<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Pkumar8791</id>
	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Pkumar8791"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/Pkumar8791"/>
	<updated>2026-06-30T16:18:51Z</updated>
	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=62499</id>
		<title>प्रेमचंद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=62499"/>
		<updated>2010-09-09T05:47:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pkumar8791: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Premchand.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=मुंशी प्रेमचंद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[31 जुलाई]], [[1880]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लमही गाँव, [[बनारस]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=मुंशी अजायब लाल और आनन्दी देवी&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=शिवरानी देवी&lt;br /&gt;
|संतान=अमृत राय और श्रीपत राय (पुत्र)&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=अध्यापक, लेखक, उपन्यासकार&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[8 अक्तूबर]] [[1936]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=[[ग़बन]], [[गोदान]] और [[बड़े घर की बेटी]]&lt;br /&gt;
|विषय=सामजिक&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम '''धनपत राय श्रीवास्तव''' था।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भारत]] के उपन्यास सम्राट '''मुंशी प्रेमचंद''' के युग का विस्तार सन 1880 से 1936 तक है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व का है। इस युग में भारत का स्वतंत्रता-संग्राम नई मंजिलों से गुज़रा। यह संघर्ष अधिक सशक्त और गहरा हुआ। प्रेमचंद का वास्तविक नाम '''धनपत राय श्रीवास्तव''' था। वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब [[हिन्दी]] में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं फिर भी इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=गुप्त |first=प्रकाशचन्द्र|title=प्रेमचंद भारतीय साहित्य के निर्माता |year=1984 |publisher=साहित्य अकादेमी|location=नई दिल्ली |id= |page= |accessday=21|accessmonth=अगस्त|accessyear=2010}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद का जन्म [[बनारस]] से लगभग चार मील दूर, लमही नाम के गाँव में [[31 जुलाई]], [[1880]] को हुआ। प्रेमचंद के पिताजी मुंशी अजायब लाल और माता आनन्दी देवी थीं। प्रेमचंद का बचपन गाँव में बीता था। वे नटखट और खिलाड़ी बालक थे और खेतों से शाक-सब्ज़ी और पेड़ों से फल चुराने में दक्ष थे। उन्हें मिठाई का बड़ा शौक़ था और विशेष रूप से गुड़ से उन्हें बहुत प्रेम था। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा लमही में हुई और एक मौलवी साहब से उन्होंने उर्दू और फ़ारसी पढ़ना सीखा। एक रुपया चुराने पर ‘बचपन’ में उन पर बुरी तरह मार पड़ी थी। उनकी कहानी, ‘कज़ाकी’, उनकी अपनी बाल-स्मृतियों पर आधारित है। कज़ाकी डाक-विभाग का हरकारा था और बड़ी लम्बी लम्बी यात्राएं करता था। वह बालक प्रेमचंद के लिए सदैव अपने साथ कुछ सौगात लाता था। कहानी में वह बच्चे के लिये हिरन का छौना लाता है और डाकघर में देरी से पहुंचने के कारण नौकरी से अलग कर दिया जाता है। हिरन के बच्चे के पीछे दौड़ते-दौड़ते वह अति विलम्ब से डाक घर लौटा था। कज़ाकी का व्यक्तित्व अतिशय मानवीयता में डूबा है। वह शालीनता और आत्मसम्मान का पुतला है, किन्तु मानवीय करुणा से उसका ह्रदय भरा है। &lt;br /&gt;
==पारिवारिक जीवन==&lt;br /&gt;
उनका कुल फटेहाल कायस्थों का था, जिनके पास क़रीब छै बीघे ज़मीन थी और जिनका परिवार बड़ा था। प्रेमचंद के पितामह, मुंशी गुरुसहाय लाल, पटवारी थे। उनके पिता, मुंशी अजायब लाल, डाकमुंशी थे और उनका वेतन लगभग पच्चीस रुपये मासिक था। उनकी मां, आनन्द देवी, सुन्दर सुशील और सुघड़ महिला थीं। छ: महीने की बीमारी के बाद प्रेमचंद की मां की मृत्यु हो गई। तब वे आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। दो वर्ष के बाद उनके पिता ने फिर विवाह कर लिया और उनके जीवन में विमाता का अवतरण हुआ। प्रेमचंद के इतिहास में विमाता के अनेक वर्णन हैं । यह स्पष्ट है कि प्रेमचंद के जीवन में मां के अभाव की पूर्ति विमाता द्वारा न हो सकी थी। जब प्रेमचंद पंद्रह वर्ष के थे, उनका विवाह हो गया। वह विवाह उनके सौतेले नाना ने तय किया था। उस काल के विवरण से लगता है कि लड़की न तो देखने में सुंदर थी, न वह स्वभाव से शीलवती थी। वह झगड़ालू भी थी। प्रेमचंद के कोमल मन का कल्पना-भवन मानो नींव रखते-रखते ही ढह गया। प्रेमचंद का यह पहला विवाह था। इस विवाह का टूटना आश्चर्य न था। प्रेमचंद की पत्नी के लिए यह विवाह एक दु:खद घटना रहा होगा। जीवन पर्यन्त यह उनका अभिशाप बन गया। इस सब का दोष भारत की परम्पराग्रस्त विवाह-प्रणाली पर है, जिसके कारण यह व्यवस्था आवश्यकता से भी अधिक जुए का खेल बन जाती है। प्रेमचंद ने निश्चय किया कि अपना दूसरा विवाह वे किसी विधवा कन्या से करेंगे। यह निश्चय उनके उच्च विचारों और आदर्शों के ही अनुरूप था। शिवरानी देवी बाल-विधवा थीं। उनके पिता [[फ़तेहपुर]] के पास के इलाक़े में एक साहसी ज़मीदार थे और शिवरानी जी के पुनर्विवाह के लिए उत्सुक थे। सन [[1916]] के आदिम युग में ऐसे विचार-मात्र की साहसिकता का अनुमान किया जा सकता है। इसी वर्ष प्रेमचंद का दूसरा विवाह संपन्न हुआ। शिवरानी जी की पुस्तक ‘प्रेमचंद-घर में’, प्रेमचंद के घरेलू जीवन का सजीव और अंतरंग चित्र प्रस्तुत करती है। प्रेमचंद अपने पिता की तरह पेचिश के शिकार थे और निरंतर पेट की व्याधियों से पीड़ित रहते थे। प्रेमचंद स्वभाव से सरल, आदर्शवादी व्यक्ति थे। वे सभी का विश्वास करते थे, किन्तु निरंतर उन्हें धोखा खाना पड़ा। उन्होंने अनेक लोगों को धन-राशि कर्ज़ दी, किन्तु बहुधा यह धन लौटा ही नहीं । शिवरानी देवी की दृष्टि कुछ अधिक सांसारिक और व्यवहार-कुशल थी। वे निरंतर प्रेमचंद की उदार-ह्रदयता पर ताने कसती थीं, क्योंकि अनेक बार कुपात्र ने ही इस उदारता का लाभ उठाया। प्रेमचंद स्वयं सम्पन्न न थे और अपनी उदारता के कारण अर्थ-संकट में फंस जाते थे। ‘ढपोरशंख’ शीर्षक कहानी में प्रेमचंद एक कपटी साहित्यिक द्वारा अपने ठगे जाने की मार्मिक कथा कहते हैं। &lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
ग़रीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में ही गाँव से दूर [[बनारस]] पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाना पड़ता था। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे, मगर ग़रीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर में एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रेमचन्द ने मैट्रिक पास किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साहित्यिक जीवन==&lt;br /&gt;
{{highright}}प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। उनका वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना आरम्भ किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें जीवन-पर्यन्त नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे।{{highclose}}&lt;br /&gt;
प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। उनका वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना आरम्भ किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें जीवन-पर्यन्त नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे। जब सरकार ने उनका पहला कहानी-संग्रह, ‘सोज़े वतन’ ज़ब्त किया, तब उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा। बाद का उनका अधिकतर साहित्य प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित हुआ। इसी काल में प्रेमचंद ने कथा-साहित्य बड़े मनोयोग से पढ़ना शुरू किया। एक तम्बाकू-विक्रेता की दुकान में उन्होंने कहानियों के अक्षय भण्डार, ‘तिलिस्मे होशरूबा’ का पाठ सुना। इस पौराणिक गाथा के लेखक फ़ैज़ी बताए जाते हैं, जिन्होंने [[अकबर]] के मनोरंजन के लिए ये कथाएं लिखी थीं। एक पूरे वर्ष प्रेमचंद ये कहानियां सुनते रहे और इन्हें सुनकर उनकी कल्पना को बड़ी उत्तेजना मिली। कथा साहित्य की अन्य अमूल्य कृतियां भी प्रेमचंद ने पढ़ीं। इनमें ‘सरशार’ की कृतियां और रेनाल्ड की ‘लन्दन-रहस्य’ भी थी। [[गोरखपुर]] में बुद्धिलाल नाम के पुस्तक-विक्रेता से उनकी मित्रता हुई। वे उनकी दुकान की कुंजियां स्कूल में बेचते थे और इसके बदले में वे कुछ [[उपन्यास]] अल्प काल के लिए पढ़ने को घर ले जा सकते थे। इस प्रकार उन्होंने दो-तीन वर्षों में सैकड़ों उपन्यास पढ़े होंगे। इस समय प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाकमुंशी की हैसियत से काम कर रहे थे। गोरखपुर मे ही प्रेमचंद ने अपनी सबसे पहली साहित्यिक कृति रची। यह रचना एक अविवाहित मामा से सम्बंधित प्रसहन था। मामा का प्रेम एक छोटी जाति की स्त्री से हो गया था। वे प्रेमचंद को उपन्यासों पर समय बर्बाद करने के लिए निरन्तर डांटते रहते थे। मामा की प्रेम-कथा को नाटक का रूप देकर प्रेमचंद ने उनसे बदला लिया। यह प्रथम रचना उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनके मामा ने क्रुद्ध होकर पांडुलिपि को अग्नि को समर्पित कर दिया। गोरखपुर में प्रेमचंद को एक नये मित्र महावीर प्रसाद पोद्दार मिले और इनसे परिचय के बाद प्रेमचंद और भी तेज़ी से हिन्दी की ओर झुके। उन्होंने हिन्दी में शेख़ सादी पर एक छोटी-सी पुस्तक लिखी थी, टॉल्सटॉय की कुछ कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया था और ‘प्रेम-पचीसी’ की कुछ कहानियों का रूपान्तर भी हिन्दी में कर रहे थे। ये कहानियां ‘सप्त-सरोज’ शीर्षक से हिन्दी संसार के सामने सर्वप्रथम सन 1917 में आयीं। ये सात कहानियां थीं:- &lt;br /&gt;
# बड़े घर की बेटी, &lt;br /&gt;
# सौत, &lt;br /&gt;
# सज्जनता का दण्ड, &lt;br /&gt;
# पंच परमेश्वर, &lt;br /&gt;
# नमक का दारोग़ा, &lt;br /&gt;
# उपदेश, &lt;br /&gt;
# परीक्षा। प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में इन कहानियों की गणना होती है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद के साहित्य की विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। अपनी कहानियों से प्रेमचंद मानव-स्वभाव की आधारभूत महत्ता पर बल देते हैं। '''‘बड़े घर की बेटी,’ आनन्दी, अपने देवर से अप्रसन्न हुई, क्योंकि वह गंवार उससे कर्कशता से बोलता है और उस पर खींचकर खड़ाऊं फेंकता है। जब उसे अनुभव होता है कि उनका परिवार टूट रहा है और उसका देवर परिताप से भरा है, तब वह उसे क्षमा कर देती है और अपने पति को शांत करती है'''। इसी प्रकार नमक का दारोग़ा बहुत ईमानदार व्यक्ति है। घूस देकर उसे बिगाड़ने में सभी असमर्थ हैं। सरकार उसे, सख्ती से उचित कार्यवाही करने के कारण, नौकरी से बर्खास्त कर देती है, किन्तु जिस सेठ की घूस उसने अस्वीकार की थी, वह उसे अपने यहां ऊंचे पद पर नियुक्त करता है। वह अपने यहाँ ईमानदार और कर्तव्यपरायण कर्मचारी रखना चाहता है। इस प्रकार प्रेमचंद के संसार में सत्कर्म का फल सुखद होता है। वास्तविक जीवन में ऐसी आश्चर्यप्रद घटनाएं कम घटती हैं। '''गाँव का पंच भी व्यक्तिगत विद्वेष और शिकायतों को भूलकर सच्चा न्याय करता है। उसकी आत्मा उसे इसी दिशा में ठेलती है। असंख्य भेदों, पूर्वाग्रहों, अन्धविश्वासों, जात-पांत के झगड़ों और हठधर्मियों से जर्जर ग्राम-समाज में भी ऐसा न्याय-धर्म कल्पनातीत लगता है'''। हिन्दी में प्रेमचंद की कहानियों का एक संग्रह [[बम्बई]] के एक सुप्रसिद्ध प्रकाशन गृह, हिन्दी ग्रन्थ-रत्नाकर ने प्रकाशित किया। यह संग्रह ‘नवनिधि’ शीर्षक से निकला और इसमें ‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारन्धा’ जैसी बुन्देल वीरता की सुप्रसिद्ध कहानियाँ शामिल थीं। इसके कुछ समय के बाद प्रेमचंद ने हिन्दी में कहानियों का एक और संग्रह प्रकाशित किया। इस संग्रह का शीर्षक था ‘प्रेम-पूर्णिमा’। ‘बड़े घर की बेटी’ और ‘पंच परमेश्वर’ की ही परम्परा की एक और अद्भुत कहानी ‘ईश्वरीय न्याय’ इस संग्रह में थी।&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद का स्वर्णिम युग==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की उपन्यास-कला का यह स्वर्ण युग था। सन 1931 के आरम्भ में ‘[[ग़बन]]’ प्रकाशित हुआ था। [[16 अप्रॅल]], [[1931]] को प्रेमचंद ने अपनी एक और महान रचना, ‘[[कर्मभूमि]]’ शुरू की। यह अगस्त, 1932 में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद के पत्रों के अनुसार सन 1932 में ही वह अपना अन्तिम महान उपन्यास, ‘[[गोदान]]’ लिखने में लग गये थे, यद्यपि ‘हंस’ और ‘जागरण’ से सम्बंधित अनेक कठिनाइयों के कारण इसका प्रकाशन जून, 1936 में ही सम्भव हो सका। अपनी अन्तिम बीमारी के दिनों में उन्होंने एक और उपन्यास, ‘मंगलसूत्र’, लिखना शुरू किया था, किन्तु अकाल मृत्यु के कारण यह अपूर्ण रह गया। '''‘ग़बन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’- उपन्यासत्रयी पर विश्व के किसी भी कृतिकार को गर्व हो सकता है। ‘कर्मभूमि’ अपनी क्रांतिकारी चेतना के कारण विशेष महत्त्वपूर्ण है'''। लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में अध्यक्ष-पद से भाषण देते हुए [[जवाहरलाल नेहरू]] ने घोषित किया था। ‘मैं गणतंत्रवादी और समाजवादी हूँ।’ कर्मभूमि इस अशान्त काल की प्रतिध्वनियों से भरा हुआ उपन्यास है। गोर्की के उपन्यास, ‘माँ’ के समान ही यह उपन्यास भी क्रान्ति की कला पर लगभग एक प्रबंध-ग्रन्थ है। यह उपन्यास अद्भुत पात्रों की एक सम्पूर्ण श्रंखला प्रस्तुत करता ह। अमर कांत, समरकान्त, सक़ीना, सुखदा, पठानिन, मुन्नी। अमरकान्त और समरकान्त पाठकों को पिता और पुत्र, नेहरू-द्वय का स्मरण दिलाते हैं। मुन्नी, पठानिन, सक़ीना और लाला समरकान्त सभी की परिणति घटनाओं द्वारा होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृतियाँ==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। उन्होंने [[उपन्यास]], कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की, किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं। उन्हें अपने जीवन काल में ही '''उपन्यास सम्राट''' की पदवी मिल गयी थी। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हज़ारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| width=100% class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+प्रेमचंद की प्रमुख कहानियाँ और उपन्यास &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;7&amp;quot;|प्रमुख कहानियाँ &lt;br /&gt;
! उपन्यास&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अंधेर&lt;br /&gt;
| अनाथ लड़की&lt;br /&gt;
| अपनी करनी&lt;br /&gt;
| अमृत&lt;br /&gt;
| अलग्योझा &lt;br /&gt;
| बाँका ज़मीदार &lt;br /&gt;
| बेटों वाली विधवा &lt;br /&gt;
| [[सेवासदन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आख़िरी तोहफ़ा &lt;br /&gt;
| आख़िरी मंज़िल &lt;br /&gt;
| आत्म-संगीत &lt;br /&gt;
| आत्माराम&lt;br /&gt;
| आधार&lt;br /&gt;
| बैंक का दिवाला &lt;br /&gt;
| बोहनी &lt;br /&gt;
| प्रेमाश्रम&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आल्हा &lt;br /&gt;
| इज्ज़त का ख़ून&lt;br /&gt;
| इस्तीफ़ा &lt;br /&gt;
| ईदगाह &lt;br /&gt;
| ईश्वरीय न्याय &lt;br /&gt;
| मैकू &lt;br /&gt;
| मंत्र &lt;br /&gt;
| रंगभूमि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उद्धार &lt;br /&gt;
| एक ऑंच की कसर&lt;br /&gt;
| एक्ट्रेस &lt;br /&gt;
| कप्तान साहब&lt;br /&gt;
| कर्मों का फल &lt;br /&gt;
| मंदिर और मस्जिद &lt;br /&gt;
| मनावन &lt;br /&gt;
| कायाकल्प&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कफ़न&lt;br /&gt;
| कवच &lt;br /&gt;
| क़ातिल &lt;br /&gt;
| कौशल &lt;br /&gt;
| ख़ुदी&lt;br /&gt;
| मुबारक बीमारी&lt;br /&gt;
| ममता &lt;br /&gt;
| वरदान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ग़ैरत की कटार &lt;br /&gt;
| गुल्ली डंडा&lt;br /&gt;
| घरजमाई &lt;br /&gt;
| स्‍वामिनी&lt;br /&gt;
| ज्योति &lt;br /&gt;
| माँ &lt;br /&gt;
| माता का हृदय&lt;br /&gt;
| [[निर्मला]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जेल &lt;br /&gt;
| जुलूस &lt;br /&gt;
| ठाकुर का कुआँ&lt;br /&gt;
| झाँकी&lt;br /&gt;
| तेंतर&lt;br /&gt;
| मिलाप &lt;br /&gt;
| मोटेराम जी शास्त्री &lt;br /&gt;
| [[ग़बन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| त्रिया चरित्र &lt;br /&gt;
| तांगेवाले की बड़&lt;br /&gt;
| दिल की रानी &lt;br /&gt;
| दण्ड &lt;br /&gt;
| दूसरी शादी &lt;br /&gt;
| र्स्वग की देवी &lt;br /&gt;
| राजहठ &lt;br /&gt;
| कर्मभूमि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दो सखियाँ &lt;br /&gt;
| नेउर मचंद&lt;br /&gt;
| नेकी &lt;br /&gt;
| नरक का मार्ग &lt;br /&gt;
| नैराश्य &lt;br /&gt;
| रामलीला &lt;br /&gt;
| राष्ट्र का सेवक &lt;br /&gt;
| [[गोदान]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नैराश्य लीला &lt;br /&gt;
| नशा &lt;br /&gt;
| नसीहतों का दफ्तर &lt;br /&gt;
| नागपूजा &lt;br /&gt;
| नादान दोस्त &lt;br /&gt;
| लैला &lt;br /&gt;
| वफ़ा का खंजर &lt;br /&gt;
| कृष्णा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| निर्वासन&lt;br /&gt;
| पंच परमेश्वर &lt;br /&gt;
| पत्नी से पति &lt;br /&gt;
| पुत्र-प्रेम &lt;br /&gt;
| पैपुजी &lt;br /&gt;
| वासना की कड़ियाँ &lt;br /&gt;
| विजय &lt;br /&gt;
| प्रतिज्ञा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रतिशोध &lt;br /&gt;
| प्रेम-सूत्र &lt;br /&gt;
| पर्वत-यात्रा &lt;br /&gt;
| प्रायश्चित &lt;br /&gt;
| परीक्षा &lt;br /&gt;
| विश्वास &lt;br /&gt;
| शंखनाद &lt;br /&gt;
| प्रतापचन्द्र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पूस की रात &lt;br /&gt;
| बड़े घर की बेटी &lt;br /&gt;
| बड़े बाबू &lt;br /&gt;
| बड़े भाई साहब &lt;br /&gt;
| बन्द दरवाज़ा &lt;br /&gt;
| शूद्र &lt;br /&gt;
| शराब की दुकान &lt;br /&gt;
| श्यामा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शांति &lt;br /&gt;
| शादी की वजह &lt;br /&gt;
| शोक का पुरस्कार &lt;br /&gt;
| स्त्री और पुरुष&lt;br /&gt;
| स्वर्ग की देवी &lt;br /&gt;
| स्वांग&lt;br /&gt;
| सभ्यता का रहस्य &lt;br /&gt;
| मंगलसूत्र (अपूर्ण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| समर यात्रा &lt;br /&gt;
| समस्या &lt;br /&gt;
| सैलानी बंदर  &lt;br /&gt;
| स्‍वामिनी &lt;br /&gt;
| सोहाग का शव &lt;br /&gt;
| सौत &lt;br /&gt;
| होली की छुट्टी&lt;br /&gt;
| असरारे मुआबिद (अपूर्ण)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद मुंशी कैसे बने==&lt;br /&gt;
सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के मूल नाम के साथ कभी-कभी कुछ उपनाम या विशेषण ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि साहित्यकार का मूल नाम तो पीछे रह जाता है और यह उपनाम या विशेषण इतने प्रसिद्ध हो जाते हैं कि उनके बिना कवि या रचनाकार का नाम अधूरा-सा लगने लगता है। साथ ही मूल नाम अपनी पहचान ही खोने लगता है। भारतीय जनमानस की संवेदना में बसे उपन्यास सम्राट 'प्रेमचंद' जी भी इस पारंपरिक तथ्य से अछूते नहीं रह सके। उनका नाम यदि मात्र प्रेमचंद लिया जाय तो अधूरा सा प्रतीत होता है। प्रेमचंद जी के नाम के साथ 'मुंशी' कब और कैसे जुड़ गया? इस विषय में अधिकांश लोग यही मान लेते हैं कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे। अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था। इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप 'मुंशी' शब्द लगाने की परम्परा रही है। संभवत: प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़कर रूढ़ हो गया। इस जिज्ञासा की पूर्ति हेतु प्रेमचंद जी के सुपुत्र एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री [[अमृत राय]] जी के अनुसार प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे 'मुंशी' शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा। यह तथ्य अनुमान पर आधारित है। यह बात सही है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है। यह भी सच है कि कायस्थों के नाम के आगे मुंशी लगाने की परम्परा रही है तथा अध्यापकों को भी 'मुंशी जी' कहा जाता था। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2005/premchand.htm |title=प्रेमचंद मुंशी कैसे बने |accessmonthday=[[29 अगस्त]] |accessyear=2010 |last= |first= |authorlink= |format=एचटीएम |publisher=अभिव्यक्ति |language=हिन्दी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==प्रेमचंद और सिनेमा==&lt;br /&gt;
{{highright}}साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की जो प्रोढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें सिनेमा में नहीं मिलती।{{highclose}}&lt;br /&gt;
प्रेमचंद ने ‘[[मज़दूर]]’ शीर्षक फ़िल्म के लिए संवाद लिखे। फ़िल्म के स्वामियों ने कहानी की रूपरेखा तैयार की थी। फ़िल्म में एक देश-प्रेमी मिल-मालिक की कथा थी, किन्तु सेंसर को यह भी सहन न हो सका। फिर भी फ़िल्म का प्रदर्शन [[पंजाब]], [[दिल्ली]], [[उत्तर प्रदेश]] और [[मध्य प्रदेश]] में हुआ। फ़िल्म का मज़दूरों पर इतना असर हुआ कि पुलिस बुलानी पड़ गई। अंत में फ़िल्म के प्रदर्शन पर [[भारत]] सरकार ने रोक लगा दी। इस फ़िल्म में प्रेमचंद स्वयं भी कुछ क्षण के लिए रजतपट पर अवतीर्ण हुए। मज़दूरों और मालिकों के बीच एक संघर्ष में वे पंच की भूमिका में आए थे।&lt;br /&gt;
एक लेख में प्रेमचंद ने [[सिनेमा]] की हालत पर अपना भरपूर रोष और असन्तोष व्यक्त किया है। वह साहित्य के ध्येय की तुलना करते हैं: &lt;br /&gt;
“साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की जो प्रोढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें वहाँ नहीं मिलती। उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना है, सुरुचि या सुन्दरता से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। व्यापार, व्यापार है। व्यापार में भावुकता आई और व्यापार नष्ट हुआ। वहाँ तो जनता की रुचि पर निगाह रखनी पड़ती है, और चाहे संसार का संचालन देवताओं के ही हाथों में क्यों न हो, मनुष्य पर निम्न मनोवृत्तियों ही का राज्य होता है। ... जिस शौक़ से लोग ताड़ी और शराब पीतें हैं, उसके आधे शौक़ से दूध नहीं पीते। इसकी दवा निर्माता के पास नहीं। जब तक एक चीज़ की मांग है, वह बाज़ार में आएगी। कोई उसे रोक नहीं सकता। अभी वह ज़माना बहुत दूर है, जब सिनेमा और साहित्य का एक रूप होगा। लोक-रुचि जब इतनी परिष्कृत हो जायगी कि वह नीचे ले जाने वाली चीज़ों से घृणा करेगी, तभी सिनेमा में साहित्य की सुरुचि दिखाई पड़ सकती है। ”&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=गुप्त |first=प्रकाशचन्द्र|title= प्रेमचंद भारतीय साहित्य के निर्माता |year=1984 |publisher=साहित्य अकादेमी|location=नई दिल्ली |id= |page=46-47 |accessday= 29|accessmonth=अगस्त|accessyear= 2010}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पुरस्कार और सम्मान==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Munshi-Premchand.jpg|thumb|प्रेमचंद के सम्मान में जारी डाक टिकट]]&lt;br /&gt;
मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया। प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने '''प्रेमचंद घर में''' नाम से उनकी जीवनी लिखी और उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया है, जिससे लोग अनभिज्ञ थे। उनके ही बेटे [[अमृत राय]] ने [[क़लम का सिपाही]] नाम से पिता की जीवनी लिखी है। उनकी सभी पुस्तकों के [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] व [[उर्दू भाषा|उर्दू]] रूपांतर तो हुए ही हैं, चीनी, रूसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में उनकी कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आलोचना==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की बढ़ती हुई ख्याति से कुछ व्यक्तियों के मन में बड़ी कुढ़न और ईर्ष्या हो रही थी। इनमें से एक, श्री अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद के विरुद्ध साहित्यिक चोरी का अभियोग लगाया और उनके विरुद्ध छ: महीने तक लेख लिखे। बीजगणित के मान्य फ़ार्मूलों से वे सिद्ध करते रहे कि—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क+ख+ग &amp;lt;big&amp;gt;/&amp;lt;/big&amp;gt; द = प+फ+ब &amp;lt;big&amp;gt;/&amp;lt;/big&amp;gt; घ &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यानी प्रेमचंद की 1/3 सोफ़िया थैकरे की ¼ अमीलिया का स्मरण दिलाती है। एक और असफल कथाकार ने आलोचक का बाना धारण करते हुए प्रेमचंद को ‘घृणा का प्रचारक’ कहा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
सन 1936 ई0 में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण [[8 अक्तूबर]] [[1936]] में इनका स्वर्गवास हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://shabdokiunjali.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
*[http://baljaihindi.blogspot.com/2009/05/blog-post_2397.html हमारे साहित्यकार - प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
*[http://gadyakosh.org/gk/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6 प्रेमचंद की कहानियाँ]&lt;br /&gt;
*[http://hindikechirag.blogspot.com/2008/09/blog-post_07.html उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 [[Category:उपन्यासकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्यकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pkumar8791</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=62498</id>
		<title>प्रेमचंद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=62498"/>
		<updated>2010-09-09T05:45:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pkumar8791: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Premchand.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=मुंशी प्रेमचंद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[31 जुलाई]], [[1880]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लमही गाँव, [[बनारस]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=मुंशी अजायब लाल और आनन्दी देवी&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=शिवरानी देवी&lt;br /&gt;
|संतान=अमृत राय और श्रीपत राय (पुत्र)&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=अध्यापक, लेखक, उपन्यासकार&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[8 अक्तूबर]] [[1936]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=[[ग़बन]], [[गोदान]] और [[बड़े घर की बेटी]]&lt;br /&gt;
|विषय=सामजिक&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम '''धनपत राय श्रीवास्तव''' था।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भारत]] के उपन्यास सम्राट '''मुंशी प्रेमचंद''' के युग का विस्तार सन 1880 से 1936 तक है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व का है। इस युग में भारत का स्वतंत्रता-संग्राम नई मंजिलों से गुज़रा। यह संघर्ष अधिक सशक्त और गहरा हुआ। प्रेमचंद का वास्तविक नाम '''धनपत राय श्रीवास्तव''' था। वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब [[हिन्दी]] में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं फिर भी इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=गुप्त |first=प्रकाशचन्द्र|title=प्रेमचंद भारतीय साहित्य के निर्माता |year=1984 |publisher=साहित्य अकादेमी|location=नई दिल्ली |id= |page= |accessday=21|accessmonth=अगस्त|accessyear=2010}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद का जन्म [[बनारस]] से लगभग चार मील दूर, लमही नाम के गाँव में [[31 जुलाई]], [[1880]] को हुआ। प्रेमचंद के पिताजी मुंशी अजायब लाल और माता आनन्दी देवी थीं। प्रेमचंद का बचपन गाँव में बीता था। वे नटखट और खिलाड़ी बालक थे और खेतों से शाक-सब्ज़ी और पेड़ों से फल चुराने में दक्ष थे। उन्हें मिठाई का बड़ा शौक़ था और विशेष रूप से गुड़ से उन्हें बहुत प्रेम था। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा लमही में हुई और एक मौलवी साहब से उन्होंने उर्दू और फ़ारसी पढ़ना सीखा। एक रुपया चुराने पर ‘बचपन’ में उन पर बुरी तरह मार पड़ी थी। उनकी कहानी, ‘कज़ाकी’, उनकी अपनी बाल-स्मृतियों पर आधारित है। कज़ाकी डाक-विभाग का हरकारा था और बड़ी लम्बी लम्बी यात्राएं करता था। वह बालक प्रेमचंद के लिए सदैव अपने साथ कुछ सौगात लाता था। कहानी में वह बच्चे के लिये हिरन का छौना लाता है और डाकघर में देरी से पहुंचने के कारण नौकरी से अलग कर दिया जाता है। हिरन के बच्चे के पीछे दौड़ते-दौड़ते वह अति विलम्ब से डाक घर लौटा था। कज़ाकी का व्यक्तित्व अतिशय मानवीयता में डूबा है। वह शालीनता और आत्मसम्मान का पुतला है, किन्तु मानवीय करुणा से उसका ह्रदय भरा है। &lt;br /&gt;
==पारिवारिक जीवन==&lt;br /&gt;
उनका कुल फटेहाल कायस्थों का था, जिनके पास क़रीब छै बीघे ज़मीन थी और जिनका परिवार बड़ा था। प्रेमचंद के पितामह, मुंशी गुरुसहाय लाल, पटवारी थे। उनके पिता, मुंशी अजायब लाल, डाकमुंशी थे और उनका वेतन लगभग पच्चीस रुपये मासिक था। उनकी मां, आनन्द देवी, सुन्दर सुशील और सुघड़ महिला थीं। छ: महीने की बीमारी के बाद प्रेमचंद की मां की मृत्यु हो गई। तब वे आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। दो वर्ष के बाद उनके पिता ने फिर विवाह कर लिया और उनके जीवन में विमाता का अवतरण हुआ। प्रेमचंद के इतिहास में विमाता के अनेक वर्णन हैं । यह स्पष्ट है कि प्रेमचंद के जीवन में मां के अभाव की पूर्ति विमाता द्वारा न हो सकी थी। जब प्रेमचंद पंद्रह वर्ष के थे, उनका विवाह हो गया। वह विवाह उनके सौतेले नाना ने तय किया था। उस काल के विवरण से लगता है कि लड़की न तो देखने में सुंदर थी, न वह स्वभाव से शीलवती थी। वह झगड़ालू भी थी। प्रेमचंद के कोमल मन का कल्पना-भवन मानो नींव रखते-रखते ही ढह गया। प्रेमचंद का यह पहला विवाह था। इस विवाह का टूटना आश्चर्य न था। प्रेमचंद की पत्नी के लिए यह विवाह एक दु:खद घटना रहा होगा। जीवन पर्यन्त यह उनका अभिशाप बन गया। इस सब का दोष भारत की परम्पराग्रस्त विवाह-प्रणाली पर है, जिसके कारण यह व्यवस्था आवश्यकता से भी अधिक जुए का खेल बन जाती है। प्रेमचंद ने निश्चय किया कि अपना दूसरा विवाह वे किसी विधवा कन्या से करेंगे। यह निश्चय उनके उच्च विचारों और आदर्शों के ही अनुरूप था। शिवरानी देवी बाल-विधवा थीं। उनके पिता [[फ़तेहपुर]] के पास के इलाक़े में एक साहसी ज़मीदार थे और शिवरानी जी के पुनर्विवाह के लिए उत्सुक थे। सन [[1916]] के आदिम युग में ऐसे विचार-मात्र की साहसिकता का अनुमान किया जा सकता है। इसी वर्ष प्रेमचंद का दूसरा विवाह संपन्न हुआ। शिवरानी जी की पुस्तक ‘प्रेमचंद-घर में’, प्रेमचंद के घरेलू जीवन का सजीव और अंतरंग चित्र प्रस्तुत करती है। प्रेमचंद अपने पिता की तरह पेचिश के शिकार थे और निरंतर पेट की व्याधियों से पीड़ित रहते थे। प्रेमचंद स्वभाव से सरल, आदर्शवादी व्यक्ति थे। वे सभी का विश्वास करते थे, किन्तु निरंतर उन्हें धोखा खाना पड़ा। उन्होंने अनेक लोगों को धन-राशि कर्ज़ दी, किन्तु बहुधा यह धन लौटा ही नहीं । शिवरानी देवी की दृष्टि कुछ अधिक सांसारिक और व्यवहार-कुशल थी। वे निरंतर प्रेमचंद की उदार-ह्रदयता पर ताने कसती थीं, क्योंकि अनेक बार कुपात्र ने ही इस उदारता का लाभ उठाया। प्रेमचंद स्वयं सम्पन्न न थे और अपनी उदारता के कारण अर्थ-संकट में फंस जाते थे। ‘ढपोरशंख’ शीर्षक कहानी में प्रेमचंद एक कपटी साहित्यिक द्वारा अपने ठगे जाने की मार्मिक कथा कहते हैं। &lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
ग़रीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में ही गाँव से दूर [[बनारस]] पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाना पड़ता था। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे, मगर ग़रीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर में एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रेमचन्द ने मैट्रिक पास किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साहित्यिक जीवन==&lt;br /&gt;
{{highright}}प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। उनका वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना आरम्भ किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें जीवन-पर्यन्त नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे।{{highclose}}&lt;br /&gt;
प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। उनका वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना आरम्भ किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें जीवन-पर्यन्त नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे। जब सरकार ने उनका पहला कहानी-संग्रह, ‘सोज़े वतन’ ज़ब्त किया, तब उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा। बाद का उनका अधिकतर साहित्य प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित हुआ। इसी काल में प्रेमचंद ने कथा-साहित्य बड़े मनोयोग से पढ़ना शुरू किया। एक तम्बाकू-विक्रेता की दुकान में उन्होंने कहानियों के अक्षय भण्डार, ‘तिलिस्मे होशरूबा’ का पाठ सुना। इस पौराणिक गाथा के लेखक फ़ैज़ी बताए जाते हैं, जिन्होंने [[अकबर]] के मनोरंजन के लिए ये कथाएं लिखी थीं। एक पूरे वर्ष प्रेमचंद ये कहानियां सुनते रहे और इन्हें सुनकर उनकी कल्पना को बड़ी उत्तेजना मिली। कथा साहित्य की अन्य अमूल्य कृतियां भी प्रेमचंद ने पढ़ीं। इनमें ‘सरशार’ की कृतियां और रेनाल्ड की ‘लन्दन-रहस्य’ भी थी। [[गोरखपुर]] में बुद्धिलाल नाम के पुस्तक-विक्रेता से उनकी मित्रता हुई। वे उनकी दुकान की कुंजियां स्कूल में बेचते थे और इसके बदले में वे कुछ [[उपन्यास]] अल्प काल के लिए पढ़ने को घर ले जा सकते थे। इस प्रकार उन्होंने दो-तीन वर्षों में सैकड़ों उपन्यास पढ़े होंगे। इस समय प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाकमुंशी की हैसियत से काम कर रहे थे। गोरखपुर मे ही प्रेमचंद ने अपनी सबसे पहली साहित्यिक कृति रची। यह रचना एक अविवाहित मामा से सम्बंधित प्रसहन था। मामा का प्रेम एक छोटी जाति की स्त्री से हो गया था। वे प्रेमचंद को उपन्यासों पर समय बर्बाद करने के लिए निरन्तर डांटते रहते थे। मामा की प्रेम-कथा को नाटक का रूप देकर प्रेमचंद ने उनसे बदला लिया। यह प्रथम रचना उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनके मामा ने क्रुद्ध होकर पांडुलिपि को अग्नि को समर्पित कर दिया। गोरखपुर में प्रेमचंद को एक नये मित्र महावीर प्रसाद पोद्दार मिले और इनसे परिचय के बाद प्रेमचंद और भी तेज़ी से हिन्दी की ओर झुके। उन्होंने हिन्दी में शेख़ सादी पर एक छोटी-सी पुस्तक लिखी थी, टॉल्सटॉय की कुछ कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया था और ‘प्रेम-पचीसी’ की कुछ कहानियों का रूपान्तर भी हिन्दी में कर रहे थे। ये कहानियां ‘सप्त-सरोज’ शीर्षक से हिन्दी संसार के सामने सर्वप्रथम सन 1917 में आयीं। ये सात कहानियां थीं:- &lt;br /&gt;
# बड़े घर की बेटी, &lt;br /&gt;
# सौत, &lt;br /&gt;
# सज्जनता का दण्ड, &lt;br /&gt;
# पंच परमेश्वर, &lt;br /&gt;
# नमक का दारोग़ा, &lt;br /&gt;
# उपदेश, &lt;br /&gt;
# परीक्षा। प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में इन कहानियों की गणना होती है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद के साहित्य की विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। अपनी कहानियों से प्रेमचंद मानव-स्वभाव की आधारभूत महत्ता पर बल देते हैं। '''‘बड़े घर की बेटी,’ आनन्दी, अपने देवर से अप्रसन्न हुई, क्योंकि वह गंवार उससे कर्कशता से बोलता है और उस पर खींचकर खड़ाऊं फेंकता है। जब उसे अनुभव होता है कि उनका परिवार टूट रहा है और उसका देवर परिताप से भरा है, तब वह उसे क्षमा कर देती है और अपने पति को शांत करती है'''। इसी प्रकार नमक का दारोग़ा बहुत ईमानदार व्यक्ति है। घूस देकर उसे बिगाड़ने में सभी असमर्थ हैं। सरकार उसे, सख्ती से उचित कार्यवाही करने के कारण, नौकरी से बर्खास्त कर देती है, किन्तु जिस सेठ की घूस उसने अस्वीकार की थी, वह उसे अपने यहां ऊंचे पद पर नियुक्त करता है। वह अपने यहाँ ईमानदार और कर्तव्यपरायण कर्मचारी रखना चाहता है। इस प्रकार प्रेमचंद के संसार में सत्कर्म का फल सुखद होता है। वास्तविक जीवन में ऐसी आश्चर्यप्रद घटनाएं कम घटती हैं। '''गाँव का पंच भी व्यक्तिगत विद्वेष और शिकायतों को भूलकर सच्चा न्याय करता है। उसकी आत्मा उसे इसी दिशा में ठेलती है। असंख्य भेदों, पूर्वाग्रहों, अन्धविश्वासों, जात-पांत के झगड़ों और हठधर्मियों से जर्जर ग्राम-समाज में भी ऐसा न्याय-धर्म कल्पनातीत लगता है'''। हिन्दी में प्रेमचंद की कहानियों का एक संग्रह [[बम्बई]] के एक सुप्रसिद्ध प्रकाशन गृह, हिन्दी ग्रन्थ-रत्नाकर ने प्रकाशित किया। यह संग्रह ‘नवनिधि’ शीर्षक से निकला और इसमें ‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारन्धा’ जैसी बुन्देल वीरता की सुप्रसिद्ध कहानियाँ शामिल थीं। इसके कुछ समय के बाद प्रेमचंद ने हिन्दी में कहानियों का एक और संग्रह प्रकाशित किया। इस संग्रह का शीर्षक था ‘प्रेम-पूर्णिमा’। ‘बड़े घर की बेटी’ और ‘पंच परमेश्वर’ की ही परम्परा की एक और अद्भुत कहानी ‘ईश्वरीय न्याय’ इस संग्रह में थी।&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद का स्वर्णिम युग==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की उपन्यास-कला का यह स्वर्ण युग था। सन 1931 के आरम्भ में ‘[[ग़बन]]’ प्रकाशित हुआ था। [[16 अप्रॅल]], [[1931]] को प्रेमचंद ने अपनी एक और महान रचना, ‘[[कर्मभूमि]]’ शुरू की। यह अगस्त, 1932 में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद के पत्रों के अनुसार सन 1932 में ही वह अपना अन्तिम महान उपन्यास, ‘[[गोदान]]’ लिखने में लग गये थे, यद्यपि ‘हंस’ और ‘जागरण’ से सम्बंधित अनेक कठिनाइयों के कारण इसका प्रकाशन जून, 1936 में ही सम्भव हो सका। अपनी अन्तिम बीमारी के दिनों में उन्होंने एक और उपन्यास, ‘मंगलसूत्र’, लिखना शुरू किया था, किन्तु अकाल मृत्यु के कारण यह अपूर्ण रह गया। '''‘ग़बन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’- उपन्यासत्रयी पर विश्व के किसी भी कृतिकार को गर्व हो सकता है। ‘कर्मभूमि’ अपनी क्रांतिकारी चेतना के कारण विशेष महत्त्वपूर्ण है'''। लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में अध्यक्ष-पद से भाषण देते हुए [[जवाहरलाल नेहरू]] ने घोषित किया था। ‘मैं गणतंत्रवादी और समाजवादी हूँ।’ कर्मभूमि इस अशान्त काल की प्रतिध्वनियों से भरा हुआ उपन्यास है। गोर्की के उपन्यास, ‘माँ’ के समान ही यह उपन्यास भी क्रान्ति की कला पर लगभग एक प्रबंध-ग्रन्थ है। यह उपन्यास अद्भुत पात्रों की एक सम्पूर्ण श्रंखला प्रस्तुत करता ह। अमर कांत, समरकान्त, सक़ीना, सुखदा, पठानिन, मुन्नी। अमरकान्त और समरकान्त पाठकों को पिता और पुत्र, नेहरू-द्वय का स्मरण दिलाते हैं। मुन्नी, पठानिन, सक़ीना और लाला समरकान्त सभी की परिणति घटनाओं द्वारा होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृतियाँ==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। उन्होंने [[उपन्यास]], कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की, किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं। उन्हें अपने जीवन काल में ही '''उपन्यास सम्राट''' की पदवी मिल गयी थी। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हज़ारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| width=100% class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+प्रेमचंद की प्रमुख कहानियाँ और उपन्यास &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;7&amp;quot;|प्रमुख कहानियाँ &lt;br /&gt;
! उपन्यास&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अंधेर&lt;br /&gt;
| अनाथ लड़की&lt;br /&gt;
| अपनी करनी&lt;br /&gt;
| अमृत&lt;br /&gt;
| अलग्योझा &lt;br /&gt;
| बाँका ज़मीदार &lt;br /&gt;
| बेटों वाली विधवा &lt;br /&gt;
| [[सेवासदन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आख़िरी तोहफ़ा &lt;br /&gt;
| आख़िरी मंज़िल &lt;br /&gt;
| आत्म-संगीत &lt;br /&gt;
| आत्माराम&lt;br /&gt;
| आधार&lt;br /&gt;
| बैंक का दिवाला &lt;br /&gt;
| बोहनी &lt;br /&gt;
| प्रेमाश्रम&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आल्हा &lt;br /&gt;
| इज्ज़त का ख़ून&lt;br /&gt;
| इस्तीफ़ा &lt;br /&gt;
| ईदगाह &lt;br /&gt;
| ईश्वरीय न्याय &lt;br /&gt;
| मैकू &lt;br /&gt;
| मंत्र &lt;br /&gt;
| रंगभूमि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उद्धार &lt;br /&gt;
| एक ऑंच की कसर&lt;br /&gt;
| एक्ट्रेस &lt;br /&gt;
| कप्तान साहब&lt;br /&gt;
| कर्मों का फल &lt;br /&gt;
| मंदिर और मस्जिद &lt;br /&gt;
| मनावन &lt;br /&gt;
| कायाकल्प&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कफ़न&lt;br /&gt;
| कवच &lt;br /&gt;
| क़ातिल &lt;br /&gt;
| कौशल &lt;br /&gt;
| ख़ुदी&lt;br /&gt;
| मुबारक बीमारी&lt;br /&gt;
| ममता &lt;br /&gt;
| वरदान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ग़ैरत की कटार &lt;br /&gt;
| गुल्ली डंडा&lt;br /&gt;
| घरजमाई &lt;br /&gt;
| स्‍वामिनी&lt;br /&gt;
| ज्योति &lt;br /&gt;
| माँ &lt;br /&gt;
| माता का हृदय&lt;br /&gt;
| [[निर्मला]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जेल &lt;br /&gt;
| जुलूस &lt;br /&gt;
| ठाकुर का कुआँ&lt;br /&gt;
| झाँकी&lt;br /&gt;
| तेंतर&lt;br /&gt;
| मिलाप &lt;br /&gt;
| मोटेराम जी शास्त्री &lt;br /&gt;
| [[ग़बन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| त्रिया चरित्र &lt;br /&gt;
| तांगेवाले की बड़&lt;br /&gt;
| दिल की रानी &lt;br /&gt;
| दण्ड &lt;br /&gt;
| दूसरी शादी &lt;br /&gt;
| र्स्वग की देवी &lt;br /&gt;
| राजहठ &lt;br /&gt;
| कर्मभूमि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दो सखियाँ &lt;br /&gt;
| नेउर मचंद&lt;br /&gt;
| नेकी &lt;br /&gt;
| नरक का मार्ग &lt;br /&gt;
| नैराश्य &lt;br /&gt;
| रामलीला &lt;br /&gt;
| राष्ट्र का सेवक &lt;br /&gt;
| [[गोदान]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नैराश्य लीला &lt;br /&gt;
| नशा &lt;br /&gt;
| नसीहतों का दफ्तर &lt;br /&gt;
| नागपूजा &lt;br /&gt;
| नादान दोस्त &lt;br /&gt;
| लैला &lt;br /&gt;
| वफ़ा का खंजर &lt;br /&gt;
| कृष्णा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| निर्वासन&lt;br /&gt;
| पंच परमेश्वर &lt;br /&gt;
| पत्नी से पति &lt;br /&gt;
| पुत्र-प्रेम &lt;br /&gt;
| पैपुजी &lt;br /&gt;
| वासना की कड़ियाँ &lt;br /&gt;
| विजय &lt;br /&gt;
| प्रतिज्ञा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रतिशोध &lt;br /&gt;
| प्रेम-सूत्र &lt;br /&gt;
| पर्वत-यात्रा &lt;br /&gt;
| प्रायश्चित &lt;br /&gt;
| परीक्षा &lt;br /&gt;
| विश्वास &lt;br /&gt;
| शंखनाद &lt;br /&gt;
| प्रतापचन्द्र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पूस की रात &lt;br /&gt;
| बड़े घर की बेटी &lt;br /&gt;
| बड़े बाबू &lt;br /&gt;
| बड़े भाई साहब &lt;br /&gt;
| बन्द दरवाज़ा &lt;br /&gt;
| शूद्र &lt;br /&gt;
| शराब की दुकान &lt;br /&gt;
| श्यामा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शांति &lt;br /&gt;
| शादी की वजह &lt;br /&gt;
| शोक का पुरस्कार &lt;br /&gt;
| स्त्री और पुरुष&lt;br /&gt;
| स्वर्ग की देवी &lt;br /&gt;
| स्वांग&lt;br /&gt;
| सभ्यता का रहस्य &lt;br /&gt;
| मंगलसूत्र (अपूर्ण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| समर यात्रा &lt;br /&gt;
| समस्या &lt;br /&gt;
| सैलानी बंदर  &lt;br /&gt;
| स्‍वामिनी &lt;br /&gt;
| सोहाग का शव &lt;br /&gt;
| सौत &lt;br /&gt;
| होली की छुट्टी&lt;br /&gt;
| असरारे मुआबिद (अपूर्ण)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद मुंशी कैसे बने==&lt;br /&gt;
सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के मूल नाम के साथ कभी-कभी कुछ उपनाम या विशेषण ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि साहित्यकार का मूल नाम तो पीछे रह जाता है और यह उपनाम या विशेषण इतने प्रसिद्ध हो जाते हैं कि उनके बिना कवि या रचनाकार का नाम अधूरा-सा लगने लगता है। साथ ही मूल नाम अपनी पहचान ही खोने लगता है। भारतीय जनमानस की संवेदना में बसे उपन्यास सम्राट 'प्रेमचंद' जी भी इस पारंपरिक तथ्य से अछूते नहीं रह सके। उनका नाम यदि मात्र प्रेमचंद लिया जाय तो अधूरा सा प्रतीत होता है। प्रेमचंद जी के नाम के साथ 'मुंशी' कब और कैसे जुड़ गया? इस विषय में अधिकांश लोग यही मान लेते हैं कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे। अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था। इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप 'मुंशी' शब्द लगाने की परम्परा रही है। संभवत: प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़कर रूढ़ हो गया। इस जिज्ञासा की पूर्ति हेतु प्रेमचंद जी के सुपुत्र एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री [[अमृत राय]] जी के अनुसार प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे 'मुंशी' शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा। यह तथ्य अनुमान पर आधारित है। यह बात सही है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है। यह भी सच है कि कायस्थों के नाम के आगे मुंशी लगाने की परम्परा रही है तथा अध्यापकों को भी 'मुंशी जी' कहा जाता था। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2005/premchand.htm |title=प्रेमचंद मुंशी कैसे बने |accessmonthday=[[29 अगस्त]] |accessyear=2010 |last= |first= |authorlink= |format=एचटीएम |publisher=अभिव्यक्ति |language=हिन्दी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==प्रेमचंद और सिनेमा==&lt;br /&gt;
{{highright}}साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की जो प्रोढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें सिनेमा में नहीं मिलती।{{highclose}}&lt;br /&gt;
प्रेमचंद ने ‘[[मज़दूर]]’ शीर्षक फ़िल्म के लिए संवाद लिखे। फ़िल्म के स्वामियों ने कहानी की रूपरेखा तैयार की थी। फ़िल्म में एक देश-प्रेमी मिल-मालिक की कथा थी, किन्तु सेंसर को यह भी सहन न हो सका। फिर भी फ़िल्म का प्रदर्शन [[पंजाब]], [[दिल्ली]], [[उत्तर प्रदेश]] और [[मध्य प्रदेश]] में हुआ। फ़िल्म का मज़दूरों पर इतना असर हुआ कि पुलिस बुलानी पड़ गई। अंत में फ़िल्म के प्रदर्शन पर [[भारत]] सरकार ने रोक लगा दी। इस फ़िल्म में प्रेमचंद स्वयं भी कुछ क्षण के लिए रजतपट पर अवतीर्ण हुए। मज़दूरों और मालिकों के बीच एक संघर्ष में वे पंच की भूमिका में आए थे।&lt;br /&gt;
एक लेख में प्रेमचंद ने [[सिनेमा]] की हालत पर अपना भरपूर रोष और असन्तोष व्यक्त किया है। वह साहित्य के ध्येय की तुलना करते हैं: &lt;br /&gt;
“साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की जो प्रोढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें वहाँ नहीं मिलती। उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना है, सुरुचि या सुन्दरता से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। व्यापार, व्यापार है। व्यापार में भावुकता आई और व्यापार नष्ट हुआ। वहाँ तो जनता की रुचि पर निगाह रखनी पड़ती है, और चाहे संसार का संचालन देवताओं के ही हाथों में क्यों न हो, मनुष्य पर निम्न मनोवृत्तियों ही का राज्य होता है। ... जिस शौक़ से लोग ताड़ी और शराब पीतें हैं, उसके आधे शौक़ से दूध नहीं पीते। इसकी दवा निर्माता के पास नहीं। जब तक एक चीज़ की मांग है, वह बाज़ार में आएगी। कोई उसे रोक नहीं सकता। अभी वह ज़माना बहुत दूर है, जब सिनेमा और साहित्य का एक रूप होगा। लोक-रुचि जब इतनी परिष्कृत हो जायगी कि वह नीचे ले जाने वाली चीज़ों से घृणा करेगी, तभी सिनेमा में साहित्य की सुरुचि दिखाई पड़ सकती है। ”&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=गुप्त |first=प्रकाशचन्द्र|title= प्रेमचंद भारतीय साहित्य के निर्माता |year=1984 |publisher=साहित्य अकादेमी|location=नई दिल्ली |id= |page=46-47 |accessday= 29|accessmonth=अगस्त|accessyear= 2010}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पुरस्कार और सम्मान==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Munshi-Premchand.jpg|thumb|प्रेमचंद के सम्मान में जारी डाक टिकट]]&lt;br /&gt;
मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया। प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने '''प्रेमचंद घर में''' नाम से उनकी जीवनी लिखी और उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया है, जिससे लोग अनभिज्ञ थे। उनके ही बेटे [[अमृत राय]] ने [[क़लम का सिपाही]] नाम से पिता की जीवनी लिखी है। उनकी सभी पुस्तकों के [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] व [[उर्दू भाषा|उर्दू]] रूपांतर तो हुए ही हैं, चीनी, रूसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में उनकी कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आलोचना==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की बढ़ती हुई ख्याति से कुछ व्यक्तियों के मन में बड़ी कुढ़न और ईर्ष्या हो रही थी। इनमें से एक, श्री अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद के विरुद्ध साहित्यिक चोरी का अभियोग लगाया और उनके विरुद्ध छ: महीने तक लेख लिखे। बीजगणित के मान्य फ़ार्मूलों से वे सिद्ध करते रहे कि—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क+ख+ग &amp;lt;big&amp;gt;/&amp;lt;/big&amp;gt; द = प+फ+ब &amp;lt;big&amp;gt;/&amp;lt;/big&amp;gt; घ &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यानी प्रेमचंद की 1/3 सोफ़िया थैकरे की ¼ अमीलिया का स्मरण दिलाती है। एक और असफल कथाकार ने आलोचक का बाना धारण करते हुए प्रेमचंद को ‘घृणा का प्रचारक’ कहा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
सन 1936 ई0 में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण [[8 अक्तूबर]] [[1936]] में इनका स्वर्गवास हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://shabdokiunjali.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
*[http://baljaihindi.blogspot.com/2009/05/blog-post_2397.html हमारे साहित्यकार - प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
*[http://gadyakosh.org/gk/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6 प्रेमचंद की कहानियाँ]&lt;br /&gt;
*[http://hindikechirag.blogspot.com/2008/09/blog-post_07.html उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 टीका टिप्पणी और संदर्भ&lt;br /&gt;
[[Category:उपन्यासकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्यकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pkumar8791</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=62488</id>
		<title>प्रेमचंद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=62488"/>
		<updated>2010-09-09T05:31:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pkumar8791: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Premchand.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=मुंशी प्रेमचंद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[31 जुलाई]], [[1880]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लमही गाँव, [[बनारस]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=मुंशी अजायब लाल और आनन्दी देवी&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=शिवरानी देवी&lt;br /&gt;
|संतान=अमृत राय और श्रीपत राय (पुत्र)&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=अध्यापक, लेखक, उपन्यासकार&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[8 अक्तूबर]] [[1936]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=[[ग़बन]], [[गोदान]] और [[बड़े घर की बेटी]]&lt;br /&gt;
|विषय=सामजिक&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरुस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम '''धनपत राय श्रीवास्तव''' था।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भारत]] के उपन्यास सम्राट '''मुंशी प्रेमचंद''' के युग का विस्तार सन 1880 से 1936 तक है। यह कालखण्ड भारत के इतिहास में बहुत महत्त्व का है। इस युग में भारत का स्वतंत्रता-संग्राम नई मंजिलों से गुज़रा। यह संघर्ष अधिक सशक्त और गहरा हुआ। प्रेमचंद का वास्तविक नाम '''धनपत राय श्रीवास्तव''' था। वे एक सफल लेखक, देशभक्त नागरिक, कुशल वक्ता, ज़िम्मेदार संपादक और संवेदनशील रचनाकार थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जब [[हिन्दी]] में काम करने की तकनीकी सुविधाएँ नहीं थीं फिर भी इतना काम करने वाला लेखक उनके सिवा कोई दूसरा नहीं हुआ। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=गुप्त |first=प्रकाशचन्द्र|title=प्रेमचंद भारतीय साहित्य के निर्माता |year=1984 |publisher=साहित्य अकादेमी|location=नई दिल्ली |id= |page= |accessday=21|accessmonth=अगस्त|accessyear=2010}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जन्म==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद का जन्म [[बनारस]] से लगभग चार मील दूर, लमही नाम के गाँव में [[31 जुलाई]], [[1880]] को हुआ। प्रेमचंद के पिताजी मुंशी अजायब लाल और माता आनन्दी देवी थीं। प्रेमचंद का बचपन गाँव में बीता था। वे नटखट और खिलाड़ी बालक थे और खेतों से शाक-सब्ज़ी और पेड़ों से फल चुराने में दक्ष थे। उन्हें मिठाई का बड़ा शौक़ था और विशेष रूप से गुड़ से उन्हें बहुत प्रेम था। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा लमही में हुई और एक मौलवी साहब से उन्होंने उर्दू और फ़ारसी पढ़ना सीखा। एक रुपया चुराने पर ‘बचपन’ में उन पर बुरी तरह मार पड़ी थी। उनकी कहानी, ‘कज़ाकी’, उनकी अपनी बाल-स्मृतियों पर आधारित है। कज़ाकी डाक-विभाग का हरकारा था और बड़ी लम्बी लम्बी यात्राएं करता था। वह बालक प्रेमचंद के लिए सदैव अपने साथ कुछ सौगात लाता था। कहानी में वह बच्चे के लिये हिरन का छौना लाता है और डाकघर में देरी से पहुंचने के कारण नौकरी से अलग कर दिया जाता है। हिरन के बच्चे के पीछे दौड़ते-दौड़ते वह अति विलम्ब से डाक घर लौटा था। कज़ाकी का व्यक्तित्व अतिशय मानवीयता में डूबा है। वह शालीनता और आत्मसम्मान का पुतला है, किन्तु मानवीय करुणा से उसका ह्रदय भरा है। &lt;br /&gt;
==पारिवारिक जीवन==&lt;br /&gt;
उनका कुल फटेहाल कायस्थों का था, जिनके पास क़रीब छै बीघे ज़मीन थी और जिनका परिवार बड़ा था। प्रेमचंद के पितामह, मुंशी गुरुसहाय लाल, पटवारी थे। उनके पिता, मुंशी अजायब लाल, डाकमुंशी थे और उनका वेतन लगभग पच्चीस रुपये मासिक था। उनकी मां, आनन्द देवी, सुन्दर सुशील और सुघड़ महिला थीं। छ: महीने की बीमारी के बाद प्रेमचंद की मां की मृत्यु हो गई। तब वे आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। दो वर्ष के बाद उनके पिता ने फिर विवाह कर लिया और उनके जीवन में विमाता का अवतरण हुआ। प्रेमचंद के इतिहास में विमाता के अनेक वर्णन हैं । यह स्पष्ट है कि प्रेमचंद के जीवन में मां के अभाव की पूर्ति विमाता द्वारा न हो सकी थी। जब प्रेमचंद पंद्रह वर्ष के थे, उनका विवाह हो गया। वह विवाह उनके सौतेले नाना ने तय किया था। उस काल के विवरण से लगता है कि लड़की न तो देखने में सुंदर थी, न वह स्वभाव से शीलवती थी। वह झगड़ालू भी थी। प्रेमचंद के कोमल मन का कल्पना-भवन मानो नींव रखते-रखते ही ढह गया। प्रेमचंद का यह पहला विवाह था। इस विवाह का टूटना आश्चर्य न था। प्रेमचंद की पत्नी के लिए यह विवाह एक दु:खद घटना रहा होगा। जीवन पर्यन्त यह उनका अभिशाप बन गया। इस सब का दोष भारत की परम्पराग्रस्त विवाह-प्रणाली पर है, जिसके कारण यह व्यवस्था आवश्यकता से भी अधिक जुए का खेल बन जाती है। प्रेमचंद ने निश्चय किया कि अपना दूसरा विवाह वे किसी विधवा कन्या से करेंगे। यह निश्चय उनके उच्च विचारों और आदर्शों के ही अनुरूप था। शिवरानी देवी बाल-विधवा थीं। उनके पिता [[फ़तेहपुर]] के पास के इलाक़े में एक साहसी ज़मीदार थे और शिवरानी जी के पुनर्विवाह के लिए उत्सुक थे। सन [[1916]] के आदिम युग में ऐसे विचार-मात्र की साहसिकता का अनुमान किया जा सकता है। इसी वर्ष प्रेमचंद का दूसरा विवाह संपन्न हुआ। शिवरानी जी की पुस्तक ‘प्रेमचंद-घर में’, प्रेमचंद के घरेलू जीवन का सजीव और अंतरंग चित्र प्रस्तुत करती है। प्रेमचंद अपने पिता की तरह पेचिश के शिकार थे और निरंतर पेट की व्याधियों से पीड़ित रहते थे। प्रेमचंद स्वभाव से सरल, आदर्शवादी व्यक्ति थे। वे सभी का विश्वास करते थे, किन्तु निरंतर उन्हें धोखा खाना पड़ा। उन्होंने अनेक लोगों को धन-राशि कर्ज़ दी, किन्तु बहुधा यह धन लौटा ही नहीं । शिवरानी देवी की दृष्टि कुछ अधिक सांसारिक और व्यवहार-कुशल थी। वे निरंतर प्रेमचंद की उदार-ह्रदयता पर ताने कसती थीं, क्योंकि अनेक बार कुपात्र ने ही इस उदारता का लाभ उठाया। प्रेमचंद स्वयं सम्पन्न न थे और अपनी उदारता के कारण अर्थ-संकट में फंस जाते थे। ‘ढपोरशंख’ शीर्षक कहानी में प्रेमचंद एक कपटी साहित्यिक द्वारा अपने ठगे जाने की मार्मिक कथा कहते हैं। &lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
ग़रीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में ही गाँव से दूर [[बनारस]] पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाना पड़ता था। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे, मगर ग़रीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर में एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रेमचन्द ने मैट्रिक पास किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साहित्यिक जीवन==&lt;br /&gt;
{{highright}}प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। उनका वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना आरम्भ किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें जीवन-पर्यन्त नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे।{{highclose}}&lt;br /&gt;
प्रेमचंद उनका साहित्यिक नाम था और बहुत वर्षों बाद उन्होंने यह नाम अपनाया था। उनका वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। जब उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए कहानी लिखना आरम्भ किया, तब उन्होंने नवाब राय नाम अपनाया। बहुत से मित्र उन्हें जीवन-पर्यन्त नवाब के नाम से ही सम्बोधित करते रहे। जब सरकार ने उनका पहला कहानी-संग्रह, ‘सोज़े वतन’ ज़ब्त किया, तब उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा। बाद का उनका अधिकतर साहित्य प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित हुआ। इसी काल में प्रेमचंद ने कथा-साहित्य बड़े मनोयोग से पढ़ना शुरू किया। एक तम्बाकू-विक्रेता की दुकान में उन्होंने कहानियों के अक्षय भण्डार, ‘तिलिस्मे होशरूबा’ का पाठ सुना। इस पौराणिक गाथा के लेखक फ़ैज़ी बताए जाते हैं, जिन्होंने [[अकबर]] के मनोरंजन के लिए ये कथाएं लिखी थीं। एक पूरे वर्ष प्रेमचंद ये कहानियां सुनते रहे और इन्हें सुनकर उनकी कल्पना को बड़ी उत्तेजना मिली। कथा साहित्य की अन्य अमूल्य कृतियां भी प्रेमचंद ने पढ़ीं। इनमें ‘सरशार’ की कृतियां और रेनाल्ड की ‘लन्दन-रहस्य’ भी थी। [[गोरखपुर]] में बुद्धिलाल नाम के पुस्तक-विक्रेता से उनकी मित्रता हुई। वे उनकी दुकान की कुंजियां स्कूल में बेचते थे और इसके बदले में वे कुछ [[उपन्यास]] अल्प काल के लिए पढ़ने को घर ले जा सकते थे। इस प्रकार उन्होंने दो-तीन वर्षों में सैकड़ों उपन्यास पढ़े होंगे। इस समय प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाकमुंशी की हैसियत से काम कर रहे थे। गोरखपुर मे ही प्रेमचंद ने अपनी सबसे पहली साहित्यिक कृति रची। यह रचना एक अविवाहित मामा से सम्बंधित प्रसहन था। मामा का प्रेम एक छोटी जाति की स्त्री से हो गया था। वे प्रेमचंद को उपन्यासों पर समय बर्बाद करने के लिए निरन्तर डांटते रहते थे। मामा की प्रेम-कथा को नाटक का रूप देकर प्रेमचंद ने उनसे बदला लिया। यह प्रथम रचना उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनके मामा ने क्रुद्ध होकर पांडुलिपि को अग्नि को समर्पित कर दिया। गोरखपुर में प्रेमचंद को एक नये मित्र महावीर प्रसाद पोद्दार मिले और इनसे परिचय के बाद प्रेमचंद और भी तेज़ी से हिन्दी की ओर झुके। उन्होंने हिन्दी में शेख़ सादी पर एक छोटी-सी पुस्तक लिखी थी, टॉल्सटॉय की कुछ कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया था और ‘प्रेम-पचीसी’ की कुछ कहानियों का रूपान्तर भी हिन्दी में कर रहे थे। ये कहानियां ‘सप्त-सरोज’ शीर्षक से हिन्दी संसार के सामने सर्वप्रथम सन 1917 में आयीं। ये सात कहानियां थीं:- &lt;br /&gt;
# बड़े घर की बेटी, &lt;br /&gt;
# सौत, &lt;br /&gt;
# सज्जनता का दण्ड, &lt;br /&gt;
# पंच परमेश्वर, &lt;br /&gt;
# नमक का दारोग़ा, &lt;br /&gt;
# उपदेश, &lt;br /&gt;
# परीक्षा। प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में इन कहानियों की गणना होती है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद के साहित्य की विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। अपनी कहानियों से प्रेमचंद मानव-स्वभाव की आधारभूत महत्ता पर बल देते हैं। '''‘बड़े घर की बेटी,’ आनन्दी, अपने देवर से अप्रसन्न हुई, क्योंकि वह गंवार उससे कर्कशता से बोलता है और उस पर खींचकर खड़ाऊं फेंकता है। जब उसे अनुभव होता है कि उनका परिवार टूट रहा है और उसका देवर परिताप से भरा है, तब वह उसे क्षमा कर देती है और अपने पति को शांत करती है'''। इसी प्रकार नमक का दारोग़ा बहुत ईमानदार व्यक्ति है। घूस देकर उसे बिगाड़ने में सभी असमर्थ हैं। सरकार उसे, सख्ती से उचित कार्यवाही करने के कारण, नौकरी से बर्खास्त कर देती है, किन्तु जिस सेठ की घूस उसने अस्वीकार की थी, वह उसे अपने यहां ऊंचे पद पर नियुक्त करता है। वह अपने यहाँ ईमानदार और कर्तव्यपरायण कर्मचारी रखना चाहता है। इस प्रकार प्रेमचंद के संसार में सत्कर्म का फल सुखद होता है। वास्तविक जीवन में ऐसी आश्चर्यप्रद घटनाएं कम घटती हैं। '''गाँव का पंच भी व्यक्तिगत विद्वेष और शिकायतों को भूलकर सच्चा न्याय करता है। उसकी आत्मा उसे इसी दिशा में ठेलती है। असंख्य भेदों, पूर्वाग्रहों, अन्धविश्वासों, जात-पांत के झगड़ों और हठधर्मियों से जर्जर ग्राम-समाज में भी ऐसा न्याय-धर्म कल्पनातीत लगता है'''। हिन्दी में प्रेमचंद की कहानियों का एक संग्रह [[बम्बई]] के एक सुप्रसिद्ध प्रकाशन गृह, हिन्दी ग्रन्थ-रत्नाकर ने प्रकाशित किया। यह संग्रह ‘नवनिधि’ शीर्षक से निकला और इसमें ‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारन्धा’ जैसी बुन्देल वीरता की सुप्रसिद्ध कहानियाँ शामिल थीं। इसके कुछ समय के बाद प्रेमचंद ने हिन्दी में कहानियों का एक और संग्रह प्रकाशित किया। इस संग्रह का शीर्षक था ‘प्रेम-पूर्णिमा’। ‘बड़े घर की बेटी’ और ‘पंच परमेश्वर’ की ही परम्परा की एक और अद्भुत कहानी ‘ईश्वरीय न्याय’ इस संग्रह में थी।&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद का स्वर्णिम युग==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की उपन्यास-कला का यह स्वर्ण युग था। सन 1931 के आरम्भ में ‘[[ग़बन]]’ प्रकाशित हुआ था। [[16 अप्रॅल]], [[1931]] को प्रेमचंद ने अपनी एक और महान रचना, ‘[[कर्मभूमि]]’ शुरू की। यह अगस्त, 1932 में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद के पत्रों के अनुसार सन 1932 में ही वह अपना अन्तिम महान उपन्यास, ‘[[गोदान]]’ लिखने में लग गये थे, यद्यपि ‘हंस’ और ‘जागरण’ से सम्बंधित अनेक कठिनाइयों के कारण इसका प्रकाशन जून, 1936 में ही सम्भव हो सका। अपनी अन्तिम बीमारी के दिनों में उन्होंने एक और उपन्यास, ‘मंगलसूत्र’, लिखना शुरू किया था, किन्तु अकाल मृत्यु के कारण यह अपूर्ण रह गया। '''‘ग़बन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’- उपन्यासत्रयी पर विश्व के किसी भी कृतिकार को गर्व हो सकता है। ‘कर्मभूमि’ अपनी क्रांतिकारी चेतना के कारण विशेष महत्त्वपूर्ण है'''। लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में अध्यक्ष-पद से भाषण देते हुए [[जवाहरलाल नेहरू]] ने घोषित किया था। ‘मैं गणतंत्रवादी और समाजवादी हूँ।’ कर्मभूमि इस अशान्त काल की प्रतिध्वनियों से भरा हुआ उपन्यास है। गोर्की के उपन्यास, ‘माँ’ के समान ही यह उपन्यास भी क्रान्ति की कला पर लगभग एक प्रबंध-ग्रन्थ है। यह उपन्यास अद्भुत पात्रों की एक सम्पूर्ण श्रंखला प्रस्तुत करता ह। अमर कांत, समरकान्त, सक़ीना, सुखदा, पठानिन, मुन्नी। अमरकान्त और समरकान्त पाठकों को पिता और पुत्र, नेहरू-द्वय का स्मरण दिलाते हैं। मुन्नी, पठानिन, सक़ीना और लाला समरकान्त सभी की परिणति घटनाओं द्वारा होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृतियाँ==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। उन्होंने [[उपन्यास]], कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की, किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं। उन्हें अपने जीवन काल में ही '''उपन्यास सम्राट''' की पदवी मिल गयी थी। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हज़ारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| width=100% class=&amp;quot;wikitable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+प्रेमचंद की प्रमुख कहानियाँ और उपन्यास &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;7&amp;quot;|प्रमुख कहानियाँ &lt;br /&gt;
! उपन्यास&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अंधेर&lt;br /&gt;
| अनाथ लड़की&lt;br /&gt;
| अपनी करनी&lt;br /&gt;
| अमृत&lt;br /&gt;
| अलग्योझा &lt;br /&gt;
| बाँका ज़मीदार &lt;br /&gt;
| बेटों वाली विधवा &lt;br /&gt;
| [[सेवासदन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आख़िरी तोहफ़ा &lt;br /&gt;
| आख़िरी मंज़िल &lt;br /&gt;
| आत्म-संगीत &lt;br /&gt;
| आत्माराम&lt;br /&gt;
| आधार&lt;br /&gt;
| बैंक का दिवाला &lt;br /&gt;
| बोहनी &lt;br /&gt;
| प्रेमाश्रम&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आल्हा &lt;br /&gt;
| इज्ज़त का ख़ून&lt;br /&gt;
| इस्तीफ़ा &lt;br /&gt;
| ईदगाह &lt;br /&gt;
| ईश्वरीय न्याय &lt;br /&gt;
| मैकू &lt;br /&gt;
| मंत्र &lt;br /&gt;
| रंगभूमि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उद्धार &lt;br /&gt;
| एक ऑंच की कसर&lt;br /&gt;
| एक्ट्रेस &lt;br /&gt;
| कप्तान साहब&lt;br /&gt;
| कर्मों का फल &lt;br /&gt;
| मंदिर और मस्जिद &lt;br /&gt;
| मनावन &lt;br /&gt;
| कायाकल्प&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कफ़न&lt;br /&gt;
| कवच &lt;br /&gt;
| क़ातिल &lt;br /&gt;
| कौशल &lt;br /&gt;
| ख़ुदी&lt;br /&gt;
| मुबारक बीमारी&lt;br /&gt;
| ममता &lt;br /&gt;
| वरदान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ग़ैरत की कटार &lt;br /&gt;
| गुल्ली डंडा&lt;br /&gt;
| घरजमाई &lt;br /&gt;
| स्‍वामिनी&lt;br /&gt;
| ज्योति &lt;br /&gt;
| माँ &lt;br /&gt;
| माता का हृदय&lt;br /&gt;
| [[निर्मला]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जेल &lt;br /&gt;
| जुलूस &lt;br /&gt;
| ठाकुर का कुआँ&lt;br /&gt;
| झाँकी&lt;br /&gt;
| तेंतर&lt;br /&gt;
| मिलाप &lt;br /&gt;
| मोटेराम जी शास्त्री &lt;br /&gt;
| [[ग़बन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| त्रिया चरित्र &lt;br /&gt;
| तांगेवाले की बड़&lt;br /&gt;
| दिल की रानी &lt;br /&gt;
| दण्ड &lt;br /&gt;
| दूसरी शादी &lt;br /&gt;
| र्स्वग की देवी &lt;br /&gt;
| राजहठ &lt;br /&gt;
| कर्मभूमि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दो सखियाँ &lt;br /&gt;
| नेउर मचंद&lt;br /&gt;
| नेकी &lt;br /&gt;
| नरक का मार्ग &lt;br /&gt;
| नैराश्य &lt;br /&gt;
| रामलीला &lt;br /&gt;
| राष्ट्र का सेवक &lt;br /&gt;
| [[गोदान]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नैराश्य लीला &lt;br /&gt;
| नशा &lt;br /&gt;
| नसीहतों का दफ्तर &lt;br /&gt;
| नागपूजा &lt;br /&gt;
| नादान दोस्त &lt;br /&gt;
| लैला &lt;br /&gt;
| वफ़ा का खंजर &lt;br /&gt;
| कृष्णा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| निर्वासन&lt;br /&gt;
| पंच परमेश्वर &lt;br /&gt;
| पत्नी से पति &lt;br /&gt;
| पुत्र-प्रेम &lt;br /&gt;
| पैपुजी &lt;br /&gt;
| वासना की कड़ियाँ &lt;br /&gt;
| विजय &lt;br /&gt;
| प्रतिज्ञा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रतिशोध &lt;br /&gt;
| प्रेम-सूत्र &lt;br /&gt;
| पर्वत-यात्रा &lt;br /&gt;
| प्रायश्चित &lt;br /&gt;
| परीक्षा &lt;br /&gt;
| विश्वास &lt;br /&gt;
| शंखनाद &lt;br /&gt;
| प्रतापचन्द्र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पूस की रात &lt;br /&gt;
| बड़े घर की बेटी &lt;br /&gt;
| बड़े बाबू &lt;br /&gt;
| बड़े भाई साहब &lt;br /&gt;
| बन्द दरवाज़ा &lt;br /&gt;
| शूद्र &lt;br /&gt;
| शराब की दुकान &lt;br /&gt;
| श्यामा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शांति &lt;br /&gt;
| शादी की वजह &lt;br /&gt;
| शोक का पुरस्कार &lt;br /&gt;
| स्त्री और पुरुष&lt;br /&gt;
| स्वर्ग की देवी &lt;br /&gt;
| स्वांग&lt;br /&gt;
| सभ्यता का रहस्य &lt;br /&gt;
| मंगलसूत्र (अपूर्ण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| समर यात्रा &lt;br /&gt;
| समस्या &lt;br /&gt;
| सैलानी बंदर  &lt;br /&gt;
| स्‍वामिनी &lt;br /&gt;
| सोहाग का शव &lt;br /&gt;
| सौत &lt;br /&gt;
| होली की छुट्टी&lt;br /&gt;
| असरारे मुआबिद (अपूर्ण)&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रेमचंद मुंशी कैसे बने==&lt;br /&gt;
सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के मूल नाम के साथ कभी-कभी कुछ उपनाम या विशेषण ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि साहित्यकार का मूल नाम तो पीछे रह जाता है और यह उपनाम या विशेषण इतने प्रसिद्ध हो जाते हैं कि उनके बिना कवि या रचनाकार का नाम अधूरा-सा लगने लगता है। साथ ही मूल नाम अपनी पहचान ही खोने लगता है। भारतीय जनमानस की संवेदना में बसे उपन्यास सम्राट 'प्रेमचंद' जी भी इस पारंपरिक तथ्य से अछूते नहीं रह सके। उनका नाम यदि मात्र प्रेमचंद लिया जाय तो अधूरा सा प्रतीत होता है। प्रेमचंद जी के नाम के साथ 'मुंशी' कब और कैसे जुड़ गया? इस विषय में अधिकांश लोग यही मान लेते हैं कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे। अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था। इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप 'मुंशी' शब्द लगाने की परम्परा रही है। संभवत: प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़कर रूढ़ हो गया। इस जिज्ञासा की पूर्ति हेतु प्रेमचंद जी के सुपुत्र एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री [[अमृत राय]] जी के अनुसार प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे 'मुंशी' शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा। यह तथ्य अनुमान पर आधारित है। यह बात सही है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है। यह भी सच है कि कायस्थों के नाम के आगे मुंशी लगाने की परम्परा रही है तथा अध्यापकों को भी 'मुंशी जी' कहा जाता था। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2005/premchand.htm |title=प्रेमचंद मुंशी कैसे बने |accessmonthday=[[29 अगस्त]] |accessyear=2010 |last= |first= |authorlink= |format=एचटीएम |publisher=अभिव्यक्ति |language=हिन्दी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==प्रेमचंद और सिनेमा==&lt;br /&gt;
{{highright}}साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की जो प्रोढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें सिनेमा में नहीं मिलती।{{highclose}}&lt;br /&gt;
प्रेमचंद ने ‘[[मज़दूर]]’ शीर्षक फ़िल्म के लिए संवाद लिखे। फ़िल्म के स्वामियों ने कहानी की रूपरेखा तैयार की थी। फ़िल्म में एक देश-प्रेमी मिल-मालिक की कथा थी, किन्तु सेंसर को यह भी सहन न हो सका। फिर भी फ़िल्म का प्रदर्शन [[पंजाब]], [[दिल्ली]], [[उत्तर प्रदेश]] और [[मध्य प्रदेश]] में हुआ। फ़िल्म का मज़दूरों पर इतना असर हुआ कि पुलिस बुलानी पड़ गई। अंत में फ़िल्म के प्रदर्शन पर [[भारत]] सरकार ने रोक लगा दी। इस फ़िल्म में प्रेमचंद स्वयं भी कुछ क्षण के लिए रजतपट पर अवतीर्ण हुए। मज़दूरों और मालिकों के बीच एक संघर्ष में वे पंच की भूमिका में आए थे।&lt;br /&gt;
एक लेख में प्रेमचंद ने [[सिनेमा]] की हालत पर अपना भरपूर रोष और असन्तोष व्यक्त किया है। वह साहित्य के ध्येय की तुलना करते हैं: &lt;br /&gt;
“साहित्य के भावों की जो उच्चता, भाषा की जो प्रोढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमें वहाँ नहीं मिलती। उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना है, सुरुचि या सुन्दरता से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। व्यापार, व्यापार है। व्यापार में भावुकता आई और व्यापार नष्ट हुआ। वहाँ तो जनता की रुचि पर निगाह रखनी पड़ती है, और चाहे संसार का संचालन देवताओं के ही हाथों में क्यों न हो, मनुष्य पर निम्न मनोवृत्तियों ही का राज्य होता है। ... जिस शौक़ से लोग ताड़ी और शराब पीतें हैं, उसके आधे शौक़ से दूध नहीं पीते। इसकी दवा निर्माता के पास नहीं। जब तक एक चीज़ की मांग है, वह बाज़ार में आएगी। कोई उसे रोक नहीं सकता। अभी वह ज़माना बहुत दूर है, जब सिनेमा और साहित्य का एक रूप होगा। लोक-रुचि जब इतनी परिष्कृत हो जायगी कि वह नीचे ले जाने वाली चीज़ों से घृणा करेगी, तभी सिनेमा में साहित्य की सुरुचि दिखाई पड़ सकती है। ”&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=गुप्त |first=प्रकाशचन्द्र|title= प्रेमचंद भारतीय साहित्य के निर्माता |year=1984 |publisher=साहित्य अकादेमी|location=नई दिल्ली |id= |page=46-47 |accessday= 29|accessmonth=अगस्त|accessyear= 2010}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पुरस्कार और सम्मान==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Munshi-Premchand.jpg|thumb|प्रेमचंद के सम्मान में जारी डाक टिकट]]&lt;br /&gt;
मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया। प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने '''प्रेमचंद घर में''' नाम से उनकी जीवनी लिखी और उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया है, जिससे लोग अनभिज्ञ थे। उनके ही बेटे [[अमृत राय]] ने [[क़लम का सिपाही]] नाम से पिता की जीवनी लिखी है। उनकी सभी पुस्तकों के [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] व [[उर्दू भाषा|उर्दू]] रूपांतर तो हुए ही हैं, चीनी, रूसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में उनकी कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आलोचना==&lt;br /&gt;
प्रेमचंद की बढ़ती हुई ख्याति से कुछ व्यक्तियों के मन में बड़ी कुढ़न और ईर्ष्या हो रही थी। इनमें से एक, श्री अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद के विरुद्ध साहित्यिक चोरी का अभियोग लगाया और उनके विरुद्ध छ: महीने तक लेख लिखे। बीजगणित के मान्य फ़ार्मूलों से वे सिद्ध करते रहे कि—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क+ख+ग &amp;lt;big&amp;gt;/&amp;lt;/big&amp;gt; द = प+फ+ब &amp;lt;big&amp;gt;/&amp;lt;/big&amp;gt; घ &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यानी प्रेमचंद की 1/3 सोफ़िया थैकरे की ¼ अमीलिया का स्मरण दिलाती है। एक और असफल कथाकार ने आलोचक का बाना धारण करते हुए प्रेमचंद को ‘घृणा का प्रचारक’ कहा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
सन 1936 ई0 में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण [[8 अक्तूबर]] [[1936]] में इनका स्वर्गवास हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://shabdokiunjali.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
*[http://baljaihindi.blogspot.com/2009/05/blog-post_2397.html हमारे साहित्यकार - प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
*[http://gadyakosh.org/gk/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6 प्रेमचंद की कहानियाँ]&lt;br /&gt;
[http://hindikechirag.blogspot.com/2008/09/blog-post_07.html उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[Category:उपन्यासकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्यकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pkumar8791</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:Pkumar8791&amp;diff=62475</id>
		<title>सदस्य:Pkumar8791</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:Pkumar8791&amp;diff=62475"/>
		<updated>2010-09-09T02:19:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pkumar8791: 'Category:पाठCategory:पाठ' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:पाठ]][[Category:पाठ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pkumar8791</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A4%BF&amp;diff=62474</id>
		<title>कृषि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A4%BF&amp;diff=62474"/>
		<updated>2010-09-09T02:08:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Pkumar8791: /* भारतीय कृषि की विशेषताएँ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कृषि'''  खेती और वानिकी के माध्यम से खाद्य और अन्य सामान के उत्पादन से सम्बंधित व्यवसाय है। इसने [[सभ्यता|सभ्यताओं]] के उदय और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। खेती में [[पशुपालन]], [[जंतु पालन]] का भी योगदान है। पौधों को उगाने तथा खाद्यान्न जुटाने के लिए इस व्यवसाय की विकास हुआ। बागबानी भी कृषि का ही एक रूप है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तकनीकों और जानकारियो की बहुत सी श्रेणियाँ कृषि के अर्न्तगत आती है, इसमें वे तरीके शामिल हैं जिनसे पौधे उगाने के लिए उपयुक्त भूमि का विस्तार किया जाता है, इसके लिए पानी के चैनल खोदे जाते हैं और सिंचाई के अन्य रूपों का उपयोग किया जाता है। कृषि योग्य भूमि पर फसलों को उगाना और चरागाहों और पर पशुधन को गड़रियों के द्वारा चराया जाना मुख्यतः कृषि से सम्बंधित कार्य हैं। कृषि के भिन्न रूपों की पहचान करना व उनका विकास करना पिछली शताब्दी में विचार के मुख्य मुद्दे बन गए हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों एवं प्रयासों से कृषि को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में गरिमापूर्ण दर्जा मिला है। कृषि क्षेत्रों में लगभग 64% श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है। 1950-51 में कुल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 59.2% था जो घटकर 1982-83 में 36.4% और 1990-91 में 34.9% तथा 2001-2002 में 25% रह गया। यह 2006-07 की अवधि के दौरान औसत आधार पर घटकर 18.5% रह गया। दसवीं योजना (2002-2007) के दौरान समग्र सकल घरेलू उत्पाद की औसत वार्षिक वृद्धि पद 7.6% थी जबकि इस दौरान कृषि तथा सम्बद्ध क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर 2.3% रही। 2001-02 से प्रारंभ हुई नव सहस्त्राब्दी के प्रथम 6 वर्षों में 3.0% की वार्षिक सामान्य औसत वृद्धि दर 2003-04 में 10% और 2005-06 में 6% की रही। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश में राष्ट्रीय आय का लगभग 28% कृषि से प्राप्त होता है। लगभग 70% जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। देश से होने वाले निर्यातों का बड़ा हिस्सा भी कृषि से ही आता है। ग़ैर कृषि-क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में उपभोक्ता वस्तुएं एवं बहुतायत उद्योगों को कच्चा माल इसी क्षेत्र द्वारा भेजा जाता है। &lt;br /&gt;
{{कृषि सूची1}}&lt;br /&gt;
भारत में पाँचवें दशक के शुरुआती वर्षों में अनाज की प्रति व्यक्ति दैनिक उपलब्धता 395 ग्राम थी, जो 1990-91 में बढ़कर 468 ग्राम, 1996-97 में 528.77 ग्राम, 1999-2000 में 467 ग्राम, 2000-01 में 455 ग्राम, 2001-02 में 416 ग्राम, 2002-03 में 494 ग्राम और 2003-04 में 436 ग्राम तक पहुँच गई। वर्ष 2005-06 में यह उपलब्धता प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 412 ग्राम हो गई। विश्व में सबसे अधिक क्षेत्रों में दलहनी खेती करने वाला देश भी भारत ही है। इसके बावजूद प्रति व्यक्ति दाल की दैनिक उपलब्धता संतोषजनक नहीं रही है। इसमें सामान्यत: प्रति वर्ष गिरावट दर्ज़ की गई है। वर्ष 1951 में दाल की प्रति व्यक्ति दैनिक उपलब्धता 60.7 ग्राम थी वही यह 1961 में 69.0 ग्राम, 1971 में 51.2 ग्राम, 1981 में 37.5 ग्राम, 1991 में 41.6 ग्राम और 2001 में 30.0 ग्राम हो गई। वर्ष 2005 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दाल की निवल उपलब्ध मात्रा 31.5 ग्राम तथा 2005-06 के दौरान 33 ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति हो गई। भारत में ही सर्वप्रथम कपास का संकर बीज तैयार किया गया है। विभिन्न कृषि क्षेत्रों में आधुनिकतम एवं उपयुक्त प्रौद्योगिकी का विकास करने में भी भारतीय वैज्ञानिकों ने सफलता अर्जित की है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़सल-चक्र विविधतापूर्ण हो गया है। हरित क्रान्ति के शुरू होने के बाद के समय में 1967-68 से 2005-06 तक कृषि उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर लगभग 2.45% रही। 1964-65 में खाद्यान्न उत्पादन 890 लाख टन से बढ़कर 1999-2000 में 2098 लाख टन, 2000-01 में 1968 लाख टन, 2001-02 में 2119 लाख टन, 2002-03 में 1748 लाख टन, 2003-04 में 2132 लाख टन, 2004-05 में 1984 लाख टन और 2005-06 में 2086 लाख टन हो गया जबकि 2006-07 के दौरान 2173 लाख खाद्यान्न उत्पांदन संभावित है। फ़सल-चक्र में परिवर्तन के परिणामस्वरूप सूरजमुखी, सोयाबीन तथा गर्मियों में होने वाली मूँगफली जैसी ग़ैर परम्परागत फ़सलों का महत्व बढ़ता जा रहा है। 1970-71 में कृषि उत्पादन सूचकांक 85.9 था। यह सूचकांक 1980-81 के सूचकांक 102.1 और 1990-91 के सूचकांक 148.4 से बढ़कर 2001-2002 में 178.8, 2002-03 में 150.4, 2003-04 में 182.8, 2004-05 में 177.3 और 2005-06 में यह सूचकांक 191.6 हो गया जबकि 2006-07 में यह सूचकांक 197.1 संभावित है। इसका मुख्य कारण चावल, गेहूँ, दाल, तिलहन, गन्ना तथा अन्य नक़दी फ़सलों की पैदावार में वृद्धि रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में मुख्य रूप से तीन फ़सलों बोई जाती है- यथा ख़रीफ़, रबी एवं गर्मी (ज़ायद)। ख़रीफ़ की फ़सल में मुख्य रूप से मक्का, ज्वार, बाजरा, धान, मूँगफली, सोयाबीन, अरहर आदि हैं। रबी की मुख्य फ़सलों में गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, तोरिया आदि है। गर्मी की फ़सलों में मुख्य रूप से सब्ज़ियाँ ही बोई जाती है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 3287.3 लाख हेक्टेयर का 93.1% खेती के प्रयोग में लिया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृषि एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें उत्पादन के बहुत से कारक हैं जिन पर कृषक या वैज्ञानिकों का कोई वश नहीं चलता हे। इस तरह के कारकों में जलवायु सबसे महत्वपूर्ण कारक है। विभिन्न स्थानों पर सामान्य मौसम-चक्र के अतिरिक्त भी कब मौसम कैसा हो जाएगा कोई पता नहीं। इसके अलावा फ़सलें जलवायु के अनुसार बदली जाती हैं न कि फ़सल के अनुसार जलवायु को। अतएव किसी स्थान पर कौन सी फसल के अनुसार जलवायु को। अतएव किसी स्थान पर कौन सी फ़सल बोई जाय यह वहाँ की जलवायु, मृदा, ऊँचाई, वर्षा आदि पर निर्भर करती हे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;भारतीय कृषि की विशेषताएँ&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार हैं-&lt;br /&gt;
# भारतीय कृषि का अधिकांश भाग सिचाई के लिए मानसून पर निर्भर करता है। &lt;br /&gt;
# भारतीय कृषि की महत्वपूर्ण विशेषता जोत इकाइयों की अधिकता एवं उनके आकार का कम होना है। &lt;br /&gt;
# भारतीय कृषि में जोत के अन्तर्गत कुल क्षेत्रफल खण्डों में विभक्त है तथा सभी खण्ड दूरी पर स्थित हैं। &lt;br /&gt;
# भूमि पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जनसंख्या का अधिक भार है।&lt;br /&gt;
# कृषि उत्पादन मुख्यतया प्रकृति पर निर्भर रहता है। &lt;br /&gt;
# भारतीय कृषक गरीबी के कारण खेती में पूँजी निवेश कम करता है। &lt;br /&gt;
# खाद्यान्न उत्पादन को प्राथमिकता दी जाती है। &lt;br /&gt;
# कृषि जीविकोपार्जन की साधन मानी जाती हें &lt;br /&gt;
# भारतीय कृषि में अधिकांश कृषि कार्य पशुओं पर निर्भर करता है। &lt;br /&gt;
# भारत की प्रचलित भूमिकिर प्रणाली भी दोषयुक्त है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;भूमि उपयोग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
भारत में भूमि उपयोग में विविधता देखने को मिलती है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 3287.3 लाख हेक्टेयर में से 1950-51 में 404.8 लाख हेक्टेयर भूमि पर वन थे। 1998-99 में यह क्षेत्र बढ़कर 689.7 लाख हेक्टेयर और 2000-01 में 694-07 लाख हेक्टेयर हो गया। इसी अवधि में बुआई वाली भूमि 1,187.5 लाख हेक्टेयर से बढ़कर क्रमश: 1,426 लाख हेक्टेयर और 1,411.01 लाख हेक्टेयर हो गई। फ़सलों के प्रकार की दृष्टि से अगर देखा जाये तो कृषि वाले कुल क्षेत्रों में गैर-खाद्यान्न की अपेक्षा खाद्यान्न की कृषि अधिक होती रही है, किन्तु खाद्यान्न की कृषि जो 1950-51 में 76.7% भूमि पर हो रही थी, वह 1998-99 के दौरान घटकर 65.6% रह गई। कृषि गणना के अनुसार बड़ी जोत (10 हेक्टेयर और इससे अधिक) के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र 1985-86 में 20.1% की अपेक्षा 1990-91 में घटकर 17.3% रह गया है। इसी प्रकार सीमांत जोत (1 हेक्टेयर से कम की जोत) के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र 1985-86 में 13.4% से बढ़कर 1990-91 में 15% हो गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;भारतीय कृषि के प्रकार&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय कृषि अनेक विविधताओं के युक्त है। जलवायविक भिन्नता, मिट्टी की उर्वरता, परिवर्तनशील मौसम, खेती करने के ढंग आदि से भारतीय कृषि प्रभावित है। उत्पादन की मात्रा तथा कृषि ढंग के आधार पर भारत की कृषि को शुद्ध और संकर कृषि के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। शुद्ध कृषि मूलत: परंपरागत प्रकार की कृषि है जिसके द्वारा कृषकों की केवल मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो पाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सस्य विज्ञान&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सस्य विज्ञान (Agronomy) कृषि की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत फसल उत्पादन तथा भूमि प्रबन्ध के सिद्धान्तों और कृषि क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। &lt;br /&gt;
फसलों का महत्व- पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं की जीवन परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से वनस्पतियों पर निर्भर करता है। वनस्पति से जीव-जन्तुओं को भोजन तथा आक्सीजन के अलावा जनसंख्या हेतु वस्त्र, आवास एवं दवाओं आदि की पूर्ति भी की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;फ़सलों का वर्गीकरण&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
*जीवन चक्र के अनुसार वर्गीकरण&lt;br /&gt;
#एक वर्षी- ये फ़सलें अपना जीवन चक्र एक वर्ष अथवा इससे कम समय में पूरा करती है, जैसे – धान, गेहूँ, जौ, चना, सोयाबीन आदि। &lt;br /&gt;
#द्विवर्षी- ऐसे पौधों में पहले वर्ष वानस्पतिक वृद्धि होती है और दूसरे वर्ष उनमें फूल तथा बीज बनते हैं। यानी वे अपना जीवन चक्र दो वर्षों में पूरा करते हैं। यथा चुकन्दर, गन्ना आदि। &lt;br /&gt;
#बहुवर्षी- ऐसे पौधे अनेक वर्षों तक जीवित रहते हैं। परन्तु इनके जीवन चक्र में प्रतिवर्ष या एक वर्ष के अन्तराल पर फूल और फल आते हैं और जीवन चक्र पूरा हो जाता है। जैसे- लूसर्न, नेपियर घास। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*ऋतुओं के आधार पर वर्गीकरण&lt;br /&gt;
# ख़रीफ़- इन फसलों को बोते समय अधिक तापमान एवं आर्द्रता तथा पकते समय शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है। उत्तर भारत में इनको जून-जुलाई में बोते हैं। धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूँग, मूँगफली, गन्ना आदि इस ऋतु की प्रमुख फ़सलें हैं। ख़रीफ़ की फ़सलें C3  श्रेणी में आती हैं। इस श्रेणी के पौधे में जल उपयोग क्षमता और प्रकाश संश्लेषण पर दोनों ही अधिक होती है जबकि प्रकाश-श्वसन दर कम होती है। &lt;br /&gt;
# रबी-  इन फ़सलों को बोआई के सयम कम तापमान तथा पकते समय शुष्क और गर्म वातावरण की आवश्यकता होती है। ये फ़सलें सामान्यत: अक्टूबर-नवम्बर के महीनों में बोई जाती हैं। गेहूँ, जौ, चना, मसूर, सरसों, बरसीम आदि इस वर्ग की प्रमुख फसलें हैं। रबी फसलें, C4 श्रेणी में आती हैं। इस श्रेणी के पौधे की विशेषता है कि इनमें जल उपयोग क्षमता एवं प्रकाश-संश्लेषण दर दोनों ही कम होती है। इस प्रकार, इन पौधों में दिन के प्रकाश में भी श्वसन एवं प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया संपन्न होती है। &lt;br /&gt;
# ज़ायद- इस वर्ग की फ़सलों में तेज गर्मी और शुष्क हवाएं सहन करने की अच्छी क्षमता होती है। उत्तर भारत में ये फसलें मुख्यत: मार्च-अप्रैल में बोई जाती हैं। तरबूज, ककड़ी, खीरा आदि इस वर्ग की प्रमुख फ़सलें हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति               &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी: कृषि]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pkumar8791</name></author>
	</entry>
</feed>