों की पूजा की भी शिवोपासना में गणना की गई है। &lt;br /&gt;
*[[आदि जगद्गुरू श्री शंकराचार्य]] के मत और सिद्धान्त के प्रचार से पहले कुमाऊँ के लोगों को ‘पाशुपतेश्वर’ का नाम नहीं मालूम था। इन देवों की बलि पूजा होती थी या नहीं, यह कहना कठिन है, किन्तु इतिहास के पृष्ठों से इतना तो निश्चित है कि काठमाण्डू, नेपाल के ‘पाशुपतिनाथ, और कुमाऊँ में ‘यागेश्वर’ के ‘पाशुपतेश्वर’ दोनों वैदिक काल से पूजनीय देवस्थान हैं। पवित्र [[हिमालय]] की सम्पूर्ण चोटियों को तपस्वी भगवान शिवमूर्तियों के रूप में स्वीकार किया जाता है, किन्तु [[कैलास पर्वत]] को तो आदि काल से नैसर्गिक शिव मन्दिर बताया गया है। *इन सब बातों से स्पष्ट है कि कुमाऊँ मण्डल में शिवपूजन का प्रचलन अतीव प्राचीन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक प्रसिद्ध आख्यायिका के अनुसार ‘यागेश्वर मन्दिर’ हिमालय के उत्तर पश्चिम की ओर अवस्थित है तथा यहाँ सघन देवदार का वन है। इस मन्दिर का निर्माण तिब्बतीय और आर्य शैली का मिला जुला स्वरूप है। जागेश्वर-मन्दिर के अवलोकन से पता चलता है कि इसका निर्माण कम से कम 2500 वर्षों पूर्व का है। इसके समीप मृत्युंजय और डिण्डेश्वर-मन्दिर भी उतने ही पुराने हैं। जागेश्वर-मन्दिर शिव-शक्ति की प्रतिमाएँ और दरवाजों के द्वारपालों की मूर्तियाँ भी उक्त प्रकार की अत्यन्त प्राचीन हैं। जागेश्वर-मन्दिर में राजा दीपचन्द की चाँदी की मूर्ति भी स्थापित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्कन्द पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[स्कन्द पुराण]] के मानस खण्ड और रेवा खण्ड में गढ़वाल तथा कुमाऊँ के पवित्र तीर्थो का वर्णन मिलता है। चीनी यात्री [[हुएन-सांग|ह्रेनसांग]] ने [[बौद्ध धर्म]] की खोज में कुमाऊँ की यात्रा की थी। &lt;br /&gt;
==कुमाऊँ और कोसल राज्य==&lt;br /&gt;
कुमाऊँ [[कोसल]] राज्य का ही एक भाग था। कुमाऊँ में वैदिक तथा बौद्ध धर्म समानान्तर रूप से प्रचलित थे। मल्ल राजाओं ने भी पाशुपतेश्वर या जागेश्वर के दर्शन किये थे तथा जागेश्वर को कुछ गाँव उपहार में समर्पित किये थे। चन्द राजाओं की जागेश्वर के प्रति अटूट श्रृद्धा थी। इनका राज्य कुमाऊँ की पहाड़ियों तथा तराईभाँवर के बीच था। देवीचन्द, कल्याणचन्द, रतनचन्द, रूद्रचन्द्र आदि राजाओं ने जागेश्वर-मन्दिर को गाँव तथा बहुत-सा धन दान में दिये थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1740 में अलीमुहम्मद खाँ ने अपने रूहेला सैनिकों के साथ कुमाऊँ पर आक्रमण किया था। उसके सैनिकों ने भारी तबाही मचाई और अल्मोड़ा तक के मन्दिरों को भ्रष्ट कर उनकी मूर्तियों को तोड़ डाला। उन दुष्टों ने जागेश्वर-मन्दिर पर भी धावा बोला था, किन्तु ईश्वर इच्छा से वे असफल रहे। सघन देवदार के जंगल से लाखों बर्र निकलकर उन सैनिकों पर टूट पड़े और वे सभी भाग खड़े हुए। उनमें से कुछ कुमाऊँ निवासियों द्वारा मार दिये गये, तो कुछ सर्दी से मर गये। &lt;br /&gt;
==बौद्धों के समय में==&lt;br /&gt;
बौद्धों के समय में भगवान 'बदरी विशाल' की प्रतिमा की तरह जागेश्वर की देव-प्रतिमाएँ भी सूर्य कुण्ड में कुछ दिनों तक पड़ रहीं। अपने दिग्विजय-यात्रा के दौरान [[आदि जगद्गुरू शंकराचार्य]] ने पुन: मूर्तियों को स्थापित किया और जागेश्वर-मन्दिर की पूजा का दायित्त्व दक्षिण भारतीय कुमारस्वामी को सौंप दिया।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार प्राचीन इतिहास का अवलोकन करने से ज्ञात होता है। कि जागेश्वर-मन्दिर अत्यन्त प्राचीन काल का है और नाग जातियों के द्वारा इस शिवलिंग की पूजा होने के कारण इसे ‘यागेश’ या ‘नागेश’ कहा जाने लगा। इसी के कारण इसे ‘नागेश्वर ज्योतिर्लिंग’ मानने के पर्याप्त आधार मिल जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवपुराण की कथा== &lt;br /&gt;
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में श्री [[शिव पुराण]] की कथा इस प्रकार है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘दारूका’ नाम की एक प्रसिद्ध राक्षसी थी, जो [[पार्वती देवी|पार्वती]] जी से वरदान प्राप्त कर अहंकार में चूर रहती थी। उसका पति ‘दारूका’ महान बलशाली राक्षस था। उसने बहुत से राक्षसों को अपने साथ लेकर समाज में आतंक फैलाया हुआ था। वह यज्ञ आदि शुभ कर्मों को नष्ट करता हुआ सन्त-महात्माओं का संहार करता था। वह प्रसिद्ध धर्मनाशक राक्षस था। पश्चिम समुद्र के किनारे सभी प्रकार की सम्पदाओं से भरपूर सोलह योजन विस्तृत पर उसका एक वन था, जिसमें वह निवास करता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दारूका जहाँ भी जाती थी, वृक्षों तथा विविध उपकरणों से सुसज्जित वह वनभूमि अपने विलास के लिए साथ-साथ ले जाती थी। महादेवी पार्वती ने उस वन की देखभाल का दायित्त्व दारूका को ही सौंपा था। जो उनके वरदान के प्रभाव से उसके ही पास रहता था। उससे पीड़ित आम जनता ने महर्षि और्व के पास जाकर अपना कष्ट सुनाया। शरणागतों की रक्षा का धर्म पालन करते हुए महर्षि और्व ने राक्षसों को शाप दे दिया। उन्होंने कहा कि ‘जो राक्षस इस पृथ्वी पर प्राणियों की हिंसा और यज्ञों का विनाश करेगा, उसी समय वह अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा। महर्षि और्व द्वारा दिये गये शाप की सूचना जब देवताओं को मालूम हुई, तब उन्होंने दुराचारी राक्षसों पर चढ़ाई कर दी। राक्षसों पर भारी संकट आ पड़ा। यदि वे युद्ध में देवताओं को मरते हैं, तो शाप के कारण स्वयं मर जाएँगे और यदि उन्हें नहीं मारते हैं, तो पराजित होकर स्वयं भूखों मर जाएँगे। उस समय दारूका ने राक्षसों को सहारा दिया और भवानी के वरदान का प्रयोग करते हुए वह सम्पूर्ण वन को लेकर समुद्र में जा बसी। इस प्रकार राक्षसों ने धरती को छोड़ दिया और निर्भयतापूर्वक समुद्र में निवास करते हुए वहाँ भी प्राणियों को सताने लगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार उस समुद्र में मनुष्यों से भरी बहुत-सारी नौकाएँ जा रही थीं, जिन्हें उन राक्षसों ने पकड़ लिया। सभी लोगों को बेड़ियों से बाँधकर उन्हें कारागार में बन्द कर दिया गया। राक्षस उन यात्रियों को बार-बार धमकाने लगे। एक ‘सुप्रिय’ नामक वैश्य उस यात्री दल का अगुवा (नेता) था, जो बड़ा ही सदाचारी था। वह ललाट पर भस्म, गले में [[रुद्राक्ष]] की माला डालकर भगवान [[शिव]] की भक्ति करता था। सुप्रिय बिना शिव जी की पूजा किये कभी भी भोजन नहीं करता था। उसने अपने बहुत से साथियों को भी शिव जी का भजन-पूजन सिखला दिया था। उसके सभी साथी ‘नम: शिवाय’ का जप करते थे तथा शिव जी का ध्यान भी करते थे। सुप्रिय परम भक्त था, इसलिए उसे शिव जी का दर्शन भी प्राप्त होता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस विषय की सूचना जब राक्षस दारूका को मिली, तो वह करागार में आकर सुप्रिय सहित सभी को धमकाने लगा। मारने के लिए दौड़ पड़े। मारने के लिए आये राक्षसों को देखकर भयभीत सुप्रिय ने कातरस्वर से भगवान् शिव को पुकारा, उनका चिन्तन किया और वह उनके नाम-मन्त्र का जप करने लगा। उसने कहा- देवेश्वर शिव! हमारी रक्षा करें, हमें इन दुष्ट राक्षसों से बचाइए। देव! आप ही हमारे सर्वस्व हैं, आप ही मेरे जीवन और प्राण हैं। इस प्रकार सुप्रिय वैश्य की प्रार्थना को सुनकर भगवान शिव एक विवर अर्थात बिल से प्रकट हो गये। उनके साथ ही चार दरवाजों का एक सुन्दर मन्दिर प्रकट हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस मन्दिर के मध्यभाग में (गर्भगृह) में एक दिव्य ज्योतिर्लिंग प्रकाशित हो रहा था तथा शिव परिवार के सभी सदस्य भी उसके साथ विद्यमान थे। वैश्य सुप्रिय ने शिव परिवार सहित उस &amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ज्योतिर्लिंग का दर्शन और पूजन किया–&lt;br /&gt;
इति सं प्रार्थित: शम्भुर्विवरान्निर्गतस्तदा।&lt;br /&gt;
भवनेनोत्तमेनाथ चतुर्द्वारयुतेन च।।&lt;br /&gt;
मध्ये ज्योति:स्वरूपं च शिवरूपं तदद्भुतम्।&lt;br /&gt;
परिवारसमायुक्तं दृष्टवा चापूजयत्स वै।।&lt;br /&gt;
पूजितश्च तदा शम्भु: प्रसन्नौ ह्यभवत्स्वयम्।&lt;br /&gt;
अस्त्रं पाशुपतं नाम दत्त्वा राक्षसपुंगवान्।।&lt;br /&gt;
जघान सोपकरणांस्तान्सर्वान्सगणान्द्रुतम्।&lt;br /&gt;
अरक्षच्च स्वभक्तं वै दुष्टहा स हि शंकर:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिवपुराण कोटि रूद्र संहिता 30/10-13&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                      &lt;br /&gt;
सुप्रिय के पूजन से प्रसन्न भगवान शिव ने स्वयं पाशुपतास्त्र लेकर प्रमुख राक्षसों को, उनके अनुचरों को तथा उनके सारे संसाधनों (अस्त्र-शस्त्र) को नष्ट कर दिया। लीला करने के लिए स्वयं शरीर धारण करने वाले भगवान शिव ने अपने भक्त सुप्रिय आदि की रक्षा करने के बाद उस वन को भी यह वर दिया कि ‘आज से इस वन में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र- इन चारों वर्णों के धर्मों का पालन किया जाएगा। इस वन में शिव धर्म के प्रचारक श्रेष्ठ ऋषि-मुनि निवास करेंगे और यहाँ तामसिक दुष्ट राक्षसों के लिए कोई स्थान न होगा।’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राक्षसों पर आये इसी भारी संकट को देखकर राक्षसी दारूका ने दैन्यभाव (दीनता के साथ) से देवी पार्वती की स्तुति, विनती आदि की। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न माता पार्वती ने पूछा– ‘बताओं, मैं तेरा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’! दारूका ने कहा– ‘माँ! आप मेरे कुल (वंश) की रक्षा करें।’ पार्वती ने उसके कुल की रक्षा का आश्वासन देते हुए भगवान शिव से कहा– ‘नाथ! आपकी कही हुई बात इस युग के अन्त में सत्य होगी, तब तक यह तामसिक सृष्टि भी चलती रहे, ऐसा मेरा विचार है।’ माता पार्वती शिव से आग्रह करती हुईं बोलीं कि ‘मैं भी आपके आश्रय में रहने वाली हूँ, आपकी ही हूँ, इसलिए मेरे द्वारा दिये गये वचन को भी आप सत्य (प्रमाणित) करें। यह राक्षसी दारूका राक्षसियों में बलिष्ठ, मेरी ही शक्ति तथा देवी है। इसलिए यह राक्षसों के राज्य का शासन करेगी। ये राक्षसों की पत्नियाँ अपने राक्षसपुत्रों को पैदा करेगी, जो मिल-जुलकर इस वन में निवास करेंगे-ऐसा मेरा विचार है।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता पार्वती के उक्त प्रकार के आग्रह को सुनकर भगवान शिव ने उनसे कहा– ‘प्रिय! तुम मेरी भी बात सुनो। मैं भक्तों का पालन तथा उनकी सुरक्षा के लिए प्रसन्नतापूर्वक इस वन में निवास करूँगा। जो मनुष्य वर्णाश्रम-धर्म का पालन करते हुए श्रद्धा-भक्तिपूर्वक मेरा दर्शन करेगा, वह चक्रवर्ती राजा बनेगा। [[कलि युग]] के अन्त में तथा [[सत युग]] के प्रारम्भ में महासेन का पुत्र वीरसेन राजाओं का महाराज होगा। वह मेरा परम भक्त तथा बड़ा पराक्रमी होगा। जब वह इस वन में आकर मेरा दर्शन करेगा। उसके बाद वह चक्रवर्ती सम्राट हो जाएगा।’ तत्पश्चात बड़ी-बड़ी लीलाएँ करने वाले शिव-दम्पत्ति ने आपस में हास्य-विलास की बातें की और वहीं पर स्थित हो गये। इस प्रकार शिवभक्तों को प्रिय ज्योतिर्लिंग स्वरूप भगवान शिव ‘नागेश्वर’ कहलाये और शिवा (पार्वती) देवी भी ‘नागेश्वरी’ के नाम से विख्यात हुईं। इस प्रकार शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए हैं, जो तीनों लोगों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। जो कोई इस नागेश्वर महादेव के आविर्भाव की कथा को श्रद्धा-प्रेम पूर्वक सुनता है, उसके समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं और वह अपने सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को प्राप्त कर लेता है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इति दत्तवर: सोऽपि शिवेन परमात्मना।&lt;br /&gt;
शक्त: सर्वं तदा कर्त्तु सम्बभूव न संशय:।।&lt;br /&gt;
एवं नागेश्वरो देव उत्पन्नो ज्योतिषां पति:।&lt;br /&gt;
लिंगस्पस्त्रिलोकस्य सर्वकामप्रद: सदा।।&lt;br /&gt;
एतद्य: श्रृणुयान्नित्यं नागेशोद्भवमादरात्।&lt;br /&gt;
सर्वान्कामानियाद्धिमान्ममहापातक नाशनान्।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिवपुराण कोटि रूद्र संहिता 30/42-44&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                       &lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category: गुजरात के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&amp;diff=18229</id>
		<title>घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-03T11:56:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Grishneshwar-Temple.jpg|घुश्मेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Ghushmeshwar Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री घुश्मेश्वर / Ghushmeshwar'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचें== &lt;br /&gt;
श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग  भारत के [[महाराष्ट्र]] प्रांत में [[दौलताबाद]] स्टेशन से बारह मील दूर अवस्थित है। यह घुश्मेश्वर मन्दिर वेरूल गाँव के पास है, जो [[दौलताबाद]] रेलवे-स्टेशन से लगभग अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ मध्य रेलवे के [[मनमाड]]-पूर्णा मार्ग से मनमाड से लगभग 100 किलोमीटर पर दौलताबाद स्टेशन पड़ता है। दौलताबाद से आगे [[औरंगाबाद]] रेलवे-स्टेशन है। यहाँ से वेरूल जाने का अच्छा मोटरमार्ग है, जहाँ से विविध प्रकार के वाहन सुलभ होते हैं। दौलताबाद से वेरूल का मार्ग पहाड़ी है, किन्तु उसकी प्राकृतिक शोभा बड़ी मनोहारी है। &lt;br /&gt;
==श्री घुश्मेश्वर के नाम==&lt;br /&gt;
घुश्मेश्वर को लोग घुसृणेश्वर और घृष्णेश्वर भी कहते हैं। घृष्णेश्वर से लगभग आठ किलोमीटर दूर दक्षिण में एक पहाड़ की चोटी पर दौलताबाद का किला मौजूद है। यहाँ पर भी धारेश्वर शिवलिंग स्थित है। यहीं पर श्री एकनाथ जी के गुरू श्री जनार्दन महाराज जी की समाधि भी है। &lt;br /&gt;
==एलोरा की गुफाएँ==&lt;br /&gt;
यहाँ से आगे कुछ दूर जाकर इतिहास प्रसिद्ध एलोरा की दर्शनीय गुफाएँ हैं। एलोरा की इन गुफाओं मे कैलास नाम की गुफा सर्वश्रेष्ठ और अति सुन्दर है। पहाड़ को काट-काटकर इस गुफा का निर्माण किया गया है। कैलास गुफा की कलाकारी दर्शकों के मन को मुग्ध कर देती है। यहाँ मात्र हिन्दू धर्मावलम्बी ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोग एलोरा की कलाओं से आकर्षित होते हैं। एलोरा की रमणीयता को देखकर उससे प्रभावित होगर [[बौद्ध]], [[जैन]] तथा मुसलमान आदि धर्मावलाम्बियों ने भी उसकी सुरम्य पहाड़ियों पर अपने-अपने स्थान बनाये हैं। कैलास गुफा से बेहद प्रभावित एक पश्चिमी विद्वान श्यावेल ने दक्षिण भारत के सभी मन्दिरो का निर्माण-आधार (नमूना) कैलास को ही स्वीकार किया है।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
कुछ ऐसे भी लोग है, जो इलोरा कैलास-मन्दिर को घुश्मेश्वर का प्राचीन स्थान मानते हैं। यहाँ के अति प्राचीन स्थानों में श्री घृष्णेश्वर [[शिव]] और [[देवगिरि दुर्ग]] के मध्य में स्थित सहस्रलिंग, पातालेश्चर व सूर्येश्वर हैं। इसी प्रकार सूर्य कुण्ड तथा शिव कुण्ड नामक सरोवर भी अति प्राचीन हैं। इस पहाड़ी की प्राकृतिक बनावट भी कुछ ऐसी ही है, जो सबके मन को अपनी ओर खींच लेती है। [[शिव पुराण]] के ज्ञान संहिता में लिखा है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ईदृशं चैव लिंग च दृष्ट्वा पापै: प्रमुच्यते।&lt;br /&gt;
सुखं संवर्धते पुंसां शुक्लपक्षे यथा शशी।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्थात् ‘घुश्मेश्वर महादेव के दर्शन करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा उसी प्रकार सुख-समृद्धि होती है, जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की।’ &lt;br /&gt;
==शिव महापुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
श्री शिवमहापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार बतायी गई है–&lt;br /&gt;
‘अद्भभुत तथा नित्य परम शोभा सम्पन्न देवगिरि नामक पर्वत दक्षिण दिशा में अवस्थित है। उस पर्वत के समीप में भारद्वाज कुल में उत्पन्न एक सुधर्मा नामक ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्म को जानने वाला) ब्राह्मण निवास करते थे। सदा शिव धर्म के पालन में तत्पर रहने वाली उनकी पत्नी का नाम सुदेहा था। वह कुशलतापूर्वक अपने घर के कार्यों को करती हुई पति की भी सब प्रकार से सेवा करती थी। ब्राह्मण श्रेष्ठ सुधर्मा भी देवताओं तथा अतिथियों के पूजक थे। वे वैदिक सनातन धर्म के नियम का अनुसरण करते हुए नित्य अग्निहोत्र करते थे। त्रिकाल सन्ध्या (सुबह, दोपहर और शाम) करने के कारण उनके शरीर की कान्ति [[सूर्य देवता|सूर्य]] की भाँति उद्दीप्त हो रही थी। [[वेद]] शास्त्रों के मर्मज्ञ (ज्ञाता) होने के कारण वे शिष्यों को पढ़ाया भी करते थे। वे धनवान तथा दानी भी थे। वे सज्जनता तथा विविध सद्गुणों के अधिष्ठान अर्थात पात्र थे। स्वयं शिव भक्त होने के कारण सदा शिव जी आराधना में लगे रहते थे तथा उन्हें शिव भक्त परम प्रिय थे। शिव भक्त भी उन्हें बड़ा प्रेम देते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतना सब कुछ होने पर भी सुधर्मा को कोई सन्तान न थी। यद्यपि उस ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण का कोई कष्ट न था, किन्तु उनकी धर्मपत्नी सुदेहा बड़ी दु:खी रहती थी। उसके पड़ोसी तथा अन्य लोग भी उसे नि:सन्तान होने का ताना मारा करते थे, जिसके कारण अपने पति से बार-बार पुत्रप्राप्ति हेतु प्रार्थना करती थी। उसके पति उस मिथ्या संसार के सम्बन्ध में उसे ज्ञान का उपदेश दिया करते थे, फिर भी उसका मन नहीं मानता था। उस ब्राह्मणदेव ने भी पुत्रप्राप्ति के लिए कुछ उपाय किये, किन्तु असफल रहे। उसके बाद अत्यन्त दु:खी उस ब्राह्मणी ने अपनी छोटी बहन घुश्मा के साथ अपने पति का दूसरा विवाह करा दिया। सुधर्मा ने द्वितीय विवाह से पूर्व अपनी पत्नी को बहुत समझाया था कि तुम इस समय अपनी बहन से प्यार कर रहीं हो, इसलिए मेरा विवाह करा रही हो, किन्तु जब इसे पुत्र उत्पन्न होगा,तो तुम उससे ईर्ष्या करने लगोगी। सुदेहा ने संकल्प लिया था कि वह कभी भी अपनी बहन से ईर्ष्या नहीं करेगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाह के बाद घुश्मा एक दासी की तरह अपनी बड़ी बहन की सेवा करती थी तथी सुदेहा भी उससे अतिशय प्यार करती थी। अपनी बहन की शिव भक्ति से प्रभावित होकर उसके आदेश के अनुसार घुश्मा भी शिव जी का एक सौ एक पार्थिव लिंग (मिट्टी शिवलिंग) बनाकर पूजा करती थी। पूजा करने के बाद उन शिवलिंगों को समीप के तालाब में विसर्जित कर देती थी–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कनिष्ठा चैव पत्नी स्वस्रनुज्ञामवाप्य च।&lt;br /&gt;
पार्थिवान्सा चकाराशु नित्यमेकोत्तरं शतम्।।&lt;br /&gt;
विधानपूर्वकं घुश्मा सोपचारसमन्वितम्।&lt;br /&gt;
वृत्वा तान्प्राक्षिपत्तत्र तडागे निकटस्थिते।।&lt;br /&gt;
एवं नित्यं सा चकार शिवपूजां सवकामदाम्।&lt;br /&gt;
विसृज्य पुनरावाह्य तत्सपर्याविधानत:।।&lt;br /&gt;
कुर्वन्त्या नित्यमेवं हि तस्या: शंकरपूजनम्।&lt;br /&gt;
लक्षसंख्याऽभवत्पूर्णा सर्वकाम फलप्रदा।।&lt;br /&gt;
कृपया शंकरस्यैव तस्या: पुत्रो व्यजायत।&lt;br /&gt;
सुन्दर: सुभगश्चैव कल्याणगुणभाजन:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्री शिवपुराण कोटि रूद्र संहिता 32/45-49&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शंकर की कृपा से घुश्मा को एक सुन्दर भाग्यशाली तथा सद्गुण सम्पन्न पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र प्राप्ति से जब घुश्मा का कुछ मान बढ़ गया, तब सुदेहा को ईर्ष्या पैदा हो गई। समय के साथ जब पुत्र बड़ा हो गया, तो विवाह कर दिया गया और पुत्रवधू भी घर में आ गई। यह सब देखकर सुदेहा और अधिक जलने लगी। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, जिसके कारण उसने अनिष्ट करने की ठान ली। एक दिन रात्रि में उसने सोते समय घुश्मा के पुत्र के शरीर को चाकू से टुकड़े-टुकड़े कर दिया और शव को समेटकर वहीं पास के सरोवर में डाल दिया, जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंग का विसर्जन करती थी। सुदेहा शव को तालाब में फेंककर आ गई और आराम से घर में सो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिदिन की भाँति घृश्मा अपने पूजा कृत्य में लग गई और ब्राह्मण सुधर्मा भी अपने नित्यकर्म में लग गये। सुदेहा भी जब सुबह उठी तो, उसके हृदय में जलने वाली ईर्ष्या की आग अब बुझ चुकी थी, इसलिए वह भी आनन्दपूर्वक घर के काम-काज में जुट गई। जब बहू की नींद खुली, तो उसने देखा कि उसका पति बिस्तर पर नहीं है। बिस्तर भी खून में सना है तथा शरीर के कुछ टुकड़े पड़े दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य देखकर दु:खी बहू ने अपनी सास घुश्मा के पास जाकर निवेदन किया और पूछा कि आपके पुत्र कहाँ गये हैं? उसने रक्त से भीगी शैय्या की स्थिति भी बताई और विलाप करने लगी– ‘हाय मैं तो मारी गयी। किसने यह क्रूर व्यवहार किया है?’ इस प्रकार वह पुत्रवधू करूण विलाप करती हुई रोने लगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुधर्मा की बड़ी पत्नी सुदेहा भी उसके साथ ‘हाय!’ ऐसा बोलती हुई शोक में डूब गई। यद्यपि वह ऊपर से दु:ख व्यक्त कर रही थी, किन्तु मन ही मन बहुत प्रसन्न थी। अपनी प्रिय वधू के कष्ट और क्रन्दन (रोना) को सुनकर भी घुश्मा विचलित नहीं हुई और वह अपने पार्थिव-पूजन व्रत मे लगी रही। उसका मन बेटे को देखने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हुआ। इसी प्रकार ब्राह्मण सुधर्मा भी अपने नित्य पूजा-कर्म में लगे रहे। उन दोनों ने भगवान के पूजन में किसी अन्य विघ्न की चिन्ता नहीं की। दोपहर को जब पूजन समाप्त हुआ, तब घुश्मा ने अपने पुत्र की भयानक शैय्या को देखा। देखकर भी उसे किसी प्रकार का दु:ख नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने विचार किया, जिसने मुझे यह पुत्र दिया है, वे ही उसकी रक्षा भी करेंगे। वे तो भक्तप्रिय हैं, कालों के भी काल हैं तथा सत्पुरूषों के मात्र आश्रय हैं। वे ही सर्वेश्वर प्रभु हमारे भी संरक्षक हैं। वे माला गूँथने वाले माली की तरह जिनको जोड़ते हैं, उन्हें अलग-अलग भी करते हैं। मैं अब चिन्ता करके क्या कर सकती हूँ। इस प्रकार सांसारिक तत्त्वों का विचार कर उसने शिव के भरोसे धैर्य धारण कर लिया, किन्तु शोक का अनुभव नहीं किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिदिन की तरह वह 'नम: शिवाय' का उच्चारण करती हुई उन पार्थिव लिंगों को लेकर सरोवर के तट पर गई। जब उसने पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर वापस होने की चेष्टा की, तो उसका अपना पुत्र उस सरोवर के किनारे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा। अपने पुत्र को देखकर घुश्मा के मन में न तो प्रसन्नता हुई और न ही किसी प्रकार का कष्ट हुआ। इतने में ही परम सन्तुष्ट ज्योति: स्वरूप महेश्वर [[शिव]] उसके सामने प्रकट हो गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव ने कहा कि ‘मै’ तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम वर माँगों। तुम्हारी सौत ने इस बच्चे को मार डाला था, अत: मैं भी उसे त्रिशूल से मार डालूँगा। घुश्मा ने श्रद्धा-निष्ठा के साथ महेश्वर को प्रणाम किया और कहा कि सुदेहा मेरी बड़ी बहन है, कृपया आप उसकी रक्षा करे। शिव ने कहा कि सुदेहा ने तुम्हारा बड़ा अनिष्ट किया है, फिर तुम उसका उपकार क्यों करना चाहती हो? वह दुष्टा तो सर्वदा मार डालने के योग्य है। ‘घुश्मा’ हाथ जोडकर प्रार्थना करने लगी– ‘देव! आपके दर्शन मात्र से सारे पातक भस्म हो जाते हैं। हमने तो ऐसा ही सुना है कि अपकार करने वाले (अनिष्ट करने वाले) पर जो उपकार करता है, उसके भी दर्शन से पाप बहुत दूर भाग जाता है। सदाशिव जो कुकर्म करने वाला है, वही करे, भला मैं दुष्कर्म क्यों करूँ? मुझे तो बुरा करने वाले की भी भलाई करना ही अच्छा लगता है।’ भगचानि शिव घुश्मा के भक्तिपूर्ण विकार शून्य स्वभाव से अत्यन्त प्रसन्न हो उठ। दयासिन्धु महेश्वर ने कहा– ‘घुश्मा! तुम्हारे हित के लिए मैं तुम्हें कोई वर अवश्य दूँगा। इसलिए तुम कोई और वर माँगो।’ उसने कहा– ‘महादेव! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो लोगों की रक्षा और कल्याण के लिए आप यहीं सदा निवास करें और आपकी ख्याति मेरे ही नाम से संसार में होवे’–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सोवाच तद्वच: श्रुत्वा यदि देयो वरस्त्वया।&lt;br /&gt;
लोकानां चैव रक्षार्थमत्र स्थेयं मदाख्यया।।&lt;br /&gt;
तदोवाच शिवस्तत्र सुप्रसन्नो महेश्वर:।&lt;br /&gt;
स्थास्येऽत्र तव नाम्नाहं घुश्मेशाख्य: सुखप्रद:।।&lt;br /&gt;
घुश्मेशाख्यं सुप्रसद्धि लिंग मे जायतां शुभम्।&lt;br /&gt;
इदं सरस्तु लिंगानामालयं जायतां सदा।।&lt;br /&gt;
तस्यामच्छिवालयं नाम प्रसिद्धं भुवनत्रये।&lt;br /&gt;
सर्वकामप्रदं ह्योयद्दर्शनात्स्यात्सदा सर:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिवपुराण कोटि रूद्र संहिता 33/43-46&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घुश्मा की प्रार्थना और वर-याचना से प्रसन्न महेश्वर शिव ने उससे कहा कि मैं सब लोगों को सुख देने के लिए हमेशा यहाँ निवास करूँगा। मेरा ज्योतिर्लिंग ‘घुश्मेश’ के नाम से संसार में प्रसिद्ध होगा। यह सरोवर भी शिवलिंग का आलय अर्थात घर बन जाएगा और इसीलिए यह संसार में शिवालय के नाम से प्रसिद्ध होगा। इस सरोवर का दर्शन करने से सब प्रकार के अभीष्ट प्राप्त होंगे। भगवान शिव ने आशीर्वचन बोलते हुए घुश्मा से कहा कि तुम्हारे एक सौ एक पीढ़ियों तक ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ करेंगे। वे सभी सन्तानें उत्तम गुणों से सम्पन्न, सुन्दरी स्त्रियाँ, धन-वैभव, विद्या-बुद्धि और दीर्घायुष्य से युक्त होंगे। वे भोग और मोक्ष दोनों प्राकर के लाभ पाने के पात्र होंगे। तुम्हारे एक सौ एक पीढ़ियों तक वंश का विस्तार शोभादायक, यशस्वी तथा आनन्दवर्द्धक होगा’ इस प्रकार घुश्मा को वरदान देते हुए भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं स्थित हो गये। ‘घुश्मेश’ नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई और सरोवर भी शिवालय के नाम से विख्यात हुआ। सुधर्मा, घुश्मा तथा सुदेहा ने भी उस शिवलिंग की तत्काल एक सौ एक परिक्रमा दाहिनी ओर से की पूजा करने के बाद परिवार के सभी सदस्यों के मन की मलीनता दूर हो गई। पुत्र को जीवित देखकर सुदेहा बड़ी लज्जित हुई और उसने अपने पति तथा बहन घुश्मा से क्षमा याचना कर प्रायश्चित के द्वारा पाप का शोधन किया। इस प्रकार घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का आविर्भाव हुआ, जिसका दर्शन और पूजन करने से सब प्रकार के सुखों की वृद्धि होती है। जगद्गुरू आदि शंकराचार्य ने घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रार्थना इस प्रकार की है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इलापुरे रम्याविशालकेऽस्मिन्।&lt;br /&gt;
समुल्लसन्तं च जगदवरेण्यम्।।&lt;br /&gt;
वन्दे महोदारतरस्वभावं।&lt;br /&gt;
घुश्मेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-03T11:55:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Grishneshwar-Temple.jpg|घुश्मेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Ghushmeshwar Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री घुश्मेश्वर / Ghushmeshwar'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचें== &lt;br /&gt;
श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग  भारत के [[महाराष्ट्र]] प्रांत में [[दौलताबाद]] स्टेशन से बारह मील दूर अवस्थित है। यह घुश्मेश्वर मन्दिर वेरूल गाँव के पास है, जो [[दौलताबाद]] रेलवे-स्टेशन से लगभग अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ मध्य रेलवे के [[मनमाड]]-पूर्णा मार्ग से मनमाड से लगभग 100 किलोमीटर पर दौलताबाद स्टेशन पड़ता है। दौलताबाद से आगे [[औरंगाबाद]] रेलवे-स्टेशन है। यहाँ से वेरूल जाने का अच्छा मोटरमार्ग है, जहाँ से विविध प्रकार के वाहन सुलभ होते हैं। दौलताबाद से वेरूल का मार्ग पहाड़ी है, किन्तु उसकी प्राकृतिक शोभा बड़ी मनोहारी है। &lt;br /&gt;
==श्री घुश्मेश्वर के नाम==&lt;br /&gt;
घुश्मेश्वर को लोग घुसृणेश्वर और घृष्णेश्वर भी कहते हैं। घृष्णेश्वर से लगभग आठ किलोमीटर दूर दक्षिण में एक पहाड़ की चोटी पर दौलताबाद का किला मौजूद है। यहाँ पर भी धारेश्वर शिवलिंग स्थित है। यहीं पर श्री एकनाथ जी के गुरू श्री जनार्दन महाराज जी की समाधि भी है। &lt;br /&gt;
==एलोरा की गुफाएँ==&lt;br /&gt;
यहाँ से आगे कुछ दूर जाकर इतिहास प्रसिद्ध एलोरा की दर्शनीय गुफाएँ हैं। एलोरा की इन गुफाओं मे कैलास नाम की गुफा सर्वश्रेष्ठ और अति सुन्दर है। पहाड़ को काट-काटकर इस गुफा का निर्माण किया गया है। कैलास गुफा की कलाकारी दर्शकों के मन को मुग्ध कर देती है। यहाँ मात्र हिन्दू धर्मावलम्बी ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोग एलोरा की कलाओं से आकर्षित होते हैं। एलोरा की रमणीयता को देखकर उससे प्रभावित होगर [[बौद्ध]], [[जैन]] तथा मुसलमान आदि धर्मावलाम्बियों ने भी उसकी सुरम्य पहाड़ियों पर अपने-अपने स्थान बनाये हैं। कैलास गुफा से बेहद प्रभावित एक पश्चिमी विद्वान श्यावेल ने दक्षिण भारत के सभी मन्दिरो का निर्माण-आधार (नमूना) कैलास को ही स्वीकार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ ऐसे भी लोग है, जो इलोरा कैलास-मन्दिर को घुश्मेश्वर का प्राचीन स्थान मानते हैं। यहाँ के अति प्राचीन स्थानों में श्री घृष्णेश्वर [[शिव]] और [[देवगिरि दुर्ग]] के मध्य में स्थित सहस्रलिंग, पातालेश्चर व सूर्येश्वर हैं। इसी प्रकार सूर्य कुण्ड तथा शिव कुण्ड नामक सरोवर भी अति प्राचीन हैं। इस पहाड़ी की प्राकृतिक बनावट भी कुछ ऐसी ही है, जो सबके मन को अपनी ओर खींच लेती है। [[शिव पुराण]] के ज्ञान संहिता में लिखा है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ईदृशं चैव लिंग च दृष्ट्वा पापै: प्रमुच्यते।&lt;br /&gt;
सुखं संवर्धते पुंसां शुक्लपक्षे यथा शशी।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्थात् ‘घुश्मेश्वर महादेव के दर्शन करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा उसी प्रकार सुख-समृद्धि होती है, जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की।’ &lt;br /&gt;
==शिव महापुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
श्री शिवमहापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार बतायी गई है–&lt;br /&gt;
‘अद्भभुत तथा नित्य परम शोभा सम्पन्न देवगिरि नामक पर्वत दक्षिण दिशा में अवस्थित है। उस पर्वत के समीप में भारद्वाज कुल में उत्पन्न एक सुधर्मा नामक ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्म को जानने वाला) ब्राह्मण निवास करते थे। सदा शिव धर्म के पालन में तत्पर रहने वाली उनकी पत्नी का नाम सुदेहा था। वह कुशलतापूर्वक अपने घर के कार्यों को करती हुई पति की भी सब प्रकार से सेवा करती थी। ब्राह्मण श्रेष्ठ सुधर्मा भी देवताओं तथा अतिथियों के पूजक थे। वे वैदिक सनातन धर्म के नियम का अनुसरण करते हुए नित्य अग्निहोत्र करते थे। त्रिकाल सन्ध्या (सुबह, दोपहर और शाम) करने के कारण उनके शरीर की कान्ति [[सूर्य देवता|सूर्य]] की भाँति उद्दीप्त हो रही थी। [[वेद]] शास्त्रों के मर्मज्ञ (ज्ञाता) होने के कारण वे शिष्यों को पढ़ाया भी करते थे। वे धनवान तथा दानी भी थे। वे सज्जनता तथा विविध सद्गुणों के अधिष्ठान अर्थात पात्र थे। स्वयं शिव भक्त होने के कारण सदा शिव जी आराधना में लगे रहते थे तथा उन्हें शिव भक्त परम प्रिय थे। शिव भक्त भी उन्हें बड़ा प्रेम देते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतना सब कुछ होने पर भी सुधर्मा को कोई सन्तान न थी। यद्यपि उस ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण का कोई कष्ट न था, किन्तु उनकी धर्मपत्नी सुदेहा बड़ी दु:खी रहती थी। उसके पड़ोसी तथा अन्य लोग भी उसे नि:सन्तान होने का ताना मारा करते थे, जिसके कारण अपने पति से बार-बार पुत्रप्राप्ति हेतु प्रार्थना करती थी। उसके पति उस मिथ्या संसार के सम्बन्ध में उसे ज्ञान का उपदेश दिया करते थे, फिर भी उसका मन नहीं मानता था। उस ब्राह्मणदेव ने भी पुत्रप्राप्ति के लिए कुछ उपाय किये, किन्तु असफल रहे। उसके बाद अत्यन्त दु:खी उस ब्राह्मणी ने अपनी छोटी बहन घुश्मा के साथ अपने पति का दूसरा विवाह करा दिया। सुधर्मा ने द्वितीय विवाह से पूर्व अपनी पत्नी को बहुत समझाया था कि तुम इस समय अपनी बहन से प्यार कर रहीं हो, इसलिए मेरा विवाह करा रही हो, किन्तु जब इसे पुत्र उत्पन्न होगा,तो तुम उससे ईर्ष्या करने लगोगी। सुदेहा ने संकल्प लिया था कि वह कभी भी अपनी बहन से ईर्ष्या नहीं करेगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाह के बाद घुश्मा एक दासी की तरह अपनी बड़ी बहन की सेवा करती थी तथी सुदेहा भी उससे अतिशय प्यार करती थी। अपनी बहन की शिव भक्ति से प्रभावित होकर उसके आदेश के अनुसार घुश्मा भी शिव जी का एक सौ एक पार्थिव लिंग (मिट्टी शिवलिंग) बनाकर पूजा करती थी। पूजा करने के बाद उन शिवलिंगों को समीप के तालाब में विसर्जित कर देती थी–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कनिष्ठा चैव पत्नी स्वस्रनुज्ञामवाप्य च।&lt;br /&gt;
पार्थिवान्सा चकाराशु नित्यमेकोत्तरं शतम्।।&lt;br /&gt;
विधानपूर्वकं घुश्मा सोपचारसमन्वितम्।&lt;br /&gt;
वृत्वा तान्प्राक्षिपत्तत्र तडागे निकटस्थिते।।&lt;br /&gt;
एवं नित्यं सा चकार शिवपूजां सवकामदाम्।&lt;br /&gt;
विसृज्य पुनरावाह्य तत्सपर्याविधानत:।।&lt;br /&gt;
कुर्वन्त्या नित्यमेवं हि तस्या: शंकरपूजनम्।&lt;br /&gt;
लक्षसंख्याऽभवत्पूर्णा सर्वकाम फलप्रदा।।&lt;br /&gt;
कृपया शंकरस्यैव तस्या: पुत्रो व्यजायत।&lt;br /&gt;
सुन्दर: सुभगश्चैव कल्याणगुणभाजन:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्री शिवपुराण कोटि रूद्र संहिता 32/45-49&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शंकर की कृपा से घुश्मा को एक सुन्दर भाग्यशाली तथा सद्गुण सम्पन्न पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र प्राप्ति से जब घुश्मा का कुछ मान बढ़ गया, तब सुदेहा को ईर्ष्या पैदा हो गई। समय के साथ जब पुत्र बड़ा हो गया, तो विवाह कर दिया गया और पुत्रवधू भी घर में आ गई। यह सब देखकर सुदेहा और अधिक जलने लगी। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, जिसके कारण उसने अनिष्ट करने की ठान ली। एक दिन रात्रि में उसने सोते समय घुश्मा के पुत्र के शरीर को चाकू से टुकड़े-टुकड़े कर दिया और शव को समेटकर वहीं पास के सरोवर में डाल दिया, जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंग का विसर्जन करती थी। सुदेहा शव को तालाब में फेंककर आ गई और आराम से घर में सो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिदिन की भाँति घृश्मा अपने पूजा कृत्य में लग गई और ब्राह्मण सुधर्मा भी अपने नित्यकर्म में लग गये। सुदेहा भी जब सुबह उठी तो, उसके हृदय में जलने वाली ईर्ष्या की आग अब बुझ चुकी थी, इसलिए वह भी आनन्दपूर्वक घर के काम-काज में जुट गई। जब बहू की नींद खुली, तो उसने देखा कि उसका पति बिस्तर पर नहीं है। बिस्तर भी खून में सना है तथा शरीर के कुछ टुकड़े पड़े दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य देखकर दु:खी बहू ने अपनी सास घुश्मा के पास जाकर निवेदन किया और पूछा कि आपके पुत्र कहाँ गये हैं? उसने रक्त से भीगी शैय्या की स्थिति भी बताई और विलाप करने लगी– ‘हाय मैं तो मारी गयी। किसने यह क्रूर व्यवहार किया है?’ इस प्रकार वह पुत्रवधू करूण विलाप करती हुई रोने लगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुधर्मा की बड़ी पत्नी सुदेहा भी उसके साथ ‘हाय!’ ऐसा बोलती हुई शोक में डूब गई। यद्यपि वह ऊपर से दु:ख व्यक्त कर रही थी, किन्तु मन ही मन बहुत प्रसन्न थी। अपनी प्रिय वधू के कष्ट और क्रन्दन (रोना) को सुनकर भी घुश्मा विचलित नहीं हुई और वह अपने पार्थिव-पूजन व्रत मे लगी रही। उसका मन बेटे को देखने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हुआ। इसी प्रकार ब्राह्मण सुधर्मा भी अपने नित्य पूजा-कर्म में लगे रहे। उन दोनों ने भगवान के पूजन में किसी अन्य विघ्न की चिन्ता नहीं की। दोपहर को जब पूजन समाप्त हुआ, तब घुश्मा ने अपने पुत्र की भयानक शैय्या को देखा। देखकर भी उसे किसी प्रकार का दु:ख नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने विचार किया, जिसने मुझे यह पुत्र दिया है, वे ही उसकी रक्षा भी करेंगे। वे तो भक्तप्रिय हैं, कालों के भी काल हैं तथा सत्पुरूषों के मात्र आश्रय हैं। वे ही सर्वेश्वर प्रभु हमारे भी संरक्षक हैं। वे माला गूँथने वाले माली की तरह जिनको जोड़ते हैं, उन्हें अलग-अलग भी करते हैं। मैं अब चिन्ता करके क्या कर सकती हूँ। इस प्रकार सांसारिक तत्त्वों का विचार कर उसने शिव के भरोसे धैर्य धारण कर लिया, किन्तु शोक का अनुभव नहीं किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतिदिन की तरह वह 'नम: शिवाय' का उच्चारण करती हुई उन पार्थिव लिंगों को लेकर सरोवर के तट पर गई। जब उसने पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर वापस होने की चेष्टा की, तो उसका अपना पुत्र उस सरोवर के किनारे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा। अपने पुत्र को देखकर घुश्मा के मन में न तो प्रसन्नता हुई और न ही किसी प्रकार का कष्ट हुआ। इतने में ही परम सन्तुष्ट ज्योति: स्वरूप महेश्वर [[शिव]] उसके सामने प्रकट हो गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव ने कहा कि ‘मै’ तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम वर माँगों। तुम्हारी सौत ने इस बच्चे को मार डाला था, अत: मैं भी उसे त्रिशूल से मार डालूँगा। घुश्मा ने श्रद्धा-निष्ठा के साथ महेश्वर को प्रणाम किया और कहा कि सुदेहा मेरी बड़ी बहन है, कृपया आप उसकी रक्षा करे। शिव ने कहा कि सुदेहा ने तुम्हारा बड़ा अनिष्ट किया है, फिर तुम उसका उपकार क्यों करना चाहती हो? वह दुष्टा तो सर्वदा मार डालने के योग्य है। ‘घुश्मा’ हाथ जोडकर प्रार्थना करने लगी– ‘देव! आपके दर्शन मात्र से सारे पातक भस्म हो जाते हैं। हमने तो ऐसा ही सुना है कि अपकार करने वाले (अनिष्ट करने वाले) पर जो उपकार करता है, उसके भी दर्शन से पाप बहुत दूर भाग जाता है। सदाशिव जो कुकर्म करने वाला है, वही करे, भला मैं दुष्कर्म क्यों करूँ? मुझे तो बुरा करने वाले की भी भलाई करना ही अच्छा लगता है।’ भगचानि शिव घुश्मा के भक्तिपूर्ण विकार शून्य स्वभाव से अत्यन्त प्रसन्न हो उठ। दयासिन्धु महेश्वर ने कहा– ‘घुश्मा! तुम्हारे हित के लिए मैं तुम्हें कोई वर अवश्य दूँगा। इसलिए तुम कोई और वर माँगो।’ उसने कहा– ‘महादेव! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो लोगों की रक्षा और कल्याण के लिए आप यहीं सदा निवास करें और आपकी ख्याति मेरे ही नाम से संसार में होवे’–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सोवाच तद्वच: श्रुत्वा यदि देयो वरस्त्वया।&lt;br /&gt;
लोकानां चैव रक्षार्थमत्र स्थेयं मदाख्यया।।&lt;br /&gt;
तदोवाच शिवस्तत्र सुप्रसन्नो महेश्वर:।&lt;br /&gt;
स्थास्येऽत्र तव नाम्नाहं घुश्मेशाख्य: सुखप्रद:।।&lt;br /&gt;
घुश्मेशाख्यं सुप्रसद्धि लिंग मे जायतां शुभम्।&lt;br /&gt;
इदं सरस्तु लिंगानामालयं जायतां सदा।।&lt;br /&gt;
तस्यामच्छिवालयं नाम प्रसिद्धं भुवनत्रये।&lt;br /&gt;
सर्वकामप्रदं ह्योयद्दर्शनात्स्यात्सदा सर:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिवपुराण कोटि रूद्र संहिता 33/43-46&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घुश्मा की प्रार्थना और वर-याचना से प्रसन्न महेश्वर शिव ने उससे कहा कि मैं सब लोगों को सुख देने के लिए हमेशा यहाँ निवास करूँगा। मेरा ज्योतिर्लिंग ‘घुश्मेश’ के नाम से संसार में प्रसिद्ध होगा। यह सरोवर भी शिवलिंग का आलय अर्थात घर बन जाएगा और इसीलिए यह संसार में शिवालय के नाम से प्रसिद्ध होगा। इस सरोवर का दर्शन करने से सब प्रकार के अभीष्ट प्राप्त होंगे। भगवान शिव ने आशीर्वचन बोलते हुए घुश्मा से कहा कि तुम्हारे एक सौ एक पीढ़ियों तक ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ करेंगे। वे सभी सन्तानें उत्तम गुणों से सम्पन्न, सुन्दरी स्त्रियाँ, धन-वैभव, विद्या-बुद्धि और दीर्घायुष्य से युक्त होंगे। वे भोग और मोक्ष दोनों प्राकर के लाभ पाने के पात्र होंगे। तुम्हारे एक सौ एक पीढ़ियों तक वंश का विस्तार शोभादायक, यशस्वी तथा आनन्दवर्द्धक होगा’ इस प्रकार घुश्मा को वरदान देते हुए भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं स्थित हो गये। ‘घुश्मेश’ नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई और सरोवर भी शिवालय के नाम से विख्यात हुआ। सुधर्मा, घुश्मा तथा सुदेहा ने भी उस शिवलिंग की तत्काल एक सौ एक परिक्रमा दाहिनी ओर से की पूजा करने के बाद परिवार के सभी सदस्यों के मन की मलीनता दूर हो गई। पुत्र को जीवित देखकर सुदेहा बड़ी लज्जित हुई और उसने अपने पति तथा बहन घुश्मा से क्षमा याचना कर प्रायश्चित के द्वारा पाप का शोधन किया। इस प्रकार घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का आविर्भाव हुआ, जिसका दर्शन और पूजन करने से सब प्रकार के सुखों की वृद्धि होती है। जगद्गुरू आदि शंकराचार्य ने घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रार्थना इस प्रकार की है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इलापुरे रम्याविशालकेऽस्मिन्।&lt;br /&gt;
समुल्लसन्तं च जगदवरेण्यम्।।&lt;br /&gt;
वन्दे महोदारतरस्वभावं।&lt;br /&gt;
घुश्मेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B6_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&amp;diff=18222</id>
		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-03T11:49:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग]]&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वरम मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhimshankar.jpg|[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Bheemashankar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Kashi-Vishwanath.jpg|[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Omkareshwar.jpg|[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Omkareshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Trimbakeshwar.jpg|[[त्र्यंम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यंम्बकेश्वर मन्दिर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Grishneshwar-Temple.jpg|घुश्मेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Ghushmeshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Nageshwar-Temple.jpg|नागेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Nageshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Somnath-Temple.jpg|सोमनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Temple&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>ओंकारेश्वर</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Trimbakeshwar.jpg|त्र्यंम्बकेश्वर मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री ओंकारेश्वर / Shri Onkareshwar'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इसके साथ ही अमलेश्वर ज्येतिर्लिंग भी है। इन दोनों शिवलिंगों की गणना एक ही ज्योतिर्लिंग में की गई है। ओंकारेश्वर स्थान भी [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। [[स्कन्द पुराण]] के रेवा खण्ड में श्री ओंकारेश्वर की महिमा का बखान किया गया है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
देवस्थानसमं ह्येतत् मत्प्रसादाद् भविष्यति।&lt;br /&gt;
अन्नदानं तप: पूजा तथा प्राणविसर्जनम्।&lt;br /&gt;
ये कुर्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासनम्।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड-अध्याय-22&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्थात ‘ओंकारेश्वर तीर्थ अलौकिक है। भगवान [[शंकर]] की कृपा से यह देव स्थान के समान ही हैं। जो मनुष्य इस तीर्थ में पहुँचकर अन्नदान, तप, पूजा आदि करता है अथवा अपना प्राणोत्सर्ग यानि मृत्यु को प्राप्त होता है, उसे भगवान शिव के लोक में स्थान प्राप्त होता है।’ &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अमराणां शतैशचैव संवितो हामरेश्वर:।&lt;br /&gt;
तथैव ऋषिसंघैशच तेन पुण्यतमो महान्।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड-अध्याय- 28&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्थात ‘महान पुण्यशाली अमरेश्वर (ओंकारेश्वर) तीर्थ हमेशा सैकड़ों देवताओं तथा ऋषि-महर्षि  के अत्यन्त पवित्र तीर्थ है।’&lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचे==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
ओंकारेश्वर-तीर्थ [[नर्मदा नदी]] के किनारे विद्यमान है। [[उज्जैन]] से [[खण्डवा]] जाने वाले रेलमार्ग पर ‘मोरटक्का’ नामक रेलवे स्टेशन है, जहाँ से लगभग बारह किलोमीटर की दूरी पर ‘ओंकारेश्वर-तीर्थ’ है। &lt;br /&gt;
==मान्धाता पर्वत==&lt;br /&gt;
नर्मदा नदी के दो धाराओं के बँटने से एक टापू का निर्माण हो गया है, इसे शिवपुरी भी कहा जाता है। नर्मदा की विभक्त धारा दक्षिण की ओर जाती है। दक्षिण की ओर बहने वाली धारा ही प्रधान मानी जाती है, जिसे नाव (नौका) के द्वारा पार किया जाता है। नर्मदा के इस किनारे पर पक्के घाटों का निर्माण कराया गया है। इसी मान्धाता नामक पर्वत पर भगवान ओंकारेश्वर-महादेव विराजमान हैं। इतिहास प्रसिद्ध भगवान के महान भक्त अम्बरीष और मुचुकुन्द के पिता सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने इस स्थान पर कठोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। वे एक महान तपस्वी और विशाल महायज्ञों के कर्त्ता थे। उस महान पुरूष मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत हो गया। यहाँ के ज़्यादातर मन्दिरों का निर्माण पेशवा राजाओं द्वारा ही कराया गया था। ऐसा बताया जाता है कि भगवान ओंकारेश्वर का मन्दिर भी उन्ही पेशवाओं द्वारा ही बनवाया गया है। इस मन्दिर में दो कमरों (कक्षों) के बीच से होकर जाना पडता है। चूँकि भीतर अन्धेरा रहता है, इसलिए वहाँ हमेशा दीपक जलाया जाता है। &lt;br /&gt;
==शिव पुराण की कथा==&lt;br /&gt;
इस ओंकारतीर्थ के ज्योतिर्लिंग को [[शिव पुराण|शिव महापुराण]] में ‘परमेश्वर लिंग’ कहा गया है। यह परमेश्वर लिंग इस तीर्थ में कैसे प्रकट हुआ अथवा इसकी स्थापना कैसे हुई, इस सम्बन्ध में शिव पुराण की कथा इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव]] के अनेक नाम हैं। एक बार [[नारद]] ऋषि परम श्रद्धा और बड़ी लगन के साथ उनकी सेवा करने लगे। कुछ समय सेवा में बिताने के बाद मुनिश्रेष्ठ वहाँ से गिरिराज [[विन्ध्याचल पर्वत|विन्ध्य]] पर पहुँच गये। विन्ध्य ने बड़े आदर-सम्मान के साथ उनकी विधिवत पूजा की। 'मैं सर्वगुण सम्पन्न हूँ, मेरे पास हर प्रकार की सम्पदा है, किसी वस्तु की कमी नहीं है'- इस प्रकार के भाव को मन में लिये विन्ध्याचल नारद जी के समक्ष खड़ा हो गया। अहंकारनाशक श्री नारद जी विन्ध्याचल की अभिमान से भरी बातें सुनकर लम्बी साँस खींचते हुए चुपचाप खड़े रहे। उसके बाद विन्ध्यपर्वत ने पूछा- 'आपको मेरे पास कौन-सी कमी दिखाई दी? आपने किस कमी को देखकर लम्बी साँस खींची?’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारद जी ने विन्ध्याचल को बताया कि तुम्हारे पास सब कुछ है, किन्तु [[मेरू पर्वत]] तुमसे बहुत ऊँचा है। उस पर्वत के शिखरों का विभाग (पर्वत की चोटियाँ) देवताओं के लोकों तक पहुँचा हुआ है। मुझे लगता है कि तुम्हारे शिखर (चोटी) के भाग वहाँ तक कभी नहीं पहुँच पाँएगे। इस प्रकार कहकर ऋषि नारद जी के चले जाने पर विन्ध्याचल को बहुत पछतावा हुआ। वह दु:खी होकर मन ही मन शोक करने लगा। उसने निशचय किया कि अब वह विश्वनाथ भगवान सदाशिव की आराधना और तपस्या करेगा। इस प्रकार विचार करने के बाद वह भगवान शंकर जी की सेवा में चला गया। जहाँ पर साक्षात ओंकार विद्यमान हैं। उस स्थान पर पहुँच कर उसने प्रसन्नता और प्रेमपूर्वक शिव की पार्थिव मूर्ति (मिट्टी की शिवलिंग) बनाई और छ: महीने तक लगातार उसके पूजन में तन्मय रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह शम्भू की आराधना-पूजा के बाद निरन्तर उनके ध्यान में तल्लीन हो गया और अपने स्थान से इधर-उधर नहीं हुआ। उसकी कठोर तपस्या को देखकर पार्वतीपति भगवान शिव उस पर प्रसन्न हो गये। उन्होंने विन्ध्याचल को अपना दिव्य स्वरूप प्रकट कर दिखाया, जिसका दर्शन बड़े - बड़े योगियों के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ होता है। सदाशिव भगवान प्रसन्नतापूर्वक विन्ध्याचल से बोले- ‘विन्ध्य! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। मैं अपने भक्तों को उनका अभीष्ट  (उनके द्वारा इच्छा किया गया) वर प्रदान करता हूँ। इसलिए तुम वर माँगो।’ विन्ध्य ने कहा- ‘देवेश्वर महेश! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो भक्तवत्सल! हमारे कार्य की सिद्धि करने वाली वह अभीष्ट बुद्धि हमें प्रदान करें!’ विन्ध्यपर्वत की याचना को पूरा करते हुए भगवान शिव ने उससे कहा कि- ‘पर्वतराज! मैं तुम्हें वह उत्तम वर (बुद्धि) प्रदान करता हूँ। तुम जिस प्रकार का काम करना चाहो, वैसा कर सकते हो। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव ने जब विन्ध्य को उत्तम वर दे दिया, उसी समय देवगण तथा शुद्ध बुद्धि और निर्मल चित्त वाले कुछ ऋषिगण भी वहाँ आ गये। उन्होने भी भगवान शंकर जी की विधिवत पूजा की और उनकी स्तुति करने के बाद उनसे कहा- ‘प्रभो! आप हमेशा के लिए यहाँ स्थिर होकर निवास करें।’ देवताओं की बात से महेश्वर भगवान शिव को बड़ी प्रसन्नता हुई। लोकों को सुख  पहुँचाने वाले परमेशवर शिव ने उन ऋषियों तथा देवताओं की बात को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वहाँ स्थित एक ही ओंकारलिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। प्रणव के अन्तर्गत जो सदाशिव विद्यमान हुए, उन्हे ‘ओंकार’ नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार पार्थिव मूर्ति में जो ज्योति प्रतिष्ठित हुई थी, वह ‘परमेश्वर लिंग’ के नाम से विख्यात हुई। परमेश्वर लिंग को ही ‘अमलेश्वर’ भी कहा जाता है। इस प्रकार भक्तजनों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाले ‘ओंकारेश्वर’ और ‘परमेश्वर’ नाम से शिव के ये ज्योतिर्लिंग जगत में प्रसिद्ध हुए। उस समय देवताओं और ऋषियों ने मिलकर उन ज्योतिर्लिंगों का पूजन किया तथा भगवान वृषभध्वज ने शिव को प्रसन्न कर अनेक वर प्राप्त किये-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ॐकारं चैवं यल्लिंगमेकं तच्च द्विधा गतम्।&lt;br /&gt;
प्रणवे चैव ॐकारनामसीत्स सदाशिव:।।&lt;br /&gt;
पार्थिवे चैव यज्जातं तदासीत्परमेश्वर:।&lt;br /&gt;
भक्तीभष्टप्रदौ चोभौ भुक्तिमुक्तिप्रौ द्विज:।&lt;br /&gt;
तत्पूजां च तदा चक्रुर्देवाशच ऋषयस्तथा।&lt;br /&gt;
प्रापुर्वराननेकांशच संतोष्य वृषभध्वजम्।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव महापुराण कोटि रूद्र संहिता, अध्याय 18/22-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार भगवान शिव के प्रादुर्भाव और निरन्तर निवास से विन्ध्याचल पर्वत को अतीव प्रसन्नता हुई। अभीष्ट वर की प्राप्ति से उसने अपने कार्य की सिद्धि की और अपने मानसिक परिताप का परित्याग कर दिया। शिव पुराण का ऐसा उद्घोष है कि जो मनुष्य भगवान शंकर का पूजन कर निरन्तर ध्यान करता है, उसे दोबारा माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता है अर्थात उसकी मुक्ति हो जाती है। इस ओंकार में परमेश्वर ज्योतिर्लिंग का पूजन सभी प्रकार का मनोवांछित फल देने वाला है।&lt;br /&gt;
==ओंकारेश्वर का वास्तुशिल्प==&lt;br /&gt;
ओंकारेश्वर लिंग किसी मनुष्य के द्वारा गढ़ा, तराशा या बनाया हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है। प्राय: किसी मन्दिर में लिंग की स्थापना गर्भ गृह के मध्य में की जाती है और उसके ठीक ऊपर शिखर होता है, किन्तु यह ओंकारेश्वर लिंग मन्दिर के गुम्बद के नीचे नहीं है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि मन्दिर के ऊपरी शिखर पर भगवान महाकालेश्वर की मूर्ति लगी है। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह पर्वत ही ओंकाररूप है। वे लोग इस पर्वत की परक्रिमा भी करते हैं। &lt;br /&gt;
==प्राचीन सिद्धेश्वर महादेव==&lt;br /&gt;
यहाँ पर स्थित प्राचीन सिद्धेश्वर महादेव का मन्दिर भी दर्शनीय है। परिक्रमा के अन्तर्गत बहुत से मन्दिरों के विद्यमान होने के कारण भी यह पर्वत ओंकार के स्वरूप में दिखाई पड़ता है। ओंकारेश्वर के मन्दिर ॐकार में बने चन्द्र का स्थानीय ॐ इसमें बने हुए चन्द्रबिन्दु का जो स्थान है, वही स्थान ओंकारपर्वत पर बने ओंकारेश्वर मन्दिर का  है। मालूम पड़ता है इस मन्दिर में शिव जी के पास ही माँ [[पार्वती देवी|पार्वती]] की भी मूर्ति स्थापित है। यहाँ पर भगवान परमेश्वर महादेव को चने की दाल चढ़ाने की परम्परा है। &lt;br /&gt;
==धर्म के साथ कुप्रथा भी==&lt;br /&gt;
इस ओंकारेश्वर मन्दिर में कभी एक भीषण परम्परा भी प्रचलित भी, जो अब समाप्त कर दी गई है। इस मान्धाता पर्वत पर एक खड़ी चढ़ाई वाली पहाड़ी है। इसके सम्बन्ध में एक प्रचलन था कि जो कोई मनुष्य इस पहाड़ी से कूदकर अपना प्राण नर्मदा में विसर्जित कर देता है, उसकी तत्काल मुक्ति हो जाती है। इस कुप्रथा के चलते बहुत सारे लोग सद्योमुक्ति (तत्काल मोक्ष) की कामना से उस पहाड़ी पर से नदी में कूदकर अपनी जान दे देते थे। इस प्रथा को ‘भृगुपतन’ नाम से जाना जाता था। [[सती प्रथा]] की तरह इस प्रचलन को भी अँग्रेजी सरकार ने प्रतिबन्धित कर दिया। यह प्राणनाशक अनुष्ठान सन 1824 ई0 में ही बन्द करा दिया। था। इस ओंकारेश्वर-तीर्थ में कार्तिक मास (नवम्बर) की पूर्णिमा तिथि को भारी मेला लगता है। नर्मदा में स्नानकर भगवान अमलेश्वर के दर्शन का बहुत महत्व [[पुराण|पुराणों]] में दर्शाया गया है। नर्मदा नदी के स्नान तो क्या, उसके दर्शन मात्र से भी मनुष्य में पवित्रता आती है।&lt;br /&gt;
==मंदिर और नर्मदा==&lt;br /&gt;
मोरटक्का से ओंकारेश्वर जाते समय नर्मदा के किनारे अगल-बगल में दो छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं, जिनको ‘विष्णुपुरी’ और ‘ब्रह्मपुरी’ कहा जाता है। इनके बीच से ही कपिल धारा नामक नदी बहती है, जो आगे चलकर नर्मदा नदी में ही मिल जाती है। यहाँ पर पक्के घाट और अनेक मन्दिर विराजमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लिंग की जलहरी का सम्बन्ध नीचे नर्मदा के किसी छिद्र (बिल) से है। इसलिए ओंकार लिंग पर चढ़ायी गयी भेंट-पूजा को पुजारी लोग बड़ी सावधानी से शीघ्र ही उठा लेते हैं। वे अपने हाथ को जलहरी के आगे लगाये रहते हैं, जिससे कि चढ़ावा पानी में बहकर नदी में न चला जाय।&lt;br /&gt;
==प्रतिमा का नौकाविहार==&lt;br /&gt;
प्रत्येक सोमवार को भगवान ओंकारेश्वर की पाँच मुखों वाली सोने की प्रतिमा को नाव में बैठाकर नर्मदा नदी में जलविहार या नौकाविहार कराया जाता है। वर्तमान में ओंकारेश्वर-मन्दिर का जीर्णोद्धार किया गया है। यहाँ से सरकार द्वारा एक नहर निकाली गयी है, जो कृषि कार्य अर्थात सिंचाई के लिए है। &lt;br /&gt;
==ओंकारेश्वर कैसे पहुँचें==&lt;br /&gt;
इस नहर का निर्माण करने वाली एक प्राइवेट कम्पनी ने ही ओंकारेश्वर-मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया है। उसने नदी पर पक्का घाट तथा ऊपर मंदिर जाने के लिए सीढ़ियाँ भी बनायी हैं। दो तरफ से नदी से घिरी यह पहाड़ी इस समय लगभग डेढ़ किलोमीटर लम्बी और एक किलोमीटर चौडी है। मोरटक्का रेलवे स्टेशन से बस, टैम्पों, ताँगा आदि के द्वारा ओंकारेश्वर पहुँचा जाता है। इस टापू (मान्धाता) के दोनों ओर बहने वाली नदी यद्यपि नर्मदा ही है, किन्तु इसकी दूसरी जलधारा को वहाँ कावेरी कहते हैं। &lt;br /&gt;
==मंदिरों के दर्शन==&lt;br /&gt;
मान्धाता द्वीप के अन्त में वही कावेरी-धारा पुन: नर्मदा में ही मिल जाती है। इस द्वीप का आकार-प्रकार (बनावट) प्रणव (ॐ) से मिलता-जुलता है। ओंकारेश्वर-मन्दिर के परिसर में ही पाँच मुख वाले गणेश जी की मूर्ति है। ओंकारेश्वर-मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़कर दूसरी मंजिल में महाकालेश्वर लिंग मूर्ति का दर्शन प्राप्त होता है। उसकी तीसरी मंजिल पर भगवान वैद्यनाथेश्वर की लिंग मूर्ति विद्यमान है। इस मन्दिर की परिक्रमा में श्री रामेश्वर मन्दिर तथा गौरी-सोमनाथ के भी दर्शन प्राप्त होते हैं। मन्दिर के समीप में अविमुक्तेश्वर महादेव, ज्वालेश्वर, केदारेश्वर महादेव, आदि के प्राचीन मन्दिर भी अवस्थित है। &lt;br /&gt;
==धार्मिक दृष्टि से परिक्रमा==&lt;br /&gt;
धार्मिक दृष्टि से मान्धाता टापू में ओंकारेश्वर की एक छोटी और एक बड़ी दो परिक्रमाएँ की जाती हैं। ओंकारेश्वर क्षेत्र की सम्पूर्ण तीर्थ यात्रा तीन दिनों में पूरी की जा  सकती है। मान्धाता द्वीप में कोटि तीर्थ पर स्नान करने के बाद कोटेश्वर महादेव, हाटकेश्वर, त्र्यंम्बकेश्वर गायत्रीश्वर, गोविन्देश्वर, तथा सावित्रीश्वर आदि देवों के दर्शन किये जाते है। तदनन्तर भूरीश्वर, श्रीकालिका माता और पाँच मुख  वाले गणपति सहित नन्दी का दर्शन करने के बाद ओंकारेश्वर-मन्दिर महादेव का दर्शन प्राप्त होता है। ओंकारेश्वर-मन्दिर में शुकदेव जी, मान्धातेश्वर, मनागणेश्वर, श्री द्वारिकाधीश, नर्मदेश्वर भगवान्, नर्मदा देवी, महाकालेश्वर, भगवान वैद्यनाथश्वर, सिद्धेश्वर, रामेश्वर, जालेश्वर आदि का दर्शन करने के बाद विशल्या-संगम तीर्थ पर विशल्येश्वर का दर्शन किया जाता है।&lt;br /&gt;
==अन्य मंदिरों के दर्शन==&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त अन्धकेश्वर, झुमेश्वर, नवग्रहेश्वर नाम से भी बहुत से शिवलिंगों के दर्शनों का अवसर मिलता है। मारूति, साक्षी गणेश, श्री अन्नपूर्णा माता तथा तुलसी जी का भी दर्शन मिलता है। इनके अतिरिक्त भी बहुत से देव हैं, जिनका दर्शन पैदल चलकर ही प्राप्त होता है, उनमें अविमुक्तेश्वर, महात्मा दरियाईनाथ की गद्दी, श्री बटुकभैरव, मंगलेश्वर, नागचन्द्रेश्वर, दत्तात्रेय तथा काले-गोरे भैरव का दर्शन प्रमुख हैं। वहाँ श्रीराममन्दिर और गुफा के भीतर धृष्णेश्वर का भी दर्शन प्राप्त होता है। इतने देवताओं के दर्शन में पूरा दिन लग जाता है। &lt;br /&gt;
==दूसरे दिन के दर्शन==&lt;br /&gt;
दूसरे दिन ओंकारेश्वर अर्थात मान्धाता पर्वत की पंचकोसी परिक्रमा करने का विधान है। यहाँ देव स्थानों की संख्या बहुत है। श्री चक्रेश्वर, गोदन्तेश्वर और खेड़ापति [[हनुमान]] का दर्शन करने के बाद मल्लिकार्जुन, चन्द्रेश्वर, त्रिलोचनेश्वर, गोपेश्वर का दर्शन करते हैं। उसके बाद श्मशान भूमि में पहुँचकर पिशाचमुक्तेश्वर तथा केदारेश्वर का दर्शन कर सावित्रीकुण्ड और यमलार्जुनेश्वर के दर्शन के बाद कावेरी के संगम पर पितरों के लिए तर्पण करने की प्रथा है। वहाँ पर श्री रणछोड़ जी और ऋणमुक्तेश्वर का पूजन किया जाता है। राजा मुचुकुन्द के किले से आगे [[हिडिम्बा]] संगमतीर्थ मिलता है। वहाँ जाते समय रास्ते में गौरी-सोमनाथ की विशाल लिंगमूर्ति का दर्शन मिलता है, जिन्हें ‘मामा-भांजा’ कहा जाता है। यह तीन मंजिल का भव्य मन्दिर है, जिसकी प्रत्येक मंजिल में शिवलिंग स्थापित है। यहाँ पर श्री नन्दी, श्री गणेश तथा श्री हनुमान जी की प्रतिमाएँ भी विद्यमान हैं। इस मन्दिर से जब आगे बढ़ते हैं, तो अन्नपूर्णा, अष्टभुजा, महिषासुरमर्दिनी, सीता-रसोई तथा श्री आनन्दभैरव के दर्शन होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुचुकुन्द किले के बाहर अर्जुन और भीम की मूर्तियाँ लगी हैं। उससे नीचे आने पर वीरखला पर भीमाशंकर का दर्शन तथा कुछ और नीचे उतरने पर श्री कालभैरव के दर्शन होते हैं। कावेरी संगम पर जूने कोटितीर्थ तथा सूर्यकुण्ड अवस्थित है। कावेरी के उस पार चौबीस अवतार, पशुपतिनाथ, गयाशिला, एरंडी संगमतीर्थ, पत्रीश्वर तथा गदाधर भगवान के मन्दिर हैं। यहाँ पर पिण्डदान तथा पितरों का श्राद्ध किया जाता है। राजमहल में श्रीराम का दर्शन कर, उसके बाद ओंकारेश्वर का दर्शन करने से परिक्रमा पूरी हो जाती है।&lt;br /&gt;
== विष्णुपुरी और ब्रह्मपुरी==&lt;br /&gt;
मान्धाता द्वीप से आगे नर्मदा को पार करके 'विष्णुपुरी' और 'ब्रह्मपुरी' स्थित है। विष्णुपुरी के पास गोमुख है, जहाँ से सर्वदा जल गिरता रहता है। इसे कपिला-संगम तीर्थ कहा जाता है। गोमुख से निकलने वाली जलधारा गोकर्ण और महाबलेश्वर के लिंगों पर गिरती रहती है। इसे कपिलाधारा कहा जाता है, जिसका जल त्रिशूलभेद कुण्ड से आता है। उस स्थान से इन्द्रेश्वर और व्यासेश्वर के दर्शन हेतु जाया जाता है, उसके बाद अमलेश्वर के दर्शन की  परम्परा है। &lt;br /&gt;
अमलेश्वर-मन्दिर का निर्माण [[अहल्याबाई]] ने करवाया था। इसे भी ज्योतिर्लिंग ही कहते हैं। यहाँ पर पूर्व गायकवाड़  राज्य की ओर से बहुत से ब्राह्मण नियुक्त थे, जो पार्थिव लिंग की पूजा करते रहते हैं। पार्थिव-पूजन की प्रकिया आज भी चल रही है। अमलेश्वर-मन्दिर की प्रदक्षिणा में वृद्धकालेश्वर, बाणेश्वर, मुक्तेश्वर, कर्दमेश्वर तथा तिलभाण्डेश्वर महादेव के मन्दिर विराजमान हैं। अमलेश्वर के अतिरिक्त बहुत से आंश्रम और अखाड़ों में अनेक देवी-देवताओ के मन्दिर स्थापित हैं। उनमें निरंजनी अखाड़े में स्वामी कार्तिक का मन्दिर, अघोरी नाले पर अघोरेश्वर गणपति भगवान का मन्दिर, विष्णुपुरी में विष्णु के अतिरिक्त कपिल जी, वरूण, वरूणेश्वर, नीलकण्ठेश्वर, कर्दमेश्वर आदि के दर्शन प्राप्त होते हैं। मार्कण्डेय आश्रम में मार्कण्डेयशिला तथा मार्कण्डेश्वर का दर्शन किया जाता है। &lt;br /&gt;
==चौबीस अवतार और पशुपतिनाथ==&lt;br /&gt;
ओंकारेश्वर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर जहाँ से नर्मदा की एक धारा कावेरी के रूप में विभक्त होती है, वहाँ पर चौबीस अवतार और पशुपतिनाथ का मन्दिर है। यहाँ पर धरती पर लेटी हुई एक रावण की मूर्ति है। इस मन्दिर से डेढ़ किलोमीटर आगे चलकर कुबेर जी का स्थान है, जाहँ कावेरी पुन: नर्मदा में मिल जाती है, वहीं संगम तट पर भगवान शिव का प्राचीन मन्दिर है्। ऐसी लोक मान्यता है कि यहाँ पर कुबेर ने कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या के कारण ही इस मन्दिर को कुबेरेश्वर-मन्दिर कहा जाता है। &lt;br /&gt;
==सीता वाटिका==&lt;br /&gt;
वहाँ से आगे [[च्यवन]] मुनि का आश्रम है और आगे सप्तमातृकाओं के मन्दिर हैं, जिन्हे सातमात्रा कहा जाता है। सातमात्रा में वाराही, चामुण्डा, ब्रह्माणी, वैष्णवी, इन्द्राणी, कौमारी तथा माहेश्वरी इन सप्तमातृकाओं के मन्दिर बने हुए हैं। ऐसी जनश्रुति है कि नर्मदा के उत्तर तट से लगभग पाँच किलोमीटर की दूरी पर महर्षि [[वाल्मीकि]] का आश्रम था। जनकनन्दिनी [[सीता|जानकी]] इसी आश्रम में निवास करती थीं। वर्तमान में इस स्थान को सीता वाटिका कहा जाता है, जो सातमात्रा से सात मील  दूर है। सीता वाटिका नामक स्थान में सीताकुण्ड, रामकुण्ड तथा लक्ष्मण कुण्ड हैं। यहाँ चौसठ योगिनियों और बावन भैरवों की विशाल मूर्तियाँ स्थापित हैं। इस क्षेत्र के आसपास भी अनेक धार्मिक स्थल हैं।&lt;br /&gt;
य एवं पूजयेच्छम्भुं मातृगर्भं वसेन्न हि।&lt;br /&gt;
यदभीष्टं फलं तच्य प्राप्नुयान्नात्र संशय:।।&lt;br /&gt;
‘इस प्रकार जो ओंकारेश्वर शिव की पूजा करता है, उसे सम्पूर्ण अभीष्ट मिल जाता है और उसे पुन: माता के गर्भ में आना नहीं पड़ता है।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-02T05:18:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhimshankar.jpg|भीमशंकर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Bheemashankar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Kashi-Vishwanath.jpg|विश्वनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Omkareshwar.jpg|ओंकारश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Omkareshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Trimbakeshwar.jpg|त्र्यंम्बकेश्वर मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>त्र्यम्बकेश्वर मंदिर</title>
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		<updated>2010-05-02T05:15:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Trimbakeshwar.jpg|त्र्यंम्बकेश्वर मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री त्र्यम्बकेश्वर / Shri Trayambkeshwar''' &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग [[महाराष्ट्र]] प्रान्त के [[नासिक]] जनपद में नासिक शहर से तीस किलोमीटर पश्चिम में अवस्थित है। &lt;br /&gt;
==गोदावरी का उद्गम==&lt;br /&gt;
यहाँ समीप में ही ब्रह्मगिरि नामक पर्वत से [[गोदावरी नदी]] निकलती है। जिस प्रकार उत्तर भारत में प्रवाहित होने वाली पवित्र नदी [[गंगा नदी|गंगा]] का विशेष आध्यात्मिक महत्त्व है, उसी प्रकार दक्षिण में प्रवाहित होने वाली इस पवित्र नदी गोदावरी का विशेष महत्त्व है। जहाँ उत्तरभारत की गंगा को ‘भागीरथी’ कहा जाता हैं, वहीं इस गोदावरी नदी को ‘गौतमी गंगा’ कहकर पुकारा जाता है। भागीरथी राजा [[भगीरथ]] की तपस्या का परिणाम है, तो गोदावरी ऋषि [[गौतम]] की तपस्या का साक्षात फल है। &lt;br /&gt;
==महाकुम्भ का आयोजन==&lt;br /&gt;
देश में लगने वाले विश्व के प्रसिद्ध चार महाकुम्भ मेलों में से एक महाकुम्भ का मेला यहीं लगता है। यहाँ प्रत्येक बारहवें वर्ष जब सिंह राशि पर बृहस्पति का पदार्पण होता है और सूर्य नारायण भी सिंह राशि पर ही स्थित होते हैं, तब महाकुम्भ पर्व का स्नान, मेला आदि धार्मिक कृत्यों का समारोह होता है। उन दिनों गोदावरी गंगा में स्नान का आध्यात्मिक पुण्य बताया गया है।&lt;br /&gt;
==श्री त्र्यम्बकेश्वर शिव==&lt;br /&gt;
गोदावरी के उद्गगम स्थल के समीप ही श्री त्र्यम्बकेश्वर [[शिव]] अवस्थित हैं, जिनकी महिमा का बखान [[पुराण|पुराणों]] में किया गया है। ऋषि गौतम और पवित्र नदी गोदावरी की प्रार्थना पर ही भगवान शिव ने इस स्थान पर अपने वास की स्वीकृति दी थी। वही भगवान शिव ‘त्र्यम्बकेश्वर’ नाम से इस जगत में विख्यात हुए। यहाँ स्थित ज्योतिर्लिंग का प्रत्यक्ष दर्शन स्त्रियों के लिए निषिद्ध है, अत: वे केवल भगवान के मुकुट का दर्शन करती हैं। त्र्यम्बकेश्वर-मन्दिर में सर्वसामान्य लोगों का भी प्रवेश न होकर, जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) हैं तथा भजन-पूजन करते हैं और पवित्रता रखते हैं, वे ही लोग मन्दिर के अन्दर प्रवेश कर पाते हैं। इनसे अतिरिक्त लोगों को बाहर से ही मन्दिर का दर्शन करना पड़ता है।&lt;br /&gt;
==श्री त्र्यम्बकेश्वर और गोदावरी==&lt;br /&gt;
यहाँ मन्दिर के भीतर एक गड्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग हैं, जो [[ब्रह्मा]] [[विष्णु]] और शिव इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। ब्रह्मगिरी से निकलने वाली गोदावरी की जलधारा इन त्रिमूर्तियों पर अनवरत रूप से पड़ती रहती है। ब्रह्मगिरि पर्वत के ऊपर जाने के लिए सात सौ सीढ़ियों का निर्माण कराया गया है। ऊपरी पहाड़ी पर ‘रामकुण्ड’ और ‘लक्ष्मणकुण्ड’ नामक दो कुण्ड भी स्थित हैं। पर्वत की चोटी पर पहुँचने पर गोमुखी से निकलती हुई भगवान गौतमी (गोदावरी) का दर्शन प्राप्त होता है। श्री शिव महापुराण के कोटिरूद्र संहिता में ऋषि गौतम- गौतमी-गोदावरी तथा त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में विस्तार से वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार== &lt;br /&gt;
‘पूर्व समय में गौतम नाम के एक प्रसिद्ध ऋषि अपनी धर्मपत्नी [[अहल्या]] के साथ रहते थे। उन्होंने दक्षिण भारत के ब्रह्मगिरि पर्वत पर दस हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की थी।&lt;br /&gt;
एक समय वहाँ सौ वर्षों तक वर्षा बिल्कुल नहीं हुई, सब जगह सूखा पड़ने के कारण जीवधारियों में बेचैनी हो गई। जल के अभाव में पेड़-पौधे सूख गये, पृथ्वी पर महान संकट टूट पड़ा, सर्वत्र चिन्ता ही चिन्ता, आखिर जीवन को धारण करने वाला जल कहाँ से लाया जाये?  उस समय मनुष्य, मुनि, पशु, पक्षी तथा अन्य जीवनधारी भी जल के लिए भटकते हुए विविध दिशाओं में चले गये। उसके बाद ऋषि गौतम ने छ: महीने तक कठोर तपस्या करके [[वरुण]] देवता को प्रसन्न किया। ऋषि ने वरुण देवता से जब जल बरसाने की प्रार्थना की, तो उन्होंने कहा कि मैं देवताओं के विधान विपरीत वृष्टि नहीं कर सकता, किन्तु तुम्हारी इच्छा की पूर्ति हेतु तुम्हें अक्षय (कभी नष्ट नहीं होने वाला) जल देता हूँ। तुम उस जल को रखने के लिए एक गड्ढा तैयार करो।&lt;br /&gt;
वरुण देव के आदेश के अनुसार ऋषि गौतम ने एक हाथ गहरा एक गड्ढा खोद दिया, जिसे वरुण ने अपने दिव्य जल से भर दिया। उसके बाद उन्होंने परोपकार परायण ऋषि गौतम से कहा– ‘महामुने! यह अक्षुण्ण जल कभी नष्ट नहीं होगा और तीर्थ बनकर इस पृथ्वी पर तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगा। इसके समीप दान-पुण्य, हवन-यज्ञ, तर्पण, देव पूजन और पितरों का श्राद्ध, सब कुछ अक्षय फलदायी होंगे। उसके बाद उस जल से ऋषि गौतम ने बहुतों का कल्याण किया, जिससे उन्हें सुख की अनुभूति हुई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार वरुण से अक्षय जल की प्राप्ति के बाद ऋषि गौतम आनन्द के साथ अपने नित्य नैमित्तिक कर्म, यज्ञ आदि सम्पन्न करने लगे। उन्होंने अपने नित्य हवन-यज्ञ के लिए धान, जौं, नीवार (ऋषि धान्य) आदि लगवाया। जल की सुलभता से वहाँ विविध प्रकार की फसलें, अनेक प्रकार के वृक्ष तथा फल-फूल लहलहा उठे। इस प्रकार जल की सुविधा और व्यवस्था को सुनकर वहाँ हजारों ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी और जीवधारी रहने लगे। कर्म करने वाले बहुत से ऋषि-मुनि अपनी धर्मपत्नियों, पुत्रों तथा शिष्यों के साथ रहने लगे। समय का सदुपयोग करने के लिए गौतम ने काफी खेतों में धान लगाया। उनके प्रभाव से उस क्षेत्र में सब ओर आनन्द ही आनन्द था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक बार कुछ ब्रह्मणों की स्त्रियाँ जो गौतम के आश्रम में आकर निवास करती थीं, जल के सम्बन्ध में विवाद हो जाने पर अहल्या से नाराज हो गयी। उन्होंने गौतम को नुकसान पहुँचाने हेतु अपने पतियों को उकसाया। उन ब्राह्मणों ने गौतम का अनिष्ट करने हेतु [[गणेश]] जी की आराधना की। गणेश जी के प्रसन्न होने पर उन ब्राह्मणों ने उनसे कहा कि आप ऐसा कोई उपाय कीजिए कि यहाँ के सभी ऋषि डाँट-फटकार कर गौतम को आश्रम से बार निकाल दें। गणेश जी ने उन सबको समझाया कि तुम लोगों को ऐसा करना उचित नहीं है। यदि तुम लोग बिना अपराध किये ही गौतम पर क्रोध करोगे, तो इससे तुम लोगों की ही हानि होगी। जिसने पहले उपकार किया हो, ऐसे व्यक्ति को कष्ट दिया जाय, तो वह अपने लिए ही दु:खदायी होता है। &lt;br /&gt;
जब अकाल पड़ा था और उपवास के कारण तुम लोग दु:ख भोग रहे थे, उस समय गौतम ने जल की व्यवस्था करके तुम लोगों को सुख पहुँचाया, किन्तु अब तुम लोग उन्हें ही कष्ट देना चाहते हो। उस विषय पर तुम लोग पुनर्विचार करो। गणेश जी के समझाने पर भी वे दुष्ट ऋषि दूसरा वर लेने के लिए तैयार नहीं हुए और अपने पहले वाले दुराग्रह पर अड़े रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवपुत्र गणेश अपने भक्तों के अधीन होने के कारण, उनके द्वारा गौतम के विरूद्ध माँगे गये वर को स्वीकार कर लिया और कहा कि उसे मैं अवश्य ही पूर्ण करूँगा। गौतम ने अपने खेत में धान और जौं लगाया था। गणेश जी उन अत्यन्त दुबली-पतली और कमजोर गाय का रूप धारण कर उन खेतों में जाकर फसलों को चरने लगे। उसी समय संयोगवश दयालु गौतम जी वहाँ पहुँच गये और मुट्ठी भर खर-पतवार लेकर उस गौ को हाँकने लगे। उन खर-पतवारों का स्पर्श होते ही वह दुर्बल गौ कांपती हुई धरती पर गिर गई और तत्काल ही मर गयी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे दुष्ट ब्राह्मण और उनकी स्त्रियाँ छिपकर उक्त सारी घटनाएँ देख रही थीं। गौ के धरती पर गिरते ही सभी ऋषि गौतम के सामने आकर बोल पड़े– ‘अरे , गौतम ने यह क्या कर डाला?’ गौतम भी आश्चर्य में डूब गयो। उन्होंने अहल्या से दु:खपूर्वक कहा– ‘देवि! यह सब कैसे हो गया और क्यों हुआ? लगता है, ईश्वर मुझ पर कुपित हैं। अब मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? मुझे तो गोहत्या के पाप ने स्पर्श कर लिया है।’ इस प्रकार पश्चात्ताप करते हुए गौतम की उन ब्राह्मणों तथा उनकी पत्नियों  ने घोर निन्दा की, उन्हें अपशब्द कहे और दुर्वचनों द्वारा अहल्या को भी प्रताड़ित किया। उनके शिष्यों तथा पुत्रों ने भी गौतम को पुन:-पुन: धिक्कारा और फटकारा, जिससे बेचारे गौतम भयंकर संकट और सन्ताप के सागर में गोता लगाने लगे। ब्राह्मणों ने उन्हें धिक्कारते हुए कहा– ‘अब तुम यहाँ से चले जाओ, क्योंकि तुम्हें यहाँ मुख दिखाना अब ठीक नहीं है। गोहत्या करने वाले का मुख देखने पर तत्काल सचैल अर्थात वस्त्र सहित स्नान करना पड़ता है। इस आश्रम में तुम जैसे गो हत्यारे के रहते हुए [[अग्नि]] देव और पितृगण (पितर) हमारे हव्य-कव्य (हवन तथा पिण्डदान) आदि को ग्रहण नहीं करेंगे। इसलिए पापी होने के कारण तुम बिना देरी किये शीघ्र ही परिवार सहित कहीं दूसरी जगह चले जाओ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसके बाद उन दुष्ट ब्राह्मणों ने गालियाँ देते हुए सपत्नीक ऋषि गौतम को अपमानित किया और उन पर ढेले तथा पत्थरों से भी प्रहार किया। कष्ट और मानसिक सन्ताप से भी पीड़ित गौतम ने उस आश्रम को तत्काल छोड़ दिया। उन्होंने वहाँ से तीन किलोमीटर की दूरी पर जाकर अपना आश्रम बनाया। उन ब्राह्मणों ने गौतम को तंग करने हेतु वहाँ भी उनका पीछा किया। उन्होंने कहा– ‘जब तक तुम्हारे ऊपर गो हत्या का पाप है, तब तक तुम्हें किसी भी वैदिकदेव अथवा पितृयज्ञ के अनुष्ठान करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। इसलिए तुम्हें कोई यज्ञ-यागादि कर्म नहीं करना चाहिए।’ मुनि गौतम ने बड़ी कठिनाई और दु:ख के साथ पन्द्रह दिनों को बिताया, किन्तु धर्म-कर्म से वंचित होने के कारण उनका जीवन दूभर हो गया। उन्होंने उन मुनियों, ब्राह्मणों से गोहत्या का प्रायश्चित बताने हेतु बार-बार दु:खी मन से अनुनय-विनय की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनकी दीनता पर तरस खाते हुए उन मुनियों ने कहा– ‘गौतम! तुम अपने पाप को प्रकट करते हुए अर्थात किये गये गोहत्या-सम्बन्धी पाप को बोलते हुए तीन बार पृथ्वी की परिक्रमा करके फिर एक महीने तक व्रत करो। व्रत के बाद जब तुम इस ब्रह्मगिरि की एक सौ एक परिक्रमा करोगे, उसके बाद ही तुम्हारी शुद्धि होगी। ब्राह्मणों ने उक्त प्रायश्चित का विकल्प बतलाते हुए कहा कि यदि तुम गंगा जी को इसी स्थान पर लाकर उनके जल में स्नान करो, तदनन्तर एक करोड़ पार्थिव लिंग बनाकर महादेव जी की उपासना (पार्थिव पूजन) करो, उसके बाद पुन: गंगा स्नान करके इस ब्रह्मगिरि पर्वत की ग्यारह परिक्रमा करने के बाद एक सौ कलशों (घड़ों) में जल भर पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक करो, फिर तुम्हारी शुद्धि हो जाएगी और तुम गो हत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे।’ गौतम ने उन ऋषियों की बातों को स्वीकार करते हुए कहा कि वे ब्रह्मगिरि की अथवा पार्थिव पूजन करेंगे। तत्पश्चात उन्होंने अहल्या को साथ लेकर ब्रह्मगिरि की परिक्रमा की और अतीव निष्ठा के साथ पार्थिव लिंगों का निर्माण कर महादेव जी की आराधना की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुनि गौतम द्वारा अटूट श्रद्धा भक्ति से पार्थिव पूजन करने पर [[पार्वती]] सहित भगवान [[शिव]] प्रसन्न हो गये। उन्होंने अपने प्रमथगणों सहित प्रकट होकर कहा– ‘गौतम! मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए अद्भुत रूप को देखकर आनन्द विभोर हो उठे। उन्होंने भक्तिभाव पूर्वक शिव को प्रणाम कर उनकी लम्बी स्तुति की। वे हाथ जोड़कर खड़े हुए और भगवान शिव से बोले कि ‘आप मुझे निष्पाप (पापरहित) बनाने की कृपा करें।’ भगवान शिव ने कहा– ‘तुम धन्य हो। तुम में  किसी भी प्रकार का कोई पाप नहीं है। संसार के लोग तुम्हारे दर्शन करने से पापरहित हो जाते हैं। तुम सदा ही मेरी भक्ति में लीन रहते हो, फिर पापी कैसे हो सकते हो? उन दुष्टों ने तुम्हारे साथ छल-कपट किया है, तुम पर घोर अत्याचार किया है। इसलिए वे ही पापी, हत्यारे और दुराचारी हैं। उन सब कृतघ्नों का कभी भी उद्धार नहीं होगा, जो लोग उन दुरात्माओं का दर्शन करेगें वे भी पापी बन जाएँगे।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव की बात सुनकर ऋषि गौतम आश्चर्यचकित हो उठे। उन्होंने शिव को पुन:-पुन: प्रणाम किया और कहा– ‘भगवान्! उन्होंने तो मेरा बड़ा उपकार किया है, वे महर्षि धन्य हैं, क्योंकि उन्होंने मेरे लिए परम कल्याणकारी कार्य किया है। उनके दुराचार से ही मेरा महान कार्य सिद्ध हुआ है। उनके बर्ताव से ही हमें आपका परम दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो सका है।’ गौतम की बात सुनकर भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे बोले– विप्रवर! तुम सभी ऋषियों में श्रेष्ठ हो, मैं तुम पर अतिशय प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम कोई उत्तम वर माँग लो।’ ऋषि गौतम ने महेश को बार-बार प्रणाम करते हुए कहा कि लोक कल्याण करने के लिए आप मुझे गंगा प्रदान कीजिए। इस प्रकार बोलते हुए गौतम ने लोकहित की कामना से भगवान शिव के चरणों को पकड़ लिया। तब भगवान महेश्वर ने [[पृथ्वी]] और स्वर्ग का सारभूत उस जल को निकाला, जो [[ब्रह्मा]] जी ने उन्हें उनके विवाह के अवसर पर दिया था। वह परम पवित्र जल स्त्री का रूप धारण करके जब वहाँ खड़ा हुआ, तो ऋषि गौतम ने उसकी स्तुति करते हुए नमस्कार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौतम ने कहा– ‘सम्पूर्ण भुवन को पवित्र करने वाली गंगे! नरक में गिरते हुए मुझ गौतम को पवित्र कर दो।’ भगवान शंकर ने भी कहा– ‘देवि! तुम इस मुनि को पवित्र करो और [[वैवस्वत मनु]] के अट्ठाइसवें [[कलि युग]] तक यहीं रहो।’ गंगा ने भगवान शिव से कहा कि ‘मैं अकेली यहाँ अपना निवास बनाने में असमर्थ हूँ। यदि भगवान महेश्वर अम्बिका और अपने अन्य गणों के साथ रहें तथा मैं सभी नदियों में श्रेष्ठ स्वीकार की जाऊँ, तभी इस धरातल पर रह सकती हूँ।’ भगवान शिव ने गंगा का अनुरोध स्वीकार करते हुए कहा कि ‘तुम यहाँ स्थित हो जाओ और मैं भी यहाँ रहूँगा।’ उसके बाद विविध देवता, ऋषि, अनेक तीर्थ तथा सम्मानित क्षेत्र भी वहाँ आ पहुँचे। उन सभी ने आदरपूर्वक गौतम, गंगा तथा भूतभावन शिव का पूजन किया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी स्तुति करते हुए अपना सिर झुकाया। उनकी आराधना से प्रसन्न गंगा और गिरीश ने कहा – ‘श्रेष्ठ देवताओं! हम तुम लोगों का प्रिय करना चाहते हैं, इसलिए तुम वर माँगो।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवताओं ने कहा कि ‘यदि गंगा और भगवान शिव प्रसन्न हैं, तो हमारे और मनुष्यों का प्रिय करने के लिए आप लोग कृपापूर्वक यहीं निवास करें। गंगा ने उत्तर देते हुए कहा कि ‘मैं तो गौतम जी का पाप क्षालित कर वापस चली जाऊँगी, क्योंकि आपके समाज में मेरी विशेषता कैसे समझी जाएगी और उस विशेषता का पता कैसे लगेगा? सबका प्रिय करने हेतु आप सब लोग यहाँ क्यों नहीं रहते हैं? यदि आप लोग यहाँ मेरी विशेषता सिद्ध कर सकें, तो मैं अवश्य ही रहूँगी।’ देवताओं ने बताया कि जब सिंह राशि पर बृहस्पति जी का पदार्पण होगा, उस समय हम सभी आकर यहाँ निवास करेंगे। ग्यारह वर्षों तक लोगों का गो-पातक यहाँ क्षालित होगा, उस पापराशि को धोने के लिए हम लोग सरिताओं में श्रेष्ठ आप गंगा के पास आया करेंगे। महादेवी! समस्त लोगों पर अनुग्रह करते हुए हमारा प्रिय करने हेतु तम्हें और भगवान शंकर को यहाँ पर नित्य निवास करना चाहिए।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महापर्व==&lt;br /&gt;
देवताओं ने आगे बताया कि ‘गुरू (बृहस्पति) जब तक सिंह राशि पर यहाँ विराजमान होंगे, तभी तक हम लोग यहाँ निवास करेंगे। उस समय हम लोग तुम्हारे जल में तीनों समय स्नान करके भगवान शंकर का दर्शन करते हुए शुद्ध होंगे।’ इस प्रकार ऋषि गौतम और देवताओं के द्वारा प्रार्थना करने पर भगवती गंगा और भगवान शिव वहाँ अवस्थित हो गये। तभी से वहाँ गंगा गौतमी (गोदावरी) के नाम से प्रसिद्ध हुईं और भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग भी त्र्यम्बक नाम से विख्यात हुआ। यह त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग समस्त पापों का क्षय करने वाला है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसी दिन से जब-जब बृहस्पति का सिंह राशि पर पदार्पण होता है, तब-तब सभी तीर्थ, क्षेत्र, देवता, पुष्कर आदि सरोवर, गंगा आदि श्रेष्ठ नदियाँ, भगवान विष्णु आदि देवगण गौतमी के तट पर आते हैं और वहीं निवास करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जितने दिनों तक वे गौतमी के तट पर निवास करते हैं, उतने दिनों तक उनके मूलस्थान पर कोई फल नहीं प्राप्त होता है। इस प्रकार गौतमी तट पर स्थित इस त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग का जो मनुष्य भक्तिभाव पूर्वक दर्शन पूजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। ऋषि गौतम द्वारा पूजित यह त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग इस लोक में मनुष्य के समस्त अभीष्ट फलों को प्रदान करता है और परलोक में उत्तम मोक्ष पद को देने वाला है– &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ज्योतिर्लिंगमिदं प्रोक्तं त्र्यम्बकं नाम विश्रुतम्।&lt;br /&gt;
स्थितं तटे हि गौतम्या महापातकनाशनम्।।&lt;br /&gt;
य: पश्येद्भक्तितो ज्योतिर्लिंगं त्र्यम्बकनामकम्।&lt;br /&gt;
पूजयेत्प्रणमेत्सतुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यते।।&lt;br /&gt;
ज्योतिर्लिंग त्र्यम्बकं हि पूजितं गौतमेन ह।&lt;br /&gt;
सर्वकामप्रदं चात्र परत्र परमुक्तिदम्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-02T05:14:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhimshankar.jpg|भीमशंकर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Bheemashankar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Kashi-Vishwanath.jpg|विश्वनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Omkareshwar.jpg|ओंकारश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Omkareshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Trimbakeshwar.jpg|त्रयंबकेश्वर मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-02T05:14:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Kashi-Vishwanath.jpg|विश्वनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री विश्वेश्वर / Shri Vishveshvar'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग [[उत्तर प्रदेश]] के [[वाराणसी]] जनपद के [[काशी]] नगर मे अवस्थित है। कहते है, काशी तीनों लोकों में न्यारी नगरी है, जो भगवान [[शिव]] के त्रिशूल पर विराजती है। इसे आनन्दवन, आनन्दकानन, अविमुक्त क्षेत्र तथा काशी आदि अनेक नामों से स्मरण किया गया है। काशी साक्षात सर्वतीर्थमयी, सर्वसन्तापहरिणी तथा मुक्तिदायिनी नगरी है। निराकर महेश्वर ही यहाँ भूतभावना भोलानाथ श्री विश्वनाथ के रूप में साक्षात अवस्थित हैं। इस काशी क्षेत्र में स्थित #श्री दशाश्वमेध, &lt;br /&gt;
#श्री लोलार्क, &lt;br /&gt;
#श्री बिन्दुमाधव, &lt;br /&gt;
#श्री केशव और &lt;br /&gt;
#श्री मणिकर्णिक– ये पाँच प्रमुख तीर्थ हैं, जिनके कारण इसे‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा जाता है। काशी के उत्तर में ओंकार खण्ड, दक्षिण में केदारखण्ड और मध्य में विश्वेश्वरखण्ड में ही बाबा विश्वनाथ का प्रसिद्ध है। ऐसा सुना जाता है कि मन्दिर की पुन: स्थापना [[आदि जगत गुरू शंकरचार्य]] जी ने अपने हाथों से की थी। श्री विश्वनाथ-मन्दिर को मुग़ल बादशाह [[औरंगज़ेब]] ने नष्ट करके उस स्थान पर मस्जिद बनवा दी थी, जो आज भी विद्यमान है। इस मस्जिद के परिसर को ही 'ज्ञानवाणी' कहा जाता है। प्राचीन शिवलिंग आज भी 'ज्ञानवापी' कहा जाता है। आगे चलकर भगवान शिव की परम भक्त [[महारानी अहल्याबाई]] ने ज्ञानवापी से कुछ हटकर श्री विश्वनाथ के एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण कराया था। [[महाराजा रणजीत सिंह]] जी ने इस मन्दिर पर स्वर्ण कलश (सोने का शिखर) चढ़वाया था। काशी में अनेक विशिष्ट तीर्थ हैं, जिनके विषय में लिखा है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम्।&lt;br /&gt;
वन्दे काशीं गुहां गंगा भवानीं मणिकर्णिकाम्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्थात ‘विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग बिन्दुमाधव, ढुण्ढिराज [[गणेश]], दण्डपाणि कालभैरव, गुहा गंगा (उत्तरवाहिनी गंगा), माता अन्नपूर्णा तथा मणिकर्णिक आदि मुख्य तीर्थ हैं। &lt;br /&gt;
   &lt;br /&gt;
काशीक्षेत्र में मरने वाले किसी भी प्राणी को निश्चित ही मुक्ति प्राप्त होती है। जब कोई मर रहा होता है, उस समय भगवान श्री विश्वनाथ उसके कानों में तारक मन्त्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन के चक्कर से छूट जाता है, अर्थात इस संसार से मुक्त हो जाता है। &lt;br /&gt;
==काशी नगरी की उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
काशी नगरी की उत्पत्ति तथा उसे भगवान [[शिव]] की प्रियतमा बनने की कथा [[स्कन्द पुराण]] के काशी खण्ड में वर्णित है। काशी उत्पत्ति के विषय में [[अगस्त्य]] जी ने श्रीस्कन्द से पूछा था, जिसका उत्तर देते हुए श्री स्कन्द ने उन्हें बताया कि इस प्रश्न का उत्तर हमारे पिता महादेव जी ने माता [[पार्वती]] जी को दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘महाप्रलय के समय जगत के सम्पूर्ण प्राणी नष्ट हो चुके थे, सर्वत्र घोर अन्धकार छाया हुआ था। उस समय 'सत्' स्वरूप ब्रह्म के अतिरिक्त [[सूर्य देवता|सूर्य]], [[नक्षत्र]], [[ग्रह]],तारे आदि कुछ भी नहीं थे। केवल एक ब्रह्म का अस्तित्त्व था, जिसे शास्त्रों में ‘एकमेवाद्वितीयम्’ कहा गया है। ‘ब्रह्म’ का ना तो कोई नाम है और न रूप, इसलिए वह मन, वाणी आदि इन्द्रियों का विषय नहीं बनता है। वह तो सत्य है, ज्ञानमय है, अनन्त है, आनन्दस्वरूप और परम प्रकाशमान हैं। वह निर्विकार, निराकार, निर्गुण, निर्विकल्प तथा सर्वव्यापी, माया से परे तथा उपद्रव से रहित परमात्मा [[कल्प]] के अन्त में अकेला ही था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल्प के आदि में उस परमात्मा के मन में ऐसा संकल्प उठा कि ‘मैं एक से दो हो जाऊँ’। यद्यपि वह निराकार है, किन्तु अपनी लीला शक्ति का विस्तार करने के उद्देश्य से उसने साकार रूप धारण कर लिया। परमेश्वर के संकल्प से प्रकट हुई वह ऐश्वर्य गुणों से भरपूर, सर्वज्ञानमयी, सर्वस्वरूप द्वितीय मूर्ति सबके लिए वन्दनीय थी। महादेव ने पार्वती जी से कहा– ‘प्रिये! निराकार परब्रह्म की वह द्वितीय मूर्ति मैं ही हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी शास्त्र और विद्वान मुझे ही ‘ईश्वर ’ कहते हैं। साकार रूप में प्रकट होने पर भी मैं अकेला ही अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता हूँ। मैंने ही अपने शरीर से कभी अलग न होने वाली 'तुम' प्रकृति को प्रकट किया है। तुम ही गुणवती माया और प्रधान प्रकृति हो। तुम प्रकृति को ही बुद्धि तत्त्व को जन्म देने वाली तथा विकार रहित कहा जाता है। काल स्वरूप आदि पुरूष मैंने ही एक साथ तुम शक्ति को और इस काशी क्षेत्र को प्रकट किया है।’ &lt;br /&gt;
==प्रकृति और ईश्वर==&lt;br /&gt;
इस प्रकार उस शक्ति को ही प्रकृति और ईश्वर को परम पुरूष कहा गया है। वे दोनों शक्ति और परम पुरूष परमानन्दमय स्वरूप में होकर काशी क्षेत्र में रमण करने लगे। पाँच कोस के क्षेत्रफल वाले काशी क्षेत्र को [[शिव]] और [[पार्वती]] ने प्रलयकाल में भी कभी त्याग नहीं किया है। इसी कारण उस क्षेत्र को ‘अविमुक्त’ क्षेत्र कहा गया है। जिस समय इस भूमण्डल की, जल की तथा अन्य प्राकृतिक पदार्थों की सत्ता (अस्तित्त्व) नहीं रह जाती है, उस समय में अपने विहार के लिए भगवान जगदीश्वर शिव ने इस काशी क्षेत्र का निर्माण किया था। स्कन्द ([[कार्तिकेय]]) ने अगस्त्य जी को बताया कि यह काशी क्षेत्र भगवान शिव के आनन्द का कारण है, इसीलिए पहले उन्होंने इसका नाम ‘आनन्दवन’ रखा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काशी क्षेत्र के रहस्य को ठीक-ठीक कोई नही जान पाता है। उन्होंने कहा कि उस आनन्दकानन में जो यत्र-तत्र (इधर-उधर) सम्पूर्ण शिवलिंग हैं, उन्हें ऐसा समझना चाहिए कि वे सभी लिंग आनन्दकन्द रूपी बीजो से अंकुरित (उगे) हुए हैं। &lt;br /&gt;
==पुरूषोत्तम==&lt;br /&gt;
उसके बाद भगवान शिव ने माँ जगदम्बा के साथ अपने बायें अंग में अमृत बरसाने वाली अपनी दृष्टि डाली। उस दृष्टि से अत्यन्त तेजस्वी तीनो लोकों में अतिशय सुन्दर एक पुरूष प्रकट हुआ। वह अत्यन्त शान्त, सतो गुण से परिपूर्ण तथा सागर से भी अधिक गम्भीर और [[पृथ्वी]] के समान श्यामल था तथा बड़े-बड़े उसके नेत्र कमल के समान सुन्दर थे। अत्यन्त कमनीय और रमणीय होते हुए भी प्रचण्ड बाहुओं से सुशोभित वह पुरूष सुर्वण रंग के दो पीताम्बरों से अपने शरीर को ढँके हुए था। उसके नाभि कमल से बहुत ही मनमोहक सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी। देखने में वह अकेले ही सम्पूर्ण गुणों की खान तथा समस्त कलाओं का खजाना प्रतीत होता था। वह एकाकी ही जगत के सभी पुरूषो में उत्तम था, इसलिए उसे ‘पुरूषोत्तम’ कहा गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सब गुणों से विभूषित उस महान पुरू को देखकर महादेव जी ने उससे कहा– ‘अच्युत! तुम महाविष्णु हो। तुम्हारे नि:श्वास (सांस) से [[वेद]] प्रकट होंगे, जिनके द्वारा तुम्हें सब कुछ ज्ञान हो जाएगा अर्थात तुम सर्वज्ञ बन जाओगे।’ इस प्रकार महाविष्णु  को कहने के बाद भगवान शंकर (पार्वती) के साथ विचरण  करने हेतु आनन्दवन में प्रवेश कर गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरूषोत्तम भगवान [[विष्णु]] जब ध्यान में बैठे, तो उनका मन तपस्या में लग गया। उन्होंने अपने चक्र से एक सुन्दर पुष्करिणी (सरोवर) खोदकर उसे अपने शरीर के पसीने से भर दिया। उसके बाद उस सरोवर के किनारे उन्होंने कठिन तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर पार्वती के साथ भगवान शिव वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने महाविष्णु से वर माँगने के लिए कहा, तो विष्णु ने भवानी सहित हमेशा उनके दर्शन की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव सदा दर्शन देने के वचन को स्वीकार करते हुए बोले कि मेरी मणिमय कर्णिका (मणि से बने कानों के कुण्डल) यहाँ गिर पड़ी है, इसलिए यह स्थान 'मणिकर्णिका तीर्थ' के नाम से निवेदन किया कि चूँकि मुक्तामय (मणिमय) कुण्डल यहाँ गिरा है, इसलिए यह मुक्ति का प्रधान क्षेत्र माना जाय अर्थात अकथनीय ज्योति प्रकाशित होती रहे। इन कारणो से इसका दूसरा नाम ‘काशी’ भी स्वीकार हो। विष्णु ने आगे निवेदन किया कि [[ब्रह्मा]] से लेकर कीट-पतंग जितने भी प्रकार के जीव हैं, उन सबके काशी क्षेत्र में मरने पर मोक्ष की प्राप्ति अवश्य हो। उस मणिकर्णिका तीर्थ में स्नान, सन्ध्या, जप, हवन, पूजन, वेदाध्ययन, तर्पण, पिण्ड दान, दशमहादान, कन्यादान, अनेक प्रकार के यज्ञों, व्रतोद्यापन (व्रत को समाप्त करना) वृषोत्सर्ग तथा शिवलिंग स्थापना आदि शुभ कर्मों का फल मोक्ष के रूप में प्राप्त होवे। जगत में जितने भी क्षेत्र हैं, उनमें सर्वाधिक सुन्दर और शुभकारी हो तथा इस काशी का नाम लेने वाले भी पाप से मुक्त हो जायें।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाविष्णु की बातें को स्वीकार करते हुए शिव ने उन्हें आदेश दिया कि ‘आप विविध प्रकार की यथायोग्य सृष्टि करो और उनमें जो कुमार्ग पर चलने वाले दुष्टात्मा हैं, उनके संहार में भी कारण बनो। पाँच कोस के क्षेत्रफल में फैला यह काशीधाम मुझे अतिशय प्रिय है। मैं यहाँ सदा निवास करता हूँ, इसिलए इस क्षेत्र में सिर्फ मेरी ही आज्ञा चलती है, [[यमराज]] आदि किसी अन्य की नहीं। इस 'अविमुक्त' क्षेत्र में रहने वाला पापी हो अथवा धर्मात्मा उन सबका शासक अकेला मैं ही हूँ। काशी से दूर रहकर भी जो मनुष्य मानसिक रूप से इस क्षेत्र का स्मरण करता है, उसे पाप स्पर्श नहीं करता है और वह काशी क्षेत्र में पहुँच कर उसके पुण्य के प्रभाव से मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। जो कोई संयमपूर्वक काशी में बहुत दिनों तक निवास करता  है, किन्तु संयोगवश उसकी मृत्यु काशी से बाहर हो जाती है, तो वह भी स्वर्गीय सुख को प्राप्त करता है और अन्त में पुन: काशी में जन्म लेकर मोक्ष पद को प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;
==सर्वव्यापी शिव==&lt;br /&gt;
जो मनुष्य श्री काशी विश्वनाथ की प्रसन्नता के लिए इस क्षेत्र में दान देता है, वह धर्मात्मा भी अपने जीवन को धन्य बना लेता है। पंचक्रोशी (पाँच कोस की) अविमुक्त क्षेत्र विश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध एक ज्योतिर्लिंग का स्वरूप ही जानना और मानना चाहिए। भगवान विश्वनाथ काशी में स्थित होते हुए भी सर्वव्यापी होने के कारण सूर्य की तरह सर्वत्र उपस्थित रहते हैं। जो कोई उस क्षेत्र की महिमा से अनजान है अथवा उसमें श्रद्धा नहीं है, फिर भी वह जब काशीक्षेत्र में प्रवेश करता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो वह निष्पाप होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। यदि कोई मनुष्य काशी में रहते हुए पापकर्म करता है, तो मरने के बाद वह पहले 'रूद्र पिशाच' बनता है, 'उसके बाद उसकी मुक्ति होती है’&lt;br /&gt;
==स्कन्द पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[स्कन्द पुराण]] के इस आख्यान से स्पष्ट होता है कि श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या आदि से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहाँ निराकार परब्रह्म परमेश्वर महेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए। उन्होंने दूसरी बार महाविष्णु की तपस्या के फलस्वरूप प्रकृति और पुरूष (शक्ति और शिव) के रूप में उपस्थित होकर आदेश दिया। महाविष्णु के आग्रह पर ही भगवान शिव ने काशीक्षेत्र को अविमुक्त कर दिया। उनकी लीलाओं पर ध्यान देने से काशी के साथ उनकी अतिशय प्रियशीलता स्पष्ट मालूम होती है। इस प्रकार [[द्वादश ज्योतिर्लिंग]] में श्री विश्वेश्वर भगवान विश्वनाथ का शिवलिंग सर्वाधिक प्रभावशाली तथा अद्भुत शक्तिसम्पन्न लगता है। माँ अन्नापूर्णा (पार्वती) के साथ भगवान शिव अपने त्रिशूल पर काशी को धारण करते हैं और कल्प के प्रारम्भ में अर्थात सृष्टि रचना के प्रारम्भ में उसे त्रिशूल से पुन: भूतल पर उतार देते हैं।&lt;br /&gt;
शिव महापुराण में श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा कुछ इस प्रकार बतायी गई है– 'परमेश्वर शिव ने माँ पार्वती के पूछने पर स्वयं अपने मुँह से श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा कही थी। उन्होंने कहा कि वाराणसी पुरी हमेशा के लिए गुह्यतम अर्थात अत्यन्त रहस्यात्मक हैं तथा सभी प्रकार के जीवों की मुक्ति का कारण है। इस पवित्र क्षेत्र में सिद्धगण शिव-आराधना का व्रत लेकर अनेक स्वरूप बनाकर संयमपूर्वक मेरे लोक की प्राप्ति हेतु महायोग का नाम 'पाशुपत योग' है। पाशुपतयोग भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रकार का फल प्रदान करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव ने कहा कि मुझे काशी पुरी में रहना सबसे अच्छा लगता है, इसलिए मैं सब कुछ छोड़कर इसी पुरी में निवास करता हूँ। जो कोई भी मेरा भक्त है और जो कोई मेरे शिवतत्त्व का ज्ञानी है, ऐसे दोनों प्रकार के लोग मोक्षपद के भागी बनते हैं, अर्थात उन्हें मुक्ति अवश्य प्राप्त होती है। इस प्रकार के लोगों को न तो तीर्थ की अपेक्षा रहती है और न विहित अविहित कर्मों का प्रतिबन्ध। इसका तात्पर्य यह है कि उक्त दोनों प्रकार के लोगों को जीवन्मुक्त मानना चाहिए। वे जहाँ भी मरते हैं, उन्हें तत्काल मुक्ति प्राप्त होती है। भगवान शिव ने माँ पार्वती को बताया कि बालक वृद्ध या जवान हो, वह किसी भी वर्ण, जाति या आश्रम का हो, यदि अविमुक्त क्षेत्र में मृत्यु होती है, तो उसे अवश्य ही मुक्ति मिल जाती है। स्त्री यदि अपवित्र हो या पवित्र हो, वह कुमारी हो, विवाहिता हो, विधवा हो, बन्ध्या, रजस्वला, प्रसूता हो अथवा उसमें संस्कारहीनता हो, चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, यदि उसकी मृत्यु काशी क्षेत्र में होती है, तो वह अवश्य ही मोक्ष कीभागीदार बनती है। &lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण|शिव महापुराण]] के अनुसार इस पुथ्वी पर जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्गुण, निर्विकार तथा सनातन ब्रह्मस्वरूप ही है। अपने कैवल्य (अकेला) भाव में रमण करने वाले अद्वितीय परमात्मा में जब एक से दो बनने की इच्छा हुई, तो वही सगुणरूप में ‘शिव’ कहलाने लगा। शिव ही पुरूष और स्त्री, इन दो हिस्सों में प्रकट हुए और उस पुरूष भाग को शिव तथा स्त्रीभाग को ‘शक्ति’ कहा गया। उन्हीं सच्चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्ति ने अदृश्य रहते हुए स्वभाववश प्रकृति और पुरूषरूपी चेतन की सृष्टि की। प्रकृति और पुरुष सृष्टिकर्त्ता अपने माता-पिता को न देखते हुए संशय में पड़ गये। उस समय उन्हें निर्गुण  ब्रह्म की आकाशवाणी सुनाई पड़ी– ‘तुम दोनों को तपस्या करनी चाहिए, जिससे कि बाद में उत्तम सृष्टि का विस्तार होगा।’&lt;br /&gt;
उसके बाद भगवान शिव ने तप:स्थली के रूप में तेजोमय पाँच कोसों का शुभ और सुन्दर एक नगर का निर्माण किया, जो उनका ही साक्षात रूप था। उसके बाद उन्होंने उस नगर को प्रकृति और पुरुष के पास भेजा, जो उनके समीप पहुँच कर आकाश में ही स्थित हो गया। तब उस पुरूष (श्री हरि) ने उस नगर  में भगवान शिव का ध्यान करते हुए सृष्टि की कामना से वर्षों तपस्या की। तपस्या में श्रम होने के कारण श्री हरि (पुरूष) के शरीर से श्वेतजल की अनेक धाराएँ फूट पड़ीं, जिनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया। वहाँ उसके अतिरकित कुछ भी दिखाई नहीं देता था। उसके बाद भगवान विष्णु (श्री हरि) मन ही मन विचार करने लगे कि यह कैसी विचित्र वस्तु दिखाई देती है। उस आश्चर्यमय दृश्य को देखते हुए जब उन्होंने अपना सिर हिलाया, तो उनके एक कान से मणि खिसककर गिर पड़ी। मणि के गिरने से वह स्थान ‘मणिकर्णिका-तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस महान जलराशि में जब पंचक्रोशी डूबने लगी, तब निर्गुण निर्विकार भगवान शिव ने उसे शीघ्र ही अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया। तदनन्तर विष्णु (श्रीहरि) अपनी पत्नी (प्रकृति) के साथ वहीं सो गये। उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ, जिससे [[ब्रह्मा]]जी की उत्पत्ति हुई। कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति में भी निराकार शिव का निर्देश ही कारण था। उसके बाद ब्रह्मा जी ने शिव के आदेश से विलक्षण सृष्टि की रचना प्रारम्भ कर दी। ब्रह्मा जी ने ब्रह्माण्ड का विस्तार (विभाजन) चौदह भुवनों में किया जब कि ब्रह्माण्ड का क्षेत्रफल पचास करोड़ योजन बताया गया है। भगवान शिव ने विचार किया कि ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत कर्मपाश (कर्बन्धन) में फँसे प्राणी मुझे कैसे प्राप्त हो सकेंगे? उस प्रकार विचार करते हुए उन्होंने पंचकोशी को अपने त्रिशूल से उतार कर इस जगत में छोड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काशी में स्वयं परमेश्वर ने ही अविमुक्त लिंग की स्थापना की थी, इसलिए उन्होंने अपने अंशभूत हर (शिव) को यह निर्देश दिया कि तुम्हें उस क्षेत्र का कभी भी त्याग नही करना चाहिए। यह पंचकोशी लोक का कल्याण करने वाली, कर्मबन्धनों कोनष्ट करने वाली, ज्ञान प्रकाश करने वाली तथा प्राणियों के लिए मोक्षदायिनी है। यद्यपि ऐसा बताया गया है कि ब्रह्मा जी का एक दिन पूरा हो जाने पर इस जगत् का प्रलय हो जाता है, फिर भी अविमुक्त काशी क्षेत्र का नाश नहीं होता है, क्योंकि उसे भगवान परमेश्वर शिव अपने त्रिशूल पर उठा लेते हैं। ब्रह्मा जी जब नई सृष्टि प्रारम्भ करते हैं, उस समय भगवान शिव काशी को पुन: भूतल पर स्थापित कर देते हैं। कर्मों का कर्षण (नष्ट) करने के कारण ही उस क्षेत्र का नाम ‘काशी’ है, जहाँ अविमुक्तेश्वरलिंग हमेशा विराजमान रहता है। संसार में जिसको कहीं गति नहीं मिलती है, उसे वाराणसी में गति मिलती है। महापुण्यमयी पंचक्रोशी करोड़ों हत्याओं के दुष्फल का विनाश करने वाली है। भगवान शंकर की यह प्रिय नगरी समानरूप से भोग ओर मोक्ष को प्रदान करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालाग्नि रूद्र के नाम से विख्यात कैलासपति शिव अन्दर से सतोगुणी तथा बाहर से तमोगुणी कहलाते हैं। यद्यपि वे निर्गुण हैं, किन्तु जब सगुण रूप में प्रकट होते हैं, तो ‘शिव’ कहलाते है। रूद्र ने पुन: पुन: प्रणाम करके निर्गुण शिव से कहा– ‘विश्वनाथ’ महेश्वर! निस्सन्देह मैं आपका ही हूँ। मुझ आत्मज (पुत्र) पर आप कृपा कीजिए। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, आप लोककल्याण की कामना से जीवों का उद्धार करने के लिए यहीं विराजमान हों।’ इसी प्रकार स्वयं अविमुक्त क्षेत्र ने भी शंकर जी से प्रार्थना की है। उसने कहा– ‘देवाधिदेव’ महादेव वास्तव में आप ही तीनों लोकों के स्वामी हैं और ब्रह्मा तथा विष्णु आदि के द्वारा पूजनीय हैं। आप काशीपुरी को अपनी राजधानी के रूप में स्वीकार करें। मैं यहाँ स्थिर भाव से बैठा हुआ सदा आपका ध्यान करता रहूँगा। सदाशिव! आप उमा सहित यहाँ सदा विराजमान रहें और अपने भक्तों का कार्य सिद्ध करते हुए समस्त जीवों के संसार सागर से पार करें। इस प्रकार भगवान शिव अपने गणो सहित काशी में विराजमान हो गये। तभी से काशी पुरी सर्वश्रेष्ठ हो गई। उक्त आशय को ही शिव पुराण में इस प्रकार कहा गया है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
देवदेव महादेव कालामयसुभेषज।&lt;br /&gt;
त्वं त्रिलोकपति: सत्यं सेव्यो ब्रह्माच्युतादिभि:।।&lt;br /&gt;
काश्यां पुर्यां त्वया देव राजधानी प्रगृह्यताम्।&lt;br /&gt;
मया ध्यानतया स्थेयमचिन्त्यसुखहेतवे।।&lt;br /&gt;
मुक्तिदाता भवानेव कामदश्च न चापर:।&lt;br /&gt;
तस्मात्त्वमुपकाराय तिष्ठोमासहित: सदा।।&lt;br /&gt;
जीवान्भवाष्धेरखिलास्तारय त्वं सदाशिव।&lt;br /&gt;
भक्तकार्य्यं कुरू हर प्रार्थयामि पुन: पुन:।।&lt;br /&gt;
इत्येवं प्रार्थितस्तेन विश्वनाथेन शंकर:।&lt;br /&gt;
लोकानामुपकारार्थं तस्थौ तत्रापि सर्वराट्।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 22/35-39&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                &lt;br /&gt;
==परिवहन व्यवस्था==&lt;br /&gt;
उत्तर भारत में अवस्थित श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए वाराणसी शहर में आना होता है। देश-विदेश के लोगों के लिए यातायात-व्यवस्था अच्छी है।&lt;br /&gt;
धार्मिक जनता अपनी सुविधा के अनुसार रेल, बस, हवाई जहाज, टैक्सी आदि से मनचाही यात्रा कर सकती है। &lt;br /&gt;
==धार्मिक भावनायें==&lt;br /&gt;
जो वर्षों से काशी नगरी में निवास कर रहा हो और उसकी आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो गई हो, फिर भी वह काशी छोड़कर दूर नहीं जाना चाहता है। शास्त्रकारों ने लिखा है कि जिस स्थान पर मृत्यु मंगलदायक, भस्म  का त्रिपुण्ड (तिलक) ही अलंकार है, लंगोटी ही जहाँ रेशमी वस्त्र के समान है, ऐसी काशी का सेवन कौन नहीं करना चाहेगा?&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
मरणं मंगलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्।&lt;br /&gt;
कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज भी गंगा के किनारे दशाश्वमेध-घाट पर एक सामान्य व्यक्ति भी यह कहते मिल जाता है कि– &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चना चबेना गंगजल, जो पूरवे करतार।&lt;br /&gt;
काशी कभी न छोड़ियो, बाबा विश्वनाथ दरबार।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार माँ गंगा के किनारे बसी हुई श्री माँ अन्नपूर्णा सहित भोलेनाथ बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी अतीव दिव्य है, मोक्षदायिका है और तीनों लोकों से विलक्षण है। श्री विश्वेश्वर विश्वनाथ का यह ज्योतिर्लिंग साक्षात भगवान परमेश्वर महेश्वर का स्वरूप है, यहाँ भगवान  शिव सदा विराजमान रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===बाहरी कड़ियाँ===&lt;br /&gt;
[http://varanasi.nic.in/temple/KASHI.html काशी विश्वनाथ]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>भीमशंकर ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-02T05:04:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Bhimshankar.jpg|भीमशंकर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Bheemashankar Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री भीमशंकर / Shri Bheemshankar'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में प्रकट हुए भगवान [[शंकर]] के बारह ज्योतिर्लिंग में श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का छठा स्थान हैं। इस ज्योतिर्लिंग में कुछ मतभेद हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्त्रोत में ‘डाकिन्यां भीमशंकरम्’ ऐसा लिखा है, जिसमें ‘डाकिनी’ शब्द से स्थान का स्पष्ट उल्लेख नहीं हो पाता है। इसके अनुसार भीमशंकर ज्योतिर्लिंग [[मुम्बई]] से पूरब और [[पूना]] से उत्तर [[भीमा नदी]] के तट पर अवस्थित है।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के अनुसार भीमशंकर ज्योतिर्लिंग [[असम]] प्रान्त के कामरूप जनपद में [[गुवाहाटी]] के पास ब्रह्मरूप पहाड़ी पर स्थित है। कुछ लोग तो [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[नैनीताल]] ज़िले में ‘उज्जनक’ स्थान पर स्थित भगवान [[शिव]] के विशाल मन्दिर को भी भीमशंकर ज्योतिर्लिंग कहते हैं। श्री शिव महापुराण के कोटि रूद्र संहिता में श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘लोक हित की कामना से भगवान शंकर कामरूप देश में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। उनका वह कल्याणकारक स्वरूप बड़ा ही सुखदायी था। पूर्वकाल में भीम नामक एक महाबलशाली और पराक्रमी राक्षस उत्पन्न हुआ था। वह अत्याचारी राक्षस जगह-जगह धर्म का नाश करता हुआ सम्पूर्ण प्राणियों को सताया करता था। भयंकर बलशाली वह राक्षस [[कुम्भकर्ण]] के वीर्य और कर्कट की पुत्री कर्कटी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। भीम अपनी माता कर्कटी के साथ ही ‘सह्य’ नामक पर्वत पर निवास करता था। उसने अपने जीवन में अपने पिता को कभी नहीं देखा था। एक दिन उसने आपनी माता से पूछा- ‘माँ! तुम इस पर्वत पर अकेली क्यों रहती हो? मेरे पिताजी कौन हैं और कहाँ रहते हैं? मुझे ये सब बातें जानने की बड़ी इच्छा है, इसलिए तुम सच-सच बताओ’–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
मात मे क: पिता कुत्र कथं वैकाकिनी स्थिता। &lt;br /&gt;
ज्ञातुमिच्छमि तत्सर्वं यथार्थं त्वं वदाधुना।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 20/8&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदनन्तर उसकी माता कर्कटी ने उसे विस्तार से बताया कि तुम्हारे पिता का नाम कुम्भकर्ण था, जो [[रावण]] के छोटे भाई थे। महाबलशाली और पराक्रमी उस वीर को भाई सहित श्री[[राम]] ने मार डाला था। मेरे पिता अर्थात जुम्हारे नाना का नाम कर्कट और नानी का नाम पुष्कसी था। मेरे पूर्व पति का नाम ‘विराध’ था, जिन्हें पहले ही श्रीराम ने मार डाला था। मैं अपने प्रिय स्वामी विराध के मारे जाने पर अपने माता-पिता के पास आकर रहने लगी थी, क्योंकि मेरा सहारा अन्य कोई नहीं था। एक दिन मेरे माता-पिता आहार की खोज में निकले और उन्होंने [[अगस्त्य]] मुनि के परम शिष्य तपस्वी सुतीक्ष्ण को अपना आहार बनाना चाहा, किन्तु वे ऋषि महान तपस्वी और महात्मा थे। इसलिए उन्होंने कुपित होकर अपने तपोबल से मेरे माता-पिता को भस्म कर डाला। वे दोनों वहीं मर गये और मैं अकेली अनाथ हो गई। मुझ पर चारों तरफ से दु:ख का पहाड़ टूट पड़ा और मैं दु:खी होकर अकेली इस पर्वत पर रहने लगी। मेरा इस दुनियाँ में कोई अवलम्बन क्या सहारा भी न रहा और मैं आतुर होकर एकाकी ही किसी प्रकार अपना जीवन जी रही थी। एक दिन इस सुनसान पहाड़ पर राक्षसराज रावण के छोटे भाई महाबल और पराक्रम से युक्त कुम्भकर्ण आ गये। उन्होंने मेरे साथ बलात्कार किया और समागम के बाद वे मुझे यहीं छोड़कर पुन: [[लंका]] में चले गये। उसके बाद समय पूरा होने पर तुम्हारा जन्म हुआ। बेटा! तुम अपने पिता के समान ही साक्षात महाबली और पराक्रमी हो। तुम्हें ही देख-देखकर, तुम्हारे ही सहारे अब मैं अपना जीवन चला रही हूँ और किसी तरह समय बीत रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपनी माता कर्कटी के बात सुनकर भयानक पराक्रमी राक्षस कुपित हो उठा। उसने विचार किया कि [[विष्णु]] के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए, उनसे प्रतिरोध (बदला) लेने का क्या उपाय है? वह चिन्तित होकर अपनी माँ की बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगा- ‘विष्णु ने मेरे पिता को मार डाला। मेरे नाना-नानी भी उनके ही भक्त के हाथों मारे गये। इतना ही नहीं विराध को भी उन्होंने ही मार डाला। निश्चित ही श्रीहरि ने मुझ पर बहुत ही अत्याचार किया है, अत्यधिक कष्ट दिया है। उसने निश्चय किया कि हरि द्वारा किये गये कृत्य का बदला वह अवश्य लेगा। उसने अपनी माता के सामने कहा कि यदि मैं अपने पिता का पुत्र हूँ, तो श्री हरि से अवश्य ही बदला लेकर रहूँगा, उन्हें भारी कष्ट दूँगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार निश्चय कर वह बलवान राक्षस अपनी शक्ति को और अधिक बढ़ाने के लिए तपस्या करने चला गया। उसने संकल्प लेकर [[ब्रह्मा]]जी को प्रसन्न करने हेतु एक हजार वर्षों तक तप किया। वह मानसिक रूप से अपने इष्टदेव के ध्यान में ही मग्न रहता था। उसकी तपस्या, ध्यान और अर्चना-वन्दना से लोकपितामह ब्रह्मा जी प्रसन्न हो उठे। ब्रह्मा जी ने उसे वर देने की इच्छा से कहा- ‘भीम! मैं तुम्हारी तपस्या और धैर्य से बहुत प्रसन्न हूँ और तुम्हें वर देना चाहता हूँ। इसलिए तुम अपना अभीष्ट वर मांगो।' तदनन्तर उस राक्षस ने कहा– ‘देवेश्वर! यदि आप मेरे ऊपर सच में प्रसन्न हैं और मेरा भला करना चाहते हैं, तो आप मुझे अतुलनीय बल प्रदान कीजिए। मुझे इतना बल और पराक्रम प्राप्त हो, जिसकी तुलना कहीं भी न हो सके।’ इस प्रकार बोलते हुए राक्षस भीम ने बार-बार ब्रह्मा जी को प्रणाम किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसकी तपस्या से प्रभावित ब्रह्मा जी उसे अतुलनीय बल-प्राप्ति का वर देकर अपने धाम चले गये। ब्रह्मा जी से अतुलनीय बल प्राप्त करने के कारण वह राक्षस अत्यन्त प्रसन्न हो गया। उसने अपने निवास पर आकर अपनी माता जी को प्रणाम किया और अत्यन्त अहंकार के साथ उससे कहा– ‘माँ! अब तुम मेरा बल और पराक्रम देखो। अब मैं [[इन्द्र]] इत्यादि देवताओं के साथ ही इनका सहयोग करने वाले महान श्री हरि का भी संहार कर डालूँगा। अपनी माँ से इस प्रकार कहने के बाद वीर राक्षस भीम ने इन्द्रादि देवताओं पर चढ़ाई कर दिया। उसने उन सबको जीत लिया और उनके स्थान से उन्हें भगा दिया। उसके बाद तो उसने घोर युद्ध करके देवताओं का पक्ष लेने वाले श्रीहरि को भी परजित कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसके बाद भीम ने प्रसन्नतापूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने का अभियान चलाया। वह सर्वप्रथम कामरूप देश के राजा सुदक्षिण को जीतने के लिए पहुँचा। उसने उस राजा के साथ भंयकर युद्ध किया। क्योंकि ब्रह्मा जी के वरदान से भीम के पास अतुलनीय शक्ति प्राप्त थी, इसलिए महावीर और [[शिव]] के परम भक्त सुदक्षिण युद्ध में परास्त हो गये। उसने राजा का राज्य और उनकी सम्पूर्ण सम्पत्ति को अपने अधिकार में ले लिया। इतने पर भी उस पराक्रमी राक्षस भीम का क्रोध शान्त नहीं हुआ, तो उसने धर्म प्रेमी और शिव के अनन्य भक्त राजा सुदक्षिण को कैद कर लिया। सुदक्षिण के पैरों में बेड़ी डालकर उन्हें एकान्त स्थान में निरुद्ध (बन्द) कर दिया। उस एकान्त स्थान का लाभ उठाते हुए शिव भक्त राजा सुदक्षिण ने भगवान शिव की उत्तम पार्थिव मूर्ति बनाकर उनका भजन-पूजन प्रारम्भ कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[गंगा नदी|गंगा जी]] को भी प्रसन्न करने के लिए राजा ने ढेर सारी स्तुति की और विवशता के कारण मानसिक स्नान किया। उसके बाद उन्होंने शास्त्र विधि से पार्थिव लिंग में भगवान शिव की अर्चना की। उसके बाद वे विधिपूर्वक भगवान शिव का ध्यान करते हुए पंचाक्षर मन्त्र अर्थात 'ॐ नम: शिवाय' का जप करने लगे। राजा सुदक्षिण इसी दिनचर्या को अपनाकर रात-दिन शिव जी की भक्ति में लगे रहते थे। उनकी साध्वी धर्मपत्नी रानी दक्षिणा भी राजा का अनुकरण करती हुईं श्रद्धा-भक्ति पूर्वक पार्थिव पूजन में जुट गयीं। वे पति-पत्नी अकारण करुणावरुणालय भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु अनन्य भाव से उनकी भक्ति में लीन रहते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राक्षस भीम [[ब्रह्मा]] जी के वरदान के कारण अत्यन्त अहंकार में डूब गया। अभिमान में मोहित होकर वह यज्ञों का विध्वंस करने लगा और तमाम धार्मिक कृत्यों में बाधा डालने लगा। उसने जनता में ऐसी घोषणा करवा दी कि संसार का सब कुछ उसे ही माने और समझो। इस प्रकार उस दुष्ट राक्षस ने एक विशाल सेना इकट्ठी करके सम्पूर्ण [[पृथ्वी]] को अपने अधिकार में कर लिया। उसके बाद उसके दुराचारों की सीमा न रही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राक्षस भीम के अत्याचार से पीड़ित सभी देवता और ऋषिगण महाकोशी नदी के किनारे जाकर भगवान शिव की आराधना और स्तुति करने लगे। उनकी सामूहिक स्तुति और प्रार्थना से भगवान शंकर ने देवताओं से कहा–‘देवगण तथा महर्षियों! मैं आप लोगों पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ, बोलिए, आप लोगों का कौन-सा अभीष्ट कार्य (प्रियकार्य) सिद्ध करूँ?’ देवताओं ने देवाधिदेव से कहा कि ‘आप अन्तर्यामी हैं, इसलिए सबके मन की बात जानते हैं। आपसे कोई भी रहस्य छिपा नहीं रह सकता हैं।’ देवताओं ने आगे कहा– ‘महेश्वर! राक्षस कुम्भकर्ण से उत्पन्न कर्कटी का महाबलशाली पुत्र राक्षस भीम, ब्रह्मा जी से वर प्राप्त कर अत्यन्त शक्तिशाली और अभिमान में आ गया है तथा देवताओं को अनवरत कष्ट पहुँचा रहा है। भगवान! बिना देरी किये आप उस दु:खदायी राक्षस का शीघ्र ही नाश कर डालिए। हम सभी देवगण उससे अन्त क्षुब्ध होकर आपकी शरण में आये हैं।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव ने उन देवताओं को आश्वस्त करते हुए बताया कि कामरूप देश के राजा सुदक्षिण उनके श्रेष्ठ भक्त हैं। आप लोग उनके पास मेरा एक सन्देश सुना दो। उसके बाद आप लोगों का सारा अभीष्ट कार्य पूरा हो जाएगा। उनसे बोलना – कामरूप के अधिपति महाराज सुदक्षिण! तुम शिव के परम भक्त हो। इसलिए तुम उनका प्रेमपूर्वक भजन करो। दुष्ट राक्षस भीम ब्रह्मा जी का वर प्राप्त कर ही अभिमानी बन गया है और इसीलिए वह तुम्हारा अपमान कर रहा है। अपने भक्त के कष्ट को नहीं सहन करने वाले भगवान शिव शीघ्र ही उस दुष्ट राक्षस का नाश करने वाले हैं। इस वाणी में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है।’ उसके बाद भगवान शंकर की वाणी से अत्यन्त प्रसन्न उन देवताओं ने महाराजा सुदक्षिण के पास पहुँचकर सारी घटना बताई। राजा को शिव का कल्याणकारक सन्देश देने से देवताओं और ऋषियों का हित करने वाले भगवान शंकर अपने गणों के साथ उस राजा के निकट जाकर गोपनीय रूप में वहीं ठहर गये। राजा सुदक्षिण विधिपूर्वक पार्थिवपूजन करके भगवान शिव के ध्यान में लीन हो गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी व्यक्ति ने जाकर राक्षस से बताया कि राजा पार्थिव पूजन करके तुम्हारे लिए अनुष्ठान कर रहे हैं। समाचार पाते ही राक्षस क्रोध से आग – बबूला हो उठा। वह राजा का वध करने हेतु हाथ में नंगी तलवार लेकर चल पड़ा। ध्यान में मग्न राजा को देखकर उसका चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था। उसने पूजन सामग्री, पार्थिव शिवलिंग, वातावरण को देखकर तथा उसके प्रयोजन और स्वरूप को समझकर मान लिया कि राजा उसके अनिष्ट के लिए ही कुछ कर रहा है। उस महाक्रोधी राक्षस ने ऐसा विचार किया कि इन सब पूजन सामग्रियों सहित इस नरेश को भी मैं शीघ्र ही नष्ट कर देता हूँ। उसने राजा को डाँट-फटकार लगाते हुए पूछा कि ‘तुम यह क्या कर रहे हो?’ राजा भगवान शंकर के समर्पित भक्त थे। इसलिए उन्होंने निर्भयता पूर्वक कहा कि ‘मैं चराचर जगत के स्वामी भगवान शिव की पूजा कर रहा हूँ।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सुनकर मद में मतवाले उस राक्षस ने भगवान शिव के प्रति बहुत से दुर्वचन बोले और उनका अपमान किया तथा पार्थिव लिंग पर तलवार का प्रहार किया। उसकी तलवार लिंग को छू नहीं पायी, तभी भगवान रूद्र (शिव) तत्काल प्रकट हो गये। उन्होंने कहा–‘देखो, मैं भीमेश्वर शिव अपने भक्त की रक्षा के लिए प्रकट हुआ हूँ। इसलिए राक्षस! अब तू मेरे बल और पराक्रम को देख।’ इस प्रकार बोलते हुए भगवान शिव ने अपने पिनाक से उसकी तलवार के टुकड़े-टुकड़े कर दिया। उसके बाद उस राक्षस ने शिव जी पर अपना त्रिशूल चला दिया, किन्तु उन्होंने उसके भी अनेक टुकड़े कर डाले। तदनंन्तर उस राक्षस ने शिव जी के साथ घोर युद्ध किया, जिससे सारा जगत क्षुब्ध हो उठा। उस स्थिति में मुनि [[नारद]] वहाँ पहुँच गये और उन्होंने भगवान शंकर से प्रार्थना की ‘महेश्वर! संसार को भ्रमित करने वाले मेरे नाथ! अब आप क्षमा करें। सामान्य तिनके को काटने हेतु कुल्हाड़ी चलाने की क्या आवश्यकता है? अब तो इसका संहार शीघ्र कर डालिए–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
क्षम्यतां क्षम्यतां नाथत्वया विभ्रमकारक।&lt;br /&gt;
तृणे कश्च कुठारे वै हन्यतां शीघ्रमेव हि।।&lt;br /&gt;
इति संप्रार्थित: शम्भु: सर्वान रक्षोगणान्प्रभु:।&lt;br /&gt;
हुंकारेणैव चास्त्रेण भस्मसात्कृतवांस्तदा।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 21/42-43&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                             &lt;br /&gt;
इस प्रकार जब नारद जी ने भगवान शिव की प्रार्थना की, उन्होंने अपनी हुँकार मात्र से भीम सहित समस्त राक्षसों को भस्म कर डाला। उन राक्षसों को शंकर जी के द्वारा जला दिये जाने के बाद समस्त देवताओं और ऋषियों ने राहत की साँस ली तथा लोक में शान्ति की स्थापना हो सकी। ऋषियों ने देवाधिदेव भगवान शिव की  विशेष स्तुति और प्रार्थना की। उन्होंने कहा–‘भूतभावन शिव! यह क्षेत्र बहुत ही निन्दित माना जाता है, इसलिए लोक कल्याण की भावना से आप सदा के लिए यहीं निवास करें। प्राय: ऐसा देखा गया है कि जो व्यक्ति यहाँ आता है, उसे कष्ट ही मिलता है, किन्तु आपके दर्शन करने से प्रत्येक आने वाले का कल्याण होगा। भगवान्! आपका यह ज्योतिर्लिंग सर्वथा पूजनीय तथा सभी प्रकार के संकटों को टालने वाला हैं। आप यहाँ भीमशंकर के नाम से प्रसिद्ध होंगे और सबके मनोरथों को सिद्ध करेंगे। इस प्रकार देवताओं तथा ऋषियों की प्रार्थना पर प्रसन्न भक्तवत्सल शिव ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया और प्रसन्नतापूर्वक वहीं स्थित हो गये। इस प्रकार की कथा का प्रामाणिक उल्लेख श्री [[शिव पुराण]] में विस्तार से किया गया है&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अयं वै कुत्सितो देश अयोध्यालोकदु:खद:।&lt;br /&gt;
भवन्तं च तदा दृष्ट्वा कल्याणं सम्भाविष्यति।।&lt;br /&gt;
भीमशंकरनामा त्वं भविता सर्वसाधक:।&lt;br /&gt;
एतल्लिंग सदा पूज्यं सर्वापद्विनिवारकम्।।&lt;br /&gt;
इत्येवं प्रार्थित: शम्भुलोकानां हितकारक:।&lt;br /&gt;
तत्रैवास्थितवान्प्रीत्या स्वतन्त्रो भक्तवत्सल:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 21/52-54&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जनश्रुतियाँ==&lt;br /&gt;
*जनश्रुतियों तथा [[महाराष्ट्र]] में बहने वाली [[भीमा नदी]] को आधार बनाकर कुछ लोग भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान मुम्बई से पूर्व और पूना से उत्तर भीमा नदी के किनारे मानते हैं। वहाँ पर भगवान शिव सह्याद्रि पर्वत पर अवस्थित हैं। द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में ‘डाकिन्यां भीमशंकरम्’ ऐसा लिखा है, किन्तु इस ‘डाकिनी’ स्थान का कहीं अता-पता नहीं है। हो सकता है, प्राचीनकाल में वहाँ कोई बस्ती रही हो, जो कालान्तर में नष्ट हो गई हो। सह्याद्रि पर्वत जिस पर भगवान भीमशंकर विराजमान हैं, उसी से भीमा नदी निकल कर प्रवाहित होती है। इस लिंगमूर्ति से किंचित जल रिसता हुआ गिरता है। इसके समीप ही जल के दो कुण्ड भी हैं और आस-पास लोगों की बस्ती है। उन निवासियों के अनुसार भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर का वध करने के बाद उसी स्थान पर विश्राम किया था। &lt;br /&gt;
*उस समय [[अवध]] के निवासी किसी सूर्यवंशी राजा ने उस पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या की थी। उसकी भक्ति और तपस्या से भगवान शंकर अतीव प्रसन्न हुए थे। बताते हैं कि उस राजा का भी नाम ‘भीम’ था। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया था, उसी समय से यह ज्योतिर्लिंग भीमशंकर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि अवध नरेश राजा भीम और [[भीमा नदी]] के कारण सह्याद्रि पर्वत का वह भाग और शिवलिंग श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ।&lt;br /&gt;
*उक्त श्री भीमशंकर स्थान मुम्बई से पूना जाने वाले रेलमार्ग पर [[कल्याण]] जंकशन से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर नेराल रेलवे स्टेशन है और यहाँ से पूरब दिशा में लगभग 25 किलोमीटर पर अवस्थित है। यहाँ से बस, टैक्सी आदि का साधन उपलब्ध होता है। तलेगाँव रेलवे स्टेशन से भीमशंकर की दूरी लगभग 36 किलोमीटर है। यहाँ से भी मोटरमार्ग की अच्छी सुविधा है। &lt;br /&gt;
*यद्यपि ज्योतिर्लिंग के स्थान के सम्बन्ध में क्षेत्र विशेष के आधार पर मतान्तर दिखाता है, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से इन शिवलिंगों का महत्त्व कम नहीं होता है। ये सभी सिद्ध स्थान हैं, जहाँ दर्शन-पूजन करने से भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करते हैं। हिंदू धर्म में जनश्रुतियों की अपेक्षा शास्त्रों का विशेष महत्त्व है। श्री शिव महापुराण हमारा शास्त्र है और उसके अनुसार [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले में [[गुवाहाटी]] के पास स्थित भीमशंकर मन्दिर ही श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान हो सकता है। मुख्य रूप से शिव के उपासकों को वहाँ जाकर भगवान श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का दर्शन अवश्य करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:असम]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:असम_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&amp;diff=17565</id>
		<title>भीमशंकर ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-02T05:02:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Bhimshankar.jpg|भीमशंकर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Bhimashankar Temple|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्री भीमशंकर / Shri bheemshankar'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में प्रकट हुए भगवान [[शंकर]] के बारह ज्योतिर्लिंग में श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का छठा स्थान हैं। इस ज्योतिर्लिंग में कुछ मतभेद हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्त्रोत में ‘डाकिन्यां भीमशंकरम्’ ऐसा लिखा है, जिसमें ‘डाकिनी’ शब्द से स्थान का स्पष्ट उल्लेख नहीं हो पाता है। इसके अनुसार भीमशंकर ज्योतिर्लिंग [[मुम्बई]] से पूरब और [[पूना]] से उत्तर [[भीमा नदी]] के तट पर अवस्थित है।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के अनुसार भीमशंकर ज्योतिर्लिंग [[असम]] प्रान्त के कामरूप जनपद में [[गुवाहाटी]] के पास ब्रह्मरूप पहाड़ी पर स्थित है। कुछ लोग तो [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[नैनीताल]] ज़िले में ‘उज्जनक’ स्थान पर स्थित भगवान [[शिव]] के विशाल मन्दिर को भी भीमशंकर ज्योतिर्लिंग कहते हैं। श्री शिव महापुराण के कोटि रूद्र संहिता में श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘लोक हित की कामना से भगवान शंकर कामरूप देश में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। उनका वह कल्याणकारक स्वरूप बड़ा ही सुखदायी था। पूर्वकाल में भीम नामक एक महाबलशाली और पराक्रमी राक्षस उत्पन्न हुआ था। वह अत्याचारी राक्षस जगह-जगह धर्म का नाश करता हुआ सम्पूर्ण प्राणियों को सताया करता था। भयंकर बलशाली वह राक्षस [[कुम्भकर्ण]] के वीर्य और कर्कट की पुत्री कर्कटी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। भीम अपनी माता कर्कटी के साथ ही ‘सह्य’ नामक पर्वत पर निवास करता था। उसने अपने जीवन में अपने पिता को कभी नहीं देखा था। एक दिन उसने आपनी माता से पूछा- ‘माँ! तुम इस पर्वत पर अकेली क्यों रहती हो? मेरे पिताजी कौन हैं और कहाँ रहते हैं? मुझे ये सब बातें जानने की बड़ी इच्छा है, इसलिए तुम सच-सच बताओ’–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
मात मे क: पिता कुत्र कथं वैकाकिनी स्थिता। &lt;br /&gt;
ज्ञातुमिच्छमि तत्सर्वं यथार्थं त्वं वदाधुना।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 20/8&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदनन्तर उसकी माता कर्कटी ने उसे विस्तार से बताया कि तुम्हारे पिता का नाम कुम्भकर्ण था, जो [[रावण]] के छोटे भाई थे। महाबलशाली और पराक्रमी उस वीर को भाई सहित श्री[[राम]] ने मार डाला था। मेरे पिता अर्थात जुम्हारे नाना का नाम कर्कट और नानी का नाम पुष्कसी था। मेरे पूर्व पति का नाम ‘विराध’ था, जिन्हें पहले ही श्रीराम ने मार डाला था। मैं अपने प्रिय स्वामी विराध के मारे जाने पर अपने माता-पिता के पास आकर रहने लगी थी, क्योंकि मेरा सहारा अन्य कोई नहीं था। एक दिन मेरे माता-पिता आहार की खोज में निकले और उन्होंने [[अगस्त्य]] मुनि के परम शिष्य तपस्वी सुतीक्ष्ण को अपना आहार बनाना चाहा, किन्तु वे ऋषि महान तपस्वी और महात्मा थे। इसलिए उन्होंने कुपित होकर अपने तपोबल से मेरे माता-पिता को भस्म कर डाला। वे दोनों वहीं मर गये और मैं अकेली अनाथ हो गई। मुझ पर चारों तरफ से दु:ख का पहाड़ टूट पड़ा और मैं दु:खी होकर अकेली इस पर्वत पर रहने लगी। मेरा इस दुनियाँ में कोई अवलम्बन क्या सहारा भी न रहा और मैं आतुर होकर एकाकी ही किसी प्रकार अपना जीवन जी रही थी। एक दिन इस सुनसान पहाड़ पर राक्षसराज रावण के छोटे भाई महाबल और पराक्रम से युक्त कुम्भकर्ण आ गये। उन्होंने मेरे साथ बलात्कार किया और समागम के बाद वे मुझे यहीं छोड़कर पुन: [[लंका]] में चले गये। उसके बाद समय पूरा होने पर तुम्हारा जन्म हुआ। बेटा! तुम अपने पिता के समान ही साक्षात महाबली और पराक्रमी हो। तुम्हें ही देख-देखकर, तुम्हारे ही सहारे अब मैं अपना जीवन चला रही हूँ और किसी तरह समय बीत रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपनी माता कर्कटी के बात सुनकर भयानक पराक्रमी राक्षस कुपित हो उठा। उसने विचार किया कि [[विष्णु]] के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए, उनसे प्रतिरोध (बदला) लेने का क्या उपाय है? वह चिन्तित होकर अपनी माँ की बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगा- ‘विष्णु ने मेरे पिता को मार डाला। मेरे नाना-नानी भी उनके ही भक्त के हाथों मारे गये। इतना ही नहीं विराध को भी उन्होंने ही मार डाला। निश्चित ही श्रीहरि ने मुझ पर बहुत ही अत्याचार किया है, अत्यधिक कष्ट दिया है। उसने निश्चय किया कि हरि द्वारा किये गये कृत्य का बदला वह अवश्य लेगा। उसने अपनी माता के सामने कहा कि यदि मैं अपने पिता का पुत्र हूँ, तो श्री हरि से अवश्य ही बदला लेकर रहूँगा, उन्हें भारी कष्ट दूँगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार निश्चय कर वह बलवान राक्षस अपनी शक्ति को और अधिक बढ़ाने के लिए तपस्या करने चला गया। उसने संकल्प लेकर [[ब्रह्मा]]जी को प्रसन्न करने हेतु एक हजार वर्षों तक तप किया। वह मानसिक रूप से अपने इष्टदेव के ध्यान में ही मग्न रहता था। उसकी तपस्या, ध्यान और अर्चना-वन्दना से लोकपितामह ब्रह्मा जी प्रसन्न हो उठे। ब्रह्मा जी ने उसे वर देने की इच्छा से कहा- ‘भीम! मैं तुम्हारी तपस्या और धैर्य से बहुत प्रसन्न हूँ और तुम्हें वर देना चाहता हूँ। इसलिए तुम अपना अभीष्ट वर मांगो।' तदनन्तर उस राक्षस ने कहा– ‘देवेश्वर! यदि आप मेरे ऊपर सच में प्रसन्न हैं और मेरा भला करना चाहते हैं, तो आप मुझे अतुलनीय बल प्रदान कीजिए। मुझे इतना बल और पराक्रम प्राप्त हो, जिसकी तुलना कहीं भी न हो सके।’ इस प्रकार बोलते हुए राक्षस भीम ने बार-बार ब्रह्मा जी को प्रणाम किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसकी तपस्या से प्रभावित ब्रह्मा जी उसे अतुलनीय बल-प्राप्ति का वर देकर अपने धाम चले गये। ब्रह्मा जी से अतुलनीय बल प्राप्त करने के कारण वह राक्षस अत्यन्त प्रसन्न हो गया। उसने अपने निवास पर आकर अपनी माता जी को प्रणाम किया और अत्यन्त अहंकार के साथ उससे कहा– ‘माँ! अब तुम मेरा बल और पराक्रम देखो। अब मैं [[इन्द्र]] इत्यादि देवताओं के साथ ही इनका सहयोग करने वाले महान श्री हरि का भी संहार कर डालूँगा। अपनी माँ से इस प्रकार कहने के बाद वीर राक्षस भीम ने इन्द्रादि देवताओं पर चढ़ाई कर दिया। उसने उन सबको जीत लिया और उनके स्थान से उन्हें भगा दिया। उसके बाद तो उसने घोर युद्ध करके देवताओं का पक्ष लेने वाले श्रीहरि को भी परजित कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसके बाद भीम ने प्रसन्नतापूर्वक सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने का अभियान चलाया। वह सर्वप्रथम कामरूप देश के राजा सुदक्षिण को जीतने के लिए पहुँचा। उसने उस राजा के साथ भंयकर युद्ध किया। क्योंकि ब्रह्मा जी के वरदान से भीम के पास अतुलनीय शक्ति प्राप्त थी, इसलिए महावीर और [[शिव]] के परम भक्त सुदक्षिण युद्ध में परास्त हो गये। उसने राजा का राज्य और उनकी सम्पूर्ण सम्पत्ति को अपने अधिकार में ले लिया। इतने पर भी उस पराक्रमी राक्षस भीम का क्रोध शान्त नहीं हुआ, तो उसने धर्म प्रेमी और शिव के अनन्य भक्त राजा सुदक्षिण को कैद कर लिया। सुदक्षिण के पैरों में बेड़ी डालकर उन्हें एकान्त स्थान में निरुद्ध (बन्द) कर दिया। उस एकान्त स्थान का लाभ उठाते हुए शिव भक्त राजा सुदक्षिण ने भगवान शिव की उत्तम पार्थिव मूर्ति बनाकर उनका भजन-पूजन प्रारम्भ कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[गंगा नदी|गंगा जी]] को भी प्रसन्न करने के लिए राजा ने ढेर सारी स्तुति की और विवशता के कारण मानसिक स्नान किया। उसके बाद उन्होंने शास्त्र विधि से पार्थिव लिंग में भगवान शिव की अर्चना की। उसके बाद वे विधिपूर्वक भगवान शिव का ध्यान करते हुए पंचाक्षर मन्त्र अर्थात 'ॐ नम: शिवाय' का जप करने लगे। राजा सुदक्षिण इसी दिनचर्या को अपनाकर रात-दिन शिव जी की भक्ति में लगे रहते थे। उनकी साध्वी धर्मपत्नी रानी दक्षिणा भी राजा का अनुकरण करती हुईं श्रद्धा-भक्ति पूर्वक पार्थिव पूजन में जुट गयीं। वे पति-पत्नी अकारण करुणावरुणालय भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु अनन्य भाव से उनकी भक्ति में लीन रहते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राक्षस भीम [[ब्रह्मा]] जी के वरदान के कारण अत्यन्त अहंकार में डूब गया। अभिमान में मोहित होकर वह यज्ञों का विध्वंस करने लगा और तमाम धार्मिक कृत्यों में बाधा डालने लगा। उसने जनता में ऐसी घोषणा करवा दी कि संसार का सब कुछ उसे ही माने और समझो। इस प्रकार उस दुष्ट राक्षस ने एक विशाल सेना इकट्ठी करके सम्पूर्ण [[पृथ्वी]] को अपने अधिकार में कर लिया। उसके बाद उसके दुराचारों की सीमा न रही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राक्षस भीम के अत्याचार से पीड़ित सभी देवता और ऋषिगण महाकोशी नदी के किनारे जाकर भगवान शिव की आराधना और स्तुति करने लगे। उनकी सामूहिक स्तुति और प्रार्थना से भगवान शंकर ने देवताओं से कहा–‘देवगण तथा महर्षियों! मैं आप लोगों पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ, बोलिए, आप लोगों का कौन-सा अभीष्ट कार्य (प्रियकार्य) सिद्ध करूँ?’ देवताओं ने देवाधिदेव से कहा कि ‘आप अन्तर्यामी हैं, इसलिए सबके मन की बात जानते हैं। आपसे कोई भी रहस्य छिपा नहीं रह सकता हैं।’ देवताओं ने आगे कहा– ‘महेश्वर! राक्षस कुम्भकर्ण से उत्पन्न कर्कटी का महाबलशाली पुत्र राक्षस भीम, ब्रह्मा जी से वर प्राप्त कर अत्यन्त शक्तिशाली और अभिमान में आ गया है तथा देवताओं को अनवरत कष्ट पहुँचा रहा है। भगवान! बिना देरी किये आप उस दु:खदायी राक्षस का शीघ्र ही नाश कर डालिए। हम सभी देवगण उससे अन्त क्षुब्ध होकर आपकी शरण में आये हैं।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव ने उन देवताओं को आश्वस्त करते हुए बताया कि कामरूप देश के राजा सुदक्षिण उनके श्रेष्ठ भक्त हैं। आप लोग उनके पास मेरा एक सन्देश सुना दो। उसके बाद आप लोगों का सारा अभीष्ट कार्य पूरा हो जाएगा। उनसे बोलना – कामरूप के अधिपति महाराज सुदक्षिण! तुम शिव के परम भक्त हो। इसलिए तुम उनका प्रेमपूर्वक भजन करो। दुष्ट राक्षस भीम ब्रह्मा जी का वर प्राप्त कर ही अभिमानी बन गया है और इसीलिए वह तुम्हारा अपमान कर रहा है। अपने भक्त के कष्ट को नहीं सहन करने वाले भगवान शिव शीघ्र ही उस दुष्ट राक्षस का नाश करने वाले हैं। इस वाणी में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है।’ उसके बाद भगवान शंकर की वाणी से अत्यन्त प्रसन्न उन देवताओं ने महाराजा सुदक्षिण के पास पहुँचकर सारी घटना बताई। राजा को शिव का कल्याणकारक सन्देश देने से देवताओं और ऋषियों का हित करने वाले भगवान शंकर अपने गणों के साथ उस राजा के निकट जाकर गोपनीय रूप में वहीं ठहर गये। राजा सुदक्षिण विधिपूर्वक पार्थिवपूजन करके भगवान शिव के ध्यान में लीन हो गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी व्यक्ति ने जाकर राक्षस से बताया कि राजा पार्थिव पूजन करके तुम्हारे लिए अनुष्ठान कर रहे हैं। समाचार पाते ही राक्षस क्रोध से आग – बबूला हो उठा। वह राजा का वध करने हेतु हाथ में नंगी तलवार लेकर चल पड़ा। ध्यान में मग्न राजा को देखकर उसका चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था। उसने पूजन सामग्री, पार्थिव शिवलिंग, वातावरण को देखकर तथा उसके प्रयोजन और स्वरूप को समझकर मान लिया कि राजा उसके अनिष्ट के लिए ही कुछ कर रहा है। उस महाक्रोधी राक्षस ने ऐसा विचार किया कि इन सब पूजन सामग्रियों सहित इस नरेश को भी मैं शीघ्र ही नष्ट कर देता हूँ। उसने राजा को डाँट-फटकार लगाते हुए पूछा कि ‘तुम यह क्या कर रहे हो?’ राजा भगवान शंकर के समर्पित भक्त थे। इसलिए उन्होंने निर्भयता पूर्वक कहा कि ‘मैं चराचर जगत के स्वामी भगवान शिव की पूजा कर रहा हूँ।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सुनकर मद में मतवाले उस राक्षस ने भगवान शिव के प्रति बहुत से दुर्वचन बोले और उनका अपमान किया तथा पार्थिव लिंग पर तलवार का प्रहार किया। उसकी तलवार लिंग को छू नहीं पायी, तभी भगवान रूद्र (शिव) तत्काल प्रकट हो गये। उन्होंने कहा–‘देखो, मैं भीमेश्वर शिव अपने भक्त की रक्षा के लिए प्रकट हुआ हूँ। इसलिए राक्षस! अब तू मेरे बल और पराक्रम को देख।’ इस प्रकार बोलते हुए भगवान शिव ने अपने पिनाक से उसकी तलवार के टुकड़े-टुकड़े कर दिया। उसके बाद उस राक्षस ने शिव जी पर अपना त्रिशूल चला दिया, किन्तु उन्होंने उसके भी अनेक टुकड़े कर डाले। तदनंन्तर उस राक्षस ने शिव जी के साथ घोर युद्ध किया, जिससे सारा जगत क्षुब्ध हो उठा। उस स्थिति में मुनि [[नारद]] वहाँ पहुँच गये और उन्होंने भगवान शंकर से प्रार्थना की ‘महेश्वर! संसार को भ्रमित करने वाले मेरे नाथ! अब आप क्षमा करें। सामान्य तिनके को काटने हेतु कुल्हाड़ी चलाने की क्या आवश्यकता है? अब तो इसका संहार शीघ्र कर डालिए–&lt;br /&gt;
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क्षम्यतां क्षम्यतां नाथत्वया विभ्रमकारक।&lt;br /&gt;
तृणे कश्च कुठारे वै हन्यतां शीघ्रमेव हि।।&lt;br /&gt;
इति संप्रार्थित: शम्भु: सर्वान रक्षोगणान्प्रभु:।&lt;br /&gt;
हुंकारेणैव चास्त्रेण भस्मसात्कृतवांस्तदा।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 21/42-43&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
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                             &lt;br /&gt;
इस प्रकार जब नारद जी ने भगवान शिव की प्रार्थना की, उन्होंने अपनी हुँकार मात्र से भीम सहित समस्त राक्षसों को भस्म कर डाला। उन राक्षसों को शंकर जी के द्वारा जला दिये जाने के बाद समस्त देवताओं और ऋषियों ने राहत की साँस ली तथा लोक में शान्ति की स्थापना हो सकी। ऋषियों ने देवाधिदेव भगवान शिव की  विशेष स्तुति और प्रार्थना की। उन्होंने कहा–‘भूतभावन शिव! यह क्षेत्र बहुत ही निन्दित माना जाता है, इसलिए लोक कल्याण की भावना से आप सदा के लिए यहीं निवास करें। प्राय: ऐसा देखा गया है कि जो व्यक्ति यहाँ आता है, उसे कष्ट ही मिलता है, किन्तु आपके दर्शन करने से प्रत्येक आने वाले का कल्याण होगा। भगवान्! आपका यह ज्योतिर्लिंग सर्वथा पूजनीय तथा सभी प्रकार के संकटों को टालने वाला हैं। आप यहाँ भीमशंकर के नाम से प्रसिद्ध होंगे और सबके मनोरथों को सिद्ध करेंगे। इस प्रकार देवताओं तथा ऋषियों की प्रार्थना पर प्रसन्न भक्तवत्सल शिव ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया और प्रसन्नतापूर्वक वहीं स्थित हो गये। इस प्रकार की कथा का प्रामाणिक उल्लेख श्री [[शिव पुराण]] में विस्तार से किया गया है&lt;br /&gt;
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अयं वै कुत्सितो देश अयोध्यालोकदु:खद:।&lt;br /&gt;
भवन्तं च तदा दृष्ट्वा कल्याणं सम्भाविष्यति।।&lt;br /&gt;
भीमशंकरनामा त्वं भविता सर्वसाधक:।&lt;br /&gt;
एतल्लिंग सदा पूज्यं सर्वापद्विनिवारकम्।।&lt;br /&gt;
इत्येवं प्रार्थित: शम्भुलोकानां हितकारक:।&lt;br /&gt;
तत्रैवास्थितवान्प्रीत्या स्वतन्त्रो भक्तवत्सल:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 21/52-54&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जनश्रुतियाँ==&lt;br /&gt;
*जनश्रुतियों तथा [[महाराष्ट्र]] में बहने वाली [[भीमा नदी]] को आधार बनाकर कुछ लोग भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान मुम्बई से पूर्व और पूना से उत्तर भीमा नदी के किनारे मानते हैं। वहाँ पर भगवान शिव सह्याद्रि पर्वत पर अवस्थित हैं। द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में ‘डाकिन्यां भीमशंकरम्’ ऐसा लिखा है, किन्तु इस ‘डाकिनी’ स्थान का कहीं अता-पता नहीं है। हो सकता है, प्राचीनकाल में वहाँ कोई बस्ती रही हो, जो कालान्तर में नष्ट हो गई हो। सह्याद्रि पर्वत जिस पर भगवान भीमशंकर विराजमान हैं, उसी से भीमा नदी निकल कर प्रवाहित होती है। इस लिंगमूर्ति से किंचित जल रिसता हुआ गिरता है। इसके समीप ही जल के दो कुण्ड भी हैं और आस-पास लोगों की बस्ती है। उन निवासियों के अनुसार भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर का वध करने के बाद उसी स्थान पर विश्राम किया था। &lt;br /&gt;
*उस समय [[अवध]] के निवासी किसी सूर्यवंशी राजा ने उस पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या की थी। उसकी भक्ति और तपस्या से भगवान शंकर अतीव प्रसन्न हुए थे। बताते हैं कि उस राजा का भी नाम ‘भीम’ था। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया था, उसी समय से यह ज्योतिर्लिंग भीमशंकर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि अवध नरेश राजा भीम और [[भीमा नदी]] के कारण सह्याद्रि पर्वत का वह भाग और शिवलिंग श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ।&lt;br /&gt;
*उक्त श्री भीमशंकर स्थान मुम्बई से पूना जाने वाले रेलमार्ग पर [[कल्याण]] जंकशन से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर नेराल रेलवे स्टेशन है और यहाँ से पूरब दिशा में लगभग 25 किलोमीटर पर अवस्थित है। यहाँ से बस, टैक्सी आदि का साधन उपलब्ध होता है। तलेगाँव रेलवे स्टेशन से भीमशंकर की दूरी लगभग 36 किलोमीटर है। यहाँ से भी मोटरमार्ग की अच्छी सुविधा है। &lt;br /&gt;
*यद्यपि ज्योतिर्लिंग के स्थान के सम्बन्ध में क्षेत्र विशेष के आधार पर मतान्तर दिखाता है, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से इन शिवलिंगों का महत्त्व कम नहीं होता है। ये सभी सिद्ध स्थान हैं, जहाँ दर्शन-पूजन करने से भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करते हैं। हिंदू धर्म में जनश्रुतियों की अपेक्षा शास्त्रों का विशेष महत्त्व है। श्री शिव महापुराण हमारा शास्त्र है और उसके अनुसार [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले में [[गुवाहाटी]] के पास स्थित भीमशंकर मन्दिर ही श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान हो सकता है। मुख्य रूप से शिव के उपासकों को वहाँ जाकर भगवान श्री भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का दर्शन अवश्य करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:असम]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:असम_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B6_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&amp;diff=17564</id>
		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-02T05:00:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhimshankar.jpg|भीमशंकर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Bhimashankar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Kashi-Vishwanath.jpg|काशी विश्वनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Kashi Vishwanath Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Omkareshwar.jpg|ओंकारश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Omkareshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Trimbakeshwar.jpg|त्र्यंम्बक मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-05-02T04:55:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhimshankar.jpg|भीमशंकर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Bhimashankar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Kashi-Vishwanath.jpg|काशी विश्वनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Kashi Vishwanath Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Omkareshwar.jpg|ओंकारश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Omkareshwar Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Trimbakeshwar.jpg|त्रयंबकेश्वर मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt; Trimbakeshwar Temple&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B6_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&amp;diff=17559"/>
		<updated>2010-05-02T04:54:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhimshankar.jpg|भीमशंकर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Bhimashankar Temple&lt;br /&gt;
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[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
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		<title>रामेश्वर</title>
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		<updated>2010-04-29T13:54:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple]]&lt;br /&gt;
'''श्रीरामेश्वर / श्रीरामलिंगेश्वर / Rameswaram'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचे==&lt;br /&gt;
यह स्थान दक्षिण भारत के समुद्र तट पर अवस्थित है। यहाँ महासागर और [[बंगाल की खाड़ी]] का संगम होता है। देश के प्रसिद्ध महानगर [[दिल्ली]], [[मुम्बई]], [[कोलकाता]] आदि से [[रामेश्वरम]] जाने क लिए [[चेन्नई]] (मद्रास) जाना पड़ता है। चेन्नई से दक्षिण रेलवे मार्ग से [[त्रिचिनापल्ली]] होते हुए रामेश्वरम पहुँचा जाता है। &lt;br /&gt;
==वास्तु शिल्प==&lt;br /&gt;
श्री रामेश्वर जी का मन्दिर एक हजार फुट लम्बा, छ: सौ पचास फुट चौड़ा तथा एक सौ पच्चीस फुट ऊँचा है। इस मन्दिर में प्रधान रूप से एक हाथ से भी कुछ अधिक ऊँची [[शिव]] जी की लिंग मूर्ति स्थापित है। इसके अतिरिक्त भी मन्दिर में बहुत-सी सुन्दर-सुन्दर शिव प्रतिमाएँ हैं। [[नन्दी]] जी की भी एक विशाल और बहुत आकर्षक मूर्ति लगायी गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शंकर और [[पार्वती]] की चल-प्रतिमाएँ भी हैं, जिनकी शोभायात्रा वार्षिकोत्सव पर निकाली जाती हैं। इस अवसर पर सोने और चाँदी के वाहनों पर बैठा कर शिव और पार्वती की सवारी निकलती है। वार्षिकोत्सव पर रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग को चाँदी के त्रिपुण्ड और श्वेत उत्तरीय से अलंकृत किया जाता है अर्थात सजाया जाता है, जिससे लिंग की अद्भुत शोभा होती है। [[उत्तराखंड]] के [[गंगोत्री]] से गंगा जल लेकर श्रीरामेश्वरम ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाने का विशेष महत्त्व बताया गया है। श्री रामेश्वर पहुँचने वाले तीर्थ यात्री के पास यदि गंगा जल उपलब्ध नहीं है, तो वहाँ के पण्डे लोग दक्षिणा लेकर छोटी-छोटी शीशियों में (इत्र की शीशी जैसी) गंगाजल देते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीर्थ व ज्योतिर्लिंग का आविर्भाव==&lt;br /&gt;
सेतुबन्ध-रामेश्वरम तीर्थ व ज्योतिर्लिंग के आविर्भाव के सम्बन्ध में इस प्रकार बताया जाता है–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री[[राम]] ने स्वयं अपने हाथो से श्री रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। ऐसा बताया जाता है कि श्री राम ने जब [[रावण]] के वध हेतु [[लंका]] पर चढ़ाई की थी, तो यहाँ पहुँचने पर विजय श्री की प्राप्ति हेतु उन्होंने समुद्र के किनारे बालुका (रेत) का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की थी। ऐसा भी बताया जाता है कि रामेश्वरम में पहुँचकर भगवान श्री राम जल पी रहे थे। उसी समय आकाशवाणी सुनायी पड़ी– ‘तुम मेरी पूजा किये बिना ही जल पी रहे हो?’ तब श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्ति के लिए आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री राम द्वारा प्रार्थना किये जाने पर लोक कल्याण की भावना से ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए वहाँ निवास करना भगवान शंकर ने स्वीकार कर लिया। श्री राम ने विधि-विधान से शिवलिंग की स्थापना की और उनकी पूजा करने के बाद शिव का यशोगान किया। &lt;br /&gt;
==अन्य ऐतिहासिक कथा==&lt;br /&gt;
श्री रामेश्वरम में ज्योतिर्लिंग की स्थापना के सम्बन्ध में एक अन्य ऐतिहासिक कथा भी प्रचलित है। जब श्री राम का वध कर लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद वापस [[अयोध्या]] को लौट रहे थे, तो उन्होंने समुद्र के इस पार गन्धमादन पर्वत पर रूक कर प्रथम विश्राम किया। उनके साथ [[सीता]] जी तथा अन्य सभी गण भी थे। उनके आगमन का समाचार सुनकर बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि वहाँ दर्शन करने के लिए पहुँच गये। ऋषियों ने उनसे कहा कि उन्होंने पुलस्त्य कुल का विनाश किया है, जिससे उन्हें ब्रह्म हत्या का पातक लग गया है। श्री राम ने ऋषियों से आग्रह किया कि आप लोग कृपा करके बताने का कष्ट करें कि इस पाप से मुक्त होने का उपाय क्या हैं? उन ऋषियों ने आपस में विचार-विमर्श करने के बाद श्री राम को बतलाया कि आप एक शिवलिंग की स्थापना कर शास्त्रीय विधि से उसकी पूजा कीजिए। इस प्रकार शिवलिंग का पूजन करने से आप सब प्रकार से पापों से मुक्त हो जाएँगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषियों की सभा में उपर्युक्त निर्णय होने के बाद श्री राम ने महावीर श्री [[हनुमान]] को आदेश दिया कि आप कैलास से लिंग लेकर आइए। श्री हनुमान शीघ्र ही कैलास पर्वत पर पहुँच गये, किन्तु वहाँ शिव का दर्शन नहीं मिला। हनुमान जी ने उस कैलास पर दर्शन पाने हेतु भगवान शिव का ध्यानपूर्वक तप किया। उनकी आराधना से प्रसन्न शिव जी ने उन्हें दर्शन दिया। उसके बाद शंकर जी से लिंग प्राप्त कर वे पुन: गन्धमादन पर वापस आ गये। इस प्रक्रिया में हनुमान जी को काफी देरी लग गई। इधर ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि बुधवार के दिन शिवलिंग की स्थापना का अत्यन्त उत्तम मुहूर्त निर्धारित था। मुहूर्त के बीत जाने की आशंका से तथा समय पर लिंग लेकर हनुमान जी के न पहुँचने के कारण ऋषियों ने मुहूर्त के अनुसार श्री राम से लिंग-स्थापना करने की प्रार्थना की। पुण्यकाल का विचार करते हुए जानकी जी द्वारा विधिपूर्वक बालू  का ही लिंग बनाकर उसकी स्थापना कर दी गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री हनुमान जी ने देखा कि लिंग स्थापना हो चुकी है, तो उन्हें बड़ा कष्ट हुआ और वे श्री राम के चरणों में गिर पड़े। भक्तवत्सल भगवान श्री राम ने स्नेहपूर्वक हनुमान जी की पीठ पर हाथ फेरते हुए उनके आने से पहले ही लिंग स्थापना हो जाने का कारण समझाया। कारण बताने पर भी जब हनुमान जी को पूर्ण सन्तुष्टि नहीं हुई, तो श्री राम ने कहा कि तुम इस स्थापित लिंग को उखाड़ दो और मैं तुम्हारे द्वारा लाये गये लिंग को उसके स्थान पर स्थापित कर देता हूँ। श्री राम की बात सुनकर हनुमान जी प्रसन्नता से खिल उठे। वे उस स्थापित लिंग को उखाड़ने के लिए झपट पड़े।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लिंग का स्पर्श करने से उन्हें बोध हुआ कि इसे उखाड़ना सामान्य कार्य नहीं है। वह बालू का लिंग वज्र बन गया था, जिसको उखाड़ने के लिए हनुमान जी ने उपनी सारी ताकत लगा दी, किन्तु सब श्रम व्यर्थ गया। अन्त में उन्होंने अपनी लम्बी पूँछ में उस लिंग को लपेट लिया और किलकारियाँ मारते हुए जोर से खींचा, फिर भी वह टस से मस नहीं हुआ। श्री हनुमान जी उसे उखाड़ने के ज़ोर लगाते रहे और अन्त में स्वयं धक्का खाकर तीन किलोमीटर दूर जाकर गिर पड़े तथा काफी समय तक मूर्च्छित पड़े रहे। उनके मुँह आदि अंगों से रक्त बहने लगा, जिसे देखकर श्री रामचन्द्र जी सहित सभी उपस्थित लोग व्याकुल हो उठे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता सीता उनके शरीर परी हाथ फेरती हुई स्नेह के कारण रोने लगीं। बहुत देर बाद हनुमान जी की मूर्च्छा दूर हो सकी। जब हनुमान जी की दृष्टि श्री राम के अंगो पर पड़ी तो उन्हें साक्षात परब्रह्म के रूप में दर्शन प्राप्त हुआ। हनुमान जी को बड़ी आत्मग्लानि (पश्चात्ताप) हुई और वे झट से श्रीराम जी के चरणों पर पड़ गये। उन्होंने भाव विह्वल होकर भगवान श्री राम की स्तुति की। श्री राम ने उन्हें समझाते हुए कहा कि तुम से भूल हो गई, जिसके कारण तुम्हें इतना कष्ट मिला उन्होंने बताया कि उनके द्वारा स्थापित इस शिवलिंग को दुनियाँ की सारी शक्ति मिलकर भी नहीं उखाड़ सकती हैं तुम्हारे द्वारा महादेव जी का अपराध हुआ है, जिसके कारण तुम्हें कष्ट झेलना पड़ा है। आगे, ऐसी भूल नहीं करना।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने भक्त हनुमान पर कृपा करते हुए भगवान श्री राम ने उनके द्वारा कैलास से लाये गये लिंग को भी वहीं समीप में ही स्थापित कर दिया, जिससे हनुमान जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। श्री राम ने ही उस लिंग का नाम ‘हनुमदीश्वर’ रखा। रामेश्वर तथा हनुमदीश्वर शिवलिंग की प्रशंसा भगवान श्री राम ने स्वयं की है– &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्वयं हरेण दत्तं हनुमान्नामकं शिवम्।&lt;br /&gt;
सम्पश्यन् रामनाथं च कृतकृत्यो भवेन्नर:।।&lt;br /&gt;
योजनानां सहस्त्रेऽपि स्मृत्वा लिंग हनूमत:।&lt;br /&gt;
रामनाथेश्वरं चापि स्मृत्वा सायुज्यमाप्नुयात्।।&lt;br /&gt;
तेनेष्टं सर्वयज्ञैश्च तपश्चकारि कृत्स्नश:।&lt;br /&gt;
येन इष्टौ महादेवौ हनूमद्राघवेश्वरौ।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;स्कन्द पुराण ब्रा. खं. सं. मा. अध्याय 45&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                  &lt;br /&gt;
अर्थात ‘भगवान शंकर के द्वारा प्रदत्त हनुमान नामक लिंग का दर्शन करने से मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है। जो कोई मनुष्य हजार योजन की दूरी से भी यदि हनुमदीश्वर और श्रीरामनाथेश्वर-लिंग का स्मरण और भाव पूर्वक चिन्तन करता है, वह शिवसायुज्य (शिव की समीपता या शिवलोक की प्राप्ति) नामक मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। इस लिंग की महिमा का बखान करते हुए कहा गया है कि जिसने हनुमदीश्वर और श्री रामनाथेश्वर लिंग का दर्शन कर लिया है, मानों उसने सभी प्रकार के यज्ञ तथा तप को कर लिया है।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री रामेश्वर मन्दिर में परिसर के भीतर ही चौबीस कुओं का निर्माण कराया गया है, जिनको ‘तीर्थ’ कहा जाता है। इनके जल से स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। इन कुओं का मीठा जल पीने योग्य भी है। मन्दिर के बाहर भी बहुत से कुएँ बने हुए हैं, किन्तु उन सभी का जल खारा है। मन्दिर-परिसर के भीतर के कुओं के सम्बन्ध में ऐसी प्रसिद्धि है कि ये कुएं भगवान श्री राम ने अपने अमोघ बाणों के द्वारा तैयार किया था। उन्होंने अनेक तीर्थों का जल मँगाकर उन कुओं में छोड़ा था, जिनके कारण उन कुओं को आज भी तीर्थ कहा जाता है। उनमें कुछ के नाम इस प्रकार हैं– गंगा, यमुना, गया, शंख, चक्र, कुमुद आदि। श्री रामेश्वरधाम में कुछ अन्य भी दर्शनीय तीर्थ हैं, जिनके नाम हैं– रामतीर्थ, अमृतवाटिका, हनुमान कुण्ड, ब्रह्म हत्या तीर्थ,विभीषण तीर्थ, माधवकुण्ड, सेतुमाधव, नन्दिकेश्वर तथा अष्टलक्ष्मीमण्डप आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीरामेश्वरम से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर धनुष्कोटि नाम स्थान है। यहाँ [[अरब सागर]] और [[हिंद महासागर]] का संगम होने के कारण श्राद्धतीर्थ मानकर पितृकर्म करने का विधान है। यहाँ लक्ष्मणतीर्थ में भी मुण्डन और श्राद्ध करने का प्रचलन है। इस स्थान पर समुद्र में स्नान करने के बाद अर्घ्यदान किया जाता है। यहाँ के गन्धमादन पर्वत पर ‘रामझरोखे’ नाम स्थान है। इस रामझरोखे से समुद्र तथा श्रीरामसेतु के दर्शन करने का विशेष माहात्म्य (महिमा) बताया गया है। श्रीराम सेतु के मध्य में बहुत से तीर्थ बने हुए हैं, जिनमे प्रमुख तीर्थों के नाम इस प्रकार है– चक्रतीर्थ, वेतालवरद, पापविनाशन, सीतासर, मंगलतीर्थ, अमृतवाटिका, ब्रह्मकुण्ड, अगस्त्यतीर्थ, जयतीर्थ,लक्ष्मीतीर्थ, अग्नितीर्थ, शुकतीर्थ, शिवतीर्थ, कोटितीर्थ, साध्यामृततीर्थ तथा मानसतीर्थ आदि। भगवान श्रीरामेश्वर ज्योतिर्लिंग को गंगोत्री का गंगाजल विशेष प्रिय है। शिवभक्तों की यह प्रथा उत्तर और दक्षिण भारत की यात्रा कराकर राष्ट्रीय अखण्डता को मजबूत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिव पुराण में कथा==&lt;br /&gt;
श्री शिवमहापुराण में रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार है –&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान श्री [[विष्णु]] के रामावतार में रावण सीता जी का अपहरण कर अपनी राजधानी लंका में ले गया। उस समय श्री राम [[सुग्रीव]] के साथ अठारह पद्म वानरी सेना लेकर समुद्र के किनारे आ गये। वे समुद्र तट पर यह चिन्तन करने लगे कि किस प्रकार समुद्र को पार कर लंका पहुँचा जाये और रावण पर विजय प्राप्त की जाय। इसी चिन्तन के दौरान श्री राम को प्यास लगी, तो उन्होंने पीने के लिए जल माँगा। वानरों ने पीने योग्य मीठा जल लाकर श्री राम को दिया और श्री राम ने जल को प्रसन्नतापूर्वक ले लिया। उस जल को पीने से पहले ही उन्हें ख्याल आया कि मैंने अपने स्वामी भगवान शंकर का दर्शन नहीं किया है। ऐसी स्थिति में दर्शन किये बिना मैं जल कैसे ग्रहण कर सकता हूँ? इस प्रकार विचार कर श्री राम ने जल ग्रहण नही किया। उसके बाद रघुनन्दन ने पार्थिव लिंग के  पूजन का आयोजन किया उन्होंने सब प्रकार से पूजन की सामग्री संकलित करायी और षोडशोपचार (सोलह प्रकार) से विधिपूर्वक भगवान शंकर की अर्चना वन्दना की– &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इत्युक्त्वा च जलं पीतं तदा रघुवरेण च।&lt;br /&gt;
पश्चाच्च पार्थिवीं पूजां चकार रघुनन्दन:।।&lt;br /&gt;
आवाहनादिकं चैव ह्युपचारान्प्रकल्प्य वै।&lt;br /&gt;
विधिवत्षोडशं प्रीत्या देवमानर्च शंकरम्।।&lt;br /&gt;
प्रणिपातै: स्तवैर्दिर्व्ये: शिवं सन्तोष्य यत्नत:।&lt;br /&gt;
प्रार्थयामास सदभक्त्या स राम: शंकरं मुदा।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री राम ने कहा– ‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले मेरे स्वामी महादेव! आप मेरी सहायता करें। आपकी सहायता के बिना मेरे कार्य की सिद्धि होना अत्यन्त कठिन है। रावण भी आपका भक्त है, किन्तु वह सभी के लिए सब प्रकार से दुर्जय है अर्थात उसे जीता नहीं जा सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक तो वह त्रिभुवन विजयी अत्यन्त शक्तिशाली महावीर है, दूसरा आपसे उत्तम वरदान प्राप्त कर लेने के कारण अहंकार में चूर रहता है। मैं भी आपका दास हूँ, जो सर्वथा (प्रत्येक दशा में) आपके अधीन रहने वाला हूँ अर्थात आपकी इच्छा का ही अनुसरण करता हूँ। सदाशिव! आप विचारपूर्वक मेरा कल्याण करें, आपको मेरी सहायता करनी चाहिए, क्योंकि यह पक्षपात उचित है।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार श्री राम ने भगवान शिव की प्रार्थना की और ‘जय शिवशंकर’ आदि का जयघोष के बाद उन्होंने भगवान शिव को पूर्णतया सन्तुष्ट करने के लिए अपना गाल बजाकर कुछ अव्यक्त (अस्पष्ट) शब्द किया। उनकी अर्चना वन्दना से प्रसन्न भगवान शिव ज्योतिर्मय महेश्वर के रूप में अपने वामभाग में पार्वती को लिये, अपने सभी पार्षदों के साथ दिव्यरूप धारण किए हुए वहाँ तत्काल प्रकट हो गये–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इत्येवं स च संप्रार्थ्य नमस्कृत्य पुन: पुन:।&lt;br /&gt;
तदा जयजयेत्युच्चैरूदघोषै: शंकरेति च।।&lt;br /&gt;
इति स्तुत्वा शिवं तत्र मन्त्रध्यानपरायण:।&lt;br /&gt;
पुन: पूजां तत: कृत्वा स्वाम्यग्रे स ननर्त ह।।&lt;br /&gt;
प्रेमविक्लन्नहृदयो गल्लनादं यदाऽकरोत्।&lt;br /&gt;
तदा च शंकरो देव: सुप्रसन्नो बभूव ह।।&lt;br /&gt;
सांगं: सपरिवारश्च ज्योतिरूपो महेश्वर:।&lt;br /&gt;
यथोक्तरूपममलं कृत्वाऽविरभवद् द्रुतम्।।&lt;br /&gt;
तत: सन्तुष्टहृदयो रामभक्त्या महैश्वर:।&lt;br /&gt;
शिवमस्तु वरं ब्रूहि रामेति स तदाऽब्रवीत्।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता 31/30-34&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीराम की भक्ति से महेश्वर भगवान शिव अतीव प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा– ‘श्री राम! तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगों।’ अंगों सहित भगवान शिव के दिव्य दर्शन को प्राप्त कर वहाँ उपस्थित सब लोग पवित्र हो गये। शिव धर्म के रहस्य को जानने वाले श्री राम ने पुन: शास्त्र विधि से उनका पूजन किया। उसके बाद उन्होंने शिवजी से प्रार्थना की और लंका में रावण के साथ होने वाले युद्ध में अपने लिए विजयश्री की माँग की। प्रसन्न भगवान महेश्वर ने कहा– ‘महाराज! तुम्हारी जय हो।’ इस प्रकार भगवान शिव से विजय सूचक वर तथा युद्ध की आज्ञा श्री राम ने प्राप्त कर ली। उसके बाद विनम्र भाव से हाथ जोड़कर उनसे पुन: प्रार्थना की। उन्होंने कहा– ‘स्वामी शिवशंकर! यदि आप मुझ पर भली भाँति सन्तुष्ट हैं, तो संसार के लोगों का कल्याण करने के लिए आप हमेशा यहीं निवास करें।’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव श्री राम की प्रार्थना स्वीकार कर वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गये। उसके बाद संसार में रामेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई। उनके ही कृपा-प्रसाद से अथाह समुद्र को श्री राम ने अनायास ही पार कर लिया और रावण आदि राक्षसों का संहार करके अपनी प्रिय सीता को भी प्राप्त कर लिया। तभी से इस पृथ्वी पर रामेश्वर सर्वथा भोग और मोक्ष के प्रदाता हैं तथा अपने भक्तों की सभी कामनाओं को पूरा करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य परम पवित्र गंगाजल से भक्तिपूर्वक रामेश्वर शिव का अभिषेक करता है अथवा उन्हें स्नान कराता है, वह साक्षात जीवन मुक्त हो जाता है। वह इस संसार में देवदुर्लभ सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करने के बाद उस ज्ञान को प्राप्त कर अन्त में कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। [[तुलसीदास|गोस्वामी तुलसीदास]]जी ने अपने [[रामचरितमानस]] में लिखा है कि भगवान श्री राम ने समुद्र के किनारे रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना करके स्वयं शास्त्र विधि से पूजा की। इसलिए इस ज्योतिर्लिंग की विशेष महिमा है। भगवान श्री राम ने स्वयम अपने मुख से बखान करते हुए कहा–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं।&lt;br /&gt;
ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।&lt;br /&gt;
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि।&lt;br /&gt;
सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।।&lt;br /&gt;
होई अकाम जो छल तजि सेइहि।&lt;br /&gt;
भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।&lt;br /&gt;
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही।&lt;br /&gt;
सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, दोहा 2 के बाद&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
                 &lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:तमिलनाडु के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:तमिलनाडु]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5&amp;diff=17416</id>
		<title>केदारनाथ</title>
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		<updated>2010-04-29T13:52:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
'''श्री केदारेश्वर / Shri Kedarnath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
[[हिमालय]] सदियों से ऋषि-मुनियों तथा देवताओं की तप:स्थली रहा है। महान विभूतियों ने यहाँ तपस्या करके आध्यात्मिक शक्ति अर्जित की और विश्व में [[भारत]] का गौरव बढ़ाया। [[उत्तराखंड|उत्तराखण्ड]] प्रदेश के हिमालय क्षेत्र में चारधाम के नाम से [[बद्रीनाथ]], केदारनाथ, [[गंगोत्री]] तथा [[यमुनोत्री]] प्रसिद्ध हैं। ये तीर्थ देश के सिर-मुकुट मे चमकते हुए बहुमूल्य रत्न हैं। इनमें बद्रीनाथ और केदारनाथ तीर्थो के दर्शन का विशेष महत्त्व है। केदारखण्ड में [[द्वादश ज्योतिर्लिंग|द्वादश (बारह) ज्योतिर्लिंग]] में आने वाले केदारनाथ दर्शन के सम्बन्ध में लिखा है कि जो कोई व्यक्ति बिना केदारनाथ भगवान का दर्शन किये यदि बद्रीनाथ क्षेत्र की यात्रा करता है, तो उसकी यात्रा निष्फल अर्थात व्यर्थ हो जाती है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अकृत्वा दर्शनं वैश्वय केदारस्याघनाशिन:।&lt;br /&gt;
यो गच्छेद् बदरीं तस्य यात्रा निष्फलतां व्रजेत्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री केदारनाथ जी का मन्दिर पर्वतराज हिमालय के 'केदार' नामक चोटी पर अवस्थित है। इस चोटी के पूर्व की दिशा में कल-कल करती उछलती [[अलकनन्दा नदी]] के परम पावन तट पर भगवान बद्री विशाल का पवित्र देवालय स्थित है तथा पश्चिम में पुण्य सलिला [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे भगवान श्री केदारनाथ विराजमान हैं। अलकनन्दा और मंदाकिनी उन दोनों नदियों का पवित्र संगम [[रूद्रप्रयाग]] में होता है और वहाँ से ये एक धारा बनकर पुन: [[देवप्रयाग]] में ‘भागीरथी गंगा’ से संगम करती हैं। देवप्रयाग में [[गंगा नदी|गंगा]] उत्तराखण्ड के पवित्र तीर्थ 'गंगोत्तरी' से निकल कर आती है। देवप्रयाग के बाद अलकनन्दा और मंदाकिनी का अस्तित्त्व विलीन होकर गंगा में समाहित हो जाता है तथा वहीं गंगा प्रथम बार [[हरिद्वार]] की समतल धरती पर उतरती हैं। भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद बद्री क्षेत्र में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते है। और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है। इसी आशय को [[शिव पुराण]] के कोटि रूद्र संहिता में भी व्यक्त किया गया है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
तस्यैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापै: प्रमुच्यते।&lt;br /&gt;
जीवन्मक्तो भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीबने।।&lt;br /&gt;
दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च।&lt;br /&gt;
केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशय:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटि रूद्र संहिता, 19/20-21&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==वास्तु शिल्प==                                                         &lt;br /&gt;
केदारेश्वर (केदारनाथ) ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मन्दिर का निर्माण [[पांडव|पाण्डवों]] ने कराया था, जो पर्वत की 11750 फुट की ऊँचाई पर अवस्थित है। पौराणिक प्रमाण के अनुसार ‘केदार’ महिष अर्थात भैंसे का पिछला अंग (भाग) है। केदारनाथ मन्दिर की ऊँचाई 80 फुट है, जो एक विशाल चौकोर चबूतरे पर खड़ा है। इस मन्दिर के निर्माण में भूरे रंग के पत्थरों का उपयोग किया गया है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि प्राचीन काल में यान्त्रिक साधनों के अभाव में ऐसे दुर्गम स्थल पर उन विशाल पत्थरों को लाकर कैसे स्थापित किया गया होगा? यह भव्य मन्दिर पाण्डवों की शिव भक्ति, उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति तथा उनके बाहुबल का जीता जागता प्रमाण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मन्दिर में उत्तम प्रकार की कारीगरी की गई है। मन्दिर के ऊपर स्तम्भों में सहारे लकड़ी की छतरी निर्मित है, जिसके ऊपर ताँबा मढ़ा गया है। मन्दिर का शिखर (कलश) भी ताँबे का ही है, किन्तु उसके ऊपर सोने की पॉलिश की गयी है। मन्दिर के गर्भ गृह में केदारनाथ का स्वयंमभू ज्योतिर्लिंग है, जो अनगढ़ पत्थर का है। यह लिंगमूर्ति चार हाथ लम्बी तथा डेढ़ हाथ मोटी है, जिसका स्वरूप भैंसे की पीठ के समान दिखाई पड़ता है। इसके पास-पास में सँकरी परिक्रमा बनी हुई है, जिसमें श्रद्धालु भक्तगण प्रदक्षिणा करते हैं। इस ज्योतिर्लिंग के सामने जल, फूल, बिल्वपत्र आदि को चढ़ाया जाता है और इसके दूसरे भाग में यात्रीगण घी पोतते हैं। भक्त लोग इस लिंगमूर्ति को अपनी बाँहों मे भरकर भगवान से मिलते भी हैं।&lt;br /&gt;
==अन्य मंदिर और कुण्ड==&lt;br /&gt;
मन्दिर के जगमोहन में [[द्रौपदी]] सहित पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियाँ हैं। केदारनाथ-मन्दिर के प्रवेश द्वार पर [[नन्दी]] की विशाल प्रतिमा स्थापित है और वहाँ से दक्षिण की ओर एक पहाड़ी पर श्री भैरव जी का एक सुन्दर मन्दिर है। केदारनाथ-मन्दिर के द्वार पर दोनों ओर द्वारपालों की मूर्तियाँ हैं। केदारनाथ की श्रृंगार मूर्ति पाँच मुखवाली है और इसे हमेशा वस्त्र तथा आभूषणों से सजाया जाता है। मन्दिर में उक्त मूर्तियों के अतिरिक्त पन्द्रह अन्य देवमूर्तियाँ भी स्थापित हैं। मन्दिर से पीछे लगभग तीन हाथ लम्बा एक कुण्ड है, जिसे 'अमृतकुण्ड' कहा जाता है। इस अमृतकुण्ड में दो [[शिवलिंग]] हैं। इनके पूर्व और उत्तर भाग में 'हंसकुण्ड' और 'रेतसकुण्ड' स्थित हैं। यहाँ की परम्परा है कि रेतसकुण्ड में पैर (जंघा) टेककर बायें हाथ से तीन आचमन किये जाते हैं। यहीं पर ईशानेश्वर-महादेव की प्रतिमा विराजमान है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केदारनाथजी के मन्दिर के सामने एक छोटे मन्दिर में 'उदक कुण्ड' है। इस कुण्ड में भी रेतसकुण्ड के समान ही आचमन लेने की प्रथा प्रचलित है। इस मन्दिर के पीछे मीठे जल का एक कुण्ड स्थित है, जिसका पानी भक्तगण पीते हैं। [[श्रावण]] के महीने में केदारेश्वर की पूजा गंगा जल, बिल्वपत्र तथा ब्रह्मकमल के फूलों से की जाती है। केदारघाटी के इस क्षेत्र में पंचकेदार (पाँच केदारनाथ) प्रसिद्ध हैं, जिनके स्थान मन्दिर और शिवलिंगों का अपना-अपना विशेष महत्त्व है। भगवान केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के आविर्भाव के सम्बन्ध में शिव महापुराण की कथा इस प्रकार है- &lt;br /&gt;
==शिव पुराण में कथा==&lt;br /&gt;
भगवान [[विष्णु]] के नर और नारायण नामक दो अवतार हुए हैं। नर और नारायण इन दोनों ने पवित्र हिमालय के बदरिकाश्रम में बड़ी तपस्या की थी। उन्होंने पार्थिव (मिट्टी) का शिवलिंग बनाकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उसमें विराजने के लिए भगवान [[शिव]] से प्रार्थना की। पार्थिव लिंग में शिव के विद्यमान होने पर दोनों (नर व नारायण) ने शास्त्र-विधि से उनकी पूजा-अर्चना की। प्रतिदिन निरन्तर शिव का पार्थिव-पूजन करना और उनके ही ध्यान में मग्न रहना उन तपस्वियों की संयमित दिनचर्या थी। बहुत दिनों के बाद उनकी आराधना से सन्तुष्ट परमेश्वर [[शंकर]] भगवान ने कहा कि मैं तुम दोनों पर बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम लोग मुझसे वर माँगो। भगवान शंकर की बात सुनकर प्रसन्न नर और नारायण ने जनकल्याण की भावना से कहा- 'देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और हमें वर देना चाहते हैं, तो आप अपने स्वरूप से पूजा स्वीकार करने हेतु सर्वदा के लिए यहीं स्थित हो जाइए।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जगत का कल्याण करने वाले भगवान शंकर उन दोनों तपस्वी-बन्धुओं के अनुरोध को स्वीकारते हुए हिमालय के केदारतीर्थ मे ज्योतिर्लिंग के रूप मे स्थित हो गये। उन दोनों अनन्य भक्तों से पूजित हो सम्पूर्ण भय और दु:ख का नाश करने हेतु तथा अपने भक्तों को दर्शन देने की इच्छा से केदारेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव वहाँ सदा ही विद्यमान रहते हैं। भगवान केदारनाथ दर्शन-पूजन करने वाले प्रदान करते हैं। नर-नारायण की तपस्या के आधार पर विराजने वाले केदारेश्वर की जिसने भी भक्तिभाव से पूजा की, उसे स्वप्न में भी दु:ख और कष्ट के दर्शन नहीं हुए। शिव का प्रिय भक्त केदारलिंग के समीप शिव का स्वरूप अंकित (जिस वलय / कंकण पर शिव की आकृति बनी हो) कड़ा चढ़ाता है, वह उस वलय से सुशोभित भगवान शिव का दर्शन करके इस भवसागर से पार हो जाता है अर्थात वह जीवनमुक्त हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो मनुष्य बदरीवन की यात्रा करके नर तथा नारायण और केदारेश्वर शिव के स्वरूप का दर्शन करता है, नि:सन्देह वह मोक्ष पद का भागी बन जाता है। ऐसा मनुष्य जो केदारनाथ ज्योतिर्लिंग में भक्ति-भावना रखता है और उनके दर्शन के लिए अपने स्थान से प्रस्थान करता है, किन्तु रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो जाती है, जिससे वह केदारेश्वर का दर्शन नहीं कर पाता है, तो समझना चाहिए कि निश्चित ही उस मनुष्य की मुक्ति हो गई। शिव पुराण का यह भी अभिमत है कि केदारतीर्थ में पहुँचकर, वहाँ केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का पूजन कर जो मनुष्य वहाँ का जल पी लेता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह भक्ति-भाव पूर्वक भगवान नर-नारायण और केदारेश्वर शिवलिंग की पूजा-अर्चना करे। श्री शिव महापुराण के कोटि रूद्र संहिता में इसी बात को निम्नलिखित प्रकार कहा गया है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
केदारेशस्य भक्ता ये मार्गस्थास्तस्य वै मृता:।&lt;br /&gt;
तेऽपि मुक्ता भवन्त्येव नात्र कार्य्या विचारणा।।&lt;br /&gt;
तत्वा तत्र प्रतियुक्त: केदारेशं प्रपूज्य च।&lt;br /&gt;
तत्रत्यमुदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विन्दति।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटि रूद्र संहिता, 20/22-23&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य कथा==                              &lt;br /&gt;
शिव महापुराण में एक अन्य कथा का भी संकेत प्राप्त होता है। उसके अनुसार जब [[महाभारत]]-युद्ध समाप्त हो गया और पाण्डव विजयी हो गये, उस समय भारतवर्ष की वीरता महाभारत के समर (युद्ध) में विलीन हो गई, युद्ध का परिणाम भय़ंकर हुआ क्योंकि क्षत्रिय योद्धाओं का संहार हो गया। [[कौरव|कौरवों]] के साथ-साथ पाण्डवो पर भी उस युद्ध की जिम्मेदारी कम न थी यद्यपि महाभारत का युद्ध न्याय और अन्याय का संघर्ष था, किन्तु उसका दुष्परिणाम समूचे राष्ट्र को भुगतना पड़ा। युद्ध समाप्त होने के बाद जब पाण्डवों ने उस पर विचार मन्थन किया, तो वे दु:ख से अत्यन्त व्याकुल हो उठे। उन्होने स्वयं अपने ही हाथों अपने सगे-सम्बन्धियों तथा कुल के लोगों का नाश कर डाला था। पाण्डवों ने आत्मकुल-नाश और गोत्र-हत्या के पाप से पीछा छुड़ाने हेतु अर्थात मुक्ति प्राप्त करने हेतु [[व्यास|वेदव्यास]]जी से प्रायश्चित का विधान जानना चाहा। व्यास जी ने उन पाण्डवों को बताया कि संसार में सबका भला होता देखा गया है, किन्तु अपने वंश की हत्या करने वाले कुलघाती का कभी कल्याण नहीं होता है। उन्होंने कहा कि यदि तुम लोग इस पाप से मुक्त होना चाहते हो, तो केदार क्षेत्र में जाकर भगवान केदारनाथ का दर्शन और पूजा करो। केदारेश्वर शिवलिंग के दर्शन के बिना तुम लोगों को मुक्ति नहीं मिलेगी। केदार क्षेत्र का वर्णन करते हुए व्यास जी ने बताया कि जिस क्षेत्र में नदियों में श्रेष्ठ मंदाकिनी अनेक धाराओं में विभक्त होकर बहती हैं, जहाँ भगवान महेश, [[पार्वती]] के संग अपने सैकड़ों महान वीर गणों के साथ निवास करते हैं और उनके दर्शनों के लिए कर्मनिष्ठ तपेव्रती [[ब्रह्मा]] आदि देवता उपस्थित होते हैं, जहाँ विविध प्रकार के वाद्ययन्त्रों की ध्वनियाँ तथा [[वेद|वेदों]] की ऋचाएँ अनवरत सुनायी पड़ती हैं, उस महापथ नाम से निर्मित देवस्थान में तुम लोग चले जाओं। व्यास जी से निर्देश और उपदेश ग्रहण कर प्रसन्नचित्त पाण्डव भगवान शिव के दर्शन हेतु तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डव सर्वप्रथम [[काशी]] की यात्रा पर [[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|श्री विश्वनाथ]] भोलेनाथ का दर्शन करने हेतु पहुँचे, किन्तु इन कुलघाती पापियों को भगवान शिव प्रत्यक्ष दर्शन नहीं देना चाहते थे। इसलिए पाण्डव निराश होकर श्री व्यास जी द्वारा निर्देशित केदार क्षेत्र की ओर मुड़ गये। इन्हे केदारखण्ड में आते देख भगवान शंकर गुप्तकाशी में जाकर अन्तर्धान हो गये। उसके बाद कुछ दूर और आगे जाकर महादेव जी ने एक भैंसे का रूप धारण किया और विचरण करने लगे। पाण्डव दल को इस प्रकरण का ज्ञान आकाशवाणी के द्वारा हो गया। जब भगवान शिव ने पाण्डवों के मन की बात जान ली, तब वे भैंसा रूपी शिव भूमिगत होने के लिए दलदली धरती में धँसने लगे। महान बलशाली और  पराक्रमी [[भीम]] ने भैंसा रूपी शिव की पूँछ पकड़ ली। इसी परिस्थिति में अन्य सभी पाण्डव करूणापूर्वक क्रन्दन करते हुए विविध प्रकार से भगवान भोलेनाथ श्री केदारेश्वर की स्तुति करने लगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनकी श्रद्धा-भक्ति और स्तुति से आशुतोष भगवान शिव प्रभावित होकर उन पर प्रसन्न हो गये। उन पाण्डवों की प्रार्थना पर भैंसा के पृष्ठभाग (पीठ) के यप में सर्वदा के लिए शंकर जी वहीं स्थित हो गये, जिनकी पूजा पाण्डवों ने विधिपूर्वक की। वहाँ पर भी पाण्डवों को नभ वाणी सुनाई पड़ी– 'पाण्डवों! मेरी इस पूजा से तुम्हारे सकल मनोरथ सिद्ध हो जाएँगें।' शिव को भैंसा के पृष्ठ के रूप में पूजन कर पाण्डव गोत्र हत्या के पाप से मुक्त हो गये। इसी कथा के आधार पर केदार घाटी में पाँच स्थानों पर पाँच केदार का दर्शन-पूजन करने का प्रचलन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भैंसा रूपी शिव के अंगों के आधार पर ये केदार-स्थान इस प्रकार हैं–&lt;br /&gt;
#केदारनाथ प्रमुख तीर्थ में भैंसा के पीठ के रूप में।&lt;br /&gt;
#मध्य महेश्वर में उसकी नाभि के यप में। &lt;br /&gt;
#तुंगनाथ में उसकी भुजाएँ और हृदय के रूप में। &lt;br /&gt;
#रूद्रनाथ में मुख के रूप में और&lt;br /&gt;
#कल्पेश्वर में जटाओं के रूप में प्रतिष्ठिता हैं। &lt;br /&gt;
उत्तराखंड के इन पाँचो केदारों के दर्शन का विशेष महत्त्व है। यहाँ एक बूढ़ा केदार भी हैं। इनके सम्बन्ध मे कहा जाता है कि जब पाण्डव तीर्थयात्रा पर निकले थे, तो उन्होंने भगवान शिव के दर्शन हेतु बूढा केदार में जाकर दर्शन किया था। शिव के भैंसा रूप का वर्णन जो पाण्डवों से सम्बन्धित है, शिव महापुराण के कोटि रूद्र संहिता में इस प्रकार किया गया है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
यो वै हि पाण्डवान्दृष्ट्वा महिषं रूपमास्थित:।&lt;br /&gt;
मायामास्थाय तत्रैव पलायनपरोऽभवत्।।&lt;br /&gt;
धृतश्च पाण्डवैस्तत्र ह्मवांगमुखतया स्थित:।&lt;br /&gt;
पुच्छं चैव धृतं तैस्तु प्रर्थितश्च पुन:।।&lt;br /&gt;
तद्रूपेण स्थितस्तत्र भक्तवत्सलनामभाक्।&lt;br /&gt;
नयपाले शिरोभागो गतस्तद्रूपत: स्थित:।।&lt;br /&gt;
तथैव पूजनान्नित्यामाज्ञां चैवाप्यदात्तथा।&lt;br /&gt;
पूजयित्वा गतास्ते तु पाण्डवा मुदितास्तदा।&lt;br /&gt;
लब्ध्वा चित्तोप्सितं सर्व विमुक्ता: सर्वदु:खत:।।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटि रूद्र संहिता, 19/13-17&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==स्कन्द पुराण में यात्रा का महात्मय==                          &lt;br /&gt;
भगवान शंकर को मंदाकिनी गंगा, मधुगंगा, क्षीर गंगा आदि नदियों से सिंचित और सैकड़ों शिवलिंगों से सुशोभित तथा हिमखण्डों से आच्छादित यह केदार क्षेत्र अतिशय प्रिय है। [[स्कन्द पुराण]] की कथा के अनुसार माँ [[पार्वती]] के द्वारा केदार क्षेत्र की महिमा पूछने पर भगवान [[शिव]] ने उन्हें बताया कि यह क्षेत्र अधिक प्रिय होने के कारण वे इसे कभी नहीं छोड़ते हैं। उन्होंने पार्वती जी से कहा कि मैंने जब सृष्टि-कार्य के लिए [[ब्रह्मा]]जी का रूप धारण किया था, तभी से परब्रह्म को जीतने के लिए मैं इस क्षेत्र मे सर्वदा निवास करता हूँ। इस क्षेत्र के द्वार पर नन्दी, भृँगी आदि प्रहरी (द्वारपाल) बनकर खड़े रहते हैं। जो मनुष्य अपने निवास पर रहते हुए इस केदार यात्रा का विचार करता है, इसके लिए कार्यक्रम बनाता है, उसके तीन सौ पीढ़ियों के पितर शिव लोक में निवास प्राप्त करते है। जो व्यक्ति मन, वाणी और कर्म से मेरे प्रति समर्पित होकर श्री केदारनाथ जी का दर्शन करता है, तो यदि उसे ब्रह्महत्या के समान भी पाप लगा हो, वे सब दर्शनमात्र से ही नष्ट हो जाते हैं। जैसे देवताओं में भगवान [[विष्णु]], सरोवरों में समुद्र, नदियों में [[गंगा नदी|गंगा]], पर्वतों मे [[हिमालय]], भक्तों में [[नारद]], गऊओं में [[कामधेनु]] और सभी पुरियों में कैलाश श्रेष्ठ है, वैसे ही सम्पूर्ण क्षेत्रों में केदार क्षेत्र सर्वश्रेष्ठ है।&lt;br /&gt;
==स्कन्द पुराण की कथा==&lt;br /&gt;
इस प्रकार केदार क्षेत्र के बखान में आनन्दित भगवान शंकर ने माता गौरी को एक कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि एक गाँव में एक हिंसक बहेलिया (पक्षियों और वन्य प्राणियों का शिकार करने वाला) रहता था। उसे मृगों का मांस बहुत प्रिय था और मांसाहारी होने  के कारण वह दुराचार भी बहुत करता था। वह प्रतिदिन मृगों का शिकार करता था और उन्हें अपना आहार बना लेता था। एक दिन वह शिकार के सिलसिले में केदारतीर्थ में पहुँच गया। जब वह सघन जंगलों से होकर शिकार की खोज में पर्वतों पर विचरण कर रहा था, तब उसे मुनि नारद दिखाई दिये जिनको स्वर्ण मृग समझ लिया, क्योंकि वह बहुत दूर से उन्हें देख रहा था। उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ा लिया। जब वह ऋषि नारद को बाण से मारने के लिए उद्यत हुआ, तब तक सूर्यास्त हो चला था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस समय उस बहेलिए ने वहाँ देखा कि एक साँप मेंढक को निगल गया है, किन्तु वह मृत्यु प्राप्त मेढ़क शिव के स्वरूप में हो गया। जब वह कुछ दूर और आगे गया, तो देखा कि उस बाघ ने हिरण को मार डाला है, किन्तु वह हिरण शिव गणों के साथ शिवलोक में जा रहा है। इन सब दृश्यों को देखकर वह बहेलिया भ्रमित और चकित हो उठा। इतने में ऋषि नारद जी उस बहेलिये के पास पहुँच गये। मनुष्य के रूप में नारद को अपने पास आया देख उस शिकारी ने उपर्युक्त घटित घटनाओं के सम्बन्ध में उनसे जानने की इच्छा प्रकट की। नारद मुनि ने उससे कहा कि तुम बहुत सौभाग्यशाली हो, जो इस परम पवित्र तीर्थ में पधारे हो। जैसा कि तुमने देखा है, इस कल्याणकारक शुभ तीर्थ में निकृष्ट जीव भी तुम्हारे देखते-देखते शिवतत्त्व को प्राप्त हो गये हैं।&lt;br /&gt;
उसके बाद उस बहेलिए (व्याध) ने घोर आश्चर्य में पड़कर मुनिश्रेष्ठ नारद के चरणों में दण्डवत प्रणाम किया। उसने अपने उद्धार हेतु नारद जी से बड़ी विनती की। नारद जी ने भगवान शिव के सम्बन्ध में उसे उपदेश तथा निर्देश दिया। उनके उपदेशानुसर वह शिकारी उसी केदार क्षेत्र का निवासी बन गया और केदारेश्वर भगवान के भजन-चिन्तन में रम गया। घोर हिंसा करने वाला वह बहेलिया केदारनाथ की भक्ति करने से अन्त में परम गति (मुक्ति) को प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कन्द पुराण में महिष रूपधारी भगवान शिव की एक भिन्न कथा भी आती है। केदार क्षेत्र में देवराज [[इन्द्र]] ने भगवान शंकर की तपरस्या की थी। उस प्रकरण में महाबलशाली दैत्य [[हिरण्याक्ष]] उत्पन्न हुआ था। उस दैत्य ने युद्ध में देवताओं के राजा इन्द्र को पराजित कर स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया था। पराजित इन्द्र ने देवताओं सहित देवाधिदेव महादेव की श्रद्धा-भक्ति पूर्वक आराधना की। उनकी तपस्या से आशुतोष भगवान शिव प्रसन्न हो उठे। वे एक दिन महिष (भैंसा) का रूप धारण करके इन्द्र के समक्ष ही धरती से निकल पड़े। उन्होंने कहा- ‘देवेन्द्र! मैं इस रूप में किसको-किसको पानी में फेंक कर विदीर्ण कर डालूँ अर्थात मार डालूँ?’ भगवान शिव के द्वारा ऐसा पूछने पर इन्द्र ने हिरण्याक्ष सहित पाँच राक्षसों का नाम बताया। इन्द्र द्वारा बताये गये उन बलशाली पाँच दैत्यों के स्थान पर भोलेनाथ शिव गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वहाँ पर उन दैत्यों के अन्य भी भयंकर पराक्रमी साथी विद्यमान थे। वे सभी अस्त्र-शस्त्र लेकर भैंसा रूपी शिव की ओर दौड़ पड़े, जिन्हें महादेव जी ने अपनी सींगों से मार-मारकर जल में डुबोया और यमलोक पहुँचा दिया। उसके बाद उन्होंने इन्द्र से वर माँगने के लिए कहा। इन्द्र ने पिनाकधारी शिव से प्रार्थना करते हुए कहा कि आप धर्म तथा तीनों लोकों की रक्षा करने के लिए इसी क्षेत्र में सर्वदा निवास करें। भगवान शिव ने इन्द्र की याचना को स्वीकार कर लिया। इन्द्र से शिव जी ने पूछा – ‘के दरयामि?’ यहाँ ‘कं जलम्’ अर्थात् ‘कम्’ जल को कहा जाता है और उसका अधिकरण कारक में रूप बनता है 'के'। इसी प्रकार ‘छिदिर-भिदिर विदारणे’ धातु से ‘विदारयामि’ अर्थात फाड़ डालूँ ऐसा वाक्य तैयार होता है। इसका तात्पर्य यह कि जल में फेंककर मार (विदीर्ण) डालता हूँ। इन्द्र ने भगवान शिव से कहा कि आपने ‘के दरयामि’ ऐसा वाक्य प्रयोग किया है, इसीलिए इस क्षेत्र का नाम ‘केदार’ शब्द से प्रसिद्ध होगा। &lt;br /&gt;
==संचालन हेतु मंदिर समिति==&lt;br /&gt;
श्री केदारनाथ और श्री बदरीनाथ के मन्दिरों के संचालन हेतु प्रदेश की सरकार ने मन्दिर-समिति बनाई है। मन्दिर-समिति के माध्यम से मन्दिरों का संचालन होता है तथा उनके आय-व्याय और सर्व प्रकार की व्यवस्था का दायित्व उसी पर होता है। आम जनता द्वारा मन्दिरों में पूजा, भोग-राग, आरती आदि करवाने हेतु मन्दिर-समिति ने दक्षिणा (शुक्ल) निर्धारित किया है। दक्षिण भारत के रावल (ब्राह्मण) मन्दिर के प्रमुख पुजारी होते हैं। मन्दिर के सभी कर्मचारियों को समिति द्वारा वेतन दिया जाता है। &lt;br /&gt;
==दर्शन का समय==&lt;br /&gt;
*केदारनाथ जी का मन्दिर आम दर्शनार्थियों के लिए प्रात: 7:00 बजे खुलता है। &lt;br /&gt;
*दोपहर एक से दो बजे तक विशेष पूजा होती है और उसके बाद विश्राम के लिए मन्दिर बन्द कर दिया जाता है। &lt;br /&gt;
*पुन: शाम 5 बजे जनता के दर्शन हेतु मन्दिर खोला जाता है। &lt;br /&gt;
*पाँच मुख वाली भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करके 7:30 बजे से 8:30 बजे तक नियमित आरती होती है। *रात्रि 8:30 बजे केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर बन्द कर दिया जाता है। &lt;br /&gt;
*शीतकाल में केदारघाटी बर्फ से ढँक जाती है। यद्यपि केदारनाथ-मन्दिर के खोलने और बन्द करने का मुहूर्त निकाला जाता है, किन्तु यह सामान्यत: नवम्बर माह की 15 तारीख से पूर्व (वृश्चिक संक्रान्ति से दो दिन पूर्व) बन्द हो जाता है और छ: माह बाद अर्थात वैशाखी (13-14 अप्रैल) के बाद कपाट खुलता है। &lt;br /&gt;
*ऐसी स्थिति में केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को ‘ऊखीमठ’ में लाया जाता हैं। इसी प्रतिमा की पूजा यहाँ भी रावल जी करते हैं।&lt;br /&gt;
*केदारनाथ में जनता शुल्क जमा कराकर रसीद प्राप्त करती है और उसके अनुसार ही वह मन्दिर की पूजा-आरती कराती है अथवा भोग-प्रसाद ग्रहण करती है।&lt;br /&gt;
==पूजा का क्रम==&lt;br /&gt;
भगवान की पूजाओं के क्रम में प्रात:कालिक पूजा, महाभिषेक पूजा, अभिषेक, लघु रूद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजन, अष्टोपचार पूजन, सम्पूर्ण आरती, पाण्डव पूजा, गणेश पूजा, श्री भैरव पूजा, पार्वती जी की पूजा, शिव सहस्त्रनाम आदि प्रमुख हैं। मन्दिर-समिति द्वारा केदारनाथ मन्दिर में पूजा कराने हेतु जनता से जो दक्षिणा (शुल्क) लिया जाता है, उसमें  समिति समय-समय पर परिर्वतन भी करती है। &lt;br /&gt;
==आने जाने की व्यवस्था==&lt;br /&gt;
हिमालय के पवित्र तीर्थों के दर्शन करने हेतु तीर्थयात्रियों को रेल, बस, टैक्सी आदि के द्वारा हरिद्वार आना चाहिए। हरिद्वार से उत्तराखंड की यात्राओं के लिए साधन उपलब्ध होते हैं। हरिद्वार से केदारनाथ की दूरी 247 किलोमीटर है। हरिद्वार से गौरीकुण्ड 233 किलोमीटर की यात्रा मोटरमार्ग से की जाती है, जबकि गौरी कुण्ड से केदारनाथ तक 14 किलोमीटर की दूरी पैदल मार्ग से जाना पड़ता है। पैदल चलने में असमर्थ व्यक्ति के लिए गौरी कुण्ड से घोड़ा, पालकी, पिट्ठू आदि के साधन मिलते हैं। यह यात्रा हरिद्वार से [[ऋषिकेश]], [[देवप्रयाग]], [[श्रीनगर]], [[रूद्रप्रयाग]], तिलवाड़ा, अगस्त्यमुनि कुण्ड, गुप्तकाशी, नाला, फाटा, रामपुर, सोनप्रयाग, गौरीकुण्ड,रामबाढ़ा और गरुड़चट्टी होते हुए श्रीकेदारनाथ तक पहुँचती है। &lt;br /&gt;
==गंगोत्री और यमुनोत्री==   &lt;br /&gt;
उत्तराखण्ड के चारों धाम की यात्रा में पहले यमुनोत्री की यात्रा का विधान है। गंगोत्री, यमुनोत्री तीर्थों के बाद भक्तगण केदारनाथ का दर्शन करते हैं, फिर अन्त में बद्रीनाथ जाते हैं। गंगोत्री से केदारनाथ जाने के लिए दो मोटर मार्ग हैं। प्रथम मार्ग गंगोत्री से भैरोघाटी, हरसिल, भटवाड़ी, उत्तरकाशी, धरासू, टिहरी, घनसाली, चिरबटिया, अगस्त्यमुनि, गुप्तकाशी, फोटा, सोनप्रयाग, गौरीकुण्ड तथा गरुड़चट्टी होकर केदारनाथ पहुँचता है। इस रास्ते की कुल दूरी 348 किलोमीटर बैठती है। गंगोत्री से केदारनाथ जाने के लिए एक दूसरा मार्ग भी है, जिसकी कुल दूरी 343 किलोमीटर पड़ती है। गंगोत्री से भैरवघाटी, उत्तरकाशी, धरासू, टिहरी, श्रीनगर, रूद्रप्रयाग, तिलवाड़ा और गौरी कुण्ड होते हुए केदारनाथ पहुँचा जाता है। &lt;br /&gt;
==कोटद्वार से केदारनाथ==&lt;br /&gt;
*कोटद्वार से दुगड्डा, पौडी, श्रीनगर, गुप्तकाशी और गौरीकुण्ड हाकर केदारनाथ जाने का भी मार्ग है। &lt;br /&gt;
*रूद्रप्रयाग 171 किलोमीटर पड़ता है, जबकि रूद्रप्रयाग से गौरीकुण्ड की दूरी 70 किलोमीटर। &lt;br /&gt;
*गुप्तकाशी की ऊँचाई समुद्रतल से  1479 मीटर है। &lt;br /&gt;
*केदारनाथ के लिए यात्रियों को गोचर से हेलिकाप्टर-सेवा भी उपलब्ध है। किसी भी मार्ग से यात्रा की जाये, किन्तु गौरीकुण्ड चौदह किलोमीटर पैदल चलकर ही केदारनाथ पहुँचना पड़ता हैं। *गौरीकुण्ड में हिमालय कन्या गौरी (पार्वती) ने भगवान शंकर को पति के रूप मे प्राप्त करने हेतु तप किया था। कठोर नियम वाली गौरी कमजोन-शरीर हो गयी थीं और सर्दी के कारण व्यथित थीं। वहाँ भगवान रूद्र ने [[अग्नि]] के रूप में प्रकट होकर जल को गर्म कर दिया था, जिसमें गौरी ने स्नान किया। आज भी तीर्थयात्री उस तप्तकुण्ड मे स्नान करके श्री केदारनाथ के दर्शन के लिए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*गौरी कुण्ड पर ही माता ने [[गणेश]] जी को जन्म दिया था। यहाँ वैनायिकी (मुंडाकटा) मन्दिर आज भी विद्यमान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान श्री केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर एक सुरम्य प्रकृति की शोभा है, उसके माँग का सिन्दूर है। नीचे मंदाकिनी का कल-कल निनाद, ऊपर पहाड़ों पर बर्फ की सफेद चादरें, उस रात को छिटकती चन्द्रमा की शीतल चाँदनी, मंदिर के घंटा घड़ियाल का मधुर संगीत, वेदमन्त्रों के घोष और बीच-बीच में हर-हर महादेव तथा ‘नम: शिवाय’ की ध्वनि, रोम-रोम में साक्षात शिवलोक का अनुभव कराती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5&amp;diff=17414</id>
		<title>सोमनाथ</title>
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		<updated>2010-04-29T13:49:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग / Somanath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग [[गुजरात]] (सौराष्ट्र) के [[काठियावाड़]] क्षेत्र के अन्तर्गत प्रभास में विराजमान हैं। इसी क्षेत्र में लीला पुरूषोत्तम भगवान [[कृष्ण|श्रीकृष्णचन्द्र]] ने [[यदु वंश]] का संहार कराने के बाद अपनी नर लीला समाप्त कर ली थीं। ‘जरा’ नामक व्याध (शिकारी) ने अपने बाणों से उनके चरणों (पैर) को बींध डाला था। [[शिव पुराण]] में भगवान सोमनाथ  का परिचय इस प्रकार दिया है-&lt;br /&gt;
==शिव पुराण में श्री सोमनाथ==&lt;br /&gt;
[[द्वादश ज्योतिर्लिंग]] में सोमनाथ की गणना प्रथम है। इनके आविर्भाव का प्रकरण प्रजापति [[दक्ष]] और [[चंद्र देवता|चन्द्रमा]] के साथ जुड़ा है। जब प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्विनी आदि सभी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ कर दिया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी के रूप में दक्ष कन्याओं को प्राप्त कर चन्द्रमा बहुत शोभित हुए और दक्षकन्याएँ भी अपने स्वामी के रूप में चन्द्रमा को प्राप्त कर शोभायमान हो उठी। चन्द्रमा की उन सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी उन्हें अतिशय प्रिय थी, जिसको वे विशेष आदर तथा प्रेम करते थे। उनका इतना प्रेम अन्य पत्नियों से नहीं था। चन्द्रमा की उदासीनता और उपेक्षा का देखकर रोहिणी की अपेक्षा शेष स्त्रियाँ बहुत दुःखी हुई। वे सभी स्त्रियाँ अपने पिता दक्ष की शरण में गयीं और उनसे अपने कष्टों का वर्णन किया। अपनी पुत्रियों की व्यथा और चन्द्रमा के दुर्व्यवहार को सुनकर दक्ष भी बड़े दुःखी हुए। उन्होंने चन्द्रमा से भेंट की और शान्तिपूर्वक कहा- ‘कलानिधे! तुमने निर्मल व पवित्र कुल में जन्म लिया है, फिर भी तुम अपनी पत्नियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हो। तुम्हारे आश्रय में रहने वाली जितनी भी स्त्रियाँ हैं, उनके प्रति तुम्हारे मन मे कम और अधिक, ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों है? तुम किसी को अधिक प्यार करते हो और किसी को कम प्यार देते हो, ऐसा क्यों करते हो? अब तक जो व्यवहार किया है, वह ठीक नहीं है, फिर अब आगे ऐसा दुर्व्ववहार तुम्हें नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति आत्मीयजनों के साथ विषमतापूर्ण व्यवहार करता है, उसे नर्क में जाना पड़ता है।’ इस प्रकार प्रजापति दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक समझाया और ऐसा सोच लिया कि चन्द्रमा में सुधार हो जाएगा। उसके बाद प्रजापति दक्ष वापस चले गये।&lt;br /&gt;
*शिव महापुराण के कोटिरूद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में लिखा है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमले च कुले त्वं हि समुत्पन्नः कलानिधे।&lt;br /&gt;
आश्रितेषु च सर्वेषु न्यूनाधिक्यं कथं तव।।&lt;br /&gt;
कृतं चेतत्कृतं तच्च् न कर्त्तव्यं त्वया पुनः।&lt;br /&gt;
वर्तनं    विषमत्वेन    नरकप्रदमीरितम्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रबल भावी के कारण विवश चन्द्रमा ने अपने ससुर प्रजापति दक्ष की बात नहीं मानी। रोहिणी के प्रति अतिशय आसक्ति के कारण उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की तथा अपनी अन्य पत्नियों का कुछ भी ख्याल नहीं रखा और उन सभी से उदासीन रहे। दुबारा समाचार प्राप्त कर प्रजापति दक्ष बड़े दुःखी हुए। वे पुनः चन्द्रमा के पास आकर उन्हें उत्तम नीति के द्वारा समझने लगे। दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की । बार-बार आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने अवहेलनापूर्वक जब दक्ष की बात नहीं मानी, तब उन्होंने शाप दे दिया। दक्ष ने कहा कि मेंरे आग्रह करने पर भी तुमने मेरी अवज्ञा की है, इसलिए तुम्हें क्षयरोग हो जाय-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रयतां  चन्द्र  यत्पूर्व  प्रार्थितो बहुधा  मया।,&lt;br /&gt;
न मानितं त्वया यस्मात्तस्मात्त्वं च क्षयी भव&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण कोटि रूद्र संख्या 14-18&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
दक्ष द्वारा शाप देने के साथ ही क्षण भर में चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गये। उनके क्षीण होते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी देवगण तथा ऋषिगण भी चिंतित हो गये। परेशान चन्द्रमा ने अपनी अस्वस्थता तथा उसके कारणों की सूचना [[इन्द्र]] आदि देवताओं तथा ऋषियों को दी। उसके बाद उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता तथा [[वसिष्ठ]] आदि ऋषिगण [[ब्रह्मा]]जी की शरण में गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि जो घटना हो गई है, उसे तो भुगतना ही है, क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नहीं जा सकता। उसके बाद ब्रह्माजी ने उन देवताओं को एक उत्तम उपाय बताया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मा ने कहा कि चन्द्रमा देवताओं के साथ कल्याणकारक शुभ प्रभास क्षेत्र में चले जायें। वहाँ पर विधिपूर्वक शुभ [[महामृत्युंजय मन्त्र|मुत्युंजय-मत्रं]] का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान [[शिव]] की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें। इनकी आराधना और तपस्या से जब भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाएँगे, तो वे इन्हें क्षय रोग से मुक्त कर देगें। पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा को स्वीकार कर देवताओं और ऋषियों के सरंक्षण मे चन्द्रमा देवमण्डल सहित प्रभास क्षेत्र में पहुँच गये। वहाँ चन्द्रदेव ने मृत्युंजंय भगवान। की अर्चना-वन्दना और अनुष्ठान प्रारम्भ किया। वे मृत्युंजय-मंत्र का जप तथा भगवान। शिव की उपासना में तल्लीन हो गये। ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की ओर वृषभध्वज का पूजन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित से वहाँ निरन्तर खड़े रहे। उनकी उत्कट तपस्या से भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने चन्द्रमा से कहा- 'चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जिसके लिए यह कठोर तप कर रहे हो, उस अपनी अभिलाषा को बताओ। मै तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें उत्तम वर प्रदान करूँगा।’ चन्द्रमा ने प्रार्थना करते हुए विनयपूर्वक कहा- ‘देवेश्वर! आप मेरे सब अपराधों को क्षमा करें और मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कर दें।’ भगवान शिव ने कहा– 'चन्द्रदेव! तुम्हारी कल प्रतिदिन एक पक्ष में क्षीण हुआ करेगी, जबकि दूसरे पक्ष में प्रतिदिन वह निरन्तर बढ़ती रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ और लोक-सम्मान के योग्य ही जाओगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शिव का कृपा-प्रसाद प्राप्त कर चन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्तिभाव पूर्वक शंकर की स्तुति की। ऐसी स्थिति में निराकार शिव उनकी दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हो गये तथा प्रभास क्षेत्र के महत्व को बढाने हेतु देवताओं के सम्मान तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए स्वयं ‘सोमेश्वर’ कहलने लगे। चन्द्रमा के नाम पर सोमनाथ बने भगवान शिव संसार में ‘सोमनाथ’ के नाम से भी प्रसि) हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोमनाथ भगवान की पूजा और उपासना करने से उपासक भक्त के क्षय तथा कोढ़ आदि रोग सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है। यशस्वी चन्द्रमा के कारण ही सोमेश्वर भगवान शिव इस भूतल को परम पवित्र करते हुए प्रभास क्षेत्र मे विराजते हैं। उस प्रभास क्षेत्र में सभी देवताओं ने मिलकर एक सोमकुण्ड की भी स्थापना की है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस कुण्ड में शिव तथा ब्रह्मा का सदा निवास रहता है। इस पृथ्वी पर यह चन्द्रकुण्ड मनुष्यों के पाप नाश करने वाले के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ‘पापनाशक-तीर्थ’ भी कहते हैं। जो मनुष्य इस चन्द्रकुण्ड में स्नान करता है, वह सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। इस कुण्ड में बिना नागा किये छः माह तक स्नान करने से क्षय आदि दुःसाध्य और असाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं। मुनष्य जिस किसी भी भावना या इच्छा से इस परम पवित्र और उत्तम तीर्थ का सेवन करता है, तो वह बिना संशय ही उसे प्राप्त कर लेता है। शिव महापुराण की कोटिरूद्र संहिता के चौदहवें अध्याय में उपर्युक्त आशय वर्णित है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
चन्द्रकुण्डं  प्रसिद्ध  च पृथिव्यां पापनाशनम्।&lt;br /&gt;
तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।&lt;br /&gt;
रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।&lt;br /&gt;
ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।&lt;br /&gt;
प्रभासं  च  परिक्रम्य  पृथिवीक्रमसं  भवम्।&lt;br /&gt;
फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।&lt;br /&gt;
सोमलिंग  नरो   दृष्टा  सर्वपापात्प्रमुच्यते ।&lt;br /&gt;
लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार सोमनाथ के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव देवताओं की प्रार्थना पर लोक कल्याण करने हेतू प्रभास क्षेत्र में हमेशा-हमेशा के लिए विराजमान हो गये। इस प्रकार शिव-महापुराण में सोमेश्वर महादेव अथवा सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति का वर्णन है। इसके अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में लिखी कथा भी इसी से मिलती-जुलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास से==&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय इतिहास और आधुनिक भारत के इतिहास में भी सोमनाथ-मन्दिर को सन 1024 में [[महमूद ग़ज़नवी]] ने भ्रष्ट कर दिया था। मूर्ति भंजक (मूर्ति का तोड़ने वाला व मूर्तिपूजा विरोधी) होने के कारण तथा सोने-चाँदी को लूटने के लिए उसने मन्दिर में तोड़-फोड़ की थी। मन्दिर के हीरे-जवाहरातों को लूट कर वह अपने देश ग़ज़नी लेकर चला गया। उक्त सोमनाथ-मन्दिर का भग्नावशेष आज भी समुद्र के किनारे विद्यमान है। इतिहास के अनुसार बताया जाता है कि जब महमूद ग़ज़नवी उस शिवलिंग को नहीं तोड़ पाया, तब उसने उसके अगल-बगल मे भीषण आग लगवा दी। सोमनाथ मन्दिर में नीलमणि के छप्प्न खम्भे लगे हुए थे। उन खम्भों में हीरे-मोती तथा विविध प्रकार के रत्न जड़े हुए थे। उन बहुमूल्य रत्नों को लुटेरों ने लूट लिया और मन्दिर को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।&lt;br /&gt;
==पुन: प्रतिष्ठा==&lt;br /&gt;
महमूद के मन्दिर लूटने के बाद राजा भीमदेव ने पुनः उसकी प्रतिष्ठा कीं। सन 1093. में सिद्धराज जयसिंह ने भी मन्दिर की प्रतिष्ठा और उसके पवित्रीकरण में भरपूर सहयोग किया। 1168 में विजयेश्वर कुमारपाल ने जैनाचार्य हेमचन्द्र सरि के साथ सोमनाथ की यात्रा की थी। उन्होंने भी मन्दिर का बहुत कुछ सुधार करवाया था। इसी प्रकार सौराष्ट्र के राजा खंगार ने भी सोमनाथ-मन्दिर का सौन्द्रयीकरण कराया था। उसके बाद भी मुसलमानों ने बहुत दुराचार किया और मन्दिर को नष्ट-भ्रष्ट करते रहे। [[अलाऊद्दीन ख़िलजी]] ने सन 1297 ई. में पुनः सोमनाथ-मन्दिर का ध्वंस किया। उसके सेनापति नुसरत खाँ ने जी-भर मन्दिर को लूटा। सन 1395 ई. में गुजरात का सुल्तान मुजफ्फरशाह भी मन्दिर का विध्वंस करने में जुट गया। अपने पितामह के पदचिन्ह्वों पर चलते हुए अहमदशाह ने पुनः सन 1413 ई. में सोमनाथ-मन्दिर को तोड़ डाला। प्राचीन स्थापत्यकला जो उस मन्दिर में दृष्टिगत होती थी, उन सबको उसने तहस-नहस कर डाला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वतन्त्रता के बाद==&lt;br /&gt;
भारतीय स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद राष्ट्र के प्रथम राष्ट्रपति [[डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद|डा॰ राजेन्द्र प्रसाद]] ने देश के स्वाभिमान को जाग्रत करते हुए पुनः सोमनाथ मन्दिर क भव्य निर्माण कराया आज पुनः भारतीय-संस्कृति और सनातन-धर्म की ध्वजा के रूप में सोमेश्वर ज्योतिर्लिंग ‘सोमनाथ मन्दिर’ के रूप में शोभायमान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचें==&lt;br /&gt;
सोमनाथ का मन्दिर जिस स्थान पर स्थित है, उसे वेरावल, सोमनाथपाटण, प्रभास और प्रभासपाटण आदि नामों से जाना जाता है। सौराष्ट्र के पश्चिमी रेलवे की [[राजकोट]]-वेरीवल तथा खिजडिया वेरावल लाइनें हैं। इन दोनों ओर से वेरावल पहुँचा जाता है। वेरावल रेलवे स्टेशन से प्रभास पाटल पाँच किलोमीटर की दूरी पर है। स्टेशन से बस, टैक्सी आदि के द्वारा प्रभासपाटाण पहुँचा जा सकता है।&lt;br /&gt;
==समुद्रका अग्निकुण्ड==&lt;br /&gt;
सोमनाथ में धर्मयात्रियों के लिए अनेक पवित्र और दर्शनीय स्थान विद्यमान हैं। प्रभासपाटाण नगर के बाहर ही एक ‘समुद्रका’ नामक अग्निकुण्ड हैं सर्वप्रथम यात्रीगण इसी कुण्ड में स्नान करते हैं, उसके बाद वे प्राची त्रिवेणी में स्नान करने के लिए जाते हैं। सोमनाथ का मूल मन्दिर जो आततायियों द्वारा बार-बार नष्ट किया गया था, वह आज भी अपने मूलस्थान समुद्र के किनारे ही है। स्वाधीन भारत के प्रथम गृहमन्त्री [[सरदार वल्लभभाई पटेल]] ने यहाँ भव्यमन्दिर का निर्माण कराया था। सोमनाथ के मूल मन्दिर से कुछ ही दूरी पर [[अहल्याबाई]] द्वारा बनवाया गया सोमनाथ का मन्दिर है।&lt;br /&gt;
==भू-गर्भ में==&lt;br /&gt;
यहाँ भू-गर्भ में (भूमि के नीचे) सोमनाथ लिंग की स्थापना की गई है। भू-गर्भ में होने के कारण यहाँ प्रकाश का अभाव रहता है। इस मन्दिर में [[पार्वती]], [[सरस्वती देवी]], [[लक्ष्मी]], [[गंगा नदी|गंगा]] और [[नन्दी]] की भी मूर्तियाँ स्थापित हैं। भूमि के ऊपरी भाग में शिवलिंग से ऊपर अहल्येश्वर मूर्ति है। मन्दिर के परिसर में [[गणेश]]जी का मन्दिर है और उत्तर द्वार के बाहर अघोरलिंग की मूर्ति स्थापित की गई है। प्रभावनगर में अहल्याबाई मन्दिर के पास ही महाकाली का मन्दिर है। इसी प्रकार गणेशजी, भद्रकाली तथा भगवान [[विष्णु]] का मन्दिर नगर में विद्यमान है। नगर के द्वार के पास गौरीकुण्ड नामक सरोवर है। सरोवर के पास ही एक प्राचीन शिवलिंग है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राची त्रिवेणी==&lt;br /&gt;
नगर के द्वार से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर प्राची त्रिवेणी है। उससे पहले ही रास्ते में ब्रह्माकुण्ड नामक बावडी मिलती है। वहीं पर ब्रह्माकण्डलु नामक तीर्थ और ब्रह्मेश्वर शिवमन्दिर भी स्थित है। इससे आग्र चलने पर ‘आदिप्रभास’ तथा ‘जलप्रभास’ नामक दो कुण्डों का दर्शन होता है। [[हिरण्या नदी|हिरण्या]], [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] और [[कपिला नदी|कपिला]] नाम वाली तीन नदियों नगर से पूरब की दिशा में समुद्र में जाकर मिलती है। नगर से पूरब में इन तीनों नदियों का संगम होने के कारण ही इसे ‘प्राची त्रिवेणी’ कहा जाता है।&lt;br /&gt;
सबसे पहले ‘कपिला’ सरस्वती में मिलती है, उसके बाद ‘सरस्वती’ हिरण्या में मिलती है, फिर ‘हिरण्या’ समुद्र मे जा मिलती है। प्राचीन त्रिवेणी संगम से कुछ ही दूर पर [[सूर्य देवता|सूर्य]] भगवान का मन्दिर है। उससे आग चलने पर हिंगलाज भवानी और महादेव सिद्धनाथ का मन्दिर एक गुफा के भीतर प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ से बलदेव जी शेषरूप धारण करके पाताल में गये थे। वहीं समीप में ही श्री [[वल्लभाचार्य]]जी की बैठक है, जहाँ त्रिवेणी माता, महाकालेश्वर, श्रीराम, श्रीकृष्णऔर भीमेश्वर के मन्दिर हैं। इस स्थान को ‘देहोत्सर्ग-तीर्थ' भी कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को जब भालक-तीर्थ में बाण लगा था, उसके बाद वे यहाँ पर आ गये थे और फिर अन्तर्धान हो गये थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल्पभेद की कथा के अनुसार श्रीकृष्णचन्द्र के शरीर का यहीं अग्नि-संस्कार किया गया था। देहोत्सर्ग तीर्थ से कुछ आगे चलकर हिरण्या नदी के किनारे यादवस्थली मिलती है। ऐसी मान्यता है कि इस यादवस्थली पर ही आपस में लड़ते हुए यादवगण नष्ट हो गये थे।&lt;br /&gt;
==बाणतीर्थ==&lt;br /&gt;
वेरोवल रेलवे स्टेशन से सोमनाथ आते समय रास्ते में समुद्र के किनारे बाणतीर्थ अवस्थित है। इस तीर्थ में शशिभूषण महादेव का प्राचीन मन्दिर है। समुद्र के किनारे बाणतीर्थ से पश्चिम की ओर चन्द्रभाग तीर्थ है। इस तीर्थ में बालू (रेत) के ऊपर ही कलिलेश्वर महादेव का स्थान है। बाणतीर्थ से लगभग पाँच किलोमीटर पर भालुपुर गाँव के पास भालक-तीर्थ है। यहाँ पर पास-पास मे ही भालकुण्ड और पद्मकुण्ड नामक सरोवर हैं। यहीं पर एक पीपल-वृक्ष के नीचे भालेश्वर शिव का स्थान है। इस पेड़ को मोक्ष-पीपल भी कहा जाता है। ऐसी प्रसिद्धि है कि इसी वृक्ष के (पीपल) नीचे बैठे श्रीकृष्णचन्द्र को उनके चरण में ‘जरा’ नामक व्याध ने बाण मारा था। कहा जाता है कि उनके चरणों से बाण निकाल कर इसी भालकुण्ड में फैंक दिया था। भालकुण्ड के पास दुर्गकूट में गणेश जी का भी मन्दिर है। यहाँ एक कर्दमकुण्ड भी है, जहाँ पर कर्देश्वर-महादेव का मन्दिर है। कुछ लोग बाण तीर्थ को ही भालक तीर्थ भी कहते है। [[पुराण]] की एक  विशेष कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी को खोदकर प्रभास क्षेत्र में मुर्गी के अण्डे बराबर स्वयम्भू स्पर्शलिंग सोमनाथ के दर्शन किये उसके बाद उन्होंने उस लिंग को कुशा तथा मधु से ढँककर उस पर ब्रह्मशिला रख दी। उसी ब्रह्मशिला के उपर ब्रह्मा ने सोमनाथ के बृहद्लिंग की प्रतिष्ठा की। चन्द्रमा इसी बृहद्लिंग की अर्चना-वन्दना करने के बाद प्रजापति दक्ष के शाप से मुक्त हुऐ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात_के_ऐतिहासिक_नगर]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>महाकालेश्वर</title>
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		<updated>2010-04-29T13:46:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple]]&lt;br /&gt;
'''श्री महाकालेश्वर / Shri Mahakaleshwar'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] जनपद में अवस्थित है। उज्जैन का [[पुराण|पुराणों]] और प्राचीन अन्य ग्रन्थों में 'उज्जयिनी' तथा 'अवन्तिकापुरी' के नाम से उल्लेख किया गया है। यह स्थान [[मालवा]] क्षेत्र में स्थित [[क्षिप्रा नदी]] के किनारे विद्यमान है। अवन्तीपुरी की गणना सात मोक्षदायिनी पुरियों में की गई है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवन्तिका।&lt;br /&gt;
पुरी  द्वारावती  चैव  सप्तैता  मोक्षदायिकाः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==महाराजा विक्रमादित्य द्वारा निर्माण==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
इसी महाकालेश्वर की नगरी में महाराजा [[विक्रमादित्य]] ने चौबीस खम्बों का दरबार-मण्डप बनवाया था। मंगल ग्रह का जन्मस्थान मंगलश्वेर भी यहीं स्थित है। इतिहास प्रसिद्ध [[भर्तृहरि की गुफा]] तथा [[महर्षि सान्दीपनि]] का आश्रम यहीं विराजमान है। श्री [[कृष्ण|कृष्णचन्द्र]] और [[बलराम]] जी ने इसी सान्दीपनि आश्रम में विद्या का अध्ययन किया था। इसी उज्जयिनी  नगरी में परम प्रतापी महाराज वीर विक्रमादित्य की राजधानी थी। जब सिंह राशि पर बृहस्पति ग्रह का आगमन होता है, तो यहाँ प्रत्येक बारह वर्ष पर [[कुम्भ|महाकुम्भ]] का स्नान और मेला लगता है। &lt;br /&gt;
==शिव महापुराण में वर्णित कथा== &lt;br /&gt;
समस्त देहधारियों की मोक्ष प्रदान करने वाली एक प्रसिद्ध और अत्यन्त अवन्ति नाम की नगरी है। लोक पावनी परम पुण्यदायिनी और कल्याण-कारिणी वह नगरी भगवान शिव जी को अत्यन्त प्रिय है। उसी पवित्र पुरी में शुभ कर्मपरायण तथा सदा [[वेद|वेदों]] के स्वाध्याय में लगे रहने वाले एक उत्तम ब्राह्मण रहा करते थे। वे अपने घर में [[अग्नि]] की स्थापना कर प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे और वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे रहते थे। भगवान शंकर के भक्त वे ब्राह्मण शिव जी की अर्चना-वन्दना में तत्पर रहा करते थे। वे प्रातिदिन पार्थिव लिंग का निर्माण कर शास्त्र विधि से उसकी पूजा करते थे। हमेशा उत्तम ज्ञान को प्राप्त करने में तत्पर उस ब्राह्मण देवता का नाम ‘वेदप्रिय’ था। वेदप्रिय स्वयं ही शिव जी के अनन्य भक्त थे, जिसके संस्कार के फलस्वरूप उनके शिव पूजा-परायण ही चार पुत्र हुए। वे तेजस्वी तथा माता-पिता के सद्गगुणों के अनुरूप थे। उन चारों पुत्रों के देवप्रिय, प्रियमेधा, संस्कृत और सुवृत थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन दोनों रत्नमाल पर्वत पर ‘दूषण’ नाम वाले धर्म विरोधी एक असुर ने वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण कर दिया। उस असुर को [[ब्रह्मा]]जी से अजेयता का वर मिला थां। सबको सताने के बाद अन्त में उस असुर ने भारी सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन) के उन पवित्र और कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों पर भी चढ़ाई कर दी। उस असुर की आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलयकाल की आग के समान प्रकट हो गये। उनके भंयकर उपद्रव से भी शिव जी मंद विश्वास करने वाले वे ब्राह्मणबन्धु भयभीत नहीं हुए। अवन्ति नगर के निवासी सभी ब्राह्मण जब उस संकट में घबराने लगे, तब उन चारों शिवभक्त भाइयों ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ‘आप लोग भक्तों के हितकारी भगवान [[शिव]] पर भरोसा रखें।’ उसके बाद वे चारों ब्राह्मण-बन्धु शिव जी का पूजन कर उनके ही ध्यान में तल्लीन हो गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेना सहित दूषण ध्यान मग्न उन ब्राह्मणो के पास पहूँच गया। उन ब्राह्मणों को देखते ही ललकारते हुए बोल उठा कि इन्हें बाँधकर मार डालो। वेदप्रिय के उन ब्राह्मण पुत्रों ने उस दैत्य के द्वारा कही गई बातों पर कान नहीं दिया और भगवान शिव के ध्यान में मग्न रहे। जब उस दुष्ट दैत्य ने यह समझ लिया कि हमारे डाँट-डपट से कुछ भी परिणाम निकलने वाला नहीं है, तब उसने ब्राह्मणों को मार डालने का निश्चय किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने ज्योंहि उन शिव भक्तों के प्राण लेने हेतु शस्त्र उठाया, त्योंहि उनके द्वारा पूजित उस पार्थिव लिंग की जगह गम्भीर आवाल के साथ एक गडढा प्रकट हो गया और तत्काल उस गड्ढे से विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हो गये। दुष्टों का विनाश करने वाले तथा सज्जन पुरूषों के कल्याणकर्त्ता वे भगवान शिव ही महाकाल के रूप में इस [[पृथ्वी] पर विख्यात हुए। उन्होंने दैत्यों से कहा- ‘अरे दुष्टों! तुझ जैसे हत्यारों के लिए ही मैं ‘महाकाल’ प्रकट हुआ हूँ। जल्दी इन ब्राह्मणों के समीप से दूर भाग जाओं’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार धमकाते हुए महाकाल भगवान शिव ने अपने हुँकार मात्र से ही उन दैत्यों को भस्म कर डाला। दूषण की कुछ सेना को भी उन्होंने मार गिराया और कुछ स्वयं ही भाग खड़ी हुई। इस प्रकार परमात्मा शिव ने दूषण नामक दैत्य का वध कर दिया। जिस प्रकार सूर्य क निकलते ही अन्धकार छँट जाता है, उसी प्रकार भगवान् आशुतोष शिव को देखते ही सभी दैत्य सैनिक पलायन कर गये। देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी दन्दुभियाँ बजायीं और आकाश से फूलों की वर्षा की। उन शिवभक्त ब्राह्मणो पर अति प्रसन्न् भगवान् शंकर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि ‘मै महाकाल महेश्वर तुम लोगों पर प्रसन्न हूँ, तुम लोग वर मांगो।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाकालेश्वर की वाणी सुनकर भक्ति भाव से पूर्ण उन ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहा- 'दुष्टों को दण्ड देने वाले महाकाल! शम्भो! आप हम सबको इस संसार-सागर से मुक्त कर दें। हे भगवान शिव! आप आम जनता के कल्याण तथा उनकी रक्षा करने के  लिए यहीं हमेशा के लिए विराजिए। प्रभो! आप अपने दर्शनार्थी मनुष्यों का सदा उद्धार करते रहें।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शंकर ने उन ब्राह्माणों को सद्गगति प्रदान की और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उस गड्ढे में स्थित हो गये। उस गड्ढे के चारों ओर की लगभग तीन-तीन किलोमीटर भूमि लिंग रूपी भगवान शिव की स्थली बन गई। ऐसे भगवान शिव इस पृथ्वी पर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने से स्वप्न में भी किसी प्रकार का दुःख अथवा संकट नहीं आता है। जो कोई भी मनुष्य सच्चे मन से महाकालेश्वर लिंग की उपसना करता है, उसकी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और वह परलोक में मोक्षपद को प्राप्त करता है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
महाकालेश्वरो  नाम   शिवः  ख्यातश्च   भूतले।&lt;br /&gt;
तं दुष्ट्वा न भवेत् स्वप्ने किंचिददुःखमपि द्विजाः।।&lt;br /&gt;
यं  यं  काममपेदयैव  तल्लिगं  भजते  तु  यः ।&lt;br /&gt;
तं  तं  काममवाप्नेति   लभेन्मोक्षं   परत्र   च&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिवमहापुराण कोटिरूद्रसहिंता 16/50-51&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य कथानक==&lt;br /&gt;
उज्जयिनी नगरी में महान शिवभक्त तथा जितेन्द्रिय चन्द्रसेन नामक एक राजा थे। उन्होंने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन कर उनके रहस्यों का ज्ञान प्राप्त किया था। उनके सदाचरण से प्रभावित होकर शिवजी के पार्षदों (गणों) में अग्रणी (मुख्य) मणिभद्र जी राजा  चन्द्रसेन के मित्र बन गये। मणिभद्र जी ने एक बार राजा पर अतिशय प्रसन्न होकर राजा चन्द्रसेन को चिन्तामणि नामक एक महामणि प्रदान की। वह महामणि कौस्तुभ मणि और [[सूर्य देवता|सूर्य]] के समान देदीप्यमान (चमकदार) थी। वह महा मणि देखने, सुनने तथा ध्यान करने पर भी, वह मनुष्यों को निश्चित ही मंगल प्रदान करती थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा चनद्रसेन के गले में अमूल्य चिन्तामणि शोभा पर रही है, यह जानकार सभी राजाओं में उस मणि के प्रति लोभ बढ़ गया। चिन्तामणि के लोभ से सभी राजा क्षुभित होने लगे। उन राजाओं ने अपनी चतुरंगिणी सेना तैयार की और उस चिन्तामणि के लोभ में वहाँ आ धमके। चन्द्रसेन के विरूद्ध वे सभी राजा एक साथ मिलकर एकत्रित हुए थे और उनके साथ भारी सैन्यबल भी था। उन सभी राजाओं ने आपस में परामर्श करके रणनीति तैयार की और राजा चन्द्रसेन पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों सहित उन राजाओं ने चारों ओर से उज्जयिनी के चारों द्वारों को घेर लिया। अपनी पुरी को चारों ओर से सैनिकों द्वारा घिरी हुई देखकर राजा चन्द्रसेन महाकालेश्वर भगवान शिव की शरण में पहुँच गये। वे निश्छल मन से दृढ़ निश्चय के सथ उपवास-व्रत लेकर भगवान महाकाल की आराधना में जुट गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन दिनों उज्जयिनी में एक विधवा ग्वालिन रहती थी,  जिसको इकलौता पुत्र था। वह इस नगरी में बहुत दिनों से रहती थी। वह अपने उस पाँच वर्ष के बालक को लेकर महाकालेश्वर का दर्शन करने हेतु गई। उसने देखा कि राजा चन्द्रसेन वहाँ बड़ी श्रद्धाभक्ति से महाकाल की पूजा कर रहे हैं। राजा के शिव पूजन का महोत्सव उसे बहुत ही आश्चर्यमय लगा। उसने पूजन को निहारते हुए भक्ति भावपूर्वक महाकाल को प्रणाम किया और अपने निवास स्थान पर लौट गयी। उस ग्वालिन माता के साथ उसके बालक ने भी महाकाल की पूजा का कौतूहलपूर्वक अवलोकन किया था। इसलिए घर वापस आकर उसने भी शिव जी का पूजन करने का विचार किया। वह एक सुन्दर-सा पत्थर ढूँढ़कर लाया और अपने निवास से कुछ ही दूरी पर किसी अन्य के निवास के पास एकान्त में रख दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने अपने मन में निश्चय करके उस पत्थर को ही शिवलिंग मान लिया। वह शुद्ध मन से भक्ति भावपूर्वक मानसिक रूप से गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य और अलंकार आदि जुटाकर, उनसे उस शिवलिंग की पूजा की। वह सुन्दर-सुन्दर पत्तों तथा फूलों को बार-बार  पूजन के बाद उस बालक ने बार-बार भगवान के चरणों में मस्तक लगाया। बालक का चित्त भगवान के चरणों में आसक्त था और वह विह्वल होकर उनको दण्डवत कर रहा था। उसी समय ग्वालिन ने भोजन के लिए अपने पुत्र को प्रेम से बुलाया। उधर उस बालक का मन शिव जी की पूजा में रमा हुआ था, जिसके कारण वह बाहर से बेसुध था। माता द्वारा बार-बार बुलाने पर भी बालक को भोजन करने की इच्छा नहीं हुई और वह भोजन करने नहीं गया तब उसकी माँ स्वयं उठकर वहाँ आ गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माँ ने देखा कि उसका बालक एक पत्थर के सामने आँखें बन्द करके बैठा है। वह उसका हाथ पकड़कर बार-बार खींचने लगी पर इस पर भी वह बालक वहाँ से नहीं उठा, जिससे उसकी माँ को क्रोध आया और उसने उसे खूब पीटा। इस प्रकार खींचने और मारने-पीटने पर भी जब वह बालक वहाँ से नहीं हटा, तो माँ ने उस पत्थर को उठाकर दूर फेंक दिया। बालक द्वारा उस शिवलिंग पर चढ़ाई गई सामग्री को भी उसने नष्ट कर दिया। शिव जी का अनादर देखकर बालक ‘हाय-हाय’ करके रो पड़ा। क्रोध में आगबबूला हुई वह ग्वालिन अपने बेटे को डाँट-फटकार कर पुनः अपने घर में चली गई। जब उस बालक ने देखा कि भगवान शिव जी की पूजा को उसकी माता ने नष्ट कर दिया, तब वह बिलख-बिलख कर रोने लगा। देव! देव! महादेव! ऐसा पुकरता हुआ वह सहसा बेहोश होकर [[पृथ्वी]] पर गिर पड़ा। उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। कुछ देर बाद जब उसे चेतना आयी, तो उसने अपनी बन्द आँखें खोल दीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस बालक ने आँखें खोलने के बाद जो दृश्य देखा, उससे वह आश्चर्य मे पड़ गया। भगवान शिव की कृपा से उस स्थान पर महाकाल का दिव्य मन्दिर खड़ा हो गया था। मणियों के चमकीले खम्बे उस मन्दिर की शोभा बढा रहे थे। वहाँ के भूतल पर स्फटिक मणि जड़ दी गयी थी। तपाये गये दमकते हुए स्वर्ण-शिखर उस शिवालय को सुशोभित कर रहे थे। उस मन्दिर के विशाल द्वार, मुख्य द्वार तथा उनके कपाट सुवर्ण निर्मित थे। उस मन्दिर के सामने नीलमणि तथा हीरे जड़े बहुत से चबूतरे बने थे। उस भव्य शिवालय के भीतर मध्य भाग में (गर्भगृह) करूणावरूणालय, भूतभावन, भोलानाथ भगवान शिव का रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्वालिन के उस बालक ने शिवलिंग को बड़े ध्यानपूर्वक देखा उसके द्वारा चढ़ाई गई सभी पूजन-सामग्री उस शिवलिंग पर सुसज्जित पड़ी हुई थी। उस शिवलिंग को तथा उसपर उसके ही द्वारा चढ़ाई पूजन-सामग्री को देखते-देखते वह बालक उठ खड़ा हुआ। उसे मन ही मन आश्चर्य तो बहुत हुआ, किन्तु वह परमान्द सागर में गोते लगाने लगा। उसके बाद तो उसने शिव जी की ढेर-सारी स्तुतियाँ कीं और बार-बार अपने मस्तक को उनके चरणों में लगाया। उसके बाद जब शाम हो गयी, तो सूर्यास्त होने पर वह बालक शिवालय से निकल कर बाहर आया और अपने निवास स्थल को देखने लगा। उसका निवास देवताओं के राजा [[इन्द्र]] के समान शोभा पा रहा था। वहाँ  सब कुछ शीघ्र ही सुवर्णमय हो गया था, जिससे वहाँ की विचित्र शोभा हो गई थी। परम उज्ज्वल वैभव से सर्वत्र प्रकाश हो रहा था। वह बालक सब प्रकार की शोभाओं से सम्पन्न उस घर के भीतर प्रविष्ट हुआ। उसने देखा कि उसकी माता एक मनोहर पलंग पर सो रही हैं। उसके अंगों में बहुमूल्य रत्नों के अलंकार शोभा पा रहे हैं। आश्चर्य और प्रेम में विह्वल उस बालक ने अपनी माता को बड़े जोर से उठाया। उसकी माता भी भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर चुकी थी। जब उस ग्वालिन ने उठकर देखा, तो उसे सब कुछ अपूर्व 'विलक्षण' सा देखने को मिला। उसके आनन्द का ठिकाना न रहा। उसने भावविभोर होकर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया। अपने बेटे के भूतेश शिव के कृपा प्रसाद का सम्पूर्ण वर्णन सुनकर उस ग्वालिन ने राजा चन्द्रसेन को सूचित किया। निरन्तर भगवान शिव के भजन-पूजन में लगे रहने वाले राजा चन्द्रसेन अपना नित्य-नियम पूरा कर रात्रि के समय पहुँचे। उन्होंने भगवान शंकर को सन्तुष्ट करने वाले ग्वालिन के पुत्र का वह प्रभाव देखा। उज्जयिनि को चारों ओर से घेर कर युद्ध के लिए खड़े उन राजाओं ने भी गुप्तचरों के मुख से प्रात:काल उस अद्भुत वृत्तान्त को सुना। इस विलक्षण घटना को सुनकर सभी नरेश आश्चर्यचकित हो उठे। उन राजाओं ने आपस में मिलकर पुन: विचार-विमर्श किया। परस्पर बातचीत में उन्होंने कहा कि राजा चन्द्रसेन महान शिव भक्त है, इसलिए इन पर विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। ये सभी प्रकार से निर्भय होकर महाकाल की नगरी उज्जयिनी का पालन-पोषण करते हैं। जब इस नगरी का एक छोटा बालक भी ऐसा शिवभक्त है, तो राजा चन्द्रसेन का महान शिवभक्त होना स्वाभाविक ही है। ऐसे राजा के साथ विरोध करने पर निशचय ही भगवान शिव क्रोधित हो जाएँगे। शिव के क्रोध करने पर तो हम सभी नष्ट ही हो जाएँगे। इसलिए हमें इस नरेश से दुश्मनी न करके मेल-मिलाप ही कर लेना चाहिए, जिससे भगवान महेश्वर की कृपा हमें भी प्राप्त होगी-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ईदृशाशिशशवो यस्य पुयर्या सन्ति शिवव्रता:।&lt;br /&gt;
स राजा चन्द्रसेनस्तु महाशंकरसेवक:।।&lt;br /&gt;
नूनमस्य विरोधेन शिव: क्रोधं करिष्यति।&lt;br /&gt;
तत्क्रोधाद्धि वयं सर्वे भविष्यामो विनष्टका:।।&lt;br /&gt;
तस्मादनेन राज्ञा वै मिलाय: कार्य एव हि।&lt;br /&gt;
एवं सति महेशान: करिष्यति कृपा पराम्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
युद्ध के लिए उज्जयिनी को घेरे उन राजाओं का मन भगवान शिव के प्रभाव से निर्मल हो गया और शुद्ध हृदय से सभी ने हथियार डाल दिये। उनके मन से राजा चन्द्रसेन के प्रति बैर भाव निकल गया और महाकालेश्वर पूजन किया। उसी समय परम तेजस्वी श्री [[हनुमान]] वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने गोप-बालक को अपने हृदय से लगाया और राजाओं की ओर देखते हुए कहा- ‘राजाओं! तुम सब लोग तथा अन्य देहधारीगण भी ध्यानपूर्वक हमारी बातें सुनें। मैं जो बात कहूँगा उससे तुम सब लोगों का कल्याण होगा। उन्होंने बताया कि ‘शरीरधारियों के लिए भगवान शिव से बढ़कर अन्य कोई गति नहीं है अर्थात महेश्वर की कृपा-प्राप्ति ही मोक्ष का सबसे उत्तम साधन है। यह परम सौभाग्य का विषय है कि इस गोप कुमार ने शिवलिंग का दर्शन किया और उससे प्रेरणा लेकर स्वयम शिव की पूजा में प्रवृत्त हुआ। यह बालक किसी भी प्रकार का लौकिक अथवा वैदिक मन्त्र नहीं जानता है, किन्तु इसने बिना मन्त्र का प्रयोग किये ही अपनी भक्ति निष्टा के द्वारा भगवान शिव की आराधना की और उन्हें प्राप्त कर लिया। यह बालक अब गोप वंश की कीर्ति को बढ़ाने वाला तथा उत्तम शिव भक्त हो गया है। &lt;br /&gt;
भगवान शिव की कृपा से यह इस लोक के सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करेगा और अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर लेगा। इसी बालक के कुल में इससे आठवीं पीढ़ी में महायशस्वी [[नन्द]] उत्पन्न होंगे और उनके यहाँ ही साक्षात नारायण का प्रादुर्भाव होगा। वे भगवान नारायण ही नन्द के पुत्र के रूप में प्रकट होकर श्री[[कृष्ण]] के नाम से जगत में विख्यात होंगे। यह गोप बालक भी जिस पर कि भगवान शिव की कृपा हुई है, ‘श्रीकर’ गोप के नाम से विशेष प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। &lt;br /&gt;
==शिव भक्त हनुमान==&lt;br /&gt;
शिव के ही प्रतिनिधि वानर राज हनुमान जी ने समस्त राजाओं सहित राजा चन्द्रसेन को अपनी कृपादृष्टि से देखा। उसके बाद अतीव प्रसन्नता के साथ उन्होंने गोप बालक श्रीकर को शिव जी की उपासना के सम्बन्ध में बताया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजा-अर्चना की जो विधि और आचार-व्यवहार भगवान शंकर को विशेष प्रिय है, उसे भी श्री हनुमान जी ने विस्तार से बताया। अपना कार्य पूरा करने के बाद वे समस्त भूपालों तथा राजा चन्द्रसेन से और गोप बालक श्रीकर से विदा लेकर वहीं पर तत्काल अर्न्तधान हो गये। राजा चन्द्रसेन की आज्ञा प्राप्त कर सभी नरेश भी अपनी राजधानियों को वापस हो गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार ‘महाकाल’ नामक यह शिवलिंग शिव भक्तो का परम आश्रय है, जिसकी पूजा से भक्त वत्सल महेश्वर शीघ्र प्रसन्न होते हैं। ये भगवान शिव दुष्टों के संहारक हैं, इसलिए इनका नाम ‘महाकाल’ है। ये काल अर्थात मृत्यु को भी जीतने वाले हैं, इसलिए इन्हे ‘महाकालेश्वर’ कहा जाता हैं। भगवान शिव भयंकर ‘हुँकार’ के साथ प्रकट हुए थे, इसलिए भी इनका नाम ‘महाकाल’ से प्रसिद्ध हुआ हैं। &lt;br /&gt;
==भव्य मन्दिर==&lt;br /&gt;
[[उज्जैन]] में स्थित महाकाल ज्योतिर्लिंग का भव्य मन्दिर पाँच मंजिल वाला है तथा [[क्षिप्रा नदी]] से कुछ दूर पर अवस्थित है।मन्दिर के ऊपरी भाग में श्री ओंकारेश्वर विद्यमान हैं। यातायात-व्यवस्था और सुरक्षा-सुविधा की दृष्टि से तीर्थयात्री दर्शनार्थियों को पंक्ति में होकर सरोवर के किनारे किनारे से ऊपर की मंजिल में जाना पड़ता है। वहाँ से संकरी गली की सीढ़ियाँ उतर कर मन्दिर के निचले सतह पर आना पड़ता है जहाँ भूतल पर महाकालेश्वर का ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यह शिवलिंग समतल भूमि से भी कुछ नीचे में है। यहाँ के रामघाट और कोटितीर्थ नामक कुण्डों में भी स्नान किया जाता है तथा पितरों का श्राद्ध भी विहित है अर्थात यहाँ पितृश्राद्ध करने का भी विधान है। इन कुण्डों के पास ही अगस्त्येश्वर, कोढ़ीश्वर, केदारेश्वर तथा हरसिद्धि देवी आदि के दर्शन करते हुए महाकालेश्वर के दर्शन हेतु जाया जाता है। &lt;br /&gt;
==पूजन==&lt;br /&gt;
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रात:काल की पूजा में अनिवार्य रूप से सवा मन चिता की भस्म सम्मिलित की जाती है। चिता की भस्म से विभूषित महाकालेश्वर का दर्शन अत्यन्त पुण्यदायी होता है। &lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचें==&lt;br /&gt;
यहाँ मध्य रेलवे की [[भोपाल]] - [[उज्जैन]] और [[आगरा]] - उज्जैन रेलवे लाइनें हैं तथा पश्चिमी रेलवे की [[नागदा]] - उज्जैन तथा [[फतेहाबाद]] - उजैन रेलमार्ग की व्यवस्था हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>महाकालेश्वर</title>
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		<updated>2010-04-29T13:45:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
'''श्री महाकालेश्वर / Shri Mahakaleshwar'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] जनपद में अवस्थित है। उज्जैन का [[पुराण|पुराणों]] और प्राचीन अन्य ग्रन्थों में 'उज्जयिनी' तथा 'अवन्तिकापुरी' के नाम से उल्लेख किया गया है। यह स्थान [[मालवा]] क्षेत्र में स्थित [[क्षिप्रा नदी]] के किनारे विद्यमान है। अवन्तीपुरी की गणना सात मोक्षदायिनी पुरियों में की गई है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवन्तिका।&lt;br /&gt;
पुरी  द्वारावती  चैव  सप्तैता  मोक्षदायिकाः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==महाराजा विक्रमादित्य द्वारा निर्माण==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
इसी महाकालेश्वर की नगरी में महाराजा [[विक्रमादित्य]] ने चौबीस खम्बों का दरबार-मण्डप बनवाया था। मंगल ग्रह का जन्मस्थान मंगलश्वेर भी यहीं स्थित है। इतिहास प्रसिद्ध [[भर्तृहरि की गुफा]] तथा [[महर्षि सान्दीपनि]] का आश्रम यहीं विराजमान है। श्री [[कृष्ण|कृष्णचन्द्र]] और [[बलराम]] जी ने इसी सान्दीपनि आश्रम में विद्या का अध्ययन किया था। इसी उज्जयिनी  नगरी में परम प्रतापी महाराज वीर विक्रमादित्य की राजधानी थी। जब सिंह राशि पर बृहस्पति ग्रह का आगमन होता है, तो यहाँ प्रत्येक बारह वर्ष पर [[कुम्भ|महाकुम्भ]] का स्नान और मेला लगता है। &lt;br /&gt;
==शिव महापुराण में वर्णित कथा== &lt;br /&gt;
समस्त देहधारियों की मोक्ष प्रदान करने वाली एक प्रसिद्ध और अत्यन्त अवन्ति नाम की नगरी है। लोक पावनी परम पुण्यदायिनी और कल्याण-कारिणी वह नगरी भगवान शिव जी को अत्यन्त प्रिय है। उसी पवित्र पुरी में शुभ कर्मपरायण तथा सदा [[वेद|वेदों]] के स्वाध्याय में लगे रहने वाले एक उत्तम ब्राह्मण रहा करते थे। वे अपने घर में [[अग्नि]] की स्थापना कर प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे और वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे रहते थे। भगवान शंकर के भक्त वे ब्राह्मण शिव जी की अर्चना-वन्दना में तत्पर रहा करते थे। वे प्रातिदिन पार्थिव लिंग का निर्माण कर शास्त्र विधि से उसकी पूजा करते थे। हमेशा उत्तम ज्ञान को प्राप्त करने में तत्पर उस ब्राह्मण देवता का नाम ‘वेदप्रिय’ था। वेदप्रिय स्वयं ही शिव जी के अनन्य भक्त थे, जिसके संस्कार के फलस्वरूप उनके शिव पूजा-परायण ही चार पुत्र हुए। वे तेजस्वी तथा माता-पिता के सद्गगुणों के अनुरूप थे। उन चारों पुत्रों के देवप्रिय, प्रियमेधा, संस्कृत और सुवृत थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन दोनों रत्नमाल पर्वत पर ‘दूषण’ नाम वाले धर्म विरोधी एक असुर ने वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण कर दिया। उस असुर को [[ब्रह्मा]]जी से अजेयता का वर मिला थां। सबको सताने के बाद अन्त में उस असुर ने भारी सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन) के उन पवित्र और कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों पर भी चढ़ाई कर दी। उस असुर की आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलयकाल की आग के समान प्रकट हो गये। उनके भंयकर उपद्रव से भी शिव जी मंद विश्वास करने वाले वे ब्राह्मणबन्धु भयभीत नहीं हुए। अवन्ति नगर के निवासी सभी ब्राह्मण जब उस संकट में घबराने लगे, तब उन चारों शिवभक्त भाइयों ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ‘आप लोग भक्तों के हितकारी भगवान [[शिव]] पर भरोसा रखें।’ उसके बाद वे चारों ब्राह्मण-बन्धु शिव जी का पूजन कर उनके ही ध्यान में तल्लीन हो गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेना सहित दूषण ध्यान मग्न उन ब्राह्मणो के पास पहूँच गया। उन ब्राह्मणों को देखते ही ललकारते हुए बोल उठा कि इन्हें बाँधकर मार डालो। वेदप्रिय के उन ब्राह्मण पुत्रों ने उस दैत्य के द्वारा कही गई बातों पर कान नहीं दिया और भगवान शिव के ध्यान में मग्न रहे। जब उस दुष्ट दैत्य ने यह समझ लिया कि हमारे डाँट-डपट से कुछ भी परिणाम निकलने वाला नहीं है, तब उसने ब्राह्मणों को मार डालने का निश्चय किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने ज्योंहि उन शिव भक्तों के प्राण लेने हेतु शस्त्र उठाया, त्योंहि उनके द्वारा पूजित उस पार्थिव लिंग की जगह गम्भीर आवाल के साथ एक गडढा प्रकट हो गया और तत्काल उस गड्ढे से विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हो गये। दुष्टों का विनाश करने वाले तथा सज्जन पुरूषों के कल्याणकर्त्ता वे भगवान शिव ही महाकाल के रूप में इस [[पृथ्वी] पर विख्यात हुए। उन्होंने दैत्यों से कहा- ‘अरे दुष्टों! तुझ जैसे हत्यारों के लिए ही मैं ‘महाकाल’ प्रकट हुआ हूँ। जल्दी इन ब्राह्मणों के समीप से दूर भाग जाओं’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार धमकाते हुए महाकाल भगवान शिव ने अपने हुँकार मात्र से ही उन दैत्यों को भस्म कर डाला। दूषण की कुछ सेना को भी उन्होंने मार गिराया और कुछ स्वयं ही भाग खड़ी हुई। इस प्रकार परमात्मा शिव ने दूषण नामक दैत्य का वध कर दिया। जिस प्रकार सूर्य क निकलते ही अन्धकार छँट जाता है, उसी प्रकार भगवान् आशुतोष शिव को देखते ही सभी दैत्य सैनिक पलायन कर गये। देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी दन्दुभियाँ बजायीं और आकाश से फूलों की वर्षा की। उन शिवभक्त ब्राह्मणो पर अति प्रसन्न् भगवान् शंकर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि ‘मै महाकाल महेश्वर तुम लोगों पर प्रसन्न हूँ, तुम लोग वर मांगो।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाकालेश्वर की वाणी सुनकर भक्ति भाव से पूर्ण उन ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहा- 'दुष्टों को दण्ड देने वाले महाकाल! शम्भो! आप हम सबको इस संसार-सागर से मुक्त कर दें। हे भगवान शिव! आप आम जनता के कल्याण तथा उनकी रक्षा करने के  लिए यहीं हमेशा के लिए विराजिए। प्रभो! आप अपने दर्शनार्थी मनुष्यों का सदा उद्धार करते रहें।’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान शंकर ने उन ब्राह्माणों को सद्गगति प्रदान की और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उस गड्ढे में स्थित हो गये। उस गड्ढे के चारों ओर की लगभग तीन-तीन किलोमीटर भूमि लिंग रूपी भगवान शिव की स्थली बन गई। ऐसे भगवान शिव इस पृथ्वी पर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने से स्वप्न में भी किसी प्रकार का दुःख अथवा संकट नहीं आता है। जो कोई भी मनुष्य सच्चे मन से महाकालेश्वर लिंग की उपसना करता है, उसकी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और वह परलोक में मोक्षपद को प्राप्त करता है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
महाकालेश्वरो  नाम   शिवः  ख्यातश्च   भूतले।&lt;br /&gt;
तं दुष्ट्वा न भवेत् स्वप्ने किंचिददुःखमपि द्विजाः।।&lt;br /&gt;
यं  यं  काममपेदयैव  तल्लिगं  भजते  तु  यः ।&lt;br /&gt;
तं  तं  काममवाप्नेति   लभेन्मोक्षं   परत्र   च&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिवमहापुराण कोटिरूद्रसहिंता 16/50-51&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य कथानक==&lt;br /&gt;
उज्जयिनी नगरी में महान शिवभक्त तथा जितेन्द्रिय चन्द्रसेन नामक एक राजा थे। उन्होंने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन कर उनके रहस्यों का ज्ञान प्राप्त किया था। उनके सदाचरण से प्रभावित होकर शिवजी के पार्षदों (गणों) में अग्रणी (मुख्य) मणिभद्र जी राजा  चन्द्रसेन के मित्र बन गये। मणिभद्र जी ने एक बार राजा पर अतिशय प्रसन्न होकर राजा चन्द्रसेन को चिन्तामणि नामक एक महामणि प्रदान की। वह महामणि कौस्तुभ मणि और [[सूर्य देवता|सूर्य]] के समान देदीप्यमान (चमकदार) थी। वह महा मणि देखने, सुनने तथा ध्यान करने पर भी, वह मनुष्यों को निश्चित ही मंगल प्रदान करती थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा चनद्रसेन के गले में अमूल्य चिन्तामणि शोभा पर रही है, यह जानकार सभी राजाओं में उस मणि के प्रति लोभ बढ़ गया। चिन्तामणि के लोभ से सभी राजा क्षुभित होने लगे। उन राजाओं ने अपनी चतुरंगिणी सेना तैयार की और उस चिन्तामणि के लोभ में वहाँ आ धमके। चन्द्रसेन के विरूद्ध वे सभी राजा एक साथ मिलकर एकत्रित हुए थे और उनके साथ भारी सैन्यबल भी था। उन सभी राजाओं ने आपस में परामर्श करके रणनीति तैयार की और राजा चन्द्रसेन पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों सहित उन राजाओं ने चारों ओर से उज्जयिनी के चारों द्वारों को घेर लिया। अपनी पुरी को चारों ओर से सैनिकों द्वारा घिरी हुई देखकर राजा चन्द्रसेन महाकालेश्वर भगवान शिव की शरण में पहुँच गये। वे निश्छल मन से दृढ़ निश्चय के सथ उपवास-व्रत लेकर भगवान महाकाल की आराधना में जुट गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन दिनों उज्जयिनी में एक विधवा ग्वालिन रहती थी,  जिसको इकलौता पुत्र था। वह इस नगरी में बहुत दिनों से रहती थी। वह अपने उस पाँच वर्ष के बालक को लेकर महाकालेश्वर का दर्शन करने हेतु गई। उसने देखा कि राजा चन्द्रसेन वहाँ बड़ी श्रद्धाभक्ति से महाकाल की पूजा कर रहे हैं। राजा के शिव पूजन का महोत्सव उसे बहुत ही आश्चर्यमय लगा। उसने पूजन को निहारते हुए भक्ति भावपूर्वक महाकाल को प्रणाम किया और अपने निवास स्थान पर लौट गयी। उस ग्वालिन माता के साथ उसके बालक ने भी महाकाल की पूजा का कौतूहलपूर्वक अवलोकन किया था। इसलिए घर वापस आकर उसने भी शिव जी का पूजन करने का विचार किया। वह एक सुन्दर-सा पत्थर ढूँढ़कर लाया और अपने निवास से कुछ ही दूरी पर किसी अन्य के निवास के पास एकान्त में रख दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने अपने मन में निश्चय करके उस पत्थर को ही शिवलिंग मान लिया। वह शुद्ध मन से भक्ति भावपूर्वक मानसिक रूप से गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य और अलंकार आदि जुटाकर, उनसे उस शिवलिंग की पूजा की। वह सुन्दर-सुन्दर पत्तों तथा फूलों को बार-बार  पूजन के बाद उस बालक ने बार-बार भगवान के चरणों में मस्तक लगाया। बालक का चित्त भगवान के चरणों में आसक्त था और वह विह्वल होकर उनको दण्डवत कर रहा था। उसी समय ग्वालिन ने भोजन के लिए अपने पुत्र को प्रेम से बुलाया। उधर उस बालक का मन शिव जी की पूजा में रमा हुआ था, जिसके कारण वह बाहर से बेसुध था। माता द्वारा बार-बार बुलाने पर भी बालक को भोजन करने की इच्छा नहीं हुई और वह भोजन करने नहीं गया तब उसकी माँ स्वयं उठकर वहाँ आ गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माँ ने देखा कि उसका बालक एक पत्थर के सामने आँखें बन्द करके बैठा है। वह उसका हाथ पकड़कर बार-बार खींचने लगी पर इस पर भी वह बालक वहाँ से नहीं उठा, जिससे उसकी माँ को क्रोध आया और उसने उसे खूब पीटा। इस प्रकार खींचने और मारने-पीटने पर भी जब वह बालक वहाँ से नहीं हटा, तो माँ ने उस पत्थर को उठाकर दूर फेंक दिया। बालक द्वारा उस शिवलिंग पर चढ़ाई गई सामग्री को भी उसने नष्ट कर दिया। शिव जी का अनादर देखकर बालक ‘हाय-हाय’ करके रो पड़ा। क्रोध में आगबबूला हुई वह ग्वालिन अपने बेटे को डाँट-फटकार कर पुनः अपने घर में चली गई। जब उस बालक ने देखा कि भगवान शिव जी की पूजा को उसकी माता ने नष्ट कर दिया, तब वह बिलख-बिलख कर रोने लगा। देव! देव! महादेव! ऐसा पुकरता हुआ वह सहसा बेहोश होकर [[पृथ्वी]] पर गिर पड़ा। उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। कुछ देर बाद जब उसे चेतना आयी, तो उसने अपनी बन्द आँखें खोल दीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस बालक ने आँखें खोलने के बाद जो दृश्य देखा, उससे वह आश्चर्य मे पड़ गया। भगवान शिव की कृपा से उस स्थान पर महाकाल का दिव्य मन्दिर खड़ा हो गया था। मणियों के चमकीले खम्बे उस मन्दिर की शोभा बढा रहे थे। वहाँ के भूतल पर स्फटिक मणि जड़ दी गयी थी। तपाये गये दमकते हुए स्वर्ण-शिखर उस शिवालय को सुशोभित कर रहे थे। उस मन्दिर के विशाल द्वार, मुख्य द्वार तथा उनके कपाट सुवर्ण निर्मित थे। उस मन्दिर के सामने नीलमणि तथा हीरे जड़े बहुत से चबूतरे बने थे। उस भव्य शिवालय के भीतर मध्य भाग में (गर्भगृह) करूणावरूणालय, भूतभावन, भोलानाथ भगवान शिव का रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्वालिन के उस बालक ने शिवलिंग को बड़े ध्यानपूर्वक देखा उसके द्वारा चढ़ाई गई सभी पूजन-सामग्री उस शिवलिंग पर सुसज्जित पड़ी हुई थी। उस शिवलिंग को तथा उसपर उसके ही द्वारा चढ़ाई पूजन-सामग्री को देखते-देखते वह बालक उठ खड़ा हुआ। उसे मन ही मन आश्चर्य तो बहुत हुआ, किन्तु वह परमान्द सागर में गोते लगाने लगा। उसके बाद तो उसने शिव जी की ढेर-सारी स्तुतियाँ कीं और बार-बार अपने मस्तक को उनके चरणों में लगाया। उसके बाद जब शाम हो गयी, तो सूर्यास्त होने पर वह बालक शिवालय से निकल कर बाहर आया और अपने निवास स्थल को देखने लगा। उसका निवास देवताओं के राजा [[इन्द्र]] के समान शोभा पा रहा था। वहाँ  सब कुछ शीघ्र ही सुवर्णमय हो गया था, जिससे वहाँ की विचित्र शोभा हो गई थी। परम उज्ज्वल वैभव से सर्वत्र प्रकाश हो रहा था। वह बालक सब प्रकार की शोभाओं से सम्पन्न उस घर के भीतर प्रविष्ट हुआ। उसने देखा कि उसकी माता एक मनोहर पलंग पर सो रही हैं। उसके अंगों में बहुमूल्य रत्नों के अलंकार शोभा पा रहे हैं। आश्चर्य और प्रेम में विह्वल उस बालक ने अपनी माता को बड़े जोर से उठाया। उसकी माता भी भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर चुकी थी। जब उस ग्वालिन ने उठकर देखा, तो उसे सब कुछ अपूर्व 'विलक्षण' सा देखने को मिला। उसके आनन्द का ठिकाना न रहा। उसने भावविभोर होकर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया। अपने बेटे के भूतेश शिव के कृपा प्रसाद का सम्पूर्ण वर्णन सुनकर उस ग्वालिन ने राजा चन्द्रसेन को सूचित किया। निरन्तर भगवान शिव के भजन-पूजन में लगे रहने वाले राजा चन्द्रसेन अपना नित्य-नियम पूरा कर रात्रि के समय पहुँचे। उन्होंने भगवान शंकर को सन्तुष्ट करने वाले ग्वालिन के पुत्र का वह प्रभाव देखा। उज्जयिनि को चारों ओर से घेर कर युद्ध के लिए खड़े उन राजाओं ने भी गुप्तचरों के मुख से प्रात:काल उस अद्भुत वृत्तान्त को सुना। इस विलक्षण घटना को सुनकर सभी नरेश आश्चर्यचकित हो उठे। उन राजाओं ने आपस में मिलकर पुन: विचार-विमर्श किया। परस्पर बातचीत में उन्होंने कहा कि राजा चन्द्रसेन महान शिव भक्त है, इसलिए इन पर विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। ये सभी प्रकार से निर्भय होकर महाकाल की नगरी उज्जयिनी का पालन-पोषण करते हैं। जब इस नगरी का एक छोटा बालक भी ऐसा शिवभक्त है, तो राजा चन्द्रसेन का महान शिवभक्त होना स्वाभाविक ही है। ऐसे राजा के साथ विरोध करने पर निशचय ही भगवान शिव क्रोधित हो जाएँगे। शिव के क्रोध करने पर तो हम सभी नष्ट ही हो जाएँगे। इसलिए हमें इस नरेश से दुश्मनी न करके मेल-मिलाप ही कर लेना चाहिए, जिससे भगवान महेश्वर की कृपा हमें भी प्राप्त होगी-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ईदृशाशिशशवो यस्य पुयर्या सन्ति शिवव्रता:।&lt;br /&gt;
स राजा चन्द्रसेनस्तु महाशंकरसेवक:।।&lt;br /&gt;
नूनमस्य विरोधेन शिव: क्रोधं करिष्यति।&lt;br /&gt;
तत्क्रोधाद्धि वयं सर्वे भविष्यामो विनष्टका:।।&lt;br /&gt;
तस्मादनेन राज्ञा वै मिलाय: कार्य एव हि।&lt;br /&gt;
एवं सति महेशान: करिष्यति कृपा पराम्।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
युद्ध के लिए उज्जयिनी को घेरे उन राजाओं का मन भगवान शिव के प्रभाव से निर्मल हो गया और शुद्ध हृदय से सभी ने हथियार डाल दिये। उनके मन से राजा चन्द्रसेन के प्रति बैर भाव निकल गया और महाकालेश्वर पूजन किया। उसी समय परम तेजस्वी श्री [[हनुमान]] वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने गोप-बालक को अपने हृदय से लगाया और राजाओं की ओर देखते हुए कहा- ‘राजाओं! तुम सब लोग तथा अन्य देहधारीगण भी ध्यानपूर्वक हमारी बातें सुनें। मैं जो बात कहूँगा उससे तुम सब लोगों का कल्याण होगा। उन्होंने बताया कि ‘शरीरधारियों के लिए भगवान शिव से बढ़कर अन्य कोई गति नहीं है अर्थात महेश्वर की कृपा-प्राप्ति ही मोक्ष का सबसे उत्तम साधन है। यह परम सौभाग्य का विषय है कि इस गोप कुमार ने शिवलिंग का दर्शन किया और उससे प्रेरणा लेकर स्वयम शिव की पूजा में प्रवृत्त हुआ। यह बालक किसी भी प्रकार का लौकिक अथवा वैदिक मन्त्र नहीं जानता है, किन्तु इसने बिना मन्त्र का प्रयोग किये ही अपनी भक्ति निष्टा के द्वारा भगवान शिव की आराधना की और उन्हें प्राप्त कर लिया। यह बालक अब गोप वंश की कीर्ति को बढ़ाने वाला तथा उत्तम शिव भक्त हो गया है। &lt;br /&gt;
भगवान शिव की कृपा से यह इस लोक के सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करेगा और अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर लेगा। इसी बालक के कुल में इससे आठवीं पीढ़ी में महायशस्वी [[नन्द]] उत्पन्न होंगे और उनके यहाँ ही साक्षात नारायण का प्रादुर्भाव होगा। वे भगवान नारायण ही नन्द के पुत्र के रूप में प्रकट होकर श्री[[कृष्ण]] के नाम से जगत में विख्यात होंगे। यह गोप बालक भी जिस पर कि भगवान शिव की कृपा हुई है, ‘श्रीकर’ गोप के नाम से विशेष प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। &lt;br /&gt;
==शिव भक्त हनुमान==&lt;br /&gt;
शिव के ही प्रतिनिधि वानर राज हनुमान जी ने समस्त राजाओं सहित राजा चन्द्रसेन को अपनी कृपादृष्टि से देखा। उसके बाद अतीव प्रसन्नता के साथ उन्होंने गोप बालक श्रीकर को शिव जी की उपासना के सम्बन्ध में बताया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजा-अर्चना की जो विधि और आचार-व्यवहार भगवान शंकर को विशेष प्रिय है, उसे भी श्री हनुमान जी ने विस्तार से बताया। अपना कार्य पूरा करने के बाद वे समस्त भूपालों तथा राजा चन्द्रसेन से और गोप बालक श्रीकर से विदा लेकर वहीं पर तत्काल अर्न्तधान हो गये। राजा चन्द्रसेन की आज्ञा प्राप्त कर सभी नरेश भी अपनी राजधानियों को वापस हो गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार ‘महाकाल’ नामक यह शिवलिंग शिव भक्तो का परम आश्रय है, जिसकी पूजा से भक्त वत्सल महेश्वर शीघ्र प्रसन्न होते हैं। ये भगवान शिव दुष्टों के संहारक हैं, इसलिए इनका नाम ‘महाकाल’ है। ये काल अर्थात मृत्यु को भी जीतने वाले हैं, इसलिए इन्हे ‘महाकालेश्वर’ कहा जाता हैं। भगवान शिव भयंकर ‘हुँकार’ के साथ प्रकट हुए थे, इसलिए भी इनका नाम ‘महाकाल’ से प्रसिद्ध हुआ हैं। &lt;br /&gt;
==भव्य मन्दिर==&lt;br /&gt;
[[उज्जैन]] में स्थित महाकाल ज्योतिर्लिंग का भव्य मन्दिर पाँच मंजिल वाला है तथा [[क्षिप्रा नदी]] से कुछ दूर पर अवस्थित है।मन्दिर के ऊपरी भाग में श्री ओंकारेश्वर विद्यमान हैं। यातायात-व्यवस्था और सुरक्षा-सुविधा की दृष्टि से तीर्थयात्री दर्शनार्थियों को पंक्ति में होकर सरोवर के किनारे किनारे से ऊपर की मंजिल में जाना पड़ता है। वहाँ से संकरी गली की सीढ़ियाँ उतर कर मन्दिर के निचले सतह पर आना पड़ता है जहाँ भूतल पर महाकालेश्वर का ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यह शिवलिंग समतल भूमि से भी कुछ नीचे में है। यहाँ के रामघाट और कोटितीर्थ नामक कुण्डों में भी स्नान किया जाता है तथा पितरों का श्राद्ध भी विहित है अर्थात यहाँ पितृश्राद्ध करने का भी विधान है। इन कुण्डों के पास ही अगस्त्येश्वर, कोढ़ीश्वर, केदारेश्वर तथा हरसिद्धि देवी आदि के दर्शन करते हुए महाकालेश्वर के दर्शन हेतु जाया जाता है। &lt;br /&gt;
==पूजन==&lt;br /&gt;
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रात:काल की पूजा में अनिवार्य रूप से सवा मन चिता की भस्म सम्मिलित की जाती है। चिता की भस्म से विभूषित महाकालेश्वर का दर्शन अत्यन्त पुण्यदायी होता है। &lt;br /&gt;
==कैसे पहुँचें==&lt;br /&gt;
यहाँ मध्य रेलवे की [[भोपाल]] - [[उज्जैन]] और [[आगरा]] - उज्जैन रेलवे लाइनें हैं तथा पश्चिमी रेलवे की [[नागदा]] - उज्जैन तथा [[फतेहाबाद]] - उजैन रेलमार्ग की व्यवस्था हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश_के_धार्मिक_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
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		<updated>2010-04-29T13:37:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।&lt;br /&gt;
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। &lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक_स्थल_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>द्वादश ज्योतिर्लिंग</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B6_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&amp;diff=17409"/>
		<updated>2010-04-29T13:36:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Somjyotir.jpg|thumb|सोमनाथ ज्योतिर्लिंग&amp;lt;br /&amp;gt; Somnath Jyotirlinga]]&lt;br /&gt;
'''द्वाद्वश ज्योतिर्लिंग'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[शिव पुराण]] के कोटिरूद्र सहिंता&amp;lt;balloon title=&amp;quot;शिव पुराण, कोटिरूद्र सहिंता,1-21-24&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; में वर्णित कथानक के अनुसार भगवान [[शिव|शिवशंकर]] प्राणियों के कल्याण हेतु जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं तथा लिंग के रूप में वहाँ निवास भी करते हैं कुछ विशेष स्थानों पर शिव के उपासकों ने महती निष्ठा के साथा तन्मय होकर भूतभावन की आराधना की थी। उनके भक्तिभाव के प्रेम से आकर्षित भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया तथा उनके मन की अभिलाषा को भी पूर्ण किया था। उन स्थानों में आविर्भूत (प्रकट) दयालु शिव अपने भक्तो के अनुरोध पर अपने अंशों से सदा के लिए वहीं अवस्थित हो गये। लिंग के रूप में साक्षात भगवान शिव जिन-जिन स्थानों में विराजमान हुए, वे सभी तीर्थ के रूप में महत्व को प्राप्त हुए।&lt;br /&gt;
==शिव द्वारा शिवलिंग रूप धारण==&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण तीर्थ ही लिंगमय है तथा सब कुछ लिंग में समाहित है। वैसे तो शिवलिंगों की गणना अत्यन्त कठिन है। जो भी दृश्य दिखाई पड़ता है अथवा हम जिस किसी भी दृश्य  का स्मरण करते हैं, वह सब भगवान शिव का ही रूप है, उससे पृथक कोई वस्तु नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत पर अनुग्रह करने के लिए ही भगवान शिव ने देवता, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा मनुष्यों सहित तीनों लोकों को लिंग के रूप में व्याप्त कर रखा है। सम्पूर्ण लोकों पर कृपा करने की दृष्टि से ही वे भगवान महेश्वर तीर्थ में तथा विभिन्न जगहों में भी अनेक प्रकार के लिंग धारण करते हैं। जहाँ-जहाँ जब भी उनके भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उनका स्मरण या चिन्तन किया, वहीं वे अवतरित हो गये अर्थात प्रकट होकर वहीं स्थित (विराजमान) हो गये। जगत का कल्याण करने हेतु भगवान शिव ने स्वयम अपने स्वरूप क अनुकूल लिंग की परिकल्पना की और उसी में वे प्रतिष्टित हो गये। ऐसे लिंगों की पूजा करके शिवभक्त सब प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। भूमण्डल के लिंगों की गणना तो नहीं की जा सकती, किन्तु उनमे कुछ प्रमुख शिवलिंग हैं।&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
शिव पुराण के अनुसार प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं, जिनमें नाम श्रवण मात्र से मनुष्य का किया हुआ पाप दूर भाग जाता है। &lt;br /&gt;
#प्रथम ज्योतिर्लिंग [[सौराष्ट्र]] में अवस्थित '[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]]' का है। यह स्थान [[काठियावाड़]] के प्रभास क्षेत्र में हैं। &lt;br /&gt;
#श्रीशैल पर विराजमान दूसरा ज्योतिर्लिंग '[[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]]' है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] प्रदेश के [[कृष्णा]] ज़िले में पड़ता है। यहाँ [[कृष्णा नदी]] के किनारे श्रीशैल या श्रीपर्वत पर मल्लिकार्जुन नामक ज्योतिर्लिंग अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#तृतीय ज्योतिर्लिंग महाकाल या '[[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]]' के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान [[मध्य प्रदेश]] के [[उज्जैन]] नाम का नगर है, जिसे प्राचीन साहित्य में अवन्तिका पुरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान महाकालेश्वर का भव्य ज्योतिर्लिंग का मन्दिर विद्यमान है। [[चित्र:Mahakaleshwar-Temple.jpg|thumb|महाकालेश्वर मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Mahakaleshwar Temple|left]]&lt;br /&gt;
#चतुर्थ ज्योतिर्लिंग का नाम '[[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारश्वर]]' या परमेश्रवर है। यह स्थान भी मध्य प्रदेश के [[मालवा]] क्षेत्र में ही पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर [[नर्मदा नदी]] के तट पर अवस्थित है। यहाँ ओकारेश्वर और अमलेश्वर नाम से दो लिंग स्थापित हैं, किन्तु इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का पृथक-पृथक स्वरूप माना जाता है।&lt;br /&gt;
#पाँचवाँ ज्योतिर्लिंग [[हिमालय]] की चोटी पर विराजमान श्री '[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]]' जी का है। श्री केदारनाथ को केदारेश्वर भी कहा जाता है, जो केदार नामक शिखर पर विराजमान हैं। इस शिखर से पूरब दिशा में [[अलकनन्दा नदी]] के किनारे भगवान श्री बदरीविशाल का मन्दिर है और उससे पश्चिम की ओर [[मन्दाकिनी नदी]] के किनारे केदारनाथ विराजमान हैं। यह केदार घाटी [[उत्तराखंड]] प्रदेश के [[उत्तरकाशी]] जनपद में पड़ता है। &lt;br /&gt;
#षष्ठ ज्योतिर्लिंग का नाम ‘[[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]]’ है, जो डाकिनी पर अवस्थित है। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] में [[मुम्बई]] से पूरब तथा [[पूना]] से उत्तर की ओर स्थित है, जो [[भीमा नदी]] के किनारे [[सहयात्र पर्वत]] पर हैं भीमा नदी भी इसी पर्वत से निकलती है। यह ज्योतिर्लिंग सहयात्र पर्वत की जिस चोटी पर है, उसका नाम डाकिनी है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में कुछ वैमत्य भी है। शिव पुराण में वर्णित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का स्थान [[असम]] प्रदेश के कामरूप जिले के [[गुवाहाटी]] के समीप ब्रह्मपुर पहाड़ी पर प्रतीत होता है, जब कि कुछ लोग उत्तराखण्ड के [[नैनीताल]] ज़िले में उज्जनक नामक स्थान पर स्थित विशाल शिवमन्दिर को भीमशंकर बताते है।&lt;br /&gt;
#[[काशी]] में विराजमान भूतभावन भगवान श्री '[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ]]' को सप्तम ज्योतिर्लिंग कहा गया है। &lt;br /&gt;
#अष्टम ज्योतिर्लिंग को ‘[[त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग|त्र्यम्बक]]’ के नाम से भी जाना जाता है, इंन्हें [[नासिक]] ज़िले में [[पंचवटी]] से लगभग अठारह मील की दूरी पर है। यह मन्दिर ब्रह्मगिरि के पास [[गोदावरी नदी]] कें किनारे अवस्थित हैं। &lt;br /&gt;
#नवम ज्योतिर्लिंग '[[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]]' हैं। यह स्थान [[झारखण्ड]] प्रान्त के [[संथाल]] परगना में जसीडीह रेलवे स्टेशन के समीप में है। [[पुराण|पुराणों]] में इस जगह को चिताभूमि कहा गया है। पाठान्तर के आग्रह से इस लिंग को कुछ लोग दक्षिण में बताते हैं, जो [[हैदराबाद]] से परभनी जंक्शन की ओर ‘परली’ एक छोटा स्टेशन है, वहाँ से कुछ ही दूर पर परली गाँव के समीप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हैं। &lt;br /&gt;
#'[[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]]' नामक ज्योतिर्लिंग दशम है, जो [[गुजरात]] के [[बडौदा]] क्षेत्र में गोमती [[द्वारका]] के समीप है। इस स्थान को दारूकावन भी कहा जाता है। कुछ लोग दक्षिण हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिंग का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते हैं, तो कोई-कोई उत्तराखण्ड के [[अल्मोड़ा]] जिले में स्थित जागेश्वर शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग कहते हैं। [[चित्र:Kedarnath-Temple.jpg|thumb|केदारनाथ मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt;Kedarnath Temple]]&lt;br /&gt;
#एकादशवें ज्योतिर्लिंग श्री '[[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]]' हैं। रामेश्वरतीर्थ को ही सेतुबन्ध तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान [[तमिलनाडु]] के रामनाथम जनपद में स्थित है। यहाँ समुद्र के किनारे भगवान श्री रामेश्वरम का विशाल मन्दिर शोभित है। &lt;br /&gt;
#द्वादशवें ज्योतिर्लिंग का '[[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]' है। इन्हें कोई घृष्णेश्वर और घुसृणेश्वर भी कहते हैं। यह स्थान [[महाराष्ट्र]] क्षेत्र के अन्तर्गत [[दौलताबाद]] से लगभग अठारह किलोमीटर दूर ‘बेरूलठ गाँव के पास है। इस स्थान को ‘शिवालय’ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों के सम्बन्ध में [[शिव पुराण]] की कोटि 'रूद्रसंहिता' में निम्नलिखित श्लोक दिया गया है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।&lt;br /&gt;
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।&lt;br /&gt;
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वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।&lt;br /&gt;
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।&lt;br /&gt;
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।&lt;br /&gt;
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।&lt;br /&gt;
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।&lt;br /&gt;
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।&lt;br /&gt;
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जो भी मनुष्य प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों से सम्बन्धित श्लोकों का पाठ करता है अर्थात उपर्युक्त श्लोकों को पढ़ता हुआ शिवलिंगों का ध्यान करता है, उसके सात जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य नित्य इन नामों का पाठ करता है, शीघ्र ही उस फल की प्राप्ति हो जाती है। इन  लिंगो के दर्शन मात्र से सभी पापों का क्षय हो जाता है, यही प्रसन्न भगवान [[शंकर]] की विशेषता है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग में प्रकट होने के बाद [[ब्रह्मा]]जी और भगवान [[विष्णु]] ने उनकी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इन देवताओं से कहा देववरों! मैं आप लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। आप दोनों ही मेरी इच्छा के अनुरूप प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। मैने अपने निर्गुण स्वरूप को तीन रूपों में बाँटकर  अलग-अलग गुणों से युक्त कर दिय है। मेरे दाहिने भाग में लोक पितामह ब्रह्मा, बायें भाग में विष्णु तथा ह्दयप्रदेश में परमात्मा अवस्थित है। यद्यपि मै निर्गुण हूँ, फिर भी गुणों के संयोग से मेरा बन्धन नहीं होता है। [[चित्र:Ramanathar-Temple.jpg|thumb|रामेश्वरम मन्दिर&amp;lt;br /&amp;gt; Rameswaram Temple|left]]&lt;br /&gt;
*इस लोक के सारे दृश्य पदार्थ मेरे ही स्वरूप है। मैं आप दोनों तथा उत्पन्न होने वाले 'रूद्र' नामक व्यक्ति सब एक ही रूप हैं । हम लोगों के अन्दर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, क्योंकि भेद ही बन्धन का कारक बनता है। उसके बाद प्रसन्न शिव ने विष्णु से कहा- ‘हे सनातन विष्णो! आप जीवों की मुक्ति प्रदान करने का दायित्व सम्हालिए। मेरे दर्शन करने से जो भी फल प्राप्त होता है, वही फल आपके दर्शन करने से भी मिलेगा। मेरे ह्वदय़ में निवास करते हैं और मैं आपके ह्वदय में निवास करता हूँ। इस प्रकार का भाव जो भी मनुष्य अपने ह्वदय में रखता है और मेरे तथा आप मैं कोई भेद नहीं देखता है, ऐसा मनुष्य मुझे अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार रहस्यमय उपदेश देने के बाद भगवान शिव अन्तर्धान हो गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:धर्म]]&lt;br /&gt;
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		<title>चित्र:Ramanathar-Temple.jpg</title>
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&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>आगरा</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[District::आगरा]] / Agra&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tajmahal.jpg|ताजमहल, आगरा&amp;lt;br /&amp;gt; Tajmahal, Agra|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
आगरा [[उत्तर प्रदेश]] प्रान्त का एक ज़िला शहर व तहसील है। आगरा 27.18° उत्तर 78.02° पूर्व में [[यमुना नदी|यमुना]] नदी के तट पर स्थित है। समुद्र-तल से इसकी औसत ऊँचाई क़रीब 171 मीटर (561 फ़ीट) है। यह उत्तर में [[मथुरा]], दक्षिण में [[धौलपुर]], पूर्व में फ़िरोज़ाबाद, शिकोहाबाद, दक्षिणपूर्व में फ़तेहाबाद और पश्चिम में [[भरतपुर]] से घिरा हुआ है। आगरा उत्तर प्रदेश का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। [[ताजमहल]] आगरा की पहचान है और यह यमुना नदी के किनारे बसा है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अग्रबाण या अग्रवन==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
आगरा एक ऐतिहासिक नगर है, जिसका प्रमाण यह अपने चारों ओर समेटे हुए है। इतिहास मे पहला ज़िक्र आगरा का [[महाभारत]] के समय से माना जाता है, जब इसे अग्रबाण या अग्रवन के नाम से संबोधित किया जाता था। कहते हैं कि पहले यह नगर आर्य ग्रह के नाम से भी जाना जाता था। [[टॉल्मी|तौलमी]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;Ptolmi 2nd century A.D.&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; पहला ज्ञात व्यक्ति था जिसने इसे आगरा नाम से संबोधित किया।&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक तथ्य==&lt;br /&gt;
मुग़लकाल के इस प्रसिद्ध नगर की नींव [[दिल्ली]] के सुल्तान [[सिकंदर लोदी|सिकंदरशाह लोदी]] ने 1504 ई॰ में डाली थी। इसने अपने शासनकाल में होने वाले विद्रोहों को भली भांति दबाने के लिए वर्तमान आगरा के स्थान पर एक सैनिक छावनी बनाई थी जिसके द्वारा उसे इटावा, बयाना, कोल, [[ग्वालियर]] और धौलपुर के विद्रोहियों को दबाने में सहायता मिली। मख़जन-ए-अफगान के लेखक के अनुसार सुलतान सिकंदर ने कुछ चतुर आयुक्तों को दिल्ली, इटावा और चांदवर के आस-पास के इलाके में किसी उपयुक्त स्थान पर सैनिक छावनी बनाने का काम सौंपा था और उन्होंने काफी छानबीन के पश्चात इस स्थान (आगरा) को चुना था। अब तक आगरा या अग्रवन केवल एक छोटा-सा गांव था जिसे [[ब्रजमंडल]] के [[ब्रज चौरासी कोस की यात्रा|चौरासी वनों]] में अग्रणी माना जाता था। शीघ्र ही इसके स्थान पर एक भव्य नगर खड़ा हो गया। कुछ दिन बाद सिकंदर भी यहां आकर रहने लगा। तारीख-दाऊदी के लेखक के अनुसार सिकंदर प्राय: आगरा में ही रहा करता था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tajmahal-1.jpg|thumb|ताजमहल&amp;lt;br /&amp;gt;Taj Mahal]]&lt;br /&gt;
==अकबर और आगरा==&lt;br /&gt;
1505 ई॰ में रविवार, जुलाई 7 को आगरा में एक विकट भूकंप आया जिसने एक वर्ष पहले ही बसे हुए नगर के अनेक सुंदर भवनों को धराशायी कर दिया। मख़जन के लेखक के अनुसार भूंकप इतना भयानक था कि उसके धक्के से इमारतों का तो कहना ही क्या, पहाड़ तक गिर गए थे और प्रलय का सा दृश्य दिखाई देने लगा था। इसके पश्चात आगरा की उन्नति [[अकबर]] के समय में प्रारंभ हुई। 1565 ई॰ में उसने यहां लाल पत्थर का क़िला बनवाना शुरू किया जो आठ वर्षों में तैयार हुआ। अब तक इसके स्थान पर ईटों का बना हुआ एक छोटा-सा क़िला था जो खंडहर हो चला था। अकबर के किले को बनाने वाला तीन हजारी मनसबदार कासिम खां था और इसके निर्माण का व्यय 35 लाख रूपया था। किले की नींव भूमिगत पानी तक गहरी है। इसके पत्थरों को मसाले के साथ-साथ लोहे के छल्लों से भी जोड़ कर सुदृढ़ बनाया गया है। अकबर ने अपने शासन के प्रारंभ में ही [[फतेहपुर सीकरी]] को अपनी राजधानी बनाया था किंतु 1586 ई॰ में अकबर पुन: अपनी राजधानी आगरा ले आया था। [[जहाँगीर]] के राज्यकाल में और [[शाहजहाँ]] के शासन के प्रारंभिक वर्षों में आगरा में ही राजधानी रही। इस जमाने में यहां किले की अंदर की सुंदर इमारतें-मोती मस्जिद और ऐतमाद्दौला का मक़बरा (जिसका निर्माण [[नूरजहाँ]] ने करवाया था) बना। शाहजहाँ ने आगरा को छोड़कर दिल्ली में अपनी राजधानी बनाई। इसी समय आगरा में विश्वविश्रुत [[ताजमहल]] का निर्माण हुआ।&lt;br /&gt;
==आगरा में वास्तुकला==&lt;br /&gt;
*आगरा में [[मुग़ल]] वास्तुकला के पूर्व और उत्तरकालीन दोनों रूपों के उदाहरण मिलते हैं।  &lt;br /&gt;
*अकबर के समय तक जो इमारतें मुग़लों ने बनवाईं वे विशाल, भव्य और विस्तीर्ण हैं, जैसे फतेहपुर सीकरी के भवन या दिल्ली में [[हुमायुँ]] का मक़बरा।  &lt;br /&gt;
*नूरजहाँ के बनवाए हुए ऐतमाद्दौला के मकबरे में पहली बार पत्थर पर बारीक नक्काशी और पच्चीकारी का काम किया गया। &lt;br /&gt;
*उस कला का जन्म हुआ जो विकसित होते हुए ताजमहल के अभूतपूर्व  वास्तुशिल्प में प्रस्फुटित हुई।  &lt;br /&gt;
*ताजमहल में भव्य तथा सूक्ष्म दोनों कला पक्षों का अद्भुत मेल है जो उसे संसार की सर्वश्रेष्ठ इमारतों में प्रमुख स्थान दिलाता है।&lt;br /&gt;
*शाहजहाँ के दिल्ली चले जाने के पश्चात आगरा फिर कभी मुग़लों की राजधानी न बन सका यद्यपि यह नगर मुग़लकाल का एक प्रमुख नगर तो अंत तक बना ही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के ज़िले]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=15607</id>
		<title>आगरा</title>
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		<updated>2010-04-20T14:20:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[District::आगरा]] / Agra&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tajmahal.jpg|ताजमहल, आगरा&amp;lt;br /&amp;gt; Tajmahal, Agra|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
आगरा [[उत्तर प्रदेश]] प्रान्त का एक ज़िला शहर व तहसील है। आगरा 27.18° उत्तर 78.02° पूर्व में [[यमुना नदी|यमुना]] नदी के तट पर स्थित है। समुद्र-तल से इसकी औसत ऊँचाई क़रीब 171 मीटर (561 फ़ीट) है। यह उत्तर में [[मथुरा]], दक्षिण में [[धौलपुर]], पूर्व में फ़िरोज़ाबाद, शिकोहाबाद, दक्षिणपूर्व में फ़तेहाबाद और पश्चिम में [[भरतपुर]] से घिरा हुआ है। आगरा उत्तर प्रदेश का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। [[ताजमहल]] आगरा की पहचान है और यह यमुना नदी के किनारे बसा है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अग्रबाण या अग्रवन==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
आगरा एक ऐतिहासिक नगर है, जिसका प्रमाण यह अपने चारों ओर समेटे हुए है। इतिहास मे पहला ज़िक्र आगरा का [[महाभारत]] के समय से माना जाता है, जब इसे अग्रबाण या अग्रवन के नाम से संबोधित किया जाता था। कहते हैं कि पहले यह नगर आर्य ग्रह के नाम से भी जाना जाता था। [[टॉल्मी|तौलमी]]&amp;lt;balloon title=&amp;quot;Ptolmi 2nd century A.D.&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; पहला ज्ञात व्यक्ति था जिसने इसे आगरा नाम से संबोधित किया।&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक तथ्य==&lt;br /&gt;
मुग़लकाल के इस प्रसिद्ध नगर की नींव [[दिल्ली]] के सुल्तान [[सिकंदर लोदी|सिकंदरशाह लोदी]] ने 1504 ई॰ में डाली थी। इसने अपने शासनकाल में होने वाले विद्रोहों को भली भांति दबाने के लिए वर्तमान आगरा के स्थान पर एक सैनिक छावनी बनाई थी जिसके द्वारा उसे इटावा, बयाना, कोल, [[ग्वालियर]] और धौलपुर के विद्रोहियों को दबाने में सहायता मिली। मख़जन-ए-अफगान के लेखक के अनुसार सुलतान सिकंदर ने कुछ चतुर आयुक्तों को दिल्ली, इटावा और चांदवर के आस-पास के इलाके में किसी उपयुक्त स्थान पर सैनिक छावनी बनाने का काम सौंपा था और उन्होंने काफी छानबीन के पश्चात इस स्थान (आगरा) को चुना था। अब तक आगरा या अग्रवन केवल एक छोटा-सा गांव था जिसे [[ब्रजमंडल]] के [[ब्रज चौरासी कोस की यात्रा|चौरासी वनों]] में अग्रणी माना जाता था। शीघ्र ही इसके स्थान पर एक भव्य नगर खड़ा हो गया। कुछ दिन बाद सिकंदर भी यहां आकर रहने लगा। तारीख-दाऊदी के लेखक के अनुसार सिकंदर प्राय: आगरा में ही रहा करता था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tajmahal-1.jpg|thumb|ताजमहल&amp;lt;br /&amp;gt;Taj Mahal]]&lt;br /&gt;
==अकबर और आगरा==&lt;br /&gt;
1505 ई॰ में रविवार, जुलाई 7 को आगरा में एक विकट भूकंप आया जिसने एक वर्ष पहले ही बसे हुए नगर के अनेक सुंदर भवनों को धराशायी कर दिया। मख़जन के लेखक के अनुसार भूंकप इतना भयानक था कि उसके धक्के से इमारतों का तो कहना ही क्या, पहाड़ तक गिर गए थे और प्रलय का सा दृश्य दिखाई देने लगा था। इसके पश्चात आगरा की उन्नति [[अकबर]] के समय में प्रारंभ हुई। 1565 ई॰ में उसने यहां लाल पत्थर का क़िला बनवाना शुरू किया जो आठ वर्षों में तैयार हुआ। अब तक इसके स्थान पर ईटों का बना हुआ एक छोटा-सा क़िला था जो खंडहर हो चला था। अकबर के किले को बनाने वाला तीन हजारी मनसबदार कासिम खां था और इसके निर्माण का व्यय 35 लाख रूपया था। किले की नींव भूमिगत पानी तक गहरी है। इसके पत्थरों को मसाले के साथ-साथ लोहे के छल्लों से भी जोड़ कर सुदृढ़ बनाया गया है। अकबर ने अपने शासन के प्रारंभ में ही [[फतेहपुर सीकरी]] को अपनी राजधानी बनाया था किंतु 1586 ई॰ में अकबर पुन: अपनी राजधानी आगरा ले आया था। [[जहाँगीर]] के राज्यकाल में और [[शाहजहाँ]] के शासन के प्रारंभिक वर्षों में आगरा में ही राजधानी रही। इस जमाने में यहां किले की अंदर की सुंदर इमारतें-मोती मस्जिद और ऐतमाद्दौला का मक़बरा (जिसका निर्माण [[नूरजहाँ]] ने करवाया था) बना। शाहजहाँ ने आगरा को छोड़कर दिल्ली में अपनी राजधानी बनाई। इसी समय आगरा में विश्वविश्रुत [[ताजमहल]] का निर्माण हुआ।&lt;br /&gt;
==आगरा में वास्तुकला==&lt;br /&gt;
*आगरा में [[मुग़ल]] वास्तुकला के पूर्व और उत्तरकालीन दोनों रूपों के उदाहरण मिलते हैं।  &lt;br /&gt;
*अकबर के समय तक जो इमारतें मुग़लों ने बनवाईं वे विशाल, भव्य और विस्तीर्ण हैं, जैसे फतेहपुर सीकरी के भवन या दिल्ली में [[हुमायुँ]] का मक़बरा।  &lt;br /&gt;
*नूरजहाँ के बनवाए हुए ऐतमाद्दौला के मकबरे में पहली बार पत्थर पर बारीक नक्काशी और पच्चीकारी का काम किया गया। &lt;br /&gt;
*उस कला का जन्म हुआ जो विकसित होते हुए ताजमहल के अभूतपूर्व  वास्तुशिल्प में प्रस्फुटित हुई।  &lt;br /&gt;
*ताजमहल में भव्य तथा सूक्ष्म दोनों कला पक्षों का अद्भुत मेल है जो उसे संसार की सर्वश्रेष्ठ इमारतों में प्रमुख स्थान दिलाता है।&lt;br /&gt;
*शाहजहाँ के दिल्ली चले जाने के पश्चात आगरा फिर कभी मुग़लों की राजधानी न बन सका यद्यपि यह नगर मुग़लकाल का एक प्रमुख नगर तो अंत तक बना ही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के ज़िले]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=15599</id>
		<title>दिल्ली</title>
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		<updated>2010-04-20T14:18:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[State::दिल्ली]] / Delhi&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|क़ुतुब मीनार, दिल्‍ली&amp;lt;br /&amp;gt; Qutub Minar, Delhi|thumb]]&lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] काल में [[पाण्डव|पाण्डवों]] द्वारा बसाया गया [[इन्द्रप्रस्थ]] नगर, दिल्ली आज हमारे देश का हृदय कहलाता है। &lt;br /&gt;
*पर्यटकों के आकर्षण के साथ-साथ यह हमारे देश का मुख्य राजनीतिक केन्द्र भी है। &lt;br /&gt;
*समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 230 मीटर तथा फैलाव 1483 वर्ग कि.मी. क्षेत्र है। &lt;br /&gt;
*यहाँ के ऐतिहासिक स्थल तथा रमणीय स्थल अपने आप में विशेष हैं। &lt;br /&gt;
*पर्यटन विकास के उद्वेश्य से यह [[आगरा]] और [[जयपुर]] से जुडा है।&lt;br /&gt;
*इसकी सीमाएं [[उत्तर प्रदेश]], [[हरियाणा]], राजस्थान, पंजाब और चंडीगढ़ से मिलती हैं।&lt;br /&gt;
*दिल्ली भारत की राष्ट्रीय राजधानी है। इसमें नई दिल्ली सम्मिलित है जो कि ऐतिहासिक पुरानी दिल्ली के बाद बसी थी। यहाँ केन्द्र सरकार की कई प्रशासन संस्थायें हैं। औपचारिक रूप से नई दिल्ली भारत की राजधानी है। &lt;br /&gt;
*1483 वर्ग किलोमीटर (572 वर्ग मील) में फैली दिल्ली भारत का दूसरा तथा दुनिया का आठवां सबसे बड़ा महानगर है। यहाँ की जनसंख्या लगभग 1.4 करोड है। यहाँ बोली जाने वाली मुख्य भाषायें है: हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, और अंग्रेज़ी। &lt;br /&gt;
==इतिहास से==&lt;br /&gt;
*इतिहास के अनुसार दिल्ली को तत्कालीन शासकों ने इसके स्वरूप में कई बार परिवर्तन किया। पुरानी दिल्ली की स्थापना 17 वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] द्वारा की गई थी, वहीं नई दिल्ली जिसका निर्माण अंग्रेजों द्वारा करवाया गया था। प्राचीनकाल से पुरानी दिल्ली पर अनेक राजाओं एवं सम्राटों ने राज्य किया हैं तथा समय-समय पर इसका नाम भी परिवर्तित किया जाता रहा था। दिल्ली में कई राजाओं/सम्राटों के साम्राज्य के उदय तथा पतन के साक्ष्य आज भी विद्यमान हैं। सही मायने में दिल्ली हमारे देश के भविष्य, भूतकाल एवं वर्तमान परिस्थितियों का मेल है। &lt;br /&gt;
*भारत की राजधानी दिल्ली के संबंध विद्वानों का विश्वास है कि यहीं पर महाभारत काल में पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। &lt;br /&gt;
*ऐतिहासिक दिल्ली का निर्माण तोमर नरेश अनंगपाल ने 11वीं शताब्दी में कराया था। उसने जहां इस समय कुतुबमीनार हे वहां पर एक लाल क़िला भी बनवाया था। बाद में अजमेर के चौहान राजाओं ने इस पर कब्जा किया। लेकिन 1193 ई॰ में मौहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान से इसे छीनकर दिल्ली में हिन्दू शासन का अंत कर दिया। &lt;br /&gt;
*1193 ई॰ से 1857 ई॰ के थोड़े से अंतराल को छोड़कर मुस्लिम शासक यहां से राज्य करते रहे। कुछ समय के लिए [[बाबर]], [[अकबर]] और [[जहाँगीर]] ने [[आगरा]] को अपनी राजधानी बनाया था। इस लंबी अवधि में दिल्ली लूटी भी गई। &lt;br /&gt;
*1398 ई॰ में तैमूरलंग ने, 1739 ई॰ में [[नादिरशाह]] ने और 1757 ई॰ में [[अहमदशाह अब्दाली]] ने आक्रमण किया, शहर को खूब लूटा और हजारों व्यक्तियों को क़त्ल कर डाला। &lt;br /&gt;
*1803 ई॰ में दिल्ली पर अंगेजों का अधिकार हो गया और मुग़ल बादशाह नाम के शासक रह गए। 1858 ई॰ में बहादुरशाह के रंगून में कैद हो जाने के बाद नाममात्र की यह बादशाहत भी जाती रही। अंगेजों ने पहले अपने भारतीय साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता को बनाया था। 1911 ई॰ में वे राजधानी दिल्ली ले आए। अब इस राजधानी क्षेत्र का शासन प्रबंध केंद्र-शासित प्रदेश के रूप में उपराज्यपाल के अधीन होता है। दिल्ली का बराबर विस्तार हो रहा है। &lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
[[चित्र:India-Gate-1.jpg|thumb|इंडिया गेट&amp;lt;br /&amp;gt; India Gate]]&lt;br /&gt;
*इसके दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियां और पूर्व में [[यमुना नदी|यमुना]] नदी है, जिसके किनारे यह बसा है। &lt;br /&gt;
*यह प्राचीन समय में [[गंगा नदी|गंगा]] के मैदान से होकर जानेवाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव था। &lt;br /&gt;
*[[यमुना नदी|यमुना]] नदी के किनारे स्थित इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। यह भारत का अति प्राचीन नगर है। इसके इतिहास की शुरुआत सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई है। &lt;br /&gt;
*हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में हुई खुदाई से इस बात के प्रमाण मिले हैं। महाभारत काल में इसका नाम इन्द्रप्रस्थ था। &lt;br /&gt;
*दिल्ली सल्तनत के उत्थान के साथ ही दिल्ली एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक शहर के रूप में उभरी। यहाँ कई प्राचीन एवं मध्यकालीन इमारतों तथा उनके अवशेषों को देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*1639 में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] ने दिल्ली में ही एक चाहरदीवारी से घिरे शहर का निर्माण करवाया जो कि 1679 से 1857 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रही। &lt;br /&gt;
*18वीं एवं 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग पूरे भारत को अपने कब्जे में ले लिया था। इन लोगों ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया। &lt;br /&gt;
*1911 में अंग्रेजी सरकार ने फैसला किया कि राजधानी को वापस दिल्ली लाया जाए। इसके लिए पुरानी दिल्ली के दक्षिण में एक नए नगर नई दिल्ली का निर्माण प्रारम्भ हुआ। &lt;br /&gt;
*अंग्रेजों से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त कर नई दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित किया गया । &lt;br /&gt;
*स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों का प्रवास हुआ इससे दिल्ली के स्वरूप में आमूल परिवर्तन हुआ। विभिन्न प्रान्तों, धर्मों एवं जातियों के लोगों के दिल्ली में बसने के कारण दिल्ली का शहरीकरण तो हुआ ही यहाँ एक मिश्रित संस्कृति ने भी जन्म लिया। &lt;br /&gt;
*आज दिल्ली भारत का एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक केन्द्र है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=15596</id>
		<title>दिल्ली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=15596"/>
		<updated>2010-04-20T14:17:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[State::दिल्ली]] / Delhi&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|क़ुतुब मीनार, दिल्‍ली&amp;lt;br /&amp;gt; Qutub Minar, Delhi|thumb]]&lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] काल में [[पाण्डव|पाण्डवों]] द्वारा बसाया गया [[इन्द्रप्रस्थ]] नगर, दिल्ली आज हमारे देश का हृदय कहलाता है। &lt;br /&gt;
*पर्यटकों के आकर्षण के साथ-साथ यह हमारे देश का मुख्य राजनीतिक केन्द्र भी है। &lt;br /&gt;
*समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 230 मीटर तथा फैलाव 1483 वर्ग कि.मी. क्षेत्र है। &lt;br /&gt;
*यहाँ के ऐतिहासिक स्थल तथा रमणीय स्थल अपने आप में विशेष हैं। &lt;br /&gt;
*पर्यटन विकास के उद्वेश्य से यह [[आगरा]] और [[जयपुर]] से जुडा है।&lt;br /&gt;
*इसकी सीमाएं [[उत्तर प्रदेश]], [[हरियाणा]], राजस्थान, पंजाब और चंडीगढ़ से मिलती हैं।&lt;br /&gt;
*दिल्ली भारत की राष्ट्रीय राजधानी है। इसमें नई दिल्ली सम्मिलित है जो कि ऐतिहासिक पुरानी दिल्ली के बाद बसी थी। यहाँ केन्द्र सरकार की कई प्रशासन संस्थायें हैं। औपचारिक रूप से नई दिल्ली भारत की राजधानी है। &lt;br /&gt;
*1483 वर्ग किलोमीटर (572 वर्ग मील) में फैली दिल्ली भारत का दूसरा तथा दुनिया का आठवां सबसे बड़ा महानगर है। यहाँ की जनसंख्या लगभग 1.4 करोड है। यहाँ बोली जाने वाली मुख्य भाषायें है: हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, और अंग्रेज़ी। &lt;br /&gt;
==इतिहास से==&lt;br /&gt;
[[चित्र:India-Gate-1.jpg|thumb|इंडिया गेट&amp;lt;br /&amp;gt; India Gate|left]]&lt;br /&gt;
*इतिहास के अनुसार दिल्ली को तत्कालीन शासकों ने इसके स्वरूप में कई बार परिवर्तन किया। पुरानी दिल्ली की स्थापना 17 वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] द्वारा की गई थी, वहीं नई दिल्ली जिसका निर्माण अंग्रेजों द्वारा करवाया गया था। प्राचीनकाल से पुरानी दिल्ली पर अनेक राजाओं एवं सम्राटों ने राज्य किया हैं तथा समय-समय पर इसका नाम भी परिवर्तित किया जाता रहा था। दिल्ली में कई राजाओं/सम्राटों के साम्राज्य के उदय तथा पतन के साक्ष्य आज भी विद्यमान हैं। सही मायने में दिल्ली हमारे देश के भविष्य, भूतकाल एवं वर्तमान परिस्थितियों का मेल है। &lt;br /&gt;
*भारत की राजधानी दिल्ली के संबंध विद्वानों का विश्वास है कि यहीं पर महाभारत काल में पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। &lt;br /&gt;
*ऐतिहासिक दिल्ली का निर्माण तोमर नरेश अनंगपाल ने 11वीं शताब्दी में कराया था। उसने जहां इस समय कुतुबमीनार हे वहां पर एक लाल क़िला भी बनवाया था। बाद में अजमेर के चौहान राजाओं ने इस पर कब्जा किया। लेकिन 1193 ई॰ में मौहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान से इसे छीनकर दिल्ली में हिन्दू शासन का अंत कर दिया। &lt;br /&gt;
*1193 ई॰ से 1857 ई॰ के थोड़े से अंतराल को छोड़कर मुस्लिम शासक यहां से राज्य करते रहे। कुछ समय के लिए [[बाबर]], [[अकबर]] और [[जहाँगीर]] ने [[आगरा]] को अपनी राजधानी बनाया था। इस लंबी अवधि में दिल्ली लूटी भी गई। &lt;br /&gt;
*1398 ई॰ में तैमूरलंग ने, 1739 ई॰ में [[नादिरशाह]] ने और 1757 ई॰ में [[अहमदशाह अब्दाली]] ने आक्रमण किया, शहर को खूब लूटा और हजारों व्यक्तियों को क़त्ल कर डाला। &lt;br /&gt;
*1803 ई॰ में दिल्ली पर अंगेजों का अधिकार हो गया और मुग़ल बादशाह नाम के शासक रह गए। 1858 ई॰ में बहादुरशाह के रंगून में कैद हो जाने के बाद नाममात्र की यह बादशाहत भी जाती रही। अंगेजों ने पहले अपने भारतीय साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता को बनाया था। 1911 ई॰ में वे राजधानी दिल्ली ले आए। अब इस राजधानी क्षेत्र का शासन प्रबंध केंद्र-शासित प्रदेश के रूप में उपराज्यपाल के अधीन होता है। दिल्ली का बराबर विस्तार हो रहा है। &lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
*इसके दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियां और पूर्व में [[यमुना नदी|यमुना]] नदी है, जिसके किनारे यह बसा है। &lt;br /&gt;
*यह प्राचीन समय में [[गंगा नदी|गंगा]] के मैदान से होकर जानेवाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव था। &lt;br /&gt;
*[[यमुना नदी|यमुना]] नदी के किनारे स्थित इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। यह भारत का अति प्राचीन नगर है। इसके इतिहास की शुरुआत सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई है। &lt;br /&gt;
*हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में हुई खुदाई से इस बात के प्रमाण मिले हैं। महाभारत काल में इसका नाम इन्द्रप्रस्थ था। &lt;br /&gt;
*दिल्ली सल्तनत के उत्थान के साथ ही दिल्ली एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक शहर के रूप में उभरी। यहाँ कई प्राचीन एवं मध्यकालीन इमारतों तथा उनके अवशेषों को देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*1639 में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] ने दिल्ली में ही एक चाहरदीवारी से घिरे शहर का निर्माण करवाया जो कि 1679 से 1857 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रही। &lt;br /&gt;
*18वीं एवं 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग पूरे भारत को अपने कब्जे में ले लिया था। इन लोगों ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया। &lt;br /&gt;
*1911 में अंग्रेजी सरकार ने फैसला किया कि राजधानी को वापस दिल्ली लाया जाए। इसके लिए पुरानी दिल्ली के दक्षिण में एक नए नगर नई दिल्ली का निर्माण प्रारम्भ हुआ। &lt;br /&gt;
*अंग्रेजों से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त कर नई दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित किया गया । &lt;br /&gt;
*स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों का प्रवास हुआ इससे दिल्ली के स्वरूप में आमूल परिवर्तन हुआ। विभिन्न प्रान्तों, धर्मों एवं जातियों के लोगों के दिल्ली में बसने के कारण दिल्ली का शहरीकरण तो हुआ ही यहाँ एक मिश्रित संस्कृति ने भी जन्म लिया। &lt;br /&gt;
*आज दिल्ली भारत का एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक केन्द्र है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
	</entry>
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		<title>तात्या टोपे</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Tatya-Tope.jpg|thumb|तात्या टोपे]]&lt;br /&gt;
'''वीर केसरी तात्या टोपे / Tatya Topey'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
सन 1857 के [[प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] के अग्रणीय वीरों में तात्या टोपे को बड़ा उच्च स्थान प्राप्त है। इस वीर ने कई स्थानों पर अपने सैनिक अभियानों में [[उत्तर प्रदेश]], [[राजस्थान]], [[मध्य प्रदेश]], [[गुजरात]] में अंग्रेजी सेनाओं से टक्कर ली थी और उन्हें परेशान कर दिया था। गोरिल्ला युद्ध प्रणाली को अपनाते हुए तात्या ने अंग्रेजी सेनाओं के कई स्थानों पर छक्के छुड़ा दिये थे। तात्या टोपे जो 'तांतिया टोपी' के नाम से विख्यात हैं, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उन महान सैनिक नेताओं में से एक थे, जो प्रकाश में आए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1857 तक लोग इनके नाम से अपरिचित थे। लेकिन 1857 की नाटकीय घटनाओं ने उन्हें अचानक अंधकार से प्रकाश में ला खड़ा किया। इस महान विद्रोह के प्रारंभ होने से पूर्व वह राज्यच्युत [[पेशवा बाजीराव द्वितीय]] के सबसे बड़े पुत्र बिठूर के राजा, [[नाना साहब]] के एक प्रकार से साथी-मुसाहिब मात्र थे, किंतु स्वतंत्रता संग्राम में [[कानपुर]] के सम्मिलित होने के पश्चात तात्या पेशवा की सेना के सेनाध्यक्ष की स्थिति तक पहुंच गए। उसके पश्चातवर्ती युद्धों की सभी घटनाओं ने उनका नाम सबसे आगे एक पुच्छलतारे की भांति बढ़ाया, जो अपने पीछे प्रकाश की एक लंबी रेखा छोड़ता गया। उनका नाम केवल देश में नहीं वरन देश के बाहर भी प्रसिद्ध हो गया। मित्र ही नहीं शत्रु भी उनके सैनिक अभियानों को जिज्ञासा और उत्सुकता से देखने और समझने का प्रयास करते थे। समाचार पत्रों में उनके नाम के लिए विस्तृत स्थान उपलब्ध था। उनके विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते थे। उदाहरणार्थ- &lt;br /&gt;
*कर्नल माल्सन ने उनके संबंध में कहा है, 'भारत में संकट के उस क्षण में जितने भी सैनिक नेता उत्पन्न हुए, वह उनमें सर्वश्रेष्ठ थे।' &lt;br /&gt;
*सर जार्ज फारेस्ट ने उन्हें, 'सर्वोत्कृष्ट राष्ट्रीय नेता' कहा है। &lt;br /&gt;
*आधुनिक अंग्रेजी इतिहासकार, पर्सीक्रास स्टेडिंग ने सैनिक क्रांति के दौरान देशी पक्ष की ओर से उत्पन्न 'विशाल मस्तिष्क' कहकर उनका सम्मान किया। उसने उनके विषय में यह भी कहा है कि 'वह विश्व के प्रसिद्ध छापामार नेताओं में से एक थे।'&lt;br /&gt;
==झांसी की रानी और तात्या टोपे==&lt;br /&gt;
1857 के दो विख्यात वीरों - [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|झांसी की रानी]] और तात्या टोपे में से झांसी की रानी को अत्यधिक ख्याति मिली। उनके नाम के चारों ओर यश का चक्र बन गया, किंतु तात्या टोपे के साहसपूर्ण कार्य और विजय अभियान रानी लक्ष्मीबाई के साहसिक कार्यों और विजय अभियानों से कम रोमांचक नहीं थे। रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध अभियान जहां केवल [[झांसी]], [[कालपी]] और [[ग्वालियर]] के क्षेत्रों तक सीमित रहे थे वहां तात्या एक विशाल राज्य के समान कानपुर के राजपूताना और मध्य भारत तक फैल गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्नल ह्यू रोज- जो मध्य भारत युद्ध अभियान के सर्वेसर्वा थे, ने यदि रानी लक्ष्मीबाई की प्रशंसा 'उन सभी में सर्वश्रेष्ठ वीर' के रूप में की थी तो मेजर मीड को लिखे एक पत्र में उन्होंने तात्या टोपे के विषय में यह कहा था कि वह 'भारत युद्ध नेता और बहुत ही विप्लवकारी प्रकृति के थे और उनकी संगठन क्षमता भी प्रशंसनीय थी।' तात्या ने अन्य सभी नेताओं की अपेक्षा शक्तिशाली ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने शत्रु के साथ लंबे समय तक संघर्ष जारी रखा। जब स्वतंत्रता संघर्ष के सभी नेता एक-एक करके अंग्रेजों की श्रेष्ठ सैनिक शक्ति से पराभूत हो गए तो वे अकेले ही विद्रोह की पताका फहराते रहे। उन्होंने लगातार नौ मास तक उन आधे दर्जन ब्रिटिश कमांडरों को छकाया जो उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। वे अपराजेय ही बने रहे। &lt;br /&gt;
==प्रारंभिक जीवन==&lt;br /&gt;
तात्या टोपे के प्रारंभिक जीवन के संबंध में अधिक जानकारी नहीं है। उनके विषय में थोड़े बहुत तथ्य उस बयान से इकट्ठे किए जा सकते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के बाद दिया और कुछ तथ्य तात्या के सौतेले भाई रामकृष्ण टोपे के उस बयान से इकट्ठे किए जा सकते हैं जो उन्होंने 1862 ई0 में [[बड़ौदा]] के सहायक रेजीडेंस के समक्ष दिया था। तात्या का वास्तविक नाम 'रामचंद्र पांडुरंग येवालकर' था और 'तात्या' मात्र उपनाम था। जबकि टोपे भी उनका उपनाम था जो उनके साथ ही चिपका रहा। उनका परिवार मूलतः [[नासिक]] के निकट पटौदा जिले में एक छोटे से गांव येवाले में रहता था। इसलिए उनका उपनाम येवालकर पड़ा। महान वीर देशभक्त तात्या टोपे का जन्म सन 1814 [[नासिक]], [[महाराष्ट्र]] में हुआ था। तात्या शब्द का प्रयोग और अधिक प्यार के लिये होता था। पेशवा बाजीराम द्बितीय के यहाँ अपके पिता पुरोहित थे। उसका बालकाल [[बिठूर]] में पेशवा के दत्तक पुत्र [[नाना साहब]] और [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|झाँसी की वीरांगन रानी लक्ष्मीबाई]] के साथ व्यतीत हुआ था। आगे चलकर 1857 में देश की स्वाधीनता के लिए तीनों ने जो आत्मोत्सर्ग किया था वह हमारे स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। तात्या ने, 1859 में दिए गए अपने बयान में अपनी आयु 45 वर्ष बताई थी। जिससे यह पता लगता है कि उनका जन्म 1813 या 1814 के आसपास हुआ था। उनके पिता, जो एक देशस्थ ब्राह्मण थे, बहुत ही विद्वान थे। उनकी विद्वता उनकी जाति के अनुकूल थी। अच्छी नौकरी की तलाश में वह परिवार सहित [[पूना]] चले गए। पूना पेशवाओं की राजधानी थी। त्रयम्बक जी देंगाल, जो प्रसिद्ध दरबारी था, की सहायता से उन्हें अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के साथ परिचय प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। जिन्होंने उन्हें अपने महल में पुजारी के रूप में नियुक्त कर लिया। &lt;br /&gt;
==बिठूर में==&lt;br /&gt;
अपनी विद्वता, निष्ठा और विवेक बुद्धि से वह आगे चलकर पेशवा के धार्मिक विन्यास और गृह-व्यवस्था विभाग के पर्यवेक्षक की स्थिति तक पहुंच गए। &lt;br /&gt;
तात्या जब मुश्किल से 4 वर्ष के थे तभी उनके पिता के स्वामी के भाग्य में अचानक परिवर्तन हुआ। बाजीराव 1818 में बसाई के युद्ध में अंग्रेजों से हार गए। उनका साम्राज्य उनसे छिन गया। उन्हें आठ लाख रूपये की सालान पेंशन मंजूर की गई और उनकी राजधानी से उन्हें बहुत दूर हटाकर बिठूर में रखा गया। यह स्पष्ट रूप से ऎसी स्थिति से बचने के लिए किया गया था कि वह अपने खोए हुए साम्राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए कुछ नई चालें न चल सकें। बिठूर, कानपुर से 12 मील दूर [[गंगा नदी|गंगा]] के तट पर छोटा सा सुंदर नगर था। वहां उन्होंने अपने लिए एक विशाल प्रासाद का निर्माण करवाया और अपना अधिकांश समय धार्मिक कार्यकलापों में व्यतीत करने लगे। तात्या का परिवार भी पेशवा के साथ वहीं पर आ गया। &lt;br /&gt;
==युवावस्था और साथी==&lt;br /&gt;
तात्या एक अच्छे महत्वाकांक्षी नवयुवक थे। उन्होंने अनेक वर्ष बाजीराव के तीन दत्तक पुत्र- नाना साहब, बाला साहब और बाबा भट्ट के साहचर्य में बिताए। एक कहानी प्रसिद्ध है कि नाना साहब, उनके भाई, झांसी की भावी रानी जिनके पिता उस समय सिंहासनच्युत पेशवा के एक दरबारी थे और तात्या; ये सभी आगे चलकर विद्रोह के प्रख्यात नेता बने। ये अपने बचपन में एक साथ युद्ध के खेल खेला करते थे और उन्होंने मराठों की वीरता की कहानियां सुनी थी। जिनसे उन्हें विद्रोह के लिए प्रेरणा प्राप्त हुई थी। इस कहानी को कुछ इतिहासज्ञ 'अप्रमाणिक' मानते हैं। उनके विचार से गाथा के इस भाग का ताना-बाना इन वीरों का सम्मान करने वाले देश प्रेमियों के मस्तिष्क की उपज है। फिर भी यह सच है कि इन सभी का पेशवा के परिवार से निकटतम संबंध और वह अपनी आयु तथा स्थिति भिन्न होने के बावजूद प्रायः एक-दूसरे के निकट आए होंगे और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। खोए हुए राज्य की स्मृतियां अभी ताजा ही थी, धुंधली नहीं पड़ी थी। साम्राज्य को पुनः प्राप्त करना और अपने नुकसान को पूरा करना नाना और उनके भाइयों के अनेक युवा सपनों में से एक स्वप्न अवश्य रहा होगा। वे सभी बाद में अपने दुर्बल पिता की तुलना में काफी अच्छे साबित हुए थे। &lt;br /&gt;
==युध्द कला प्रशिक्षण==&lt;br /&gt;
तात्या ने कुछ सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त तो किया था किंतु उन्हें युद्धों का अनुभव बिल्कुल भी नहीं था। तात्या ने पेशवा के पुत्रों के साथ उस काल के औसत नवयुवक की भांति युद्ध प्रशिक्षण प्राप्त किया था। घेरा डालने और हमला करने का जो भी ज्ञान उन्हें रहा हो वह उनके उस कार्य के लिए बिलकुल उपयुक्त न था जिसके लिए भाग्य ने उनका निर्माण किया था। ऎसा प्रतीत होता है कि उन्होंने 'गुरिल्ला' युद्ध जो उनकी मराठा जाति का स्वाभाविक गुण था, अपनी वंश परंपरा से प्राप्त किया था। यह बात उन तरीकों से सिद्ध हो जाती है जिनका प्रयोग उन्होंने ब्रिटिश सेनानायकों से बचने के लिए किया। रामकृष्ण टोपे के बयान के अनुसार तात्या अपने पिता की 12 संतानों में से दूसरे थे। उनका एक सगा और छह सौतेले भाई और चार बहनें थी। यद्यपि तात्या अपनी बच्चों के साथ अलग रहते थे, फिर भी सभी व्यवहारिक कार्यों के लिए उनका परिवार संयुक्त परिवार था। &lt;br /&gt;
==विशिष्ट व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
तात्या के व्यक्तित्व में विशिष्ट आकर्षण था। जानलैंग ने जब उन्हें बिठूर में देखा था तो वे उनके व्यक्तित्व से प्रभावित नहीं हुए थे। उन्होंने तात्या के विषय में कहा है कि वह 'औसत ऊंचाई, लगभग पांच फीट 8 इंच और इकहरे बदन के किंतु दृढ़ व्यक्तित्व के थे। देखने में सुंदर नहीं थे। उनका माथा नीचा, नाक नासाछिद्रों के पास फैली हुई और दांत बेतरतीब थे। उनकी आंखें प्रभावी और चालाकी से भरी हुई थी। जैसी की अधिकांश एशियावासियों में होती हैं। किंतु उसके ऊपर उनकी विशिष्ट योग्यता के व्यक्ति के रूप में कोई प्रभाव नहीं पड़ा&amp;lt;balloon title=&amp;quot;जान लैंग; वांडरिंग इन इंडिया एंड अदर्स स्केचेज आफ लाइफ इन हिंदुस्तान&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'बाम्बे टाइम्स' के संवाददाता ने, तात्या से उनकी गिरफ्तारी के पश्चात भेंट की थी। अप्रैल 18, 1849 के संस्करण में लिखा था कि तात्या न तो खूबसूरत है और न ही बदसूरत, किंतु वह बुद्धिमान हैं। उनका स्वभाव शांत और निर्बध है। उनका स्वास्थ्य अच्छा और कद औसत है। उन्हें मराठी, उर्दू और गुजराती का अच्छा ज्ञान था। वे इन भाषाओं में धाराप्रवाह बोल सकते थे। अंग्रेजी तो वह मात्र अपने हस्ताक्षर करने भर के लिए जानते थे, उससे अधिक नहीं। वह रूक-रूक कर, किंतु स्पष्ट रूप से, एक नपी-तुली शैली में बोलते थे। किंतु उनकी अभिव्यक्ति का ढंग अच्छा था और वे श्रोताओं को अपनी ओर आकृष्ट कर लेते थे। यह सच है कि तात्या अपनी वाक-शक्ति और समझाने की अपनी शक्ति से प्रायः अपने विरोधियों की सेनाओं को भी समझाकर अपने पक्ष में मिला लेते थे। &lt;br /&gt;
==चरित्र==&lt;br /&gt;
बिठूर में तात्या की योग्यताओं और महत्वाकांक्षाओं के लिए न के बराबर स्थान था और वह एक उद्धत्त व्यक्ति बनकर ही वहां रहते, यह बात इस तथ्य से स्पष्ट है कि वह कानपुर गए और उन्होंने [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] की नौकरी कर ली। किंतु शीघ्र ही हतोत्साहित होकर लौट आए। इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक महाजनी का काम किया, किंतु इसे बाद में छोड़ दिया क्योंकि यह उनके स्वभाव के बिलकुल प्रतिकूल था। तात्या के पिता पेशवा के गृह प्रबंध के पहले से ही प्रधान थे, इसलिए उन्हें एक लिपिक के रूप में नौकरी पाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। किंतु वह अपनी इस हालत से खुश नहीं थे। &lt;br /&gt;
==उपाधि 'टोपे'==&lt;br /&gt;
एक कर्मचारी की विश्वासघात संबंधी योजनाओं का पता लगाने में इस नवयुवक लिपिक की योग्यता, तत्परता और चातुर्य से प्रभावित होकर पेशवा ने एक विशेष दरबार में 9 हीरों से जड़ी हुई एक टोपी उन्हें दी और दरबार में उपस्थित लोगों ने 'तात्या टोपे' के नाम से उनकी जय-जयकार की। 1851 में पेशवा की मृत्यु के पश्चात नाना बिठूर के राजा हो गए और तात्या उनके प्रधान लिपिक बने। विचारधारा एक जैसी होने के कारण वे एक-दूसरे के इतना निकट आए जितना कि पहले कभी नहीं थे और शीघ्र ही वह नाना के मुसाहिब के रूप में प्रसिद्ध हो गए। &lt;br /&gt;
==ब्रिटिश शासन से विद्रोह के कारण==&lt;br /&gt;
1857 का विद्रोह जिन कारणों से हुआ उनसे सभी परिचित हैं। सर जौन लारेंस ने कहा था, 'यह चरबी लगी कारतूस और मात्र चरबी लगी कारतूसों के कारण हुआ' किंतु मात्र चरबी लगी कारतूस इतना बड़ा और शक्तिशाली तूफान लाने में समर्थ नहीं हो सकती थी। वास्तव में चरबी लगी कारतूस, जैसा कि सिपाहियों को संदेह था, उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तन करने का एक जघन्य हथियार था। इसके लिए तो रूपक की भाषा में यह कहा जा सकता है कि यह पके हुए फोड़े पर नश्तर था। इससे पहले भी अनेक सैनिक सुधार हो चुके थे। जिसमें -&lt;br /&gt;
#यह कहा था कि सिपाही अपनी शान से बढ़ाई गई दाढ़ी एक निर्दिष्ट पैटर्न में ही रखे। &lt;br /&gt;
#दूसरा था भारतीय पगड़ी के स्थान पर चमड़े से बने टोप पहनें (इस टोप की वजह से वेल्लोर में सिपाही विद्रोह हो चुका था) &lt;br /&gt;
#बर्मा युद्ध के दौरान सिपाहियों को समुद्र यात्रा करने पर मजबूर कर दिया गया था। (समुद्र यात्रा हिंदू धर्म में निषिद्ध है) सिपाहियों ने इसका विरोध भी किया था, क्योंकि वह ऎसा समझते थे कि यह उनके धार्मिक विश्वासों पर अनावश्यक हस्तक्षेप था, लेकिन कम्पनी सरकार ने उनके संदेह के निराकरण के लिए कोई भी प्रयास नहीं किया था। &lt;br /&gt;
#चार्टर अधिनियम, 1813 ने सारे भारत का द्वार सभी अंग्रेजों के लिए खोल दिया था। जिसके परिणामस्वरूप मिशनरियों के धर्म परिवर्तन कराने पर संबंधी कार्यकलाप तेजी से बढ़ते जा रहे थे। #एक समसामयिक व्यक्ति ने यह कहा कि 'मिशनरियों पर से रोक हटा ली गई थी, ताला तोड़कर चर्च के दरवाजे पर फेंक दिया गया था, धर्मग्रंथों को बाहर ले जाकर उन पर प्रवचन करने का मौका दे दिया गया था। जब ईसाई सरकार भारत में ईसाइयत के प्रसार का विरोध न कर सकी।'&lt;br /&gt;
==युध्द अभियान==&lt;br /&gt;
सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के विस्फोट होने पर तात्या भी समरांगण में कूद गया था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहब के प्रति अंग्रेजों ने जो अन्याय किये थे, उनकी उसके हृदय मे एक टीस थी। उसने उत्तरी भारत में शिवराजपुर, [[कानपुर]], [[कालपी]] और [[ग्वालियर]] आदि अनेक स्थानों में अंग्रेजों की सेनाओं से कई बार लोहा लिया था। सन 1857 के स्वातंत्र्य योद्धाओं में वही ऐसा तेजस्वी वीर था जिसने विद्युत गति के समान अपनी गतिविधियों से शत्रु को आश्चर्य में ड़ाल दिया था। वही एकमात्र एसा चमत्कारी स्वतन्त्रता सेनानी था जिसमे पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के सैनिक अभियानों में फिरंगी अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिये थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान की भूमि में उसके जो शौर्य का परिचय दिया था वह अविस्मरणीय है। देश का दुर्भाग्य था कि राजस्थान के राजाओं ने उसका साथ नहीं दिया था। नाना साहब के साथ उसने 1 दिसम्बर से 6 दिसमबर 1857 तक कानपुर में अंग्रेजों के साथ घोर संग्राम किया था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ भी वह कालपी में शत्रु सेना से लड़ा था।&lt;br /&gt;
==मृत्यु और भ्रांतियां==&lt;br /&gt;
इसी वीर के सम्बन्ध में कहा जाता है कि मानसिंह ने तात्या के साथ धोखा करके उसे अंग्रेजों को सुपुर्द कर दिया था। अंग्रेजों ने उसे फांसी पर लटका दिया था। लेकिन खोज से ये ज्ञात हुआ है कि फाँसी पर लटकाये जाने वाला दूसरा व्यक्ति था। असली तात्या टोपे तो छद्मावेश में शत्रुओं से बचते हुए स्वतन्त्रता संग्राम के कई वर्ष बाद तक जीवित रहा। ऐसा कहा जाता है कि 1862-82 की अवधि में स्वतन्त्रता संग्राम का सेनानी तात्या टोपे नारायण स्वामी के रूप में गोकुलपुर [[आगरा]] में स्थित सोमेश्वरनाथ के मन्दिर में कई मास रहा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता संग्राम 1857]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
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		<title>तबला</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Pradeep Wagle: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''तबला / Tabla'''&lt;br /&gt;
[[चित्र:Zakir-Hussain.jpg|thumb|उस्ताद ज़ाकिर हुसेन]]&lt;br /&gt;
आधुनिक काल में गायन, वादन तथा नृत्य की संगति में तबले का प्रयोग होता है । तबले के पूर्व यही स्थान [[पखावज]] अथवा [[मृदंग]] को प्राप्त था । कुछ दिनों से तबले का स्वतन्त्र-वादन भी अधिक लोक-प्रिय होता जा रहा है । स्थूल रूप से तबले को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है, दाहिना तबला जिसे कुछ लोग दाहिना भी कहते हैं, और बायां अथवा डग्गा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pradeep Wagle</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Zakir-Hussain.jpg&amp;diff=15577</id>
		<title>चित्र:Zakir-Hussain.jpg</title>
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