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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
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		<title>परशुराम</title>
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		<updated>2011-06-16T06:56:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Gopaljirai: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Parashurama.jpg|thumb|परशुराम&amp;lt;br /&amp;gt; Parashurama]]&lt;br /&gt;
राजा प्रसेनजित की पुत्री [[रेणुका]] और भृगुवंशीय [[जमदग्नि]] के पुत्र, [[विष्णु के अवतार]] परशुराम [[शिव]] के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष [[फरसा अस्त्र|परशु]] प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु [[शंकर]] द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये '''परशुराम''' कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार, जो [[वामन अवतार|वामन]] एवं [[राम|रामचन्द्र]] के मध्य में गिने जाता है। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये 'जामदग्न्य' भी कहे जाते हैं। इनका जन्म [[अक्षय तृतीया]], [[वैशाख]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[तृतीया]] को हुआ था। अत: इस दिन व्रत करने और उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था। परशुराम ने शस्त्र विद्या [[द्रोणाचार्य]] से सीखी थी।&lt;br /&gt;
==मातृ-पितृ भक्त परशुराम==&lt;br /&gt;
उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदान स्वरूप उनका जीवित होना माँगा।&lt;br /&gt;
==पिता से प्राप्त वरदान==&lt;br /&gt;
परशुराम के पिता ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी तैयार न हुआ। अत: जमदग्नि ने सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर माता का शीश काट डाला। पिता ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान माँगे-&lt;br /&gt;
#माँ पुनर्जीवित हो जायँ, &lt;br /&gt;
#उन्हें मरने की स्मृति न रहे, &lt;br /&gt;
#भाई चेतना-युक्त हो जायँ और &lt;br /&gt;
#मैं परमायु होऊँ। &lt;br /&gt;
जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिये। &lt;br /&gt;
{{tocright}} &lt;br /&gt;
==क्रोधी स्वभाव==&lt;br /&gt;
*[[दुर्वासा]] की भाँति ये भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात है। एक बार कार्त्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था, जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्त्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] को क्षत्रिय-विहीन कर दिया (हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियाँ जीवित रहीं और नई पीढ़ी को जन्म दिया) और पाँच झीलों को रक्त से भर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया।&lt;br /&gt;
*रामावतार में [[राम|रामचन्द्र]] द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आये थे। इन्होंने परीक्षा के लिए उनका धनुष रामचन्द्र को दिया। जब राम ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गये कि रामचन्द्र [[विष्णु]] के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गये। 'कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपति गए बनहि तप हेतु॥' यह वर्णन 'राम चरितमानस', प्रथम सोपान में 267 से 284 दोहे तक मिलता है। &lt;br /&gt;
==राम के पराक्रम की परीक्षा==&lt;br /&gt;
राम का पराक्रम सुनकर वे [[अयोध्या]] गये। [[दशरथ]] ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया।&lt;br /&gt;
==परशुराम कुंड==&lt;br /&gt;
[[असम]] राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहाँ [[ब्रह्मपुत्र नदी]] [[भारत]] में प्रवेश करती है, वहीं '''परशुराम कुण्ड''' है, जहाँ तप करके उन्होंने शिवजी से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसर्जित भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थान में पाँच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जायेंगे। &lt;br /&gt;
==रामकथा में परशुराम==&lt;br /&gt;
चारों पुत्रों के विवाह के उपरान्त राजा [[दशरथ]] अपनी विशाल सेना और पुत्रों के साथ [[अयोध्या]] पुरी के लिये चल पड़े। मार्ग में अत्यन्त क्रुद्ध तेजस्वी महात्मा परशुराम मिले। उन्होंने [[राम]] से कहा कि वे उसकी पराक्रम गाथा सुन चुके हैं, पर राम उनके हाथ का धनुष चढ़ाकर दिखाएँ। तदुपरान्त उनके पराक्रम से संतुष्ट होकर वे राम को द्वंद्व युद्ध के लिए आमंत्रित करेंगे। दशरथ अनेक प्रयत्नों के उपरान्त भी ब्राह्मणदेव परशुराम को शान्त नहीं कर पाये। परशुराम ने बतलाया कि 'विश्वकर्मा ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दो धनुषों का निर्माण किया था। उनमें से एक तो देवताओं ने [[शिव]] को अर्पित कर दिया था और दूसरा [[विष्णु]] को। एक बार देवताओं के यह पूछने पर कि शिव और विष्णु में कौन बलबान है, कौन निर्बल- [[ब्रह्मा]] ने मतभेद स्थापित कर दिया। फलस्वरूप विष्णु की धनुष टंकार के सम्मुख शिव धनुष शिथिल पड़ गया था, अतः पराक्रम की वास्तविक परीक्षा इसी धनुष से हो सकती है। शान्त होने पर शिव ने अपना धनुष विदेह वंशज देवरात को और विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को धरोहर के रूप में दिया था, जो कि मेरे पास सुरक्षित है।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राम ने क्रुद्ध होकर उनके हाथ से धनुष बाण लेकर चढ़ा दिया और बोले - 'विष्णुबाण व्यर्थ नहीं जा सकता। अब इसका प्रयोग कहाँ पर किया जाये।' परशुराम का बल तत्काल लुप्त हो गया। उनके कथनानुसार राम ने बाण का प्रयोग परशुराम के तपोबल से जीते हुए अनेक लोकों पर किया, जो कि नष्ट हो गये। परशुराम ने कहा - 'हे राम, आप निश्चय ही साक्षात विष्णु हैं।' तथा परशुराम ने महेन्द्र पर्वत के लिए प्रस्थान किया। राम आदि [[अयोध्या]] की ओर बढ़े। उन्होंने यह धनुष [[वरुण देवता|वरुण देव]] को दे दिया। परशुराम की छोड़ी हुई सेना ने भी राम आदि के साथ प्रस्थान किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा: पिता का आदेश==&lt;br /&gt;
नारायण ने ही भृगुवंश में परशुराम रूप में अवतार धारण किया था। उन्होंने जंभासुर का मस्तक विदीर्ण किया। शतदुंदभि को मारा। उन्होंने युद्ध में हैहयराज अर्जुन को मारा तथा केवल धनुष की सहायता से [[सरस्वती नदी]] के तट पर हज़ारों ब्राह्मण वेशी क्षत्रियों को मार डाला। एक बार [[कार्तवीर्य अर्जुन]] ने बाणों से समुद्र को त्रस्त कर किसी परम वीर के विषय में पूछा। समुद्र ने उसे परशुराम से लड़ने को कहा। परशुराम को उसने अपने व्यवहार से बहुत रुष्ट कर दिया। अतः परशुराम ने उसकी हज़ार भुजाएँ काट डालीं। अनेक क्षत्रिय युद्ध के लिए आ जुटे। परशुराम क्षत्रियों से रुष्ट हो गये, अतः उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर डाला। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे सौ वर्षों तक सौम नामक विमान पर बैठे हुए [[शाल्व]] से युद्ध करते रहे किंतु गीत गीत गाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों के मुंह से यह सुनकर कि शाल्व का वध प्रद्युम्न और साँब को साथ लेकर विष्णु करेंगे, उन्हें विश्वास हो गया, अतः वे तभी से वन में जाकर अपने [[अस्त्र शस्त्र]] इत्यादि पानी में डुबोकर [[कृष्ण|कृष्णावतार]] की प्रतीक्षा में तपस्या करने लगे। &lt;br /&gt;
==परशुराम और यज्ञ==&lt;br /&gt;
परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवायी थी। महर्षि [[कश्यप]] ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र पीछे हटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राम और परशुराम==&lt;br /&gt;
भृगुनंदन परशुराम क्षत्रियों का नाश करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। दशरथ पुत्र राम का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गये। दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया। &lt;br /&gt;
==गाधि और ऋचीक==&lt;br /&gt;
गाधि नामक महाबली राजा अपने राज्य का परित्याग करके वन में चले गये। वहाँ उनकी एक पुत्री हुई जिसका वरण ऋचीक नामक मुनि ने किया। गाधि ने ऋचीक से कहा कि कन्या की याचना करते हुए उनके कुल में एक सहस्र पांडुबर्णी अश्व, जिनके कान एक ओर से काल हों, शुल्क स्वरूप दिये जाते हैं, अतः वे शर्ते पूरी करें। ऋचीक ने वरुण देवता से उस प्रकार के एक सहस्र घोड़े प्राप्त कर शुल्कस्वरूप प्रदान किये। गाधि की सत्यवती नामक पुत्री का विवाह ऋतीक से हुआ। &lt;br /&gt;
==जन्म कथा==&lt;br /&gt;
[[भृगु]] ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनसे सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र जन्म की कामना की। भृगु ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेडत्र तथा उसकी माता [[पीपल]] के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए—&lt;br /&gt;
#रुमण्वान, &lt;br /&gt;
#सुषेण, &lt;br /&gt;
#वसु, &lt;br /&gt;
#विश्वावसु तथा &lt;br /&gt;
#पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था। वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था। एक बार सद्यस्नाता रेणुका राजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गयी। उसके आश्रम पहुँचने पर मुनि को दिव्य ज्ञान से समस्त घटना ज्ञात हो गयी। उन्होंने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चार बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उसे वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम से कहा कि वो अमर रहेगा। एक दिन जब परशुराम बाहर गये थे तो कार्तवीर्य अर्जुन उनकी कुटिया पर आये। युद्ध के मद में उन्होंने रेणुका का अपमान किया तथा उसके बछड़ों का हरण करक चले गये। गाय रंभाती रह गयी। परशुराम को मालूम पड़ा तो क्रुद्ध होकर उन्होंने [[कार्तवीर्य अर्जुन|सहस्रबाहु हैहयराज]]  को मार डाला। हैहयराज के पुत्र ने आश्रम पर धावा बोला तथा परशुराम की अनुपस्थिति में मुनि जमदग्नि को मार डाला। परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए तथा पृथ्वी का क्षत्रियहीन करने का संकल्प किया। अतः परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों का संहार किया। समंत पंचक क्षेत्र में पाँच रुधिर के कुंड भर दिये। क्षत्रियों के रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा: शिव द्वारा दिव्यास्त्र==&lt;br /&gt;
बड़े होने पर परशुराम ने शिवाराधन किया। उस नियम का पालन करते हुए उन्होंने शिव को प्रसन्न कर लिया। शिव ने उन्हें दैत्यों का हनन करने की आज्ञा दी। परशुराम ने शत्रुओं से युद्ध किया तथा उनका वध किया। किंतु इस प्रक्रिया में परशुराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया। [[शिव]] ने प्रसन्न होकर कहा कि शरीर पर जितने प्रहार हुए हैं, उतना ही अधिक देवदत्व उन्हें प्राप्त होगा। वे मानवेतर होते जायेंगे। तदुपरान्त शिव ने परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किये, जिनमें से परशुराम ने [[कर्ण]] पर प्रसन्न होकर उसे दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जमदग्नि ऋषि ने रेणुका के गर्भ से अनेक पुत्र प्राप्त किए। उनमें सबसे छोटे परशुराम थे। उन दिनों हैहयवंश का अधिपति अर्जुन था। उसने [[विष्णु]] के अंशावतार दत्तात्रेय के वरदान से एक सहस्र भुजाएँ प्राप्त की थीं। एक बार [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] में स्नान करते हुए मदोन्मत्त हैहयराज ने अपनी बाँहों से नदी का वेग रोक लिया, फलतः उसकी धारा उल्टी बहने लगी, जिससे [[रावण]] का शिविर पानी में डूबने लगा। दशानन ने अर्जुन के पास जाकर उसे भला-बुरा कहा तो उसने रावण को पकड़कर कैद कर लिया। [[पुलस्त्य]] के कहने पर उसने रावण को मुक्त कर दिया। एक बार वह वन में जमदग्नि के आश्रम पर पहुँचा। जमदग्नि के पास कामधेनु थी। अतः वे अपरिमित वैभव क भोक्ता थे। ऐसा देखकर हैहयराज सहस्र बाहु अर्जुन ने कामधेनु का अपहरण कर लिया। परशुराम ने फरसा उठाकर उसका पीछा किया तथा युद्ध में उसकी समस्त भुजाएँ तथा सिर काट डाले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीर्थाटन== &lt;br /&gt;
उसके दस हज़ार पुत्र भयभीत होकर भाग गये। कामधेनु सहित आश्रम लौटने पर पिता ने उन्हें तीर्थाटन कर अपने पाप धोने के लिए आज्ञा दी क्योंकि उनकी मति में ब्राह्मण का धर्म क्षमादान है। परशुराम ने वैसा ही किया। एक वर्ष तक तीर्थ करके वे वापस आये। उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ और सब भाइयों का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदानस्वरूप उन सबका जीवित होना माँगा, अतः सब पूर्ववत् जीवित तथा स्वस्थ हो गये। हैहयराज अर्जुन के पुत्र निरंतर बदला लेने का अवसर ढूँढते रहते थे। एक दिन पुत्रों की अनुपस्थिति में उन्होंने ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया। परशुराम ने उन सबको मारकर [[महिष्मति]] नगरी में उनके कटे सिरों से एक पर्वत का निर्माण किया। उन्होंने अपने पिता को निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया। वास्तव में परशुराम श्रीविष्णु के अंशावतार थे, जिन्होंने क्षत्रिय नाश के लिए ही जन्म लिया था। उन्होंने अपने पिता के धड़ को सिर से जोड़कर यजन द्वारा उन्हें स्मृति रूप सकल्पमय शरीर की प्राप्ति करवा दी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि2}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
{{दशावतार2}}&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि}}&lt;br /&gt;
{{दशावतार}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Gopaljirai</name></author>
	</entry>
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		<title>परशुराम</title>
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		<updated>2011-06-16T06:55:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Gopaljirai: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Parashurama.jpg|thumb|परशुराम&amp;lt;br /&amp;gt; Parashurama]]&lt;br /&gt;
राजा प्रसेनजित की पुत्री [[रेणुका]] और भृगुवंशीय [[जमदग्नि]] के पुत्र, [[विष्णु के अवतार]] परशुराम [[शिव]] के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष [[फरसा अस्त्र|परशु]] प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु [[शंकर]] द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये '''परशुराम''' कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार, जो [[वामन अवतार|वामन]] एवं [[राम|रामचन्द्र]] के मध्य में गिने जाता है। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये 'जामदग्न्य' भी कहे जाते हैं। इनका जन्म [[अक्षय तृतीया]], [[वैशाख]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[तृतीया]] को हुआ था। अत: इस दिन व्रत करने और उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था। परशुराम ने शस्त्र विद्या [[द्रोणाचार्य]] से सीखी थी।&lt;br /&gt;
==मातृ-पितृ भक्त परशुराम==&lt;br /&gt;
उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदान स्वरूप उनका जीवित होना माँगा।&lt;br /&gt;
==पिता से प्राप्त वरदान==&lt;br /&gt;
परशुराम के पिता ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी तैयार न हुआ। अत: जमदग्नि ने सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर माता का शीश काट डाला। पिता ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान माँगे-&lt;br /&gt;
#माँ पुनर्जीवित हो जायँ, &lt;br /&gt;
#उन्हें मरने की स्मृति न रहे, &lt;br /&gt;
#भाई चेतना-युक्त हो जायँ और &lt;br /&gt;
#मैं परमायु होऊँ। &lt;br /&gt;
जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिये। &lt;br /&gt;
{{tocright}} &lt;br /&gt;
==क्रोधी स्वभाव==&lt;br /&gt;
*[[दुर्वासा]] की भाँति ये भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात है। एक बार कार्त्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था, जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्त्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] को क्षत्रिय-विहीन कर दिया (हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियाँ जीवित रहीं और नई पीढ़ी को जन्म दिया) और पाँच झीलों को रक्त से भर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया।&lt;br /&gt;
*रामावतार में [[राम|रामचन्द्र]] द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आये थे। इन्होंने परीक्षा के लिए उनका धनुष रामचन्द्र को दिया। जब राम ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गये कि रामचन्द्र [[विष्णु]] के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गये। 'कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपति गए बनहि तप हेतु॥' यह वर्णन 'राम चरितमानस', प्रथम सोपान में 267 से 284 दोहे तक मिलता है। &lt;br /&gt;
==राम के पराक्रम की परीक्षा==&lt;br /&gt;
राम का पराक्रम सुनकर वे [[अयोध्या]] गये। [[दशरथ]] ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया।&lt;br /&gt;
==परशुराम कुंड==&lt;br /&gt;
[[असम]] राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहाँ [[ब्रह्मपुत्र नदी]] [[भारत]] में प्रवेश करती है, वहीं '''परशुराम कुण्ड''' है, जहाँ तप करके उन्होंने शिवजी से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसर्जित भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थान में पाँच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जायेंगे। &lt;br /&gt;
==रामकथा में परशुराम==&lt;br /&gt;
चारों पुत्रों के विवाह के उपरान्त राजा [[दशरथ]] अपनी विशाल सेना और पुत्रों के साथ [[अयोध्या]] पुरी के लिये चल पड़े। मार्ग में अत्यन्त क्रुद्ध तेजस्वी महात्मा परशुराम मिले। उन्होंने [[राम]] से कहा कि वे उसकी पराक्रम गाथा सुन चुके हैं, पर राम उनके हाथ का धनुष चढ़ाकर दिखाएँ। तदुपरान्त उनके पराक्रम से संतुष्ट होकर वे राम को द्वंद्व युद्ध के लिए आमंत्रित करेंगे। दशरथ अनेक प्रयत्नों के उपरान्त भी ब्राह्मणदेव परशुराम को शान्त नहीं कर पाये। परशुराम ने बतलाया कि 'विश्वकर्मा ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दो धनुषों का निर्माण किया था। उनमें से एक तो देवताओं ने [[शिव]] को अर्पित कर दिया था और दूसरा [[विष्णु]] को। एक बार देवताओं के यह पूछने पर कि शिव और विष्णु में कौन बलबान है, कौन निर्बल- [[ब्रह्मा]] ने मतभेद स्थापित कर दिया। फलस्वरूप विष्णु की धनुष टंकार के सम्मुख शिव धनुष शिथिल पड़ गया था, अतः पराक्रम की वास्तविक परीक्षा इसी धनुष से हो सकती है। शान्त होने पर शिव ने अपना धनुष विदेह वंशज देवरात को और विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को धरोहर के रूप में दिया था, जो कि मेरे पास सुरक्षित है।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राम ने क्रुद्ध होकर उनके हाथ से धनुष बाण लेकर चढ़ा दिया और बोले - 'विष्णुबाण व्यर्थ नहीं जा सकता। अब इसका प्रयोग कहाँ पर किया जाये।' परशुराम का बल तत्काल लुप्त हो गया। उनके कथनानुसार राम ने बाण का प्रयोग परशुराम के तपोबल से जीते हुए अनेक लोकों पर किया, जो कि नष्ट हो गये। परशुराम ने कहा - 'हे राम, आप निश्चय ही साक्षात विष्णु हैं।' तथा परशुराम ने महेन्द्र पर्वत के लिए प्रस्थान किया। राम आदि [[अयोध्या]] की ओर बढ़े। उन्होंने यह धनुष [[वरुण देवता|वरुण देव]] को दे दिया। परशुराम की छोड़ी हुई सेना ने भी राम आदि के साथ प्रस्थान किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा: पिता का आदेश==&lt;br /&gt;
नारायण ने ही भृगुवंश में परशुराम रूप में अवतार धारण किया था। उन्होंने जंभासुर का मस्तक विदीर्ण किया। शतदुंदभि को मारा। उन्होंने युद्ध में हैहयराज अर्जुन को मारा तथा केवल धनुष की सहायता से [[सरस्वती नदी]] के तट पर हज़ारों ब्राह्मण वेशी क्षत्रियों को मार डाला। एक बार [[कार्तवीर्य अर्जुन]] ने बाणों से समुद्र को त्रस्त कर किसी परम वीर के विषय में पूछा। समुद्र ने उसे परशुराम से लड़ने को कहा। परशुराम को उसने अपने व्यवहार से बहुत रुष्ट कर दिया। अतः परशुराम ने उसकी हज़ार भुजाएँ काट डालीं। अनेक क्षत्रिय युद्ध के लिए आ जुटे। परशुराम क्षत्रियों से रुष्ट हो गये, अतः उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर डाला। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे सौ वर्षों तक सौम नामक विमान पर बैठे हुए [[शाल्व]] से युद्ध करते रहे किंतु गीत गीत गाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों के मुंह से यह सुनकर कि शाल्व का वध प्रद्युम्न और साँब को साथ लेकर विष्णु करेंगे, उन्हें विश्वास हो गया, अतः वे तभी से वन में जाकर अपने [[अस्त्र शस्त्र]] इत्यादि पानी में डुबोकर [[कृष्ण|कृष्णावतार]] की प्रतीक्षा में तपस्या करने लगे। &lt;br /&gt;
==परशुराम और यज्ञ==&lt;br /&gt;
परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवायी थी। महर्षि [[कश्यप]] ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र पीछे हटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राम और परशुराम==&lt;br /&gt;
भृगुनंदन परशुराम क्षत्रियों का नाश करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। दशरथ पुत्र राम का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गये। दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया। &lt;br /&gt;
==गाधि और ऋचीक==&lt;br /&gt;
गाधि नामक महाबली राजा अपने राज्य का परित्याग करके वन में चले गये। वहाँ उनकी एक पुत्री हुई जिसका वरण ऋचीक नामक मुनि ने किया। गाधि ने ऋचीक से कहा कि कन्या की याचना करते हुए उनके कुल में एक सहस्र पांडुबर्णी अश्व, जिनके कान एक ओर से काल हों, शुल्क स्वरूप दिये जाते हैं, अतः वे शर्ते पूरी करें। ऋचीक ने वरुण देवता से उस प्रकार के एक सहस्र घोड़े प्राप्त कर शुल्कस्वरूप प्रदान किये। गाधि की सत्यवती नामक पुत्री का विवाह ऋतीक से हुआ। &lt;br /&gt;
==जन्म कथा==&lt;br /&gt;
[[भृगु]] ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनसे सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र जन्म की कामना की। भृगु ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेडत्र तथा उसकी माता [[पीपल]] के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए—&lt;br /&gt;
#रुमण्वान, &lt;br /&gt;
#सुषेण, &lt;br /&gt;
#वसु, &lt;br /&gt;
#विश्वावसु तथा &lt;br /&gt;
#पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था। वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था। एक बार सद्यस्नाता रेणुका राजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गयी। उसके आश्रम पहुँचने पर मुनि को दिव्य ज्ञान से समस्त घटना ज्ञात हो गयी। उन्होंने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चार बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उसे वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम से कहा कि वो अमर रहेगा। एक दिन जब परशुराम बाहर गये थे तो कार्तवीर्य अर्जुन उनकी कुटिया पर आये। युद्ध के मद में उन्होंने रेणुका का अपमान किया तथा उसके बछड़ों का हरण करक चले गये। गाय रंभाती रह गयी। परशुराम को मालूम पड़ा तो क्रुद्ध होकर उन्होंने [[कार्तवीर्य अर्जुन|सहस्रबाहु हैहयराज]]  को मार डाला। हैहयराज के पुत्र ने आश्रम पर धावा बोला तथा परशुराम की अनुपस्थिति में मुनि जमदग्नि को मार डाला। परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए तथा पृथ्वी का क्षत्रियहीन करने का संकल्प किया। अतः परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों का संहार किया। समंत पंचक क्षेत्र में पाँच रुधिर के कुंड भर दिये। क्षत्रियों के रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा: शिव द्वारा दिव्यास्त्र==&lt;br /&gt;
बड़े होने पर परशुराम ने शिवाराधन किया। उस नियम का पालन करते हुए उन्होंने शिव को प्रसन्न कर लिया। शिव ने उन्हें दैत्यों का हनन करने की आज्ञा दी। परशुराम ने शत्रुओं से युद्ध किया तथा उनका वध किया। किंतु इस प्रक्रिया में परशुराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया। [[शिव]] ने प्रसन्न होकर कहा कि शरीर पर जितने प्रहार हुए हैं, उतना ही अधिक देवदत्व उन्हें प्राप्त होगा। वे मानवेतर होते जायेंगे। तदुपरान्त शिव ने परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किये, जिनमें से परशुराम ने [[कर्ण]] पर प्रसन्न होकर उसे दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जमदग्नि ऋषि ने रेणुका के गर्भ से अनेक पुत्र प्राप्त किए। उनमें सबसे छोटे परशुराम थे। उन दिनों हैहयवंश का अधिपति अर्जुन था। उसने [[विष्णु]] के अंशावतार दत्तात्रेय के वरदान से एक सहस्र भुजाएँ प्राप्त की थीं। एक बार [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] में स्नान करते हुए मदोन्मत्त हैहयराज ने अपनी बाँहों से नदी का वेग रोक लिया, फलतः उसकी धारा उल्टी बहने लगी, जिससे [[रावण]] का शिविर पानी में डूबने लगा। दशानन ने अर्जुन के पास जाकर उसे भला-बुरा कहा तो उसने रावण को पकड़कर कैद कर लिया। [[पुलस्त्य]] के कहने पर उसने रावण को मुक्त कर दिया। एक बार वह वन में जमदग्नि के आश्रम पर पहुँचा। जमदग्नि के पास कामधेनु थी। अतः वे अपरिमित वैभव क भोक्ता थे। ऐसा देखकर हैहयराज सहस्र बाहु अर्जुन ने कामधेनु का अपहरण कर लिया। परशुराम ने फरसा उठाकर उसका पीछा किया तथा युद्ध में उसकी समस्त भुजाएँ तथा सिर काट डाले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीर्थाटन== &lt;br /&gt;
उसके दस हज़ार पुत्र भयभीत होकर भाग गये। कामधेनु सहित आश्रम लौटने पर पिता ने उन्हें तीर्थाटन कर अपने पाप धोने के लिए आज्ञा दी क्योंकि उनकी मति में ब्राह्मण का धर्म क्षमादान है। परशुराम ने वैसा ही किया। एक वर्ष तक तीर्थ करके वे वापस आये। उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ और सब भाइयों का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदानस्वरूप उन सबका जीवित होना माँगा, अतः सब पूर्ववत् जीवित तथा स्वस्थ हो गये। हैहयराज अर्जुन के पुत्र निरंतर बदला लेने का अवसर ढूँढते रहते थे। एक दिन पुत्रों की अनुपस्थिति में उन्होंने ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया। परशुराम ने उन सबको मारकर [[महिष्मति]] नगरी में उनके कटे सिरों से एक पर्वत का निर्माण किया। उन्होंने अपने पिता को निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया। वास्तव में परशुराम श्रीविष्णु के अंशावतार थे, जिन्होंने क्षत्रिय नाश के लिए ही जन्म लिया था। उन्होंने अपने पिता के धड़ को सिर से जोड़कर यजन द्वारा उन्हें स्मृति रूप सकल्पमय शरीर की प्राप्ति करवा दी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि2}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
{{दशावतार2}}&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि}}&lt;br /&gt;
{{दशावतार}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:1857]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Gopaljirai</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE&amp;diff=172758</id>
		<title>परशुराम</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE&amp;diff=172758"/>
		<updated>2011-06-16T06:54:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Gopaljirai: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Parashurama.jpg|thumb|परशुराम&amp;lt;br /&amp;gt; Parashurama]]&lt;br /&gt;
राजा प्रसेनजित की पुत्री [[रेणुका]] और भृगुवंशीय [[जमदग्नि]] के पुत्र, [[विष्णु के अवतार]] परशुराम [[शिव]] के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष [[फरसा अस्त्र|परशु]] प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु [[शंकर]] द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये '''परशुराम''' कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार, जो [[वामन अवतार|वामन]] एवं [[राम|रामचन्द्र]] के मध्य में गिने जाता है। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये 'जामदग्न्य' भी कहे जाते हैं। इनका जन्म [[अक्षय तृतीया]], [[वैशाख]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[तृतीया]] को हुआ था। अत: इस दिन व्रत करने और उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था। परशुराम ने शस्त्र विद्या [[द्रोणाचार्य]] से सीखी थी।&lt;br /&gt;
==मातृ-पितृ भक्त परशुराम==&lt;br /&gt;
उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदान स्वरूप उनका जीवित होना माँगा।&lt;br /&gt;
==पिता से प्राप्त वरदान==&lt;br /&gt;
परशुराम के पिता ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी तैयार न हुआ। अत: जमदग्नि ने सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर माता का शीश काट डाला। पिता ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान माँगे-&lt;br /&gt;
#माँ पुनर्जीवित हो जायँ, &lt;br /&gt;
#उन्हें मरने की स्मृति न रहे, &lt;br /&gt;
#भाई चेतना-युक्त हो जायँ और &lt;br /&gt;
#मैं परमायु होऊँ। &lt;br /&gt;
जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिये। &lt;br /&gt;
{{tocright}} &lt;br /&gt;
==क्रोधी स्वभाव==&lt;br /&gt;
*[[दुर्वासा]] की भाँति ये भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात है। एक बार कार्त्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था, जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्त्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] को क्षत्रिय-विहीन कर दिया (हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियाँ जीवित रहीं और नई पीढ़ी को जन्म दिया) और पाँच झीलों को रक्त से भर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया।&lt;br /&gt;
*रामावतार में [[राम|रामचन्द्र]] द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आये थे। इन्होंने परीक्षा के लिए उनका धनुष रामचन्द्र को दिया। जब राम ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गये कि रामचन्द्र [[विष्णु]] के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गये। 'कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपति गए बनहि तप हेतु॥' यह वर्णन 'राम चरितमानस', प्रथम सोपान में 267 से 284 दोहे तक मिलता है। &lt;br /&gt;
==राम के पराक्रम की परीक्षा==&lt;br /&gt;
राम का पराक्रम सुनकर वे [[अयोध्या]] गये। [[दशरथ]] ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया।&lt;br /&gt;
==परशुराम कुंड==&lt;br /&gt;
[[असम]] राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहाँ [[ब्रह्मपुत्र नदी]] [[भारत]] में प्रवेश करती है, वहीं '''परशुराम कुण्ड''' है, जहाँ तप करके उन्होंने शिवजी से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसर्जित भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थान में पाँच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जायेंगे। &lt;br /&gt;
==रामकथा में परशुराम==&lt;br /&gt;
चारों पुत्रों के विवाह के उपरान्त राजा [[दशरथ]] अपनी विशाल सेना और पुत्रों के साथ [[अयोध्या]] पुरी के लिये चल पड़े। मार्ग में अत्यन्त क्रुद्ध तेजस्वी महात्मा परशुराम मिले। उन्होंने [[राम]] से कहा कि वे उसकी पराक्रम गाथा सुन चुके हैं, पर राम उनके हाथ का धनुष चढ़ाकर दिखाएँ। तदुपरान्त उनके पराक्रम से संतुष्ट होकर वे राम को द्वंद्व युद्ध के लिए आमंत्रित करेंगे। दशरथ अनेक प्रयत्नों के उपरान्त भी ब्राह्मणदेव परशुराम को शान्त नहीं कर पाये। परशुराम ने बतलाया कि 'विश्वकर्मा ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दो धनुषों का निर्माण किया था। उनमें से एक तो देवताओं ने [[शिव]] को अर्पित कर दिया था और दूसरा [[विष्णु]] को। एक बार देवताओं के यह पूछने पर कि शिव और विष्णु में कौन बलबान है, कौन निर्बल- [[ब्रह्मा]] ने मतभेद स्थापित कर दिया। फलस्वरूप विष्णु की धनुष टंकार के सम्मुख शिव धनुष शिथिल पड़ गया था, अतः पराक्रम की वास्तविक परीक्षा इसी धनुष से हो सकती है। शान्त होने पर शिव ने अपना धनुष विदेह वंशज देवरात को और विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को धरोहर के रूप में दिया था, जो कि मेरे पास सुरक्षित है।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राम ने क्रुद्ध होकर उनके हाथ से धनुष बाण लेकर चढ़ा दिया और बोले - 'विष्णुबाण व्यर्थ नहीं जा सकता। अब इसका प्रयोग कहाँ पर किया जाये।' परशुराम का बल तत्काल लुप्त हो गया। उनके कथनानुसार राम ने बाण का प्रयोग परशुराम के तपोबल से जीते हुए अनेक लोकों पर किया, जो कि नष्ट हो गये। परशुराम ने कहा - 'हे राम, आप निश्चय ही साक्षात विष्णु हैं।' तथा परशुराम ने महेन्द्र पर्वत के लिए प्रस्थान किया। राम आदि [[अयोध्या]] की ओर बढ़े। उन्होंने यह धनुष [[वरुण देवता|वरुण देव]] को दे दिया। परशुराम की छोड़ी हुई सेना ने भी राम आदि के साथ प्रस्थान किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा: पिता का आदेश==&lt;br /&gt;
नारायण ने ही भृगुवंश में परशुराम रूप में अवतार धारण किया था। उन्होंने जंभासुर का मस्तक विदीर्ण किया। शतदुंदभि को मारा। उन्होंने युद्ध में हैहयराज अर्जुन को मारा तथा केवल धनुष की सहायता से [[सरस्वती नदी]] के तट पर हज़ारों ब्राह्मण वेशी क्षत्रियों को मार डाला। एक बार [[कार्तवीर्य अर्जुन]] ने बाणों से समुद्र को त्रस्त कर किसी परम वीर के विषय में पूछा। समुद्र ने उसे परशुराम से लड़ने को कहा। परशुराम को उसने अपने व्यवहार से बहुत रुष्ट कर दिया। अतः परशुराम ने उसकी हज़ार भुजाएँ काट डालीं। अनेक क्षत्रिय युद्ध के लिए आ जुटे। परशुराम क्षत्रियों से रुष्ट हो गये, अतः उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर डाला। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे सौ वर्षों तक सौम नामक विमान पर बैठे हुए [[शाल्व]] से युद्ध करते रहे किंतु गीत गीत गाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों के मुंह से यह सुनकर कि शाल्व का वध प्रद्युम्न और साँब को साथ लेकर विष्णु करेंगे, उन्हें विश्वास हो गया, अतः वे तभी से वन में जाकर अपने [[अस्त्र शस्त्र]] इत्यादि पानी में डुबोकर [[कृष्ण|कृष्णावतार]] की प्रतीक्षा में तपस्या करने लगे। &lt;br /&gt;
==परशुराम और यज्ञ==&lt;br /&gt;
परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवायी थी। महर्षि [[कश्यप]] ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र पीछे हटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राम और परशुराम==&lt;br /&gt;
भृगुनंदन परशुराम क्षत्रियों का नाश करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। दशरथ पुत्र राम का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गये। दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया। &lt;br /&gt;
==गाधि और ऋचीक==&lt;br /&gt;
गाधि नामक महाबली राजा अपने राज्य का परित्याग करके वन में चले गये। वहाँ उनकी एक पुत्री हुई जिसका वरण ऋचीक नामक मुनि ने किया। गाधि ने ऋचीक से कहा कि कन्या की याचना करते हुए उनके कुल में एक सहस्र पांडुबर्णी अश्व, जिनके कान एक ओर से काल हों, शुल्क स्वरूप दिये जाते हैं, अतः वे शर्ते पूरी करें। ऋचीक ने वरुण देवता से उस प्रकार के एक सहस्र घोड़े प्राप्त कर शुल्कस्वरूप प्रदान किये। गाधि की सत्यवती नामक पुत्री का विवाह ऋतीक से हुआ। &lt;br /&gt;
==जन्म कथा==&lt;br /&gt;
[[भृगु]] ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनसे सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र जन्म की कामना की। भृगु ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेडत्र तथा उसकी माता [[पीपल]] के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए—&lt;br /&gt;
#रुमण्वान, &lt;br /&gt;
#सुषेण, &lt;br /&gt;
#वसु, &lt;br /&gt;
#विश्वावसु तथा &lt;br /&gt;
#पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था। वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था। एक बार सद्यस्नाता रेणुका राजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गयी। उसके आश्रम पहुँचने पर मुनि को दिव्य ज्ञान से समस्त घटना ज्ञात हो गयी। उन्होंने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चार बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उसे वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम से कहा कि वो अमर रहेगा। एक दिन जब परशुराम बाहर गये थे तो कार्तवीर्य अर्जुन उनकी कुटिया पर आये। युद्ध के मद में उन्होंने रेणुका का अपमान किया तथा उसके बछड़ों का हरण करक चले गये। गाय रंभाती रह गयी। परशुराम को मालूम पड़ा तो क्रुद्ध होकर उन्होंने [[कार्तवीर्य अर्जुन|सहस्रबाहु हैहयराज]]  को मार डाला। हैहयराज के पुत्र ने आश्रम पर धावा बोला तथा परशुराम की अनुपस्थिति में मुनि जमदग्नि को मार डाला। परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए तथा पृथ्वी का क्षत्रियहीन करने का संकल्प किया। अतः परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों का संहार किया। समंत पंचक क्षेत्र में पाँच रुधिर के कुंड भर दिये। क्षत्रियों के रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा: शिव द्वारा दिव्यास्त्र==&lt;br /&gt;
बड़े होने पर परशुराम ने शिवाराधन किया। उस नियम का पालन करते हुए उन्होंने शिव को प्रसन्न कर लिया। शिव ने उन्हें दैत्यों का हनन करने की आज्ञा दी। परशुराम ने शत्रुओं से युद्ध किया तथा उनका वध किया। किंतु इस प्रक्रिया में परशुराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया। [[शिव]] ने प्रसन्न होकर कहा कि शरीर पर जितने प्रहार हुए हैं, उतना ही अधिक देवदत्व उन्हें प्राप्त होगा। वे मानवेतर होते जायेंगे। तदुपरान्त शिव ने परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किये, जिनमें से परशुराम ने [[कर्ण]] पर प्रसन्न होकर उसे दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जमदग्नि ऋषि ने रेणुका के गर्भ से अनेक पुत्र प्राप्त किए। उनमें सबसे छोटे परशुराम थे। उन दिनों हैहयवंश का अधिपति अर्जुन था। उसने [[विष्णु]] के अंशावतार दत्तात्रेय के वरदान से एक सहस्र भुजाएँ प्राप्त की थीं। एक बार [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] में स्नान करते हुए मदोन्मत्त हैहयराज ने अपनी बाँहों से नदी का वेग रोक लिया, फलतः उसकी धारा उल्टी बहने लगी, जिससे [[रावण]] का शिविर पानी में डूबने लगा। दशानन ने अर्जुन के पास जाकर उसे भला-बुरा कहा तो उसने रावण को पकड़कर कैद कर लिया। [[पुलस्त्य]] के कहने पर उसने रावण को मुक्त कर दिया। एक बार वह वन में जमदग्नि के आश्रम पर पहुँचा। जमदग्नि के पास कामधेनु थी। अतः वे अपरिमित वैभव क भोक्ता थे। ऐसा देखकर हैहयराज सहस्र बाहु अर्जुन ने कामधेनु का अपहरण कर लिया। परशुराम ने फरसा उठाकर उसका पीछा किया तथा युद्ध में उसकी समस्त भुजाएँ तथा सिर काट डाले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीर्थाटन== &lt;br /&gt;
उसके दस हज़ार पुत्र भयभीत होकर भाग गये। कामधेनु सहित आश्रम लौटने पर पिता ने उन्हें तीर्थाटन कर अपने पाप धोने के लिए आज्ञा दी क्योंकि उनकी मति में ब्राह्मण का धर्म क्षमादान है। परशुराम ने वैसा ही किया। एक वर्ष तक तीर्थ करके वे वापस आये। उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ और सब भाइयों का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदानस्वरूप उन सबका जीवित होना माँगा, अतः सब पूर्ववत् जीवित तथा स्वस्थ हो गये। हैहयराज अर्जुन के पुत्र निरंतर बदला लेने का अवसर ढूँढते रहते थे। एक दिन पुत्रों की अनुपस्थिति में उन्होंने ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया। परशुराम ने उन सबको मारकर [[महिष्मति]] नगरी में उनके कटे सिरों से एक पर्वत का निर्माण किया। उन्होंने अपने पिता को निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया। वास्तव में परशुराम श्रीविष्णु के अंशावतार थे, जिन्होंने क्षत्रिय नाश के लिए ही जन्म लिया था। उन्होंने अपने पिता के धड़ को सिर से जोड़कर यजन द्वारा उन्हें स्मृति रूप सकल्पमय शरीर की प्राप्ति करवा दी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ॠषि मुनि]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि2}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
{{दशावतार2}}&lt;br /&gt;
{{ॠषि-मुनि}}&lt;br /&gt;
{{दशावतार}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:ghazipur]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Gopaljirai</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=172752</id>
		<title>भितरी</title>
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		<updated>2011-06-16T06:40:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Gopaljirai: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*'''भितरी''' [[बनारस]] से पूर्व [[गाजीपुर]] ज़िले में स्थित है।&lt;br /&gt;
*यहाँ पाँचवें [[गुप्त वंश|गुप्त]] सम्राट [[स्कन्दगुप्त]] (455-67 ई.) ने एक स्तम्भ निर्मित कराया था, जिसके शीर्ष पर [[विष्णु]] की मूर्ति थी।&lt;br /&gt;
*इस स्तम्भ की मूर्ति अब लुप्त हो चुकी है, लेकिन स्तम्भ अब भी खड़ा है और इस पर [[संस्कृत]] में एक विस्तृत अभिलेख अंकित है।&lt;br /&gt;
*अभिलेख में स्कन्दगुप्त की वंशावली और पुष्यमित्रों तथा [[हूण|हूणों]] से हुए युद्धों का भी विवरण है।&lt;br /&gt;
*इस अभिलेख के अनुसार स्कन्दगुप्त [[कुमारगुप्त प्रथम महेन्द्रादित्य|कुमारगुप्त प्रथम]] (413-55 ई.) का पुत्र और उत्तराधिकारी था।&lt;br /&gt;
*1889 ई. में कुमारगुप्त द्वितीय की एक मोहर भितरी में मिली थी।&lt;br /&gt;
*इस मोहर पर स्कन्दगुप्त का कोई उल्लेख नहीं है और [[पुरुगुप्त]] को कुमारगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी बतलाया गया है।&lt;br /&gt;
*भितरी में प्राप्त अभिलेख तथा मोहर की परस्पर प्रतिकूल बातों का समाधान करने के लिए यह अनुमान किया जाता है कि, पुरुगुप्त, स्कन्दगुप्त का सौतेला भाई था और वह स्कन्दगुप्त की मृत्यु के उपरान्त सिंहासनारूढ़ हुआ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{गुप्त काल}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:गुप्त काल]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Gopaljirai</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0&amp;diff=172742</id>
		<title>गोरखपुर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0&amp;diff=172742"/>
		<updated>2011-06-16T06:21:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Gopaljirai: /* गीता प्रेस */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Gorakhpur-Station.jpg|thumb|250px|गोरखपुर जंक्शन]]&lt;br /&gt;
गोरखपुर नगर, [[उत्तर प्रदेश]] राज्य की [[राप्ती नदी]] के बाँए किनारे पर बसा हुआ है।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
शहर और गोरखपुर ज़िले का नाम एक प्रसिद्ध तपस्वी तप संत गोरक्षनाथ के नाम पर पङा था, प्राचीन समय में गोरखपुर के भौगोलिक क्षेत्र में बस्ती, देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़ के आधुनिक ज़िले शामिल थे। &lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
गोरखपुर में लकड़ी और चीनी के व्यापार की प्रमुख मण्डी है।&lt;br /&gt;
==उद्योग==&lt;br /&gt;
यहाँ पर क्रैप तथा रौयेंदार तौलिए, सूत और ऊन के मिले हुए धुस्से तथा चीनी बहुत बनाई जाती है। &lt;br /&gt;
हस्तशिल्प  =  हैण्डलूम, टेक्सटाइल, टेराकोटा और पाटरी&lt;br /&gt;
==गीता प्रेस==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
यहीं से [[भारत]] का प्रमुख धार्मिक मासिक पत्र [[कल्याण]] प्रकाशित होता है। जो धार्मिक पुस्तकों के प्रसिद्ध प्रकाशन 'गीता प्रेस गोरखपुर' का प्रकाशन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;रेल&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
गोरखपुर देश के सभी बड़े नगरों/पर्यटन स्थलों से रेल-सेवा से जूड़ा हुआ है। यहां [[कम्प्यूटर]] आरक्षण सुविधा उपलब्ध है। रेल-सूचना हेतु फ़ोन 131, 1331, 1335, 201854, 201273, 201657, 200658, से सम्पर्क किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;बस&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
सभी महत्त्वपूर्ण नगरों के लिए गोरखपुर से उ० प्र० रा० स० प० निगम की बस-सेवा उपलब्ध है। फ़ोन 20093 (रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड), 333658, (राप्ती नगर बस स्टेशन, निकट कचहरी)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;हवाई-सेवा&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
गोरखपुर नगर से 8 किलोमीटर पर हवाई अड्डा स्थित है। [[भारतीय वायु सेना]] की अनुमति से वायुयानों की यातायात सुविधा उपलब्ध है। अन्य हवाई-पट्टी : गोरखपुर से 55 किलोमीटर दूरी पर कसया (जनपद-कुशीनगर) में उ० प्र० नागरिक उड्डयन की हवाई पट्टी उपलब्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;स्थानीय यातायात&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
गोरखपुर पर्यटन परिक्षेत्र के सभी नगरों एवं पर्यटन स्थलों पर टैक्सी, रिक्शा और कहीं-कहीं पर आटो रिक्शा एवं सिटी बस सेवा उपलब्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दर्शनीय स्थल==&lt;br /&gt;
विश्व में जितना अनोखा और सुन्दर [[भारत]] है, भारत में उतना ही अनोखा व आकर्षक उत्तर प्रदेश है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में गोरखपुर पर्यटन परिक्षेत्र एक विस्तृत भू-भाग में फैला हुआ है। इसके अंतर्गत गोरखपुर- मण्डल, बस्ती-मण्डल एवं आजमगढ़-मण्डल के कुल दस जनपद है। अनेक पुरातात्विक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों को समेटे हुए इस [[पर्यटन]] परिक्षेत्र की अपनी विशिष्ट परम्पराए है। [[सरयू नदी|सरयू]], राप्ती, [[गंगा]], [[गण्डक नदी|गण्डक]], [[तमसा नदी|तमसा]], रोहिणी जैसी पावन नदियों के वरदान से अभिसंचित, भगवान [[बुद्ध]], तीर्थकर [[महावीर]], संत [[कबीर]], गुरु गोरखनाथ की तपःस्थली, सर्वधर्म-सम्भाव के संदेश देने वाले विभिन्न धर्मावलम्बियों के देवालयों और प्रकृति द्वारा सजाये-संवारे नयनाभिराम पक्षी-विहार एवं अभ्यारण्यों से परिपूर्ण यह परिक्षेत्र सभी वर्ग के पर्यटकों का आकर्षण-केन्द्र है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;गोरखनाथ मन्दिर&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
गोरखपुर रेलवे स्टेशन से 4 किलोमीटर दूरी पर नेपाल रोड पर स्थित नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक परम सिद्ध गुरु गोरखनाथ का अत्यन्त सुन्दर भव्य मन्दिर स्थित है। यहां प्रतिवर्ष मकर संईद्भांति के अवसर पर खिचड़ी-मेला का आयोजन होता है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु/पर्यटक सम्मिलित होते हैं। यह एक माह तक चलता है। यह मेडिकल कॉलेज रोड पर रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मन्दिर में 12वीं शताब्दी की पालकालीन काले कसौटी पत्थर से निर्मित [[विष्णु|भगवान विष्णु]] की विशाल प्रतिमा स्थापित है। यहां दशहरा के अवसर पर पारम्परिक ईत्त्रामलीलाई का आयोजन होता है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;गीताप्रेस&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
रेलवे स्टेशन से 4 किलोमीटर दूरी पर रेती चौक के पास स्थित गीताप्रेस में सफ़ेद संगमरमर की दीवालों पर सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत्‌ गीता के 18 अध्याय के श्लोक उत्कीर्ण है। ईत्त्लीलाधामई की दीवालों पर मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम एवं भगवान [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं की 'चित्रकला' प्रदर्शित हैं। यहां पर [[हिन्दू धर्म]] की दुलर्भ पुस्तकें, हैण्डलूम एवं टेक्सटाइल्स वस्त्र सस्ते दर पर बेचे जाते हैं। विश्व प्रसिद्ध पत्रिका ईत्त्कल्याणई का प्रकाशन यहीं से किया जाता है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पिकनिक स्पाट&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
रेलवे स्टेशन से 9 किलोमीटर दूर गोरखपुर-कुशीनगर मार्ग पर अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहारी छटा से पूर्ण यह मनोरंजन केन्द्र (पिकनिक स्पाट) स्थित है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;गीतावाटिका&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
गोरखपुर-पिपराइच मार्ग पर रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर दूरी पर स्थित गीतावाटिका में राधा-कृष्ण का भव्य मनमोहक मन्दिर स्थित है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;रामगढ़ ताल&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर पर 1700 एकड़ के विस्तृत भू-भाग में रामगढ़ ताल स्थित है। यह पर्यटकों के लिए अत्यन्त आकर्षक केन्द्र है। यहां पर जल क्रीड़ा केन्द्र, बौद्ध संग्रहालय, तारा मण्डल, चम्पादेवी पार्क एवं अम्बेडकर उद्यान आदि दर्शनीय स्थल हैं।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;इमामबाड़ा&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
गोरखपुर नगर के मध्य में रेलवे स्टेशन से 2 किलोमीटर दूरी पर स्थित इस इमामबाड़ा का निर्माण हज़रत बाबा रोशन अलीशाह की अनुमति से सन्‌ 1717 ई० में नवाब आसफुद्दौला ने करवाया। उसी समय से यहां पर दो बहुमूल्य ताजियां एक स्वर्ण और दूसरा चांदी का रखा हुआ है। यहां से मुहर्रम का जुलूस निकलता है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;प्राचीन शिव मन्दिर&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
गोरखपुर शहर से देवरिया मार्ग पर कूड़ाघाट बाज़ार के निकट शहर से 4 किलोमीटर पर यह प्राचीन [[शिव]] स्थल रामगढ़ ताल के पूर्वी भाग में स्थित है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;मुंशी प्रेमचन्द उद्यान&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
गोरखपुर नगर के मध्य में रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मनोरम उद्यान प्रख्यात साहित्यकार [[प्रेमचन्द|मुंशी प्रेमचन्द]] के नाम पर बना है। इसमें प्रेमचन्द्र के साहित्य से सम्बन्धित एक विशाल पुस्तकालय निहित है तथा यह उन दिनों का द्योतक है जब मुंशी प्रेमचन्द गोरखपुर में एक स्कूल टीचर थे।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;सुर्यकुण्ड मन्दिर&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
गोरखपुर नगर के एक कोने में रेलवे स्टेशन से 4 किलोमीटर दूरी पर स्थित ताल के मध्य में स्थित इस स्थान में के बारे में यह विख्यात है कि भगवान श्री राम ने यहाँ पर विश्राम किया था जो कि कालान्तर में भव्य सुर्यकुण्ड मन्दिर बना।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर_प्रदेश]][[Category:उत्तर_प्रदेश_के_नगर]][[Category:भारत के_नगर]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Gopaljirai</name></author>
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		<title>हज़ारी प्रसाद द्विवेदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=172733"/>
		<updated>2011-06-16T06:02:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Gopaljirai: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Hazari Prasad Dwivedi.JPG &lt;br /&gt;
|पूरा नाम=&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[19 अगस्त]], [[1907]] ई.&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=गाँव 'आरत दुबे का छपरा', [[बलिया]] ज़िला, [[भारत]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[19 मई]], [[1979]] ई.&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=निबन्धकार, [[उपन्यासकार]], अध्यापक, सम्पादक&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=सूर साहित्य, बाणभट्ट, कबीर, अशोक के फूल, हिन्दी साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य का आदिकाल, नाथ सम्प्रदाय, पृथ्वीराज रासो &lt;br /&gt;
|विषय=निबन्ध, कहानी, उपन्यास&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी भाषा|हिन्दी]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=[[काशी हिन्दू विश्वविद्यालय]]&lt;br /&gt;
|शिक्षा=बारहवीं&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[पद्म भूषण]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी''' (जन्म- [[19 अगस्त]], [[1907]] ई., गाँव 'आरत दुबे का छपरा', [[बलिया ज़िला]], [[भारत]]; मृत्यु- [[19 मई]], [[1979]] ई.) [[हिन्दी]] के शीर्षस्थानीय साहित्यकारों में से हैं। वे उच्चकोटि के निबन्धकार, [[उपन्यासकार]], आलोचक, चिन्तक तथा शोधकर्ता हैं। साहित्य के इन सभी क्षेत्रों में द्विवेदी जी अपनी प्रतिभा और विशिष्ट कर्तव्य के कारण विशेष यश के भागी हुए हैं। द्विवेदी जी का व्यक्तित्व गरिमामय, चित्तवृत्ति उदार और दृष्टिकोण व्यापक है। द्विवेदी जी की प्रत्येक रचना पर उनके इस व्यक्तित्व की छाप देखी जा सकती है। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त, 1907 ई. (श्रावण, शुक्ल पक्ष एकादशी, संवत [[1964]]) में बलिया ज़िले के 'आरत दुबे का छपरा' गाँव के एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण कुल में हुआ था। द्विवेदी जी के प्रपितामह ने [[काशी]] में कई वर्षों तक रहकर ज्योतिष का गम्भीर अध्ययन किया था। द्विवेदी जी की माता भी प्रसिद्ध पण्डित कुल की कन्या थीं। इस तरह बालक द्विवेदी को [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] के अध्ययन का संस्कार विरासत में ही मिल गया था। &lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
द्विवेदी जी ने अपनी पारिवारिक परम्परा के अनुसार संस्कृत पढ़ना आरम्भ किया और सन [[1930]] ई. में [[काशी हिन्दू विश्वविद्यालय]] से ज्योतिषाचार्य तथा इण्टर की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। &lt;br /&gt;
==जीवन-दर्शन का निर्माण==&lt;br /&gt;
सन 1930 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने बाद द्विवेदी जी प्राध्यापक होकर [[शान्ति निकेतन]] चले गये। सन [[1940]] से [[1950]] ई. तक वे वहाँ पर हिन्दी भवन के डाइरेक्टर के पद पर काम करते रहे। शान्ति निकेतन में [[रवीन्द्र नाथ टैगोर]] के घनिष्ठ सम्पर्क में आने पर नये मानवतावाद के प्रति उनके मन में जिस आस्था की प्रतिष्ठा हुई, वह उनके भावी विकास में बहुत ही सहायक बनी। क्षितिमोहन सेन, विधुशेखर भट्टाचार्य और बनारसी दास चतुर्वेदी की सन्निकटा से भी उनकी साहित्यिक गतिविधि में अधिक सक्रियता आयी। शान्ति निकेतन में द्विवेदी जी को अध्ययन-चिन्तन का निर्बाध अवकाश मिला। वास्तव में वहाँ के शान्त और अध्ययनपूर्ण वातावरण में ही द्विवेदी जी के आस्था-विश्वास, जीवन-दर्शन आदि का निर्माण हुआ, जो उनके साहित्य में सर्वत्र प्रतिफलित हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1950 ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति के अनुरोध और आमंत्रण पर द्विवेदी जी हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और प्रोफ़ेसर होकर वहाँ चले गए। इसके एक वर्ष पूर्व सन [[1949]] ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उनकी हिन्दी की महत्त्वपूर्ण सेवा के कारण उन्हें डी. लिट्. की सम्मानित उपाधि (ऑनरिस काजा) प्रदान की थी। सन [[1955]] ई. में वे प्रथम 'ऑफ़िशियल लैंग्वेज कमीशन' के सदस्य चुने गये। सन [[1957]] ई. में भारत सरकार ने उनकी विद्धत्ता और साहित्यिक सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें 'पद्मभूषण' की उपाधि से अलंकृत किया। [[1958]] ई. में वे नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य बनाये गए। द्विवेदी जी कई वर्षों तक [[काशी नागरी प्रचारिणी सभा]] के उपसभापति, खोज विभाग के निर्देशक तथा 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' के सम्पादक रहे हैं। सन [[1960]] ई. में पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति के आमंत्रण पर वे वहाँ के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और प्रोफ़ेसर होकर [[चण्डीगढ़]] चले गये। सन [[1968]] ई. में ये फिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बुला लिये गए और वहाँ रेक्टर नियुक्त हुए और फिर वहीं हिन्दी के ऐतिहासिक व्याकरण विभाग के निर्देशक नियुक्त हुए। वह काम समाप्त होने पर [[उत्तर प्रदेश]], हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिन्दी समीक्षा को नयी दिशा==&lt;br /&gt;
द्विवेदी जी आचार्य [[रामचन्द्र शुक्ल]] की परम्परा के आलोचक हैं, फिर भी साहित्य को एक अविच्छिन्न विकास-परम्परा देखने पर बल देकर द्विवेदी जी ने हिन्दी समीक्षा को नयी दिशा दी। साहित्य के इस नैरन्तर्य का विशेष ध्यान रखते हुए भी वे लोक-चेतना को कभी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देते। वे मनुष्य की श्रेष्ठता के विश्वासी हैं और उच्चकोटि के साहित्य में इसकी प्रतिष्ठा को वे अनिवार्य मानते हैं। संस्कारजन्य क्षुद्र सीमाओं में बँधकर साहित्य ऊँचा नहीं उठ सकता। अपेक्षित ऊँचाई प्राप्त करने के लिए उसे मनुष्य की विराट एकता और जिजीविषा को आयत्त करना होगा। द्विवेदी जी ने चाहे काल विशेष के सम्बन्ध में, उन्होंने अपनी आलोचनाओं में यह बराबर ध्यान रखा है कि आलोच्य युग या कवि ने किन श्रेयस्कर माननीय मूल्यों की सृष्टि की है। कोई चाहे तो उन्हें मूल्यान्वेषी आलोचक कह सकता है, पर वे आप्त मूल्यों की अडिगता में विश्वास नहीं करते। उनकी दृष्टि में मूल्य बराबर विकसनशील होता है, उसमें पूर्ववर्ती और पार्श्ववर्ती चिन्तन का मिश्रण होता है। संस्कृत, अपभ्रंश आदि के गम्भीर अध्येता होने के कारण वे साहित्य की सुदीर्घ परम्परा का आलोड़न करते हुए विकासशील मूल्यों का सहज ही आकलन कर लेते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृतियाँ==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; align=&amp;quot;right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ प्रमुख कृतियाँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! सन&lt;br /&gt;
! कृति &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1936&lt;br /&gt;
| सूर साहित्य&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1940&lt;br /&gt;
| हिन्दी साहित्य की भूमिका&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1940&lt;br /&gt;
| प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1942&lt;br /&gt;
| कबीर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1947&lt;br /&gt;
| बाणभट्ट की आत्मकथा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1948&lt;br /&gt;
| अशोक के फूल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1950&lt;br /&gt;
| नाथ सम्प्रदाय&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1951&lt;br /&gt;
| कल्पलता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1952&lt;br /&gt;
| हिन्दी साहित्य&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1954&lt;br /&gt;
| विचार और वितर्क&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1957&lt;br /&gt;
| नाथ सिद्धों की बानियाँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1957&lt;br /&gt;
| मेघदूत: एक पुरानी कहानी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1959&lt;br /&gt;
| विचार प्रवाह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1960&lt;br /&gt;
| सन्देशरासक&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| पृथ्वीराज रासो&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1967&lt;br /&gt;
| कालिदास की लालित्य योजना&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1970&lt;br /&gt;
| मध्ययुगीन बोध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1971&lt;br /&gt;
| आलोक पर्व&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी की कुछ कृतियाँ निम्नलिखित हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;हिन्दी साहित्य की भूमिका&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
'हिन्दी साहित्य की भूमिका' उनके सिद्धान्तों की बुनियादी पुस्तक है। जिसमें साहित्य को एक अविच्छिन्न परम्परा तथा उसमें प्रतिफलित क्रिया-प्रतिक्रियाओं के रूप में देखा गया है। नवीन दिशा-निर्देश की दृष्टि से इस पुस्तक का ऐतिहासिक महत्त्व है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कबीर&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
अपने फक्कड़ व्यक्तित्व, घर फूँक मस्ती और और क्रान्तिकारी विचारधारा के कारण कबीर ने उन्हें विशेष आकृष्ट किया। 'कबीर' पुस्तक में उन्होंने जिस सांस्कृतिक परम्परा, समसामयिक वातावरण और नवीन मूल्यानुचिन्तन का उदघाटन किया है, वह उनकी उपरिलिखित आलोचनात्मक दृष्टि के सर्वथा मेल में है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;हिन्दी साहित्य का आदिकाल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
'हिन्दी साहित्य का आदिकाल' में द्विवेदी जी ने नवीन उपलब्ध सामग्री के आधार पर जो शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है, उससे हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुन: परीक्षण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;नाथ सम्प्रदाय&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
'[[नाथ सम्प्रदाय]]' में सिद्धों और नाथों की उपलब्धियों पर गम्भीर विचार व्यक्त किये गए हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सूर-साहित्य&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
'सूर-साहित्य' उनकी प्रारम्भिक आलोचनात्मक कृति है, जो आलोचनात्मक उतनी नहीं है, जितनी की भावनात्मक। इनके अतिरिक्त उनके अनेक मार्मिक समीक्षात्मक निबन्ध विभिन्न निबन्ध-संग्रहों में संगृहीत हैं, जो साहित्य के विभिन्न पक्षों का गम्भीर उदघाटन करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निबन्ध==&lt;br /&gt;
द्विवेदी जी जहाँ विद्वत्तापरक अनुसन्धानात्मक निबन्ध लिख सकते हैं, वहाँ श्रेष्ठ निर्बन्ध निबन्धों की सृष्टि भी कर सकते हैं। उनके निर्बन्ध निबन्ध हिन्दी निबन्ध साहित्य की मूल्यवान उपलब्धि है। द्विवेदी जी के व्यक्तित्व में विद्वत्ता और सरसता का, पाण्डित्य और विदग्धता का, गम्भीरता और विनोदमयता का, प्राचीनता और नवीनता का जो अदभुत संयोग मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इन विरोधाभासी तत्वों से निर्मित उनका व्यक्तित्व ही उनके निर्बन्ध निबन्धों में प्रतिफलित हुआ है। अपने निबन्धों में वे बहुत ही सहज ढंग से, अनौपचारिक रूप में, 'नाख़ून क्यों बढ़ते हैं', 'आम फिर बौरा गए', 'अशोक के फूल', 'एक कुत्ता और एक मैना', 'कुटज' आदि की चर्चा करते हैं, जिससे पाठकों का आनुकूल्य प्राप्त करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती। पर उनके निबन्धों का पूर्ण रसास्वादन करने के लिए जगह-जगह बिखरे हुए सांस्कृतिक-साहित्यिक सन्दर्भों को जानना बहुत आवश्यक है। इन सन्दर्भों में उनकी ऐतिहासिक चेतना को देखा जा सकता है, किन्तु सम्पूर्ण निबन्ध पढ़ने के बाद पाठक नये मानवतावादी मूल्यों की उपलब्धि भी करता चलता है। उनमें अतीत के मूल्यों के प्रति सहज ममत्व है, किन्तु नवीन के प्रति कम उत्साह नहीं है।&lt;br /&gt;
==बाणभट्ट== &lt;br /&gt;
'बाणभट्ट' की आत्मकथा' द्विवेदी जी का अपने ढंग का असमान्तर उपन्यास है, जो अपने कथ्य तथा शैली के कारण सहृदयों द्वारा विशेष रूप से समादृत हुआ है। यह हिन्दी उपन्यास साहित्य की विशिष्ट उपलब्धि है। इस उपन्यास में उनके विस्तृत और गम्भीर अध्ययन तथा कारयित्री प्रतिभा का अदभुत मिश्रण हुआ है। इसके माध्यम से अपने जीवन-दर्शन के विविध पक्षों को उदघाटित करते हुए उन्होंने इसे वैचारिक दृष्टि से भी विशिष्ट ऊँचाई प्रदान की है। हर्षकालीन जिस विशाल फलक पर बाणभट्ट को चित्रित किया गया है, वह गहन अध्ययन तथा गत्यात्मक ऐतिहासिक चेतना की अपेक्षा रखता है। कहना न होगा कि द्विवदी जी के व्यक्तित्व के निर्माण में इस ऐतिहासिक चेतना का बहुत महत्त्वपूर्ण योग रहा है। यही कारण है कि वे समाज और संस्कृति के विविध आयामों को, उसके सम्पूर्ण परिवेश को, एक आवयविक इकाई (आरगैनिक यूनिटी) में सफलता पूर्वक बाँधने में समर्थ हो सके हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Hazari-Prasad-Dwivedi.jpg|thumb|left|हज़ारी प्रसाद द्विवेदी]]&lt;br /&gt;
इस उपन्यास में कुछ पात्र, घटनाएँ और प्रसंग इतिहासाश्रित हैं और कुछ काल्पनिक। बाण, हर्ष, कुमार कृष्ण, बाण का घुमक्कड़ के रूप में भटकते फिरना, हर्ष द्वारा तिरस्कृत और सम्मानित होना आदि इतिहास द्वारा अनुमोदित हैं। निपुणिका, भट्टिनी, सुचरिता, महामाया, अवधूत पाद तथा इनसे सम्बद्ध घटनाएँ कल्पना प्रसूत हैं। इतिहास और कल्पना के समुचित विनियोग द्वारा लेखक ने उपन्यास को जो रूप-रंग दिया है, वह बहुत ही आकर्षक बन पड़ा है। इस ऐतिहासिक उपन्यास में मानव-मूल्य की नये मानवतावादी मूल्य की प्रतिष्ठा करना भी लेखक का प्रमुख उद्देश्य रहा है। जिनको लोक 'बण्ड' या कुल भ्रष्ट समझता है, वे भीतर से कितने महान हैं, इसे बाणभट्ट और निपुणिका (निउनिया) में देखा जा सकता है। लोक चेतना या लोक शक्ति को अत्यन्त विश्वासमयी वाणी में महामाया द्वारा जगाया गया है। यह लेखक का अपना विश्वास भी है। द्विवेदी जी प्रेम को सेक्स से उसम्पृक्त न करते हुए भी उसे जिस ऊँचाई पर प्रतिष्ठित करते हैं, वह सर्वथा मनोवैज्ञानिक है। प्रेम के उच्चतर सोपान पर पहुँचने के लिए अपना सब कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है। निपुणिका को नारीत्व प्राप्त हुआ तपस्या की अग्नि में जलने पर। बाणभट्ट की प्रतिभा को चार-चाँद लगा प्रेम का उन्नयनात्मक स्वरूप समझने पर। सुचरिता को अभीप्सित की उपलब्धि हुई प्रेम के वासनात्मक स्वरूप की निष्कृति पर। शैली की दृष्टि से यह पारम्परिक स्वच्छन्दतावादी (क्लैसिकल रोमाण्टिक) रचना है। बाणभट्ट की शैली को आधार मानने के कारण लेखक को वर्णन की विस्तृत और संश्लिष्ट पद्धति अपनानी पड़ी है, पर बीच-बीच में उसकी अपनी स्वच्छन्द प्रवृत्ति भी जागरूक रही है, जिससे लम्बी अलंकृत शैली की दुरूहता का बहुत कुछ परिष्कार हो जाता है। उनका दूसरा उपन्यास 'चारुचन्द्रलेख' भी प्रकाशित हो चुका है।&lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी को भारत सरकार ने उनकी विद्धत्ता और साहित्यिक सेवाओं को ध्यान में रखते हुए साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन [[1957]] में [[पद्म भूषण]] से सम्मानित किया गया था।&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी की मृत्यु [[19 मई]], [[1979]] ई. में हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{साहित्यकार}}{{शिक्षक}}&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्यकार]][[Category:साहित्य_कोश]][[Category:उपन्यासकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:शिक्षक]]&lt;br /&gt;
[[Category:लेखक]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म भूषण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Gopaljirai</name></author>
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