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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>स्वस्तिक</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=स्वस्तिक|लेख का नाम=स्वस्तिक (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Hindu-Swastika.jpg|स्वस्तिक&amp;lt;br /&amp;gt; Swastika|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
*स्वस्तिक [[हिन्दू धर्म]] का पवित्र, पूजनीय चिन्ह और प्राचीन [[धर्म]] प्रतीक है। यह देवताओं की शक्ति और मनुष्य की मंगलमय कामनाएँ इन दोनों के संयुक्त सामर्थ्य का प्रतीक है। पुरातन वैदिक सनातन संस्कृति का परम मंगलकारी प्रतीक चिन्ह स्वास्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिन्ह अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। &lt;br /&gt;
*अत्यन्त प्राचीन काल से ही [[भारत|भारतीय]] [[संस्कृति]] में स्वस्तिक को मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। विघ्नहर्ता [[गणेश]] की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी [[लक्ष्मी]] के साथ भी शुभ लाभ, स्वस्तिक तथा बहीखाते की पूजा की परम्परा है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसीलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वास्तिक को ही अंकित किया जाता है। &lt;br /&gt;
*किसी भी पूजन कार्य का शुभारंभ बिना स्वस्तिक के नहीं किया जा सकता। चूंकि शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश प्रथम पूजनीय हैं, अत: स्वस्तिक का पूजन करने का अर्थ यही है कि हम श्रीगणेश का पूजन कर उनसे विनती करते हैं कि हमारा पूजन कार्य सफल हो। स्वस्तिक बनाने से हमारे कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
*किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में या सामान्यत: किसी भी पूजा-अर्चना में हम दीवार, थाली या ज़मीन पर स्वस्तिक का निशान बनाकर स्वस्ति वाचन करते हैं। साथ ही स्वस्तिक धनात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक है, इसे बनाने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। &lt;br /&gt;
*इसे हमारे सभी व्रत, पर्व, त्योहार, पूजा एवं हर मांगलिक अवसर पर कुंकुम से अंकित किया जाता है एवं भावपूर्वक ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि हे प्रभु! मेरा कार्य निर्विघ्न सफल हो और हमारे घर में जो अन्न, वस्त्र, वैभव आदि आयें वह पवित्र बनें। &lt;br /&gt;
*देवपूजन, विवाह, व्यापार, बहीखाता पूजन, शिक्षारम्भ तथा मुण्डन-संस्कार आदि में भी स्वस्तिक-पूजन आवश्यक समझा जाता है। स्वस्तिक का चिन्ह वास्तु के अनुसार भी कार्य करता है, इसे भवन, कार्यालय, दूकान या फैक्ट्री या कार्य स्थल के मुख्य द्वार के दोनों ओर स्वास्तिक अंकित करने से किसी की बुरी नज़र नहीं लगती और घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है। &lt;br /&gt;
*पूजा स्थल, तिज़ोरी, कैश बॉक्स, अलमारी में भी स्वास्तिक स्थापित करना चाहिए। महिलाएँ अपने हाथों में [[मेंहदी]] से स्वस्तिक चिह्व बनाती हैं। इसे दैविक आपत्ति या दुष्टात्माओं से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.lakesparadise.com/madhumati/show_artical.php?id=806 |title=आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक - स्वस्तिक |accessmonthday=[[8 अक्टूबर]] |accessyear=[[2010]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=लेक्स पेराडाइस |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कभी पूजा की थाली में, कभी दरवाजे पर, [[वेद|वेदों]]-[[पुराण|पुराणों]] में प्रयुक्त होने वाला सर्वश्रेष्ठ पवित्र धर्मचिह्न के रूप में प्रयुक्त स्वस्तिक चिह्न आज फैशन की दुनिया में भी शुमार होता जा रहा है। अब यह पूजा की थाली से उठकर घर की दीवारों तथा सुंदरियों के परिधानों और आभूषणों में सजने लगा है।&lt;br /&gt;
*स्वास्तिक को धन-देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। इसकी चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, [[अग्निदेव|अग्नि]], [[इन्द्र]], [[वरुण देवता|वरुण]] एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है। &lt;br /&gt;
*स्वास्तिक का प्रयोग शुद्ध, पवित्र एवं सही ढंग से उचित स्थान पर करना चाहिए। इसके अपमान व ग़लत प्रयोग से बचना चाहिए। शौचालय एवं गन्दे स्थानों पर इसका प्रयोग वर्जित है। ऐसा करने वाले की बुद्धि एवं विवेक समाप्त हो जाता है। दरिद्रता, तनाव एवं रोग एवं क्लेश में वृद्धि होती है। स्वास्तिक के प्रयोग से धनवृद्धि, गृहशान्ति, रोग निवारण, वास्तुदोष निवारण, भौतिक कामनाओं की पूर्ति, तनाव, अनिद्रा, चिन्ता रोग, क्लेश, निर्धनता एवं शत्रुता से मुक्ति भी दिलाता है।&lt;br /&gt;
*ज्योतिष में इस मांगलिक चिन्ह को प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, सफलता व उन्नति का प्रतीक माना गया है। मुख्य द्वार पर 6.5 इंच का स्वास्तिक बनाकर लगाने से से अनेक प्रकार के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
*[[हल्दी]] से अंकित स्वास्तिक शत्रु शमन करता है। स्वास्तिक 27 नक्षत्रों का सन्तुलित करके सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। यह चिन्ह नकारात्मक [[ऊर्जा]] का सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसका भरपूर प्रयोग अमंगल व बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। &lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक का अर्थ== &lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही स्वस्तिक को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। यूँ तो बहुत से लोग इसे हिन्दू धर्म का एक प्रतीक चिन्ह ही मानते हैं । किन्तु वे लोग ये नहीं जानते कि इसके पीछे कितना गहरा अर्थ छिपा हुआ है। सामान्यतय: स्वस्तिक शब्द को &amp;quot;सु&amp;quot; एवं &amp;quot;अस्ति&amp;quot; का मिश्रण योग माना जाता है । यहाँ &amp;quot;सु&amp;quot; का अर्थ है --- शुभ और &amp;quot;अस्ति&amp;quot; का --- होना । संस्कृ्त व्याकरण अनुसार &amp;quot;सु&amp;quot; एवं &amp;quot;अस्ति&amp;quot; को जब संयुक्त किया जाता है तो जो नया शब्द बनता है -- वो है &amp;quot;स्वस्ति&amp;quot; अर्थात &amp;quot;शुभ हो&amp;quot;, &amp;quot;कल्याण हो&amp;quot; । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक शब्द '''सु+अस+क''' से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ सत्ता 'या' अस्तित्व और 'क' का अर्थ है कर्ता या करने वाला। इस प्रकार स्वस्तिक शब्द का अर्थ हुआ '''अच्छा या मंगल करने वाला'''। इसलिए देवता का तेज़ शुभ करनेवाला - स्वस्तिक करने वाला है और उसकी गति सिद्ध चिन्ह 'स्वस्तिक' कहा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। संस्कृत में सु-अस धातु से स्वस्तिक शब्द बनता है। सु अर्थात् सुन्दर, श्रेयस्कर, अस् अर्थात् उपस्थिति, अस्तित्व। जिसमें सौन्दर्य एवं श्रेयस का समावेश हो, वह स्वस्तिक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक का सामान्य अर्थ शुभ, मंगल एवं कल्याण करने वाला है। स्वस्तिक शब्द मूलभूत सु+अस धातु से बना हुआ है। सु का अर्थ है अच्छा, कल्याणकारी, मंगलमय और अस का अर्थ है अस्तित्व, सत्ता अर्थात कल्याण की सत्ता और उसका प्रतीक है स्वस्तिक। यह पूर्णतः कल्याणकारी भावना को दर्शाता है। देवताओं के चहुं ओर घूमने वाले आभामंडल का चिन्ह ही स्वास्तिक होने के कारण वे देवताओं की शक्ति का प्रतीक होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ एवं कल्याणकारी माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अमरकोश]] में स्वस्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है, अर्थात सभी [[दिशा|दिशाओं]] में सबका कल्याण हो। इस प्रकार स्वस्तिक में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या '''वसुधैव कुटुम्बकम्''' की भावना निहित है। प्राचीनकाल में हमारे यहाँ कोई भी श्रेष्ठ कार्य करने से पूर्व मंगलाचरण लिखने की परंपरा थी, लेकिन आम आदमी के लिए मंगलाचरण लिखना सम्भव नहीं था, इसलिए ऋषियों ने स्वस्तिक चिन्ह की परिकल्पना की, ताकि सभी के कार्य सानन्द सम्पन्न हों।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2058038.cms?prtpage=1 |title=आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक- स्वस्तिक |accessmonthday=[[8 अक्टूबर]] |accessyear=[[2010]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=नवभारत टाइम्स |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक का आकृति==&lt;br /&gt;
स्वस्तिक का आकृति हमारे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व निर्मित की है। भारत में स्वस्तिक का रूपांकन छह रेखाओं के प्रयोग से होता है। स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। ( या स्वास्तिक बनाने के लिए धन चिन्ह बनाकर उसकी चारों भुजाओं के कोने से समकोण बनाने वाली एक रेखा दाहिनी ओर खींचने से स्वास्तिक बन जाता है। ) रेखा खींचने का कार्य ऊपरी भुजा से प्रारम्भ करना चाहिए। इसमें दक्षिणवर्त्ती गति होती है। मानक दर्शन अनुसार स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती (दक्षिणोन्मुख) हैं। इसे '''दक्षिणावर्त स्वस्तिक''' (घडी की सूई चलने की दिशा) कहते हैं। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर (वामोन्मुख) मुडती हैं। इसे '''वामावर्त स्वस्तिक''' (उसके विपरीत) कहते हैं। दोनों दिशाओं के संकेत स्वरूप दो प्रकार के स्वस्तिक स्त्री एवं पुरुष के प्रतीक के रूप में भी मान्य हैं । किन्तु जहाँ दाईं ओर मुडी भुजा वाला स्वस्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक हैं, वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वस्तिक को अमांगलिक, हानिकारक माना गया है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊं एवं स्वास्तिक का सामूहिक प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को शीघ्रता से दूर करता है। स्वस्तिक चिह्व की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल की प्रतीक माना जाता है। वे हैं - अरहन्त-मंगल, सिद्ध-मंगल, साहू-मंगल और केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगल। कुछ विद्वानों की यह मान्यता है कि यह ॐ का ही विकृत रूप है। इन रेखाओं को आचार्य अभिनव गुप्त ने नाद ब्रह्म अथवा अक्षर ब्रह्म का परिचायक माना है। नाद के पश्यंती, मध्यमा तथा बैखरी-तीन रूप हैं। अत:स्वस्तिक ब्रह्म का प्रतीक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुति, अनुभूति तथा युक्ति इन तीनों का यह एक सा प्रतिपादन प्रयागराज में होने वाले संगम के समान हैं। दिशाएँ मुख्यत: चार हैं, खड़ी तथा सीधी रेखा खींचकर जो घन चिन्ह (+) जैसा आकार बनता है यह आकार चारों दिशाओं का द्योतक सर्वत्र और सदैव यही माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में राजा महाराज द्वारा किलों का निर्माण स्वस्तिक के आकार में किया जाता रहा है ताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे। प्राचीन पारम्परिक तरीके से निर्मित किलों में शत्रु द्वारा एक द्वार पर ही सफलता अर्जित करने के पश्चात सेना द्वारा किले में प्रवेश कर उसके अधिकाँश भाग अथवा सम्पूर्ण किले पर अधिकार करने के बाद नर संहार होता रहा है । परन्तु स्वस्तिक नुमा द्वारों के निर्माण के कारण शत्रु सेना को एक द्वार पर यदि सफलता मिल भी जाती थी तो बाकी के तीनों द्वार सुरक्षित रहते थे । ऎसी मज़बूत एवं दूरगामी व्यवस्थाओं के कारण शत्रु के लिए किले के सभी भागों को एक साथ जीतना संभव नहीं होता था । यहाँ स्वस्तिक किला / दुर्ग निर्माण के परिपेक्ष्य में &amp;quot;सु वास्तु&amp;quot; था । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वस्तिक की ऊर्जा&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
स्वस्तिक का आकृति सदैव कुमकुम (कुंकुम), सिन्दूर व अष्टगंध से ही अंकित करना चाहिए। यदि आधुनिक दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक, इत्यादि माँगलिक चिन्हों की महता स्वीकार करने लगा है । आधुनिक विज्ञान ने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु, पदार्थ इत्यादि के ऊर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है और इस ऊर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है -- '''बोविस''' । इस यंत्र का आविष्कार जर्मन और फ्रांस ने किया है। मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है। वैज्ञानिक हार्टमेण्ट अनसर्ट ने आवेएंटिना नामक यन्त्र द्वारा '''विधिवत पूर्ण लाल कुंकुम से अंकित स्वस्तिक की सकारात्मक ऊर्जा को 100000 बोविस यूनिट''' में नापा है। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है। ऊं (70000 बोविस) चिन्ह से भी अधिक सकारात्मक ऊर्जा स्वस्तिक में है। इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों यथा मन्दिर, गुरुद्वारा इत्यादि का ऊर्जा स्तर काफ़ी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति का अनुभव और अपनी समस्याओं, कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है। यही नहीं हमारे घरों, मन्दिरों, पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किए जाने वाले अन्य मांगलिक चिन्हों यथा ॐ इत्यादि में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:swt red.jpg|लाल रंग का स्वस्तिक|250px|thumb|left]]&lt;br /&gt;
==लाल रंग का स्वस्तिक==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में लाल रंग का सर्वाधिक महत्त्व है और मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिन्दूर, रोली या कुंकुम के रूप में किया जाता है। सभी देवताओं की प्रतिमा पर रोली का टीका लगाया जाता है। लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। लाल टीका तेजस्विता, पराक्रम, गौरव और यश का प्रतीक माना गया है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को दर्शाता है। यह रंग लोगों के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। यह रंग मंगल ग्रह का है जो स्वयं ही साहस, पराक्रम, बल व शक्ति का प्रतीक है। यह सजीवता का प्रतीक है और हमारे शरीर में व्याप्त होकर प्राण शक्ति का पोषक है। मूलतः यह रंग ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति एवं महत्त्वकांक्षा का प्रतीक है। नारी के जीवन में इसका विशेष स्थान है और उसके सुहाग चिन्ह व श्रृंगार में सर्वाधिक प्रयुक्त होता है। स्त्राी के मांग का सिन्दूर, माथे की बिन्दी, हाथों की चूड़ियां, पांव का आलता, महावर, करवाचौथ की साड़ी, शादी का जोड़ा एवं प्रेमिका को दिया लाल गुलाब आदि सभी लाल रंग की महत्ता है। नाभि स्थित मणिपुर चक्र का पर्याय भी लाल रंग है। शरीर में लाल रंग की कमी से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। लाल रंग से ही केसरिया, गुलाबी, मैहरुन और अन्य रंग बनाए जाते हैं। इन सब तथ्यों से प्रमाणित होता है कि स्वास्तिक लाल रंग से ही अंकित किया जाना चाहिए या बनाना चाहिए।&lt;br /&gt;
==भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक का पौराणिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
वेदों में स्वस्तिक चिह्न के बनावट की व्याख्या विभिन्न अर्थों में की गई है। भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिह्व को [[विष्णु]], [[सूर्य देव|सूर्य]], सृष्टिचक्र तथा सम्पूर्ण [[ब्रह्माण्ड]] का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने इसे [[गणेश]] का प्रतीक मानकर इसे प्रथम वन्दनीय भी माना है। धार्मिक नजरिए से स्वस्तिक भगवान श्री गणेश का साकार रुप है। स्वस्तिक में बाएं भाग में गं बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्री गणेश का स्थान माना जाता है। इसकी आकृति में चार बिन्दियां भी बनाई जाती है। जिसमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानि कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है। शिव के वरदान स्वरूप हर मांगलिक और शुभ कार्य पर सबसे पहले श्रीगणेश का पूजन किया जाता है। इसी वजह से किसी भी प्रकार का कोई भी मांगलिक कार्य, शुभ कर्म या विवाह आदि धर्म कर्म में स्वतिस्क बनाना अनिवार्य है। गणेश की प्रतिमा की स्वस्तिक चिह्न के साथ संगति बैठ जाती है। गणपति की सूंड, हाथ, पैर, सिर आदि को इस तरह चित्रित किया जा सकता है, जिसमें स्वस्तिक की चार भुजाओं का ठीक तरह समन्वय हो जाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सूर्य को समस्त देव शक्तियों का केंद्र और भूतल तथा अन्तरिक्ष में जीवनदाता माना गया है। स्वस्तिक को सूर्य की प्रतिमा मान कर इन्हीं विशेषताओं के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जागृत करने का उपक्रम किया जाता है। ऋग्वेद में स्वस्तिक के देवता सवृन्त का उल्लेख है। सविन्त सूत्र के अनुसार इस देवता को मनोवांछित फलदाता सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है। विष्णु की चार भुजाओं की संगति भी कहीं-कहीं सुदर्शन चक्र के साथ बिठाई गई है। स्वस्तिक विष्णु के सुदर्शन-चक्र का भी प्रतीक माना गया है। सूर्य का प्रतीक सदैव विष्णु के हाथ में घूमता है। दूसरे शब्दों में स्वस्तिक के चारों ओर मंडल हैं। वह भगवान विष्णु का महान सुदर्शन चक्र है जो समस्त लोक की सृजनात्मक एवं चालक सर्वोच्च सता है। स्वस्तिक की चार भुजाओं से विष्णु के चार भुजा के रूप में माना गया है जो विकास और विनाश के बीच संतुलन बनाकर सृष्टि को चला रहे हैं। भगवान श्रीविष्णु अपने चारों हाथों से दिशाओं का पालन करते हैं। स्वस्तिक का केन्द्र-बिन्दु है नारायण का नाभि-कमल, यानी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का उत्पत्ति-स्थल। इससे सिद्ध होता है कि स्वस्तिक सृजनात्मक है। स्वस्तिक शास्त्रीय दृष्टि से `प्रणय' का स्वरूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वायवीय संहिता में स्वस्तिक को आठ यौगिक आसनों में एक बतलाया गया है। [[यास्काचार्य]] ने इसे ब्रह्म का ही एक स्वरूप माना है। कुछ विद्वान इसकी चार भुजाओं को [[हिन्दू धर्म|हिन्दुओं]] के चार वर्णों की [[एकता]] का प्रतीक मानते हैं। इन भुजाओं को [[ब्रह्मा]] के चार मुख, चार हाथ और चार [[वेद|वेदों]] के रूप में भी स्वीकार किया गया है। स्वस्तिक की खडी रेखा को स्वयं [[ज्योतिर्लिंग]] का सूचन तथा आडी रेखा को विश्व के विस्तार का भी संकेत माना जाता है। इन चारों भुजाओं को चारों दिशाओं के कल्याण की कामना के प्रतीक के रूप में भी स्वीकार किया जाता है, जिन्हें बाद में इसी भावना के साथ रेडक्रॉस सोसायटी ने भी अपनाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ॐ को स्वस्तिक के रूप में लिया जा सकता है। लिपि विज्ञान के आरंभिक काल में गोलाई के अक्षर नहीं, रेखा के आधार पर उनकी रचना हुई थी। ॐ को लिपिबद्ध करने के आरंभिक प्रयास में उसका स्वरूप स्वस्तिक जैसा बना था। ईश्वर के नामों में सर्वोपरि मान्यता ॐ की है। उसको उच्चारण से जब लिपि लेखन में उतारा गया, तो सहज ही उसकी आकृति स्वस्तिक जैसी बन गई। जिस प्रकार ऊँ में उत्पत्ति, स्थिति, लय तीनों शक्तियों का समावेश होने के कारण इसे दिव्य गुणों से युक्त, मंगलमय, विघ्नहारक माना गया है, उसी प्रकार स्वस्तिक में भी इसी निराकार परमात्मा का वास है, जिसमें उत्पत्ति, स्थिति, लय की शक्ति है। अन्तर केवल इतना ही है कि, अंकित करने की कला निम्न है। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभा-मंडल का चिन्ह ही स्वस्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना जाता है। तर्क से भी इसे सिद्ध किया जा सकता है और यह मान्यता श्रुति द्वारा प्रतिपादित तथा युक्तिसंगत भी दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Swastika-3.jpg|उत्तर पश्चिमी बुल्गारिया में 7000 साल पुराने स्वस्तिक|350px|thumb]]&lt;br /&gt;
स्वस्तिक को इण्डो-यूरोपीय प्राचीन देवता, वायु देवता, अग्नि पैदा करने का यंत्र नारी और पुरुष का मिलन, नारी, गणपति एवं सूर्य का प्रतीक माना गया है। यास्क ने स्वस्तिक को अविनाशी ब्रह्म की संज्ञा दी है। अमर कोश में उसे पुण्य, मंगल, क्षेम एवं आशीर्वाद के अर्थ में लिया है। सिद्धान्तसार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। इस प्रकार स्वस्तिक छोटा-सा प्रतीक है, पर उसमें विराट सम्भावनाएं समाई हैं। हम उसका महत्त्व समझें और उसे समुचित श्रद्धा मान्यता प्रदान करते हुए अभीष्ट प्रेरणा करें, यही उचित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वस्ति मंत्र&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
स्वस्तिक में भगवान गणेश का रुप होने का प्रमाण दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथ माने जाने वाले वेदों में आए शांति पाठ से भी होती है, जो हर हिन्दू धार्मिक रीति-रिवाजों में बोला जाता है। स्वस्ति वाचन के प्रथम मन्त्र में लगता है स्वस्तिक का ही निरूपण हुआ है। उसकी चार भुजाओं को ईश्वर की चार दिव्य सत्ताओं का प्रतीक माना गया है। किसी भी मंगल कार्य के प्रारम्भ में स्वस्ति मंत्र बोलकर कार्य की शुभ शुरुआत की जाती है। यह मंत्र है -  &lt;br /&gt;
;ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह पूषा विश्व-वेदा-हा । स्वस्ति न-ह ताक्षर्‌यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो बृहस्पति-हि-दधातु ॥&lt;br /&gt;
महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरूड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो। इस मंत्र में चार बार स्वस्ति शब्द आता है। जिसका मतलब होता है कि इसमें भी चार बार मंगल और शुभ की कामना से श्री गणेश का ध्यान और आवाहन किया गया है। इसमें व्यावहारिक जीवन का पक्ष खोजें तो पाते हैं कि जहां शुभ, मंगल और कल्याण का भाव होता है, वहीं स्वस्तिक का वास होता है सरल शब्दों में जहां परिवार, समाज या रिश्तों में प्यार, सुख, श्री, उमंग, उल्लास, सद्भाव, सुंदरता और विश्वास का भाव हो। वहीं सुख और सौभाग्य होता है। इसे ही जीवन पर श्री गणेश की कृपा माना जाता है यानि श्री गणेश वहीं बसते हैं। इसलिए श्रीगणेश को मंगलकारी देवता माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक की प्राचीनता==&lt;br /&gt;
स्वस्तिक [[आर्य|आर्यत्व]] का चिन्ह माना जाता है। वैदिक साहित्य में स्वस्तिक की चर्चा नहीं हैं। यह शब्द ई॰ सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों के ग्रंथों में मिलता है जबकि धार्मिक कला में इसका प्रयोग शुभ माना जाता है। किंतु ओरेल स्टाइन का मत है कि यह प्रतीक पहले पहल बलूचिस्तान स्थित शाही टुम्प की धूसर भांडवाली संस्कृति में मिलता है जिसे [[हड़प्पा सभ्यता|हड़प्पा]] से पहले का माना जाता है और जिसका सम्बन्ध दक्षिण ईरान की संस्कृति से स्थापित किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;एच॰ डी॰ साँकलिया, दि प्रीहिस्ट्री एंड प्रोटोहिस्ट्री ऑव इंडिया एंड पाकिस्तान, दक्कन कॉलेज पोस्टग्रैड्यूएट एंड रिसर्च इनस्टिट्यूट, पूना, 1974, पृ॰ 323-24&amp;lt;/ref&amp;gt; स्टाइन की दृष्टि से स्वस्तिक का प्रतीक अनोखा है किंतु अरनेस्ट मैके के अनुसार यह सबसे पहले-पहल एलम अर्थात् आर्य पूर्व ईरान में प्रकट होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यद्यपि स्वस्तिक कुछ हड़प्पाई मुहरों पर मिलता है, मैके के अनुसार यह सिंधु घाटी की विशेषता नहीं है। उनके अनुसार यह बहुत पहले मिला। अर्ली इंडस सिविलाइज़ेशन, डोरथी मैके के द्वारा परिवर्द्धित एवं संशोधित द्वितीय संस्करण, इंडोलॉजिकल बुक कॉपोरेशन, दिल्ली, 1976, पृ॰ 71-72&amp;lt;/ref&amp;gt; स्वस्तिक वाले ठप्पे हड़प्पाई में और अल्लीन-देपे में पाये गये हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;दानी एंड मैसन&amp;quot;&amp;gt;दानी एंड मैसन, सं॰ उदधृत पुस्तक में वी॰ एम॰ मैसन &amp;quot;दि ब्रॉन्ज एज इन खोरासन एंड ट्रांसऑकसियाना&amp;quot;, पृ॰ 242&amp;lt;/ref&amp;gt; और उनका समय 2300-2000 ई॰ पू॰ है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;दानी एंड मैसन&amp;quot;/&amp;gt; शाही टुम्प में स्वस्तिक प्रतीक का प्रयोग [[श्राद्ध]] वाले बरतनों पर होता था, और 1200 ई॰ पू॰ के लगभग दक्षिण ताजिकिस्तान में जो क़ब्रगाह मिले हैं और उनमें क़ब्र की जगह पर इस प्रकार का चिन्ह मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt; दानी एंड मैसन, सं॰, उदधृत पुस्तक में लिटविंस्की एंड पयंकोव &amp;quot;पेस्ट्रॉरल ट्राइब्स ऑव दि ब्रॉन्ज एज इन दि आक्सस वैली (बैक्ट्रिया)&amp;quot;, पृ॰ 394&amp;lt;/ref&amp;gt; `मैकेंजी' ने इस समस्या का विषद् रूप से विवेचन किया है और बताया है कि विभिन्न देशों में स्वस्तिक अनेक प्रतीकार्यों को निर्देशित करता है। उन्होंने स्वस्तिक को पजनन प्रतीक उर्वरता का प्रतीक, पुरातन व्यापारिक चिन्ह अलंकरण का चिन्ह एवं अलंकरण का चिन्ह माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्वस्तिक का महत्त्व भरा पड़ा है। मोहन जोदड़ों, हड़प्पा संस्कृति, अशोक के शिला लेखों, रामायण, हरवंश पुराण महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है। भारत में आज तक लगभग जितनी भी पुरातात्विक खुदाइयाँ हुई हैं, उनसे प्राप्त पुरावशेषों में स्वस्तिक का अंकन बराबर मिलता है। [[सिन्धु घाटी]] सभ्यता की खुदाई में प्राप्त बर्तन और [[मुद्रा|मुद्राओं]] पर हमें स्वस्तिक की आकृतियाँ खुदी मिली हैं, जो इसकी प्राचीनता का ज्वलन्त प्रमाण है तथा जिनसे यह प्रमाणित हो जाता है कि लगभग 2-4 हज़ार वर्ष पूर्व में भी मानव सभ्यता अपने भवनों में इस मंगलकारी चिन्ह का प्रयोग करती थी। सिन्धु-घाटी सभ्यता के लोग सूर्य-पूजक थे और स्वस्तिक चिह्व, सूर्य का भी प्रतीक माना जाता रहा है। मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से ऐसी अनेक मुहरें प्राप्त हुई हैं, जिन पर स्वस्तिक अंकित है। मोहन-जोदड़ों की एक मुद्रा में हाथी स्वस्तिक के सम्मुख झुका हुआ दिखलाया गया है। अशोक के शिला-लेखों में स्वस्तिक का प्रयोग अधिकता से हुआ है। पालि अभिलेखों में भी इस प्रतीक का अंकन है। पश्चिम भारत के अनेक गुहा-मंदिरों यथा -- कुंडा, कार्ले, जूनर और शेलारवाड़ी में यह प्रतीक विशेष अवलोकनीय है। साँची, भरहुत और अमरावती के स्तूपों में यह स्वतंत्र रूप से अंकित नहीं है, पर सांची स्तूप के प्रवेश द्वार पर वृत्ताकार चतुष्पथ के रूप में प्रदर्शित है। ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी की खण्डगिरि, [[उदयगिरि गुफ़ाएँ|उदयगिरि]] की रानी की गुफ़ा में भी स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। [[मत्स्य पुराण]] में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वस्तिक की चर्चा की गयी है। [[पाणिनी]] की [[व्याकरण]] में भी स्वस्तिक का उल्लेख है। [[पाली भाषा]] में स्वस्तिक को साक्षियों के नाम से पुकारा गया, जो बाद में साखी या साकी कहलाये जाने लगे। जैन परम्परा में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वीकृत अष्टमंगल द्रव्यों में स्वस्तिक का स्थान सर्वोपरि है। प्रागैतिहासिक मानव के मूल रूप में गुफा भित्तियों पर चित्रकला के जो बीज उकेरे थे उनमें `सीधी, तिरछी या आड़ी रेखाएँ, त्रिकोणात्मक आकृतियाँ थीं। यही आकृतियाँ उस युग की लिपि थी। मेसोपोटेमिया में अस्त्र-शस्त्र पर विजय प्राप्त करने हेतु स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग किया जाता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसा पूर्व में स्वस्तिक आकृति के दायें और बायें पक्ष से आदमी लापरवाह थे। उस समय इस रहस्यमय आकृति की गंभीरता से लोग बेखबर थे। तब यह धार्मिक रूप से दो सिद्धान्तों के विकास और विनाश को दर्शाता था। स्वस्तिक का महत्त्व समाज और धर्म दोनों ही स्थानों में है। भारतवर्ष में एक विशाल जनसमूह स्वस्तिक निशान का उपयोग करता है। कोई इसे सजाने के तौर पर तो कोई इसका उपयोग धर्म और आत्मा को जोड़कर करता है। दक्षिण भारत में जहां इसका उपयोग दीवारों और दरवाजों को सजाने में किया जाता है, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में इस आकृति को तंत्र-मंत्र से जोड़कर देखा जाता है। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में इस आकृति को एक पवित्र धार्मिक चिह्न के रूप में माना जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:many svt.jpg|विभिन्न धर्मों में स्वस्तिक|300px|thumb|left]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;विश्वव्यापी प्रभाव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
हमारे मांगलिक प्रतीकों में स्वस्तिक एक ऐसा चिह्व है, जो अत्यन्त प्राचीन काल से लगभग सभी धर्मों और सम्प्रदायों में प्रचलित रहा है। भारत में तो इसकी जडें गहरायी से पैठी हुई हैं ही, विदेशों में भी इसका काफ़ी अधिक प्रचार प्रसार हुआ है। अनुमान है कि व्यापारी और पर्यटकों के माध्यम से ही हमारा यह मांगलिक प्रतीक विदेशों में पहुँचा। [[भारत]] के समान विदेशों में भी स्वस्तिक को शुभ और विजय का प्रतीक चिह्व माना गया। इसके नाम अवश्य ही अलग-अलग स्थानों में, समय-समय पर अलग-अलग रहे। स्वस्तिक संस्कृत का शब्द है। स्वस्तिक शब्द स्वस्ति से बना है। यह हम सभी जानते हैं कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। संभवत:यहीं से विश्व के अनेक देशों में स्वस्तिक का विस्तार हुआ होगा। स्वस्तिक शब्द का प्रयोग पश्चिमी देशों में भी होता है। विभिन्न देशों में इसका अर्थ भिन्न-भिन्न है। स्वस्तिक चिह्न का डिजाइन इजिप्सन क्रास, चाइनीज ताउ, रोसीक्रूसियंस और क्रिश्चियन क्रास से मिलता जुलता है। विभिन्न आकृतिओं से मिलने वाला यह चिह्न हर युग में अपना अलग-अलग महत्त्व भी रखता है। सनातन धर्म और जैन धर्म हो या बौद्ध धर्म, हर धर्म और युग में अपनी महत्ता के साथ स्वस्तिक उपस्थित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्त्र, ब्रिटेन, अमरीका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन है। स्वस्तिक की रेखाओं को कुछ विद्वान अग्नि उत्पन्न करने वाली अश्वत्थ तथा [[पीपल]] की दो लकड़ियाँ मानते हैं। प्राचीन मिस्त्र के लोग स्वस्तिक को निर्विवाद, रूप से काष्ठ दण्डों का प्रतीक मानते हैं। यज्ञ में अग्नि मंथन के कारण इसे प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि स्वस्तिक सूर्य का प्रतीक है। जैन धर्मावलम्बी अक्षत पूजा के समय स्वस्तिक चिह्न बनाकर तीन बिन्दु बनाते हैं। पारसी उसे चतुर्दिक दिशाओं एवं चारों समय की प्रार्थना का प्रतीक मानते हैं। व्यापारी वर्ग इसे शुभ-लाभ का प्रतीक मानते हैं। बहीखातों में ऊपर की ओर 'श्री' लिखा जाता है। इसके नीचे स्वस्तिक बनाया जाता है। इसमें न और स अक्षर अंकित किया जाता है जो कि नौ निधियों तथा आठों सिद्धियों का प्रतीक माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वास्तिक का प्रयोग अनेक धर्म में किया जाता है। '''आर्य धर्म''' और उसकी शाखा-प्रशाखाओं में स्वस्तिक का समान रूप से सम्मान है। बौद्ध, जैन, सिख धर्मो में उसकी समान मान्यता है। '''बौद्ध और जैन''' लेखों से सम्बन्धित प्राचीन गुफाओं में भी यह प्रतीक मिलता है। जैन व बौद्ध सम्प्रदाय व अन्य धर्मों में प्रायः लाल, पीले एवं श्वेत रंग से अंकित स्वास्तिक का प्रयोग होता रहा है। महात्मा [[बुद्ध]] की मूर्तियों पर और उनके चित्रों पर भी प्रायः स्वस्तिक चिह्व मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। अमरावती के स्तूप पर स्वस्तिक चिह्व हैं। विदेशों में इस मंगल-प्रतीक के प्रचार-प्रसार में [[बौद्ध धर्म]] के प्रचारकों का भी काफ़ी योगदान रहा है। दूसरे देशों में स्वस्तिक का प्रचार महात्मा बुद्ध की चरण पूजा से बढ़ा है। बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण ही [[जापान]] में प्राप्त महात्मा बुद्ध की प्राचीन मूर्तियों पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हुए मिले हैं। जापानी लोग स्वस्तिक को मन जी कहते हैं और धर्म-प्रतीकों में उसका समावेश करते हैं। मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है। '''नेपाल''' में हेरंब तथा '''बर्मा''' में महा पियेन्ने के नाम से पूजित हैं। '''मिस्र''' में सभी देवताओं के पहले कुमकुम से क्रॉस की आकृति बनाई जाती है। वह एक्टोन के नाम से पूजित है। '''यूरोप और अमेरिका''' की प्राचीन सभ्यता में स्वस्तिक का प्रयोग होते रहने के प्रमाण मिलते हैं। '''ईरान, यूनान, मिश्र, मैक्सिको और साइप्रस''' में की गई खुदाइयों में जो मिट्टी के प्राचीन बर्तन मिले हैं, उनमें से अनेक पर स्वस्तिक चिह्व हैं। '''आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड''' के मावरी आदिवासियों द्वारा आदिकाल से स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा हैं। ऑस्ट्रिया के राष्ट्रीय संग्रहालय में अपोलो [[देवता]] की एक प्रतिमा है, जिस पर स्वस्तिक चिह्व बना हुआ है। '''टर्की''' में ईसा से 2200 वर्ष पूर्व के ध्वज-दण्डों में अंकित स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। '''एथेन्स''' में शत्रागार के सामने यह चिह्व बना हुआ है। '''स्कॉटलैण्ड और आयरलैण्ड''' में अनेक ऐसे प्राचीन पत्थर मिले हैं, जिन पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हैं। प्रारम्भिक ईसाई स्मारकों पर भी स्वस्तिक चिह्व देखे गये हैं। कुछ ईसाई पुरातत्त्ववेत्ताओं का विचार है कि '''[[ईसाई धर्म]]''' के प्रतीक क्रॉस का भी प्राचीनतम रूप स्वस्तिक ही है। छठी शताब्दी में '''चीनी''' राजा वू ने स्वस्तिक को सूर्य के प्रतीक के रूप में मानने की घोषणा की थी। '''तिब्बती''' स्वस्तिक को अपने शरीर पर गुदवाते हैं तथा चीन में इसे दीर्घायु एवं कल्याण का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न देशों की रीति-रिवाज के अनुसार पूजा पद्धति में परिवर्तन होता रहता है। सुख समृद्धि एवं रक्षित जीवन के लिए ही स्वस्तिक पूजा का विधान है। &amp;lt;ref name=&amp;quot;आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बेल्जियम''' में नामूर संग्रहालय में एक ऐसा उपकरण है जो हड्डी से बना हुआ है। उस पर क्रॉस के कई चिन्ह बने हुए हैं तथा उन चिन्हों के बीच में एक स्वस्तिक चिन्ह भी है। '''[[इटली]]''' के अनेक प्राचीन अस्थि कलशों पर भी स्वस्तिक चिह्व हैं। इटली के संग्रहालय में रखे एक भाले पर भी स्वस्तिक का चिन्ह हैं। वहाँ के अनेक प्राचीन अस्थिकलशों पर भी स्वस्तिक चिन्ह मिलते हैं। स्वस्तिक को सुख और सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं। वे आज भी इसे अपने आभूषणों में धारण करते हैं। जब [[जर्मनी]] में नात्सियों ने इसे विशुद्ध आर्यत्व का प्रतीक घोषित किया तो इसका विश्वव्यापी महत्त्व हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाजी पार्टी के लोग स्वस्तिक के निशान को बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं संभावनाओं से भरा हुआ माध्यम मानते थे। '''जर्मनी''' के तानाशाह एडोल्फी हिटलर ने उल्टे स्वस्तिक का चिन्ह (वामावर्त स्वस्तिक) अपनी सेना के प्रतीक रूप में और ध्वज में शामिल किया था। सभी सैनिकों की वर्दी एवं टोपी पर यह उल्टा स्वस्तिक चिन्ह अंकित था। उल्टा स्वास्तिक ही उसकी बर्बादी का कारण बना। उसके शासन का नाश हुआ एवं भारी तबाही के साथ युद्ध में उसकी हार हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक से वास्तु दोष निवारण==&lt;br /&gt;
[[चित्र:lantauBuddha.jpg|[[बुद्ध|महात्मा बुद्ध]] की प्रतिमा पर स्वस्तिक|300px|thumb]]&lt;br /&gt;
वास्तु शास्त्र में चार दिशाएँ होती हैं। स्वस्तिक चारों दिशाओं का बोध कराता है। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर। चारों दिशाओं के देव पूर्व के इंद्र, दक्षिण के यम, पश्चिम के वरुण, उत्तर के कुबेर। स्वस्तिक की भुजाएँ चारों उप दिशाओं का बोध कराती हैं। ईशान, अग्नि, नेऋत्य, वायव्य। स्वस्तिक के आकार में आठों दिशाएँ गर्भित हैं। वैदिक हिन्दू धर्म के अनुकूल स्वस्तिक को गणपति का स्वरूप माना है। स्वस्तिक की चारों दिशाएँ से चार युग, सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग की जानकारी मिलती है। चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। चार वेद इत्यादि अनंत जानकारी का बोधक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक की चार भुजाओं में जिन धर्म के मूल सिद्धांतों का बोध होता है। समवसरण में भगवान का दर्शन चतुर्थ दिशाओं से समान रूप से होता है। चार घातिया कर्म ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, अंतराय। चार अनंत चतुष्टय अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख, अनंत वीर्य। उपवन भूमि में चारों दिशाओं में क्रमशः अशोक, सप्तच्छद, चंपक और आम्रवन होते हैं। चार अनुयोग- प्रथमानुयोग, चरणानुयोग, करणानुयोग, द्रव्यानुयोग। चार निक्षेप- नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव। चार कषाय- क्रोध, मान, माया, लोभ। मुख्य चार प्राण- इंद्रिय, बल, आयु, श्वासोच्छवास। चार संज्ञा- आहार, निद्रा, मैथुन, परिग्रह। चार दर्शन- चक्षु, अचक्षु, अवधि, केवल। चार आराधना- दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप। चार गतियाँ- देव, मनुष्य, तिर्यन्च, नरक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में जिन वास्तु नियमों को विद्वानो ने लिख गए हैं उनका महत्त्व आज भी कम नहीं हुआ है। परन्तु कई कारणों से इन नियमों को पालन न करने की सूरत में घर में किसी न किसी तरह का वास्तु दोष आ ही जाता है। इन वास्तु दोषों के निवारण के उपाय किसी प्रशिक्षित वास्तु विशेषज्ञ से कराने चाहिए। लेकिन फौरी तौर पर एक स्वस्तिक प्रयोग बता रहें हैं जिससे वास्तु की समस्या का कुछ हद तक निवारण हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तु दोष को दूर करने के लिए बनाया गया स्वस्तिक 6 इंच से कम नहीं होना चाहिए। घर के मुख्य़ द्वार के दोनों ओर ज़मीन से 4 से 5 फुट ऊपर सिंदूर से यह स्वस्तिक बनाऐं। घर में जहां भी वास्तु दोष है और उसे दूर करना संभव न हो तो वहां पर भी इस तरह का स्वस्तिक बना दें। जिस भी दिशा की शांति करानी हो उस दिशा में 6&amp;quot; x 6&amp;quot; का तांबे का स्वस्तिक यंत्र पूजन कर लगा देना चाहिए। इस यंत्र के साथ उस दिशा स्वामी का रत्न भी यंत्र के साथ लगा दें। नींव पूजन के समय भी इस तरह के यंत्र आठों दिशाओं व ब्रह्म स्थान पर दिशा स्वामियों के रत्न के साथ लगा कर गृहस्वामी के हाथ के बराबर गड्ढा खोद कर, चावल बिछा कर, दबा देना चाहिए। पृथ्वी में इन अभिमंत्रित रत्न जड़े स्वस्तिक यंत्र की स्थापना से इनका प्रभाव काफ़ी बड़े क्षेत्र पर होने लगता है। दिशा स्वामियों की स्थिति इस प्रकार है- ब्रह्म स्थान-माणिक, पूर्व-हीरा, आग्नेय-मूंगा, दक्षिण-नीलम, नैऋत्य-पुखराज, पश्चिम-पन्ना, वायव्य-गोमेद, उत्तर-मोती, इशान-स्फटिक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विधि  :--  शरीर की बाहरी शुद्धि करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए (जिस दिन स्वस्तिक बनाएँ) पवित्र भावनाओं से नौ अंगुल का स्वस्तिक 90 डिग्री के एंगल में सभी भुजाओं को बराबर रखते हुए बनाएँ। केसर से, कुमकुम से, सिन्दूर और तेल के मिश्रण से अनामिका अंगुली से ब्रह्म मुहूर्त में विधिवत बनाने पर उस घर के वातावरण में कुछ समय के लिए अच्छा परिवर्तन महसूस किया जा सकता है। भवन या फ्लैट के मुख्य द्वार पर एवं हर रूम के द्वार पर अंकित करने से सकारात्मक ऊर्जाओं का आगमन होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक चिन्ह लगभग हर समाज में आदर से पूजा जाता है क्योंकि स्वस्तिक के चिन्ह की बनावट ऐसी होती है, कि वह दसों दिशाओं से सकारात्मक एनर्जी को अपनी तरफ खींचता है। इसीलिए किसी भी शुभ काम की शुरुआत से पहले पूजन कर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। ऐसे ही शुभ कार्यो में आम की पत्तियों को आपने लोगों को अक्सर घर के दरवाजे पर बांधते हुए देखा होगा क्योंकि आम की पत्ती ,इसकी लकड़ी ,फल को ज्योतिष की दृष्टी से भी बहुत शुभ माना जाता है। आम की लकड़ी और स्वास्तिक दोनों का संगम आम की लकड़ी का स्वस्तिक उपयोग किया जाए तो इसका बहुत ही शुभ प्रभाव पड़ता है। यदि किसी घर में किसी भी तरह वास्तुदोष हो तो जिस कोण में वास्तु दोष है उसमें आम की लकड़ी से बना स्वास्तिक लगाने से वास्तुदोष में कमी आती है क्योंकि आम की लकड़ी में सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करती है। यदि इसे घर के प्रवेश द्वार पर लगाया जाए तो घर के सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अलावा पूजा के स्थान पर भी इसे लगाये जाने का अपने आप में विशेष प्रभाव बनता है।&lt;br /&gt;
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{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सम्बंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{भारतीय संस्कृति के प्रतीक}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक_कोश]][[Category:हिन्दू_धर्म_कोश]][[Category:धार्मिक चिन्ह]][[Category:वैदिक_धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>खुशी</name></author>
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		<title>स्वस्तिक</title>
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		<updated>2011-09-13T12:47:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=स्वस्तिक|लेख का नाम=स्वस्तिक (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Hindu-Swastika.jpg|स्वस्तिक&amp;lt;br /&amp;gt; Swastika|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
*स्वस्तिक [[हिन्दू धर्म]] का पवित्र, पूजनीय चिन्ह और प्राचीन [[धर्म]] प्रतीक है। यह देवताओं की शक्ति और मनुष्य की मंगलमय कामनाएँ इन दोनों के संयुक्त सामर्थ्य का प्रतीक है। पुरातन वैदिक सनातन संस्कृति का परम मंगलकारी प्रतीक चिन्ह स्वास्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिन्ह अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। &lt;br /&gt;
*अत्यन्त प्राचीन काल से ही [[भारत|भारतीय]] [[संस्कृति]] में स्वस्तिक को मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। विघ्नहर्ता [[गणेश]] की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी [[लक्ष्मी]] के साथ भी शुभ लाभ, स्वस्तिक तथा बहीखाते की पूजा की परम्परा है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसीलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वास्तिक को ही अंकित किया जाता है। &lt;br /&gt;
*किसी भी पूजन कार्य का शुभारंभ बिना स्वस्तिक के नहीं किया जा सकता। चूंकि शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश प्रथम पूजनीय हैं, अत: स्वस्तिक का पूजन करने का अर्थ यही है कि हम श्रीगणेश का पूजन कर उनसे विनती करते हैं कि हमारा पूजन कार्य सफल हो। स्वस्तिक बनाने से हमारे कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
*किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में या सामान्यत: किसी भी पूजा-अर्चना में हम दीवार, थाली या ज़मीन पर स्वस्तिक का निशान बनाकर स्वस्ति वाचन करते हैं। साथ ही स्वस्तिक धनात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक है, इसे बनाने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। &lt;br /&gt;
*इसे हमारे सभी व्रत, पर्व, त्योहार, पूजा एवं हर मांगलिक अवसर पर कुंकुम से अंकित किया जाता है एवं भावपूर्वक ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि हे प्रभु! मेरा कार्य निर्विघ्न सफल हो और हमारे घर में जो अन्न, वस्त्र, वैभव आदि आयें वह पवित्र बनें। &lt;br /&gt;
*देवपूजन, विवाह, व्यापार, बहीखाता पूजन, शिक्षारम्भ तथा मुण्डन-संस्कार आदि में भी स्वस्तिक-पूजन आवश्यक समझा जाता है। स्वस्तिक का चिन्ह वास्तु के अनुसार भी कार्य करता है, इसे भवन, कार्यालय, दूकान या फैक्ट्री या कार्य स्थल के मुख्य द्वार के दोनों ओर स्वास्तिक अंकित करने से किसी की बुरी नज़र नहीं लगती और घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है। &lt;br /&gt;
*पूजा स्थल, तिज़ोरी, कैश बॉक्स, अलमारी में भी स्वास्तिक स्थापित करना चाहिए। महिलाएँ अपने हाथों में [[मेंहदी]] से स्वस्तिक चिह्व बनाती हैं। इसे दैविक आपत्ति या दुष्टात्माओं से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.lakesparadise.com/madhumati/show_artical.php?id=806 |title=आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक - स्वस्तिक |accessmonthday=[[8 अक्टूबर]] |accessyear=[[2010]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=लेक्स पेराडाइस |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*कभी पूजा की थाली में, कभी दरवाजे पर, [[वेद|वेदों]]-[[पुराण|पुराणों]] में प्रयुक्त होने वाला सर्वश्रेष्ठ पवित्र धर्मचिह्न के रूप में प्रयुक्त स्वस्तिक चिह्न आज फैशन की दुनिया में भी शुमार होता जा रहा है। अब यह पूजा की थाली से उठकर घर की दीवारों तथा सुंदरियों के परिधानों और आभूषणों में सजने लगा है।&lt;br /&gt;
*स्वास्तिक को धन-देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। इसकी चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, [[अग्निदेव|अग्नि]], [[इन्द्र]], [[वरुण देवता|वरुण]] एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है। &lt;br /&gt;
*स्वास्तिक का प्रयोग शुद्ध, पवित्र एवं सही ढंग से उचित स्थान पर करना चाहिए। इसके अपमान व ग़लत प्रयोग से बचना चाहिए। शौचालय एवं गन्दे स्थानों पर इसका प्रयोग वर्जित है। ऐसा करने वाले की बुद्धि एवं विवेक समाप्त हो जाता है। दरिद्रता, तनाव एवं रोग एवं क्लेश में वृद्धि होती है। स्वास्तिक के प्रयोग से धनवृद्धि, गृहशान्ति, रोग निवारण, वास्तुदोष निवारण, भौतिक कामनाओं की पूर्ति, तनाव, अनिद्रा, चिन्ता रोग, क्लेश, निर्धनता एवं शत्रुता से मुक्ति भी दिलाता है।&lt;br /&gt;
*ज्योतिष में इस मांगलिक चिन्ह को प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, सफलता व उन्नति का प्रतीक माना गया है। मुख्य द्वार पर 6.5 इंच का स्वास्तिक बनाकर लगाने से से अनेक प्रकार के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
*[[हल्दी]] से अंकित स्वास्तिक शत्रु शमन करता है। स्वास्तिक 27 नक्षत्रों का सन्तुलित करके सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। यह चिन्ह नकारात्मक [[ऊर्जा]] का सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसका भरपूर प्रयोग अमंगल व बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। &lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक का अर्थ== &lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही स्वस्तिक को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। यूँ तो बहुत से लोग इसे हिन्दू धर्म का एक प्रतीक चिन्ह ही मानते हैं । किन्तु वे लोग ये नहीं जानते कि इसके पीछे कितना गहरा अर्थ छिपा हुआ है। सामान्यतय: स्वस्तिक शब्द को &amp;quot;सु&amp;quot; एवं &amp;quot;अस्ति&amp;quot; का मिश्रण योग माना जाता है । यहाँ &amp;quot;सु&amp;quot; का अर्थ है --- शुभ और &amp;quot;अस्ति&amp;quot; का --- होना । संस्कृ्त व्याकरण अनुसार &amp;quot;सु&amp;quot; एवं &amp;quot;अस्ति&amp;quot; को जब संयुक्त किया जाता है तो जो नया शब्द बनता है -- वो है &amp;quot;स्वस्ति&amp;quot; अर्थात &amp;quot;शुभ हो&amp;quot;, &amp;quot;कल्याण हो&amp;quot; । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक शब्द '''सु+अस+क''' से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ सत्ता 'या' अस्तित्व और 'क' का अर्थ है कर्ता या करने वाला। इस प्रकार स्वस्तिक शब्द का अर्थ हुआ '''अच्छा या मंगल करने वाला'''। इसलिए देवता का तेज़ शुभ करनेवाला - स्वस्तिक करने वाला है और उसकी गति सिद्ध चिन्ह 'स्वस्तिक' कहा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण। कल्याण शब्द का उपयोग तमाम सवालों के एक जवाब के रूप में किया जाता है। शायद इसलिए भी यह निशान मानव जीवन में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। संस्कृत में सु-अस धातु से स्वस्तिक शब्द बनता है। सु अर्थात् सुन्दर, श्रेयस्कर, अस् अर्थात् उपस्थिति, अस्तित्व। जिसमें सौन्दर्य एवं श्रेयस का समावेश हो, वह स्वस्तिक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक का सामान्य अर्थ शुभ, मंगल एवं कल्याण करने वाला है। स्वस्तिक शब्द मूलभूत सु+अस धातु से बना हुआ है। सु का अर्थ है अच्छा, कल्याणकारी, मंगलमय और अस का अर्थ है अस्तित्व, सत्ता अर्थात कल्याण की सत्ता और उसका प्रतीक है स्वस्तिक। यह पूर्णतः कल्याणकारी भावना को दर्शाता है। देवताओं के चहुं ओर घूमने वाले आभामंडल का चिन्ह ही स्वास्तिक होने के कारण वे देवताओं की शक्ति का प्रतीक होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ एवं कल्याणकारी माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अमरकोश]] में स्वस्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है, अर्थात सभी [[दिशा|दिशाओं]] में सबका कल्याण हो। इस प्रकार स्वस्तिक में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या '''वसुधैव कुटुम्बकम्''' की भावना निहित है। प्राचीनकाल में हमारे यहाँ कोई भी श्रेष्ठ कार्य करने से पूर्व मंगलाचरण लिखने की परंपरा थी, लेकिन आम आदमी के लिए मंगलाचरण लिखना सम्भव नहीं था, इसलिए ऋषियों ने स्वस्तिक चिन्ह की परिकल्पना की, ताकि सभी के कार्य सानन्द सम्पन्न हों।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2058038.cms?prtpage=1 |title=आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक- स्वस्तिक |accessmonthday=[[8 अक्टूबर]] |accessyear=[[2010]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=नवभारत टाइम्स |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक का आकृति==&lt;br /&gt;
स्वस्तिक का आकृति हमारे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व निर्मित की है। भारत में स्वस्तिक का रूपांकन छह रेखाओं के प्रयोग से होता है। स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। ( या स्वास्तिक बनाने के लिए धन चिन्ह बनाकर उसकी चारों भुजाओं के कोने से समकोण बनाने वाली एक रेखा दाहिनी ओर खींचने से स्वास्तिक बन जाता है। ) रेखा खींचने का कार्य ऊपरी भुजा से प्रारम्भ करना चाहिए। इसमें दक्षिणवर्त्ती गति होती है। मानक दर्शन अनुसार स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती (दक्षिणोन्मुख) हैं। इसे '''दक्षिणावर्त स्वस्तिक''' (घडी की सूई चलने की दिशा) कहते हैं। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर (वामोन्मुख) मुडती हैं। इसे '''वामावर्त स्वस्तिक''' (उसके विपरीत) कहते हैं। दोनों दिशाओं के संकेत स्वरूप दो प्रकार के स्वस्तिक स्त्री एवं पुरुष के प्रतीक के रूप में भी मान्य हैं । किन्तु जहाँ दाईं ओर मुडी भुजा वाला स्वस्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक हैं, वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वस्तिक को अमांगलिक, हानिकारक माना गया है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊं एवं स्वास्तिक का सामूहिक प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को शीघ्रता से दूर करता है। स्वस्तिक चिह्व की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल की प्रतीक माना जाता है। वे हैं - अरहन्त-मंगल, सिद्ध-मंगल, साहू-मंगल और केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगल। कुछ विद्वानों की यह मान्यता है कि यह ॐ का ही विकृत रूप है। इन रेखाओं को आचार्य अभिनव गुप्त ने नाद ब्रह्म अथवा अक्षर ब्रह्म का परिचायक माना है। नाद के पश्यंती, मध्यमा तथा बैखरी-तीन रूप हैं। अत:स्वस्तिक ब्रह्म का प्रतीक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुति, अनुभूति तथा युक्ति इन तीनों का यह एक सा प्रतिपादन प्रयागराज में होने वाले संगम के समान हैं। दिशाएँ मुख्यत: चार हैं, खड़ी तथा सीधी रेखा खींचकर जो घन चिन्ह (+) जैसा आकार बनता है यह आकार चारों दिशाओं का द्योतक सर्वत्र और सदैव यही माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में राजा महाराज द्वारा किलों का निर्माण स्वस्तिक के आकार में किया जाता रहा है ताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे। प्राचीन पारम्परिक तरीके से निर्मित किलों में शत्रु द्वारा एक द्वार पर ही सफलता अर्जित करने के पश्चात सेना द्वारा किले में प्रवेश कर उसके अधिकाँश भाग अथवा सम्पूर्ण किले पर अधिकार करने के बाद नर संहार होता रहा है । परन्तु स्वस्तिक नुमा द्वारों के निर्माण के कारण शत्रु सेना को एक द्वार पर यदि सफलता मिल भी जाती थी तो बाकी के तीनों द्वार सुरक्षित रहते थे । ऎसी मज़बूत एवं दूरगामी व्यवस्थाओं के कारण शत्रु के लिए किले के सभी भागों को एक साथ जीतना संभव नहीं होता था । यहाँ स्वस्तिक किला / दुर्ग निर्माण के परिपेक्ष्य में &amp;quot;सु वास्तु&amp;quot; था । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वस्तिक की ऊर्जा&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
स्वस्तिक का आकृति सदैव कुमकुम (कुंकुम), सिन्दूर व अष्टगंध से ही अंकित करना चाहिए। यदि आधुनिक दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक, इत्यादि माँगलिक चिन्हों की महता स्वीकार करने लगा है । आधुनिक विज्ञान ने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु, पदार्थ इत्यादि के ऊर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है और इस ऊर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है -- '''बोविस''' । इस यंत्र का आविष्कार जर्मन और फ्रांस ने किया है। मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है। वैज्ञानिक हार्टमेण्ट अनसर्ट ने आवेएंटिना नामक यन्त्र द्वारा '''विधिवत पूर्ण लाल कुंकुम से अंकित स्वस्तिक की सकारात्मक ऊर्जा को 100000 बोविस यूनिट''' में नापा है। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है। ऊं (70000 बोविस) चिन्ह से भी अधिक सकारात्मक ऊर्जा स्वस्तिक में है। इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों यथा मन्दिर, गुरुद्वारा इत्यादि का ऊर्जा स्तर काफ़ी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति का अनुभव और अपनी समस्याओं, कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है। यही नहीं हमारे घरों, मन्दिरों, पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किए जाने वाले अन्य मांगलिक चिन्हों यथा ॐ इत्यादि में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:swt red.jpg|लाल रंग का स्वस्तिक|250px|thumb|left]]&lt;br /&gt;
==लाल रंग का स्वस्तिक==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में लाल रंग का सर्वाधिक महत्त्व है और मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिन्दूर, रोली या कुंकुम के रूप में किया जाता है। सभी देवताओं की प्रतिमा पर रोली का टीका लगाया जाता है। लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। लाल टीका तेजस्विता, पराक्रम, गौरव और यश का प्रतीक माना गया है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को दर्शाता है। यह रंग लोगों के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। यह रंग मंगल ग्रह का है जो स्वयं ही साहस, पराक्रम, बल व शक्ति का प्रतीक है। यह सजीवता का प्रतीक है और हमारे शरीर में व्याप्त होकर प्राण शक्ति का पोषक है। मूलतः यह रंग ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति एवं महत्त्वकांक्षा का प्रतीक है। नारी के जीवन में इसका विशेष स्थान है और उसके सुहाग चिन्ह व श्रृंगार में सर्वाधिक प्रयुक्त होता है। स्त्राी के मांग का सिन्दूर, माथे की बिन्दी, हाथों की चूड़ियां, पांव का आलता, महावर, करवाचौथ की साड़ी, शादी का जोड़ा एवं प्रेमिका को दिया लाल गुलाब आदि सभी लाल रंग की महत्ता है। नाभि स्थित मणिपुर चक्र का पर्याय भी लाल रंग है। शरीर में लाल रंग की कमी से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। लाल रंग से ही केसरिया, गुलाबी, मैहरुन और अन्य रंग बनाए जाते हैं। इन सब तथ्यों से प्रमाणित होता है कि स्वास्तिक लाल रंग से ही अंकित किया जाना चाहिए या बनाना चाहिए।&lt;br /&gt;
==भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक का पौराणिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
वेदों में स्वस्तिक चिह्न के बनावट की व्याख्या विभिन्न अर्थों में की गई है। भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिह्व को [[विष्णु]], [[सूर्य देव|सूर्य]], सृष्टिचक्र तथा सम्पूर्ण [[ब्रह्माण्ड]] का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने इसे [[गणेश]] का प्रतीक मानकर इसे प्रथम वन्दनीय भी माना है। धार्मिक नजरिए से स्वस्तिक भगवान श्री गणेश का साकार रुप है। स्वस्तिक में बाएं भाग में गं बीजमंत्र होता है, जो भगवान श्री गणेश का स्थान माना जाता है। इसकी आकृति में चार बिन्दियां भी बनाई जाती है। जिसमें गौरी, पृथ्वी, कूर्म यानि कछुआ और अनन्त देवताओं का वास माना जाता है। शिव के वरदान स्वरूप हर मांगलिक और शुभ कार्य पर सबसे पहले श्रीगणेश का पूजन किया जाता है। इसी वजह से किसी भी प्रकार का कोई भी मांगलिक कार्य, शुभ कर्म या विवाह आदि धर्म कर्म में स्वतिस्क बनाना अनिवार्य है। गणेश की प्रतिमा की स्वस्तिक चिह्न के साथ संगति बैठ जाती है। गणपति की सूंड, हाथ, पैर, सिर आदि को इस तरह चित्रित किया जा सकता है, जिसमें स्वस्तिक की चार भुजाओं का ठीक तरह समन्वय हो जाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सूर्य को समस्त देव शक्तियों का केंद्र और भूतल तथा अन्तरिक्ष में जीवनदाता माना गया है। स्वस्तिक को सूर्य की प्रतिमा मान कर इन्हीं विशेषताओं के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जागृत करने का उपक्रम किया जाता है। ऋग्वेद में स्वस्तिक के देवता सवृन्त का उल्लेख है। सविन्त सूत्र के अनुसार इस देवता को मनोवांछित फलदाता सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है। विष्णु की चार भुजाओं की संगति भी कहीं-कहीं सुदर्शन चक्र के साथ बिठाई गई है। स्वस्तिक विष्णु के सुदर्शन-चक्र का भी प्रतीक माना गया है। सूर्य का प्रतीक सदैव विष्णु के हाथ में घूमता है। दूसरे शब्दों में स्वस्तिक के चारों ओर मंडल हैं। वह भगवान विष्णु का महान सुदर्शन चक्र है जो समस्त लोक की सृजनात्मक एवं चालक सर्वोच्च सता है। स्वस्तिक की चार भुजाओं से विष्णु के चार भुजा के रूप में माना गया है जो विकास और विनाश के बीच संतुलन बनाकर सृष्टि को चला रहे हैं। भगवान श्रीविष्णु अपने चारों हाथों से दिशाओं का पालन करते हैं। स्वस्तिक का केन्द्र-बिन्दु है नारायण का नाभि-कमल, यानी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का उत्पत्ति-स्थल। इससे सिद्ध होता है कि स्वस्तिक सृजनात्मक है। स्वस्तिक शास्त्रीय दृष्टि से `प्रणय' का स्वरूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वायवीय संहिता में स्वस्तिक को आठ यौगिक आसनों में एक बतलाया गया है। [[यास्काचार्य]] ने इसे ब्रह्म का ही एक स्वरूप माना है। कुछ विद्वान इसकी चार भुजाओं को [[हिन्दू धर्म|हिन्दुओं]] के चार वर्णों की [[एकता]] का प्रतीक मानते हैं। इन भुजाओं को [[ब्रह्मा]] के चार मुख, चार हाथ और चार [[वेद|वेदों]] के रूप में भी स्वीकार किया गया है। स्वस्तिक की खडी रेखा को स्वयं [[ज्योतिर्लिंग]] का सूचन तथा आडी रेखा को विश्व के विस्तार का भी संकेत माना जाता है। इन चारों भुजाओं को चारों दिशाओं के कल्याण की कामना के प्रतीक के रूप में भी स्वीकार किया जाता है, जिन्हें बाद में इसी भावना के साथ रेडक्रॉस सोसायटी ने भी अपनाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ॐ को स्वस्तिक के रूप में लिया जा सकता है। लिपि विज्ञान के आरंभिक काल में गोलाई के अक्षर नहीं, रेखा के आधार पर उनकी रचना हुई थी। ॐ को लिपिबद्ध करने के आरंभिक प्रयास में उसका स्वरूप स्वस्तिक जैसा बना था। ईश्वर के नामों में सर्वोपरि मान्यता ॐ की है। उसको उच्चारण से जब लिपि लेखन में उतारा गया, तो सहज ही उसकी आकृति स्वस्तिक जैसी बन गई। जिस प्रकार ऊँ में उत्पत्ति, स्थिति, लय तीनों शक्तियों का समावेश होने के कारण इसे दिव्य गुणों से युक्त, मंगलमय, विघ्नहारक माना गया है, उसी प्रकार स्वस्तिक में भी इसी निराकार परमात्मा का वास है, जिसमें उत्पत्ति, स्थिति, लय की शक्ति है। अन्तर केवल इतना ही है कि, अंकित करने की कला निम्न है। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभा-मंडल का चिन्ह ही स्वस्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना जाता है। तर्क से भी इसे सिद्ध किया जा सकता है और यह मान्यता श्रुति द्वारा प्रतिपादित तथा युक्तिसंगत भी दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक को इण्डो-यूरोपीय प्राचीन देवता, वायु देवता, अग्नि पैदा करने का यंत्र नारी और पुरुष का मिलन, नारी, गणपति एवं सूर्य का प्रतीक माना गया है। यास्क ने स्वस्तिक को अविनाशी ब्रह्म की संज्ञा दी है। अमर कोश में उसे पुण्य, मंगल, क्षेम एवं आशीर्वाद के अर्थ में लिया है। सिद्धान्तसार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। इस प्रकार स्वस्तिक छोटा-सा प्रतीक है, पर उसमें विराट सम्भावनाएं समाई हैं। हम उसका महत्त्व समझें और उसे समुचित श्रद्धा मान्यता प्रदान करते हुए अभीष्ट प्रेरणा करें, यही उचित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्वस्ति मंत्र&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
स्वस्तिक में भगवान गणेश का रुप होने का प्रमाण दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथ माने जाने वाले वेदों में आए शांति पाठ से भी होती है, जो हर हिन्दू धार्मिक रीति-रिवाजों में बोला जाता है। स्वस्ति वाचन के प्रथम मन्त्र में लगता है स्वस्तिक का ही निरूपण हुआ है। उसकी चार भुजाओं को ईश्वर की चार दिव्य सत्ताओं का प्रतीक माना गया है। किसी भी मंगल कार्य के प्रारम्भ में स्वस्ति मंत्र बोलकर कार्य की शुभ शुरुआत की जाती है। यह मंत्र है -  &lt;br /&gt;
;ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह पूषा विश्व-वेदा-हा । स्वस्ति न-ह ताक्षर्‌यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो बृहस्पति-हि-दधातु ॥&lt;br /&gt;
महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरूड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो। इस मंत्र में चार बार स्वस्ति शब्द आता है। जिसका मतलब होता है कि इसमें भी चार बार मंगल और शुभ की कामना से श्री गणेश का ध्यान और आवाहन किया गया है। इसमें व्यावहारिक जीवन का पक्ष खोजें तो पाते हैं कि जहां शुभ, मंगल और कल्याण का भाव होता है, वहीं स्वस्तिक का वास होता है सरल शब्दों में जहां परिवार, समाज या रिश्तों में प्यार, सुख, श्री, उमंग, उल्लास, सद्भाव, सुंदरता और विश्वास का भाव हो। वहीं सुख और सौभाग्य होता है। इसे ही जीवन पर श्री गणेश की कृपा माना जाता है यानि श्री गणेश वहीं बसते हैं। इसलिए श्रीगणेश को मंगलकारी देवता माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक की प्राचीनता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Swastika-3.jpg|उत्तर पश्चिमी बुल्गारिया में 7000 साल पुराने स्वस्तिक|350px|thumb]]&lt;br /&gt;
स्वस्तिक [[आर्य|आर्यत्व]] का चिन्ह माना जाता है। वैदिक साहित्य में स्वस्तिक की चर्चा नहीं हैं। यह शब्द ई॰ सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों के ग्रंथों में मिलता है जबकि धार्मिक कला में इसका प्रयोग शुभ माना जाता है। किंतु ओरेल स्टाइन का मत है कि यह प्रतीक पहले पहल बलूचिस्तान स्थित शाही टुम्प की धूसर भांडवाली संस्कृति में मिलता है जिसे [[हड़प्पा सभ्यता|हड़प्पा]] से पहले का माना जाता है और जिसका सम्बन्ध दक्षिण ईरान की संस्कृति से स्थापित किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;एच॰ डी॰ साँकलिया, दि प्रीहिस्ट्री एंड प्रोटोहिस्ट्री ऑव इंडिया एंड पाकिस्तान, दक्कन कॉलेज पोस्टग्रैड्यूएट एंड रिसर्च इनस्टिट्यूट, पूना, 1974, पृ॰ 323-24&amp;lt;/ref&amp;gt; स्टाइन की दृष्टि से स्वस्तिक का प्रतीक अनोखा है किंतु अरनेस्ट मैके के अनुसार यह सबसे पहले-पहल एलम अर्थात् आर्य पूर्व ईरान में प्रकट होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;यद्यपि स्वस्तिक कुछ हड़प्पाई मुहरों पर मिलता है, मैके के अनुसार यह सिंधु घाटी की विशेषता नहीं है। उनके अनुसार यह बहुत पहले मिला। अर्ली इंडस सिविलाइज़ेशन, डोरथी मैके के द्वारा परिवर्द्धित एवं संशोधित द्वितीय संस्करण, इंडोलॉजिकल बुक कॉपोरेशन, दिल्ली, 1976, पृ॰ 71-72&amp;lt;/ref&amp;gt; स्वस्तिक वाले ठप्पे हड़प्पाई में और अल्लीन-देपे में पाये गये हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;दानी एंड मैसन&amp;quot;&amp;gt;दानी एंड मैसन, सं॰ उदधृत पुस्तक में वी॰ एम॰ मैसन &amp;quot;दि ब्रॉन्ज एज इन खोरासन एंड ट्रांसऑकसियाना&amp;quot;, पृ॰ 242&amp;lt;/ref&amp;gt; और उनका समय 2300-2000 ई॰ पू॰ है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;दानी एंड मैसन&amp;quot;/&amp;gt; शाही टुम्प में स्वस्तिक प्रतीक का प्रयोग [[श्राद्ध]] वाले बरतनों पर होता था, और 1200 ई॰ पू॰ के लगभग दक्षिण ताजिकिस्तान में जो क़ब्रगाह मिले हैं और उनमें क़ब्र की जगह पर इस प्रकार का चिन्ह मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt; दानी एंड मैसन, सं॰, उदधृत पुस्तक में लिटविंस्की एंड पयंकोव &amp;quot;पेस्ट्रॉरल ट्राइब्स ऑव दि ब्रॉन्ज एज इन दि आक्सस वैली (बैक्ट्रिया)&amp;quot;, पृ॰ 394&amp;lt;/ref&amp;gt; `मैकेंजी' ने इस समस्या का विषद् रूप से विवेचन किया है और बताया है कि विभिन्न देशों में स्वस्तिक अनेक प्रतीकार्यों को निर्देशित करता है। उन्होंने स्वस्तिक को पजनन प्रतीक उर्वरता का प्रतीक, पुरातन व्यापारिक चिन्ह अलंकरण का चिन्ह एवं अलंकरण का चिन्ह माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्वस्तिक का महत्त्व भरा पड़ा है। मोहन जोदड़ों, हड़प्पा संस्कृति, अशोक के शिला लेखों, रामायण, हरवंश पुराण महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है। भारत में आज तक लगभग जितनी भी पुरातात्विक खुदाइयाँ हुई हैं, उनसे प्राप्त पुरावशेषों में स्वस्तिक का अंकन बराबर मिलता है। [[सिन्धु घाटी]] सभ्यता की खुदाई में प्राप्त बर्तन और [[मुद्रा|मुद्राओं]] पर हमें स्वस्तिक की आकृतियाँ खुदी मिली हैं, जो इसकी प्राचीनता का ज्वलन्त प्रमाण है तथा जिनसे यह प्रमाणित हो जाता है कि लगभग 2-4 हज़ार वर्ष पूर्व में भी मानव सभ्यता अपने भवनों में इस मंगलकारी चिन्ह का प्रयोग करती थी। सिन्धु-घाटी सभ्यता के लोग सूर्य-पूजक थे और स्वस्तिक चिह्व, सूर्य का भी प्रतीक माना जाता रहा है। मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से ऐसी अनेक मुहरें प्राप्त हुई हैं, जिन पर स्वस्तिक अंकित है। मोहन-जोदड़ों की एक मुद्रा में हाथी स्वस्तिक के सम्मुख झुका हुआ दिखलाया गया है। अशोक के शिला-लेखों में स्वस्तिक का प्रयोग अधिकता से हुआ है। पालि अभिलेखों में भी इस प्रतीक का अंकन है। पश्चिम भारत के अनेक गुहा-मंदिरों यथा -- कुंडा, कार्ले, जूनर और शेलारवाड़ी में यह प्रतीक विशेष अवलोकनीय है। साँची, भरहुत और अमरावती के स्तूपों में यह स्वतंत्र रूप से अंकित नहीं है, पर सांची स्तूप के प्रवेश द्वार पर वृत्ताकार चतुष्पथ के रूप में प्रदर्शित है। ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी की खण्डगिरि, [[उदयगिरि गुफ़ाएँ|उदयगिरि]] की रानी की गुफ़ा में भी स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। [[मत्स्य पुराण]] में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वस्तिक की चर्चा की गयी है। [[पाणिनी]] की [[व्याकरण]] में भी स्वस्तिक का उल्लेख है। [[पाली भाषा]] में स्वस्तिक को साक्षियों के नाम से पुकारा गया, जो बाद में साखी या साकी कहलाये जाने लगे। जैन परम्परा में मांगलिक प्रतीक के रूप में स्वीकृत अष्टमंगल द्रव्यों में स्वस्तिक का स्थान सर्वोपरि है। प्रागैतिहासिक मानव के मूल रूप में गुफा भित्तियों पर चित्रकला के जो बीज उकेरे थे उनमें `सीधी, तिरछी या आड़ी रेखाएँ, त्रिकोणात्मक आकृतियाँ थीं। यही आकृतियाँ उस युग की लिपि थी। मेसोपोटेमिया में अस्त्र-शस्त्र पर विजय प्राप्त करने हेतु स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग किया जाता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसा पूर्व में स्वस्तिक आकृति के दायें और बायें पक्ष से आदमी लापरवाह थे। उस समय इस रहस्यमय आकृति की गंभीरता से लोग बेखबर थे। तब यह धार्मिक रूप से दो सिद्धान्तों के विकास और विनाश को दर्शाता था। स्वस्तिक का महत्त्व समाज और धर्म दोनों ही स्थानों में है। भारतवर्ष में एक विशाल जनसमूह स्वस्तिक निशान का उपयोग करता है। कोई इसे सजाने के तौर पर तो कोई इसका उपयोग धर्म और आत्मा को जोड़कर करता है। दक्षिण भारत में जहां इसका उपयोग दीवारों और दरवाजों को सजाने में किया जाता है, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में इस आकृति को तंत्र-मंत्र से जोड़कर देखा जाता है। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में इस आकृति को एक पवित्र धार्मिक चिह्न के रूप में माना जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:many svt.jpg|विभिन्न धर्मों में स्वस्तिक|300px|thumb|left]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;विश्वव्यापी प्रभाव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
हमारे मांगलिक प्रतीकों में स्वस्तिक एक ऐसा चिह्व है, जो अत्यन्त प्राचीन काल से लगभग सभी धर्मों और सम्प्रदायों में प्रचलित रहा है। भारत में तो इसकी जडें गहरायी से पैठी हुई हैं ही, विदेशों में भी इसका काफ़ी अधिक प्रचार प्रसार हुआ है। अनुमान है कि व्यापारी और पर्यटकों के माध्यम से ही हमारा यह मांगलिक प्रतीक विदेशों में पहुँचा। [[भारत]] के समान विदेशों में भी स्वस्तिक को शुभ और विजय का प्रतीक चिह्व माना गया। इसके नाम अवश्य ही अलग-अलग स्थानों में, समय-समय पर अलग-अलग रहे। स्वस्तिक संस्कृत का शब्द है। स्वस्तिक शब्द स्वस्ति से बना है। यह हम सभी जानते हैं कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। संभवत:यहीं से विश्व के अनेक देशों में स्वस्तिक का विस्तार हुआ होगा। स्वस्तिक शब्द का प्रयोग पश्चिमी देशों में भी होता है। विभिन्न देशों में इसका अर्थ भिन्न-भिन्न है। स्वस्तिक चिह्न का डिजाइन इजिप्सन क्रास, चाइनीज ताउ, रोसीक्रूसियंस और क्रिश्चियन क्रास से मिलता जुलता है। विभिन्न आकृतिओं से मिलने वाला यह चिह्न हर युग में अपना अलग-अलग महत्त्व भी रखता है। सनातन धर्म और जैन धर्म हो या बौद्ध धर्म, हर धर्म और युग में अपनी महत्ता के साथ स्वस्तिक उपस्थित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्त्र, ब्रिटेन, अमरीका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन है। स्वस्तिक की रेखाओं को कुछ विद्वान अग्नि उत्पन्न करने वाली अश्वत्थ तथा [[पीपल]] की दो लकड़ियाँ मानते हैं। प्राचीन मिस्त्र के लोग स्वस्तिक को निर्विवाद, रूप से काष्ठ दण्डों का प्रतीक मानते हैं। यज्ञ में अग्नि मंथन के कारण इसे प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि स्वस्तिक सूर्य का प्रतीक है। जैन धर्मावलम्बी अक्षत पूजा के समय स्वस्तिक चिह्न बनाकर तीन बिन्दु बनाते हैं। पारसी उसे चतुर्दिक दिशाओं एवं चारों समय की प्रार्थना का प्रतीक मानते हैं। व्यापारी वर्ग इसे शुभ-लाभ का प्रतीक मानते हैं। बहीखातों में ऊपर की ओर 'श्री' लिखा जाता है। इसके नीचे स्वस्तिक बनाया जाता है। इसमें न और स अक्षर अंकित किया जाता है जो कि नौ निधियों तथा आठों सिद्धियों का प्रतीक माना जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:lantauBuddha.jpg|[[बुद्ध|महात्मा बुद्ध]] की प्रतिमा पर स्वस्तिक|300px|thumb]]&lt;br /&gt;
स्वास्तिक का प्रयोग अनेक धर्म में किया जाता है। '''आर्य धर्म''' और उसकी शाखा-प्रशाखाओं में स्वस्तिक का समान रूप से सम्मान है। बौद्ध, जैन, सिख धर्मो में उसकी समान मान्यता है। '''बौद्ध और जैन''' लेखों से सम्बन्धित प्राचीन गुफाओं में भी यह प्रतीक मिलता है। जैन व बौद्ध सम्प्रदाय व अन्य धर्मों में प्रायः लाल, पीले एवं श्वेत रंग से अंकित स्वास्तिक का प्रयोग होता रहा है। महात्मा [[बुद्ध]] की मूर्तियों पर और उनके चित्रों पर भी प्रायः स्वस्तिक चिह्व मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। अमरावती के स्तूप पर स्वस्तिक चिह्व हैं। विदेशों में इस मंगल-प्रतीक के प्रचार-प्रसार में [[बौद्ध धर्म]] के प्रचारकों का भी काफ़ी योगदान रहा है। दूसरे देशों में स्वस्तिक का प्रचार महात्मा बुद्ध की चरण पूजा से बढ़ा है। बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण ही [[जापान]] में प्राप्त महात्मा बुद्ध की प्राचीन मूर्तियों पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हुए मिले हैं। जापानी लोग स्वस्तिक को मन जी कहते हैं और धर्म-प्रतीकों में उसका समावेश करते हैं। मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है। '''नेपाल''' में हेरंब तथा '''बर्मा''' में महा पियेन्ने के नाम से पूजित हैं। '''मिस्र''' में सभी देवताओं के पहले कुमकुम से क्रॉस की आकृति बनाई जाती है। वह एक्टोन के नाम से पूजित है। '''यूरोप और अमेरिका''' की प्राचीन सभ्यता में स्वस्तिक का प्रयोग होते रहने के प्रमाण मिलते हैं। '''ईरान, यूनान, मिश्र, मैक्सिको और साइप्रस''' में की गई खुदाइयों में जो मिट्टी के प्राचीन बर्तन मिले हैं, उनमें से अनेक पर स्वस्तिक चिह्व हैं। '''आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड''' के मावरी आदिवासियों द्वारा आदिकाल से स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा हैं। ऑस्ट्रिया के राष्ट्रीय संग्रहालय में अपोलो [[देवता]] की एक प्रतिमा है, जिस पर स्वस्तिक चिह्व बना हुआ है। '''टर्की''' में ईसा से 2200 वर्ष पूर्व के ध्वज-दण्डों में अंकित स्वस्तिक चिह्व मिले हैं। '''एथेन्स''' में शत्रागार के सामने यह चिह्व बना हुआ है। '''स्कॉटलैण्ड और आयरलैण्ड''' में अनेक ऐसे प्राचीन पत्थर मिले हैं, जिन पर स्वस्तिक चिह्व अंकित हैं। प्रारम्भिक ईसाई स्मारकों पर भी स्वस्तिक चिह्व देखे गये हैं। कुछ ईसाई पुरातत्त्ववेत्ताओं का विचार है कि '''[[ईसाई धर्म]]''' के प्रतीक क्रॉस का भी प्राचीनतम रूप स्वस्तिक ही है। छठी शताब्दी में '''चीनी''' राजा वू ने स्वस्तिक को सूर्य के प्रतीक के रूप में मानने की घोषणा की थी। '''तिब्बती''' स्वस्तिक को अपने शरीर पर गुदवाते हैं तथा चीन में इसे दीर्घायु एवं कल्याण का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न देशों की रीति-रिवाज के अनुसार पूजा पद्धति में परिवर्तन होता रहता है। सुख समृद्धि एवं रक्षित जीवन के लिए ही स्वस्तिक पूजा का विधान है। &amp;lt;ref name=&amp;quot;आर्य संस्कृति का मंगल प्रतीक&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बेल्जियम''' में नामूर संग्रहालय में एक ऐसा उपकरण है जो हड्डी से बना हुआ है। उस पर क्रॉस के कई चिन्ह बने हुए हैं तथा उन चिन्हों के बीच में एक स्वस्तिक चिन्ह भी है। '''[[इटली]]''' के अनेक प्राचीन अस्थि कलशों पर भी स्वस्तिक चिह्व हैं। इटली के संग्रहालय में रखे एक भाले पर भी स्वस्तिक का चिन्ह हैं। वहाँ के अनेक प्राचीन अस्थिकलशों पर भी स्वस्तिक चिन्ह मिलते हैं। स्वस्तिक को सुख और सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं। वे आज भी इसे अपने आभूषणों में धारण करते हैं। जब [[जर्मनी]] में नात्सियों ने इसे विशुद्ध आर्यत्व का प्रतीक घोषित किया तो इसका विश्वव्यापी महत्त्व हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की नाजी पार्टी के लोग स्वस्तिक के निशान को बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं संभावनाओं से भरा हुआ माध्यम मानते थे। '''जर्मनी''' के तानाशाह एडोल्फी हिटलर ने उल्टे स्वस्तिक का चिन्ह (वामावर्त स्वस्तिक) अपनी सेना के प्रतीक रूप में और ध्वज में शामिल किया था। सभी सैनिकों की वर्दी एवं टोपी पर यह उल्टा स्वस्तिक चिन्ह अंकित था। उल्टा स्वास्तिक ही उसकी बर्बादी का कारण बना। उसके शासन का नाश हुआ एवं भारी तबाही के साथ युद्ध में उसकी हार हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्वस्तिक से वास्तु दोष निवारण==&lt;br /&gt;
वास्तु शास्त्र में चार दिशाएँ होती हैं। स्वस्तिक चारों दिशाओं का बोध कराता है। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर। चारों दिशाओं के देव पूर्व के इंद्र, दक्षिण के यम, पश्चिम के वरुण, उत्तर के कुबेर। स्वस्तिक की भुजाएँ चारों उप दिशाओं का बोध कराती हैं। ईशान, अग्नि, नेऋत्य, वायव्य। स्वस्तिक के आकार में आठों दिशाएँ गर्भित हैं। वैदिक हिन्दू धर्म के अनुकूल स्वस्तिक को गणपति का स्वरूप माना है। स्वस्तिक की चारों दिशाएँ से चार युग, सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग की जानकारी मिलती है। चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। चार वेद इत्यादि अनंत जानकारी का बोधक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक की चार भुजाओं में जिन धर्म के मूल सिद्धांतों का बोध होता है। समवसरण में भगवान का दर्शन चतुर्थ दिशाओं से समान रूप से होता है। चार घातिया कर्म ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, अंतराय। चार अनंत चतुष्टय अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख, अनंत वीर्य। उपवन भूमि में चारों दिशाओं में क्रमशः अशोक, सप्तच्छद, चंपक और आम्रवन होते हैं। चार अनुयोग- प्रथमानुयोग, चरणानुयोग, करणानुयोग, द्रव्यानुयोग। चार निक्षेप- नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव। चार कषाय- क्रोध, मान, माया, लोभ। मुख्य चार प्राण- इंद्रिय, बल, आयु, श्वासोच्छवास। चार संज्ञा- आहार, निद्रा, मैथुन, परिग्रह। चार दर्शन- चक्षु, अचक्षु, अवधि, केवल। चार आराधना- दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप। चार गतियाँ- देव, मनुष्य, तिर्यन्च, नरक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में जिन वास्तु नियमों को विद्वानो ने लिख गए हैं उनका महत्त्व आज भी कम नहीं हुआ है। परन्तु कई कारणों से इन नियमों को पालन न करने की सूरत में घर में किसी न किसी तरह का वास्तु दोष आ ही जाता है। इन वास्तु दोषों के निवारण के उपाय किसी प्रशिक्षित वास्तु विशेषज्ञ से कराने चाहिए। लेकिन फौरी तौर पर एक स्वस्तिक प्रयोग बता रहें हैं जिससे वास्तु की समस्या का कुछ हद तक निवारण हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तु दोष को दूर करने के लिए बनाया गया स्वस्तिक 6 इंच से कम नहीं होना चाहिए। घर के मुख्य़ द्वार के दोनों ओर ज़मीन से 4 से 5 फुट ऊपर सिंदूर से यह स्वस्तिक बनाऐं। घर में जहां भी वास्तु दोष है और उसे दूर करना संभव न हो तो वहां पर भी इस तरह का स्वस्तिक बना दें। जिस भी दिशा की शांति करानी हो उस दिशा में 6&amp;quot; x 6&amp;quot; का तांबे का स्वस्तिक यंत्र पूजन कर लगा देना चाहिए। इस यंत्र के साथ उस दिशा स्वामी का रत्न भी यंत्र के साथ लगा दें। नींव पूजन के समय भी इस तरह के यंत्र आठों दिशाओं व ब्रह्म स्थान पर दिशा स्वामियों के रत्न के साथ लगा कर गृहस्वामी के हाथ के बराबर गड्ढा खोद कर, चावल बिछा कर, दबा देना चाहिए। पृथ्वी में इन अभिमंत्रित रत्न जड़े स्वस्तिक यंत्र की स्थापना से इनका प्रभाव काफ़ी बड़े क्षेत्र पर होने लगता है। दिशा स्वामियों की स्थिति इस प्रकार है- ब्रह्म स्थान-माणिक, पूर्व-हीरा, आग्नेय-मूंगा, दक्षिण-नीलम, नैऋत्य-पुखराज, पश्चिम-पन्ना, वायव्य-गोमेद, उत्तर-मोती, इशान-स्फटिक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विधि  :--  शरीर की बाहरी शुद्धि करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए (जिस दिन स्वस्तिक बनाएँ) पवित्र भावनाओं से नौ अंगुल का स्वस्तिक 90 डिग्री के एंगल में सभी भुजाओं को बराबर रखते हुए बनाएँ। केसर से, कुमकुम से, सिन्दूर और तेल के मिश्रण से अनामिका अंगुली से ब्रह्म मुहूर्त में विधिवत बनाने पर उस घर के वातावरण में कुछ समय के लिए अच्छा परिवर्तन महसूस किया जा सकता है। भवन या फ्लैट के मुख्य द्वार पर एवं हर रूम के द्वार पर अंकित करने से सकारात्मक ऊर्जाओं का आगमन होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्तिक चिन्ह लगभग हर समाज में आदर से पूजा जाता है क्योंकि स्वस्तिक के चिन्ह की बनावट ऐसी होती है, कि वह दसों दिशाओं से सकारात्मक एनर्जी को अपनी तरफ खींचता है। इसीलिए किसी भी शुभ काम की शुरुआत से पहले पूजन कर स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है। ऐसे ही शुभ कार्यो में आम की पत्तियों को आपने लोगों को अक्सर घर के दरवाजे पर बांधते हुए देखा होगा क्योंकि आम की पत्ती ,इसकी लकड़ी ,फल को ज्योतिष की दृष्टी से भी बहुत शुभ माना जाता है। आम की लकड़ी और स्वास्तिक दोनों का संगम आम की लकड़ी का स्वस्तिक उपयोग किया जाए तो इसका बहुत ही शुभ प्रभाव पड़ता है। यदि किसी घर में किसी भी तरह वास्तुदोष हो तो जिस कोण में वास्तु दोष है उसमें आम की लकड़ी से बना स्वास्तिक लगाने से वास्तुदोष में कमी आती है क्योंकि आम की लकड़ी में सकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करती है। यदि इसे घर के प्रवेश द्वार पर लगाया जाए तो घर के सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अलावा पूजा के स्थान पर भी इसे लगाये जाने का अपने आप में विशेष प्रभाव बनता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==सम्बंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{भारतीय संस्कृति के प्रतीक}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>खुशी</name></author>
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		<title>ब्रजभाषा</title>
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		<updated>2011-09-13T12:40:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: Adding category :Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Raskhan-2.jpg|thumb|250px|[[रसखान]] के दोहे]]&lt;br /&gt;
'''ब्रजभाषा''' मूलत: ब्रजक्षेत्र की बोली है। विक्रम की 13वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी तक [[भारत]] में साहित्यिक भाषा रहने के कारण ब्रज की इस जनपदीय बोली ने अपने विकास के साथ भाषा नाम प्राप्त किया और ब्रजभाषा नाम से जानी जाने लगी। शुद्ध रूप में यह आज भी [[मथुरा]], [[आगरा]], [[धौलपुर]] और [[अलीगढ़]] ज़िलों में बोली जाती है। इसे हम केंद्रीय ब्रजभाषा भी कह सकते हैं। प्रारम्भ में ब्रजभाषा में ही काव्य रचना हुई। [[भक्तिकाल]] के कवियों ने अपनी रचनाएँ ब्रजभाषा में ही लिखी हैं, जिनमें [[सूरदास]], [[रहीम]], [[रसखान]], [[बिहारी लाल]], [[केशवदास|केशव]], [[घनानन्द कवि|घनानन्द]] आदि कवि प्रमुख हैं। हिन्दी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों में भी ब्रजभाषा के शब्दों का बहुत प्रयोग होता है। आधुनिक ब्रजभाषा 1 करोड़ 23 लाख जनता के द्वारा बोली जाती है और लगभग 38,000 वर्गमील के क्षेत्र में फैली हुई है।&lt;br /&gt;
==ब्रजभाषा का विस्तार==&lt;br /&gt;
'''शुद्ध रूप में ब्रजभाषा आज भी''' मथुरा, [[अलीगढ़]], [[आगरा]], [[भरतपुर]] और धौलपुर ज़िलों में बोली जाती है। ब्रजभाषा का कुछ मिश्रित रूप [[जयपुर]] राज्य के पूर्वी भाग तथा बुलंदशहर, मैनपुरी, [[एटा]], [[बरेली]] और [[बदायूँ]] ज़िलों तक बोला जाता है। ग्रिर्यसन महोदय ने अपने भाषा सर्वे में पीलीभीत, [[शाहजहाँपुर]], फर्रूख़ाबाद, हरदोई, [[इटावा]] तथा [[कानपुर]] की बोली को कन्नौजी नाम दिया है, किन्तु वास्तव में यहाँ की बोली मैनपुरी, एटा बरेली और बदायूँ की बोली से भिन्न नहीं हैं। अधिक से अधिक हम इन सब ज़िलों की बोली को 'पूर्वी ब्रज' कह सकते हैं। सच तो यह है कि, [[बुन्देलखंड]] की बुन्देली बोली भी ब्रजभाषा का ही रुपान्तरण है। बुन्देली 'दक्षिणी ब्रज' कहला सकती है।&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रजभाषा व्याकरण, (प्रथम संस्करण 1937 ई.) पृ. 13&amp;lt;/ref&amp;gt; डॉ. गुलाबराय के अनुसार- &amp;quot;ब्रजभाषा का क्षेत्र निम्न प्रकार है- मथुरा, आगरा, अलीगढ़ ज़िलों को केन्द्र मानकर उत्तर में यह अल्मोड़ा, [[नैनीताल]] और [[बिजनौर]] ज़िलों तक फैली है। दक्षिण में धौलपुर, [[ग्वालियर]] तक, पूर्व में [[कन्नौज]] और [[कानपुर]] ज़िलों तक, पश्चिम में भरतपुर और गुडगाँव ज़िलों तक इसकी सीमा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाषायी सर्वेक्षण तथा अन्य अनुवेषणों के आधार पर श्रीकृष्णदत्त वाजपेयी ने ब्रजभाषा - भाषी क्षेत्र निम्नलिखित है- मथुरा ज़िला, [[राजस्थान]] का भरतपुर ज़िला तथा करौली का उत्तरी अंश जो भरतपुर एंव धौलपुर की सीमाओं से मिला-जुला है। सम्पूर्ण धौलपुर ज़िला, मध्य [[भारत]] में मुरैना से भिण्ड ज़िले और गिर्द ग्वालियर का लगभग 26 अक्षांश से ऊपर का उत्तरी भाग (यहाँ की ब्रजबोली में बुंदेली की झलक है), सम्पूर्ण आगरा ज़िला, इटावा ज़िले का पश्चिमी भाग (लगभग इटावा शहर की सीध देशान्तर 79 तक), मैनपुरी ज़िला तथा एटा ज़िला (पूर्व के कुछ अंशों को छोड़कर, जो फ़र्रुख़ाबाद ज़िले की सीमा से मिले-जुले है), अलीगढ़ ज़िला (उत्तर पूर्व में [[गंगा नदी|गंगा]] नदी की सीमा तक), बुलंदशहर का दक्षिणी आधा भाग (पूर्व में [[अनूपशहर]] की सीध से लेकर), गुड़गाँव ज़िले का दक्षिणी अंश, (पलवल की सीध से) तथा अलवर ज़िले का पूर्वी भाग, जो गुडगाँव ज़िले की दक्षिणी तथा भरतपुर की पश्चिमी सीमा से मिला-जुला है।&amp;lt;ref&amp;gt;वाजपेयी, के. डी., ब्रज का इतिहास प्रथम खंड, प्रथम संस्करण, 1955 ई., पृ. 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाषायी ब्रज के सम्बंध में भाषाविद् डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने लिखा है- अपने विशुद्ध रूप में ब्रजभाषा आज भी आगरा, धौलपुर, मथुरा और अलीगढ़ ज़िलों में बोली जाती है। इसे हम केंद्रीय ब्रजभाषा के नाम से भी पुकार सकते हैं। केंद्रीय ब्रजभाषा क्षेत्र के उत्तर पश्चिम की ओर बुलंदशहर ज़िले की उत्तरी पट्टी से इसमें खड़ी बोली की लटक आने लगती है। उत्तरी-पूर्वी ज़िलों अर्थात् बदायूँ और एटा ज़िलों में इस पर कन्नौजी का प्रभाव प्रारंभ हो जाता है। डा. धीरेंद्र वर्मा, कन्नौजी को ब्रजभाषा का ही एक रूप मानते हैं। दक्षिण की ओर ग्वालियर में पहुँचकर इसमें बुंदेली की झलक आने लगती है। पश्चिम की ओर गुड़गाँव तथा भरतपुर का क्षेत्र राजस्थानी से प्रभावित है। वर्तमान समय में ब्रजभाषा एक ग्रामीण भाषा है, जो मथुरा-आगरा केन्द्रित ब्रजक्षेत्र में बोली जाती है। यह निम्न ज़िलों की प्रधान भाषा है:&lt;br /&gt;
*[[मथुरा]]&lt;br /&gt;
*[[आगरा]]&lt;br /&gt;
*[[एटा]]&lt;br /&gt;
*[[हाथरस]]&lt;br /&gt;
*बुलंदशहर&lt;br /&gt;
*[[अलीगढ़]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा पार बदायूँ, बरेली, नैनीताल की तराई से होते हुए [[उत्तराखंड]] में उधमसिंह नगर और राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर, करौली और पश्चिमी राजस्थान, [[हरियाणा]] के [[फरीदाबाद]], गुड़गाँव, [[दिल्ली]] के कुछ भाग और मेवात ज़िलों के पूर्वी भाग में ब्रजभाषा का प्रभाव है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साहित्य-यात्रा==&lt;br /&gt;
'''बोलचाल की भाषा और साहित्यिक ब्रजभाषा''' में अन्तर करने की आवश्यकता दो कारणों से पड़ती है, बोलचाल की ब्रजभाषा ब्रज के भौगोलिक क्षेत्र के बाहर उपयोग में नहीं लाई जाती, जबकि साहित्यिक ब्रजभाषा का उपयोग ब्रजक्षेत्र के बाहर के कवियों ने भी उसी कुशलता के साथ किया है, जिस कुशलता के साथ ब्रजक्षेत्र के कवियों ने किया है। दूसरा अन्तर यह है कि बोलचाल की [[ब्रज]] और साहित्यिक ब्रज के बीच में एक मानक ब्रज है, जिसमें ब्रजभाषा के उपबोलियों के सभी रूप स्वीकार्य नहीं है, दूसरे शब्दों में ब्रजक्षेत्र के विभिन्न रूप-विकल्पों में से कुछ ही विकल्प मानक रूप में स्वीकृत हैं और इस मानक रूप को ब्रज के किसी क्षेत्र विशेष से पूर्ण रूप से जोड़ना सम्भव नहीं है। अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि, ब्रज प्रदेश के मध्यवर्ती क्षेत्र की [[भाषा]] मानक ब्रज का आधार बनती है। जिस तरह [[मेरठ]] के आस-पास बोली जाने वाली बोली (जिसे कौरवी नाम दिया गया है) मानक [[हिन्दी]] से भिन्न है, किन्तु उसका व्याकरणिक ढाँचा मानक हिन्दी का आधार है, उसी तरह मध्यवर्ती ब्रज का ढाँचा मानक ब्रज का आधार है। मानक ब्रज और साहित्यिक ब्रज के बीच भी उसी प्रकार का अन्तर है, यह भेद वाक्य-विन्यास, पद-विन्यास और उक्ति-भंगिमा के स्तरों पर भी रेखांकित होता है। यह तो भाषा विज्ञान का माना हुआ सिद्धान्त है कि, साहित्यिक भाषा और सामान्य भाषा में अन्तर प्रयोजनवश आता है और चूँकि साहित्यिक भाषा अपने सन्देश से कम महत्व नहीं रखती और उसमें बार-बार दुहराये जाने की, नया अर्थ उदभावित करने की क्षमता अपेक्षित होती है, उसमें मानक भाषा की यान्त्रिकता अपने आप टूट जाती है, उसमें एक-दिशीयता के स्थान पर बहुदिशीयता आ जाती है और शब्द-चयन, वाक्य-विन्यास, पद-विन्यास सब इस प्रयोजन को चरितार्थ करने के लिए कुछ न कुछ बदल जाते हैं। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि व्याकरण बदल जाता है या [[शब्द (व्याकरण)|शब्द]] कोश बदल जाता है, केवल व्याकरण और शब्द के कार्य बदल जाते हैं, क्योंकि दोनों अतिरिक्त सोद्देश्यता से विद्युत चालित कर दिये जाते हैं।&lt;br /&gt;
==ब्रजभाषा का प्रयोग==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Guru Gobind Singh.jpg|thumb|[[गुरु गोविन्दसिंह]]]]&lt;br /&gt;
'''साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग''' ब्रज के अतिरिक्त बोली-क्षेत्रों में होने के कारण उन-उन क्षेत्रों की बोलियों के [[रंग]] भी जुड़े हैं। आज की साहित्यिक हिन्दी में भी इस प्रकार का प्रभाव दिखाई पड़ता है। वह एक किसी एक मुहावरे एक चाल में बँधी हुई भाषा नहीं है, उसमें क्षेत्रीय रंगतों को अपनाने की और उन्हें अपने रंग में डालने की क्षमता है। ब्रजभाषा में भी [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[अवधी भाषा|अवधी]], बुन्देली, [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], पहाड़ी, राजस्थानी प्रभावों की झाँई पड़ी और उससे ब्रजभाषा में दीप्ति और अर्थवत्ता आई। कुछ शब्दकोश भी बढ़ा, मुहावरे तो निश्चित रूप से नये-नये उसमें सन्निविष्ट हुए। [[बुन्देलखण्ड]] के कवियों में पद्माकर, ठाकुर बोधा और बख्शी हंसराज का प्रभाव उल्लेखनीय है। भोजपुरी क्षेत्र के कवियों में इतने बड़े नाम तो नहीं लिए जा सकते, लेकिन रंगपाल, छुटकन जैसे कवियों के द्वारा रचे गए फागों में भोजपुरी से भावित ब्रजभाषा की छटा एक अलग ही मिलती है। ग्वाल कवि, [[गुरु गोविन्दसिंह]] जैसे पंजाब क्षेत्र के कवियों ने पंजाबी प्रभाव दिया है। [[दादू दयाल|दादू]], सुन्दरदास और रज्जब जैसे सन्तकवियों की भाषा में (जो प्रमुख रूप से ब्रजभाषा ही है) राजस्थानी का पुट गहरा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रजभाषा का स्वरूप==&lt;br /&gt;
'''ब्रजभाषा में अपना रूपगत प्रकृति''' औकारांत है यानि कि इसकी एकवचनीय पुंलिंग संज्ञा और विशेषण प्राय: औकारांत होते हैं; जैसे खुरपौ, यामरौ, माँझौ आदि संज्ञा शब्द औकारांत हैं। इसी प्रकार कारौ, गोरौ, साँवरौ आदि विशेषण पद औकारांत है। क्रिया का सामान्य भूतकाल का एकवचन पुंलिंग रूप भी ब्रजभाषा में प्रमुख रूप से औकारांत ही रहता है। कुछ क्षेत्रों में &amp;quot;य्&amp;quot; श्रुति का आगम भी मिलता है। अलीगढ़ की तहसील कोल की बोली में सामान्य भूतकालीन रूप &amp;quot;य्&amp;quot; श्रुति से रहित मिलता है, लेकिन ज़िला मथुरा तथा दक्षिणी बुलंदशहर की तहसीलों में &amp;quot;य्&amp;quot; श्रुति अवश्य पाई जाती है। कन्नौजी की अपनी प्रकृति ओकारांत है। संज्ञा, विशेषण तथा क्रिया के रूपों में ब्रजभाषा जहाँ औकारांतता लेकर चलती है वहाँ कन्नौजी ओकारांत है। भविष्यत्कालीन क्रिया ब्रजभाषा में कृदंत पाई जाती है। यदि हम &amp;quot;लड़का जाएगा&amp;quot; और &amp;quot;लड़की जाएगी&amp;quot; वाक्यों को कन्नौजी तथा ब्रजभाषा में रूपांतरित करके बोलें तो यह इस प्रकार रहेगी:&lt;br /&gt;
*कन्नौजी में - (1) लरिका जइहै । (2) बिटिया जइहै ।&lt;br /&gt;
*ब्रजभाषा में - (1) छोरा जाइगौ । (2) छोरी जाइगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रजभाषा के सामान्य भविष्यतकाल रूप में क्रिया कर्ता के लिंग के अनुसार परिवर्तित होती है, जब कि कन्नौजी में एक रूप रहती है। इसके अतिरिक्त कन्नौजी में अवधि की भाँति विवृति भी पाई जाती है जिसका ब्रजभाषा में सर्वथा अभाव है। कन्नौजी के संज्ञा, सर्वनाम आदि वाक्य पदों में संधिरहित मिलते हैं, किंतु ब्रजभाषा में वे ही पद संधिगत अवस्था में मिलते हैं। उदाहरण:&lt;br /&gt;
*कन्नौजी - &amp;quot;&amp;quot;बउ गओ&amp;quot;&amp;quot; (उ वह गया)।&lt;br /&gt;
*ब्रजभाषा - &amp;quot;&amp;quot;बो गयौ&amp;quot;&amp;quot; (उ वह गया)।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त वाक्यों के सर्वनाम पद &amp;quot;बउ&amp;quot; तथा &amp;quot;बो&amp;quot; में संधिराहित्य तथा संधि की अवस्थाएँ दोनों भाषाओं की प्रकृतियों को स्पष्ट करती हैं।&lt;br /&gt;
==प्रयोग के प्रमाण==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Suryakant Tripathi Nirala.jpg|thumb|[[सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला]]]]&lt;br /&gt;
'''साहित्यिक ब्रजभाषा के सबसे प्राचीनतम''' उपयोग का प्रमाण [[महाराष्ट्र]] में मिलता है। महानुभाव सम्प्रदाय (तेरहवीं शताब्दी के अन्त) के सन्त कवियों ने एक प्रकार की ब्रजभाषा का उपयोग किया। कालान्तर में साहित्यिक ब्रजभाषा का विस्तार पूरे [[भारत]] में हुआ और अठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में दूर दक्षिण में तंजौर और [[केरल]] में ब्रजभाषा की कविता लिखी गई। [[सौराष्ट्र]] ([[कच्छ]]) में ब्रजभाषा काव्य की पाठशाला चलायी गई, जो स्वाधीनता की प्राप्ति के कुछ दिनों बाद तक चलती रही। उधर पूरब में यद्यपि साहित्यिक ब्रज में तो नहीं साहित्यिक [[ब्रज]] से लगी हुई स्थानीय भाषाओं में पद रचे जाते रहे। [[बंगाल]] और [[असम]] में इन भाषा को ‘ब्रजबुलि’ नाम दिया गया। इस ‘ब्रजबुली’ का प्रचार कीर्तन पदों में और दूर [[मणिपुर]] तक हुआ। साहित्यिक ब्रजभाषा की कविता ही गढ़वाल, कांगड़ा, गुलेर, [[बूँदी]], [[मेवाड़]], किशनगढ़, चित्रकारी कलमों का आधार बनी और कुछ क्षेत्रों में तो चित्रकारों ने कविताएँ लिखीं। गढ़वाल के मोलाराम का नाम उल्लेखनीय है। गुरु गोविन्दसिंह के दरबार में ब्रजभाषा के कवियों का एक बहुत बड़ा जमघट था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक काव्य-भाषा के रूप में ब्रजभाषा का अक्षुण्ण देशव्यापी वर्चस्व रहा। इस प्रकार लगभग पाँच शताब्दी तक बहुत बड़े व्यापक क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करने वाली साहित्यिक भाषा रही। इस देश के [[साहित्य]] के [[इतिहास]] में ब्रजभाषा ने जो अवदान दिया है, उसे यदि हम काट दें तो देश की रसवत्ता और संस्कारिता का बहुत बड़ा हिस्सा हमसे अलग हो जायेगा। आधुनिक [[हिन्दी]] ने साहित्यिक भाषा के रूप में जो ब्रजभाषा का स्थान लिया है, वह स्थान भी ब्रजभाषा की व्यापकता के ही कारण सम्भव हुआ है। इस प्रकार से साहित्यिक ब्रजभाषा आधुनिक हिन्दी की धरती है। शुरू-शुरू में खड़ी बोली की कविता इतिवृत्तात्मकता की ओर अग्रसर हुई तो, ब्रजभाषा की धरती ने ही आधुनिक खड़ी-बोली की कविता को अधिक लचकीला बनाने की शक्ति दी, उसके उक्ति-विधान, सादृश्य-विधान और मुहावरों ने प्रेरणा दी। बहुत सूक्ष्मता से [[महावीर प्रसाद द्विवेदी|प्रसाद]], [[सुमित्रानन्दन पंत|पंत]], [[सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला|निराला]], [[महादेवी वर्मा|महादेवी]] की काव्यधारा का अध्ययन करें तो हमें ब्रजभाषा के प्रभाव से आई हुई लोच नज़र आयेगी।&lt;br /&gt;
==जनमानस की भाषा==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Krishna-2.jpg|thumb|बंसी बजाते हुए [[कृष्ण]]]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ने [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] साहित्य के इतिहास में ठीक ही कहा है कि, गीतिकाव्य की रचना के लिए ब्रजभाषा का व्यवहार सर्वव्यापी था, जो निर्गुणपंथी सन्त कवि उपदेश की भाषा के लिए खड़ी बोली पर आधारित सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग करते थे, वे ही गेय पदों की रचना करते समय ब्रजभाषा का प्रयोग ही प्राय: करते हैं। इसी तरह प्रबन्धकाव्य लिखते समय भले ही अधिकतर लोगों ने पूर्वी क्षेत्र में [[अवधी भाषा]], पश्चिम क्षेत्र में डिंगल का प्रयोग किया, किन्तु गेय पदों या मुक्तकों की रचना करते समय पूर्व या पश्चिम हर एक प्रदेश के कवि ब्रजभाषा का अध्ययन करते हैं। एक प्रकार से ब्रजभाषा ही मुक्तक काव्य भाषा के रूप में उत्तर [[भारत]] के बहुत बड़े हिस्से में एकमात्र मान्य भाषा थी। उसकी विषयवस्तु [[श्री कृष्ण]] प्रेम तक ही सीमित नहीं थी, उसमें सगुण-निर्गुण भक्ति की विभिन्न धाराओं की अभिव्यक्ति सहज रूप में हुई और इसी कारण ब्रजभाषा जनसाधारण के कंठ में बस गई। एक अंग्रेज़ी अधिकारी मेजर टॉमस डुएरब्रूटन (1814) ने ‘सलेक्शन फ़्रॉए दि पॉपुलर पोयट्री ऑफ़ दि हिन्दूज’ नामक पुस्तक में निरक्षर सिपाहियों से लोकप्रिय पदों का संग्रह किया और उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। इस संग्रह में संकलित मुक्तकों में अधिकतर दोहे, कवित्त और सवैये हैं, जो ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवियों के द्वारा रचित हैं। सभी सरल हों, ऐसी बात नहीं, [[केशवदास]] के भी छन्द इस संकलन में हैं। इससे यह बात स्पष्ट प्रमाणित होती है कि, मौखिक परम्परा से ब्रजभाषा के छन्द दूर-दूर तक फैले और लोगों ने उन्हें रस और चाव से कंठस्थ किया। उनके अर्थ पर विचार किया और उन्हें अपने दैनिक जीवन का एक अंग बनाया। इस मायने में साहित्यिक ब्रजभाषा का भाग्य आज की साहित्यिक हिन्दी की अपेक्षा अधिक स्पृहणीय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रसों का प्रयोग==&lt;br /&gt;
{{Main|ब्रजभाषा में रस}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Abdul-Rahim.jpg|thumb|[[रहीम|अब्दुर्रहीम रहीम खानखाना]]]]&lt;br /&gt;
'''रचना बाहुल्य के आधार पर''' प्राय: यह मान लिया जाता है कि, ब्रजभाषा काव्य का विषय रूप-वर्णन, शोभा-वर्णन, श्रृंगारी चेष्टा-वर्णन, श्रृंगारी हाव-भाव-वर्णन, प्रकृति के श्रृंगारोद्दीपक रूप का वर्णन विविध प्रकार की कामिनियों की विलासचर्या का वर्णन, ललित कला-विनोदों का वर्णन और नागर-नागरियों के पहिराव, सजाव, सिंगार का वर्णन तक ही सीमित है। इसमें साधारण मनुष्य के दु:ख-दर्द या उनके जीवन-संघर्ष का चित्र नहीं है, न कुछ अपवादों को छोड़कर जीवन में उत्साह वृद्धि जगाने के लिए विशेष चाव है। इसमें जो आलौकिक, आध्यात्मिक भाव है भी, वह भी या तो अलक्षित और सुकुमार भावों की परिधि के भीतर ही समाये हुए हैं या मनुष्य के दैन्य या उदास भाव के अतिरेक से ग्रस्त हैं। ब्रजभाषा काव्य का संसार इस प्रकार बड़ा ही संकुचित संसार है। पर जब हम ब्यौरे में जाते हैं और भक्ति-कालीन काव्य की ज़मीन का सर्वेक्षण करते हैं और उत्तर मध्यकाल की नीति-प्रधान रचनाओं में या आक्षेप प्रधान रचनाओं का पर्यवेक्षण करते हैं, तो यह संसार बहुत विस्तुत दिखाई पड़ता है। इसमें जिन्हें दरबारी कवि कहकर छोटा मानते हैं, उनकी कविता में गाँव के बड़े अनूठे चित्र हैं और लोक-व्यवहार के तो तरह-तरह के आयाम मिलते हैं। ये आयाम श्रृंगारी ही नहीं हैं अदभुत, हास्य, शान्त रसों के सैंकड़ों उदाहरण उस उत्तर मध्यकाल में भी मिलते हैं, जिसे श्रृंगार-काल कहा जाता है। यही नहीं, पद्माकर जैसे कवि की रचना में सूक्ष्म रूप में [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आने के ख़तरे की चिन्ता भी मिलती है। [[भूषण]] की बात छोड़ भी दे, तो भी अनेक अनाम कवियों के भीतर धरती का लगाव, जो जन-जन के अराध्य आलंबनों से जुड़े हुए हैं, बहुत सरल ढंग से अंकित मिलता है। देव का एक प्रसिद्ध छन्द है, जिसमें बारात के आकर विदा होने में और उसके बाद की उदासी का चित्र मिलता है। &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;'''काम परयौ''' दुलही अरु दुलह, चाकर यार ते द्वार ही छूटे।&lt;br /&gt;
माया के बाजने बाजि गये परभात ही भात खवा उठि बूटे।&lt;br /&gt;
आतिसबाजी गई छिन में छूटि देकि अजौ उठिके अँखि फूटे।&lt;br /&gt;
‘देव’ दिखैयनु दाग़ बने रहे, बाग़ बने ते बरोठहिं लूटे।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-19.jpg|सूरदास, सूर कुटी, सूर सरोवर, [[आगरा]]|thumb]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विद्वानों व कवियों द्वारा प्रयोग==&lt;br /&gt;
{{Main|कवियों की ब्रजभाषा}}&lt;br /&gt;
'''यह बात अनदेखी करने योग्य''' नहीं है कि, ब्रजभाषा के कवियों ने सामान्य गृहस्थ जीवन को ही केन्द्र में रखा है, चाहे वे कवि संत हो, दरबारी हो, राजा हो या फ़कीर हो। [[रहीम]] के निम्नलिखित शब्द-चित्रों में श्रमजीवी की सहधर्मिता अंकित है-&lt;br /&gt;
[[चित्र:Amir-Khusro.jpg|thumb|[[अमीर ख़ुसरो]] और ह्ज़रत निज़ामुद्दीन औलिया]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;लइके सुघर खुरपिया पिय के साथ।&lt;br /&gt;
छइबे एक छतरिया बरसत पाथ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अमीर खुसरो]] से शुरू करके [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] तक मुकरी, पहेली जैसी शब्द-क्रीड़ाओं में भी प्रसंग ठेठ गाँव के जीवन के मिलते है। कहीं-कहीं उनमें ग्राम्यता है, पर उक्ति की सहजता में वह ग्राम्यता तिरोहित हो जाती है। उदाहरण के लिए ‘सखि साजन’ वाली मुकरियों में अत्यन्त सामान्य जीवन के सन्दर्भ ही गृहस्थ जीवन के रस-व्यंजक रूप में प्रस्तुत किये गये हैं-&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bhartendu-Harishchandra-3.jpg|thumb|	[[भारतेन्दु हरिश्चंद्र]]]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;जब माँगू तब जल भरि लावै। मेरे मन की विपति बुझावै।&lt;br /&gt;
मन का भारी तन का छोटा। ए सखि साजन ना सखि लोटा।&lt;br /&gt;
बाट चलत मोरा अँचरा गहे। मेरी सुने न अपनी कहे।&lt;br /&gt;
ना कुछ मो सों झगड़ा-झंटा। ए सखि साजन ना सखि काँटा।&lt;br /&gt;
हाट चलत में पड़ा जो पाया। खोटा जरा न मैं परखाया।&lt;br /&gt;
ना जानूं वह हैगा कैसा। ये सखि साजन, ना सखि पैसा।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
'''भारतेन्दु की इन दो मुकरियों में भी''' व्यंग रूप में सामान्य व्यक्ति की प्रतिक्रिया, सामान्य-जीवन के बिम्ब पर आधारित प्रस्तुत मिलती है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;सीटी देकर पास बुलावै&lt;br /&gt;
रुपया ले तो निकट बिठावै।&lt;br /&gt;
लै भागै मोहि खेलहि खेल&lt;br /&gt;
क्यों सखि साजन ना सखि रेल।।&lt;br /&gt;
भीतर-भीतर सब रस चूसै&lt;br /&gt;
हंसि-हंसि तन मन धन मूसै।&lt;br /&gt;
ज़ाहिर बातन में अति तेज&lt;br /&gt;
क्यों सखि साजन नहिं अंगरेज़।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इन विविध उदाहरणों से यह बात स्पष्ट है कि, ब्रजभाषा काव्य के बारे में आम धारणा सही नहीं है कि, ब्रजभाषा काव्य एकांगी या सीमित भावभूमि का काव्य है। चाहे सगुण भक्त कवि हों, चाहे निर्गुण भक्त कवि; चाहे, आचार्य कवि हों, चाहे स्वछन्द कवि, चाहे सूक्तिकार हों, सभी लोक व्यवहार के प्रति बहुत सजग हैं और लौकिक जीवन की समझ इन सबकी बहुत गहरी नुकीली है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक एकता की कड़ी==&lt;br /&gt;
'''भक्ति की धारा को आलौकिक मानना''' ही ग़लत है, उसी प्रकार रीतिकालीन कविता को दरबारी कविता या एक रुँधे हुए जीवन की कविता मानना भी ग़लत है। दोनों कविताओं की भूमि लोक है और इसी कारण दोनों में अभिव्यक्ति और वर्ण्य-विषय दोनों ही स्तरों पर सामान्य जीवन को मुख्य आधार माना गया है। इसलिए बिम्ब अधिकतर कुछ एक अपवादों को छोड़कर सामान्य जीवन के ही ब्रजभाषा साहित्य में मिलते हैं और इसीलिए ब्रजभाषा काव्य में तरह-तरह के ठेठ मुहावरे मिलते हैं, जो उस काव्य के सौन्दर्य को विशेष दीप्ति प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए [[रसखान]] की यह पंक्ति, ‘वारहि गोरस बेचन जाहु री माइ लें मूड़ चढ़ै जिन मौड़ी’, जहाँ मूड़ चढ़ने का मुहावरा ठेठ ब्रज गाँव से लिया गया मुहावरा है। भिखारीदास की इस पंक्ति में आया मुहावरा ‘वा अमरइया ने राम-राम कही है’ [[अवधी भाषा|अवधी]] क्षेत्र के ठेठ प्रयोग के द्वारा एक आत्मीय आमंत्रण का स्वर जगाया गया है या बोधा की इस पंक्ति में ‘कवि बोधा न चाउ सरी कबहूँ नितही हरबा सौ हिरैबौ करै’, जंगल में खो जाने वाले पशुओं की तरह एक असहाय स्थिति का बोध कराया गया है। ब्रजभाषा काव्य की यात्रा जितनी एकांगी मानी जाती है, उतनी एकांगी है नहीं। उसमें एक बिन्दु पर स्वर अवश्य ही मिलता है, वह बिन्दु है, तरह-तरह के भेदों और अलगावों को बिसराकर एक सामान्य भाव-भूमि तैयार करना। इसी कारण ब्रजभाषा कविता [[हिन्दू]], [[मुसलमान]], [[सिक्ख]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]] तक व्याप्त हुई। केवल [[छन्द]] और सवैया लिखने वाले मुसलमान कवियों की संख्या डेढ़ सौ से ऊपर है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Maithili-Sharan-Gupt.jpg|thumb|[[मैथिलीशरण गुप्त]]]]&lt;br /&gt;
उन्नीसवीं शताब्दी के एक मुसलमान अध्यापक हफ़ीजुल्ला ने विषय वार चयन के एक हज़ार कवित्त-सवैयों का संकलन तैयार करके छपाया। उत्तर [[भारत]] के [[संगीत]] में चाहे ध्रुपद धमार में, चाहे ख्याल में, चाहे ठुमरी में या दादरे में, सर्वत्र हिन्दू-मुसलमान सभी प्रकार के गायकों के द्वारा ब्रजभाषा का ही प्रयोग होता रहा और आज भी जिसे हिन्दुस्तानी संगीत कहा जाता है, उसके ऊपर ब्रजभाषा ही छायी हुई है। इसका कारण केवल संगीत का वर्ण्य-विषय प्यार ही नहीं है, इसका कारण एक समान भाव-भूमि की तलाश है। मध्ययुग और उत्तर मध्ययुग के चित्रकारों ने भी ब्रजभाषा काव्य से प्रेरणा ली है, जैसा की पहले ही कहा जा चुका है, कुष्ठ ने ब्रजभाषा की कविता भी की। देश की सांस्कृतिक एकता के लिए ब्रजभाषा एक ज़बर्दस्त कड़ी चार शताब्दियों से अधिक समय तक बनी रही और आधुनिक [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] की व्यापक सर्वदेशीय भूमिका इसी साहित्यिक ब्रजभाषा के कारण सम्भव हुई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रजभाषा साहित्य का कोई अलग इतिहास नहीं लिखा गया है, इसका कारण यह है कि हिन्दी और ब्रजभाषा दो सत्ताएँ नहीं हैं। यदि दो हैं भी तो, एक-दूसरे की पूरक हैं। परन्तु जिस प्रकार की अल्प परिश्रम से विद्या प्राप्त करने की प्रवृत्ति ज़ोर पकड़ती जा रही है, जिस तरह का संकीर्ण उपयोगितावाद लोगों के मन में घर करता जा रहा है, उसमें एक प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है, कि हिन्दी साहित्य को यदि पढ़ना-पढ़ाना है तो, उसे [[श्रीधर पाठक]] या [[मैथिलीशरण गुप्त]] से शुरू करना चाहिए। यह कितना बड़ा आत्मघात है, उसे बतलाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि [[साहित्य]] या [[संस्कृति]] में इस प्रकार की विच्छिन्नता तभी आती है, जब कोई जाति अपने भाव-स्वभाव को भूलकर पूर्ण रूप से दास हो जाती है। हिन्दुस्तान में ऐसी स्थिति कभी नहीं आयी, आज आ सकती है, यदि इस प्रकार विच्छेद करने का प्रयत्न हो।&lt;br /&gt;
==ब्रजभाषा साहित्य सर्वेक्षण==&lt;br /&gt;
'''साहित्यिक ब्रजभाषा कोश''' तैयार करने के पीछे उद्देश्य यह नहीं है कि, साहित्यिक ब्रजभाषा को साहित्यिक हिन्दी से अलग करके देखा जाए, बल्कि उद्देश्य यह है कि, इस साहित्यिक ब्रजभाषा को पढ़ने-पढ़ाने में जो कठिनाई हो रही है, विशेष रूप से उन प्रान्तों में, जहाँ क्षेत्रीय भाषाएँ प्रथम भाषा के रूप में स्वीकृत हैं। उसके मार्ग दर्शन के लिए एक ऐसा कोश होना चाहिए, जो ब्रजभाषा साहित्य के अध्ययन-अध्यापन, ठीक रूप से कहें हिन्दी साहित्य के समूचे अध्ययन-अध्यापन को एक आवश्यक अवलम्ब दे सके। साहित्यिक ब्रजभाषा के ऐतिहासिक स्वरूप को समझने के लिए आवश्यक है कि, ब्रजभाषा साहित्य का सर्वेक्षण इस रूप में कराया जाए कि इस साहित्य की प्रकृति सार्वदेशिक सार्वभौमिक एकात्मता लाने वाली रही है।&lt;br /&gt;
==ब्रजभाषा गद्य का प्रयोग==&lt;br /&gt;
{{Main|ब्रजभाषा के गद्य}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pandit-Madan-Mohan-Malaviya.jpg|thumb|[[मदनमोहन मालवीय|पंडित मदनमोहन मालवीय]]]]&lt;br /&gt;
'''जब हम ब्रजभाषा साहित्य कहते हैं तो''', उसमें गद्य का समावेश नहीं करते। इसका कारण यह नहीं है कि, ब्रजभाषा में गद्य और साहित्यिक गद्य है ही नहीं। [[वैष्णव|वैष्णवों]] के वार्ता साहित्य में, भक्ति ग्रन्थों के टीका साहित्य में तथा रीतकालीन ग्रन्थों के टीका साहित्य में ब्रजभाषा गद्य का प्रयोग हुआ है, परन्तु गद्य का प्रसार दो ही स्थितियों में होता है, या तो वह शास्त्र हो या गद्यगन्धी हो, क्योंकि इन्हीं दोनों दिशाओं में उसमें पुनरावर्तमानता होती है। छापाखाने के आगमन के बाद गद्य का महत्व अपने आप बढ़ा, क्योंकि तब कंठगत करने की अपरिहार्यता नहीं रही। लल्लूलाल जी ने अपने प्रेमसागर में ब्रजभाषा से भावित ऐसे गद्य की रचना की और वह गद्य ही आधुनिक गद्य की भूमि बना, किन्तु ब्रजभाषा का स्थान उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त से जो [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] को मिला, उसमें गद्य की नयी भूमिका का महत्व तो था ही, सबसे बड़ा कारण था, [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के द्वारा उत्तर [[भारत]] में कचहरी भाषा के रूप में [[उर्दू]] को मान्यता देना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==काल विभाजन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dadu-Dayal.gif|thumb|[[दादू दयाल]]]]&lt;br /&gt;
'''ब्रजभाषा साहित्य के इतिहास''' को तीन चरणों में बाँटा जा सकता है। इसका उदयकाल जिसके ऊपर 'नागर' अपभ्रंश काव्य की छाप है। इसी कारण उसमें दिखने वाले हिन्दी के मध्य देश में पैदा हुए [[अमीर ख़ुसरो]] से लेकर [[महाराष्ट्र]] में पैदा हुए महानुभाव और [[ज्ञानेश्वर]] के साथी नामदेव हैं। दूसरी ओर [[पंजाब]] से लेकर [[बिहार]] तक के सन्त कवि हैं, जो भिन्न-भिन्न प्रयोजनों से भिन्न-भिन्न प्रकार की भाषा का व्यवहार करते हैं, परन्तु गेय प्रयोजन के लिए प्राय: ब्रजभाषा का ही व्यवहार करते हैं। इनकी सूची बड़ी लम्बी है और पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के अधिकांश सन्त-कवि साहित्यिक ब्रजभाषा का ही प्रयोग करते हैं। मुख्य नाम ये हैं-[[कबीर]], [[रैदास]], [[धर्मदास]] और [[गुरु नानक]], [[दादू दयाल]] और सत्रहवीं शताब्दी के [[सुन्दरदास खण्डेलवाल|सुन्दरदास]], [[मलूकदास]] और [[अक्षरअनन्य]] हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूफ़ी काव्य का बीच रूप भी जिस काव्य से मिलता है, वह मुल्लादाउद का चन्दायन नहीं है, वह साधन का ‘मैनासत’ है, जिसकी भाषा ग्वालियरी है और वह कुछ और नहीं ब्रजभाषा ही है। कुछ विद्वान ब्रजभाषा का पुराना नाम 'ग्वालियरी' ही देते हैं। ‘मैनासत’ का रचना काल पन्द्रहवीं शताब्दी है। यह उल्लेखनीय है कि, इस कोटि के कवियों की भाषा बहुत परिमार्जित नहीं है, न उसमें वक्र-भंगिमाओं के लिए कोई विशेष स्थान है। उदाहरण के लिए नामदेव ने इस [[छन्द]] में बहुत सीधे-साधे ढंग से लीला का कीर्तन किया है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;अम्बरीष कौ दियौ अभय पद, राज विभीषन अधिक करयो।&lt;br /&gt;
नवनिधि ठाकुर दई सुदामहि, ध्रुव जो अटल अजहूँ न टरयो।&lt;br /&gt;
भगत हेत मारयो हरिनाकुस, नृसिंह रूप ह्वै देह धरयो।&lt;br /&gt;
नामा कहै भगति बस केसव, अजहूँ बलि के द्वार खरौ।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kabirdas.jpg|thumb|[[कबीर]]]]&lt;br /&gt;
'''इस प्रकार''' [[कबीर]] के इस पद में [[सूरदास]] की भाषा का एक प्रागरूप मिलता है, जो उक्ति की नाटकीयता का बड़ा सरस उदाहरण प्रस्तुत करता है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;हौ बलि कब देखौंगी तोहि।&lt;br /&gt;
अहनिसि आंतुर दरसन कारनि ऐसी ब्यापी मोहि।&lt;br /&gt;
नैन हमारे तुम्हको चाहैं, रती न मानैं हारि।&lt;br /&gt;
बिरह अगिनि तन अधिक जरावै ऐसी लेहु विचारि।&lt;br /&gt;
सुनहु हमारी दादि गोसाई, अब जनि करहु अधीर।&lt;br /&gt;
तुम धीरज मैं आतुर, स्वामी काँचे भाँड़े नीर।&lt;br /&gt;
बहुत दिनन के बिछुरे माधी, मन नहि बाँधे धीर।&lt;br /&gt;
देह छमा तुम मिलहु कृपा करि आरतिवन्त कबीर।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[रैदास]] और [[धर्मदास]] में [[भाषा]] कुछ अधिक संवरी हुई मिलती है, उदाहरण के लिए रैदास का पद लें-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;अब कैसे छूटे नाम रट लागी।&lt;br /&gt;
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी। जाकी अंग अंग बास समानी।&lt;br /&gt;
प्रभुजी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा।&lt;br /&gt;
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती।&lt;br /&gt;
प्रभुजी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहि मिलत सोहागा।&lt;br /&gt;
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करी रैदासा।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
या धर्मदास का यह पद जिसमें हल्की सी [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] छटा है और शब्द योजना में अनुरणात्मक प्रभाव की गूँज है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;झर लागै महलिया गगन महराय।&lt;br /&gt;
खन गरजै खन बिजली चमकै, लहरि उठै सोभा बरनि न जाय।&lt;br /&gt;
सुन्न महल से अमृत बरसै, प्रेम आनन्द ह्वै साधु नहाय।&lt;br /&gt;
खुली केवरिया, मिटी अँधियरिया धनि सतगुरु जिन दिया लखाय।&lt;br /&gt;
धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु चरन में रहत समाय।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[गुरु नानक]] और [[दादू दयाल]] में ब्रजभाषा का प्राय: तो मिश्रित रूप मिलता है, किन्तु कहीं-कहीं ब्रजभाषा में पूरा का पूरा पद रचा मिलता है, जैसे&lt;br /&gt;
[[चित्र:Guru-Nanak.jpg|thumb|[[गुरु नानक]]]]&lt;br /&gt;
 &amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;नानक के इस पद में-&lt;br /&gt;
जो नर दुख नहिं माने।&lt;br /&gt;
सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै।&lt;br /&gt;
नहिं निन्दा नहिं अस्तुति जाकें, लोभ मोह अभिमाना।&lt;br /&gt;
हरष सोक तै रहे नियारो, नाहिं मान अपमाना।&lt;br /&gt;
आसा मनसा सकल त्यागि कै जगतें रहे निरासा।&lt;br /&gt;
काम क्रोध जेहि परसै नाहिन तेहि घट ब्रह्म निवासा।&lt;br /&gt;
गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्ही तिन्ह यह जुगति पिछानी।&lt;br /&gt;
नानक लीन भयो गोविन्द सौ ज्यों पानी सँग पानी।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
और दादू के इस पद में-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;अजहूँ न निकसै प्राण कठोर।&lt;br /&gt;
दर्सन बिना बहुत दिन बीते, सुन्दर प्रीतम मोर।।&lt;br /&gt;
चारि पहर चारयौ जुग बीते, रैनि गँवाइ भोर।&lt;br /&gt;
अवधि गई अजहूँ नहि आये, कतहूँ रहे चितचोर।।&lt;br /&gt;
कबहूँ नैन निरषि नहिं देषे, मारग चितवत तोर।&lt;br /&gt;
दादू ऐसे आतुर विरहिणि, जैसे चंद चकोर।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
या सुन्दरदास और मलूकदास में जिनका कार्यकाल सोलहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक चला जाता है, ब्रजभाषा का और अधिक निखरा हुआ रूप मिलता है। सुन्दरदास के एक उदाहरण में-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;तू ठगि कै धन और कौ ल्यावत, तेरेउ तौ घर औरइ फोरै।&lt;br /&gt;
आगि लगै सबही जरि जाइ सु तू, दमरी दमरी करि जोरै।&lt;br /&gt;
हाकिम कौ डर नाहिन सूझत, सुन्दर एकहि बार निचोरै।&lt;br /&gt;
तू षरचै नहिं आपुन षाइ सु तेरी हि चातुरि तोहि लै बोरे।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मलूकदास के पद में-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;अबकी लागी खेप हमारी।&lt;br /&gt;
लेखा दिया साह अपने को, सहजै चीठी फारी।&lt;br /&gt;
सौदा करत बहुत जुग बीते, दिन दिन टूटी आई।&lt;br /&gt;
अबकी बार बेबाक भये हम जम की तलब छोड़ाई।&lt;br /&gt;
चार पदारथ नफा भया मोहि, बनिजैं कबहूँ न जइहौं।&lt;br /&gt;
अब डहकाय बलाय हमारी, घर ही बैठे खइहौं।&lt;br /&gt;
वस्तु अमोलक गुप्तै पाई, ताती वायु न लाओं।&lt;br /&gt;
हरि हीरा मेरा ज्ञान जौहरी, ताही सों परखाओं।&lt;br /&gt;
देव पितर औ राजा रानी, काहू से दीन न भाखौं।&lt;br /&gt;
कह मलूक मेरे रामैं पूँजी, जीव बराबर राखौं।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bihari-Lal.jpg|thumb|[[बिहारीलाल]]]]&lt;br /&gt;
इन दोनों उदाहरणों में मुहावरेदारी और एक उक्ति को दूसरे में पिरोने की कुशलता और रूपक का निर्वाह तीनों के गुण मिलते हैं। जिससे पता चलता है कि साहित्यिक ब्रजभाषा के विकास का [[रंग]] इनमें गहरा है और इन्हें रचनाकाल और भाषा-विकास की दृष्टि से ब्रजभाषा साहित्य के दूसरे चरण में रखना उचित होगा। धरनीदास के निम्नलिखित दोहे की बंदिश और [[बिहारीलाल]] के दोहे की बंदिश में बहुत कम अन्तर दिखेगा। &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;धरनी धरकत है हिया करकत आहि करेज।&lt;br /&gt;
ढरकत लोचन भरि भरि पीया नाहिन सेज।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
उसी प्रकार सन्त कवि यारी साहब के इस पद और पद्माकर की ध्वनि-चित्रमयी भाषा में अन्तर नहीं के बराबर है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;झिलमिल-झिलमिल बरखै नूरा&lt;br /&gt;
नूर जहूर सदा भरपूरा।।&lt;br /&gt;
रुनझुन-रुनझुन अनहद बाजै&lt;br /&gt;
भवन गुँजार गगन चढ़ि गाजै।।&lt;br /&gt;
रिमझिम-रिमझिम बरखै मोती&lt;br /&gt;
भयो प्रकास निरन्तर जोती।।&lt;br /&gt;
निरमल-निरमल-निरमल नामा&lt;br /&gt;
कह यारी तहँ लियो विस्रामा।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==क्षेत्रीय भाषाओं के तत्त्व==&lt;br /&gt;
'''यह मान लेना की प्रारम्भ के कवि''' भाषा के प्रति उदासीन थे और उनका ध्यान भाषा के सँवार पर नहीं था, सही नहीं है। कम से कम बहुत दूर तक नहीं ही सही है। उपदेश की भाषा या फटकार की भाषा में एक जानबूझकर बाज़ार-भाषा का रूप मिलता है, अनेक क्षेत्रीय भाषाओं के तत्त्व मिलते हैं, किन्तु जहाँ रागात्मक संवेदना तीव्र है, वहाँ भाषा परिनिष्ठित है और यह परिनिष्ठित भाषा ब्रज है। ऐसा लगता है, जैसे उस युग में भाषा के प्रयोग की कुछ रूढ़ियाँ उसी तरह से स्वीकृत हो चुकी थीं, जिस तरह [[संस्कृत]] के नाटकों में संस्कृत और विभिन्न प्राकृतों के संन्दर्भ में कुछ रूढ़ियाँ बन गई थीं। इसीलिए एक ही कवि भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में भिन्न-भिन्न भाषाओं का प्रयोग करता है। [[अमीर खुसरो]] से ही यह बात दृष्टिगोचर होने लगती है। गेय पदों में चूँकि रागात्मकता का सन्निवेश अपरिहार्य है, इसलिए उनकी भाषा में तो ब्रजभाषा प्राय: निरपवाद रूप में है। जिन दोहों, सोरठों, झूलने, सवैयों और कवित्तों में कोरी उपदेशपरकता नहीं है, सुन्दर तरीके से कहने का भाव है या किसी लालित्य की अभिव्यंजना है या कोई गहरी संवेदना व्यक्त करने का भाव है, उनमें प्राय: ब्रजभाषा का ही प्रयोग मिलेगा। इसके विपरीत युद्ध वर्णन में डिंगल या [[राजस्थानी भाषा]] का प्रयोग मिलेगा। कहीं-कहीं इस डिंगल में प्राचीन अपभ्रंश के भी अवशेष दिखाई देते हैं। जहाँ कहीं एक ख़ास किस्म का शहरीपन है, वहाँ पर खड़ी बोली का प्रयोग है और जहाँ सधुक्कड़ी ठाठ है, वहाँ पर मिश्रित भाषा का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार से प्रबन्ध योजना में [[अवधी भाषा]] का प्रयोग अधिकतर देखने को मिलता है। उसका कारण है कि अवधी ने जिस अपभ्रंश का उत्तराधिकार लिया है, उस अपभ्रंश में प्रबन्ध काव्य बहुत लिये गए थे। स्वयंभू जैसे कवियों ने अनेक प्रबन्ध काव्य लिखे थे।&lt;br /&gt;
==ब्रजभाषी गेय पद रचना==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gitawali.jpg|thumb|[[गीतावली]]]]&lt;br /&gt;
'''चण्डीदास, विद्यावति तथा गोविन्दस्वामी''' को छोड़कर गेय पद रचना पर ब्रजभाषा का अक्षुण्ण अधिकार है। [[तुलसीदास]] जी ने स्वयं भिन्न प्रयोजनों से भिन्न-भिन्न प्रकार की भाषा का प्रयोग किया। अवधी में उन्होंने [[रामचरितमानस]] लिखा। ब्रजभाषा में विनय-पत्रिका, [[गीतावली]], दोहावली, कृष्ण-गीतावली लिखी, ठेठ अवधी में उन्होंने पार्वती-मंगल, जानकी-मंगल लिखा और यही नहीं साहित्यिक ब्रजभाषा के भी अनेक रूप उन्होंने प्रस्तुत किए। स्तुतियों के लिए तत्सम बहुल भाषा का उपयोग करने में उन्हें यह आकर्षण हुआ कि ये स्तुतियाँ एक विशेष प्रकार की गरिमा का प्रभाव उत्पन्न कर सकेंगी। किन्तु आत्म-निवेदन की भाषा को उन्होंने तदभव बहुल रखा, जिससे उनका आत्म-निवेदन सामान्य जन के आत्म-निवेदन के समीप हो। ब्रजभाषा साहित्य के द्वितीय चरण की यह विशेषता है कि उसमें विभिन्न प्रकार के सम्प्रेषणों, विभिन्न प्रकार की शैली प्रयुक्तियों का आविष्कार और विकास किया गया है। इस दृष्टि से ब्रजभाषा को साहित्य की भाषा बनाने में इस काल के रससिद्ध कवियों की बड़ी ज़बर्दस्त भूमिका है। सबसे अधिक श्रेय इस विषय में [[सूरदास]] को दिया जाना चाहिए। सूर ब्रजभाषा के पहले कवि हैं, जिन्होंने इसकी सृजनात्मक सम्भावनाओं की सबसे अधिक सार्थक खोज की और जिन्होंने ब्रजभाषा को गति और लोच देकर इसकी यान्त्रिकता तोड़ी। सूर के बाद ब्रजभाषा में परिष्कार या साज-संवार या निखार के प्रयत्न तो अवश्य हुए और ब्रजभाषा की काव्य धारा एक लम्बे अरसे तक गतिशील और विकासशील काव्य धारा बनी रही, पर सूर की ब्रजभाषा में जो प्राणवत्ता मिलती है, वह उस मात्रा में अन्यत्र नहीं मिलती। इसके दो मुख्य कारण हैं, एक तो यह कि सूर ने लीला के मोहक और दृश्य वितान को श्रव्य से भी अधिक गेय रूप में परिवर्तित करने का प्रयत्न किया, इस कारण उसमें नाटकीय आरोह-अवरोह अपने आप आया। दूसरा कारण यह है कि सूर के लिए भाषा साधन थी। साध्य नहीं और साधन का अभ्यास उन्होंने इतनी लम्बी अवधि तक किया कि वह साधन हो गया और वह भाषा भी सहज हो गई।&lt;br /&gt;
==तदभव और तत्सम शब्दों का प्रयोग==&lt;br /&gt;
{{Main|ब्रजभाषा में तद्‌भव और तत्सम शब्द}}&lt;br /&gt;
'''द्वितीय चरण के ब्रजभाषा साहित्य के''' पाँच बिन्दु अत्यन्त संलक्ष्य रूप से दिखाई देते पड़ते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तदभव और तत्सम शब्दों का एक ऐसा सहज सन्तुलन मिलता है, जिसमें तत्सम शब्द भी ब्रजभाषा की प्रकृति में ढले दिखते हैं, अधिकतर तो वे अर्द्ध-तत्सम रूप में। ‘प्रतीत’ के लिए ‘परतीति’ जबकि इसके साथ-साथ तदभव रूप ‘पतियाबो’ भी मिलता है, जैसे तत्सम प्रतिपादकों में नई नाम धातुएँ बनाकर ‘अभिलाष’ से ‘अभिलाखत’ या ‘अनुराग’ से ‘अनुरागत’। इस अवधि में समानान्तर तत्सम और तदभव शब्दों के अर्थक्षेत्र भी कुछ न कुछ स्पष्टत: व्यतिरेकी हो गए हैं। जब नख-शिख की बात करेंगे, तब ‘नह’ का प्रयोग नहीं करेंगे और जब दसों नह का प्रयोग करेंगे, तब ‘नख’ वहाँ प्रयुक्त नहीं होगा।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Hindi-Alphabhet.jpg|thumb|हिन्दी वर्णमाला]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भाषा के प्रति असजगता==&lt;br /&gt;
'''एक प्राचीन कविसमय के अभिप्राय''' की नई उदभावना की गई है कि, प्रभु के चरणों के नखों में [[सूर्य]] की ज्योति का प्रकाश है, वहाँ रात की कोई सम्भावना नहीं, वहाँ समस्त द्वन्द्वों की विश्रान्ति है। भक्ति के द्वारा जहाँ एक ओर सामान्य व्यक्ति की भाषा को असामान्य महत्व दिया गया और सामान्य भाषा का संगीतात्मक उपयोग न केवल भगवद भक्ति का साधन हुआ, वह भगवद भक्ति की सिद्धि भी बना। इस कारण से प्रत्येक भक्त गायक और पद रचनाकार होने लगा। दूसरी ओर जो भक्त कवि कुशल नहीं थे, वे भाषा के प्रति सजग नहीं रहे, वे सम्प्रेषण के प्रति उदासीन रहे, उनके मन में यह भ्रम रहा कि भाव मुख्य है, भाषा नहीं। वे यह समझ नहीं सकते थे कि भाव और भाषा का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। इनके अचेत कवि-कर्म की बहुलता का प्रभाव भाषा पर पड़ा, उसमें कुछ जड़ता आने लगी।&lt;br /&gt;
==भक्ति आन्दोलन==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|भक्ति आन्दोलन}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chetanya-Mahaprabhu.jpg|thumb|[[चैतन्य महाप्रभु]]]]&lt;br /&gt;
भक्ति आन्दोलन तो चलता रहा और उसका व्यापक प्रभाव भी जनजीवन पर बना रहा, पर कवि-कर्म के प्रति सजग कवियों ने भाषा और भाव के ऐक्य पर ध्यान देना शुरू किया। रीतिकाल भक्तिहीन नहीं है, उस काल में भी सांसारिक प्रपंच में रहते हुए विश्व और विश्वात्मा को उद्वेलित करने वाले प्रेम-व्यापार की चिन्ता थी। वे दरबारों में आश्रय पाते थे, पर दरबारदारी से सभी कवि बँधे नहीं थे, जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि उनका संसार नायक-नायिका तक सीमित नहीं था और न नायक-नायिकाएँ ही उच्च वर्ग या सम्पन्न वर्ग तक ही सीमित थीं, वे साधारण जीवन में अभिव्याप्त राग संवेदना की पहचान कराना चाहते थे। उन्हें श्रीराधा-कृष्ण की प्रेमानुगा-भक्ति का एक चौखटा मिल गया, जिससे उन्हें अपनी बात कहने में थोड़ी आसानी रही। भिखारीदास की पंक्ति में-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;आगे के सुकवि रीझि है तो कविताई&lt;br /&gt;
न तौ राधिका कन्हाई के सुमिरन को बहानौ है।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
का अर्थ यह नहीं है कि सचमुच में उनके लिए ‘राधिका कन्हाई’ का स्मरण बहाना था। उसका अर्थ केवल यही है कि वे विनम्रतापूर्वक अपने को लौकिक रखना चाहते थे, परन्तु आलौकिक [[श्रीकृष्ण]] की लौकिक लीला से वे किसी भी प्रकार अप्रभावित नहीं थे। यदि इन कवियों के समानान्तर दरबारी [[उर्दू]] कवियों के साथ तुलना की जाए तो यह बात और अच्छी तरह समझ में आती है कि उर्दू कविता में उक्ति चमत्कार के स्तर पर कवि-कर्म की वैसी ही सजगता है, परन्तु उसके अनुभव का संसार सीमित है। इस कारण उनकी भाषा में एक जड़ाऊपन तो है, विभिन्न प्रकार के जीवन क्षेत्रों से आने वाली ताज़गी नहीं है। उनमें ग्राम्य जीवन के चित्र नहीं के बराबर हैं। रीतिकाल में अभिव्यक्ति को निस्संदेह महत्त्व मिला, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं समझा जाना चाहिए कि उनका काव्य अनुभव उनके भक्त न होने के कारण अपरिहार्य रूप से हेय या भक्त कवियों की अपेक्षा कम उपादेय अनुभव है। अतिरेक प्रत्येक युग में होता है और वह उस युग की प्रवृत्ति नहीं है। उसके आधार पर उस युग की कविता का मूल्यांकन करना समीचीन नहीं है।&lt;br /&gt;
==ब्रजभाषा की समृद्धता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Surdas Surkuti Sur Sarovar Agra-12.jpg|thumb|[[सूरदास]], सूरसरोवर, [[आगरा]]]]&lt;br /&gt;
'''रीतिकाल पुनर्मूल्यांकन की अपेक्षा''' रखता है। वह व्यक्तित्वों के आधार पर किया जाता रहा है। अथवा उन्नीसवीं शताब्दी की विक्टोरियन, खोखली नैतिकता के मानदण्डों से किया जाता रहा है। यह सही है कि [[सूरदास]] या [[तुलसीदास]] की ऊँचाई का कवि या उनके व्यापक काव्य संसार जैसा संसार इस युग के कवियों में नहीं प्राप्त है, पर साधारण जन के कंठ में तुलसी, सूर, [[कबीर]] की ही तरह [[रहीम]], [[रसखान]], पद्माकर, ठाकुर, देव, [[बिहारीलाल]] ही नहीं बहुत अपेक्षाकृत कम विख्यात कवि भी चढ़े। उसका कारण उनकी कविता की सह्रदता और सम्प्रेषणीयता ही थी। इन कवियों से ब्रजभाषा समृद्ध हुई है, उसने एक ऐसे जीवन में प्रवेश किया है, जो सबका हो सकता है। यह उल्लेखनीय है कि इस युग के जो कवि राजदरबारों में हैं, वे भी केवल कसीदा या बधाई लिखकर सन्तोष नहीं पाते थे। वे अपना काव्य राजा को समर्पित कर दें, पर उस काव्य में राजा या राजदरबार का जीवन बहुत कम रहता था। वे प्रकृति के मुक्त वितान के कवि थे, सँकरी और अँधेरी गली के कवि नहीं थे। इसलिए इस युग के उत्कृष्ट काव्य में सेनापति जैसे कवि के स्वच्छ प्रकृति चित्रण मिलते हैं और विभिन्न व्यवसायों, विशेष करके [[कृषि]] व्यवसाय के मनोरम चित्र कहीं विम्ब के रूप में, कहीं वर्ण्य विषय के रूप में, कहीं सादृश्य के रूप में मिलते हैं। [[संस्कृत]] की मुक्तक काव्य परम्परा और संस्कृत की काव्यशिखा परम्परा का दाय इस काल में प्रसृत दिखता है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि उसके पूर्ववर्ती काल में उसकी छाप न हो, अपभ्रंश काव्य में वीर गाथाओं, [[वैष्णव]] पदावली साहित्य इन सबमें उसकी छाप है। अत: इसको रीतिकाल का अभिलक्षण बताना उचित नहीं। रीतिकाल के कवियों में देश की चेतना न हो, ऐसी बात भी नहीं है। भूषण, लाल, सूदन, पद्माकर जैसे प्रसिद्ध कवियों के अतिरिक्त भी अनेक कवि हुए, जिनके काव्य में स्वदेश का अनुराग व्यक्त होता है और वह परम्परा [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]], श्रीधर पाठक और सत्य नारायण कविरत्न तक अक्षुण्ण चली आई है। &lt;br /&gt;
==सुन्दर व्याकरणीय प्रयोग==&lt;br /&gt;
'''ब्रजभाषा के माध्यम से पूरे देश की''' कविता में एक ऐसी भावभूमी वाली, जिसमें सभी शरीक हो सकते थे और एक ऐसी भाषा पाई, जिसकी गूँज मन को और का और बना सकती थी। इस युग में भाषा में एक ओर घनानन्द जैसे कवियों में लाक्षणिक प्रयोगों का विकास हुआ, जिसमें ‘लगियै रहै आँखिन के उर आरति’ जैसे प्रयोग अमूर्त को मूर्त रूप देने के लिए उदभूत हुए। दूसरी ओर सीधे मुहावरे की अर्थगर्भिता उन्मीलित की गई। जैसे-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*अब रहियै न रहियै समयो बहती नदी पाँय पखार लै री।...(ठाकुर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रसाद गुण और लयधर्मी प्रवाहशीलता का उत्कर्ष भी इस युग में पहुँचा। जैसे-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;चाँदनी के भारन दिखात उनयौ सो चंद&lt;br /&gt;
गंध ही के भारन मद-मंद बहत पौन...(द्विजदेव)&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Radha-Krishna-3.jpg|thumb|[[राधा]]-[[कृष्ण]]]]&lt;br /&gt;
अथवा&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;आगे नन्दरानी के तनिक पय पीवे काज&lt;br /&gt;
तीन लोक ठाकुर सो ठुनकत ठाड़ौ है...(पद्माकर)&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इस युग की ब्रजभाषा कविता में पुनरुक्ति का उपयोग भी बड़े सटीक ढंग से हुआ और उससे अर्थ में भावैक्य लाने में सफलता मिली। जैसे-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;बोल हारे कोकिल बुलाय हारे केकीगन&lt;br /&gt;
सिखै हारी सखियाँ सब जुगति नई नई&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इसमें हारने की क्रिया का प्रयोग तीन बार हुआ है। इस पुनरुक्ति से एक असम्भव स्थिति का द्योतन सामर्थ्यपूर्वक हुआ है। सादृश्य विधान की भी नई ऊँचाइयाँ देखने को मिलती हैं। कहीं-कहीं उत्प्रेक्षा की उड़ान के रूप में, कहीं-कहीं कसे हुए रूपक के रूप में, कहीं-कहीं अत्यन्त सीधी पर नुकीली उपमा के रूप में। जैसे-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;राधिका के आनन की समता न पावै विधु&lt;br /&gt;
टूकि-टूकि तोरै पुनि टूक-टूक जोरै है...(उत्प्रेक्षा)&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;वरुनी बंघबर औ गूदरी पलक दोऊ&lt;br /&gt;
कोए राते बसन भगौहें भेस रखियाँ।&lt;br /&gt;
बूड़ी जल ही में दिन जामिन हूँ जागी भौहें&lt;br /&gt;
धूम सिर छायौ बिरहानल बिलखियाँ।&lt;br /&gt;
अँसुआ फटिक-माल लाल डोरी सेली पैन्हि&lt;br /&gt;
भई हैं अकेली तजि सेली संग, सखियाँ।&lt;br /&gt;
दीजिए दरस ‘देव’ कीजिए सँजोगिनि, ये&lt;br /&gt;
जोगिन है बैठीं वा वियोगिनि की अँखियाँ।...(सांग रूपक)&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;सुरभि सी सुकवि की सुमति खुलन लागीं&lt;br /&gt;
चिरिया सी चिन्ता जागी जनक के हियरे।...(उपमा)&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
उलाहनों की भाषा में बाँकपन [[सूरदास]] से ही मिलना प्रारम्भ हो जाता है, किन्तु इस युग की कविता में वह बाँकपन कुछ और विकसित मिलता है। जैसे-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;भोरहि नयौति गई ती तुम्हें वह गोकुल गाँव की ग्वारिन गोरी।&lt;br /&gt;
आधिक राति लौं बेनी प्रबीन तुम्हें ढिंग राखि करी बरजोरी।&lt;br /&gt;
देखि हँसी हमें आवत लालन भाल में दीन्ही महावर घोरी।&lt;br /&gt;
एते बड़े ब्रजमण्डल में न मिली कहुँ माँगेहु रंचक रोरी।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
सूक्ष्म मनोभावों के अंकन के लिए मूर्त अभिव्यंजना का आश्रय बड़ी कुशलता से लिया गया है। जैसे छन्द में-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;मान्यौ न मानवती भई भोर सुसोचहि सोय गए मनभावन।&lt;br /&gt;
तैस सों सास कही दुलही भई बेर कुमार को जाहु जगावन।।&lt;br /&gt;
मान को सोच जगैबे की लाज लगी पग नूपुर पाटी बजावन।&lt;br /&gt;
या छवि हेरि हिराय रहे हरि कौन को रूसिबो काको मनावन।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इस अनाम कवि के [[छन्द]] में मान के निर्वाह की चिन्ता और जगाने की लज्जा के अर्न्तद्वन्द्व का समाधान नूपुरों से पाटी बजाकर, उन पैरों के मन जाने का सूक्ष्म संकेत है, जिन्हें नायक मनाता रहा, नायिका नहीं मनी। इस युग की भाषिक उपलब्धियों का लेखा-जोखा देना यहाँ अभिप्रेत नहीं है। यहाँ केवल इतना संकेत कर देना था कि, ब्रजभाषा की काव्य यात्रा रीति युग में नये उत्कर्ष के शिखरों पर पहुँचती रही और उसके कारण भाषा में निखार आता रहा। शब्दों के चयन के ऊपर बल देने से, उक्ति भंगिमाओं के औचित्य से, लयात्मक प्रवाह से या संक्षिप्तता से। असमर्थ कवियों के द्वारा या समर्थ कवियों के द्वारा भी शब्दक्रीड़ा करते हुए अटपटे प्रयोग भी आये हैं और खिचड़ी भी शब्दों की पकायी गई है। जिसके कारण सम्बद्ध स्थलों में दुरूहता आ गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भाषा और लिपि}}&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>खुशी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95&amp;diff=217190</id>
		<title>अशोक</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95&amp;diff=217190"/>
		<updated>2011-09-13T12:40:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: Adding category :Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा ऐतिहासिक पात्र&lt;br /&gt;
|चित्र=Ashoka.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=अशोक&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=अशोक बिन्दुसार मौर्य&lt;br /&gt;
|अन्य नाम='देवनाम प्रिय' एवं 'प्रियदर्शी'&lt;br /&gt;
|जन्म=304 ईसा पूर्व &lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[पाटलिपुत्र]], [[पटना]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु तिथि=232 ईसा पूर्व&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=पाटलिपुत्र, पटना&lt;br /&gt;
|पिता/माता=[[बिन्दुसार]], रानी धर्मा&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=देवी, पद्मावती, कौरवाकी&lt;br /&gt;
|संतान=महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा&lt;br /&gt;
|उपाधि=सम्राट&lt;br /&gt;
|शासन=&lt;br /&gt;
|धार्मिक मान्यता=[[ब्राह्मण]], [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]]&lt;br /&gt;
|राज्याभिषेक=&lt;br /&gt;
|युद्ध=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|निर्माण=&lt;br /&gt;
|सुधार-परिवर्तन=&lt;br /&gt;
|राजधानी=&lt;br /&gt;
|पूर्वाधिकारी=बिन्दुसार&lt;br /&gt;
|राजघराना=&lt;br /&gt;
|वंश=मौर्य&lt;br /&gt;
|शासन काल=269 से 232 ईसा पूर्व &lt;br /&gt;
|स्मारक=&lt;br /&gt;
|मक़बरा=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अशोक बिन्दुसार मौर्य''' (राजकाल ईसापूर्व 269-232) प्राचीन [[भारत]] में [[मौर्य राजवंश]] का राजा था। अशोक का 'देवनाम प्रिय' एवं 'प्रियदर्शी' आदि नामों से भी उल्लेख किया जाता है। उसके समय मौर्य राज्य उत्तर में [[हिन्दुकुश]] की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में [[गोदावरी नदी]] के दक्षिण तथा [[मैसूर]] ([[कर्नाटक]]) तक तथा पूर्व में [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] से पश्चिम में [[अफ़ग़ानिस्तान]] तक पहुँच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा [[बौद्ध]] धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक [[गौतम बुद्ध]] के भक्त हो गए और उन्हीं (महात्मा बुद्ध) की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी [[नेपाल]] में उनके जन्मस्थल-[[लुम्बिनी]] में मायादेवी मन्दिर के पास [[अशोक स्‍तम्‍भ]] के रूप में देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा [[श्रीलंका]], अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, [[मिस्र]] तथा [[यूनान]] में भी करवाया। [[अशोक के अभिलेख|अशोक के अभिलेखों]] में प्रजा के प्रति कल्याणकारी द्रष्टिकोण की अभिव्यक्ति की गई है|&lt;br /&gt;
==बिंदुसार का पुत्र &amp;quot;अशोक महान&amp;quot;==&lt;br /&gt;
अशोक प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट [[बिंदुसार]] का पुत्र था। जिसका जन्म लगभग 304 ई. पूर्व में माना जाता है। भाइयों के साथ गृह-युद्ध के बाद 272 ई. पूर्व अशोक को राजगद्दी मिली और 232 ई. पूर्व तक उसने शासन किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आरंभ में अशोक भी अपने पितामह [[चंद्रगुप्त मौर्य]] और पिता बिंदुसार की भाँति युद्ध के द्वारा साम्राज्य विस्तार करता गया। [[कश्मीर]], [[कलिंग]] तथा कुछ अन्य प्रदेशों को जीतकर उसने संपूर्ण भारत में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया जिसकी सीमाएं पश्चिम में [[ईरान]] तक फैली हुई थीं। परंतु कलिंग युद्ध में जो जनहानि हुई उसका अशोक के हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा और वह हिंसक युद्धों की नीति छोड़कर धर्म विजय की ओर अग्रसर हुआ। अशोक की प्रसिद्धि इतिहास में उसके साम्राज्य विस्तार के कारण नहीं वरन धार्मिक भावना और मानवतावाद के प्रचारक के रूप में अधिक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिन्दुसार की मृत्यु के बाद अशोक राजा हुआ। अशोक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने में प्रमुख साधन उसके [[अशोक के शिलालेख|शिलालेख]] तथा [[अशोक स्तंभ|स्तंभों]] पर उत्कीर्ण अभिलेख हैं। किन्तु ये अभिलेख अशोक के प्रारम्भिक जीवन पर कोई प्रकाश नहीं डालते। इनके लिए हमें संस्कृत तथा पालि में लिखे हुए [[बौद्ध]] ग्रंथों पर निर्भर रहना पड़ता है। परम्परानुसार अशोक ने अपने भाइयों का हनन करके सिंहासन प्राप्त किया था।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==तक्षशिला और कलिंग== &lt;br /&gt;
अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष तक अशोक ने मौर्य साम्राज्य की परम्परागत नीति का ही अनुसरण किया। अशोक ने देश के अन्दर साम्राज्य विस्तार किया किन्तु दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार की नीति अपनाई।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
भारत के अन्दर अशोक एक विजेता रहा। उसने [[खस]], [[नेपाल]] को विजित किया और [[तक्षशिला]] के विद्रोह का शान्त किया। अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष में अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त की। ऐसा प्रतीत होता है कि [[नंद वंश]] के पतन के बाद कलिंग स्वतंत्र हो गया था। [[प्लिनी]] की पुस्तक में उद्धत [[मेगस्थनीज़]] के विवरण के अनुसार चंद्रगुप्त के समय में कलिंग एक स्वतंत्र राज्य था। अशोक के शिलालेख के अनुसार युद्ध में मारे गए तथा क़ैद किए हुए सिपाहियों की संख्या ढाई लाख थी और इससे भी कई गुने सिपाही युद्ध में घायल हुए थे। मगध की सीमाओं से जुड़े हुए ऐसे शक्तिशाली राज्य की स्थिति के प्रति [[मगध]] शासक उदासीन नहीं रह सकता था। [[खारवेल]] के समय मगध को कलिंग की शक्ति का कटु अनुभव था। सुरक्षा की दृष्टि से कलिंग का जीतना आवश्यक था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कलिंग को जीतने का दूसरा कारण भी था। दक्षिण के साथ सीधे सम्पर्क के लिए समुद्री और स्थल मार्ग पर [[मौर्य वंश|मौर्यों]] का नियंत्रण आवश्यक था। कलिंग यदि स्वतंत्र देश रहता तो समुद्री और स्थल मार्ग से होने वाले व्यापार में रुकावट पड़ सकती थी। अतः कलिंग को मगध साम्राज्य में मिलाना आवश्यक था। किन्तु यह कोई प्रबल कारण प्रतीत नहीं होता क्योंकि इस दृष्टि से तो चंद्रगुप्त के समय से ही कलिंग को मगध साम्राज्य में मिला लेना चाहिए था। [[कौटिल्य]] के विवरण से स्पष्ट है कि वह दक्षिण के साथ व्यापार का महत्त्व देता था। विजित कलिंग राज्य मगध साम्राज्य का एक अंग हो गया। राजवंश का कोई राजकुमार वहाँ वाइसराय (उपराजा) नियुक्त कर दिया गया। [[तोसली]] इस प्रान्त की राजधानी बनाई गई।&lt;br /&gt;
==हृदय परिवर्तन== &lt;br /&gt;
कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा विजित देश की जनता के कष्ट से अशोक की अंतरात्मा को तीव्र आघात पहुँचा। युद्ध की भीषणता का अशोक पर गहरा प्रभाव पड़ा। अशोक ने युद्ध की नीति को सदा के लिए त्याग दिया और 'दिग्विजय' के स्थान पर 'धम्म विजय' की नीति को अपनाया। [[डा. हेमचंद्र रायचौधरी]] के अनुसार मगध का सम्राट बनने के बाद यह अशोक का प्रथम तथा अन्तिम युद्ध था। इसके बाद मगध की विजयों तथा राज्य-विस्तार का यह युग समाप्त हुआ जिसका सूत्रपात बिंबिसार की अंग विजय के बाद हुआ था। अब एक नए युग आरम्भ हुआ। यह युग शान्ति, सामाजिक प्रगति तथा धर्मप्रचार का था, किन्तु इसके साथ-साथ राजनीतिक गतिरोध और सामरिक कुशलता भी दिखाई देने लगी। सैनिक अभ्यास के अभाव में मगध का सामरिक आवेश और उत्साह क्षीण होने लगा। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ashok-map.jpg|thumb|250px|left|अशोक के साम्राज्य की सीमा का मानचित्र]]&lt;br /&gt;
कलिंग की प्रजा तथा कलिंग की सीमा पर रहने वाले लोगों के प्रति कैसा व्यवहार किया जए, इस सम्बन्ध में अशोक ने दो आदेश जारी किए। ये दो आदेश [[धौली]] और [[जौगड़]] नामक स्थानों पर सुरक्षित हैं। ये आदेश तोसली और [[समापा]] के महामात्यों तथा उच्च अधिकारियों को सम्बोधित करते हुए लिखे गए हैं—सम्राट का आदेश है कि प्रजा के साथ पुत्रवत् व्यवहार हो, जनता को प्यार किया जाए, अकारण लोगों को कारावास का दंड तथा यातना न दी जाए। जनता के साथ न्याय किया जाना चाहिए। सीमांत जातियों को आश्वासन दिया गया कि उन्हें सम्राट से कोई भय नहीं करना चाहिए। उन्हें राजा के साथ व्यवहार करने से सुख ही मिलेगा, कष्ट नहीं। राजा यथाशक्ति उन्हें क्षमा करेगा, वे [[धम्म]] का पालन करें। यहाँ पर उन्हें सुख मिलेगा और मृत्यु के बाद स्वर्ग।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साम्राज्य की सीमा==&lt;br /&gt;
अशोक के शिलालेखों तथा स्तंभलेखों से अशोक के साम्राज्य की सीमा की ठीक जानकारी प्राप्त होती है। शिला तथा स्तंभलेखों के विवरण से ही नहीं, वरन् जहाँ से अभिलेख पाए गए हैं, उन स्थानों की स्थिति से भी सीमा निर्धारण करने में सहायता मिलती है। इन अभिलेखों में जनता के लिए राजा की घोषणाएँ थीं। अतः वे अशोक के विभिन्न प्रान्तों में आबादी के मुख्य केन्द्रों में उत्कीर्ण कराए गए। कुछ अभिलेख सीमांत स्थानों पर पाए जाते हैं। उत्तर—पश्चिम में [[शाहबाजगढ़ी]] और [[मंसेरा]] में अशोक के शिलालेख पाए गए। इसके अतिरिक्त तक्षशिला में और [[क़ाबुल]] प्रदेश में लमगान में अशोक के लेख [[अरामाइक लिपि]] में मिलते हैं। एक शिलालेख में [[एण्टियोकस द्वितीय|एण्टियोकस द्वितीय थियोस]] को पड़ोसी राजा कहा गया है। इससे स्पष्ट है कि उत्तर-पश्चिम में अशोक के साम्राज्य की सीमा [[हिन्दुकुश]] तक थी। [[कालसी]], [[रुम्मिनदेई]] तथा [[निगाली सागर शिलालेख]] तथा स्तंभलेखों से सिद्ध होता है कि [[देहरादून]] और [[नेपाल]] की तराई का क्षेत्र अशोक के राज्य में था। [[सारनाथ]] तथा नेपाल की वंशावलियों के प्रमाण तथा स्मारकों से यह सिद्ध होता है कि नेपाल अशोक के साम्राज्य का एक अंग था। जब अशोक युवराज था, उसने [[खस]] और [[नेपाल]] प्रदेश को जीता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिलालेख और स्तूप==&lt;br /&gt;
{{Main|ब्राह्मी लिपि अशोक-काल}} &lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahmi Lipi-1.jpg|250px|thumb|[[ब्राह्मी लिपि अशोक-काल|ब्राह्मी लिपि]]]]&lt;br /&gt;
पूर्व में [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] तक मौर्य साम्राज्य के विस्तृत होने की पुष्टि [[महास्थान]] शिलालेख से होती है। यह अभिलेख [[ब्राह्मी लिपि]] में है और [[मौर्य काल]] का माना जाता है। महावंश के अनुसार अशोक अपने पुत्र को विदा करने के लिए [[ताम्रलिप्ति]] तक आया था। [[ह्वेन त्सांग]] को भी ताम्रलिप्ति, [[कर्णसुवर्ण]], [[समतट]], [[अखण्डित बंगाल|पूर्वी बंगाल]] तथा [[पुण्ड्रवर्धन]] में अशोक के स्तूप देखने को मिले थे। [[दिव्यावदान]] में कहा गया है कि अशोक के समय तक बंगाल मगध साम्राज्य का ही एक अंग था। [[आसाम]] कदाचित् मौर्य साम्राज्य से बाहर था। वहाँ पर अशोक के कोई स्मारक चीनी यात्री को देखने को नहीं मिले। [[उड़ीसा]] और [[गंज़ाम]] से लेकर पश्चिम में [[सौराष्ट्र]] तथा [[महाराष्ट्र]] तक अशोक का शासन था। [[धौली]] और [[जौगड़]] में अशोक के शिलालेख मिले हैं, साथ ही सौराष्ट्र में [[जूनागढ़]] और [[अपरान्त]] में [[मुंबई]] के पास [[सोपारा]] नामक स्थान के पास भी शिलालेख मिले हैं। दक्षिण में [[येर्रागुडी]], [[कार्नूल]] ज़िले में अशोक के शिलालेख मिले हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरी [[कर्नाटक]] के [[चित्तलदुर्ग]] इलाक़े के तीन स्थानों- [[सिद्धपुर]], [[मस्की]] तथा [[जतिंग रामेश्वर]] में अशोक के लघु शिलालेख मिले हैं। अशोक के शिलालेखों में [[चोल]], [[पांड्य]] और [[केरल]] राज्यों को स्वंतत्र सीमावर्ती राजय कहा गया है। जिससे स्पष्ट है कि सुदूर दक्षिण भारत अशोक के साम्राज्य से बाहर था। इस प्रकार हम देखते हैं कि आसाम और सुदूर दक्षिण को छोड़कर सम्पूर्ण भारतवर्ष अशोक के साम्राज्य के अंतर्गत था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राज्यों से संबंध==&lt;br /&gt;
यद्यपि अशोक का साम्राज्य विस्तृत था तथापि साम्राज्य के अंतर्गत सभी देशों पर उसका सीधा शासन था। अशोक के पाँचवे और तेरहवें शिलालेख में कुछ जनपदों तथा जातियों का उल्लेख किया गया है। जैसे [[यवन]], [[कंबोज महाजनपद|काम्बोज]], [[नाभाक]], [[नाभापंक्ति]], [[भोज]], [[पेत्तनिक]], [[आंध्र वंश|आन्ध्र]], [[पुलिंद]] [[रेप्सन]] का विचार है कि ये देश तथा जातियाँ अशोक द्वारा जीते गए राज्य के अंतर्गत न होकर प्रभावक्षेत्र में थे। किन्तु यह सही प्रतीत नहीं होता है। क्योंकि इन प्रदेशों में अशोक के धर्म महामात्रों के नियुक्त किए जाने का उल्लेख है। डा. रायचौधरी के अनुसार इन लोगों के साथ विजितों तथा अंतरविजितों (अर्थात् स्वतंत्र सीमावर्ती राज्यों) के बीच का व्यवहार किया जाता था। [[गांधार]], यवन, काम्बोज, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रदेश में थे। भोज, [[राष्ट्रिक]], [[पेत्तनिक]] सम्भवतः अपरान्त पश्चिमी सीमा में थे। 13वें शिलालेख में अशोक ने [[अटवी|अटवी जातियों]] का उल्लेख किया है, जो अपराध करते थे। उन्हें यथासम्भव क्षमा करने का आश्वासन दिया गया है। किन्तु साथ ही यह चेतावनी भी दी है कि अनुताप अर्थात् पश्चताताप में भी देवानांप्रिय का प्रभाव है। यदि ये जातियाँ कठिनाइयाँ उत्पन्न करें तो राजा को उन्हें सज़ा देने तथा मारने की शक्ति भी है। सम्भवतः यह अटवी प्रदेश बुदेलखण्ड से लेकर उड़ीसा तक फैला हुआ था। ये अटवी जातियाँ यद्यपि पराजित हुईं थीं, तथापि उनकी आंतरिक स्वतंत्रता को मान्यता दे दी गई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Asoka's-Pillar.jpg|thumb|left|200px|अशोक का स्तम्भ, [[वैशाली]]]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्म परिवर्तन==&lt;br /&gt;
इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने पूर्वजों की तरह अशोक भी [[ब्राह्मण]] धर्म का अनुयायी था। महावंश के अनुसार वह प्रतिदिन 60,000 ब्राह्मणों को भोजन दिया करता था और अनेक देवी-देवताओं की पूजा किया करता था। कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार अशोक के इष्ट देव शिव थे। पशुबलि में उसे कोई हिचक नहीं थी। किन्तु अपने पूर्वजों की तरह वह जिज्ञासु भी था। मौर्य राज्य सभा में सभी धर्मों के विद्वान भाग लेते थे। जैसे—[[ब्राह्मण]], दार्शनिक, निग्रंथ, [[आजीवक]], बौद्ध तथा यूनानी दार्शनिक। दीपवंश के अनुसार अशोक अपनी धार्मिक जिज्ञासा शान्त करने के लिए विभिन्न सिद्धांतों के व्याख्याताओं को राज्यसभा में बुलाता था। उन्हें उपहार देकर सम्मानित करता था और साथ ही स्वयं भी विचारार्थ अनेक सवाल प्रस्तावित करता था। वह यह जानना चाहता था कि धर्म के किन ग्रंथों में सत्य है। उसे अपने सवालों के जो उत्तर मिले उनसे वह संतुष्ट नहीं था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन अपने राजभवन की खिड़की से उसने श्रमण निग्रोध को भिक्षा के लिए जाते हुए देखा और उसके व्यक्तित्व से बहुत ही प्रभावित हुआ। निग्रोध अशोक के बड़े भाई सुमन का पुत्र था। निग्रोध के प्रवचन को सुनकर अशोक ने [[बौद्ध धर्म]] अपना लिया। बाद में वह मोंग्गलिपुत्त तिस्स के प्रभाव में आ गया। उत्तरी [[भारत]] की [[अनुश्रुति|अनुश्रुतियों]] के अनुसार उपगुप्त ने अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। इन भिक्षुओं की शिक्षा तथा सम्पर्क से अशोक का रुझान बौद्ध धर्म की ओर बढ़ रहा था। इन अनुश्रुतियों से पता चलता है कि एक साधारण बौद्ध होने के बावजूद अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। कलिंग युद्ध के नरसंहार से अशोक की अंतरात्मा की तीव्र आघात पहुँचा। इस पश्चाताप के परिणामस्वरूप अशोक ने विधिवत बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। किन्तु जैसा कि अशोक के एक लघु शिलालेख से विदित होता है, बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद लगभग एक साल तक अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार में सक्रिय भाग नहीं लिया। अवश्य ही एक उपासक के रूप में उसने 10वें वर्ष बौद्ध गया कि यात्रा की। विहार-यात्रा का स्थान धर्म यात्राओं ने ले लिया। इसके बाद वह एक वर्ष तक संघ में ही रहा या संघ के भिक्षुओं के निकट सम्पर्क में रहा। इस सम्पर्क के फलस्वरूप वह धर्म के प्रति अत्यधिक उत्साहशील हो गया। उसने जनता में प्रचार के लिए धर्म-सम्बन्धी उपदेश शिलाओं एवं स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अशोक का धम्म==&lt;br /&gt;
संसार के इतिहास में अशोक इसलिए विख्यात है कि उसने निरन्तर मानव की नैतिक उन्नति के लिए प्रयास किया। जिन सिद्धांतों के पालन से यह नैतिक उत्थान सम्भव था, अशोक के लेखों में उन्हें 'धम्म' कहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तंभ-लेखों में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है, &amp;quot;धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।&amp;quot; आगे कहा गया है कि, &amp;quot;प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों, ब्राह्मण तथा श्रवणों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार।&amp;quot; [[ब्रह्मगिरि]] शिलालेख में इन गुणों के अतिरिक्त शिष्य द्वारा गुरु का आदर भी धम्म के अंतर्गत माना गया है। अशोक के अनुसार यह पुरानी परम्परा (पोराण पकिति) है। तीसरे शिलालेख में अशोक ने अल्प व्यय तथा अल्प संग्रह का भी धम्म माना है। अशोक ने न केवल धम्म की व्याख्या की है, वरन् उसने धम्म की प्रगति में बाधक पाप की भी व्याख्या की है—चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, मान और ईर्ष्या पाप के लक्षण हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए। अशोक ने नित्य आत्म-परीक्षण पर बल दिया है। मनुष्य हमेशा अपने द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को ही देखता है, यह कभी नहीं देखता कि मैंने क्या पाप किया है। व्यक्ति को देखना चाहिए कि ये मनोवेग—चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, ईर्ष्या, मान—व्यक्ति को पाप की ओर न ले जाएँ और उसे भ्रष्ट न करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धम्म के सिद्धांत== &lt;br /&gt;
धम्म के इन सिद्धांतों का अनुशीलन करने से इस सम्बन्ध में कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह एक सर्वसाधारण धर्म है। जिसकी मूलभूत मान्यताएँ सभी सम्प्रदायों में मान्य हैं और जो देश काल की सीमाओं में आबद्ध नहीं हैं। किसी पाखंड या सम्प्रदाय का इससे विरोध नहीं हो सकता। अशोक ने अपने तेरहवें शिलालेख में लिखा है—ब्राह्मण, श्रमण और ग्रहस्थ सर्वत्र रहते हैं और धर्म के इन आचरणों का पालन करते हैं। अशोक के साम्राज्य में अनेक सम्प्रदाय के मानने वाले थे और हो सकता है कि उनमें थोड़ा बहुत विरोध तथा प्रतिद्वन्द्विता का भाव भी रहा हो। उसने सभी सम्प्रदायों में सामजस्य स्थापित करने के लिए सदाचार के इन नियमों पर ज़ोर दिया। बारहवें शिलालेख में अशोक में धर्म की सार-वृद्धि पर ज़ोर दिया है, अर्थात् एक धर्म—सम्प्रदाय वाले दूसरे धर्म—सम्प्रदाय के सिद्धांतों के विषय में जानकारी प्राप्त करें, इससे धर्मसार की वृद्धि होगी।{{बाँयाबक्सा|पाठ=कलिंग में अशोक ने कहा है, &amp;quot;सारी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान ऐहिक और कल्याण की कामना करता हूँ उसी प्रकार, अपनी प्रजा के ऐहिक और पारलौकिक कल्याण और सुख के लिए भी। जैसे एक माँ एक शिशु को एक कुशल धाय को सौंपकर निश्चिंत हो जाती है कि कुशल धाय संतान का पालन-पोषण करने में समर्थ है, उसी प्रकार मैंने भी अपनी प्रजा के सुख और कल्याण के लिए राजुकों की नियुक्ति की है&amp;quot;|विचारक=}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध धर्म== &lt;br /&gt;
इसमें कोई संदेह नहीं कि अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी था। सभी बौद्ध ग्रंथ अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हैं। अशोक के बौद्ध होने के सबल प्रमाण उसके अभिलेख हैं। राज्याभिषक से सम्बद्ध लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को 'बुद्धशाक्य' कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि वह ढाई वर्ष तक एक साधारण उपासक रहा। भाब्रु लघु शिलालेख में अशोक त्रिरत्न—बुद्ध, धम्म और संघ में विश्वास करने के लिए कहता है और भिक्षु तथा भिक्षुणियों से कुछ बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन तथा श्रवण करने के लिए कहता है। लघु शिलालेख से यह भी पता चलता है कि राज्याभिषेक के दसवें वर्ष में अशोक ने बोध गया की यात्रा की, बारहवें वर्ष वह निगालि सागर गया और [[कनक मुनि]] [[बुद्ध]] के स्तूप के आकार को दुगुना किया। [[महावंश]] तथा [[दीपवंश]] के अनुसार उसने तृतीय बौद्ध संगीति (सभा) बुलाई और मोग्गलिपुत्त तिस्स की सहायता से संघ में अनुशासन और एकता लाने का सफल प्रयास किया। यह दूसरी बात है कि एकता थेरवाद बौद्ध सम्प्रदाय तक ही सीमित थी। अशोक के समय [[थेरवाद सम्प्रदाय]] भी अनेक उपसम्प्रदायों में विभक्त हो गया था। अशोक के [[सारनाथ]] तथा [[सांची]] के लघु स्तंभ लेख में संघभेद के विरुद्ध यह आदेश जारी किया गया है कि जो भिक्षु या भिक्षुणी संघ में फूट डालने का प्रयास करें उन्हें संघ से बहिष्कृत किया जाए। यह आदेश [[कौशाम्बी]] और [[पाटलिपुत्र]] के महापात्रों को दिया गया है। इससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म का संरक्षक होने के नाते संघ में एकता बनाए रखने के लिए अशोक ने राजसत्ता का उपयोग किया। हमें अशोक के व्यक्तिगत धर्म और अभिलेखों में दिए हुए धम्म में स्पष्ट भेद रखना है। अशोक बौद्ध था, त्रिरत्न में विश्वास करता था। किन्तु जिस धम्म के उपदेश का उसने लोगों में प्रचार किया वह सर्वसाधारण धम्म था। यह मानव धम्म था, तभी तो अशोक अपने तेरहवें शिलालेख में विदेशों में यूनानी शासकों और देश में साम्राज्य के बाहर दक्षिण के पड़ोसी राज्यों में धम्म विजय का दावा करता है। उक्त शिलालेख के अनुसार इन सभी देशों में लोग धम्मानुशासन (धर्म की शिक्षा) सुनते हैं और धम्म के अनुकूल आचरण करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्म संबंधी शिलालेख==&lt;br /&gt;
{{Main|अशोक के शिलालेख}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahmi Lipi-3.jpg|thumb|[[अशोक के शिलालेख]]|220px]]&lt;br /&gt;
शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों के अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अशोक का धम्म व्यावहारिक फलमूलक (अर्थात फल को दृष्टि में रखने वाला) और अत्यधिक मानवीय था। इस धर्म के प्रचार से अशोक अपने साम्राज्य के लोगों में तथा बाहर अच्छे जीवन के आदर्श को चरितार्थ करना चाहता था। इसके लिए उसने जहाँ कुछ बातें लाकर बौद्ध धर्म में सुधार किया वहाँ लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया। वस्तुतः उसने अपने शासनकाल में निरन्तर यह प्रयास किया कि प्रजा के सभी वर्गों और सम्प्रदायों के बीच सहमति का आधार ढूंढा जाए और सामान्य आधार के अनुसार नीति अपनाई जाए। सातवें शिलालेख में अशोक ने कहा, &amp;quot;सभी सम्प्रदाय सभी स्थानों में रह सकते हैं, क्योंकि सभी आत्मसंयम और भावशुद्धि चाहते हैं।&amp;quot; बारहवें शिलालेख में उसने घोषणा की कि अशोक सभी सम्प्रदायों के गृहस्थ और श्रवणों का दान आदि के द्वारा सम्मान करता है। किन्तु महाराज दान और मान को इतना महत्त्व नहीं देते जितना इस बात को देते हैं कि सभी सम्प्रदाय के लोगों में सारवृद्धि हो, सारवृद्धि के लिए मूलमंत्र है वाकसंयम (वचो गुत्ति)। लोगों को अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा तथा दूसरे सम्प्रदायों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। लोगों में सहमति (समवाय) बढ़ाने के लिए धम्म महापात्र तथा अन्य कर्मचारियों को लगाया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध धर्म में रुचि का कारण==&lt;br /&gt;
अशोक के धम्म की विवेचना करते हुए रोमिला थापर ने लिखा है कि कुछ राजनीतिक उद्देश्यों से ही अशोक ने एक नए धर्म की कल्पना की तथा इसका प्रसार किया। [[चंद्रगुप्त मौर्य]] के समय शासन के केन्द्रीकरण की नीति सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी थी। कुशल अधिकारतंत्र, अच्छी संचार व्यवस्था और शक्तिशाली शासक के द्वारा उस समय साम्राज्य का जितना केन्द्रीकरण सम्भव था, वह हो चुका था। किन्तु केन्द्र का आधिपत्य बनाए रखना दो ही तरह से सम्भव था, एक तो सैनिक शक्ति द्वारा कठोर शासन तथा राजा में देवत्व का आरोपण करके और दूसरे सभी वर्गों से संकलित सारग्राही धर्म को अपनाकर। यह दूसरा तरीक़ा ही अधिक युक्ति संगत था क्योंकि ऐसा करने से किसी एक वर्ग का प्रभाव कम किया जा सकता था और फलतः केन्द्र का प्रभाव बढ़ता। अशोक की यह नीति सार रूप में वही थी जो [[अकबर]] ने अपनाई थी। यद्यपि उसका रूप भिन्न था। सिंहासनारूढ़ होने के समय अशोक बौद्ध नहीं था। बाद में ही उसकी बौद्ध धर्म में रुचि बढ़ी क्योंकि उत्तराधिकार युद्ध के समय उसे सम्भवतः कट्टर समुदायों का समर्थन नहीं मिला। अतः बौद्ध धर्म को स्पष्ट रूप में समर्थन देकर उसने उन वर्गों का समर्थन प्राप्त किया जो कट्टर नहीं थे। रोमिला थापर का अनुमान है कि बौद्ध और आजीवकों को नवोदित वैश्य वर्ग का समर्थन प्राप्त था तथा जनसाधारण का इन सम्प्रदायों से तीव्र विरोध नहीं था। इस प्रकार अशोक ने धर्म को अपनाने में व्यावहारिक लाभ देखा। इस नए धर्म या धम्म की कल्पना का दूसरा कारण था छोटी—छोटी राजनीतिक इकाइयों में बंटे साम्राज्य के विभिन्न वर्गों, जातियों और संस्कृतियों को एक सूत्र में बाँधना। इनके साथ-साथ विभिन्न प्रदेशों में सत्ता को दृढ़ करने के लिए यह उपयोग में लाया जा सकता था।&lt;br /&gt;
महत्त्वपूर्ण यह है कि एक शासक जिसके पास निरंकुश क़ानूनी विधान, विशाल सेना एंव अपरिमित संसाधन हो वह अपने शिलालेखों में स्वयं को नैतिक मूल्यों के विस्तारक के रूप में प्रस्तुत क्यों करता है? वस्तुतः योग्य व कुशल शासकों की नियुक्तियां सदैव साम्राज्य की रक्षा के लिए निर्मित की जाती हैं| बौद्ध धर्म की शिक्षा के केंद्र [[मगध]] में जनमानस में शोषण के विरुद्ध व्यापक चेतना थी| सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म का प्रचार करने और स्तूपादि को निर्मित कराने की प्रेरणा धर्माचार्य [[उपगुप्त]] ने ही दी। जब भगवान बुद्ध दूसरी बार [[मथुरा]] आये, तब उन्होंने भविष्यवाणी की और अपने प्रिय शिष्य [[आनंद]] से कहा कि कालांतर में यहाँ उपगुप्त नाम का एक प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान होगा, जो उन्हीं की तरह बौद्ध धर्म का प्रचार करेगा और उसके उपदेश से अनेक भिक्षु योग्यता और पद प्राप्त करेंगे। इस भविष्यवाणी के अनुसार उपगुप्त ने मथुरा के एक वणिक के घर जन्म लिया। उसका पिता सुगंधित द्रव्यों का व्यापार करता था। उपगुप्त अत्यंत रूपवान और प्रतिभाशाली था। उपगुप्त किशोरावस्था में ही विरक्त होकर बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। आनंद के शिष्य शाणकवासी ने उपगुप्त को मथुरा के नट-भट विहार में बौद्ध धर्म के 'सर्वास्तिवादी संप्रदाय' की दीक्षा दी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नैतिक उत्थान के लिए धम्म का प्रचार==&lt;br /&gt;
किन्तु बौद्ध अनुश्रुतियों और अशोक के अभिलेखों से यह सिद्ध नहीं होता कि उसने किसी राजनीतिक उद्देश्य से धम्म का प्रचार किया। तेरहवें शिलालेख और लघु शिलालेख से विदित होता है कि अशोक धर्म परिवर्तन का कलिंग युद्ध से निकट सम्बन्ध है।&lt;br /&gt;
रोमिला थापर का मत है कि धम्म कल्पना अशोक की निजी कल्पना थी, किन्तु अशोक के शिलालेखों में धम्म की जो बातें दी गई हैं उनसे स्पष्ट है कि वे पूर्ण रूप से बौद्ध ग्रंथों से ली गई हैं। ये बौद्ध ग्रंथ हैं—दीघनिकाय के लक्खण सुत्त चक्कवत्ती सीहनाद सुत्त, राहुलोवाद सुत्त तथा धम्मपद। इन ग्रंथों में वर्णित धर्मराज के आदर्श से प्रेरित होकर ही अशोक ने धम्म विजय आदर्श को अपनाया। लक्खण सुत्त तथा चक्कवत्ती सीहनाद सुत्त में धम्मयुक्त चक्रवर्ती सम्राट के विषय में कहा गया है कि वह भौतिक तथा आध्यात्मिक कल्याण के लिए प्रयत्नशाल रहता है। ऐसा राजा विजय से नहीं अपितु धम्म से विजयी होता है। वह तलबार के बजाय धम्म से विजय प्राप्त करता है। वह लोगों को अहिंसा का उपदेश देता है। अशोक ने धम्म की जो परिभाषा दी है वह 'राहुलोवादसुत्त' से ली गई है। इस सुत्त को 'गेहविजय' भी कहा गया है अर्थात 'ग्रहस्थों के लिए अनुशासन ग्रंथ'। उपासक के लिए परम उद्देश्य स्वर्ग प्राप्त करना था न कि निर्वाण। चक्कवत्ती (चक्रवर्ती) धम्मराज के आदर्श को अपनाते हुए अशोक ने जनसाधारण के नैतिक उत्थान के लिए अपने धम्म का प्रचार किया ताकि वे एहिक सुख और इस जन्म के बाद स्वर्ग प्राप्त कर सकें। इसमें संदेह नहीं कि अशोक सच्चे हृदय से अपनी प्रजा का नैतिक पुनरुद्धार करना चाहता था और इसके लिए वह निरन्तर प्रयत्न शील रहा। वह निस्संदेह एक आदर्श को चरितार्थ करना चाहता था। यही अशोक की मौलिकता है।&lt;br /&gt;
==अहिंसा का प्रचार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Inscription-Of-Ashoka-Brahmi-Script.jpg|thumb|250px|[[ब्राह्मी लिपि]] में लिखे [[अशोक के शिलालेख]], [[राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय संग्रहालय]], [[दिल्ली]]]]&lt;br /&gt;
अशोक ने धम्म प्रचार के लिए बड़ी लगन और उत्साह से काम किया। अहिंसा के प्रचार के लिए अशोक ने कई क़दम उठाए। उसने युद्ध बंद कर दिए और स्वयं को तथा राजकर्मचारियों को मानव-मात्र के नैतिक उत्थान में लगाया। जीवों का वध रोकने के लिए अशोक ने प्रथम शिलालेख में विक्षप्ति जारी की कि किसी यज्ञ के लिए पशुओं का वध न किया जाए। 'इह' शब्द से यह अनुमान लगाया जाता है कि यह निषेध या तो राजभवन या फिर [[पाटलिपुत्र]] के लिए ही था, समस्त साम्राज्य के लिए नहीं। पशु—वध को एकदम रोकना असम्भव था। अतः अशोक ने लिखा है कि राजकीय रसोई में पहले जहाँ सैकड़ों हज़ारों पशु भोजन के लिए मारे जाते थे, वहाँ अब केवल तीन प्राणी—दो मोर और एक मृग मारे जाते हैं, और भविष्य में वे भी नहीं मारे जाएँगे। साथ ही अशोक ने यह भी घोषणा की कि ऐसे सामाजिक उत्सव नहीं होने चाहिए, जिनमें अनियंत्रित आमोद-प्रमोद हो। जैसे—सुरापान, मांस भक्षण, मल्लयुद्ध, जानवरों की लड़ाई आदि। इनके स्थान पर अशोक ने धम्मसभाओं की व्यवस्था की जिनमें विमान, हाथी, अग्निस्कंध, इत्यादि स्वर्ग की झाँकियाँ दिखाई जाती थी और इस प्रकार जनता में धम्म के प्रति अनुराग पैदा किया जाता था। बिहार—यात्राएँ, जिनमें पशुओं का शिकार राजाओं का मूल्य मनोरंजन था, बंद कर दी गई। उनके स्थान पर अशोक ने धम्म यात्राएँ प्रारम्भ कीं। इन यात्राओं के अवसर पर अशोक ब्राह्मणों और श्रवणों को दान देता था। वृद्धों को सुवर्ण दान देता था। व्यक्तिगत उपदेश से आम जनता में धर्म प्रसारण में सहायता मिली। अशोक ने अनेक बौद्ध स्थानों की यात्रा की, जैसे—बोध गया, [[लुम्बिनी]], निगलीसागर आदि। इन धर्म यात्राओं से अशोक को देश के विभिन्न स्थानों के लोगों के सम्पर्क में आने का और धर्म तथा शासन के विषय में लोगों के विचार जानने का अवसर मिला। साथ ही इन यात्राओं से एक प्रकार से स्थानीय शासकों पर नियंत्रण रहता था। अशोक ने राज्य के कर्मचारियों—प्रादेशिक, राजुक तथा युक्तकों को प्रति पाँचवें वर्ष धर्म प्रचार के लिए यात्रा पर भेजा। अशोक के लेखों में इसे अनुसंधान कहा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कर्मचारियों की नियुक्ति== &lt;br /&gt;
अपने राज्याभिषेक के चौदहवें वर्ष में अशोक ने एक नवीन प्रकार के कर्मचारियों की नियुक्ति की। इन्हें &amp;quot;धम्ममहापात्र&amp;quot; कहा गया है। अपने कार्य की दृष्टि से धम्ममहापात्र एक नवीन प्रकार का कर्मचारी था। इन कर्मचारियों का मुख्य कार्य जनता को धम्म की बातें समझाना, उनमें धम्म के प्रति रुचि पैदा करना था। वे समाज के सभी वर्गों—[[ब्राह्मण]], [[क्षत्रिय]], [[वैश्य]], दास, निर्धन, वृद्ध—के कल्याण तथा सुख के लिए कार्य करते थे। वे सीमांत देशों तथा विदेशों में भी काम करते थे। राज्य में सभी प्रकार के लोगों तक उनकी पहुँच थी। उनका कार्य था धर्म के मामले में लोगों में सहमति बढ़ाना। ब्राह्मण, श्रमण तथा राजघराने के लोगों को दानशील कार्यों के लिए प्रोत्साहित करना, कारावास से क़ैदियों को मुक्त कराना या उनका दंड कम करवाना तथा लोगों की अन्याय से रक्षा करना। धम्ममहापात्रों की नियुक्ति से एक वर्ष पूर्व उसने साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर धम्म की शिक्षाओं को शिलालेखों में उत्कीर्ण करवाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विदेशों से सम्बन्ध==&lt;br /&gt;
धम्म प्रचार एवं धम्म विजय के संदर्भ में अशोक के शिलालेखों में कुछ ऐसे विवरण भी मिलते हैं, जिनमें उसके एवं विदेशों के पारस्परिक सम्बन्धों का आभास मिलता है। ये सम्बन्ध कूटनीति एवं भौगोलिक सान्निध्य के हितों पर आधारित थे। अशोक ने जो सम्पर्क स्थापित किए वे अधिकांशतः दक्षिण एवं पश्चिम क्षेत्रों में थे और धम्म मिशनों के माध्यम से स्थापित किए थे। इन मिशनों की तुलना आधुनिक सदभावना मिशनों से की जा सकती है। अशोक के ये मिशन स्थायी तौर पर विदेशों में एक आश्चर्यजनक तथ्य हैं कि स्तंभ अभिलेख नं. 7, जो अशोक के काल की आख़िरी घोषणा मानी जाती है, ताम्रपर्ण ([[श्रीलंका]]) के अतिरिक्त और किसी विदेशी शक्ति का उल्लेख नहीं करती। शायद विदेशों में अशोक को उनती सफलता नहीं मिली जितनी साम्राज्य के भीतर। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि विदेशों से सम्पर्क के जो द्वार [[सिकन्दर]] के आक्रमण के पश्चात खुले थे, वे अब और अधिक चौड़े हो गए।&lt;br /&gt;
==यवन, काम्बोज एवं गांधार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kharoshthi Script 4.jpg|thumb|[[खरोष्ठी लिपि]]|270px]]&lt;br /&gt;
जहाँ तक पश्चिमी शक्तियों का सम्बन्ध है, शिलालेख 5 एवं 13 में [[यवन|यवनों]], [[कम्बोज|काम्बोजों]] एवं [[गांधार|गांधारों]] का उल्लेख है। किन्तु उत्तर-पश्चिम की इन शक्तियों के पश्चिम में भी कुछ ऐसी शक्तियाँ थीं, जो कि सिकन्दर के आक्रमण के बाद स्थापित हो गई थीं और सामान्य रूप से यवन थीं। इनमें से कुछ को अशोक ने नाम लेकर अभिहित किया है। एक स्थान पर अशोक ने कहा है कि उसके धम्म मिशन सीमावर्ती राज्यों और 600 योजन जैसे सुदूर क्षेत्रों में भी पहुँचे थे। शिलालेख 2 एवं 13 में यवन नरेश अंतियोक का उल्लेख है जो अखमनी [[एण्टियोकस द्वितीय]] माना जाता है। कहा जाता है कि अशोक ने विशाल पत्थर पर एक अभिलेख उत्कीर्ण करवाया जिसकी घोषणाओं की शैली अखमनी प्ररूप से प्ररित थी। भाषाशास्त्रीय अध्ययन से भी इन सम्पर्कों की पुष्टि होती है। अशोक के शाहबज़गढ़ी एवं मनसेहरा शिलालेखों में [[खरोष्ठी लिपि]] का प्रयोग एवं कुछ ईरानी शब्दों का प्रयोग भी इसी ओर संकेत करते हैं। रुद्रदामा के जूनागढ़ अभिलेख में अपरान्त (पश्चिम भारत) में अशोक के गवर्नर के रूप में योनराज तुफ़ास्क का नाम मिलता है। जो स्पष्टतः एक ईरानी नाम है। पश्चिम के ही कुछ अन्य नरेशों के नाम अशोक के शिलालेख नं0 13 में मिलते हैं--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#तुरमाय अर्थात् तुलमाय, जो मिस्र का यवन नरेश टाल्मी द्वितीय फिलाडेल्फस (ई. पू. 285-47) था। &lt;br /&gt;
#अंतिकितनी अर्थात् अंतेकिन—मेसिडोनिया का यवन नरेश ऐण्टीगोनस गोनातास (ई. पू. 277-39)।&lt;br /&gt;
#मका अर्थात् मगा—उत्तरी अफ्रीका में सेरीन का यवन नरेश मगा (ई. पू. 282-58)।&lt;br /&gt;
#अलिकसुन्दर—ऐपीरस का यवन नरेश एलेक्ज़ेडर (ई. पू. 272-55) अथवा कोरिन्स का यवन नरेश एलेक्ज़ेडर (ई0 पू. 252-44)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ये चार नरेश अंतियोक के राज्य के परे बताए जाते हैं।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दक्षिण==&lt;br /&gt;
दक्षिण में मौर्य प्रभाव के प्रसार की जो प्रक्रिया चंद्रगुप्त मौर्य के काल में आरम्भ हुई, वह अशोक के नेतृत्व में और भी अधिक पुष्ट हुई। लगता है कि चंद्रगुप्त की सैनिक प्रसार की नीति ने वह स्थायी सफलता नहीं प्राप्त की, जो अशोक की धम्म विजय ने की थी। [[गावीमठ]], [[पालकी गुण्डु]], [[ब्रह्मगिरि]], [[मास्की]], [[येर्रागुण्डी]], [[जतिंग रामेश्वर]] आदि स्थलों पर स्थित अशोक के शिलालेख इसके प्रमाण हैं। और फिर परिवर्ती कालीन साहित्य में, विशेष रूप से दक्षिण में अशोकराज की परम्परा काफ़ी प्रचलित प्रतीत होती है। [[ह्वेन त्सांग|ह्यूनत्सांग]] ने तो चोल-पाड्य राज्यों में (जिन्हें स्वयं अशोक के शिलालेख 2 एवं 13 में सीमावर्ती प्रदेश बताया गया है) भी अशोकराज के द्वारा निर्मित अनेक स्तूपों का वर्णन किया है। यह सम्भव है कि कलिंग में अशोक की सैनिक विजय और फिर उसके पश्चात उनके सौहार्दपूर्ण नीति ने भोज, पत्तनिक, आँध्रों, राष्ट्रिकों, सतियपुत्रों एवं केरलपुत्रों जैसी शक्तियों के बीच मौर्य प्रभाव के प्रसार को बढ़ाया होगा। दक्षिण दिशा में अशोक को सर्वाधिक सफलता ताम्रपर्णी (श्रीलंका) में मिली। वहाँ का राजा [[तिस्स]] तो अशोक से इतना प्रभावित था कि उसने भी देवानांप्रिय की उपाधि धारण कर ली। अपने दूसरे राज्याभिषेक में उसने अशोक को विशेष निमंत्रण भेजा। जिसके फलस्वरूप सम्भवतः अशोक का पुत्र महेन्द्र बोधिवृक्ष की पौध लेकर पहुँचा। श्रीलंका में यह बौद्ध धर्म का पदार्पण था। श्रीलंका के प्राचीनतम अभिलेख तिस्स के उत्तराधिकारी उत्तिय के काल के हैं। जो अपनी प्राकृत भाषा एवं शैली की दृष्टि से स्पष्टतः अशोक के अभिलेखों से प्रभावित है। अशोक और श्रीलंका के सम्बन्ध पारस्परिक सदभाव, आदर-सम्मान एवं बराबरी पर आधारित थे न कि साम्राज्यिक शक्ति एवं आश्रित शक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों पर। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त विदेशी शक्तियों के अतिरिक्त कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनके सम्बन्ध में कुछ परम्पराएँ एवं किंवदन्तियाँ प्राप्त हैं। उदाहरणार्थ कश्मीर सम्भवतः अन्य सीमावर्ती प्रदेशों की तरह ही अशोक के साम्राज्य से जुड़ा था। मध्य एशिया में स्थित खोटान के राज्य के बारे में एक तिब्बती परम्परा है कि बुद्ध की मृत्यु के 250 वर्ष के बाद अर्थात् ई. पू. 236 में अशोक खोटान गया था। सम्भवतः यह भी धम्म मिशन के रूप में हुआ होगा किन्तु यह दृष्टव्य है कि स्वयं अशोक के अभिलेखों में इसका कोई उल्लेख नहीं है। इसी प्रकार [[नेपाल]] का कुछ अंश अशोक की यात्रा के उपलक्ष्य में वहाँ के करों को कम करना किसी विदेशी राज्य में सम्भव नहीं था। फिर भी नेपाल का शेष अंश सम्भवतः [[मौर्य साम्राज्य]] से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाए हुए होगा। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अशोक शासक के रूप में==&lt;br /&gt;
शासक संगठन का प्रारूप लगभग वही था जो चंद्रगुप्त मौर्य के समय में था। अशोक के अभिलेखों में कई अधिकारियों का उल्लेख मिलता है। जैसे राजुकु, प्रादेशिक, युक्तक आदि। इनमें अधिकांश राज्याधिकारी चंद्रगुप्त के समय से चले आ रहे थे। अशोक ने धार्मिक नीति तथा प्रजा के कल्याण की भावना से प्रेरित होकर उनके कर्तव्यों में विस्तार किया जिसका विवेचन आगे किया जाएगा। केवल धम्म महामात्रों की नियुक्ति एक नवीन प्रकार की नियुक्ति थी।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात अशोक ने धर्म प्रचार के लिए बड़ी लगन और उत्साह से काम किया। परन्तु शासन के प्रति वह कतई उदासीन नहीं हुआ। धर्म परायणता ने उसमें प्रजा के ऐहिक एवं पारलौकिक कल्याण के लिए लगन पैदा की। उसने राजा और प्रजा के बीच पैतृक सम्बन्ध को बढ़ाने पर अधिक बल दिया। कलिंग में अशोक ने कहा है, &amp;quot;सारी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान ऐहिक और कल्याण की कामना करता हूँ उसी प्रकार, अपनी प्रजा के ऐहिक और पारलौकिक कल्याण और सुख के लिए भी। जैसे एक माँ एक शिशु को एक कुशल धाय का सौंपकर निश्चिंत हो जाती है कि कुशल धाय संतान का पालन-पोषण करने में समर्थ है, उसी प्रकार मैंने भी अपनी प्रजा के सुख और कल्याण के लिए राजुकों की नियुक्ति की है&amp;quot; (चौथा स्तंभ लेखा)। वह प्रजा के कार्य करने के लिए सदैव उद्यत रहता था। अपने छठे शिलालेख में उसने यह घोषणा की, &amp;quot;हर क्षण और हर स्थान पर—चाहे वह रसोईघर हो, अंतपुर में हो अथवा उद्यान में—मेरे प्रतिवेदक मुझे प्रजा के कार्यों के सम्बन्ध में सूचित करें। मैं जनता का कार्य करने में कभी भी नहीं आघाता। मुझे प्रजा के हित के लिए कार्य करना चाहिए।&amp;quot; इस प्रकार हम देखते हैं कि राजा के उत्थानव्रत और प्रजाहित आदर्श पर अशोक ने अत्यधिक बल दिया। यही नहीं, अशोक ने राजा के कर्तव्य का एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। राजा प्रजा का ऋणी है, प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करके वह प्रजा का ऋण चुकाता है। अशोक के आठवें शिलालेख में तथा मास्की लघु शिलालेख में यह अनुमान लगाया गया है कि अशोक राज्य के विभिन्न भागों में निरीक्षाटन भी करता था। जिससे जनता के सुख—दुःख का सीधे पता लगा सके। पुरुषों और प्रतिवेदकों द्वारा जनसम्पर्क बना रहता था।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
अपने शासन को अधिक मानवीय बनाने के लिए अशोक ने शासन में कई सुधार किए। सर्वप्रथम प्रशासनिक सुधार यह था कि प्रादेशिक राजुक से लेकर युक्तक तक सभी अधिकारी हर पाँचवें साल (उज्जयिनी और तक्षशिलामें हर तीसरे साल) राज्य में निरीक्षाटन के लिए जाते थे। प्रशासनिक कार्य के अतिरिक्त वे धम्म का प्रचार भी करते थे। कलिंग लेख से पता चलता है कि अकारण लोगों को कारावास तथा भय बचाने के लिए प्रत्येक पाँचवें वर्ष महामात्र निरीक्षाटन के लिए भेजे जाते थे। उनका एक कार्य यह भी था कि वे देखें कि नगर न्यायाधीश राजा के आदेश का पालन करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोक ने अपने राज्य के तेरहवें वर्ष के बाद एक सर्वथा नवीन प्रकार के उच्चाधिकारियों की नियुक्ति की। इन्हें धम्ममहामात्र कहा गया है। इनका प्रमुख कार्य जनता में धर्मप्रसार करना तथा दानशीलता को उत्साहित करना था। किन्तु प्रशासनिक दृष्टि से इनका कार्य यह था—जिन्हें कारावास का दंड दिया गया हो उनके परिवारों को आर्थिक सहायता देना, अपराधियों के सम्बन्धियों से सम्पर्क बनाए रखकर उन्हें सांत्वना देना। इस प्रकार अशोक ने न्याय और दंड में मानवीयता लाने का प्रयास किया। न्याय को दया से मिश्रित करके मृदु बना दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोक व्यावहारिक था। उसने मृत्युदंड को एक दम समाप्त नहीं किया, किन्तु यह व्यवस्था की कि यदि समुचित कारण उपस्थित हों, तो धम्म महामात्र न्यायाधिकारियों से दंड कम करवाने का प्रयत्न करें। जिन अपराधियों को मृत्युदंड दिया गया हो उन्हें तीन दिन का अवकाश देने की व्यवस्था की गई, ताकि इस बीच उनके सम्बन्धी उनके जीवनदान के लिए (राजुकों से) प्रार्थना कर सकें, और (यदि यह सम्भव न हो सके तो) वे दान-व्रत-प्रार्थना के द्वारा परलोक की तैयारी कर सकें। राजुकों को आदेश दिया गया कि अभिहार दंड में एकरूपता हो और पक्षपातरहित हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
26वें वर्ष में अशोक ने राजुकों, अभिहार तथा दंडकों को स्वतंत्रता दी ताकि ऊपर से बिना हस्तक्षेप के वे आत्मविश्वास के साथ प्रजा का हित कर सकें। ये राजुक सैकड़ों—हज़ारों लोगों के ऊपर शासन करते थे और अशोक ने उन्हें स्वतंत्रता इसलिए दी कि वे निर्वघ्न शासन द्वारा जनता का हित करने में समर्थ हो सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोक ने मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सालय खुलवाए। जहाँ मनुष्यों और पशुओं के लिए उपयोगी औषधियाँ उपलब्ध नहीं थी वहाँ बाहर से मँगाकर उन्हें लगाया जाता। कंदमूल और फल भी जहाँ कभी नहीं थे, वहाँ बाहर से मँगाकर लगवाए गए। सड़क के किनारे पर पेड़ लगाए गए ताकि मनुष्यों और पशुओं को छाया मिल सके। आठ कोस या 9 मील के फ़ासले पर जगह-जगह कुएँ खुदवाए गए। इसके अलावा अनेक प्याऊ स्थापित किए गए। इस प्रकार अशोक की धर्मपरायणता ने उसे अनेक प्रकार के कल्याणकारी कार्यों के लिए प्रेरित किया। उसका शासन केन्दित होते हुए भी मानवीय था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
40 वर्ष तक राज्य करने के बाद लगभग ई. पू. 232 में अशोक की मृत्यु हुई। उसके बाद लगभग 50 वर्ष तक अशोक के अनेक उत्तराधिकारियों ने शासन किया। किन्तु इन मौर्य शासकों के सम्बन्ध में हमारा ज्ञान अपर्याप्त तथा अनिश्चित है। [[पुराण]], बौद्ध तथा जैन अनुश्रुतियों में इन उत्तराधिकारियों के नामों की जो सूचियाँ दी गई हैं वे एक-दूसरे से मेल नहीं खाती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार अशोक के बाद कुणाल गद्दी पर बैठा। दिव्यावदान में उसे धर्मविवर्धन कहा गया है। 'धर्मविवेर्धन' सम्भवतः उसका विरुद्ध था, किन्तु अशोक के और भी पुत्र थे। राजतरंगिणी के अनुसार जलौक [[कश्मीर]] का स्वतंत्र शासक बन गया। तारनाथ के अनुसार वीरसेन अशोक का पुत्र था, जो [[गांधार]] का स्वतंत्र शासक बन गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि अशोक की मृत्यु के बाद ही साम्राज्य का विघटन हो गया। कुणाल अंधा था, अतः वह शासन कार्य में असमर्थ था। जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के अनुसार शासन की बाग़डोर उसके पुत्र संप्रति के हाथ में थी। इन अनुश्रुतियों के अनुसार संप्रति ही कुणाल का उत्तराधिकारी था। पुराणों तथा नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफ़ाओं के शिलालेख के अनुसार दशरथ कुणाल का पुत्र था। नागार्जुनी गुफ़ाओं को [[दशरथ]] ने आजीविकों को दान में दिया था। इन प्रमाणों के आधार पर यह मत प्रस्तुत किया गया कि [[मगध]] साम्राज्य दो भागों में विभक्त हो गया। दशरथ का अधिकार साम्राज्य के पूर्वी भाग में तथा संप्रति का पश्चिमी भाग में था। [[विष्णु पुराण]] तथा गार्गी संहिता के अनुसार संप्रति तथा दशरथ के बाद उल्लेखनीय मौर्य शासक सालिसुक था। उसे संप्रति का पुत्र बृहस्पति भी माना जा सकता है। पुराणों में ही नहीं वरन् हर्षचरित में भी मगध के अन्तिम सम्राट का नाम [[बृहद्रथ मौर्य|बृहद्रथ]] दिया गया है। इनके अनुसार [[मौर्य वंश]] के अन्तिम सम्राट बृहद्रथ की, उसके सेनापति [[पुष्यमित्र शुंग|पुष्यमित्र]] ने हत्या कर दी और स्वयं सिंहासन पर आरूढ़ हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा==&lt;br /&gt;
अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया, इस धर्म के उपदेशों को न केवल देश में वरन विदेशों में भी प्रचारित करने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाए। अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को अशोक ने इसी कार्य के लिए [[श्रीलंका]] भेजा था। अशोक ने अपने कार्यकाल में अनेक शिलालेख खुदवाए जिनमें धर्मोपदेशों को उत्कीर्ण किया गया। राजशक्ति को सर्वप्रथम उसने ही जनकल्याण के विविध कार्यों की ओर अग्रसर किया।  अनेक [[स्तूप|स्तूपों]] और स्तंभों का निर्माण किया गया।  इन्हीं में से [[सारनाथ]] का प्रसिद्ध सिंहशीर्ष स्तंभ भी है जो अब भारत के राजचिन्ह के रूप में सम्मानित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सहृदयता, सहिष्णुता और उदारता==&lt;br /&gt;
कुछ इतिहासकारों का मत है कि अशोक ने धार्मिक क्षेत्रों की ओर ध्यान न देकर राष्ट्रीय दृष्टि से हित साधन नहीं किया।  इससे भारत का राजनीतिक विकास रूका जबकि उस समय [[रोमन साम्राज्य]] के समान विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना संभव थी।  इस नीति से दिग्विजयी सेना निष्क्रिय हो गई और विदेशी आक्रमण का सामना नहीं कर सकी।  इस नीति ने देश को भौतिक समृद्धि से विमुख कर दिया जिससे देश में राष्ट्रीयता की भावनाओं का विकास अवरूद्ध हो गया। दूसरी ओर अन्य का मत इससे विपरीत है। वे कहते हैं इसी नीति से भारतीयता का अन्य देशों में प्रचार हुआ। घृणा के स्थान पर सहृदयता विकसित हुई, सहिष्णुता और उदारता को बल मिला तथा बर्बरता के कृत्यों से भरे हुए इतिहास को एक नई दिशा का बोध हुआ।  लोकहित की दृष्टि से अशोक ही अपने समकालीन इतिहास का एकमात्र ऐसा शासक है जिसने न केवल मानव की वरन जीवमात्र की चिंता की। इस मत-विभिन्नता के रहते हुए भी यह विचार सर्वमान्य है कि अशोक अपने काल का अकेला सम्राट था, जिसकी प्रशस्ति उसके गुणों के कारण होती आई है बल के डर से नहीं।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मौर्य काल}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मौर्य काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>खुशी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80&amp;diff=217188</id>
		<title>श्रावस्ती</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80&amp;diff=217188"/>
		<updated>2011-09-13T12:38:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: Adding category :Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Jain-Temple-Sravasti.jpg|thumb|250px|प्राचीन जैन मंदिर के अवशेष, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
[[भारत]] के [[उत्तर प्रदेश]] राज्य के गोंडा-बहराइच ज़िलों की सीमा पर यह [[बौद्ध]] तीर्थ स्थान है। गोंडा-[[बलरामपुर]] से 12 मील पश्चिम में आधुनिक सहेत-महेत गांव ही श्रावस्ती है। पहले यह [[कौशल]] देश की दूसरी राजधानी थी, भगवान [[राम]] के पुत्र [[लव कुश|लव]] ने इसे अपनी राजधानी बनाया था, श्रावस्ती बौद्ध [[जैन]] दोनों का तीर्थ स्थान है, [[बुद्ध|तथागत]] श्रावस्ती में रहे थे, यहाँ के श्रेष्ठी अनाथपिण्डिक ने भगवान [[गौतम बुद्ध|बुद्ध]] के लिये जेतवन बिहार बनवाया था, आजकल यहाँ बौद्ध धर्मशाला, मठ और मन्दिर है।&lt;br /&gt;
==प्राचीन नगर==&lt;br /&gt;
यह [[कौशल|कोसल]]-जनपद का एक प्रमुख नगर था। वहाँ का दूसरा प्रसिद्ध नगर [[अयोध्या]] था। श्रावस्ती नगर अचिरावती नदी के तट पर बसा था, जिसकी पहचान आधुनिक राप्ती नदी से की जाती है। इस सरिता के तट पर स्थित आज का सहेट-महेट प्राचीन श्रावस्ती का प्रतिनिधि है। इस नगर का यह नाम क्यों पड़ा, इस संबन्ध में कई तरह के वर्णन मिलते हैं। [[बौद्ध धर्म]] -ग्रन्थों के अनुसार इस समृद्ध नगर में दैनिक जीवन में  काम आने वाली सभी छोटी-बड़ी चीज़ें बहुतायत में बड़ी सुविधा से मिल जाती थीं, अतएव इसका यह नाम पड़ गया था।&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
प्राचीन श्रावस्ती के अवशेष आधुनिक ‘सहेत’-‘महेत’ नामक स्थानों पर प्राप्त हुए हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;द्रष्टव्य आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्टस , भाग 1, पृष्ठ 330; तत्रैव, भाग 11, पृष्ठ 78 और आगे। &amp;lt;/ref&amp;gt; यह नगर 27°31’ उत्तरी अक्षांश और 82°1’ पूर्वी देशांतर पर स्थिर था।&amp;lt;ref&amp;gt;एम. वेंक्टरम्मैया, श्रावस्ती, (आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ इंडिया, दिल्ली 1981), पृष्ठ 1&amp;lt;/ref&amp;gt; ‘सहेत’ का समीकरण ‘जेतवन’ से तथा ‘महेत’ का प्राचीन श्रावस्ती नगर से किया गया है। प्राचीन टीला एवं भग्नावशेष गोंडा एवं बहराइच ज़िलो की सीमा पर बिखरे पड़े हैं, जहाँ बलरामपुर स्टेशन से पहुँचा जा सकता है। बहराइच एवं बलरामपुर से इसकी दूरी क्रमश: 26 एवं 10 मील है।&amp;lt;ref&amp;gt;विमलचरण लाहा, प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल (उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, लखनऊ, 1972), पृष्ठ 210&amp;lt;/ref&amp;gt; आजकल ‘सहेत’ (जेतवन) का भाग बहराइच ज़िले में और ‘महेत’ गोंडा ज़िले में पड़ता है। बलरामपुर-बहराइच मार्ग पर सड़क से 800 फुट की दूरी पर ‘सहेत’ स्थित है जबकि ‘महेत’ 1/3 मील की दूरी पर स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;दि मेमायर्स आफ दि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, भाग 50 ([[दिल्ली]] 1935) में उद्धृत विमलचरण लाहा का लेख ‘श्रावस्ती इन इंडियन लिटरेचर’, पृष्ठ 1&amp;lt;/ref&amp;gt;विंसेंट स्मिथ ने सर्वप्रथम श्रावस्ती का समीकरण चरदा से किया था जो ‘सहेत-महेत’ से 40 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल ऑफ़ दि रायल एशियाटिक सोसाइटी, 1900, पृष्ठ 9&amp;lt;/ref&amp;gt; लेकिन जेतवन के उत्खनन से गोविंद चंद गहड़वाल के 1128 ई. के एक अभिलेख की प्राप्ति से इसका समीकरण ‘सहेत-महेत’ से निश्चित हो गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस 1907-08, पृष्ठ 131-132; तुलनीय, विशुद्धनन्द पाठक, हिस्ट्री ऑफ़ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, [[वाराणसी]], 1963 ई.) पृष्ठ 63&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन श्रावस्ती नगर अचिरावती नदी (आधुनिक [[राप्ती नदी|राप्ती]]) के तट पर स्थित था।&amp;lt;ref&amp;gt;विनय महावग्ग, पृष्ठ 191-192; परमत्थजोतिका, पृष्ठ 511&amp;lt;/ref&amp;gt; यह नदी नगर के समीप ही बहती थी। बौद्ध युग में यह नदी नगर को घेर कर बहती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;[[राहुल सांकृत्यायन]], पुरातत्त्व निबंधावली (इलाहाबाद, 1958), पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt; बौद्ध साहित्य में श्रावस्ती का वर्णन कोशल जनपद की राजधानी और राजगृह से दक्षिण-पश्चिम में कालक और अस्सक तक जाने वाले राजमार्ग पर सावत्थी नामक दो महत्त्वपूर्ण पड़ावों के रूप में मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;	9- विमलचरण लाहा, प्राचीन [[भारत]] का ऐतिहासिक भूगोल, ([[उत्तर प्रदेश]] हिन्दी ग्रंथ अकादमी, [[लखनऊ]], प्रथम संस्करण, 1972), पृष्ठ 211&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;&amp;gt;{{cite book | last = सिंह| first =डॉ. अशोक कुमार  | title =उत्तर प्रदेश के प्राचीनतम नगर  | edition = | publisher = वाणी प्रकाशन| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय  | language =[[हिन्दी]]  | pages =98-124  | chapter =}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Sravasti.jpg|thumb|250px|left|[[खत्ती]], श्रावस्ती]] &lt;br /&gt;
==नाम की उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
श्रावस्ती कोशल का एक प्रमुख नगर था। भगवान [[बुद्ध]] के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी।&amp;lt;ref&amp;gt;भरत सिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संवत् 2018), पृष्ठ 236, दीधनिकाय, पृष्ठ 152; राखिल, दि लाइफ आफ दि बुद्ध लीजेंड एंड हिस्ट्री पृष्ठ 136&amp;lt;/ref&amp;gt; इसे बुद्धकालीन भारत के 6 महानगरों ([[चंपा]], [[राजगृह]], श्रावस्ती, [[साकेत]], [[कोशांबी]] और [[वाराणसी]]) में एक माना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;दीधनिकाय, पृष्ठ 152; राखिल, दि लाइफ आफ दि बुद्ध लीजेंड एंड हिस्ट्री, पृष्ठ 136&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में कई मत प्रतिपादित है। सावत्थी, संस्कृत श्रावस्ती का पालि और अर्द्धमागधी रूप है।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt; बौद्ध ग्रन्थों में इस नगर के नाम की उत्पत्ति के विषय में एक अन्य उल्लेख भी मिलता है। इनके अनुसार सवत्थ (श्रावस्त) नामक एक ऋषि यहाँ पर रहते थे, जिनकी बड़ी ऊँची प्रतिष्ठा थी। इन्हीं के नाम के आधार पर इस नगर का नाम श्रावस्ती पड़ गया था। [[पाणिनि]] ने, जिनका समय आज से नहीं कुछ तो चौबीस या पचीस सौ साल पहले था, अपने प्रसिद्ध व्याकरण-ग्रन्थ '[[अष्टाध्यायी]]' में साफ लिखा है कि स्थानों के नाम वहाँ रहने वाले किसी विशेष व्यक्ति के नाम के आधार पर पड़ जाते थे। [[महाभारत]] के अनुसार श्रावस्ती के नाम की उत्पत्ति का कारण कुछ दूसरा ही था। ब्राह्मण साहित्य, महाकाव्यों एवं पुराणों के अनुसार श्रावस्ती का नामकरण श्रावस्त या श्रावस्तक के नाम के आधार पर हुआ था। श्रावस्तक युवनाश्व का पुत्र था और पृथु की छठी पीढ़ी में उत्पन्न हुआ था। &amp;lt;ref&amp;gt;विश्वगश्वा पृथो: पुत्र पुत्रस्तस्मादार्दश्चजज्ञिवान्। &lt;br /&gt;
आर्द्रात्तु युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्य तु चात्मज: ॥ 	&lt;br /&gt;
तस्य श्रावस्तको ज्ञेय श्रावस्ती येन निर्मित:। 	&lt;br /&gt;
श्रावतस्य तु दायादो वृहदाश्वो महाबल: ॥महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 201, श्लोक 3-4;&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt; वही इस नगर के जन्मदाता थे और उन्हीं के नाम के आधार पर इसका नाम श्रावस्ती पड़ गया था। [[पुराण|पुराणों]] में श्रावस्तक नाम के स्थान पर श्रावस्त नाम मिलता है। महाभारत में उल्लिखित यह परम्परा उपर्युक्त अन्य परम्पराओं से कहीं अधिक प्राचीन है। अतएव उसी को प्रामणिक मानना उचित बात होगी। [[मत्स्य पुराण|मत्स्य]] एवं [[ब्रह्मपुराण|ब्रह्मपुराणों]] में इस नगर के संस्थापक का नाम श्रावस्तक के स्थान पर श्रावस्त मिलता है। &amp;lt;ref&amp;gt;श्रावस्तश्च महातेजा वत्सकस्तत्सुतोऽभवत् 	&lt;br /&gt;
निर्मिता येन श्रावस्ती गौडदेशे द्विजोत्तम्॥ मत्स्यपुराण, अध्याय 12, श्लोक 29 ;&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt;बाद में चल कर कोसल की राजधानी, [[अयोध्या]] से हटाकर श्रावस्ती ला दी गई थी और यही नगर कोसल का सबसे प्रमुख नगर बन गया। एक [[बौद्ध]] ग्रन्थ के अनुसार वहाँ 57 हज़ार कुल रहते थे और कोसल-नरेशों की आमदनी सबसे ज़्यादा इसी नगर से हुआ करती थी। [[बुद्ध|गौतम बुद्ध]] के समय में भारतवर्ष के 6 बड़े नगरों में श्रावस्ती की गणना हुआ करती थी। यह चौड़ी और गहरी खाई से घिरा हुआ था। इसके अतिरिक्त इसके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा-दीवार भी थी, जिसमें हर दिशा में दरवाजे बने हुये थे। हमारी प्राचीन कला में श्रावस्ती के दरवाजों का अंकन हुआ है। उससे ज्ञात होता है कि वे काफ़ी चौड़े थे और उनसे कई बड़ी सवारियाँ एक ही साथ बाहर निकल सकती थीं। कोसल के नरेश बहुत सज-धज कर बड़ी हाथियों की पीठ पर कसे हुये चाँदी या सोने के हौदों में बैठ कर बड़े ही शान के साथ बाहर निकला करते थे। चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फाहियान]] और [[हुएन-सांग|हुयेनसांग]] ने भी श्रावस्ती के दरवाजों का उल्लेख किया है। श्रावस्ती एक समृद्ध, जनाकीर्ण और व्यापारिक महत्त्व वाली नगरी भी। यहाँ मनुष्यों के उपभोग-परिभोग की सभी वस्तुएँ सुलभी थीं अत: इसे सावत्थी (सब्ब अत्थि) कहा जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;‘यं किं च मनुस्सान उपभोग- परिभोगं सब्बं एत्थ अत्थीति सावत्थो।’ एक किंवदंती के अनुसार एक बार काफिले वालों ने आकर यहाँ पूछा कि यहाँ क्या सामान है? (किं भण्डं अत्थि) इसके उत्तर में उनसे कहा गया ‘सब कुछ है।’ (सब्बं अत्थीति) ‘सब्बं अतीति वचनमुपादाय सावत्थि’  पपंचसूदनी, भाग 1, पृष्ठ 59-60&amp;lt;/ref&amp;gt; पहले यह केवल एक धार्मिक स्थान था, किंतु कालांतर में इस नगर का समुत्कर्ष हुआ। [[जैन साहित्य]] में इसके लिए चंद्रपुरी&amp;lt;ref&amp;gt;जैन हरिवंशपुराण, पृष्ठ 717; देखें, विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल पृष्ठ 61&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा चंद्रिकापुरी नाम भी मिलते हैं। महाकाव्यों एवं [[पुराण|पुराणों]] में श्रावस्ती को [[राम]] के पुत्र [[लव]] की राजधानी बताया गया है। [[कालिदास]]&amp;lt;ref&amp;gt;कालिदास, रघुवंश, अध्याय 15, श्लोक 97; देखें, विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोलीलाल बनारसीदास, वाराणसी, 1963), पृष्ठ 59 &amp;lt;/ref&amp;gt; ने इसे ‘सारावती’ नाम से अभिहित किया है। उच्चारण संबंधी समानता के आधार पर ‘श्रावस्ती’ और ‘सारावती’ दोनों एक ही प्रतीत होते हैं और एक निश्चित स्थान की तरफ इंगित भी करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रावस्ती न केवल बौद्ध और जैन धर्मों का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था अपितु यह ब्राह्मण धर्म एवं [[वेद]] विद्या का भी एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ वैदिक शिक्षा केंद्र के कुलपति के रूप में जानुस्सोणि का नामोल्लेख मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;दीघनिकाय, (पालि टेक्स्ट सोसायटी, लंदन), भाग 1, पृष्ठ 235; सुमंगलविलासिनी, भाग 2, पृष्ठ 399; मच्झिमनिकाय, भाग 1, पृष्ठ 16&amp;lt;/ref&amp;gt; कालांतर में बुद्ध के जीवन-काल से संबंधित तथा प्रमुख व्यापारिक मार्गों से जुड़े होने के कारण श्रावस्ती की भौतिक समृद्धि में वृद्धि हुई।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नगर का विकास== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Stupas-Jetavana.jpg|thumb|250px|जेतवन स्तूप के अवशेष, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
हमारे कुछ पुराने ग्रन्थों के अनुसार कोसल का यह प्रधान नगर सर्वदा रमणीक, दर्शनीय, मनोरम और धनधान्य से संपन्न था। इसमें सभी तरह के उपकरण मौजूद थे। इसको देखने से लगता था, मानों देवपुरी अकलनन्दा ही साक्षात धरातल पर उतर आई हो। नगर की सड़कें चौड़ी थीं और इन पर बड़ी सवारियाँ भली भाँति आ सकती थीं नागरिक श्रृंगार-प्रेमी थे। वे हाथी, घोड़े और पालकी पर सवार होकर राजमार्गों पर निकला करते थे। इसमें राजकीय कोष्ठागार (कोठार) बने हुये थे जिनमें घी, तेल और खाने-पीने की चीज़ें प्रभूत मात्रा में एकत्र कर ली गई थीं। &lt;br /&gt;
वहाँ के नागरिक गौतम [[बुद्ध]] के बहुत बड़े भक्त थे। 'मिलिन्दप्रश्न' नामक ग्रन्थ में चढ़ाव-बढ़ाव के साथ कहा गया है कि इसमें भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ थी। इसके अलावा वहाँ के तीन लाख सत्तावन हज़ार गृहस्थ बौद्ध धर्म को मानते थे। इस नगर में जेतवन नाम का एक उद्यान था जिसे वहाँ के जेत नामक राजकुमार ने आरोपित किया था। इस नगर का अनाथपिण्डिक नामक सेठ जो बुद्ध का प्रिय शिष्य था, इस उद्यान के शान्तिमय वातावरण से बड़ा प्रभावित था। उसने इसे ख़रीद कर बौद्ध संघ को दान कर दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में कथा आती है कि इस पूँजीपति ने जेतवन को उतनी ही मुद्राओं में ख़रीदी थीं जितनी की बिछाने पर इसकी पूरी फर्श को भली प्रकार ढक देती थीं। उसने इसके भीतर  एक मठ भी बनवा दिया जो कि श्रावस्ती आने पर बुद्ध का विश्रामगृह हुआ करता था। इसे लोग 'कोसल मन्दिर' भी कहते थे। अनाथपिंडिक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवा दिये जिनमें भिक्षु लोग रहते थे। इनमें प्रत्येक के निर्माण में एक लाख मुद्रायें ख़र्च हुई थीं। इसके अतिरिक्त उसने कूएँ, तालाब और चबूतरे आदि का भी वहाँ निर्माण करा दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि जेतवन में रहने वाले भिक्षु सुबह और शाम राप्ती नदी में नहाने के लिये आते थे। लगता है कि यह उद्यान इसके तट के समीप ही कहीं स्थित था। अनाथपिंडिक ने अपने जीवन की सारी कमाई बौद्ध संघ के हित में लगा दी थी। उसके घर पर श्रमणों को बहुसंख्या में प्रति दिन यथेष्ट भोजन कराया जाता था। गौतम बुद्ध के प्रति श्रद्धा के कारण श्रावस्ती नरेशों ने इस नगर में दानगृह बनवा रखा था, जहाँ पर भिक्षुओं को भोजन मिलता था। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Sravasti-2.jpg|thumb|250px|left|जेतवन, श्रावस्ती&amp;lt;br /&amp;gt;Jetavana, Sravasti]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाकाव्यों तथा पुराणों में वर्णित श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
महाकाव्यों में श्रावस्ती का विशद वर्णन मिलता है। [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;कुशस्य कोशलो राज्यं पुरी वापि कुशस्थली।	रम्या निर्मिता तेन विंध्यपर्वत सानुषु॥ उत्तर कोशले राज्ये लवस्य च महात्मन:।	श्रावस्ती लोकविख्याता कुशवशं निबोधत॥	[[वायु पुराण]], अध्याय 88, 197-98&amp;lt;/ref&amp;gt; और [[रामायण]]&amp;lt;ref&amp;gt;कोशलेष कुशम् वीरम् उत्तरेषु लवं तथा।  	अभिषिज्य महात्मानावुभौ राम: कुशीलवौ॥ 	कुशस्य नगरी रम्या विंध्यपर्वत रोधसि।  	कुशावतीति नाम्ना सा कृता रामेण धीमता ॥ 	श्रावस्तीति पुरी रम्या श्रावीता च लवस्य च। 	अयोध्यां विजना कृत्वा राधवो भरस्तदा॥ [[रामायण]], उत्तरकांड, सर्ग 1, 20-22&amp;lt;/ref&amp;gt; में दो [[कोशल]] नगरों की चर्चा है:- &lt;br /&gt;
*उत्तर कोशल जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी,&lt;br /&gt;
*दक्षिण कोशल जिसकी राजधानी कुशावती थी। &lt;br /&gt;
[[राम]] के शासन काल में इन दोनों राजधानियों का वर्णन मिलता है। राम ने अपने पुत्र [[लव]] को श्रावस्ती का और [[कुश]] को कुशावती का राजा बनाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;मेमायर्स ऑफ़् दि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, भाग 50, पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt; वर्तमान समय में श्रावस्ती बलरामपुर से 10 मील, [[अयोध्या]] से 58 मील तथा [[राजगीर]] से 720 मील दूर स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;रामायण, उत्तरकांड, अध्याय 121; 	नंदूलाल डे, दि ज्योग्राफिकल डिक्शनरी आफ ऐंश्येंट एंड मिडिवल इंडिया, पृष्ठ 197&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण|मत्स्य]], [[लिंग पुराण|लिंग]] और [[कूर्म पुराण|कूर्म पुराणों]] में श्रावस्ती को गौडा में स्थित बतलाया गया है, जिसका समीकरण कनिंघम ने आधुनिक गोंडा से किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. एनिंघम, दि ऐंश्येंट ज्योग्राफी आफ इंडिया, पृष्ठ 343&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती की संस्थापना श्रावस्तक ने की थी। [[वायु पुराण]] के अनुसार श्रावस्तक के पिता का नाम अंध था।&amp;lt;ref&amp;gt;वायुपुराण, अध्याय 88, पृष्ठ 24-26; 	द्रष्टव्य, विष्णुपुराण, अध्याय 4, पृष्ठ 2-12&amp;lt;/ref&amp;gt; मत्स्य&amp;lt;ref&amp;gt; मत्स्यपुराण, अध्याय 12, पृष्ठ 29-30&amp;lt;/ref&amp;gt; और ब्रह्म पुराणों&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्मपुराण, अध्याय 7, पृष्ठ 53;  	द्रष्टव्य, मेमायर्स आफ आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, संख्या 50. पृष्ठ 6&amp;lt;/ref&amp;gt; में श्रावस्त (श्रावस्तक) को युवनाश्व का पुत्र और अद्र का पौत्र कहा गया है (वायुपुराण के अनुसार यह अंध्र तथा भागवत पुराण के अनुसार चंद्र था)।&amp;lt;ref&amp;gt;भागवतपुराण, अध्याय 9, पृष्ठ 20-21&amp;lt;/ref&amp;gt; महाभारत में इनसे अलग सूचना मिलती है। इसमें श्रावस्तक को श्राव का पुत्र तथा युवनाश्व का पौत्र कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt; महाभारत, वनपर्व, 20/3-4; 11/21-22&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ पुराणों में श्रवस्तक (श्रावस्तक) को युवनाश्व का पुत्र और आद्र का पौत्र कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्मपुराण, 6, 53; मत्स्यपुराण, 12 29-30 	26- मत्स्यपुराण, अध्याय 12, पृष्ठ 29-30&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जातकों में वर्णित श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gandhakuti-Jetavana-Vihara.jpg|गंधकुटी जेतवन विहार, श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
जातकों में श्रावस्ती का विशद वर्णन मिलता है। इनके अनुसार श्रावस्ती का धार्मिक वायुमंडल बौद्ध धर्म से अधिक प्रभावत था। इस नगर में गौतम बुद्ध के अनेक व्याख्यान हुए थे, जिनसे प्रभावित होकर समस्त वर्गों के अनेक व्यक्तियों ने इस धर्म को अपना लिया था। नगर-श्रेष्ठी अनाथपिंडक बुद्ध का परम भक्त था। उसके घर में पाँच सौ भिक्षुओं के निमित्त प्रतिदिन भोजन तैयार कराया जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 4, पृष्ठ 91 (भदंत आनंद कौसल्यायन संस्करण&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा जाता है कि अनाथपिंडक ने अपने द्वारा बनवाए हुए सभी भवनों को बौद्ध संघ को समर्पित कर दिया था। समर्पण की यह क्रिया बड़े समारोह के साथ संपादित हुए थी। इसमें उसने 18 करोड़ मुद्राएँ व्यय की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 1, पृष्ठ 92&amp;lt;/ref&amp;gt; इन निवास गृहों में गंधकुटी, करेरिकुटी तथा कोसंबकुटी उल्लेखनीय हैं। कोसंबकुटी एवं करेरिकुटी का नामकरण उसके समीप करेरि और कोसंब वृक्षों के नाम के आधार पर हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt; ‘करेरिमंडपो तस्सा कुटिकाय द्वारेथितो तस्मा करेरिकुटिकाय द्वारेथितो तस्म करेरिकुटिका ति वुच्चति’ 	‘कोसंबरुक्खस्स द्वारे थित्तता कोसंबकुटिका ति’ सुगंलबिलासिनी, भाग 2, पृष्ठ 407&amp;lt;/ref&amp;gt; गंधकुटी जेतवन के मध्य बनी हुई थी।&amp;lt;ref&amp;gt; तत्रैव, भाग 1, पृष्ठ 92 (सो मज्झे गंधकुटीं कारेसि&amp;lt;/ref&amp;gt; पाटिकाराम नामक एक अन्य विहार भी श्रावस्ती के ही समीप था। जब सुनक्षत्र लिच्छवि पुत्र भिक्षु संघ को छोड़कर गया, तब भगवान् इस विहार में ही निवास कर रहे थे।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 1, पृष्ठ 389&amp;lt;/ref&amp;gt; एक अन्य विहार राजकाराम था जो पसेनादि (प्रसेनजित) द्वारा बनवाया गया था। यह नगर के दक्षिण-पश्चिम स्थित था।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 2, पृष्ठ 15&amp;lt;/ref&amp;gt; यहीं पर आम्रवनों के बीच एक बड़ा तालाब था जिसे जेतवन पोक्खरणि के नाम से जाना जाता था। इसके चारों तरफ उपवन इतने घने थे कि यह एक जंगल के समान प्रतीत होता था।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 4, पृष्ठ 228&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्तीवासियों ने बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को आतिथ्य सत्कार की इच्दा से दान दिया। उन्होंने विहार में एक धर्मघोष&amp;lt;ref&amp;gt;वह भिक्षु जो धर्मोपदेश की घोषणा किया करता था। &amp;lt;/ref&amp;gt; नामक भिक्षु को नियुक्त किया।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, (भदंत आनंद कौसल्यायन संस्करण), खंड तृतीय, पृष्ठ 15&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती से व्यापार का भी उल्लेख जातकों में आया है। व्यापारियों द्वारा एक पुराने जलाशय को खोदने से लोहा, जस्ता, शीशा, रत्न, सोना, मुक्ता और बिल्लौर आदि धातुएँ प्राप्त हुई थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 24 	‘जरुदपानं खणमाना, वाणिजा उदकत्थका  	अजझगंसू अयोलोहं, तिपुसीसन्ची वाणिजा।  	रतनं जातरूपंच मुक्ता बेकुरिया बाहु॥&amp;lt;/ref&amp;gt; कुंभ जातक में श्रावस्ती में सामूहिक सुरा-उत्सव मनाने का उल्लेख मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 5, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध साहित्य में श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
बुद्ध काल में कोशल जैसे समृद्धशाली जनपद की राजधानी होने के कारण श्रावस्ती का ऊँचा स्थान था। साथ ही बौद्ध धर्म के प्रचार का प्रमुख केंद्र होने के कारण बौद्ध साहित्य में इस नगर का विशद वर्णन मिलता है। ललितविस्तर&amp;lt;ref&amp;gt;ललितविस्तर अध्याय 1&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार श्रावस्ती कोशल जनपद की राजधानी थी। यह राजाओं, राजकुमारों, मंत्रियों, सभासदों तथा उनके समर्थकों-क्षत्रियों, ब्राह्मणों एवं गृहस्वामियों से भरी हुई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;विमलचरण लाहा, श्रावस्ती इन इंडियन लिटरेचर, दि मेमायर्स आफ दि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया भाग 50, पृष्ठ 20&amp;lt;/ref&amp;gt; इस नगर के नागरिक तथागत के बड़े प्रशंसक थे। बौद्ध धर्म के प्रचार की ओर संकेत करते हुए मिलिंदपन्हों में भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ बतलायी गई है&amp;lt;ref&amp;gt;‘नगरे महाराज पंचकोटिमत्ता अरियसावका भगवती उपासक-उपासिकायो सत्तण्णा सहसानि तोझि सतहससानि अनागामि फले पतित्थिता ने सब्बेऽपि गिही न पच्चजिता।’ मिलिंदपन्हो, पृष्ठ 349&amp;lt;/ref&amp;gt;, जो निश्चय ही अतिरंजना है। बुद्धघोष के अनुसार उस समय श्रावस्ती में 57 हज़ार परिवार निवास करते थे। &amp;lt;ref&amp;gt;परमत्थजोतिका, भाग 1, पृष्ठ 371; सामंतपासादिका, भाग 3, पृष्ठ 636&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी ग्रंथ में यहाँ की जनसंख्या 18 करोंड़ बताई गई है, जो स्पष्टत: अतिरंजित है।&amp;lt;ref&amp;gt;	46- भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संवत् 2018), पृष्ठ 237&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavan-Monastery-2.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती|left|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
====  व्यापार का केंद्र  ====&lt;br /&gt;
श्रावस्ती की भौतिक समृद्धि का प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर तीन प्रमुख व्यापारिक पथ मिलते थे जिससे यह व्यापार का एक महान केंद्र बन गया था। यह नगर पूर्व में [[राजगृह]] से, उत्तर-पश्चिम में [[तक्षशिला]] से और दक्षिण में प्रतिष्ठान से जुड़ा हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी 1963), पृष्ठ 59&amp;lt;/ref&amp;gt; राजगृह से 45 योजन दूर आकर बुद्ध (शास्ता) ने श्रावस्ती में विहार किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;‘राजगंह कपिलवस्थुतो दूरं सट्ठि योजनानि, सावत्थि पन पंचदश।  सत्था राजगहतो पंचतालीसयोजनं आगन्त्या सावत्थियं विहरति।’ मच्झिमनिकाय, अट्ठकथा, 1/3/4&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती से राजगृह का रास्ता वैशाली होकर गुजरता था। यह मार्ग सेतव्य, [[कपिलवस्तु]], कुशीनारा (&amp;lt;ref&amp;gt;कुशीनगर&amp;lt;/ref&amp;gt;), पावा, भोगनगर और [[वैशाली]] से होकर जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;पावामोतीचंद्र, सार्थवाह, (बिहार राष्ट्र-भाषा परिषद, पटना, 1953), पृष्ठ 17&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रतिष्ठान को जाने वाला मार्ग साकेत, कोशांबी, विदिशा, गोनधा और उज्जैन से होकर गुजरता था। इस नगर का संबंध वाराणसी से भी था।&amp;lt;ref&amp;gt; सुत्तनिपात (सारनाथ संस्करण), पृष्ठ 212-13&amp;lt;/ref&amp;gt; इन दोनों के मध्य कोटागिरी नामक स्थान पड़ता था।&amp;lt;ref&amp;gt;मच्झिमनिकाय, (पालि टेक्स्ट् सोसायटी, लंदन), भाग 1, पृष्ठ 473; मोतीचंद्र, सार्थवाह, पृष्ठ 17&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती से तक्षशिक्षा का मार्ग सोरेय्य (सोरों) होते हुए जाता था। इस मार्ग में सार्थ निरंतर चलते रहते थे।&amp;lt;ref&amp;gt; भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृष्ठ 239&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रावस्ती का बौद्ध काल में भारत के सभी प्रमुख नगरों से घनिष्ट व्यापारिक संबंध था। &lt;br /&gt;
====पालि साहित्य में श्रावस्ती==== &lt;br /&gt;
पालि साहित्य में विभिन्न नगरों से श्रावस्ती की दूरी दी हुई है, जिससे उसका व्यापारिक महत्त्व प्रकट होता है। श्रावस्ती से तक्षशिला 192 योजन&amp;lt;ref&amp;gt;‘वुक्कसाति नाम कुलपुत्रो (तक्कसलातो) अट्ठ हि उनकानि योजनसतानि गतो जेतवनद्वारकोठकस्थ पर समीपे गच्छत्तो’ मच्झिमनिकाय, अट्ककथा, 3/4/10&amp;lt;/ref&amp;gt;, संकाश्य (संकीसा) से 30 योजन&amp;lt;ref&amp;gt;‘सावत्थितो संकस्य नगरं तिसयोजनानि’ धम्मपद अट्ठकथा, 14/2&amp;lt;/ref&amp;gt;, साकेत 6 योजन, राजगृह 60 योजन, मच्छिकासंड 30 योजन&amp;lt;ref&amp;gt;राहुल सांकृत्यायन, पुरातत्त्व निबंधावली, पृष्ठ 20&amp;lt;/ref&amp;gt; उग्रनगर 120 योजन तथा चंद्रभागा नदी (चेनाव) 120 योजन&amp;lt;ref&amp;gt;‘वीसं योजनसतं पच्चुग्गत्वा चंद्रभागाय नदियातोरे’ धम्मपद अट्ठकथा 6/4&amp;lt;/ref&amp;gt; पर थी। प्राचीन भारत में ‘योजन’ की माप निश्चित न होने के कारण श्रावस्ती से इन स्थानों की वास्तविक दूरी निश्चित करना कठिन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रावस्ती से भगवान बुद्ध के जीवन और कार्यों का विशेष संबंध था। उल्लेख्य है कि बुद्ध ने अपने जीवन के अंतिम पच्चीस वर्षों के वर्षावास श्रावस्ती में ही व्यतीत किए थे। बौद्ध धर्म के प्रचार की दृष्टि से भी श्रावस्ती का महत्त्वपूर्ण स्थान था। भगवान् बुद्ध ने प्रथम निकायों के 871 सुत्तों का उपदेश श्रावस्ती में दिया था, जिनमें 844 जेतवन में, 23 पुब्बाराम में और 4 श्रावस्ती के आस-पास के अन्य स्थानों में उपदिष्ट किए गए।&amp;lt;ref&amp;gt;भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृष्ठ 237&amp;lt;/ref&amp;gt; बौद्ध धर्म प्रचार केंद्र के रूप में श्रावस्ती की ख्याति का ज्ञान यहाँ उपदिष्ट सूत्रों के आधार पर निश्चित हो जाता है। &lt;br /&gt;
====जेतवन====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana.jpg|जेतवन, श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
बुद्ध के जीवन-काल में श्रावस्ती के दक्षिण में स्थित जेतवन एवं पुब्बाराम दो प्रसिद्ध वैहारिक अधिष्ठान एवं बौद्धमत के प्रभावशाली केंद्र थे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार जेतवन का आरोपण, संवर्धन तथा परिपालन जेत नामक एक राजकुमार द्वारा किया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;तंहि जेतेन राजकुमारेन रोपितं संवर्द्धिंत परिपालित। 	सो च तस्सि सामी अहोसि, तस्मा, जेतवने ति वुच्चति॥ पपंचसूदनी, भाग 1, पृष्ठ 60&amp;lt;/ref&amp;gt; राजगृह मे वेणुवन और वैशाली के महावन के ही भाँति जेतवन का भी विशेष महत्त्व था।&amp;lt;ref&amp;gt;उदयनारायण राय, प्राचीन भारत में नगर तथा नगर जीवन, पृष्ठ 118&amp;lt;/ref&amp;gt; इस नगर में निवास करने वाले अनाथपिंडक ने जेतवन में विहार (भिक्षु विश्राम स्थल), परिवेण (आँगनयुक्त घर), उपस्थान शालाएँ (सभागृह), कापिय कुटी (भंडार), चंक्रम (टहलने के स्थान), पुष्करणियाँ और मंडप बनवाए।&amp;lt;ref&amp;gt;विनयपिटक (हिन्दी अनुवाद), पृष्ठ 462; बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृष्ठ 240; तुल. विशुद्धानन्द पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी, 1963), पृष्ठ 61&amp;lt;/ref&amp;gt; अनाथपिंडक के निमंत्रण पर भगवान बुद्ध श्रावस्ती स्थित जेतवन पहुँचे। अनाथापिण्डक ने उन्हें खाद्य भोज्य अपने हाथों से अर्पित कर जेतवन को बौद्ध संघ कोदान कर दिया। इसमें अनाथ पिंडक को 18 करोड़ मुद्राओं को व्यय करना पड़ा था। उल्लेखनीय है कि इस घटना का अंकन भरहुत कला में भी हुआ है।&amp;lt;ref&amp;gt;बरुआ, भरहुत, भाग 2, पृष्ठ 31&amp;lt;/ref&amp;gt; तथागत ने जेतवन में प्रथम वर्षावास बोधि के चौदहवें वर्ष में किया था। इससे यह निश्चित होता है कि जेतवन का निर्माण इसी वर्ष (514-513 ई. वर्ष पूर्व) में हुआ होगा। उल्लेखनीय है कि जेतवन के निर्माण के पश्चात् अनाथपिण्डक ने तथागत को निमंत्रित किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पुब्बाराम ====&lt;br /&gt;
जेतवन के पश्चात दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान पुब्बाराम (पूर्वाराम) था। इसका निर्माण नगर के एक प्रमुख धनिक सेठ मिगार (मृगधर) की पुत्रवधू विशाखा ने कराया था। यह नगर के पूर्वी द्वार के पास स्थित था।&amp;lt;ref&amp;gt;धम्मपदटीका, भाग 1, पृष्ठ 384; अंगुत्तरनिकाय, प्रथम भाग (हिन्दी अनुवाद, भदंत आनंद कौसल्यायन, महाबोधि सभा, कलकत्ता 1957, पृष्ठ 212 मेमायर्स आदि दि आर्कियोलाजिक सर्वे आफ इंडिया भाग 50, पृष्ठ 25&amp;lt;/ref&amp;gt; संभवत: इसीलिए इसका नाम पूर्वाराम पड़ा। इसके निर्माण तथा समर्पण में लगभग 27 करोड़ मुद्राओं का व्यय करना पड़ा था। यह लकड़ी (रुक्ख) तथा पत्थर द्वारा निर्मित था, जिसमें दो मंजिलें थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;राहुल सांकृत्यायन, पुरातत्व निबंधावली, पृष्ठ 79&amp;lt;/ref&amp;gt; पूर्वाराम विहार की आधुनिक स्थिति सहत-महेत के पास उनके पूर्व का हनुमनवा स्थान है।&lt;br /&gt;
====नगर का वर्णन====&lt;br /&gt;
इसके अतिरिक्त बौद्ध साहित्य में मल्लिकाराम का निर्माण प्रसेनजित की महारानी मल्लिका द्वारा किया गया था। यह एक परिब्राजकाराम था; जहाँ विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य शास्त्रार्थ होता था। तीर्थकाराम एक बड़ा आराम था जिसमें 700 से 3000 तक परिब्राजक निवास कर सकते थे। इस नगर की परिखा, प्राकार एवं नगर द्वार के विषय में प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख मिलते हैं। उस समय भवन निर्माण में मुख्यत: लकड़ी का उपयोग होता था। नगर के चारों ओर मिट्टी के प्राकार बने थे। नगर के द्वार एवं राजमार्ग पर्याप्त चौड़े थे। संयुक्त-निकाय में उल्लेख है कि यहाँ के नागरिक हाथी (हत्थिखंडम् भारोहेय्य) राजमार्गों पर निकलते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;मज्झिमनिकाय, भाग 2, पृष्ठ 22&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती में मूख्यत: चार दरवाजे थे, जिनमें तीन तो उत्तर-पूर्व एवं दक्षिण दरवाजों के नाम से प्रसिद्ध थे। इनमें से जेतवन से नगर में आने का प्रवेश द्वार दक्षिण द्वार था। पूर्वाराम पूर्व दरवाजे के सामने था। इनके अतिरिक्त पश्चिम दरवाजे का होना भी स्वाभाविक है तथापि इसका वर्णन त्रिपिटक या अट्ठकथा में नहीं मिलता। उल्लेखनीय है इन प्रवेश-द्वारों के अतिरिक्त उत्खनन से कई अन्य प्रवेश द्वारों का भी पता चला है लेकिन ये दरवाजे वास्तविक नहीं थे। बल्कि समय-समय पर प्राकारों के बिर जाने के कारण सुविधानुसार प्रयोग में लाए गए स्थानापन्न दरवाजे थे।&amp;lt;ref&amp;gt;देखें, आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 84&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Shobhnath-Temple.jpg|शोभनाथ मन्दिर, श्रावस्ती|left|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
==अन्य प्रसिद्ध स्थान==&lt;br /&gt;
इस नगर के अन्य प्रसिद्ध स्थानों में पूर्वाराम और मल्लिकाराम उल्लेखनीय हैं। पूर्वाराम का निर्माण नगर के धनिक सेठ मृगधर की पुत्रवधु विशाखा के द्वारा कराया गया था। यह नगर के पूर्वी दरवाजे के पास बना था। संभवत: इसीलिये इसका नाम पूर्वाराम (अर्थात पूरबी मठ) पड़ा। यह दो मंज़िला भवन था, जिसमें मज़बूती लाने के लिये पत्थरों की चुनाई की गई थी। लगता है कि मल्लिकाराम इससे बड़ा विश्राम-भवन था, जिसमें ऊपर और नीचे कई कमरे थे। इसका निर्माण श्रावस्ती की मल्लिका नाम की साम्राज्ञी के द्वारा कराया गया था। नगरों में आने वाले बौद्ध परिब्राजक, निर्ग्रन्थ, [[जैन]] साधु-संन्यासी और नाना धर्मों के अनुयायियों के विश्राम तथा भोजन-वस्त्र की पूरी सुख-सुविधा थी। गौतम बुद्ध के प्रिय शिष्य [[आनन्द]], सारिपुत्र, मौद्गल्यायन तथा [[महाकाच्यायन|महाकाश्यप]] आदि ने भी वहाँ के नागरिकों को अपने सदुपदेशों से प्रभावित किया था। उनकी अस्थियों के ऊपर यहाँ स्तूप बने हुये थे। अशोक धर्म-यात्रा के प्रसंग में श्रावस्ती आया हुआ था। उसने इन स्तूपों पर भी पूजा चढ़ाई थी।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जैन धर्म== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Sravasti-1.jpg|thumb|250px|जेतवन, श्रावस्ती&amp;lt;br /&amp;gt;Jetavana, Sravasti]]&lt;br /&gt;
इस नगर में [[जैन]] मतावलंबी भी रहते थे। इस धर्म के प्रवर्तक [[महावीर]] स्वामी वहाँ कई बार आ चुके थे। नागरिकों ने उनका दिल खोल कर स्वागत किया और अनेक उनके अनुयायी बन गये। वहाँ पर ब्राह्मण मतावलंबी भी मौजूद थे। [[वेद|वेदों]] का पाठ और यज्ञों का अनुष्ठान आदि इस नगर में चलता रहता था। मल्लिकाराम में सैकड़ों ब्राह्मण साधु धार्मिक विषयों पर वादविवाद में संलग्न रहा करते थे। विशेषता यह थी कि वहाँ के विभिन्न धर्मानुयायियों में किसी तरह के सांप्रदायिक झगड़े नहीं थे।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
लगता है कि जैसे-जैसे कोसल-साम्राज्य का अध:पतन होने लगा, वैसे-वैसे श्रावस्ती की भी समृद्धि घटने लगी। जिस समय चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फाहियान]] वहाँ पहुँचा, उस समय वहाँ के नागरिकों की संख्या पहले की समता में कम रह गई थी। अब कुल मिला कर केवल दो सौ परिवार ही वहाँ रह गये थे। पूर्वाराम, मल्लिकाराम और जेतवन के मठ खंडहर को प्राप्त होने लगे थे। उनकी दशा को देखकर वह दुखी हो गया। उसने लिखा है कि श्रावस्ती में जो नागरिक रह गये थे, वे बड़े ही अतिथि-परायण और दानी थे। [[हुएन-सांग|हुयेनसांग]] के आगमन के समय यह नगर उजड़ चुका था। चारों ओर खंडहर ही दिखाई दे रहे थे। वह लिखता है कि यह नगर समृद्धिकाल में तीन मील के घेरे में बसा हुआ था। आज भी अगर आप को गोंडा ज़िले में स्थित सहेट-महेट जाने का अवसर मिले, तो वहाँ श्रावस्ती के विशाल खंडहरों को देख कर इसके पूर्वकालीन ऐश्वर्य का अनुमान आप लगा सकते हैं। &lt;br /&gt;
==जैन ग्रंथों में वर्णित श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
बौद्ध मतावलंबियों की भाँति जैन धर्मानुयायी भी इस नगर को इस प्रमुख धार्मिक स्थान मानते थे। वे इसे चंद्रपुरी या चंद्रिकापुरी के नाम से अभिहित करते थे। [[जैन धर्म]] के प्रचार कंद्र के रूप में भी यह विख्यात था। श्रावस्ती जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर संभवनाथ&amp;lt;ref&amp;gt;जैन हरिवंशपुराण, पृष्ठ 717&amp;lt;/ref&amp;gt; व आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभानाथ&amp;lt;ref&amp;gt;एस. स्टीवेंसन, हार्ट आफ जैनिज्म, (दिल्ली, 1970) पृष्ठ 42&amp;lt;/ref&amp;gt; की जन्मस्थली थी। [[महावीर]] ने भी यहाँ एक वर्षावास व्यतीत किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सी. जे. शाह, जैनिज्म इन नार्थ इंडिया, पृष्ठ 26&amp;lt;/ref&amp;gt; जैन साहित्य में सावत्थि अथवा सावत्थिपुर के प्रचुर उल्लेख मिलते हैं। तृतीय तीर्थंकर संभवनाथ के गर्भ, जनम, तप और केवल ज्ञान कल्याणक यहीं संपन्न हुए थे। एक मत के मतानुसार श्रीवास्त द्वारा इस नगर की स्थापना की गई और इन्हीं के नाम पर इसका श्रावस्ती नाम पड़ा।&amp;lt;ref&amp;gt;कोशल, रिसर्च आफ दि इंडियन रिसर्च सोसायटी आफ अवध, भाग 3, पृष्ठ 23&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती के महाश्रेष्ठि नंदिनीप्रिय, नागदत्त आदि से जैन धरृम के अध्ययनार्थ श्रावस्ती में लोग दूर-दूर से आते थे। इसमें कश्यप के पुत्र कपिल एवं जैन विद्वान केशी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
जैन ग्रंथ भगवती सूत्र (320 ई.पू. से 600 ई. से मध्य) के अनुसार श्रावस्ती नगर आर्थिक क्षेत्र में भौतिक समृद्धि के चरमोत्कर्ष पर थी। यहाँ के व्यापारियों में शंख और मक्खलि मुख्य थे जिन्होंने यहाँ के नागरिकों के भौतिक समृद्धि के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था।&amp;lt;ref&amp;gt;योगेन्द्र चंद्र शिकदार, स्टडीज इन भगवती सूत्राज, (रिसर्च इंस्टीट्यूट आफ प्राकृत जैनोलाजी एंड अहिंसा, मुजफ्फरपुर, 1964), पृष्ठ 307&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस नगर में एक बहुत ही धनी श्रेष्ठि मिगार था जो जैन धर्म का प्रबल समर्थक था जबकि उसकी पुत्रवधू विशाखा बौद्ध धर्म की अनुयायी थी।&amp;lt;ref&amp;gt;के.सी.जैन, लार्ड महावीर एंड हिज टाइंस, पृष्ठ 63&amp;lt;/ref&amp;gt; भगवती मूत्र से पता चलता है कि आजीवक संप्रदाय का प्रधान मक्खलिपुत्र गोशाल महावीर का शिष्य था। जैने स्रोतों से पता चलता है कि कालांतर में श्रावस्ती आजीवक संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र बन गया। हरमन जैकोबी&amp;lt;ref&amp;gt;हरमन याकोबी, से.बु.ई. (जैन सूत्राज), मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 1964, पुनर्मुद्रित), भाग 45, पृष्ठ 30&amp;lt;/ref&amp;gt; और बी.एम. बरुआ&amp;lt;ref&amp;gt;बेनी माधव बरुआ, एक हिस्ट्री आफ बुद्धिस्टिक इंडियन फिलासफी, पृष्ठ 300&amp;lt;/ref&amp;gt; का मत है कि कुछ दिनों तक महावीर, मक्खलिपुत्र गोशाल के शिष्य थे। मक्खलिपुत्र गोशाल का जन्म श्रावस्ती में हुआ था। गोशाल महावीर से उम्र में बड़ा था। बाद में सिद्धांतीय मतभेदों के कारण गोशाल ने महावीर का साथ छोड़ दिया और आजीवक संप्रदाय के प्रमुख के रूप में श्रावस्ती में 16 वर्ष व्यतीत किए।&amp;lt;ref&amp;gt;के.सी. जैन, लार्ड महावीर एंड हिज टाइंस, पृष्ठ 165&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====संभवनाथ का मंदिर====&lt;br /&gt;
ईसा के पूर्व ही यहाँ संभवनाथ का एक मंदिर निर्मित हुआ था। फाह्यान ने जब श्रावस्ती की यात्रा की थी उस समय इस मंदिर का अवशेष मात्र शेष था। इस स्थल पर उत्खनन से एक नवीन जैन-मंदिर (शोभनाथ) के अवशेष मिले हैं, जिसकी ऊपरी बनावट से यह मध्य युग का प्रतीत होता था। साथ ही बहुत सी जैन प्रतिमाएँ भी मिली हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल ऑफ़ दि रायल एशियाटिक सोसायटी, 1908, पृष्ठ 102&amp;lt;/ref&amp;gt; यह नगर अधिक समय तक श्वेतांबर जैन श्रमणों की केंद्र-स्थली था, किन्तु बाद में यह दिगंबर संप्रदाय का केंद्र बन गया।&amp;lt;ref&amp;gt;वृहत्कथाकोश (ए. एन. उपाध्याय द्वारा संपादित), पृष्ठ8, 348&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====फाह्यान का इतिवृत्त====&lt;br /&gt;
फाह्यान साकेत से दक्षिण दिशा की ओर आठ योजन चलकर कोशल&amp;lt;ref&amp;gt;इस नाम के दो भारतीय राज्य थे- उत्तरी एवं दक्षिणी कोशल। यह उत्तरी कोशल था जो कि आधुनिक अवध का एक भाग था। &amp;lt;/ref&amp;gt; जनपद के नगर श्रावस्ती&amp;lt;ref&amp;gt;इसका आधुनिक समीकरण सहेत-महेत हैं; द्रष्टव्य, जेम्स लेग्गे, दि ट्रैवेल्स् आफ फाह्यान, (ओरियंटल पब्लिशर्स, दिल्ली, 1972), पृष्ठ 56&amp;lt;/ref&amp;gt; में पहुँचा था। फाह्यान लिखता है कि नगर में अधिवासियों की संख्या कम है और वे बिखरे हुए हैं। उसकी यात्रा के दौरान यहाँ पर सब मिलाकर केवल दो सौ परिवार ही रह गए थे। वह आगे लिखता है कि इस नगर में प्राचीन काल में राजा प्रसेनजित&amp;lt;ref&amp;gt;यह राजा गौतम बुद्ध का समकालीन था। &amp;lt;/ref&amp;gt; राज्य करते थे। यहाँ पर महा प्रजापति का प्राचीन विहार विद्यमान है। नगर के दक्षिणी द्वार के बाहर 1200 क़दम की दूरी पर वह स्थान है जहाँ वैश्याधिपति अनाथपिंडक (सुदत्त) ने एक विहार बनवाया था। जेवतन विहार से उत्तर-पश्चिम चार ली की दूरी पर ‘चक्षुकरणी’ नामक एक वन है, जहाँ जन्मांध लोगों को श्री बुद्धदेव की कृपा से ज्योति प्राप्त हुई थी। जेतवन संघाराम के श्रमण भोजनांतर प्राय: इस वन में बैठकर ध्यान लगाया करते थे। फाह्यान के अनुसार जेतवन विहार के पूर्वोत्तर 6.7 ली की दूरी पर माता विशाखा द्वारा निर्मित एक विहार था।&amp;lt;ref&amp;gt;जेम्स लेग्गे, दि ट्रेवल्स आफ फाह्यान, पृष्ठ 59&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फाह्यान पुन: लिखता है कि जेतवन विहार के प्रत्येक कमरे में, जहाँ कि भिक्षु रहते है, दो-दो दरवाजे हैं; एक उत्तर और दूसरा पूर्व की ओर। वाटिका उस स्थान पर बनी है जिसे सुदत्त ने सोने की मुहरें बिछाकर ख़रीदा था। बुद्धदेव इस स्थान पर बहुत समय तक रहे और उन्होंने लोगों को धर्मोपदेश दिया। बुद्ध ने जहाँ चक्रमण किया, जिस स्थान पर बैठे, सर्वत्र स्तूप बने हैं, और उनके अलग-अलग नाम है। यहीं पर सुंदरी ने एक मनुष्य का वध करके श्री बुद्धदेव पर दोषारोपण किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;जेम्स लेग्गे, दि ट्रैवेल्स आफ फाह्यान, पृष्ठ 60&amp;lt;/ref&amp;gt; फाह्यान आगे उस स्थान को इंगित करता है जहाँ पर श्री बुद्धदेव और विधर्मियों के बीच शास्त्रार्थ हुआ था। यहाँ एक 60 फुट ऊँचा विहार बना हुआ था। &lt;br /&gt;
====ह्वेनसाँग का इतिवृत्त====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Anathapindika-Stupa.jpg|अनाथपिण्डिक स्तूप, श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
ह्वेनसाँग लिखता है कि विशोका ज़िले से 500 ली (100 मील) उत्तर-पूर्व श्रावस्ती देश स्थित था। यह देश 6000 ली परिधि में फैला हुआ था। इस समय यह नगर पूर्णत: विनष्ट एवं जनशून्य हो गया था। जिससे इसकी सीमा निर्धारित करना कठिन है। नगर के दीवारों की परिधि नगभग 20 ली में फैली थी।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस् वाटर्स, आन् युवान् व्चाँग्स् टैवेल्स इन इंडिया (पुनर्मुद्रित, मुंशीराम मनोहरलाल, दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1961), भाग 1, पृष्ठ 377&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ की जलवायु अनुकूल थी और अन्नादि की उपज अच्दी होती थी। प्रकृति उत्तम और स्वाभावानुकूल थी तथा मनुष्य शुद्ध आचरण वाले व धर्मिष्ठ थे। यहाँ कई सौ संघाराम थे, जिनमें से अधिकांशत: विनष्ट हो गए हैं। इसके अतिरिक्त 100 देव मंदिर भी हैं, जिसमें असंख्य धर्मावलंबी उपासना करते थे। ह्वेनसाँग के अनुसार राजधानी के पूर्व थोड़ी दूरी पर एक छोटा-सा स्तूप है जो प्रसेनजित द्वारा भगवान बुद्ध के लिए बनवाया गया था। इसके पार्श्व में एक अन्य स्तूप है। यह उसी स्थान पर बना है जहाँ [[अंगुलिमाल]] ने नास्तिकता का परित्याग कर बौद्ध धर्म को अंगीकृत किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सेमुअल बील, जाइनीज् एकाउंट्स आफ इंडिया, भाग 3 (कलकत्ता, 1958), पृष्ठ 260&amp;lt;/ref&amp;gt; नगर से 5-6 ली दक्षिण जेतवन है जहाँ सुदत्त (अनाथपिंडाद)&amp;lt;ref&amp;gt;सुदत्त का नाम अनाथपिंडाद भी लिखा है, अर्थात् अनाथ और दीन पुरुषों का मित्र।&amp;lt;/ref&amp;gt; द्वारा भगवान बुद्ध के लिए विहार एवं मंदिर बनवाए गए थे। प्राचीन काल में यहाँ एक [[संघाराम]] भी था जो ह्वेनसाँग के समय में पूर्णत: नष्ट हो गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस् वाटर्स, आन युवान च्वाँग्स ट्रैवेल्स इन इंडिया, भाग 1, पृष्ठ 382&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्वेनसाँग के अनुसार जेतवन मठ के पूर्वी प्रदेश-द्वार पर दो 70 फुट ऊँचे प्रस्तर स्तंभ थे। इन स्तंभों का निर्माण अशोक ने करवाया था। बाएँ खंभे में विजय प्रतीक स्वरूप चक्र तथा दाएँ खम्भे पर बैल की आकृति बनी हुई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 383&amp;lt;/ref&amp;gt; ह्वेनसाँग आगे लिखता है कि अनाथपिंडाद विहार के उत्तर-पूर्व एक स्तूप है, वह यह वह स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध ने एक रोगी भिक्षु को स्नान कराकर रोग-निवृत्त किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 387&amp;lt;/ref&amp;gt; स्तूप के निकट ही एक कूप है जिसमें से तथागत अपनी आवश्यकता के लिए जल लिया करते थे। इसके समीप अशोक निर्मित एक स्तूप है, जिसमें बुद्ध के अस्थि अवशेष रखे गए थे। इसके अतिरिक्त यहाँ पर कई ऐसे स्थल हैं जहाँ पर बुद्धदेव के टहलने और धर्मोपदेश करने के स्थानों पर स्तूप बने हुए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्वेनसाँग पुन: लिखता है कि जेतवन मठ के 60-70 क़दम की दूरी पर 60 फुट ऊँचा एक विहार है जिसमें पूर्वाभिमुख बैठी हुई भगवान् बुद्ध की एक मूर्ति है। भगवान बुद्ध ने यहाँ पर विरोधियों से शास्त्रार्थ किया था। इस विहार के 5-6 ली पूर्व दिशा में एक स्तूप है जहाँ सारिपुत्र ने तीर्थकों से शास्त्रार्थ किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 394&amp;lt;/ref&amp;gt; इस स्तूप के पार्श्व में एक मंदिर है जिसके सामने एक बुद्ध स्तूप है। जेतवन विहार के 3-4 ली उत्तर-पूर्व आप्तनेत्रवन नामक एक जंगल था। इस स्थल पर तथागत भगवान तपस्या करने के लिए आए थे। इसके स्मृतिस्वरूप श्रद्धालुओं ने यहाँ शिलालेखों एवं स्तूपों का निर्माण करवाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस वाटर्स, आन युवॉन च्वाँग्स ट्रैवेल्स इन इंडिया, भाग 1, पृष्ठ 397&amp;lt;/ref&amp;gt; नगर के दक्षिण एक स्तूप है, यह वन स्थान है जहाँ बुद्ध ज्ञान प्राप्त करके अपने पिता से मिले थे। नगर के उत्तर में भी एक स्तूप है जहाँ बुद्ध के स्मृति अवशेष संगृहीत हैं। ये दोनों स्तूप सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए थे।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 400&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पुरातत्त्व में श्रावस्ती== &lt;br /&gt;
श्रावस्ती के प्राचीन इतिहास को प्रकाश में लाने के लिए प्रथम प्रयास जनरल [[कनिंघम]] ने किया। उन्होंने सन 1863 ई. में उत्खनन प्रारंभ करके लगभग एक वर्ष के कार्य में जेतवन का थोड़ा भाग साफ कराया। इसमें उनको एक बोधिसत्व की 7 फुट 4 इंच ऊँची प्रतिमा प्राप्त हुई जिस पर अंकित लेख से इसका श्रावस्ती विहार में स्थापित होना ज्ञात होता है। यह मूर्ति भिक्षुबल द्वारा कोसंबकुट्टी के विहार में स्थापित की गई थी। इस प्रतिमा के अधिष्ठान पर अंकित लेख में तिथि नष्ट हो गई है, परंतु लिपिशास्त्र के आधार पर यह लेख कुषाण-काल का प्रतीत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार की बोधिसत्त्व की एक और लेखयुक्त प्रतिमा सारनाथ से मिली है जो इसी भिक्षु बल द्वारा कनिष्क के राज्यकाल के तृतीय वर्ष में स्थापित की गई थी। अत: यह प्रतिमा प्रारंभिक कुषाणकाल की प्रतीत होती है।  	देखें, ब्लाक, जर्नल ऑफ़ दि रायल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, भाग 67 (1898), प्लेट 1, पृष्ठ 274 और आगे (प्लेट के साथ)। एपिग्राफिया इंडिका, भाग 8 (1905-06), पृष्ठ 179 और आगे (प्लेट के साथ)।&amp;lt;/ref&amp;gt; कनिंघम ने इस आधार पर सहेत के क्षेत्र को जेतवन और महेत के क्षेत्र को श्रावस्ती से समीकृत किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम, आर्कियोलाजिकल सर्वे रिपोटर्स भाग 1, पृष्ठ 377 और आगे।&amp;lt;/ref&amp;gt; कनिंघम के अनुकरण पर डब्ल्यू. सी. बेनेट ने पक्की कुटी टीले की कुछ खुदाई करवाई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;बेनेट के उत्खनन के लिए द्रष्टव्य, गजेटियरऑफ़ दि प्राविंसऑफ़ अवध (इलाहाबाद, 1878), पृष्ठ 286&amp;lt;/ref&amp;gt; चीनी यात्रियों के यात्रा विवरणों के आधार पर इस टीले का समीकरण कनिंघम ने अंगुलिमाल स्तूप&amp;lt;ref&amp;gt;पूर्ववर्ती लेखक इसे अंगुलिमालिय स्तूप कहते हैं, जबकि इसका सही प्राकृत रूप अंगुलिमाल होना चाहिए।  	देखें, जातक, (फाउसबोल संस्करण), भाग 5, पृष्ठ 466&amp;lt;/ref&amp;gt; से किया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन् 1876 ई. में कनिंघम ने इन स्थानों की खुदाई पुन: आरंभ करवाई, जिसमें 16 इमारतों की नीवें प्रकाश में आईं। इनमें अधिकांश स्तूप और परवर्ती काल के मंदिर थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम, आर्कियोलाजिकल सर्वे रिपोटर्स, भाग 11, पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt; इस बार उनको यहाँ से सिक्के और मृण्मूर्तियाँ भी मिलीं। उत्खनन से यह निश्चित हुआ कि जिस स्थान पर बोधिसत्व की विशाल मूर्ति मिली थी, वहाँ कोशंब-कुट्टी नामक विहार था। उसी के उत्तर में गंधकुटी अथवा मुख्य विहार था। &lt;br /&gt;
====डब्ल्यू. होवी का उत्खनन====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Vihara-Sravasti.jpg|जेतवन विहार के अवशेष, श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
कनिंघम के सहेत में उत्खनन के समय (1875-76) डब्ल्यू. होवी ने महेत में खुदाई की। इसमें उन्हें महेत के पश्चिम में स्थित शोभनाथ जैन मंदिर के खंडहरों में कुछ मूर्तियाँ मिली।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वेऑफ़ इंडिया, (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृष्ठ 83&amp;lt;/ref&amp;gt; श्री होवी ने इस क्षेत्र का गहन अन्वेषण 15 दिसम्बर 1884 से 15 मई 1885 तक किया तथा इसे क्षेत्र में बड़ी संख्या में स्मारकों का पता लगाया। अपनी रिपोर्ट में&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नलऑफ़ एशियाटिक सोसायटीऑफ़ बंगाल (1892), प्लेट 1, अतिरिक्त संख्या (भाग 61&amp;lt;/ref&amp;gt; होवी ने कुछ स्मारकों का समीकरण चीनी यात्रियों द्वारा वर्णित स्मारकों से करने का प्रयास किया, पंरतु अधिकांश स्मारकों के विषय में प्रर्याप्त प्रमाण का अभाव है। होवी द्वारा उत्खनित वस्तुओं में कुछ निम्नलिखित हैं&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वेऑफ़ इंडिया, (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-8, पृष्ठ 131-132&amp;lt;/ref&amp;gt;-&lt;br /&gt;
*संवत् 1176 (1119 ई.) का एक शिलालेख।&amp;lt;ref&amp;gt;इस शिलालेख पर 18 पंक्तियों में देवनागरी लिपि एवं संस्कृत भाषा में एक लेख खुदा हुआ है। लेख भगवान् बुद्ध की वंदना से प्रांरभ होता है, जिसे छोड़कर शेष संपूर्ण लेख छंदों में हैं। &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*गुप्तलिपि में अभिलिखित एक लाल रंग का बलुए पत्थर का टुकड़ा। &lt;br /&gt;
*जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों पर अंकित दो अभिलेखों के छ: टुकड़े। &lt;br /&gt;
*एक प्राचीन दावात। &lt;br /&gt;
*एक अग्निमुख नाग की काँसे की प्रतिमा&lt;br /&gt;
*कच्ची मिट्टी की दस मुहरें। ये सभी बौद्ध धर्म संबंधित हैं। &lt;br /&gt;
*कच्ची मिट्टी की 500 मुहरें। &lt;br /&gt;
*कर्नेकी (संभवत: कनिष्क) की एक तांबे की मुद्रा। &lt;br /&gt;
==== जे.पी.एच.फोगल तथा श्री दयाराम साहनी का उत्खनन====&lt;br /&gt;
होवी के उत्खनन के 23 वर्ष उपरांत फरवरी-अप्रैल 1908 ई. में जे.पी.एच.फोगल तथा री दयाराम साहनी ने उत्खनन किया। फोगल ने महेत के प्राचीर की दीवारों और उसके प्रवेश-द्वारों की खोज की तथा उसके विस्तार को निरूपित किया। महेत के प्रमुख टीलों में उन्होंने पक्की कुटी, कच्ची कुटी और शोभनाथ मंदिर की खोज की। कच्ची कुटी में विशेष रूप से मिट्टी की मूर्तियाँ, खिलौने आदि मिले, जिनका कलात्मक एवं ऐतिहासिक दोनों महत्व है। शोभनाथ मंदिर से अनेक जैन मूर्तियाँ भी प्राप्त हुईं। सहेत के क्षेत्र से भी अनेक विहारों, स्तूपों और मंदिरों की रूपरेखा स्पष्ट की गई और बुद्ध तथा बोधिसत्व की मूर्तियाँ, सिक्के, मृण्मूर्तियाँ व मुहरें निकाली गईं।&amp;lt;ref&amp;gt;विस्तार के लिए द्रष्टव्य, आर्कियोलाजिकल सर्वेऑफ़ इंडिया (एनुअल रिपोर्ट), 1907-08, पृष्ठ 117&amp;lt;/ref&amp;gt; इन वस्तुओं में सबसे महत्त्वपूर्ण [[कन्नौज]] के राजा गोविदचंद्र का एक दानपत्र है। इसी लेख के आधार पर विद्वानों ने सहेत को जेतवन से और महेत को श्रावस्ती से समीकृत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1910-11 ई. में विख्यात पुरातत्त्ववेत्ता सर जान मार्शल की अध्यक्षता में दयाराम साहनी ने इस क्षेत्र की पुन: खुदाई की। इनका मुख्य कार्यस्थल जेतवन टीला था। उस उत्खनन में कुछ अभिलेख, मूर्तियाँ, बड़ी मात्रा में मुद्राएँ तथा लेखयुक्त मुहरें, साँचे, मृण्मूर्तियाँ, मृण्भांड और ईंटें आदि मिली हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;मेमायर्स ऑफ़ दि आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, संख्या 50, पृष्ठ 3&amp;lt;/ref&amp;gt; यद्यपि कनिंघम और होवी के उत्खननों में महेत और श्रावस्ती के समीकरण में कोई संदेह नहीं रह जाता फिर भी विंसेंट स्मिथ ने 1898 में एक लेख प्रकाशित करके कनिंघम के इस समीकरण पर आपत्ति प्रस्तुत की।&amp;lt;ref&amp;gt;वी.ए. स्मिथ, कौशांबी एंड श्रावस्ती, जर्नल आफ दि रायल एशियाटिक सोसाइटी (1898) पृष्ठ 527&amp;lt;/ref&amp;gt; स्मिथ के तर्क का अनुमान चीनी यात्रियों के यात्रा-विवरणों पर आधारित था। उन्होंने श्रावस्ती को [[नेपाल]] की तराई में बालापुर, कामदी और इंतावा गाँवों के मध्य में स्थित बतलाया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्मिथ के अनुसार====&lt;br /&gt;
स्मिथ ने अपने एक परवर्ती लेख में बोधिसत्व के प्राप्ति-स्थान के संदर्भ में आपत्ति की जिस पर कनिंघम का सिद्धांत आधारित था। स्मिथ का यह अनुमान तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता, क्योंकि पर्याप्त साहित्यिक और पुरातात्त्विक प्रमाणों ने श्रावस्ती का सहेत-महेत से समीकरण प्रमाणित कर दिया है। अधिक संभव है कि स्मिथ द्वारा अन्वेषित बालापुर के भग्नावशेष सेतव्य के हों। साहित्यक प्रमाणों से भी इस बात की पुष्टि होती है। पालि साहित्य&amp;lt;ref&amp;gt;सुत्तनिपात (सारनाथ संस्करण), पृष्ठ 212-13; जी.पी. मललसेकर, डिक्शनरी आफ पालि प्रापर नेम्स, भाग दो, (लंदन 1960), पृष्ठ 1126&amp;lt;/ref&amp;gt; में सेतव्य को श्रावस्ती और राजगृह के मार्ग के बीच में स्थित कहा गया है। इस प्रकार सेतव्य, संभवत: श्रावस्ती और कपिलवस्तु के बीच कहीं स्थित रही होगी। अत: स्मिथ का यह कथन कि सेतव्या ही श्रावस्ती थी, उचित नहीं प्रतीत होता। &lt;br /&gt;
==सहेत का उत्खनन==&lt;br /&gt;
‘सहेत’ जो कि प्राचीन जेतवन विहार था, एक अत्यंत प्राचीन और महत्त्वपूर्ण स्थल था। यह संपूर्ण क्षेत्र 457.2 X 152.4 मीटर विस्तृत क्षेत्र में फैला था। यह टीला मैदान से 16 फुट ऊँचाई पर स्थित था। इस पुरातात्त्विक स्थल पर बड़ी संख्या में छोटे-छोटे टीले मिले हैं। इन टीलों में 20 का उत्खनन कनिंघम ने करवाया था। श्री होवी ने भी सहेत का उत्खनन करवाया था, लेकिन किसी भी भवन का पूर्ण उत्खनन न होने से तत्कालीन इतिहास पर प्रकाश नहीं पड़ता।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट 1907-8), पृष्ठ 117&amp;lt;/ref&amp;gt; विभिन्न उत्खननों से सहेत का जेतवन से समीकरण निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है। बौद्ध-स्थल होने के कारण यहाँ विशेष रूप से मंदिर, स्तूप और विहार मिलते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख पुरातात्विक स्थल निम्नलिखित हैं-&lt;br /&gt;
==== मंदिर और मठ स्थल 19 ====&lt;br /&gt;
इसकी खोज सर्वप्रथम श्री होवी ने की थी।&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल आफ दि एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल, भाग 1, अतिरिक्त् संख्या 1892, प्लेट 5 &amp;lt;/ref&amp;gt; उन्होंने सतह से 3 फुट नीचे इस भवन के चारों तरफ खुदाई करवाई जिससे इस मंदिर के दो बार निर्मित होने की पुष्टि होती है। निर्माण संरचना से यह भवन 10वीं शताब्दी का प्रतीत होता है, परंतु कालांतर में फोगल की अध्यक्षता में इस क्षेत्र का पुन: उत्खनन प्रारंभ हुआ, जिससे यह ज्ञात हुआ कि यह जेतवन में स्थित एक विशाल भवन था, जिसका प्रवेश-द्वार पूर्व की ओर था। इस मठ में एक मंदिर भी था। आँगनयुक्त इस मठ में बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए 24 कमरे बने हुए थे।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-8, पृष्ठ 119 &amp;lt;/ref&amp;gt; इस संरचना का निर्माण तीन बार इसी नींव पर हुआ था। प्रारंभिक भवन का निर्माण, जिसकी दीवार पर स्पष्ट हैं, छठी शताब्दी में हुआ था और मध्यवर्ती भवन का निर्माण-गुप्त काल में हुआ था। इसका काल-निर्धारण दीवारों की निर्माण-पद्धति एवं एक कमरे से प्राप्त पकाई मिट्टी की मुहर से संभव हुआ। इस मुहर में बुद्ध को धर्मचक्र-प्रवर्तन मुद्रा में अंकित दिखाया गया है और नीचे गुप्त-लिपि में तीन पंक्तियाँ अंकित हैं। परवर्ती भवन इसी नींव पर 10वीं शताब्दी में निर्मित हुआ था। श्री होवी के उत्खनन से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। &lt;br /&gt;
;अन्य उत्खनित वस्तु&lt;br /&gt;
अन्य उत्खनित वस्तुओं में बुद्ध प्रतिमाओं की संख्या अधिक है। इनमें से एक प्रतिमा अविलोकितेश्वर व मैत्रेय के साथ भूमि स्पर्श मुद्रा में है। एक अन्य मूर्ति में भगवान् बुद्ध एक बंदर से कटोरा ग्रहण कर रहे हैं। यह दृश्य वैशाली की उस घटना का विवरण प्रस्तुत करता है। जिसमें बुद्ध एक बंदर से शहद ग्रहण करते हुए प्रदर्शित किए गए हैं। ये दोनों मूर्तियाँ 9वीं-10वीं शताब्दी की हैं। &lt;br /&gt;
;नवीनतम संरचना&lt;br /&gt;
इस स्थान पर नवीनतम संरचना 11वीं-12वीं शताब्दी में हुई, जो चौकोर है। इसका एक भाग 35.90 मीटर विस्तृत है। इसके आंतरिक भाग के बीच में एक खुला आँगन था, जिसके चारों ओर कक्ष बने हुए थे। कक्ष और आँगन के मध्य गलियारा भी था। इसमें बने कमरे छोटे आकार के हैं। एक कमरे में पश्चिमी दीदीवार ओर एक ईंट का बना 1.20 मीटर का चबूतरा था। यहीं एक कमरे से कन्नौज के शासक गोविंद्रचन्द्र गहड़वाल का लिखित ताम्रपत्र मिला है।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स (कलकत्ता, प्रथम संस्करण, 1971), पृष्ठ 77 &amp;lt;/ref&amp;gt; इन महत्त्वपूर्ण सूचनाओं से जेतवन की सहेत से समानता निश्चित हो जाती है। साथ ही इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव 12वीं शताब्दी तक स्थाई रहा।&lt;br /&gt;
;स्तूप &lt;br /&gt;
मठ के समीपवर्ती पूर्व और उत्तर-पूर्व कई स्तूपों का निर्माण हुआ, जिनमें आठ स्तूप मुख्य है। इनमें से एक स्तूप का नवीनीकरण दयाराम साहनी द्वारा किया गया यहाँ से 5वीं शताब्दी की एक लिपियुक्त मुहर मिली है जिस पर बुद्धदेव का नाम अंकित है। इन स्तूपों के उत्तर-पश्चिम एक अष्टभुजीय कुआँ स्थित था, जो आज भी वर्तमान है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-8, पृष्ठ 120 &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मंदिर स्थल 11 और 12====&lt;br /&gt;
ये दोनों भवन एक समान थे। इनका प्रवेश-द्वार उत्तराभिमुख था। प्रत्येक मंदिर एक केंद्रीय कक्ष से युक्त था जो अंदर से 2.10 मीटर (7 फुट) चौकोर क्षेत्र में विस्तृत था। इस कक्ष में एक 6 इंच ऊँचा ईंटों का चबूतरा था। मंदिर के दोनों किनारे के कक्ष अपेक्षाकृत बड़े थे, जिनकी भीतरी लंबाई-चौड़ाई 10 फुट X 9 फुट थी। केंद्रीय कक्ष की बनावट से ऐसा प्रतीत होता है कि उसमें बुद्ध प्रतिमा स्थापित रही होगी और किनारे के कमरों में अन्य देवताओं की प्रतिमाएँ स्थापित रही होंगी। कनिंघम का मत है कि मध्य का कमरा बुद्ध प्रतिमा से युक्त रहा होगा और किनारे के कमरे बौद्ध-भिक्षुओं के आवासगृह रहे होंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, 1907-8, पृष्ठ 121&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
मंदिर स्थल 6 और 7 : अष्टभुजीय कुएँ के उत्तर दो मंदिरों के अवशेष मिले है। इनमें से मंदिर स्थल 6 का प्रवेश-द्वार उत्तर की ओर है, जबकि मंदिर स्थल 7 का प्रवेश-द्वार पूर्व की तरफ है। मंदिर स्थल-अपेक्षाकृत बड़ा है जो कि एक 3.60 मीटर वर्गाकार कमरे से युक्त् था। इस मंदिर में प्रयुक्त ईंटें बड़े आकार की हैं, जिससे संभावना है कि यह मंदिर जेतवन के प्राचीन मंदिरों में से एक था। &lt;br /&gt;
====स्तूप स्थल 17 और 18====&lt;br /&gt;
पूर्व उल्लिखित मंदिर के पूर्व में दो स्तूप थे जिन्हें स्तूप 17 और 18 नाम दिया गया है। स्तूप स्थल 17 का मूल वर्गाकार है, उसके ऊपर वृत्ताकार अंड है। इसका व्यास 6.70 मीटर था। यह भाग बाद में जोड़ा गया प्रतीत होता है। प्रारंभिक अधिष्ठान 60 सेन्टीमीटर ऊँचा था, जो कुषाणकालीन (प्रथम शती ई.) है। स्तूप का अधोभाग कंकरीट फर्श के सतह से नीचे खुला नहीं था, लेकिन इस सरंचना की गहराई को ज्ञात करने के लिए स्तूप को शीर्ष पर खोल दिया गया तथा परवर्ती स्तर की सतह से लगभग 2.10 मीटर नीचे मध्यभाग में एक दंड गाड़ दिया गया। इस स्तूप के गर्भ में एक धातु-पात्र मिला है, जिसमें सोने के तार, मनके एवं स्फटिकतुल्य वस्तुएँ थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स (कलकत्ता, प्रथम संस्करण, 1971 ई.) पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt; ये सभी वस्तुएँ तथा सतह के नीचे की संरचना कुषाणकालीन (प्रथम शती ई.) है। &lt;br /&gt;
====स्तूप स्थल 18====&lt;br /&gt;
इसका समीपवर्ती स्तूप स्थल 18 अपेक्षाकृत छोटा है। इसके अंड का व्यास 4.20 मीटर (14 फुट) है। उत्खनन में इस स्तूप के गर्भ से भी एक अभिलिखित मिट्टी का कटोरा मिला है, जिसमें हड्डियों के टुकड़े, पत्थर के मनके एवं मोतियाँ थीं। कटोर पर कुषाण-लिपि में ‘भदंत बुद्धदेव’ लिखा ह। इस स्तूप का निर्माण भी कुषाण-काल में हुआ था, इस मंदिर सम्मुख दो चबूतरों के अवशेष भी मिलें हैं। इन चबूतरों (चंक्रम) का निर्माण उसी स्थान पर किया गया है जहाँ बुद्ध टहलते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्तूप स्थल 5====&lt;br /&gt;
जेतवन विहार में स्थित यह एक महत्त्वपूर्ण स्तूप था, जो 9.10 मीटर ऊँचा शंक्वाकार टीले से ढका था। इसका उत्खनन सर्वप्रथम कनिंघम ने करवाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे रिपोर्ट, भाग 11, पृष्ठ 88&amp;lt;/ref&amp;gt; इस स्तूप के ऊपर का भाग गोलार्द्धीय स्तूप की भाँति था, जिसकी नीचे एक चौकोर कक्ष था। यह संरचना ठोस ईंटों से निर्मित थी। इसकी प्रत्येक भुजा की लंबाई 7.50 मीटर थी। स्तूप की सफाई करते समय इसके तल में दो चबूतरों का पता चला। निचला चबूतरा 24.90 X 21.30 मीटर चौड़ा था। एक अन्य परवर्ती चबूतरे के अवशेष भी मिले हैं जो 17.80 X 15 मीटर चौड़ा था। इसमें प्रयुक्त ईंटें 11 X 7&amp;lt;sup&amp;gt;1/2&amp;lt;/sup&amp;gt; X 2 इंच आकार की हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-8, पृष्ठ 122&amp;lt;/ref&amp;gt; निरीक्षण करने पर पता चला कि इसकी पूर्वी दीवार में प्रवेश-द्वार के चिन्ह थे, जिससे यह निश्चित हो गया कि वास्तव में यह एक प्रदक्षिणा पथयुक्त स्तूप था, किंतु बाद में इसे पूजागृह (मंदिर) बना दिया गया तथा कालांतर में इसके प्रवेश द्वार को बंद करके इसे स्तूप रूप में परिवर्तित कर दिया गया।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स, पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रारंभिक प्रदक्षिणा पथ युक्त स्तूप कुषाणकालीन प्रतीत होता है। जेतवन में यह सबसे लंबा स्तूप है। उत्खनन में यहाँ से कुछ मिट्टी की मुहरें भी मिली हैं, जो बुद्ध के जीवनकालीन चिन्हों से युक्त है। स्तूप के ऊपरी भाग से प्राप्त वस्तुएँ 8 वीं-10वीं शताब्दी की हैं, जो परवर्ती स्तूप निर्माण का काल-क्रम निश्चित करती हैं। &lt;br /&gt;
====मंदिर और मठ स्थल 1====&lt;br /&gt;
इस मंदिर की अंशत: खुदाई कनिंघम ने करवाई थी। इस मठ के अवशेष अब भी द्रष्टव्य हैं। इसकी पूर्व से पश्चिम लंबाई 150 फुट तथा चौड़ाई 142 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; फुट है। जेतवन में स्थित यह एक बड़ा विहार है। जो उत्तर किनारे पर स्थित है। पूर्वाभिमुख इस मठ में एक मंदिर और और मंडपयुक्त आँगन भी था। सामान्य योजना के आधार पर निर्मित इस मठ के मध्य में आँगन में एक कुएँ के अवशेष भी मिले है। पूर्वी पंक्ति का कंद्रीय कक्ष अन्य सभी कक्षों में बड़ा था। ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी छत महाकक्ष (हाल) के मध्य स्थित चार स्तंभों पर आधारित थी। इन स्तंभों के आधार पर प्रयुक्त ईंटों के केवल अवशेष मात्र ही द्रष्टव्य हैं। बरामदे में प्रयुक्त खंभे संभवत: लकड़ी के बने थे। आँगन और कक्षों की फर्श में कंकरीट का प्रयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मठ में मंदिर और मंडप बने होने के कारण यह मठ संख्या 19 से भिन्न था। मंदिर मे प्रयुक्त ईंटें कई आकार की है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, वार्षिक रिपोर्ट, 1907-08, पृष्ठ 125&amp;lt;/ref&amp;gt; यथा-13 इंच X 7इंच X 2 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच, 10 इंच X 10 इंच X 2 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच X 9 इंच X 7 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच X 1 &amp;lt;sup&amp;gt;¾&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच। मंडप स्थल के बाहरी भाग में एक ढलावदार बरामदा बना था। उपासना स्थल को जाने वाले पथ एवं मंडप के मध्य यह बरामदा अंतराक्षेप स्वरूप स्थित था।&lt;br /&gt;
==== मंदिर स्थल 2 ====&lt;br /&gt;
मंदिर स्थल 3 से 61 मीटर उत्तर में यह मंदिर स्थित था। इसका उत्खनन सर्वप्रथम कनिंघम ने करवाया और स्थिति के आधार पर इसे गंधकुटी से समीकृत किया।&amp;lt;ref&amp;gt;कनिंघम, आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, भाग 11, पृष्ठ 84&amp;lt;/ref&amp;gt; कनिंघम के पश्चात श्री होवी ने इस स्थल का उत्खनन किया। होवी ने सर्वप्रथम प्रवेश-कक्ष का पता लगाया और मंदिर के चारों तरफ के कंकरीट, फर्श और चहारदीवारी को स्पष्ट किया। इस चहारदीवारी की लंबाई पूर्व से पश्चिम 115 फुट तथा चौड़ाई एवं मोटाई क्रमश: 39 फुट और 8 फुट थी। दक्षिण और पश्चिमी तरफ से कंकरीट फर्श को हटाने पर होवी को नीचे अधिष्ठान के अवशेष मिले। इस अधिष्ठान की लंबाई एवं चौड़ाई क्रमश: 75 फुट एवं 57 फुट थी। अधिष्ठान के पूर्वी किनारे पर 15 फुट 6 इंच गहरा एवं 12 फुट चौड़ा एक प्रक्षेपण है, जो दो कक्षों में विभाजित है। ये कक्ष आपस में संबंधित नहीं हैं, अधिक संभव है कि ये सीढ़ियों से युक्त रहे हों। इस अधिष्ठान की वर्तमान ऊँचाई 7 फुट से अधिक नहीं है। &lt;br /&gt;
;गंधकुटी &lt;br /&gt;
फोगल ने कनिंघम के मत का खंडन करते हुए इस स्थान को गंधकुटी से समीकृत करने में आपत्ति की है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि उन दिनों बुद्ध के जीवन से संबंधित स्थलों पर गंधकुटी का निर्माण होता था, तो क्या कारण है कि उत्खनन में किसी भी स्थल से इसके अवशेष नहीं मिलते? साथ ही गंधकुटी से संबंधित स्थापत्य-कला का भी कोई उदाहरण ज्ञात नहीं हो पाया है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 123-124 &amp;lt;/ref&amp;gt; भरहुत स्तूप&amp;lt;ref&amp;gt;बरुआ, भरहुत, भाग 2, पृष्ठ 31; रीज डेविड्स बुद्धिस्ट इंडिया, चित्र संख्या-23 &amp;lt;/ref&amp;gt; में चित्रित गंधकुटी के अग्र उत्सेध का ही चित्रण किया गया है। जिससे इस भवन की निर्माण योजना एवं रूपाँकन के संदर्भ में निष्कर्ष निकालना कठिन है। अत: हमें केवल पालि साहित्य में वर्णित उद्धरणों पर ही विश्वास करना चाहिए। गन्धकुटी के सन्दर्भ में एच.सी.नार्मन&amp;lt;ref&amp;gt;	आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 124 &amp;lt;/ref&amp;gt; ने एक निबंध प्रकाशित कर तीन मुख्य बातों पर जो दिया है-&lt;br /&gt;
*यह बुद्ध का व्यक्तिगत निवास-स्थान था। &lt;br /&gt;
*यह स्मारकों के मध्य में स्थित होता था।&amp;lt;ref&amp;gt;जातकों में भी गंधकुटी को मध्य में स्थित बतलाया गया है- 	‘सो मज्झे गंधकुटी कारेसि’, जातक, खंड 1, पृष्ठ 92&amp;lt;/ref&amp;gt; इस पर चढ़ने के लिए एक सीढ़ी बनी होती थी। &lt;br /&gt;
*इस मंदिर में पुष्पों का संग्रह होता था, जो अपने सुगंध के नामानुरूप थी। &lt;br /&gt;
उपर्युक्त मत पर विचार करने से गंधकुटी का स्मारकों के मध्य स्थित होना निश्चित हो जाता है जबकि यह उत्खनित स्थल मध्य में स्थित नहीं था।&amp;lt;ref&amp;gt;भारतवर्ष में किसी भी बुद्धकालीन स्थल से इस प्रकार के भवन मध्य में नहीं मिलते। भवन संख्या 1 को संभवत: इस वर्णन के आधार पर गंधकुटी से समीकृत किया जा सकता है। &amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक काल का प्रश्न है यह मंदिर गुप्त काल से पूर्ववर्ती नहीं है। अत: उपर्युक्त आधार पर मंदिर स्थल 2 का गंधकुटी से समीकरण उचित नहीं प्रतीत होता। &lt;br /&gt;
====मंदिर स्थल 3====&lt;br /&gt;
इस मंदिर का भी उत्खनन सर्वप्रथम कनिंघम ने ही किया था। पूर्वाभिमुख यह मंदिर बोधिवृक्ष से 76.20 मीटर दूरी पर स्थित है। यह वहीं स्थित है जहाँ अनाथपिंडक ने कोसंबकुट्टी का निर्माण कराया था। कनिंघम ने भी इसकी पहचान कोसंबकुट्टी से की है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 122&amp;lt;/ref&amp;gt; इस कोसम्बकुट्टी का उपयोग बुद्ध के व्यक्तिगत कार्यों के लिये किया जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबकुट्टी का वर्णन साहित्य में भी मिलता है, देखें, सुमंगलविलासिनी, भाग 2, पृष्ठ 407&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन में यहाँ से बोधिसत्व की एक प्रतिमा भी मिली जिस पर प्रथम शताब्दी ई. की लिपि में लेख अंकित है। विश्वास किया जाता है। कि यह प्रतिमा कोसंबकुट्टी में बल नामक भिक्षु द्वारा कुषाण काल में स्थापित की गई थी। &lt;br /&gt;
;मंदिर स्थल 3 का परिमाण &lt;br /&gt;
इस मंदिर का परिमाण 5.75 X 5.45 मीटर क्षेत्र में था। इस परिमाण के अंदर तहखाना, मंदिर की दीवारें और मंडप स्थित थे। मंदिर की भीतरी परिधि 2.45 मीटर चौकोर थी और इसकी दीवारें 1.20 मीटर मोटी थीं। इस मंदिर के दक्षिण-पूर्व और उत्तर-पूर्व में ठोस ईंटों के बने दो चबूतरे (चंक्रम) थे। इस पर चढ़ने के लिए बीच से सीढ़ियाँ बनी थीं। दक्षिण-पूर्व वाला चबूतरा 10 फुट चोड़ा और 4 फुट ऊँचा था। पूर्व की ओर इसकी लंबाई 53 फुट थी। उत्तर-पूर्व वाले चबूतरे की लंबाई पश्चिम से पूर्व 61 फुट और चौड़ाई 5 फुट थी। मंदिर के अत्यंत समीप स्थित होने के कारण अभिलेख में वर्णित चंक्रम से इसकी समता स्थापित की जा सकती है।&amp;lt;ref&amp;gt;एम. वेंकटरम्मैया, श्रावस्ती, पृष्ठ 18&amp;lt;/ref&amp;gt; एक अन्य चंक्रम अवशेष बोधगया के महाबेधि मंदिर से मिले थे। बोधगया से प्राप्त चंक्रम छायादार थी। &lt;br /&gt;
;मंदिर स्थल 3 का उत्खनन&lt;br /&gt;
उत्खनन से प्राप्त बौद्ध-प्रतिमा पर अंकित कुषाण लिपि में&amp;lt;ref&amp;gt;एपिग्राफिया एंडिका, भाग 8 पृष्ठ 180-181&amp;lt;/ref&amp;gt; चंक्रम का वर्णन है जिसकी खोज कनिंघम ने की थी, परंतु यह निश्चित नहीं कि यह तथागत के टहलने के लिए बना वास्तविक कोसंबकुट्टी का चंक्रम था। कोशंबकुट्टी नामक यह भवन श्रावस्ती के दो प्रमुख भवनों में एक था। यह प्राय: असंभव प्रतीत होता है कि इन भवनों के विनाश के पश्चात् बुद्ध की उपासना स्थल के लिए किसी और स्थान का चुनाव किया गया हो। अत: पालि-साहित्य में वर्णित कोशंबकुट्टी तथा उत्खनन में प्राप्त इस स्थल के समीकरण में किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाता। &lt;br /&gt;
==महेत का उत्खनन==&lt;br /&gt;
महेत का समीकरण प्राचीन श्रावस्ती से किया गया है। कनिंघम ने इसकी परिधि का विस्तार 17300 फुट निर्धारित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम , ऐंश्येंट ज्योग्राफी आफ इंडिया, पृष्ठ 346&amp;lt;/ref&amp;gt; फोगल ने श्रावस्ती नगर का घेरा 17250 फुट तथा संपूर्ण क्षेत्रफल 40.773 एकड़ निश्चित किया है। इस नगर में ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर 12 वीं शताब्दी के बीच निरंतर परिवर्तन होते रहे। चीनी चात्रियों ने इस नगर को परित्यक्त एवं निर्जन पाया। कोशल राज्य के पतन के पश्चात इस नगर का क्रमश: ह्रास होता गया। अत: श्रावस्ती नगर के विस्तार का कभी मौक़ा नहीं मिल पाया। इस नगर का पूर्ण विनाश 12 वीं शताब्दी ई. में [[मुसलमान|मुसलमानों]] द्वारा किया गया। इस प्रकार फोगल द्वारा उल्लिखित वर्तमान महेत का 17250 फुट का घेरा श्रावस्ती की प्राचीन सीमा से बढ़ा हुआ नहीं प्रतीत होता। &lt;br /&gt;
====विस्तार और विन्यास====&lt;br /&gt;
विस्तार और विन्यास की दृष्टि से महेत प्राचीन नगर का एक प्रमुख स्थल था। नगर का बाहरी विस्तार मिट्टी की प्राचीरों से परिवेष्टित था। प्राचीरों की ऊँचाई एक समान नहीं है। पश्चिम ओर की प्राचीरें 35 से 40 फुट ऊँची है, जबकि दक्षिण और पूर्व की प्राचीरों की ऊँचाई 25 फुट से 30 फुट है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 84&amp;lt;/ref&amp;gt; उन्नीसवीं शताब्दी संपूर्ण क्षेत्र वनों से आच्छादित था। प्राचीरों के बीच-बीच में खुला भाग था, जिन्हें लोग दरवाजा कहते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ऐसा प्रतीत होता है कि चार दरवाजों (पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण) को छोड़कर प्रवेश के लिए प्रयुक्त होने वाले ये वास्तविक दरवाजे नहीं थे। वरन समय-समय पर नागरिकों द्वारा सुविधानुसार बनाए गए स्थानापन्न दरवाजे थे। &amp;lt;/ref&amp;gt; इस तरह के दरवाजों की संख्या अट्ठाइस है, जिसमें फोगल ने ग्यारह को ही दरवाजा माना है। जिनमें से उत्तर और पूर्व की ओर एक-एक, दक्षिण की ओर चार और पश्चिम की ओर पाँच दरवाजे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त दरवाजों में से कुछ का नामकरण उसकी स्थिति के आधार पर किया गया है। उदाहरणार्थ- एक दरवाजा पिपरहवा के नाम से जाना जाता है। इसका नामकरण प्राचीर के आस-पास एक विशेष प्रकार के वृक्ष (पीपल) के उगने के कारण हुआ था। अन्य मुख्य दरवाजों में गंगापुर, बंकी, गेलही, नौसहरा, काँदभारी एवं बाज़ार दरवाजे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 85-90&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन में इस स्थल से कच्ची कुटी, पक्की कुटी एवं शोभनाथ मंदिर के अवशेष मिले हैं। इन स्थलों से प्राप्त वस्तुओं में मृण्मूतियाँ, मृण्भांड, मुहरें, प्रतिमाएँ एवं लोहे के उपकरण भी हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====कच्ची कुटी====&lt;br /&gt;
कच्ची कुटी का उत्खनन सर्वप्रथम होवी ने किया था। तत्पश्चात फोगल ने इस खंडहर से विभिन्न काल की संरचनाओं का पता लगाया। उत्खनन के समय फोगल को टीले के ऊपरी हिस्से में आधुनिक काल का एक ईंटों का मंदिर मिला था। जिसकी उत्तरी और पश्चिमी दीवारे अब भी विद्यमान हैं। अन्य दोनों किनारे (पूर्वी औ उत्तरी) कच्ची चिनाई से पुनर्निर्मित हैं, जिसका निर्माण वहाँ निवास करने वाले किसी महात्मा ने करवाया था। इसी महात्मा ने पूर्ववर्ती चिनाई को खुदवाकर मंदिर का भी निर्माण करवाया था। इस वर्तमान मंदिर का प्रवेश-द्वार पूर्व तरफ से है। पूर्ववर्ती मंदिर का वास्तविक द्वार पश्चिम तरफ से था, जिसे यहाँ निवास करने वाले किसी साधु ने एक बड़े पत्थर से बंद कर दिया था। यह पत्थर (3 फुट 6 इंच X 1 फुट 6 इंच X 7 ½ फुट) एक मूर्ति की पीठिका प्रतीत होती है। संभव है यह पीठिका एवं मूर्ति पहले इसी मंदिर में स्थापित रही हों।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 91&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;कच्ची कुटी का उत्खनन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्खनन में फोगल को यहाँ से कुछ पत्थर के टुकड़े मिले थे, जो निश्चित रूप से किसी प्रतिमा के खंडित अंश हैं। यद्यपि ये टुकड़े इतने छोटे हैं कि इनको मिलाकर किसी प्रतिमा का प्रारूप तैयार करना कठिन है; फिर भी यह तो लगभग निश्चित है कि परवर्ती काल में निर्मित यह मंदिर जिसके खंडहर अभी भी वर्तमान हैं, एक प्रस्तर प्रतिमा से युक्त रहा होगा। &lt;br /&gt;
;अधिष्ठान &lt;br /&gt;
इस मंदिर का अधिष्ठान (नींव) अत्यंत प्राचीन है, जिसका विस्तार पूर्व से पश्चिम 105 फुट तथा उत्तर से दक्षिण 72 फुट था। मंदिर में पहुँचने के लिए पश्चिम तरफ से 45 फुट लंबी और 14 फुट 5 इंच चौड़ी सीढ़ियाँ बनी थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 92&amp;lt;/ref&amp;gt; मंदिर के आयताकार अधिष्ठान (नींव) का प्रत्येक किनारा 18 फुट से 19 फुट के प्रक्षेपण से युक्त था। इसका उत्तरी-पूर्वी किनारा पुनर्निर्मित है। 14 फुट ऊँची उत्तरी दीवारें अभी भी सुरक्षित हैं। इस दीवार का ऊपरी भाग अनलंकृत ईंटों से निर्मित भित्तिस्तंभ की पंक्तियों से सुसज्जित है, जिनमें 11 इंच विस्तृत निमग्नफलक आपस में 3 फुट 10 इंच की दूरी पर बने हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसमें प्रयुक्त ईंटें भिन्न आकारों की हैं। सबसे निचली परतों में डिनेटेड ईंटों का प्रयोग मिलता है। इसके ऊपर की परतों में गोलाकार ईंटों का प्रयोग मिलता है। कार्निश के नीचे 6 से 8 फुट की दूरी पर वीप-होल्स की कतारें भी मिली हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री होवी ने कच्ची कुटी के उत्खनन में दक्षिण और उत्तरी ओर की दीवारों के नींच की खुदाई करके दो कक्षों का पता लगाया।&amp;lt;ref&amp;gt;होवी ने इन दोनों कक्षों को ‘ए’ और ‘बी’ नामों से अभिहित किया है। &amp;lt;/ref&amp;gt; ये दोनों कक्ष आकार में आयताकार थे जो ऊँची ईंटों की दीवारों से परिवेष्टित थें निर्माण संरचना के आधार पर फोगल ने इन कक्षों को आवास-गृह नहीं माना है। कच्ची कुटी से नौशहरा और काँदभारी दरवाजों की ओर दो रास्ते जाते थे। &lt;br /&gt;
उत्खनन में यहाँ से फोगल को 356 मृण्मूर्तियाँ एवं कुछ प्रस्तर प्रतिमाएँ मिली थी।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 95&amp;lt;/ref&amp;gt; इसमें से अधिकांश मूर्तियाँ खंडित हैं अन्य वस्तुओं में मिट्टी की मुहरें, मृण्भांड एवं लोहे के उपकरण उल्लेखनीय हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शोभनाथ का मंदिर====&lt;br /&gt;
शोभनाथ का मंदिर महेत के पश्चिम में स्थित है। इस मंदिर का शोभनाथ नाम तीसवें [[तीर्थंकर]] संभवनाथ के नाम पर पड़ा। विश्वास किया जाता है कि जैनियों के तीसरे तीर्थकर संभवनाथ का जन्म श्रावस्ती में ही हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;देखें; व्यूहलर और बर्गेस ‘दि इंडियन सेक्ट जैनाज, (लंदन 1903) पृष्ठ 67 &amp;lt;/ref&amp;gt; श्री होवी ने सर्वप्रथम यहाँ 1824-25 और 1875-76 में सीमित उत्खनन करवाया था लेकिन उत्खनन से प्राप्त विवरण अत्यंत संक्षिप्त एवं संदिग्ध है। &lt;br /&gt;
;शोभनाथ के मंदिर का उत्खनन&lt;br /&gt;
उत्खनन से पता चलता है कि इस मंदिर का पूर्वी किनारा पूर्व से पश्चिम 59 फुट व उत्तर से दक्षिण 49 फुट हे। यह खंडित ईंटों से निर्मित एक दीवार (8 ½ फुट X 1 फुट) से घिरा है। एक पूरी ईंट की नाम 12 इंच X 7 इंच X 2 इंच है। चिनाई में काफ़ी संख्या में छोटी नक्कशीदार ईंटे प्रयुक्त हुई थीं। संभवत: ये नक़्क़ाशीदार ईंटें किसी पुरानी संरचना से ली गई थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आँगन को घेरने वाली दीवार की ऊँचाई को बाहर की तरफ 4 फुट 6 इंच तथा अंदर फर्श की तरह से 2 से 3 फुट की ऊँचाई तक ही सीमित रखा गया है। आँगन में पूर्व की तरफ से सीढ़ियों के माध्यम से प्रवेश किया जा सकता है। जिनकी लंबाई 23 फुट 6 इंच तथा चौड़ाई 12 फुट 6 इंच है तथा जो नीचे की तरफ घुमावदार बनाई गई हैं। उल्लेखनीय है कि इस तरह की नक़्क़ाशीदार ईंटें अन्य खंडहरों से भी मिली हैं। उत्खनन से यह ज्ञात होता है कि ये सीढ़ियाँ बाहरी आँगन में बनी हुई हैं जो 50 फुट चौड़ा तथा अंदर के आँगन के फर्श की तरह से 5 फुट नीचे है। इस निचली सतह से यह शीघ्रता से अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि बाहरी आँगन जिसकी अंशत: खुदाई हुई थी, पूर्ववर्ती काल से सम्बन्धित है। इसके विपरीत यह एक प्राभाविक रूप से परवर्ती परिवर्धन है क्योंकि इसकी दीवारों का निर्माण अंदर के आँगन की दीवारों पर किया गया है। सतह में अंतर संभवत: इस परिस्थिति के कारण होता है क्योंकि अंदर का पश्चिमी आँगन, पहले के अवशेषों पर निर्मित है, लेकिन इस तथ्य की पुष्टि अभी उत्खनन से नहीं हो सकी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभनाथ मंदिर का ऊपरी भाग एक गुम्बदाकार इमारत है, जो प्रत्यक्ष रूप में पठान युग के मुसलमानी मक़बरा जैसी प्रतीत होती है। यह मंदिर सन 1885 में पूर्व सुरक्षित था लेकिन श्री होवी के उत्खनन के समय से तथा उसके कारण वह आंशिक रूप से जीर्ण-शीर्ण हो गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, वार्षिक रिपोर्ट, 1907-08, पृष्ठ 114&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पक्की कुटी====&lt;br /&gt;
‘महेत’ में स्थित पक्की कुटी एक महत्त्वपूर्ण स्थल है जो कच्ची कुटी से उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसका आधुनिक नाम यहाँ निवास करने वाले किसी फ़कीर (साधु) के निवास-स्थान के कारण पड़ा। [[कनिंघम]] ने इसे चीनी यात्रियों के अंगुलिमाल स्तूप से समीकृत किया है। इस खंडहर की आंशिक खुदाई श्री होवी ने की थी। कालांतर में फोगल ने इस क्षेत्र का उत्खनन करवाया जिससे ज्ञात हुआ कि इसका आकार चतुष्कोणीय था। इसका उत्तर से दक्षिण विस्तार 120 फुट तथा पूर्व से पश्चिम 77 फुट 8 इंच था। इस कुटी के पूर्वी किनारे का उत्खनन अभी नहीं हो पाया है। संभव है कि इस भवन का विस्तार और आगे तक रहा हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कुटी की आंतरिक संरचना में अनियमित ढंग की दीवारें तथा आयताकार एवं वर्गाकार कक्ष मिले हैं। इन कक्षों में दरवाजों एवं खिड़कियों का अभाव इस तथ्य का साक्षी है कि इस संरचना का प्रयोग आवासगृह के रूप में नहीं हो होता था। वस्तुत: यह एक स्तूप था। उत्खनन में इस स्थल से कोई भी ऐसी वस्तु नहीं मिली है, जिससे इसकी बुद्धकालीन विहार की सूचना को प्रश्रय मिले। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टीले के केंद्र में वक्राकार दीवारें भी मिली हैं। श्री होवी ने उत्खनन करते समय इस कुटी के मध्य भाग में दक्षिण से उत्तर की ओर एक सुरंग बना दी ताकि [[वर्षा]] से इस टीले की रक्षा हो सके। होवी की भूमि की सतह पर विभाजक दीवारों के भी अवशेष मिले हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्खनन में पक्की कुटी से ऐसी कोई वस्तु नहीं मिली, जिससे उसकी धार्मिकता प्रामाणित हो सके। चीनी यात्रियों के यात्रा विवरणों में उल्लिखत प्राचीन न्यायालय कक्ष की संरचना को होवी पक्की कुटी से समीकृत करते हैं। होवी इस संरचना को परवर्ती काल की पुनर्निर्मित संरचना मानते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स, पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====स्तूप ‘ए’====&lt;br /&gt;
इस स्तूप को श्री होवी ने [[ह्वेनसांग]] द्वारा वर्णित अंगुलिमाल स्तूप से समीकृत किया है। यह पक्की कुटी से पूर्व में और कच्ची कुटी से उत्तर-पूर्व में स्थित था। होवी ने 9 फुट की परिधि में 30 इंच तक नीचे खुदाई की और पाया कि इसका आंतरिक भाग ठोस है। स्तूप के ऊपर का अंड 20 फुट परिधि में विस्तृत था। इसमें प्रयुक्त ईंटें कई आकार की हैं। सबसे बड़ी ईंटें 12 ½ इंच X 9 इंच X 2 ½ इंच आकार की हैं। इस स्तूप के बाहरी स्थल का उत्खनन फोगल ने 8 फुट नीचे तक करवाया था। इसका निचला अधिष्ठान एक आयताकार चबूतरे (72 फुट X 45 फुट) से युक्त था, जिसके पूर्व में सीढ़ियाँ थीं। ये सीढ़ियाँ 22 फुट लंबी और 14 फुट चौड़ी थीं, जो कच्ची कुटी और शोभनाथ मंदिर में प्रयुक्त सीढ़ियों के सदृश थीं। उत्तरी ओर का चबूतरा सुरक्षित था जिसकी ऊँचाई 4 फुट थी। यहाँ से प्राप्त अधिकांश ईंटें खंडित हैं। वैसे सामान्यतया ईंटों की माप 12 ½ इंच X 9 इंच X 2 ½ इंच है। चिनाई में नक़्क़ाशीदार ईंटों का सर्वथा अभाव मिलता हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 110&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
; स्तूप ‘ए’ का उत्खनन &lt;br /&gt;
कच्ची कुटी के द्वार से स्तूप की दिशा में फोगल ने 6 ½ फुट विस्तृत एक [[खत्ती]] खुदवाई थी। यहाँ से उन्हें एक निचली संरचना के अवशेष मिले थे। इस संरचना में प्रयुक्त ईंटों को चार परतों का भी पता चलता है। उत्खनन में बड़ी संख्या में छोटे मृण्भांड एवं कुछ मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|खत्ती}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;स्तूप ‘ए’ का वैज्ञानिक उत्खनन&lt;br /&gt;
श्रावस्ती का वैज्ञानिक उत्खनन 1959-60 ई. में श्री कृष्ण कुमार सिनहा द्वारा किया गया, &amp;lt;ref&amp;gt;कृष्ण कुमार सिनहा, एक्सकैवेशंस ऐट श्रावस्ती, (वाराणसी, 1967&amp;lt;/ref&amp;gt; जिससे यहाँ की दुर्ग संरचना तथा सुरक्षात्मक दीवार के काल-क्रम पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ा है। इनके उत्खनन से ज्ञात हुआ कि श्रावस्ती का विकास तीन कालों में हुआ था। इन कालों में यहाँ से प्राप्त वस्तुओं तथा निर्माण प्रक्रिया में अंतर दृष्टिगत होता है। &lt;br /&gt;
;प्रथम काल&lt;br /&gt;
प्रथम काल में नगर की बाहरी दीवारों का निर्माण नहीं हुआ था। उल्लेखनीय है परवर्ती काल में बाहरी दीवारें मिलती हैं। इस काल के मृण्भांड विकसित परंपरा में मिलते हैं। यहाँ से उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृण्भांड बड़ी संख्या से प्राप्त हुए हैं। यहाँ से प्राप्त कुछ मृण्भांड 600 ई. पू. के एथेनियन कलशों के समान हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;रोचक हैं कि इस तरह के मृण्भांड भारत के अन्य स्थलों से नहीं मिले हैं। &amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार के मृण्भांडों को विस्तार [[भारत]]-[[पाकिस्तान]] उपमहाद्वीपीय क्षेत्र में मिलता है। इसके अतिरिक्त शीशे की पारभाषी चूड़ियाँ भी मिली हैं। [[धातु]] के रूप में इस समय मुख्यत: [[ताँबा|ताँबे]] का ही प्रयोग किया जाता था, तथापि [[लोहा|लोहे]] का प्रचलन भी हो चुका था। ताँबे का प्रयोग मुख्य रूप से गृहस्थी के सामानों एवम आभूषणों के रूप में किया जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;कृष्ण कुमार सिनहा, एक्सकैवेशंस ऐट श्रावस्ती, पृष्ठ 9&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
;द्वितीय काल&lt;br /&gt;
यद्यपि प्रथम काल के अंत तथा द्वितीय काल के प्रारंभ में समय की दृष्टि से कोई विशेष अंतर नहीं है तथापि दोनों की निर्मित वस्तुओं में पर्याप्त भिन्नता दिखाई देती है। द्वितीय काल में लोहे का उपयोग प्रचुरता से मिलता है। साथ ही अस्थिनिर्मित वाणाग्र भी बड़ी संख्या में मिले हैं। इस काल की मुख्य विशेषता दुर्ग-संरचना है। मुख्य प्राचीरों के परवर्ती कालों में विस्तृत रूप से समान अंतराल पर बने दुर्ग एवम इनकी दीवारें नगर के विकास-क्रम को सिद्ध करती है। श्रावस्ती की नगरीय दीवारों की संरचना की तुलना [[कौटिल्य]] के [[अर्थशास्त्र]] में उल्लिखित दुर्ग-संरचना से की जा सकती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अर्थशास्त्र (आर. शामशास्त्री संस्करण), मैसूर 1919, अध्याय 2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रावस्ती के इस सीमित क्षेत्र के उत्खनन से सुरक्षा प्राचीरों पर पूर्णत: प्रकाश नहीं पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन रक्षा-प्राचीरों का निर्माण हिन्द-[[यवन]] राजाओं के आक्रमण के सुरक्षार्थ किया गया था। यह घटना [[मौर्यवंश]] के पतन के पश्चात स्थानीय राज्यों के अभ्युदय के समकालिक है। द्वितीय काल में निर्मित मकानों में मिट्टी के गारे से युक्त पकी ईंटों का प्रयोग मिलता है। इस काल की निर्माण संरचना की तीन अवस्थाएँ दृष्टिगत होती हैं। श्री सिनहा&amp;lt;ref&amp;gt;कृष्ण कुमार सिनहा, एक्सकैवेशन्स ऐट श्रावस्ती, (वाराणसी, 1967), पृष्ठ 12 &amp;lt;/ref&amp;gt; ने इन तीनों प्रावस्थाओं का काल-क्रम निम्नलिखित रूप से निर्धारित किया है-&lt;br /&gt;
#प्रारम्भिक प्रावस्था – 275 ई. पू. से 200 ई. पू.&lt;br /&gt;
#मध्यवर्ती प्रावस्था – 200 ई. पू. से 125 ई. पू.&lt;br /&gt;
#परवर्ती प्रावस्था – 125 ई. पू. से 50 ई. पू.।&lt;br /&gt;
;तृतीय काल&lt;br /&gt;
उत्खनन से तृतीय काल के अवशेष अत्यंत सीमित क्षेत्र से मिले हैं, इससे यह प्रतीत होता है कि इस समय यह नगर विनष्ट हो चुका था। उत्खनन से परवर्ती काल में निर्मित कुछ संरचनाओं का भी पता चला है।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Gandhakuti-Jetavana-Vihara-2.jpg|गंधकुटी जेतवन विहार के भिक्षु, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Anandabodhi-Tree.jpg|आनन्दबोधी, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-1.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-3.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-Temple-2.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-4.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-5.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-6.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बौद्ध धर्म}}{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
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[[Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>खुशी</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=217187</id>
		<title>दिल्ली</title>
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		<updated>2011-09-13T12:37:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: Adding category :Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__ {{सूचना बक्सा दिल्ली}}&lt;br /&gt;
*दिल्ली [[भारत]] की राजधानी एवं महानगरीय क्षेत्र है। इसमें [[नई दिल्ली]] सम्मिलित है जो कि ऐतिहासिक पुरानी दिल्ली के बाद बसी थी। महान ऐतिहासिक महत्त्व वाला यह महानगरीय क्षेत्र महत्त्वपूर्ण व्यापारिक, परिवहन एवं सांस्कृतिक हलचलों से भरा है। &lt;br /&gt;
*दिल्ली देश के उत्तरी मध्य भाग में [[गंगा नदी|गंगा]] की एक प्रमुख सहायक [[यमुना नदी|नदी यमुना]] के दोनों तरफ बसी है। दिल्ली देश का तीसरा बड़ा शहर है। यहाँ के ऐतिहासिक स्थल तथा रमणीय स्थल अपने आप में विशेष हैं। [[पर्यटन]] विकास के उद्वेश्य से यह [[आगरा]] और [[जयपुर]] से जुड़ा है।&lt;br /&gt;
*दिल्ली तो है दिल वालों की। दिल्ली के इतिहास में सम्पूर्ण [[भारत]]  की झलक सदैव मौजूद रही है। [[अमीर ख़ुसरो]] और [[मिर्जा ग़ालिब|ग़ालिब]]  की रचनाओं को गुनगुनाती हुई दिल्ली [[नादिरशाह]]  की लूट की चीखों से सहम भी जाती है। [[चाँदनी चौक]]-[[जामा मस्जिद दिल्ली|जामा मस्जिद]] की सकरी गलियों से गुज़रकर चौड़े राजपथ पर [[26 जनवरी]] की परेड को निहारती हुई दिल्ली [[30 जनवरी]] को उन तीन गोलियों की आवाज़ को नहीं भुला पाती जो राष्ट्रपिता [[महात्मा गाँधी]] के सीने में धँस गयी थी। दिल्ली ने दौलताबाद जाने के तुग़लकी फ़रमानों को भी सुना और [[लाल क़िला|लाल क़िले]] से [[प्रधानमंत्री]] के अभिभाषणों पर तालियाँ भी बजायी। कभी रघुराय ने दिल्ली की रायसीना पहाड़ी को अपने कैमरे में क़ैद कर लिया तो कभी हुसैन के [[रंग|रंगों]] ने दिल्ली को [[रंग]] दिया। दिल्ली कभी [[कुतुबमीनार]] की मंज़िलों को चढ़ाने में पसीना बहाती रही तो कभी [[हुमायूँ का मक़बरा|हुमायूँ के मक़बरे]] में पत्थरों को तराशती रही। नौ बार लूटे जाने से भी दिल्ली के श्रृंगार में कोई कमी नहीं आयी। आज भी दिल्ली विश्व के सुन्दरतम नगरों में गिनी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;आदित्य चौधरी (भारतकोश प्रशासक) के वक्तव्य का अंश&amp;lt;/ref&amp;gt;   &lt;br /&gt;
==नामकरण==&lt;br /&gt;
* अनुश्रुति है कि इसका वर्तमान नाम राजा ढीलू के नाम पर पड़ा जिसका आधिपत्य ई.पू. पहली शताब्दी में इस क्षेत्र पर था। बहरहाल बिजोला अभिलेखों (1170ई.) में उल्लेखित ढिल्ली या ढिल्लिका सबसे पहला लिखित उद्धरण है। [[महाभारत]] काल में [[पाण्डव|पाण्डवों]] द्वारा बसाया गया [[इन्द्रप्रस्थ]] नगर, दिल्ली आज हमारे देश का [[हृदय]] कहलाता है।&lt;br /&gt;
* एक मत के अनुसार दिल्ली का नामकरण फ़ारसी शब्द 'दहलीज़' पर पड़ा है। जिसका अर्थ है 'प्रवेश द्वार'। &lt;br /&gt;
* कुछ अन्य लोगों के मतानुसार आठवीं सदी में [[कन्नौज]] के राजा दिल्लू के नाम पर इसका नामांकन हुआ है। कई [[मुग़ल]] साम्राज्यों ने भी दिल्ली पर अपनी प्रभावी छाप छोड़ी है। कई अवसरों पर दिल्ली ने कई साम्राज्यों के पतन में अपनी छाप छोड़ी है। ऐसे बहुरूपदर्शी भूतकाल में न केवल दिल्ली बल्कि विश्व के महानतम लोकतंत्र की खोज की जा सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|दिल्ली का इतिहास}}&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] काल से ही दिल्ली का विशेष उल्लेख रहा है। दिल्ली का शासन एक वंश से दूसरे वंश को हस्तांतरित होता गया। यह [[मौर्य वंश|मौर्यों]] से आरंभ होकर [[पल्लव|पल्लवों]] तथा मध्य भारत के गुप्तों से होता हुआ 13 वीं से 15 वीं सदी तक तुर्क और अफ़ग़ान और अंत में 16 वीं सदी में [[मुग़ल|मुग़लों]] के हाथों में पहुँचा। 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली में अंग्रेज़ी शासन की स्थापना हुई। [[चित्र:Red-Fort.jpg|thumb|250px|left|[[लाल क़िला दिल्ली|लाल क़िला]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Red Fort, Delhi]] 1911 में कोलकाता से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित होने पर यह शहर सभी तरह की गतिविधियों का केंद्र बन गया। 1956 में केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा प्राप्त हुआ। दिल्ली के इतिहास में 69 वां संविधान संशोधन विधेयक एक महत्त्वपूर्ण घटना है, जिसके फलस्वरूप राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 में लागू हो जाने से दिल्ली में विधानसभा का गठन हुआ। दिल्ली का पुरातात्विक परिदृश्य अत्यंत दिलचस्प है व सहस्राब्दियों पुराने स्मारक क़दम-क़दम पर खड़े नज़र आते हैं। नए या पुराने क़िलेबंद स्थान पर निर्मित 13 शहरों ने दिल्ली–अरावली त्रिकोण के लगभग 180 वर्ग किलोमीटर के एक सीमित क्षेत्र में अपनी मौजूदगी के निशान छोड़े हैं। दिल्ली के बारे में '''यह किंवदंती प्रचलित है कि जिसने भी यहाँ नया शहर बनाया, उसे इसे खोना पड़ा।''' सबसे पुराना नगर [[इंद्रप्रस्थ]], क़रीब 1400 ई.पू निर्मित किया गया था और [[वेदव्यास]] रचित महाकाव्य [[महाभारत]] में इसका वर्णन [[पांडव|पांडवो]] की राजधानी के रूप में मिलता है। इस त्रिकोण में निर्मित दिल्ली का दूसरा शहर है अनंगपुर या आनंदपुर, जिसकी स्थापना लगभग 1020 ई. में तोमर राजपूत नरेश अनंग पाल ने राजनिवास के रूप में की थी। यह शहर अर्द्धवृत्ताकार निर्मित तालाब सूरजकुंड के आसपास बसा था। अनंग पाल ने बाद में इसे 10 किलोमीटर पश्चिम की ओर [[लालकोट]] पर स्थापित एक दुर्ग में स्थानांतरित किया।&lt;br /&gt;
==भौगोलिक संरचना==&lt;br /&gt;
दिल्ली एक [[जलसंभर]] पर स्थित है। जो [[गंगा]] तथा [[सिंधु नदी]] प्रणालियों को विभाजित करता है। दिल्ली की सबसे महत्त्वपूर्ण स्थालाकृति विशेषता पर्वत स्कंध (रिज) है, जो [[राजस्थान]] प्रांत की प्राचीन अरावली पर्वत श्रेणियों का चरम बिंदु है। अरावली संभवत: दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत माला है, लेकिन अब यह पूरी तरह वृक्ष विहीन हो चुकी है। पश्चिमोत्तर पश्चिम तथा दक्षिण में फैला और तिकोने परकोट की दो भुजाओं जैसा लगने वाला यह स्कंध क्षेत्र 180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। कछारी मिट्टी के मैदान को आकृति की विविधता देता है तथा दिल्ली को कुछ उत्कृष्ट जीव व वनस्पतियाँ उपलब्ध कराता है। यमुना नदी त्रिभुजाकार परकोटे का तीसरा किनारा बताती है। इसी त्रिकोण के भीतर दिल्ली के प्रसिद्ध सात शहरों की उत्पत्ति ई.पू. 1000 से 17 वीं शताब्दी के बीच हुई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-in-1858.jpg|thumb|left|220px|दिल्ली(शाहजहाँबाद) का एक दृश्य, वर्ष 1858]]&lt;br /&gt;
====जलवायु====&lt;br /&gt;
दिल्ली की जलवायु [[उपोष्ण]] है। दिल्ली में गर्मी के महीने [[मई]] तथा [[जून]] बेहद शुष्क और झुलसाने वाले होते हैं। दिन का तापमान कभी-कभी 40-45 सेल्सियस तक पहुँच जाता है। मानसून [[जुलाई]] में आता है। और तापमान को कम करता है। लेकिन [[सितंबर]] के अंत तक मौसम गर्म, उमस भरा और कष्टप्रद रहता है। यहाँ की वार्षिक औसत वर्षा लगभग 660 मिमी है। [[अक्टूबर]] से [[मार्च]] के बीच का मौसम काफ़ी सुहावना रहता है। हालांकि [[दिसंबर]] तथा [[जनवरी]] के महीने खूब ठंडे व कोहरे से भरे होते हैं। और कभी-कभी वर्षा भी हो जाती है। [[चित्र:New-Delhi-Map.jpg|thumb|250px|दिल्ली का मानचित्र]]  शीतकाल में प्रतिदिन का औसत न्यूनतम तापमान 7 डिग्री से. के आसपास रहता है, लेकिन कुछ रातें अधिक सर्द होती है।&lt;br /&gt;
====वनस्पति==== &lt;br /&gt;
दिल्ली की परिवर्तनशील जलवायु के कारण तीन वानस्पतिक काल होते हैं। वर्षा की कमी तथा भूमिगत जलस्तर के नीचे से प्राकृतिक वनस्पति का प्रर्याप्त विकास नहीं हो पाता। फूलों के क़रीब 1,000 प्रजातियाँ, जिनमे से अधिकाशं स्वदेशी मूल के है। यह यहाँ के वातावरण के अनुरुप ढल चुकी हैं, और दिल्ली शहर तथा आसपास के वातावरण में फलफूल रहे हैं। पहाड़ियों एव नदी के तटवर्ती भूभाग की वनस्पतियाँ स्पष्टत: भिन्न है। स्कंध क्षेत्र में पाई जाने वाली पर्वतीय वनस्पतियों में बबूल, जंगली खजूर तथा सघन झाड़ियाँ हैं। जिनमें कुछ फूलदार प्रजातियाँ भी शामिल हैं। यहाँ घास, बेले तथा लिपटने वाली अल्पायु लताएँ भी होती हैं, जो केवल बरसात के मौसम में पनपती हैं। दूसरी ओर नदी के तट के रेतीले एव क्षारीय भूभाग में विशेषकर मानसून व ठंड के महीने में वनस्पतियाँ समृद्ध एवं भिन्न हैं।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बिजली&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली के लिए इसकी अपनी उत्‍पादन इकाइयों- राजघाट बिजली घर, इंद्रप्रस्‍थ स्‍टेशन और बदरपुर ताप बिजलीघर सहित गैस टरबाइन पर आधारित इकाई से 850-900 मेगावाट बिजली प्राप्‍त होती है। शेष बिजली उत्तर क्षेत्रीय ग्रिड से प्राप्‍त की जाती है। दिल्‍ली में कई बिजली उत्‍पादन इकाइयां शुरू करने की योजना है। इंद्रप्रस्‍थ एस्‍टेट में प्रगति कंबाइंड पावर प्रोजेक्‍ट स्‍थापित किया जा चुका है। 330 मेगावाट प्रगति पावर परियोजना निर्माणाधीन है और जल्‍दी ही चालू होने वाली है। इसके 100 मेगावाट वाले प्रथम चरण को परीक्षण के लिए शुरू कर दिया गया है। बिजली वितरण को सुचारू बनाने के लिए दिल्‍ली विद्युत बोर्ड का निजीकरण कर दिया गया है और दिल्‍ली की बिजली व्‍यवस्‍था अब देश की दो जानी मानी-संस्‍थाओं- बी.एस.ई.एस. तथा टाटा पावर (एन.डी.पी.एल) द्वारा देखी जा रही है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.bharat.gov.in/knowindia/ut_delhi.php |title=राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली |accessmonthday=[[1 अप्रॅल]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format=पी.एच.पी |publisher=भारत की आधिकारिक वेबसाइट |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====प्राणी जीवन==== &lt;br /&gt;
दिल्ली में प्राणी जीवन ख़ासा विपुल, विविध तथा देशज है। मांसाहारी जीव प्रमुख रूप से देशी स्तनपायी हैं। लकड़बग्घे, [[भेडिया|भेड़िऐ]], लोमड़ी, सियार तथा [[तेंदुआ|तेंदुए]], जो पहले निचले जंगलों में विचरण करते थे, अब दर्रों तथा शहर की सीमांत पहाड़ी चोटियों पर पाए जाते हैं। [[चित्र:Giraffe-Delhi-Zoo.jpg|thumb|left||[[जिराफ़]], [[राष्ट्रीय प्राणी उद्यान दिल्ली|राष्ट्रीय प्राणी उद्यान]], दिल्ली]] हिरण तथा वराह खुरदार प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अब अपनी प्राकृतिक पर्यावास में कम ही मिलते हैं। साही, खरगोश, चूहे व गिलहरियां शहर के [[कृतंक]] जीव हैं तथा चमगादड़ कांटाचूहा और छछूंदर दिल्ली के कीट-भक्षी प्राणी हैं। जो अक्सर मंदिरों तथा ऐतिहासिक खंडहरों के आसपास पाए जाते हैं। दिल्ली का पक्षी जीवन भी समृद्ध एवं विविध है। घरेलू [[कबूतर]], गौरैया, चीलें, कौवे, तोते, जंगली बटेर, तीतर, पूरे साल पाए जाते हैं। दिल्ली के आसपास की झीलें शीतकाल में कई प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती है। [[यमुना नदी]] में मछलियों की 65 प्रजातियाँ पायी जाती थीं। प्रदूषण के कारण अब स्थिति अस्पष्ट है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| style=&amp;quot;float:right;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[चित्र:Supreme-Court.jpg|thumb|250px|[[उच्चतम न्यायालय]], [[भारत]]&amp;lt;br /&amp;gt;Supreme Court, India]] &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{दिल्ली भवन सूची}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Police-Station.jpg|thumb|250px|थाना डिफेन्स कॉलोनी, दिल्ली]] &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रशासन एवं नियोजन==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्रशासनिक व्यवस्था&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
{{Main|दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था}}&lt;br /&gt;
*दिल्ली ने प्रशासनिक व्यवस्था में कई फेरबदल देखे हैं। &lt;br /&gt;
*[[2 अगस्त]], 1858 को ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम पारित किया, जिसने भारत की अंग्रेज़ी सत्ता को [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] से ब्रिटिश राज में स्थानांतरित कर दिया। &lt;br /&gt;
*[[1876]] में [[महारानी विक्टोरिया]] के शासनाधिकार में 'भारत की सम्राज्ञी' पदवी शामिल हो गई। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्तरों का समूह&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली राज्य प्रशासनिक एवं नियोजन क्षेत्रों के कई स्तरों का समूह है। इसका दायरा 1,483 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें शहरी संकेंद्रण तथा 209 गाँव आते हैं। जो दिल्ली महरौली तहसीलों में बटे हैं। वृहद स्तर पर यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर.) का ही भाग है। [[चित्र:Rashtrapati-Bhavan-1.jpg|thumb|250px|left|[[राष्ट्रपति भवन]]&amp;lt;br /&amp;gt;President House]]  जो नगर एव ग्रामीण संगठन (टी.सी.पी.ओ.) द्वारा [[1971]] में एक नियोजन क्षेत्र के रूप में अलग किया गया, ताकि दिल्ली के इर्द-गिर्द भावी विकास को दिशा दी जा सके। एन. सी. आर के अंतर्गत दिल्ली राज्य तथा हरियाणा, उत्तर प्रदेश व राजस्थान के सीमावर्ती ज़िले या तहसीलें आती हैं। यह क्षेत्र दिल्ली महानगर के आसपास लगभग 100 किलोमीटर अर्द्धव्यास में फैला है। तथा इसमे 30,242,वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आता है। क्षेत्र के भावी संतुलित विकास के लिए एक समंवित (मास्टर प्लान) तैयार करने हेतु [[1985]] में महायोजना एन.सी.आर.बोर्ड का गठन किया गया। दिल्ली महानगर क्षेत्र उपवृहद स्तर पर है। जिनमें दिल्ली तथा निकटवर्ती राज्यों के सटे हुए शहरी भाग आते हैं। जो 3,182 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। लघु स्तर पर दिल्ली का शहरी समूह आता है, जिसका क्षेत्रफल 446 वर्ग किलोमीटर है। इसमें तीन नगरीय क्षेत्र आते हैं। [[नई दिल्ली]] नगर पालिका समिति (एन.डी.एम.सी.), नगर निगम दिल्ली (शहर), एम.सी.डी. (यू) तथा दिल्ली छावनी के साथ-साथ जनगणना (सेंसस) द्वारा वर्गीकृत 23 उपनगर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;महानगरीय अधिशासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली का महानगरीय अधिशासन मुख्य रूप से नई दिल्ली नगर पालिका, दिल्ली नगर निगम तथा छावनी परिषद के अधीन है। दिल्ली नगर निगम निर्वाचित निकाय है। नई दिल्ली नगरपालिका (एन.डी.एम.सी.) के सदस्य शासन द्वारा मनोनीत होते हैं। नगर निगम के दायरे में अनिवार्य नागरिक एवं उचित कल्याणकारी कार्य आते हैं। गंदी बस्तियों को हटाना एवं सुधार इसके मुख्य कार्य हैं यह अपना काम क्षेत्रीय समितियों के माध्यम से करती है। जो स्थानीय पार्षदों तथा एक या अधिक पौर–मुख्य से गठित होती है, नई दिल्ली नगर पालिका का गठन [[1933]] में हुआ यह केवल नई दिल्ली (इसे यह स्वरूप वास्तुविद् [[एडविन लूटियंस]] ने दिया था) तथा इससे लगे हुए क्षेत्रो के प्रति उत्तरदायी हैं। छावनी क्षेत्र के स्थानीय कार्य रक्षा मंत्रालय के प्रशासन में आते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;योजना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
महानगरीय दिल्ली की योजना की ज़िम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण (डी.डी.ए.) के अधीन है, जिसका गठन [[1957]] के एक संसदीय अधिनियम के तहत हुआ। शहर के प्रथम 20 वर्षों की नगर योजना (मास्टर प्लान) टी.सी.पी.ओ. द्वारा तैयार की गई तथा इसे दिल्ली की बेतरतीब वृद्धि को नियंत्रित करने तथा आम लोगों की क्रय–क्षमता योग्य एवं उपयुक्त आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वीकृत आधारों पर डी.डी.ए. द्वारा [[1962]] में लागू किया गया। शासन द्वारा 24 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र का अधिकरण करके शहरी विकास के लिए डी.डी.ए. को सौंपा गया। इस तरह डी. डी.ए साम्यवादी विश्व से बाहर राष्ट्रीयकृत भूमि का सबसे बड़ा विकासक बन गया। विलंबित दूसरी नगर योजना [[1986]] में प्रभाव में आई तथा यह उद्योगीकरण को धीमा करने, विकेंद्रीकरण, अनेक स्थानोंको जोड़ते लोक परिवहन के प्रावधान तथा कम ऊँचाई वाली किंतु घनी आवासीय व्यवस्था पर केंद्रित थी।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;पानी की समस्या&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{Main|दिल्ली की पानी की समस्या}}&lt;br /&gt;
*दिल्ली को प्रतिदिन कोई 3 अरब 60 करोड़ लीटर पानी की ज़रूरत है। लेकिन केवल 2 अरब 90 करोड़ लीटर आपूर्ति ही हो पाती है। &lt;br /&gt;
*आलोचकों का कहना है कि पानी की आपूर्ति में भी खूब भेदभाव बरता जा रहा है। &lt;br /&gt;
*उदाहरण के लिए लुटियन वाली दिल्ली को प्रतिदिन कोई 30 करोड़ लीटर पानी मिलता है लेकिन महरौली जैसे स्थानों में यह 4 करोड़ से भी कम है। &lt;br /&gt;
==जनजीवन==&lt;br /&gt;
अन्य राजधानियों की तरह दिल्ली महानगर की गतिविधियाँ भी अत्यंत सक्रिय हैं। 19 वीं सदी के अंत [[मुग़ल]] शासन काल का वैभव समाप्त हो चुका था, दिल्ली की आबादी मुश्किल से पाँच लाख थी, लेकिन धीरे-धीरे यह किसी दानव की तरह बढ़ती गई। वर्ष [[2001]] में दिल्ली की शहरी आबादी 1 करोड़ 28 लाख के लगभग पहुँच चुकी है और दिल्ली राज्य की कुल आबादी 1 करोड़ 37 लाख के लगभग पहुँच गई है। जनसांख्यिकीय विश्लेषण के अनुसार 90 प्रतिशत आबादी शहरी है। इनमें भी 85 प्रतिशत लोग तीन स्थायी नगरो में बसते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2001 की जनगणना के अनुसार, दिल्ली की आबादी में लिंग अनुपात (प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाएँ) शहरी क्षेत्र में 821 है, जिसमें [[1991]] के 827 के मुक़ाबले कमी आई है। यह इस बात का सूचक है कि पुरुषों का शहरों की तरफ पलायन अधिक है। दिल्ली में साक्षरता का प्रतिशत 81.82 है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। अगर हम दिल्ली के जनसांख्यिकी इतिहास पर नज़र डालें, तो [[1947]] का कालखंड एक संक्रांति काल की तरह हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। [[चित्र:Food-Delhi-8.jpg|thumb|200px|नारियल बेचता एक लड़का]] इस काल में हज़ारों शरणार्थी पाकिस्तान से दिल्ली आए। इनकी वजह से न केवल यहाँ का जनसांख्यिकी ढांचा बदला, बल्कि दिल्ली के सामाजिक– सांस्कृतिक और आर्थिक स्वरूप में भी परिर्वतन आया। तब से शहर प्रवासियों की वजह से फैलता गया। हाल के दशकों में यहाँ जन्म-दर गिरी है, लेकिन प्रवासियों की आबादी का एक–तिहाई से अधिक हिस्सा प्रवासियों का है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
शहर के मुख्य धार्मिक समूहों में (1991 की जनगणना के अनुसार) [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]] (लगभग 83 प्रतिशत), [[सिक्ख धर्म|सिक्ख]] (लगभग नौ प्रतिशत) हैं। जनसंख्या के शेष चार प्रतिशत का निर्माण [[जैन धर्म|जैन]], [[सिक्ख धर्म|सिक्ख]], ईसाई, [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]] और अन्य लोग करते हैं। अधिकांश लोग हिन्दी या उसका परिवर्तित रूप हिंदुस्तानी बोलते हैं। [[पंजाबी भाषा]] पंजाबियों द्वारा बोली जाती है। तथा [[उर्दू]] मुसलमानों द्वारा बोली जाती है। विभिन्न प्रांतों से आए आप्रवासी अपनी-अपनी भाषा बोलते हैं, लेकिन कामचलाऊ हिन्दी सीखने की कोशिश करते हैं। शिक्षित वर्ग द्वारा अंग्रेज़ी समझी व बोली जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था== &lt;br /&gt;
किसी भी ऐतिहासिक राजधानी की तरह दिल्ली भी वैविध्यपूर्ण केंद्र है, जिसमे प्रशासन, सेवाएं और निर्माण अच्छी तरह मिले–जुले हैं। दिल्ली कला एव हस्तकौशल की प्रचुर विविधता का केंद्र रहा है। मुग़ल काल में दिल्ली रत्न और आभूषण, धातु पच्चीकारी, क़सीदाकारी, सोने की पच्चीकारी, रेशम और ज़री का काम, मीनाकारी और शिल्प, मूर्तिकला और [[चित्रकला]] के लिए विख्यात थी। दिल्ली का वर्तमान प्रशासकीय महत्त्व उस समय से है, जब भारत का शासन [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] से लेकर महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया और [[ब्रिटिश साम्राज्य]] की राजधानी, वाणिज्यिक और सेवा केन्द के रूप में विकसित हो गई। यहाँ की लगभग तीन–चौथाई आबादी व्यापार लोक प्रशासन, सामुदायिक, सामाजिक और निजी सेवाओं में संलग्न है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कृषि और खनिज&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
[[गेहूँ]], बाजरा, ज्‍वार, चना और मक्‍का की प्रमुख फ़सलें हैं, लेकिन अब किसान अनाज वाली फ़सलों की बजाय फलों और सब्जियों, [[दूध|दुग्‍ध]] उत्‍पादन, मुर्गी पालन, [[फूल|फूलों]] की खेती को ज्‍यादा महत्‍व दे रहे हैं। [[चित्र:Wheat-1.jpg|thumb|200px|left|[[गेहूँ]]]] ये गतिविधियाँ खाद्यान्‍नों, फ़सलों के मुक़ाबले अधिक लाभदायक साबित हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सिंचाई&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली के गाँवों का तेज़ी से शहरीकरण होने की वजह से सिंचाई के अंतर्गत आने वाली खेती योग्‍य भूमि धीरे-धीरे कम होती जा रही है। राज्‍य में ‘केशोपुर प्रवाह सिंचाई योजना चरण तृतीय’ तथा ‘जल संशोधन संयंत्र से सुधार एवं प्रवाह विस्‍तार सिंचाई प्रणाली’ नामक दो योजनाएं चलाई जा रही है। राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्‍ली के ग्रामीण क्षेत्र में 350 हेक्‍टेयर की सिंचाई राज्‍य नलकूपों द्वारा और 1,376 हेक्‍टेयर की सिंचाई अतिरिक्‍त पानी द्वारा की जा रही है। [[चित्र:Irrigation-India.JPG|thumb|220px]] इसके अलावा 4,900 हेक्‍टेयर भूमि की सिंचाई हरियाणा सरकार के अधीन पश्चिमी यमुना नहर द्वारा की जा रही है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;उद्योग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली न केवल उत्तर भारत का सबसे बड़ा व्‍यावसायिक केंद्र है, बल्कि यह लघु उद्योगों का भी सबसे बड़ा केंद्र है। इनमें टेलीविज़न, टेपरिकार्डर, हल्‍का इंजीनियरिंग साज-सामान, मशीनें, मोटरगाडियों के हिस्‍से पुर्ज़े, खेलकूद का सामान, साइकिलें, पी.वी.सी. से बनी वस्‍तुएं जूते-चप्‍पल, कपड़ा, उर्वरक, दवाएं, हौजरी का सामान, चमड़े की वस्‍तुएं, सॉफ्टवेयर आदि विभिन्‍न वस्‍तुएं बनाई जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
20 वीं सदी के प्रारंभ में यहाँ आधुनिक उद्योगों का प्रवेश हुआ। यहाँ के बड़े उद्योगों में कपास की ओटाई, कताई और बुनाई; आटा एव मैदा की मिलें पैकिंग; गन्ने व तेल का प्रसंस्करण प्रमुख थे। [[चित्र:Market-Delhi-4.jpg|thumb|220px|left|बाज़ार का एक दृश्य, दिल्ली]] लघु उद्योगों में मुद्रण, जूता निर्माण, क़सीदाकारी, बेकरी, शराब निर्माण [[लोहा]] तथा पीतल का काम होता है। [[1980]] के दशक से औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि शुरू हुई। [[1981]] में 50 हज़ार पंजीकृत औद्योगिक इकाइयों की संख्या बढकर [[1990]] में 81 हज़ार हो गई। इस कालखंड में औद्योगिक निवेश, उत्पादन और रोज़गार में भी लगभग दुगुनी वृद्धि हुई। 1990 के दशक में इस शहर के आर्थिक स्वरूप में महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया और पुरानी दिल्ली ने उत्तर भारत के थोक वाणिज्यिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान को और अधिक सुद्ढ़ बना लिया। दिल्‍ली की नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, टेलीकम्‍यूनि‍केशन, सॉफ्टवेयर उद्योग तथा सूचना प्रौद्योगिकी को समर्थ सेवा बनाने वाले उद्योग लगाने पर बल दिया गया है। दिल्‍ली में ऐसी औद्योगिक इकाइयां लगाने को प्रोत्‍साहन दिया जा रहा है, जिनसे प्रदूषण नहीं फैलता और जिनमें कम कामगारों की आवश्‍यकता होती है। दिल्‍ली राज्‍य औद्योगिक विकास निगम ओखला स्थित व्‍यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र के भवन में [[रत्न]], [[आभूषण]] और परख तथा मीनाकारी का एक प्रशिक्षण संस्‍थान खोल रहा है।&lt;br /&gt;
{{दिल्ली चित्र सूची2}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली शैक्षणिक सूची}}&lt;br /&gt;
दिल्ली, [[भारत]] में शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है। दिल्ली के विकास के साथ-साथ यहाँ शिक्षा का भी तेज़ी से विकास हुआ है। प्राथमिक शिक्षा तो प्रायः सार्वजनिक या नि:शुल्क है। एक बहुत बड़े अनुपात में बच्चे माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। स्त्री शिक्षा का विकास हर स्तर पर पुरुषों से अधिक हुआ है। यहाँ की शिक्षा संस्थाओं में विद्यार्थी भारत के सभी भागों से आते हैं। दिल्ली में उच्चतर शिक्षा एवं अनुसंधान के अनेक केन्द्र हैं। लगभग ग्यारह विश्वविद्यालय, अनेक महाविद्यालय, अनगिनत प्राथमिक अनुसंधान केन्द्र पूरी दिल्ली में फैले हैं। यहाँ कई सरकारी एवं निजी शिक्षा संस्थान हैं जो [[कला]], वाणिज्य, [[विज्ञान]], प्रोद्योगिकी, आयुर्विज्ञान, विधि और प्रबंधन में उच्च स्तर की शिक्षा देने के लिये विख्यात हैं। [[चित्र:Delhi-University.jpg|thumb|left|[[दिल्ली विश्वविद्यालय]]]] उच्च शिक्षा के संस्थानों में सबसे महत्त्वपूर्ण दिल्ली विश्वविद्यालय है जिसके अन्तर्गत कई कॉलेज एवं शोध संस्थान हैं। गुरु गोबिन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, [[दिल्ली विश्वविद्यालय]], अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, टेरी - ऊर्जा और संसाधन संस्थान एवं जामिया मिलिया इस्लामिया उच्च शिक्षा के प्रमुख संस्थान हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने दिल्‍ली शहर में बढ़ते वाहन प्रदूषण और यातायात की अस्‍त-व्‍यस्‍त स्थिति को देखते हुए मास रैपिड ट्रांज़िट प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया। यह परियोजना कार्यान्वित की जा रही है और इसमें अति आधुनिक तकनीक का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। दिल्‍ली में मेट्रो रेल परियोजना आ गई है। अब दिल्‍ली मेट्रो के प्रथम चरण में तीन मेट्रो कॉरीडोर हैं जो रिकार्ड समय में पूरे होकर काम भी करने लगे हैं। [[चित्र:Metro-Delhi-1.jpg|thumb|250px|मेट्रो रेल, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Metro Train, Delhi]] शाहदरा से रिठाला और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से‍ [[कें‍द्रीय सचिवालय]] के बीच लाइनें बिछ गई हैं और इन पर गाडियाँ भी चलने लगी हैं। बाराखंभा और द्वारका के बीच तीसरी लाइन भी चालू हो गई है। दिल्‍ली मेट्रो के द्वितीय चरण को भी स्‍वीकृत मिल गई है जिससे राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र के यात्रियों को बेहतर संपर्क सुविधा प्राप्‍त हो सकेगी। दिल्‍ली सडकों, रेल लाइनों और विमान सेवाओं के ज़रिये भारत के सभी भागों से भलीभांति जुड़ी हुई है। यहाँ तीन हवाई अड्डे हैं। इंदिरा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डा अंतर्राष्‍ट्रीय उड़ानों के लिए पालम हवाई अड्डा घरेलू उड़ानों के लिए तथा सफदरजंग हवाई अडडा प्रशिक्षण उड़ानों के लिए इस्‍तेमाल किया जा रहा है। दिल्‍ली में तीन महत्‍वपूर्ण रेलवे स्‍टेशन भी हैं। ये दिल्‍ली जंक्‍शन, नई दिल्ली रेलवे स्‍टेशन और निज़ामुद्दीन रेलवे स्‍टेशन के नाम से जाने जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.indianrail.gov.in/ INDIAN RAILWAYS PASSENGER RESERVATION ENQUIRY]&amp;lt;/ref&amp;gt;तीन अंतर्राष्‍ट्रीय बस अड्डे- कश्‍मीरी गेट, सराय काले ख़ाँ और आनंद विहार में हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-International-Airport-Delhi.jpg|thumb|250px|left|इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Indira Gandhi International Airport, Delhi]]&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;वायु मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
पर्यटकों के लिए भारत का व्यस्ततम प्रवेश बिन्दु इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। यह दिल्ली से अन्य देशों और शहरों को जोड़ता है। इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से सात किलोमीटर और कनॉट प्लेस से 12 किलोमीटर की दूरी पर दूसरा हवाई अड्डा स्थित है। जहाँ से घरेलू उड़ानें संचालित होती हैं। सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अंतर्राष्ट्रीय आवागमन रहता है। हवाई अड्डे से शहर में आने-जाने के लिए तीन तरह की टैक्सियाँ उपलब्ध हैं। पीली व काली धारियों वाली टैक्सी शहर में घूमने के लिए हैं। दिल्ली टैक्सी पूरे भारत में भ्रमण के लिए हैं। आगमन क्षेत्र में प्री-पेड (हवाई अड्डे पर ही मूल्य चुकाया जाता है) टैक्सी व्यवस्था का काउंटर भी स्थापित है। टर्मिनल एक व दो से कोच सुविधा भी प्राप्त की जा सकती है। प्रत्येक घण्टे से छूटने वाले ये कोच, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन एवं कश्मीरी गेट अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डे तक जाते हैं। मार्ग में आने वाले प्रमुख होटलों पर इनका ठहराव निश्चित है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;रेल मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Railway-Station.jpg|thumb|250px|पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन]]&lt;br /&gt;
दिल्ली देश के सभी भागों से रेलमार्ग से जुड़ा है। रेलवे स्टेशनों पर प्री-पेड टैक्सी व्यवस्था उपलब्ध है। तीनों प्रमुख रेलवे स्टेशनों से ऑटो-रिक्शा एवं बसों की सुविधा अनवरत उपलब्ध है। सुपरफ़ास्ट राजधानी एक्सप्रैस दिल्ली से [[कलकत्ता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]], [[बैंगलोर]] और [[हैदराबाद]] महानगरों के बीच चलती हैं। शताब्दी एक्सप्रैस दिल्ली को प्रमुख राज्यों की राजधानियों [[भोपाल]], [[अमृतसर]] और [[लखनऊ]] से जोड़ती है।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;सड़क मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
उत्तरी भारत के सभी बड़े शहरों के लिए दिल्ली से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। पुरानी दिल्ली के पास स्थित कश्मीरी गेट पर मुख्य बस स्टेंण्ड है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डा कहा जाता है। यहाँ से [[हरियाणा]], [[पंजाब]], [[राजस्थान]], [[उत्तर प्रदेश]] एवं [[हिमाचल प्रदेश]] आदि के लिए बसें उपलब्ध हैं। निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप आया हुआ सराय काले ख़ाँ बस स्टेण्ड से [[आगरा]], [[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[ग्वालियर]] एवं [[भरतपुर]] आदि के लिए बसें मिलती हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Bus.jpg|thumb|250px|left|बस, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt;Bus, Delhi]] &lt;br /&gt;
दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से वर्धमान, [[वाराणसी]], [[इलाहाबाद]], [[कानपुर]] और [[आगरा]] के रास्ते कोलकता से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से [[सूरत]], [[अहमदाबाद]], [[उदयपुर]], [[अजमेर]] और [[जयपुर]] के रास्ते मुंबई से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[अंबाला]] होते हुए [[अमृतसर]] और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से रामपुर और [[मुरादाबाद]] के रास्ते [[लखनऊ]] से जुड़ी है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्थानीय परिवहन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;ऑटो रिक्शा&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिल्ली में मीटर से चलने वाले तिपहिया ऑटो रिक्शा सर्वत्र उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Local-Train-Delhi.jpg|thumb|220px|लोकल रेल, दिल्ली]]&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;बसें&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिल्ली भ्रमण हेतु बसें सबसे सस्ता व सुलभ साधन हैं। दिल्ली राज्य परिवहन सेवा की हरी धारियों वाली बसें दिल्ली परिवहन निगम की हैं। जबकि नीली धारियों वाली बसें निजी क्षेत्र की हैं। कुछ अतिरिक्त भुगतान पर आरामदेह सफ़ेद धारियों वाली बसों में सफर किया जा सकता है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://delhi.gov.in/wps/wcm/connect/DOIT_DTC_Hindi/dtc/home/ दिल्ली परिवहन निगम]&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;रिंग रेल&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
पाँच प्रमुख बाज़ारों चाँदनी चौक, सदर बाज़ार, कनॉट प्लेस, प्रगति मैदान एवं आईटीओ को जोड़ती हुई रिंग रेल की सुविधा भी उपलब्ध है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;गाइड टूर&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रशिक्षित गाइडों के साथ आरामदेह गाड़ियों में पूरे दिन या आधे दिन के गाइड टूर भी संचालित किए जाते हैं। ये टूर शहर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों की सैर कराते हैं। इसके अलावा हर क्षेत्र में टैक्सी स्टेण्ड हैं, जहाँ से टैक्सी मिल जाती है। पुरानी दिल्ली क्षेत्र में साइकिल रिक्शा भी मिल जाते हैं। प्रमुख होटलों एवं टैक्सी स्टेण्डों पर भारतीय एवं विदेशी कम्पनियाँ कार किराए पर उपलब्ध कराती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.delhitourism.nic.in/delhitourism/index.jsp delhitourism]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कला==&lt;br /&gt;
====वास्तुकला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gandhi-Smriti-Museum-Delhi-1.jpg|thumb|[[महात्मा गांधी]], गांधी स्मृति संग्रहालय, दिल्ली]]&lt;br /&gt;
दिल्ली के वैविध्यपूर्ण इतिहास ने विरासत में इसे समृद्ध वास्तुकला दी है। शहर के सबसे प्राचीन भवन सल्तनत काल के हैं और अपनी संरचना व अलंकरण में भिन्नता लिए हुए हैं। प्राकृतिक रुपाकंनों, सर्पाकार बेलों और क़ुरान के अक्षरों के घुमाव में हिन्दू राजपूत कारीगरों का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है। मध्य एशिया से आए कुछ कारीगर कवि और वास्तुकला की सेल्जुक शैली की विशेषताएं मेहराब की निचली कोर पर कमल- कलियों की पंक्ति, उत्कीर्ण अलंकरण और बारी-बारी से आड़ी और खड़ी ईटों की चिनाई है। ख़िलज़ी शासन काल तक इस्लामी वास्तुकला में प्रयोग तथा सुधार का दौर समाप्त हो चुका था और इस्लामी वास्तुकला में एक विशेष पद्धति और उपशैली स्थापित हो चुकी थी जिसे [[पख़्तून]] शैली के नाम से जाना जाता है। इस शैली की अपनी लाक्षणिक विशेषताएं हैं। जैसे घोड़े के नाल की आकृति वाली मेहराबें, जालीदार खिड़कियां, अलंकृत किनारे बेल बूटों का काम (बारीक विस्तृत रूप रेखाओं में) और प्रेरणादायी, आध्यात्मिक शब्दांकन बाहर की ओर अधिकांशत: लाल पत्थरों का तथा भीतर सफ़ेद संगमरमर का उपयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तुकला की परंपरा में बदलाव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
तुग़लक़ों ने वास्तुकला की परंपरा में बदलाव कर अलंकरण का तत्त्व समाप्त कर दिया इस काल में स्लेटी पत्थरों वाले सीधे सपाट निर्माण को प्राथमिकता दी गई उनकी इमारतों में एक दूसरे पर आधारित छतों वाली सादी मेहराबों क़ुरान की आयत से खुदे किनारों और भट्टी में रंगी टाइलों को प्रभावशाली ढंग से शामिल किया गया। तुग़लक़ों ने अपने भवनों में सजावट पर कम, और उनकी आकृति की भव्यता पर अधिक ज़ोर दिया। सैयद और लोदी काल में गुंबदीय ढांचे की दो जटिल शैलियां प्रचलित हुईं। निम्न अष्टभुजाकार आकृति वाली शैली जिसका ज़मीनी क्षेत्रफल काफ़ी विशाल होता था। और ऊँची वर्गाकार शैली जिसमें भवन का अग्रभाग चारो ओर से गुजरने वाली पट्टी और फलक  श्रृंखला रुपी सजावटी तत्त्व से विभाजित होता था, जो इन्हें दो या तीन मंजिल जैसे होने का रूप देती प्रतीत होती थी। लोदी काल में बगीचे वाले मकबरों का निर्माण भी हुआ। '''इस काल की मस्जिदों में मीनारें नहीं होती थी।''' &lt;br /&gt;
[[चित्र:National-Railway-Museum-Delhi.jpg|thumb|250px|left|[[राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय रेल संग्रहालय]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; National Railway Museum, Delhi]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तविक गौरव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{दिल्ली कला एवं सांस्कृतिक संस्थान सूची}}&lt;br /&gt;
दिल्ली की वास्तुकला का वास्तविक गौरव मुग़ल कालीन है। दिल्ली में [[हुमायूँ]] का मक़बरा मुग़ल वास्तुकला का प्रथम महत्त्वपूर्ण नमूना है। हुमायूं के मकबरे को 1565 ई. में उसकी बेगम हमीदा बानू ने बनवाया था। इसमें हमीदा की क़ब्र भी हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न कालों में बनी [[दारा शिकोह]] फ़ुरुख़सियर तथा [[आलमगीर द्वितीय]] आदि की भी क़ब्रें यहीं स्थित हैं। '''कहा जाता है कि मुग़ल परिवार के तथा उससे संबंधित 90 से अधिक व्यक्तियों की क़ब्रें यहाँ हैं।''' 1857 की राज्यकांति में अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह को मुग़लों ने यहीं क़ैद किया था। ताजमहल का अग्रगामी यह निर्माण भारत का पहला पूर्ण विकसित बग़ीचे वाला मक़बरा भी है। इसने भारतीय वास्तुकला में ऊँची मेहराबों और दोहरे गुंबदों की शुरुआत की जो मुग़ल वास्तुकला के प्रतिनिधि नमूने लाल क़िले में दिखाई देते हैं। इसमें निर्मित नक़्क़ारख़ाने, दीवार-ए-आम और दीवार-ए-ख़ास, महल तथा मनोरंजन कक्ष, छज्जे, हमाम, आंतरिक नहरें और ज्यामितीय सौंदर्यबोध के साथ निर्मित बगीचे तथा एक अलंकृत मस्जिद देखते ही बनते हैं। जामा मस्जिद मुग़लकालीन मस्जिदों की वास्तविक प्रतिनिधि है। '''यह पहली मस्जिद है, जिनमें मीनारें भी हैं।''' अधिकांश भवनों में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। जिनमें नक़्क़ाशी तथा बहुरंगी पत्थरों की सजावट के नायाब नमूने हैं।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;आंग्ल वास्तुकला&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली की आंग्ल वास्तुकला औपनिवेशिक तथा मुग़लकालीन कला का प्रतीक है। यह वाइसरॉय के आवास संसद भवन और सचिवालय के विशाल भवनों से लेकर आवासीय बंगलों और दफ़्तरों जैसी उपयोगी इमारतों तक वैविध्यपूर्ण है। स्वतंत्र भारत में वास्तुकला ने अपनी अलग उपशैली विकसित करने का प्रयास किया है। देशज तथा पश्चिमी शैली के मिश्रित स्वरूप में स्थानीय उपशैलीयों की छटा दिखाई देती है। सर्वोच्च न्यायालय भवन, विज्ञान भवन विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालय कनॉट प्लेस के आसपास की इमारतें इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। हाल ही में दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कुछ वास्तुकार हुए जिन्होंने दिल्ली के परिदृश्य में कुछ आकर्षण भवन जोड़े हैं। जिन्हें उत्तर-आधुनिक कहा जाता है। टीकाकरण संस्थान, भारतीय जीवन बीमा निगम का मुख्यालय और [[बहाई मंदिर]] इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं।&lt;br /&gt;
==संग्रहालय==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली संग्रहालय एवं स्मृति भवन सूची}}&lt;br /&gt;
*;वायुसेना एवं युद्ध संग्रहालय&lt;br /&gt;
पालम के नज़दीक स्थित इस संग्रहालय में भारतीय वायुसेना की ऐतिहासिक वस्तुओं का अवलोकन किया जा सकता है। प्रथम विश्वयुद्ध के समय के हवाई जहाज़, चित्र एवं साहसिक दुस्साहसिक प्रदर्शन के फ़ोटोग्राफ़्स का यहाँ दुर्लभ संग्रह है। राष्ट्र के सम्मान में अपना सर्वस्त्र न्यौछावर करने वाले वासुसेना के पायलटों को श्रद्धाजंली देता युद्ध संग्रहालय भी यहीं पर स्थित है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Crafts-Museum.jpg|thumb|220px|[[हस्त शिल्पकला संग्रहालय दिल्ली|हस्त शिल्पकला संग्रहालय]]|left]]&lt;br /&gt;
*;हस्तशिल्प संग्रहालय&lt;br /&gt;
{{Main|हस्त शिल्पकला संग्रहालय दिल्ली}}&lt;br /&gt;
*ग्रामीण जनजीवन की झाँकी प्रस्तुत करता लोक एवं आदिवासी कलाकृतियों का यह अनूठा संग्रहालय है। यह संग्रहालय [[प्रगति मैदान]] के अदिती पवैलियन में स्थित है। इस संग्रहालय में [[भारत]] की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा को प्रदर्शित किया गया है।&lt;br /&gt;
*;गुड़िया संग्रहालय&lt;br /&gt;
{{Main|गुड़ियों का संग्रहालय दिल्ली}}&lt;br /&gt;
लगभग 6,000 गुड़ियों से भरा यह संग्रहालय बाल पुस्तक ट्रस्ट का ही एक हिस्सा है। यहाँ अंतर्राष्ट्रीय संग्रह की अधिकांश गुड़िया अपनी पारम्परिक वेशभूषा में प्रदर्शित हैं। प्रख्यात पत्रकार शंकर द्वारा स्थापित यह संग्रहालय बहादुर शाह जफ़र मार्ग के पूर्व में स्थित है। यहाँ विश्व भर के खिलौना निर्माताओं का आगमन रहता है। यहीं स्थित बी.सी. रॉय बाल पुस्तकालय है, जिसमें बच्चों के लिए उत्तम पुस्तकों का संग्रह है। छोटे बच्चों के लिए यहाँ खेलघर भी बना है। &lt;br /&gt;
*;भू-संग्रहालय (फ़ील्ड म्यूज़ियम)&lt;br /&gt;
पुराने क़िले में स्थित इस संग्रहालय में पुरातत्व खुदाई से प्राप्त पत्थर, सिक्के और अवशेष देखे जा सकते हैं। यहाँ 200 से 100 ईसा पूर्व के सिक्के, मौर्यकालीन अवशेष, गुप्तकालीन सिक्के, मानव अवशेष, 1266-86 काल के [[बलबन]] एवं 1325-57 कालीन [[मुहम्मद बिन तुग़लक़]] के शासन में चलने वाले सिक्के भी यहाँ प्रदर्शित हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Gandhi-Smriti-Museum-Delhi.jpg|thumb|250px|गांधी स्मृति संग्रहालय]]&lt;br /&gt;
*;गांधी राष्ट्रीय संग्रहालय&lt;br /&gt;
[[राजघाट दिल्ली|राजघाट]] के सामने सड़क के उस पार स्थित इस संग्रहालय में गांधी जी की लाठी, [[चरखा]], चश्मा, चप्पल, छड़ी और कुछ पेन संग्रहित हैं। यहाँ गांधीजी द्वारा कारागृह में प्रयुक्त खाना बनाने के बर्तन एवं गांधी के सीने को छलनी करने वाली [[नाथूराम गौडसे]] के रिवॉल्वर की गोली भी प्रदर्शित है। &lt;br /&gt;
*;भारतीय युद्ध स्मृति संग्रहालय&lt;br /&gt;
लाल क़िले में नौबतख़ाने के ठीक ऊपरी भाग में स्थित इस संग्रहालय में प्रमुख विश्वयुद्ध से मुग़लकालीन युद्धों में प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र आदि संग्रहित हैं।&lt;br /&gt;
*;इंदिरा गांधी संग्रहालय&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-gandhi-museum.jpg|thumb|250px|left|इंदिरा गांधी संग्रहालय]]&lt;br /&gt;
[[भारत]] की पूर्व [[प्रधानमंत्री]] श्रीमती [[इंदिरा गांधी]] का राजकीय निवास 1, सफ़दरजंग रोड को अब संग्रहालय में बदल दिया गया है। यहाँ श्रीमती इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत यादें संजाई गई हैं। राष्ट्रीय आन्दोलनों में नेहरू-गांधी परिवार के सहयोग से सम्बन्धित कई छायाचित्र भी यहाँ दर्शनीय हैं। यहाँ 1984 में हुई इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के स्थल को भी दर्शाया गया है। &lt;br /&gt;
*;राष्ट्रीय संग्रहालय&lt;br /&gt;
{{Main|राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली}}&lt;br /&gt;
[[1960]] तक [[राष्ट्रपति भवन]] में चल रहे इस संग्रहालय को 1960 में वर्तमान जगह पर स्थानान्तरित किया गया। यह भारत के ऐतिहासिक एवं महत्त्वपूर्ण संग्रहालयों में से एक है। यहाँ देखने के लिए एक पूरे दिन की आवश्यकता होती है। भारत में कहीं पर भी प्राप्त कलाकृतियों का यह अनूठा संग्रह है। तीन विभिन्न मंज़िलों में बंटे इस संग्रहालय में ऐतिहासिक मानव सभ्यता के अवशेष, मौर्यकालीन, गांधार, गुप्त एवं अन्य राजवंशों के समय के भित्तिचित्र, प्रस्तर खण्ड, ताम्र पत्रादि एवं अनगिनत दुर्लभ कलाकृतियाँ प्रदर्शित हैं। यहीं पर हस्तशिल्प वीथिका में कपड़ा एवं सजावटी वस्तुएँ प्रदर्शित हैं। यहीं पर दिल्ली की खुदाई के अवशेष हैं। यहीं पास में पुराने काग़ज़ात एवं अभिलेख संग्रहित हैं। भारतीय कला एवं संस्कृति से सम्बन्धित पुस्तकें यहीं प्रवेशद्वार से ख़रीदी जा सकती हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:National-Museum-Delhi.jpg|thumb|[[राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय संग्रहालय]]|250px]]&lt;br /&gt;
*;राष्ट्रीय रेल संग्रहालय&lt;br /&gt;
{{Main|राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्ली}}&lt;br /&gt;
अपनी तरह का यह भारत का पहला संग्रहालय है। दस एकड़ क्षेत्र में फैले आठ कोण वाले इस भवन की स्थापना [[1 फ़रवरी]] [[1977]] को हुई थी। यहाँ भारत की दुर्लभ पुरानी रेलगाड़ियाँ संग्रहित हैं। सूचनापरक आन्तरिक संग्रहालय में पुरानी 26 चलायमान गाड़ियाँ, 17 अनूठे मालवाहक डिब्बे एवं कई सैलून हैं। यहाँ बच्चों के लिए एक छोटी खिलौना रेल भी चलती है, जो बच्चों को संग्रहालय में घुमाती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:National-Railway-Museum-Delhi-1.jpg|thumb|राष्ट्रीय रेल संग्रहालय|250px|left]]&lt;br /&gt;
*;प्राकृतिक ऐतिहासिक राष्ट्रीय संग्रहालय&lt;br /&gt;
तानसेन मार्ग पर फ़ैडरेशन हाउस में स्थित इस संग्रहालय पर मृत जानवरों एवं पक्षियों के नमूने दर्शाये गए हैं। यहाँ बच्चों के लिए अक्सर वन्य जीवन से सम्बन्धित चलचित्र प्रदर्शन इत्यादि भी आयोजित किए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*;राष्ट्रीय डाक-तार (फ़िलटैलिक) संग्रहालय&lt;br /&gt;
डाक-तार भवन में स्थित इस संग्रहालय में भारत के प्रथम [[डाक टिकट]], जो सिन्ध डाक द्वारा 1854 में जारी किया गया था, सहित अब तक जारी डाकटिकटों का विशाल एवं दुर्लभ संग्रह है। स्वतंत्रता से पहले डाकटिकट तत्कालीन राजा द्वारा किसी विशेष अवसर पर जारी किए जाते थे, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार द्वारा विशेष अवसरों, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों आदि पर जारी किए जाते हैं। इन सभी डाकटिकटों का यहाँ पर संग्रह है। &lt;br /&gt;
*;नेहरू स्मृति संग्रहालय (तीन मूर्ति भवन)&lt;br /&gt;
यह भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री [[जवाहर लाल नेहरू]] का 16 वर्षों तक निवास स्थान रहा है तथा अब इसे उनकी याद में संग्रहालय एवं शोध पुस्तकालय में बदल दिया गया है। इसका स्वरूप नेहरूकालीन ही रखा गया है। इसके पिछवाड़े में लगा गुलाब के फूलों का बगीचा दर्शनीय है। पर्यटकों के लिए यहाँ 'ट्रस्ट विद डेस्टिनी' नामक दृश्य श्रव्य प्रदर्शन (साउंड एण्ड लाइट शो) आयोजित किया जाता है, जिसमें भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन एवं श्री जवाहर लाल नहेरू के जीवन की झलक दिखाई जाती है। &lt;br /&gt;
*;लाल क़िला संग्रहालय&lt;br /&gt;
यह लाल क़िले के अन्दर मुमताज़ महल में स्थित है। इस संग्रहालय में मुग़लकालीन तलवारें, हुक़्क़ा, शतरंज, ग़लीचे, कपड़े, आईने एवं सिक्के आदि संग्रहित हैं। इसके एक भाग में, जो अन्तिम मुग़ल बादशाह [[बहादुर शाह जफ़र]] को समर्पित हैं, में उनसे सम्बन्धित चाँदी का हुक़्क़ा एवं पहनने के कपड़े आदि संग्रहित हैं। यहाँ दिल्ली का पुराना मानचित्र एवं 1857 की क्रान्ति से सम्बन्धित विशेष सामग्री भी प्रदर्शित है। [[चित्र:Teen Murti Bhavan.jpg|thumb|250px|नेहरू स्मृति संग्रहालय (तीन मूर्ति भवन)]]&lt;br /&gt;
*;स्वतंत्रता संग्रहालय&lt;br /&gt;
लाल क़िले में स्थित इस संग्रहालय में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से सम्बन्धित यादें संजोई गई हैं। 1846-47 का दिल्ली का राजपत्र (गजट) भी यहाँ भली प्रकार से सुरक्षित रखा गया है। यहाँ भारतीय स्वतंत्रता सैनानियों के प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बने आदमक़द पुतले भी दर्शाये गए हैं।&lt;br /&gt;
*;तिब्बती संग्रहालय&lt;br /&gt;
लोदी रोड पर स्थित यह एक छोटा संग्रहालय है, जहाँ तिब्बती कला एवं संस्कृति की झलक देखी जा सकती है। यहाँ 15वीं सदी के तिब्बती जीवन की तंगखास सहित बहुमूल्य संगह है। यहाँ [[बुद्ध]] की तांबे से बनी प्रतिमा दर्शनीय है।&lt;br /&gt;
;दिल्ली के अन्य संग्रहालय हैं&lt;br /&gt;
कोटला रोड पर स्थित बच्चों का संग्रहालय एवं एक्वेरियम, संगीत नाटक अकादमी में स्थित वाद्य यंत्र वीथिका (गैलरी), राष्ट्रीय विज्ञान केन्द्र एवं श्रीनिवास मल्लाह समागार हस्तशिल्प संग्रहालय (थिएटर क्राफ़्ट्स म्यूज़ियम)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कला दीर्घाएँ==&lt;br /&gt;
*;राष्ट्रीय आधुनिक कला दीर्घा&lt;br /&gt;
[[चित्र:Modern-Art-Museum-Delhi.jpg|thumb|राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, दिल्ली|250px]]&lt;br /&gt;
यह देश की एक प्रमुख एवं प्रतिष्ठित दीर्घा है। [[जयपुर]] के तत्कालीन महाराजा के निवास स्थान जयपुर हाउस में 1954 में शुरू हुई इस दीर्घा में 19वीं एवं 20वीं शताब्दी की लगभग 15,000 दुर्लभ कलाकृतियों का संग्रह है। यहाँ का मुख्य आकर्षण है [[नंदलाल बोस]], [[राजा रवि वर्मा]], [[अमृता शेरगिल]] एवं जैमिनी राय द्वारा तैयार की गई उत्कृष्ट कलाकृतियाँ। भारत के कुछ प्रसिद्ध मूर्तिकारों के कार्य को भी इस दीर्घा में प्रदर्शित किया गया है। यहीं पर एक पुस्तकालय एवं विक्रय केन्द्र भी है, जहाँ से पोस्टर, चित्रमय पोस्टकार्ड, कैटलाग आदि ख़रीदे जा सकते हैं। बच्चों में कला के प्रति अभिरूचि पैदा करने के लिए यहाँ समय-समय पर स्कूली बच्चों के लिए विशेष भ्रमण, सभा, फ़िल्म प्रदर्शन इत्यादि भी आयोजित किए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*;ललित कला अकादमी-&lt;br /&gt;
{{main|ललित कला अकादमी}}&lt;br /&gt;
यह अलाभकर संस्था देश की प्रतिभाओं को तराशने का कार्य करती है। यहाँ एक विशेष वीथिका (गैलेरी) फ़िरोजशाह रोड पर रवीन्द्र भवन में स्थित है। &lt;br /&gt;
*;गढ़ी स्टूडियो&lt;br /&gt;
ललित कला अकादमी द्वारा दिल्ली विकास प्राधिकरण की सहायता से कला कुटीर में स्थापित यह स्टूडियो कलाकारों के लिए स्वर्ग है। यह फ़्राँस की राजधानी पेरिस से प्रेरित है, जहाँ कलाकारों को स्टूडियो और लॉजिंग की सुविधा दी जाती है। यहाँ विश्व के ख्यातिप्राप्त कलाकारों के व्याख्यान व प्रदर्शन इत्यादि आयोजित किए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*;त्रिवेणी कला संगम&lt;br /&gt;
तानसेन मार्ग पर स्थित इस सांस्कृतिक केन्द्र में चार गैलेरियाँ आई हुई हैं। ज़मीन तल में स्थापित वीथिका में पुरानी दुर्लभ कलाकृतियाँ हैं, जबकि सबसे बड़ी वीथिका है श्रीराधारानी वीथिका, जहाँ स्थापित एवं नए कलाकारों के शो आयोजित किए जाते हैं। त्रिवेणी वीथिका में कलाकारों के लघु कार्य प्रदर्शित किए जाते हैं। &lt;br /&gt;
{{दिल्ली चित्र सूची3}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|दिल्ली पर्यटन}}&lt;br /&gt;
दिल्‍ली एक आकर्षक [[पर्यटन]] स्थल है। दिल्‍ली में मंदिरों से लेकर मॉल तक, क़िलों से लेकर उद्यान और अनेक ऐतिहासिक इमारतें और क़िले हैं जो [[इतिहास]] की जीवंत निशानियाँ हैं। प्रतिवर्ष लाखों सैलानी दिल्‍ली आते हैं और यहाँ की मिश्रित संस्‍कृति को जानने की कोशिश करते हैं। [[दिल्ली पर्यटन|दिल्‍ली राज्‍य पर्यटन]] और परिवहन विकास निगम पर्यटकों को यहाँ के विभिन्‍न स्‍थानों की [[सैर]] कराने के लिए विशेष बस सेवाएं चलाता है। निगम ने पैरा सेलिंग, पर्वतारोहण और नौकायन जैसी साहसिक गतिविधियों के लिए सुविधाएं विकसित की हैं। निगम ने [[दिल्‍ली हाट]] का विकास किया है, जहाँ काफ़ी और विभिन्‍न राज्‍यों की खाद्य वस्‍तुएँ एक जगह उपलब्‍ध हैं। दिल्‍ली के विभिन्‍न भागों में ऐसी ही 'हाट' बनाने की योजना है।&lt;br /&gt;
{{दिल्ली पर्यटन सूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दर्शनीय स्थल==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली दर्शनीय स्थल सूची}}&lt;br /&gt;
*;अशोक के शिलालेख&lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahmi Lipi-3.jpg|thumb|अशोक के शिलालेख|left|130px]]&lt;br /&gt;
{{Main|अशोक के शिलालेख}}&lt;br /&gt;
कालका जी मन्दिर के पास स्थित बहाईपुर गाँव में हाल में ही [[अशोक महान]] के चट्टानों पर खुदे शिलालेख मिले हैं। ये सभी लघु-शिलालेख अशोक ने अपने राजकर्मचारियों को संबोधित करके लिखवाए हैं। अशोक ने सबसे पहले लघु-शिलालेख ही खुदवाए थे, इसलिए इनकी शैली उसके अन्य लेखों से कुछ भिन्न है। &lt;br /&gt;
*;गांधी स्मृति&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mahatma-Gandhi Place-of-Assassination-Birla-bhavan.jpg|thumb|left|130px|गांधी स्मृति,बिड़ला भवन]]&lt;br /&gt;
बिड़ला भवन के बरामदे में स्थापित यह वह जगह है, जहाँ [[30 जनवरी]], [[1948]] को प्रार्थना सभा में जाते हुए राष्ट्रपिता [[महात्मा गांधी]] की हत्या कर दी गई थी। इसे बाद में स्मारक का रूप दे दिया गया। &lt;br /&gt;
*;हौज ख़ास&lt;br /&gt;
[[अलाउद्दीन खिलजी]] द्वारा सन 1305 में सिरी के निवासियों के लिए बनाया यह ऐसा पिकनिक स्थल है, जो गर्मियों में ठण्डा और सर्दियों में गरम रहता है।&lt;br /&gt;
*;पुराना सचिवालय&lt;br /&gt;
ई. माटुंग थॉमस द्वारा 1912 में यह भवन कुछ ही महीनों में बनकर तैयार हुआ था। अब यहाँ दिल्ली विधानसभा चलती है।&lt;br /&gt;
*;संसद भवन&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sansad-Bhavan-2.jpg|thumb|200px|[[संसद भवन]]]]&lt;br /&gt;
{{Main|संसद भवन}}&lt;br /&gt;
[[नई दिल्ली]] स्थित सर्वाधिक भव्य भवनों में से एक है, जहाँ विश्व में किसी भी देश में मौजूद वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूनों की उज्ज्वल छवि मिलती है । राजधानी में आने वाले भ्रमणार्थी इस भवन को देखने ज़रूर आते हैं जैसा कि [[संसद]] के दोनों सभाएं [[लोक सभा]] और [[राज्य सभा]] इसी भवन के अहाते में स्थित हैं । 144 खम्बों की यह विशाल इमारत 171 मीटर के व्यास में फैली है। हर खम्बे की ऊँचाई 8.3 मीटर है। अदभुत लकड़ी का चौखटा अपनी तरह की कला में एक उत्तम स्थान रखता है। &lt;br /&gt;
*;बेगम सामरू का महल&lt;br /&gt;
यह इलेक्ट्रानिक सामान के थोक एवं फुटकर व्यापार का केन्द्र है। आजकल इसे भागीरथ बिल्डिंग के नाम से जाना जाता है। इसे बेगम सामरू (1753-1836) के रहने के लिए बनाया गया था, जिसने एक लालची सैनिक वाल्टर रेनहर्ड से निकाह कर लिया था।&lt;br /&gt;
*;कोतवाली&lt;br /&gt;
1857 की क्रान्ति के असफल हो जाने के बाद [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने के लिए इसकी स्थापना की थी। कुछ स्वतंत्रता सैनानियों को यहाँ बन्दी बनाकर रखा गया था।  कैप्टन हेडसन द्वारा काटे गए मुग़ल राजकुमारों के सिरों का जुलूस भी यहीं पर लाया गया था। [[चित्र:The-Tomb-Of-Ghayasuddin-Tughlak.jpg|thumb|200px|[[ग़यासुद्दीन तुग़लक़]] का मक़बरा, तुग़लकाबाद|left]]&lt;br /&gt;
*;तुग़लकाबाद&lt;br /&gt;
{{Main|तुग़लकाबाद}}&lt;br /&gt;
दिल्ली का तीसरा हिस्सा, [[ग़यासुद्दीन तुग़लक़]] द्वारा 1321 से 1325 के बीच बसाया हुआ ऊँची पहाड़ी पर बनाया गया क़िला है। अन्दर घुसते ही संगमरमर का बना ग़यासुद्दीन का मक़बरा नज़र आता है। यह क़िला दक्षिण से पूर्व तक मुहम्मद तुग़लक द्वारा बनाए अदिलाबाद क़िले तक फैला है।&lt;br /&gt;
{{दिल्ली चित्र सूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धार्मिक स्थल==&lt;br /&gt;
====हिन्दू धार्मिक स्थल====&lt;br /&gt;
*;भैरव मन्दिर&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] काल में निर्मित यह मन्दिर पुराना क़िला के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहाँ निर्मित गाय के विशाल थन किसी टब के समान प्रतीत होते हैं। यहाँ भैरव के दो मन्दिर हैं, जहाँ एक जगह [[दूध]] से बने पदार्थ चढ़ाये जाते हैं। &lt;br /&gt;
*;लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला मन्दिर) &lt;br /&gt;
[[चित्र:Birla mandir delhi.jpg|thumb|लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला मन्दिर)|200px]]&lt;br /&gt;
यह शहर का सबसे विख्यात [[हिन्दू]] मन्दिर है। [[कनॉट प्लेस]] के पश्चिम में स्थित यह मन्दिर 1938 में उद्योगपति राजा बल्देव बिड़ला द्वारा बनवाया गया था और [[महात्मा गांधी]] ने इसका उदघाटन किया था। यहाँ [[हिन्दू धर्म]] की सभी शाखाओं के [[दर्शन]] किये जा सकते हैं। मन्दिर के पिछले हिस्से में यज्ञशाला के साथ कृत्रिम पहाड़ी, गुफ़ाएँ, झरने आदि बनाए गए हैं। मन्दिर के साथ ही गीता भवन स्थित है, जहाँ भगवान [[श्री कृष्ण]] की विशाल प्रतिमा एवं महाभारतकालीन चित्र हैं। एक तरफ़ भगवान [[बुद्ध]] के जीवन दर्शन की झाँकी देखी जा सकती है।&lt;br /&gt;
*;झंडेवाला देवी मन्दिर&lt;br /&gt;
झंडेवाला देवी मन्दिर हज़ारों श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र है। झंडेवाला देवी मन्दिर का एक प्राचीन [[इतिहास]] है, जिसकी मनमोहनी पौराणिक गाथा एक विशेष भक्त श्री बद्रीदास जी से आंरभ  होती है। बद्री भगत जी इस पावन स्थान पर साधना और ध्यान मग्न होकर प्रार्थना किया करते थे। एक संध्या जब एक स्वास्थ्यवर्धक झरने के पास वह साधना में रत थे, तब उनको अनुभूति हुई कि उसी स्थान पर एक प्राचीन मन्दिर दबा हुआ है। उन्होंने निश्चित किया कि वह इस प्राचीन धरोहर का पुनरोद्धार अवश्य करेंगे। उस दिन से बद्री भगत जी ने अपना तन, मन, धन इस मन्दिर की खोज में लगा दिया। उन्होंने इस क्षेत्र की भूमि ख़रीदनी आरंभ कर दी। अंत में बहुत प्रयत्न के बाद एक स्वास्थ्यदायी झरने के पास उन्हें इस प्राचीन मन्दिर के अवशेष मिले, जिसमें माता की सदियों पुरानी चमत्कारी मूर्ति विराजमान थी। इस मन्दिर की महिमा व ख्याति सारे देश में ही नहीं बल्कि पूरे संसार में फैलने लगी। आज इस मन्दिर में आने वाले हर भगत को मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है। बद्री भगत जी के सपनों को साकार करने में चार पीढ़ियों से उनका परिवार प्रयासरत है। उनकी इस धरोहर का उनके वंशज बद्री भगत झंडेवाला टैंपल सोसाइटी के सदस्यों के सहयोग से प्रबंधन कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
*;आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ मन्दिर&lt;br /&gt;
श्री आद्या कात्यायनी शक्तिपीठ मन्दिर छत्तरपुर की मान्यता एवं विश्वास की बात [[नवरात्र|नवरात्रों]] के प्रतिदिन तीन से चार लाख श्रद्धालुओं का आने से लगायी जा सकती है। संत शिरोमणिपरमपूज्य श्री दुर्गाचरणनुरागी बाबा संत  नागपाल जी इस मन्दिर के संस्थापक थे, जो ब्रह्मलीन हैं। मन्दिर में एक विशाल [[बरगद]] के पेड़ के तने से लाखों धागे बधें हैं। ये सब मनौतियाँ हैं, जब ये पूरी हो जाती हैं तो इन्हें खोलना होता है। यह सिलसिला अनंत है।&lt;br /&gt;
*;कालकाजी मन्दिर&lt;br /&gt;
{{Main|कालकाजी मन्दिर}}&lt;br /&gt;
चिराग दिल्ली फ़्लाई ओवर से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित कालका जी के इस मन्दिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में किया गया था। हालाँकि मन्दिर का विस्तार पिछले 50 सालों का ही है, [[चित्र:Kalkaji temple.jpg|thumb|250px|कालका जी मन्दिर]] लेकिन मन्दिर का सबसे पुराना हिस्सा अठारहवीं शताब्दी का है। दिल्ली के व्यापारियों द्वारा यहाँ निकट ही धर्मशाला भी बनवाई गई है। [[अक्टूबर]]-[[नवम्बर]] में आयोजित वार्षिक नवरात्र महोत्सव के समय देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं।&lt;br /&gt;
*;मां संतोषी मन्दिर&lt;br /&gt;
दो से तीन किलोमीटर लम्बी पंक्तियों में श्रद्धालुओं की कतारें लगी हुई हों और मन्दिर दूधिया रोशनी के साथ जयमाता दी के जयकारों से गूंज रहा हो तो समझ लीजिए कि आप हरी नगर स्थित जेल रोड पर मां संतोषी के प्राचीन मन्दिर के आस-पास हैं। वर्ष में दो बार नवरात्रों का आगमन जब होता है तो हर तरफ श्रद्धा की हवा बहने लगती है। इस मन्दिर में पूजा अर्चना करने वालों का मानना है कि अगर सच्चे मन से मां संतोषी के मंन्दिर में आकर कुछ भी मांगा जाए तो वह अवश्य मिलता है।  &lt;br /&gt;
*;चांदनी चौक का शिव-गौरी मन्दिर&lt;br /&gt;
यह मन्दिर [[चांदनी चौक]] की धरोहर है। चांदनी चौक इलाके में सर्वधर्म सद्भाव की गंगा सारा साल बहती है। शिव-गौरी मन्दिर में मां [[पार्वती]] और जगदम्बा जी के दर्शन कर पुण्य कमाने की होड़ लगी होती है। ख़ूबसूरत संगमरमरी पत्थरों से बना गौरी शंकर मन्दिर हिन्दुओं के लिए आस्था एवं उपासना का महान केन्द्र है।&lt;br /&gt;
*;संकट हरणी मंगल करणी शक्तिपीठ&lt;br /&gt;
भक्तों द्वारा नवरात्रों में शक्तिपीठों व मंदिर में जाकर जो फ़रियाद की जाती है, वह मां भगवती शीघ्र पूरा कराती है, इसी विश्वास का प्रतीक है शाहदरा गोरख पार्क स्थित श्री राजमाता झंडेवाला मन्दिर। ब्रह्मलीन संत शिरोमणि श्री राजमाता जी महाराज के पश्चात संत राजेश्वरानंद राज गुरु जी महाराज स्वयं को श्री राजमाता जी का नुमाइंदा मानकर शब्दों द्वारा, स्पर्श द्वारा, उचित मार्गदर्शन द्वारा दुखियों के दुखों का नाश करने हेतु मानव सेवा में तत्पर रहते हैं। &lt;br /&gt;
श्री अष्टभुजी मां की विशाल प्रतिज्ञा के ठीक नीचे मन्दिर गर्भगृह स्थित पवित्र गुफा में श्री राजमाता जी को समाधि पर भक्त, फूल, वस्त्र, नारियल चुन्नी चढ़ाते हुए बताते हैं कि किसी को विवाह के वर्षों बाद मां की कृपा से संतान प्राप्ति हुई, तो किसी को भीषण रोग के बाद जीवनदान मिला है। किसी को कोर्ट केस से मुक्ति, तो किसी को दरिद्रता के बाद धन-धान्य एवं किसी को अविरल भक्ति प्राप्त हुई। पूर्ण नवरात्रे जनकल्याण व विश्व शांति हेतु संत श्री राज गुरु जी महाराज गुफा में मौन साधना करते हैं। पूर्ण नवरात्रे विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान के साथ फलाहारी भंडारा चलता रहता है एवं दुर्गाष्टमी के अवसर पर शोभा यात्रा निकाली जाती है, जो शुक्र बाज़ार चौक पवित्र राज राजेश्वरी जागरण में जाकर संपन्न होती है, जहाँ महाराज जी द्वारा जयकारों की गूंज के साथ मौन व्रत संपन्न होता है। ऐसा मानना है कि जो भी नि:संतान दंपत्ति इस दिन गोद भरवा कर ले जाते हैं, मां की कृपा से उनकी झोली शीघ्र भरती है। &lt;br /&gt;
;दिल्ली में हिन्दुओं के अन्य मन्दिर हैं-&lt;br /&gt;
सफ़ेद संगमरमर का छतरपुर का दुर्गा मन्दिर, मां सात मंजिला मन्दिर, 1724 में [[जयपुर]] के महाराजा जयसिंह द्वारा खड़कसिंह मार्ग पर स्थित हनुमान मन्दिर, काली बेरी का मन्दिर और जोगमाया का मन्दिर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====जैन धार्मिक स्थल====&lt;br /&gt;
*;अहिंसा स्थल&lt;br /&gt;
[[कुतुबमीनार]] के पास तीन एकड़ क्षेत्र में फैला यह स्थल भव्य बगीचे के बीच भगवान [[महावीर]] की [[कमल]] में स्थित आदमकद प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। [[1980]] में स्थापित यह प्रतिमा 17 फ़ीट ऊँची एवं 50 टन वज़नी है। &lt;br /&gt;
*;दिगम्बर जैन मन्दिर&lt;br /&gt;
शाहजहाँबाद में 1656 में निर्मित यह मन्दिर भगवान आदिनाथ को समर्पित है। यह मन्दिर चेरिटी पक्षी अस्पताल के लिए भी मशहूर है। &lt;br /&gt;
====ईसाई धार्मिक स्थल====&lt;br /&gt;
*; सेक्रेड हार्ट कैथड्रल चर्च &lt;br /&gt;
[[चित्र:Catholic-Church-Delhi.jpg|thumb|सेक्रेड हार्ट कैथड्रल चर्च , दिल्ली|220px]]&lt;br /&gt;
गुरुद्वारा बंगला साहिब मार्ग के पास दिल्ली की दो प्रमुख कान्वेण्ट स्कूलों सेंट कोलम्बिया एवं कान्वेण्ट ऑफ़ जीसस एवं मैरी के मध्य में स्थित सेक्रेड हार्ट कैथड्रल चर्च है। &lt;br /&gt;
*; सेण्ट जेम्स चर्च &lt;br /&gt;
1836 में जेम्स स्कीनर द्वारा बनाई गई सेण्ट जेम्स चर्च दिल्ली का सबसे पुराना चर्च है। पश्चिमी शैली में निर्मित यह चर्च केवल रविवार के दिन ही खुलता है।&lt;br /&gt;
*; सेण्ट थॉमस चर्च  &lt;br /&gt;
दिल्ली में तीसरा चर्च सेण्ट थॉमस चर्च है। जो 1930-32 में उन ईसाईयों के लिए बनाई गई थी, जो [[धर्म]] परिवर्तन करके ईसाई बने हैं। वॉल्टर जॉर्ज नामक वास्तुशिल्पी द्वारा लाल ईटों से निर्मित यह चर्च पंचकुइयाँ मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
====सिक्खों के धार्मिक स्थल====&lt;br /&gt;
*; बंगला साहिब गुरुद्वारा&lt;br /&gt;
यह गुरुद्वारा गुरु हरकिशन साहिबजी की याद में बनाया गया है, जो होशियारपुर से दिल्ली छोटी माता के प्रकोप से दिल्ली वासियों को बचाने आए थे। इस परिसर में गुरु ने निवास किया था [[चित्र:Gurudwara-Bangla-Sahib-Delhi-1.jpg|thumb|गुरुद्वारा बंगला साहिब, दिल्ली|left|200px]] एवं यहाँ पर एक झील भी स्थित है। कहा जाता है कि इसका पानी औषधीय गुण लिए हुए है। &lt;br /&gt;
*; अन्य गुरुद्वारे हैं-&lt;br /&gt;
दमदमा साहिब गुरुद्वारा, रकाबगंज गुरुद्वारा, सीसगंज गुरुद्वारा, मजनूं का टीला गुरुद्वारा इत्यादि।&lt;br /&gt;
====मुस्लिम धार्मिक स्थल==== &lt;br /&gt;
*;चिराग देहलवी दरगाह&lt;br /&gt;
नसीरूद्दीन मोहम्मद की याद में निर्मित इसे रौशन चिराग़ देहलवी के नाम से भी जाना जाता है। &lt;br /&gt;
*;फ़तेहपुर मस्जिद&lt;br /&gt;
सन 1650 में इसे [[शाहजहाँ]] की बीवी फ़तेहपुरी बेगम ने बनवाया था।&lt;br /&gt;
*;हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया&lt;br /&gt;
{{Main|निज़ामुद्दीन दरगाह}}&lt;br /&gt;
चिश्ती संतों में चौथे नम्बर के शेख़ निज़ामुद्दीन चिश्ती को समर्पित यह दरगाह मुस्लिम समाज के लिए अत्यन्त पाक स्थल है। '''हर [[गुरुवार]] शाम को देश के नामी [[क़व्वाल]] यहाँ अपना हुनर दिखाते हैं तथा [[अमीर खुसरो]] की गज़लें गाते हैं।''' यहीं मुसलमानों का [[उर्स]] भी आयोजित किया जाता है। &lt;br /&gt;
*;जामा मस्जिद&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jama-Masjid-Delhi.jpg|thumb|[[जामा मस्जिद दिल्ली|जामा मस्जिद]], दिल्ली|200px]]&lt;br /&gt;
{{Main|जामा मस्जिद दिल्ली}}&lt;br /&gt;
लाल पत्थरों से बनी यह मस्जिद [[मुग़ल काल]] में विश्व की उम्दा मस्जिदों में से एक है। 1644 में इस मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ द्वारा शुरू करवाया गया था और 1650 में यह बनकर तैयार हुई। इस पर तत्कालीन 10 लाख रुपया लागत आई। इसके बीच में एक चबूतरा है, जहाँ पर पूर्व, उत्तर एवं दक्षिण में बनी सीढ़ियों से जाया जा सकता है।&lt;br /&gt;
*;अन्य मुस्लिम धार्मिक स्थल&lt;br /&gt;
खिड़की मस्जिद, मोठ की मस्जिद, सुनहरी मस्जिद, क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार ख़ाँ की दरगाह आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{दिल्ली धार्मिक स्थल सूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रदर्शनी स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pragati-Maidan-Hall.JPG|200px|thumb|[[प्रगति मैदान]], दिल्ली]]&lt;br /&gt;
====प्रगति मैदान====&lt;br /&gt;
{{main|प्रगति मैदान}}&lt;br /&gt;
149 एकड़ क्षेत्र में फैला यह मैदान [[एशिया]] के सर्वोत्तम प्रदर्शनी स्थलों में से एक है। [[मथुरा]] रोड पर पुराने क़िले से आगे स्थित देश के इस सर्वोत्तम मैदान में 54,685 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले 15 विशाल प्रदर्शनी स्थल हैं। इसके अलावा यहाँ 10,000 वर्ग मीटर का खुला क्षेत्र है। जहाँ समय-समय पर व्यापारिक प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाती हैं। इस मैदान में कई दर्शनीय स्थल भी हैं। जैसे- राष्ट्रीय विज्ञान केन्द्र (नेशनल साइंस सेंटर), द हॉल ऑफ़ नेशनल, अदभुत हस्तशिल्प संग्रहालय एवं स्टेट्स पवैलियन (नेशनल हेण्डीक्राफ़्ट्स एंड हेण्डलूम म्यूज़ियम)। इसके अलावा नेहरू पवैलियन एवं डिफ़ैन्स पवैलियन भी दर्शनीय हैं। &lt;br /&gt;
====दिल्ली हाट====&lt;br /&gt;
{{main|दिल्ली हाट}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dilli-Haat.jpg|thumb|200px|[[दिल्ली हाट]], दिल्ली]]&lt;br /&gt;
'लिटिल इण्डिया' के दर्शन कराने वाला यह साप्ताहिक बाज़ार हस्तशिल्प, व्यंजन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए प्रसिद्ध है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के उत्तर में अरबिन्दो मार्ग पर एक एकड़ क्षेत्र में फैला यह बाज़ार दिल्ली पर्यटन, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी), डीसी (हस्तशिल्प) एवं हैण्डलूम का संयुक्त प्रयास है। स्थायी स्थल पर लगने वाला यह बाज़ार किसी ग्रामीण मेले सा प्रतीत होता है। यहाँ हस्तशिल्पी एवं भाग लेने वाले बदलते रहते हैं। प्रत्येक हस्तशिल्पी को दो सप्ताह तक के लिए दी जाने वाली यहाँ कुल 62 स्टॉल हैं, जो क्रमिक रूप से बदलती रहती हैं, ताकि देश-विदेश के अधिकतम हस्तशिल्पों को यहाँ भागीदारी और अपने प्रदर्शित करने का अवसर मिल सके। देश के लगभग सभी प्रान्तों के हस्तशिल्पों को यहाँ पर एक साथ देखा जा सकता है। किसी पर्यटक के लिए पूरे भारत का भ्रमण कठिन हो सकता है, लेकिन वह यहाँ पूरे भारत के हर प्रान्त के खान-पान, हस्तशिल्प एवं संस्कृति की झलक देख सकता है। उचित मूल्य पर आधिकाधिक उत्पाद भी यहाँ से ख़रीदे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==खानपान==&lt;br /&gt;
दिल्‍ली में खाने पीने की बहुत सी दुकानें और भोजनालय हैं। देश के विभिन्‍न प्रांतों के व्‍यंजनों का स्‍वाद लेने के लिए दिल्‍ली हाट का रुख कर सकते हैं। यहां देश के लगभग हर भाग का भोजन मिलता है। कुल मिलाकर दिल्‍ली में हर तरह के भोजन का ज़ायक़ा लिया जा सकता है। दिल्‍ली में चाँदनी चौक एक जगह है जो फ़्रूट चाट, गोल गप्‍पों, पकौड़ों और बहुत सी चीज़ों के लिए मशहूर है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Man-Making-The-Parathas.jpg|thumb|200px|परांठे बनाता आदमी, पराठें वाली गली]]&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पराठें वाली गली&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिल्‍ली की पराठें वाली गली के पराठे वर्षों लोगों की पसंद रहे हैं। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;मिठाई&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
चाँदनी चौक के पास ही दिल्‍ली में मिठाइयों की सबसे पुरानी दुकान घंटेवाला है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;चिकन करी&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
अशोका रोड पर बने आंध्र भवन की चिकन करी (मुर्ग़ तरी वाला) बहुत की पसंद की जाती है। &lt;br /&gt;
{{दिल्ली चित्र सूची5}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ख़रीददारी==&lt;br /&gt;
{{Main|दिल्ली के बाज़ार}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Connaught-Place-Delhi.jpg|thumb|250px|[[कनॉट प्लेस]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Connaught Place, Delhi]]&lt;br /&gt;
दिल्ली में ख़रीददारी के लिए कई स्थल हैं। प्रमुख स्थल हैं- &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;अंबावता कॉम्पलेक्स&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह कॉम्पलेक्स बाबा खड़कसिंह मार्ग पर स्थित है। इस कॉम्पलेक्स में विभिन्न राज्यों के एम्पोरियम खुले हैं, जहाँ सरकारी दरों पर राज्यों के उत्पाद मिलते हैं। [[चाँदनी चौक]], [[कनॉट प्लेस]], [[दिल्ली हॉट]] से पुरानी कलात्मक वस्तुएँ एवं कालीन तथा चाँदी की वस्तुएँ हौज़ ख़ास गाँव से ख़रीदी जा सकती हैं। वहीं आई.एन.ए. (भारतीय राष्ट्रीय सेना) बाज़ार में खाने से सम्बन्धित वस्तुएँ जैसे [[शाक-सब्ज़ी|सब्ज़ी]], [[भारत के फल|फल]], मीट आदि मिलते हैं। &lt;br /&gt;
&amp;lt;center&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; align=&amp;quot;center&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ दिल्ली के बाज़ार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Dilli-Haat.jpg|दिल्ली हाट|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Connaught-Place-Delhi-1.jpg|कनॉट प्लेस|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Bangle-Shop-Delhi.jpg|दिल्ली के बाज़ार में चूड़ियाँ|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Jama-Masjid-Market-Delhi.jpg|जामा मस्जिद का बाज़ार|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Palika-Bazar-Delhi.jpg|पालिका बाज़ार|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Janpath-Market-Delhi.jpg|पालिका बाज़ार|100px|center]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/center&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संस्कृति==&lt;br /&gt;
दिल्ली की [[संस्कृति]] यहाँ के लम्बे इतिहास और [[भारत]] की राजधानी के रूप में ऐतिहासिक स्थिति से पूर्ण प्रभावित रही है, यह शहर में बने कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मारकों से ज्ञात है। [[चित्र:Delhi-Folk.jpg|thumb|left|200px|लोक गीत कलाकार, दिल्ली]] भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने दिल्ली शहर में लगभग 1200 धरोहर स्थल घोषित किए हैं, जो कि विश्व में किसी भी शहर से कहीं अधिक है। महानगर होने की वजह से दिल्ली में भारत के सभी प्रमुख त्‍यौहार मनाए जाते हैं। [[दिल्ली पर्यटन]] और परिवहन विकास निगम कुछ वार्षिक उत्‍सवों का भी आयोजन करते हैं। ये  रौशनआरा उत्‍सव, शालीमार उत्‍सव, कुतुब उत्‍सव, शीतकालीन मेला, उद्यान और पर्यटन मेला, जहाने-ख़ुसरो उत्‍सव तथा आम महोत्‍सव हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाग़-बग़ीचे==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली बाग-बगीचे सूची}}&lt;br /&gt;
दिल्ली में कई बाग़-बग़ीचे है। जिनमें जापानी शैली में बना बुद्ध जयन्ती पार्क, [[कनॉट प्लेस]] के बीच में स्थित सेंट्रल पार्क जो दुकानों में आने-जाने के लिए छोटे मार्ग के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, साथ ही ऑफ़िस आने-जाने वालों के लिए थोड़ी देर सुस्ताने की जगह है। चाणक्यपुरी में स्थित पार्क, डिस्ट्रिक्ट पार्क, लोदी गार्डन, महावीर जयन्ती पार्क, मुग़ल गार्डन, राष्ट्रीय गुलाब पार्क, एशिया का सबसे बड़ा नेशनल ज़ूलोजिकल पार्क (चिड़ियाघर), क्यूडिशा बाग़, रौशन आरा गार्डन आदि हैं। इसके अलावा दिल्ली में [[महात्मा गांधी]] के समाधि स्थल [[राजघाट दिल्ली|राजघाट]], [[जवाहरलाल नेहरू]] के समाधि स्थल शान्तिवन एवं [[लालबहादुर शास्त्री]] के समाधि स्थल विजय घाट को भी बग़ीचों का रूप दिया गया है। &lt;br /&gt;
==बच्चों की दिल्ली==&lt;br /&gt;
दिल्ली में बच्चों के मनोरंजन एवं शिक्षा के लिए बहुत कुछ है। यहाँ बच्चों के लिए मनोरंजन पार्क, विज्ञान केन्द्र हैं, प्लेनेटेरियम (खगोल शिक्षा संग्रहालय) है, संग्रहालय और चिड़ियाघर है। बाल भवन-कोटला रोड पर स्थित बाल भवन में बच्चों के लिए नियमित रूप से नाटक, [[संगीत]], चित्रकारी आदि के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। राष्ट्रीय बाल संग्रहालय एवं विज्ञान सेंटर आदि भी यहीं पर स्थित हैं। बच्चों के लिए पुस्तकालय-चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट, बी.सी.राय मेमोरियल वाचनालय, नेशनल बुक ट्रस्ट, ब्रिटिश कौंसिल पुस्तकालय इत्यादि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==खेल==&lt;br /&gt;
दिल्ली खेलों की दृष्टि से भी काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। [[क्रिकेट]] और फुटबॉल दिल्ली के मुख्य खेल हैं। यहाँ अनेक स्टेडियम मौजूद हैं जैसे- [[फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम]], जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्टेडियम, सिरी फोर्ट कांप्लेक्स, कर्णी सिंह शूटिंग रेंज, तालकटोरा स्टेडियम, त्यागराज स्टेडियम, यमुना स्पोटर्स कांप्लेक्स, आर. के. खन्ना स्टेडियम और [[दिल्ली विश्वविद्यालय]]।&lt;br /&gt;
{{दिल्ली चित्र सूची4}}&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;19वें राष्ट्रमंडल खेल&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|राष्ट्रमंडल खेल 2010}}&lt;br /&gt;
*[[14 अक्टूबर]] [[2010]] को समाप्त हुए 19वें राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी दिल्ली ने की। विभिन्न खेलों के लिए आयोजित किया जाने वाला यह अब तक का सबसे बड़ा आयोजन रहा।&lt;br /&gt;
* भारत पूरे तीन दशकों बाद ऐसे किसी आयोजन का मेज़बान बना। इससे पहले भारत 1982 में एशियाई खेलों की मेज़बानी की थी। इससे पहले भारत [[1982]] में एशियाई खेलों की मेज़बानी कर चुका है। एशिया में भी यह [[1998]] के क्वालालंपुर, मलेशिया के बाद दूसरा बड़ा आयोजन है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://bharat.gov.in/spotlight/spotlight_archive.php?id=48 |title=आधिकारिक वेबसाइट |accessmonthday=[[28 सितंबर]] |accessyear=[[2010]] |last= |first= |authorlink= |format=पीएचपी |publisher= |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* खेलों का शुभारंभ दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में हुआ। इसमें कुल 71 देशों ने भाग लिया। और 2014 में राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी ग्लासगो (स्कॉटलैण्ड और ब्रिटेन) को सौंपी गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दिल्ली पर कविताएँ==&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+(1) दिल्ली (नवनीत पाण्डे द्वारा)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 400px; overflow:auto; overflow-x: hidden; border:thin solid #aaa; width:300px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;300px&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिल्ली&lt;br /&gt;
केवल नाम नहीं है किसी शहर का&lt;br /&gt;
पहचान है एक देश की&lt;br /&gt;
प्राण है एक देश का&lt;br /&gt;
यह अलग बात है-&lt;br /&gt;
दिल्ली में एक नहीं&lt;br /&gt;
कई दिल्लियां हैं-&lt;br /&gt;
पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली,&lt;br /&gt;
दिल्ली कैंट, दिल्ली सदर आदि- आदि&lt;br /&gt;
हर दिल्ली के अपने रंग,&lt;br /&gt;
अपने क़ानून - क़ायदे&lt;br /&gt;
आपकी दिल्ली, मेरी दिल्ली&lt;br /&gt;
ज़ामा मस्ज़िद वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
बिड़ला मंदिर वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
शीशगंज गुरुद्वारे वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
चर्चगेट वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
साहित्य अकादमी वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
हिन्दी ग्रंथ अकादमी वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
एनएसडी वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय वाली दिल्ली&lt;br /&gt;
दिल्ली की सोच में&lt;br /&gt;
दिल्ली दिल वालों की है&lt;br /&gt;
दिल्ली से बाहर की खबर के अनुसार&lt;br /&gt;
दिल्ली दिल्ली वालों की है&lt;br /&gt;
दिल्ली किसकी है?&lt;br /&gt;
इस प्रश्न का सही- सही उत्तर&lt;br /&gt;
स्वयं दिल्ली के पास भी नहीं है&lt;br /&gt;
वह तो सभी को अपना मानती है&lt;br /&gt;
कश्मीर से कन्याकुमारी तक&lt;br /&gt;
पहुंचता है दिल्ली का अख़बार&lt;br /&gt;
हर गली, गांव, शहर की दीवारें उठाए हैं&lt;br /&gt;
दिल्ली के इष्तहार&lt;br /&gt;
आंखे देखती हैं- दिल्ली&lt;br /&gt;
कान सुनते हैं- दिल्ली&lt;br /&gt;
होंठ बोलते हैं- दिल्ली&lt;br /&gt;
सब करते हैं-&lt;br /&gt;
दिल्ली का एतबार&lt;br /&gt;
दिल्ली का इंतज़ार&lt;br /&gt;
दिल्ली की जयकार&lt;br /&gt;
पैरों में पंख लग जाते हैं&lt;br /&gt;
सुनते ही दिल्ली की पुकार&lt;br /&gt;
दुबक जाते हैं सुनते ही&lt;br /&gt;
दिल्ली की फटकार&lt;br /&gt;
दिल्ली की ललकार&lt;br /&gt;
सब को जानती है दिल्ली&lt;br /&gt;
सब को छानती है दिल्ली&lt;br /&gt;
सब को पालती है दिल्ली&lt;br /&gt;
सब को ढालती है दिल्ली&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;'''दिल्लीः'''&lt;br /&gt;
'''अर्थात् प्रेयसी का दिल'''&lt;br /&gt;
'''दिल्लीः'''&lt;br /&gt;
'''अर्थात् प्रेमी की मंजिल'''&lt;br /&gt;
'''दिल्लीः'''&lt;br /&gt;
'''अर्थात् सरकार'''&lt;br /&gt;
'''दिल्लीः'''&lt;br /&gt;
'''अर्थात् दरबार।'''&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80_/_%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%87 |title=दिल्ली / नवनीत पाण्डे |accessmonthday=[[4 मार्च ]]|accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= पी.एच.पी|publisher=कविता कोश |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+(2) दिल्ली (ग़ुलाम मोहम्मद शेख  द्वारा)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 400px; overflow:auto; overflow-x: hidden; border:thin solid #aaa; width:300px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;300px&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
टूटे टिक्कड़ जैसे किले पर&lt;br /&gt;
कच्ची मूली के स्वाद की-सी धूप&lt;br /&gt;
तुगलकाबाद के खंडहरों में घास और पत्थरों का संवनन&lt;br /&gt;
परछाइयों में कमान, कमान में परछाइयाँ;&lt;br /&gt;
खिड़की मस्जिद&lt;br /&gt;
आँखों को बेधकर सुई की मानिंद&lt;br /&gt;
आर-पार निकलती&lt;br /&gt;
जामा-मस्जिद की सीढ़ियों की क़तार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पेड़ की जड़ों से अन्न नली तक उठ खड़ा होता क़ुतुब&lt;br /&gt;
चारों ओर महक&lt;br /&gt;
अनाज की, माँस की, ख़ून की, जेल की, महल की&lt;br /&gt;
बीते हुए कल की, सदियों की&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँस इस क्षण की&lt;br /&gt;
आँख आज की उड़ती है इतिहास में&lt;br /&gt;
उतरती है दरार में ग़ालिब की मजार की&lt;br /&gt;
भटकती है ख़ानखानान की अधखाई हड्डी की खोज में&lt;br /&gt;
ओढ़ जहाँआरा की बदनसीबी को&lt;br /&gt;
निकल पड़ती है मक़बरा दर मक़बरा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभी भी धूल, अभी भी कोहरा&lt;br /&gt;
अब भी नहीं आया कोई फ़र्क माँस ओर पत्थर में&lt;br /&gt;
लाल किले की पश्चिमी कमान में सोई&lt;br /&gt;
फ़ाख्ता की योनि की छत से होती हुई&lt;br /&gt;
घुपती है मेरी आँख में&lt;br /&gt;
किरण एक सूर्य की।&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''अभी तो भोर ही है'''&lt;br /&gt;
'''सत्य को संभोगते हैं स्वप्न'''&lt;br /&gt;
'''सवेरा कैसा होगा ?'''&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80_/_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6_%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%96 |title=दिल्ली / ग़ुलाम मोहम्मद शेख  |accessmonthday=[[5 मार्च ]]|accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= पी.एच.पी|publisher=कविता कोश |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Sabz-Burj-Delhi-3.jpg|सब्ज बुर्ज़, दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:National-Railway-Museum-Delhi-1.jpg|[[राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय रेल संग्रहालय]], दिल्ली &lt;br /&gt;
चित्र:Sabz-Burj-Delhi-2.jpg|सब्ज बुर्ज़, दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|[[क़ुतुब मीनार]], दिल्ली &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-5.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-1.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-2.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-3.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-4.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-8.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-10.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun's-Tomb-Delhi-1.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-12.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-6.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:National-Railway-Museum-Delhi.jpg|[[राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय रेल संग्रहालय]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-17.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-18.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-19.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
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चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-26.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-29.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-30.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:India-Gate-4.jpg|[[इंडिया गेट]], दिल्ली &lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-9.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-31.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-33.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-34.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-35.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-7.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-36.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Humayun-Tomb-Delhi-11.jpg|[[हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली&lt;br /&gt;
चित्र:Pragati-Maidan-Station.jpg|[[प्रगति मैदान]] मैट्रो स्टेशन, दिल्ली&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली बाहरी कड़ियाँ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}{{संसद}}{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>खुशी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=217184</id>
		<title>गंगा नदी</title>
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		<updated>2011-09-13T12:36:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा नदी&lt;br /&gt;
|चित्र=Ganga-River-Varanasi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=गंगा नदी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|देश=[[भारत]], [[नेपाल]] और [[बांग्लादेश]]&lt;br /&gt;
|राज्य=[[हिमाचल प्रदेश]], [[उत्तराखंड]], [[उत्तर प्रदेश]], [[मध्य प्रदेश]], [[बिहार]] और [[पश्चिम बंगाल]]&lt;br /&gt;
|प्रमुख नगर=[[हरिद्वार]], [[कन्नौज]], [[कानपुर]], [[वाराणसी]], [[भागलपुर]] और [[मुर्शिदाबाद ज़िला]]&lt;br /&gt;
|प्रवाह समय=&lt;br /&gt;
|उद्गम स्थल=[[गंगोत्री]], [[उत्तराखंड]] &lt;br /&gt;
|विसर्जन स्थल=&lt;br /&gt;
|लम्बाई=2,510 किमी&lt;br /&gt;
|अधिकतम गहराई=&lt;br /&gt;
|अधिकतम चौड़ाई=&lt;br /&gt;
|इससे जुड़ी नहरें=&lt;br /&gt;
|जलचर=&lt;br /&gt;
|सहायक नदियाँ=[[यमुना]], [[रामगंगा नदी|रामगंगा]], [[घाघरा नदी|घाघरा]], [[ताप्ती नदी|ताप्ती]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[कोसी नदी|कोसी]] आदि&lt;br /&gt;
|पौराणिक उल्लेख=[[ब्रह्माण्ड पुराण]] के अनुसार गंगा को [[विष्णु]] के पाँव से एवं [[शिव]] के जटाजूट में अवस्थित माना गया है। &lt;br /&gt;
|धार्मिक महत्त्व=[[भारत]] की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। &lt;br /&gt;
|ऐतिहासिक महत्त्व=ऐतिहासिक रूप से गंगा के मैदान से ही हिन्दुस्तान का हृदय स्थल निर्मित है और वही बाद में आने वाली विभिन्न सभ्यताओं का पालना बना। [[अशोक]] के साम्राज्य का केन्द्र पाटलिपुत्र ([[पटना]]), [[बिहार]] में गंगा के तट पर बसा हुआ था। &lt;br /&gt;
|गूगल मानचित्र=[http://maps.google.co.in/maps?q=Ganga+River,+Varanasi,+Uttar+Pradesh&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=25.165795,82.959137&amp;amp;spn=0.424462,0.727158&amp;amp;sll=27.624803,81.604944&amp;amp;sspn=13.273661,23.269043&amp;amp;t=h&amp;amp;z=11&amp;amp;iwloc=A गंगा नदी]&lt;br /&gt;
|वर्तमान स्थिति=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=17:13, 5 अगस्त 2011 (IST)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा, उत्तर भारत के मैदानों की विशाल नदी है। गंगा भारत और [[बांग्लादेश]] में मिलकर 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई [[उत्तरांचल]] में [[हिमालय]] से निकलकर [[बंगाल की खाड़ी]] में भारत के लगभग एक-चौथाई भूक्षेत्र को अपवाहित करती है तथा अपने बेसिन में बसे विराट जनसमुदाय के जीवन का आधार बनती है। जिस गंगा के मैदान से होकर यह प्रवाहित होती है, वह इस क्षेत्र का हृदय स्थल है, जिसे हिन्दुस्तान कहते हैं। यहाँ तीसरी सदी में [[अशोक|अशोक महान]] के साम्राज्य से लेकर 16वीं सदी में स्थापित [[मुग़ल साम्राज्य]] तक सारी सभ्यताएँ विकसित हुईं। गंगा नदी अपना अधिकांश सफ़र भारतीय इलाक़े में ही तय करती है, लेकिन उसके विशाल डेल्टा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा बांग्लादेश में है। गंगा के प्रवाह की सामान्यत: दिशा उत्तर-पश्चिमोत्तर से दक्षिण-पूर्व की तरफ है और डेल्टा क्षेत्र में प्रवाह आमतौर से दक्षिण मुखी है।&lt;br /&gt;
====नामकरण====&lt;br /&gt;
भारतीय [[भाषा|भाषाओं]] में तथा अधिकृत रूप से गंगा नदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके अंग्रेज़ीकृत नाम ‘द गैंगीज़’ से ही जाना जाता है। गंगा सहस्राब्दियों से [[हिन्दू|हिन्दुओं]] की पवित्र तथा पूजनीय नदी रही है। अपने अधिकांश मार्ग में गंगा एक चौड़ी व मंद धारा है और विश्व के सबसे ज़्यादा उपजाऊ और घनी आबादी वाले इलाक़ों से होकर बहती है। इतने महत्व के बावज़ूद इसकी लम्बाई 2,510 किलोमीटर है, जो एशिया या विश्व स्तर की तुलना में कोई बहुत ज़्यादा नहीं है।&lt;br /&gt;
====पतितपावनी नदी====&lt;br /&gt;
भारत की पावन नदी, जिसकी जलधारा में स्नान से पापमुक्ति और जलपान से शुद्धि होती है। यह प्रसिद्ध नदी, [[हिमाचल प्रदेश]] में [[गंगोत्री]] से निकलकर [[मध्यदेश]] से होती हुई [[पश्चिम बंगाल]] के परे गंगासागर में मिलती है। गंगा की घाटी संसार की उर्वरतम घाटियों में से एक है और [[सरयू नदी|सरयू]], [[यमुना नदी|यमुना]], [[सोन नदी|सोन]] आदि अनेक नदियाँ उससे आ मिलती हैं। उसकी घाटी भारतीय सभ्यता के विकास में अन्यतम रही हैं। गंगा को [[संस्कृति|भारतीय संस्कृति]] में विशिष्ट योगदान के कारण ही उसे असाधारण महिमा मिली है, जिससे वह ‘पतितपावनी’ कहलाती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gangotri.jpg|thumb|[[गंगोत्री]]|left|250px]]&lt;br /&gt;
==उद्गम स्थल==&lt;br /&gt;
3900 मीटर ऊँचा गौमुख ([[गंगोत्री]]) गंगा का उदगम स्थल है। जो [[उत्तराखंड]] राज्य में स्थित है। गंगोत्री में गंगा का उदगम स्रोत यहाँ से लगभग 24 किलोमीटर दूर गंगोत्री ग्लेशियर में 4,225 मीटर की ऊँचाई पर होने का अनुमान है। गंगा की धारा, जो पहाड़ों में मंदाकिनी और [[अलकनन्दा नदी|अलकनन्दा]] की धाराओं के सम्मिलन से बनती है, हिमालय में अत्यन्त क्षीण है और [[हरिद्वार]] के ऊपर कनखल के समीप उत्तरी मैदान में प्रशस्त होकर बहती है और बरसात में उसके [[जल]] का [[वेग]] भयावह हो उठता है। गंगा नदी देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। 2,071 किलोमीटर तक भारत तथा उसके बाद [[बांग्लादेश]] में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31 मीटर) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। अपने सौंदर्य और महत्त्व के कारण एक ओर जहाँ [[पुराण और साहित्य में गंगा|पुराण और साहित्य में इसका उल्लेख]] बार-बार मिलता है, वहीं विदेशी साहित्य में भी गंगा नदी के प्रति प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णनों की कमी नहीं।&lt;br /&gt;
==भौतिक विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
====भू-आकृति====&lt;br /&gt;
गंगा का उद्गम दक्षिणी [[हिमालय]] में [[तिब्बत]] सीमा के भारतीय हिस्से से होता है। इसकी पाँच आरम्भिक धाराओं [[भागीरथी नदी|भागीरथी]], अलकनन्दा, मंदाकिनी, धौलीगंगा तथा पिंडर का उद्गम [[उत्तराखण्ड]] क्षेत्र, जो [[उत्तर प्रदेश]] का एक संभाग था (वर्तमान उत्तरांचल राज्य) में होता है। दो प्रमुख धाराओं में बड़ी अलकनन्दा का उद्गम हिमालय के [[नंदा देवी पर्वत|नंदा देवी शिखर]] से 48 किलोमीटर दूर तथा दूसरी भागीरथी का उद्गम हिमालय की गंगोत्री नामक [[हिमनद]] के रूप में 3, 050 मीटर की ऊँचाई पर बर्फ़ की गुफ़ा में होता है। गंगोत्री हिन्दुओं का एक तीर्थ स्थान है। वैसे गंगोत्री से 21 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व स्थित गोमुख को गंगा का वास्तविक उद्गम स्थल माना जाता है। [[चित्र:Haridwar.jpg|300px|thumb|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt;Ganga River, Haridwar]]  गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है जो [[कुमाऊँ]] में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनद से निकलती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;टीडीआईएल&amp;quot;/&amp;gt; गंगा के इस उद्गम स्थल की ऊँचाई 3140 मीटर है। यहाँ गंगा जी को समर्पित एक मंदिर भी है। [[गंगोत्री]] तीर्थ, शहर से 19 किलोमीटर उत्तर की ओर 3892 मीटर (12,770 फीट) की ऊँचाई पर इस हिमनद का मुख है। यह हिमनद 25 किलोमीटर लंबा व 4 किलोमीटर चौड़ा और लगभग 40 मीटर ऊँचा है। इसी ग्लेशियर से भागीरथी एक छोटे से गुफ़ानुमा मुख पर अवतरित होती है। इसका जल स्रोत 5000 मीटर ऊँचाई पर स्थित एक बेसिन है। इस बेसिन का मूल पश्चिमी ढलान की संतोपंथ की चोटियों में है। गौमुख के रास्ते में 3600 मीटर ऊँचे चिरबासा ग्राम से विशाल गोमुख हिमनद के दर्शन होते हैं। इस हिमनद में [[नंदा देवी पर्वत]], [[कामत पर्वत]] एवं त्रिशूल पर्वत का हिम पिघल कर आता है। [[अलकनंदा नदी]] की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। धौली गंगा का अलकनंदा से विष्णु प्रयाग में संगम होता है। यह 1372 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। फिर 2805 मीटर ऊँचे नंद प्रयाग में अलकनन्दा का नंदाकिनी नदी से संगम होता है। इसके बाद कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा का कर्ण गंगा या पिंडर नदी से संगम होता है। फिर [[ऋषिकेश]] से 139 किलोमीटर दूर स्थित रुद्र प्रयाग में अलकनंदा मंदाकिनी से मिलती है। इसके बाद भागीरथी व अलकनन्दा 1500 फीट पर स्थित देव प्रयाग में संगम करती हैं यहाँ से यह सम्मिलित जल-धारा गंगा नदी के नाम से आगे प्रवाहित होती है। इन पांच प्रयागों को सम्मिलित रूप से पंच प्रयाग कहा जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;टीडीआईएल&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url= http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/utrn0078.htm|title= उत्तरांचल-एक परिचय|accessmonthday=[[28 अप्रॅल]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= टीडीआईएल|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार 200 किलोमीटर का संकरा पहाड़ी रास्ता तय करके गंगा नदी [[ऋषिकेश]] होते हुए प्रथम बार मैदानों का स्पर्श [[हरिद्वार]] में करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होने के बाद यह गंगा के रूप में दक्षिण [[हिमालय]] से ऋषिकेश के निकट बाहर आती है और हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। हरिद्वार भी हिन्दुओं का तीर्थ स्थान है। नदी के प्रवाह में मौसम के अनुसार आने वाले थोड़े बहुत परिवर्तन के बावज़ूद इसके [[जल]] की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि तब होती है, जब इसमें अन्य सहायक नदियाँ मिलती हैं तथा यह अधिक वर्षा वाले इलाक़े में प्रवेश करती है। एक तरफ [[अप्रॅल]] से [[जून]] के बीच हिमालय में पिघलने वाली बर्फ़ से इसका पोषण होता है, वहीं दूसरी ओर [[जुलाई]] से [[सितम्बर]] के बीच का मानसून इसमें आने वाली बाढ़ों का कारण बनता है। उत्तर प्रदेश राज्य में इसके दाहिने तट की सहायक नदियाँ, यमुना राजधानी [[दिल्ली]] होते हुए [[इलाहाबाद]] में गंगा में शामिल होती हैं तथा टोन्स नदी हैं, जो [[मध्य प्रदेश]] के [[विंध्याचल पर्वत|विंध्याचल]] से निकलकर उत्तर की तरफ़ प्रवाहित होती है और शीघ्र ही गंगा में शामिल हो जाती हैं। उत्तर प्रदेश में बाईं तरफ़ की सहायक नदियाँ [[रामगंगा नदी|रामगंगा]], [[गोमती नदी|गोमती]] तथा [[घाघरा नदी|घाघरा]] हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद गंगा [[बिहार]] राज्य में प्रवेश करती है, जहाँ इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हिमालय क्षेत्र की तरफ़ से  [[गंडक नदी|गंडक]], [[गंडक नदी|बूढ़ी गंडक]], [[कोसी नदी|कोसी]] तथा घुघरी हैं। दक्षिण की तरफ़ से इसकी मुख्य सहायक नदी [[सोन नदी|सोन]] है। यहाँ से यह नदी राजमहल पहाड़ियों का चक्कर लगाती हुई दक्षिण-पूर्व में फरक्का तक पहुँचती है, जो इस डेल्टा का सर्वोच्च बिन्दु है। यहाँ से गंगा भारत में अन्तिम राज्य [[पश्चिम बंगाल]] में प्रवेश करती है, जहाँ उत्तर की तरफ़ से इसमें महानंदा मिलती है (समूचे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में स्थानीय आबादी गंगा को [[पद्मा नदी|पद्मा]] कहकर पुकारती है)। गंगा के डेल्टा की सुदूर पश्चिमी शाखा [[हुगली नदी|हुगली]] है, जिसके तट पर महानगर [[कोलकाता]] (भूतपूर्व कलकत्ता) बसा हुआ है। स्वयं हुगली में पश्चिम से आकर उसकी दो सहायक नदियाँ [[दामोदर नदी|दामोदर]] व रूपनारायण शामिल होती हैं। बांग्लादेश में ग्वालंदो घाट के निकट गंगा में विशाल [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] शामिल होती है (इन दोनों के संगम के 241 किलोमीटर पहले तक इसे फिर यमुना के नाम से बुलाया जाता है)। गंगा और ब्रह्मपुत्र की संयुक्त धारा ही पद्मा कहलाने लगती है और चाँदपुर के निकट वह मेघना में शामिल हो जाती है। इसके बाद यह विराट जलराशि अनेक प्रवाहों में विभाजित होकर [[बंगाल की खाड़ी]] में समा जाती है। बांग्लादेश की राजधानी ढाका धालेश्वदी नदी की सहायक नदी बूढ़ी गंगा के तट पर स्थित है। जिन नदी शाखाओं से गंगा का डेल्टा बनता है, उसकी हुगली और मेघना के अलावा अन्य शाखाएँ पश्चिम बंगाल में जलांगी और बांग्लादेश में मातागंगा, भैरब, काबाडक, गराई-मधुमती तथा अरियल खान हैं।&lt;br /&gt;
*डेल्टा क्षेत्र में स्थित गंगा की सभी सहायक नदियाँ और शाखाएँ मौसम में परिवर्तनों के कारण अक्सर अपना रास्ता बदल लेती हैं। ये परिवर्तन विशेषकर 1750 ई. के बाद से ज़्यादा होने लगे हैं। ब्रह्मपुत्र 1785 ई. तक मैमनसिंह शहर के पास से बहती थी, अब यह वहाँ से 64 किलोमीटर पश्चिम में गंगा में मिलती है।&lt;br /&gt;
*गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की नदी घाटियों से बहकर आई हुई गाद से बने डेल्टा का क्षेत्रफल 60,000 वर्ग किलोमीटर है तथा उसका निर्माण [[मिट्टी]], रेत तथा [[खड़िया]] की क्रमिक परतों से हुआ है। यहाँ पर सड़ी-गली वनस्पति (पीट) लिग्नाइट (भूरे कोयले) की परतें भी उन इलाक़ों में मिलती हैं, जहाँ पहले घने वन हुआ करते थे। डेल्टा में नहरों के आसपास बाद में प्राकृतिक रूप से बहुत-सा खादर भी जमा हुआ है।&lt;br /&gt;
*गंगा डेल्टा की दक्षिणी सतह का निर्माण तेज़ गति से तथा तुलनात्मक रूप से हाल में बहकर आई गाद की भारी मात्रा से हुआ है। पूरब में समुद्र की तरफ़ इसी गाद के कारण बड़ी तेज़ी से नए-नए भूक्षेत्र (नदी द्वीप) बनते जा रहे हैं, जिन्हें ‘चार’ कहते हैं। वैसे डेल्टा का पश्चिमी समुद्री तट 18वीं सदी के बाद से लगभग अपरिवर्तित है।&lt;br /&gt;
*पश्चिम बंगाल की नदियों का प्रवाह बहुत धीमा है और उनसे काफ़ी कम पानी समुद्र में प्रवाहित होता है। बांग्लादेशी डेल्टा क्षेत्र में नदियाँ चौड़ी तथा गतिमान हैं और उनमें पानी विपुल मात्रा में बहता है। ये नदियाँ अनेक संकरी पहाड़ियों से परस्पर जुड़ी हुई हैं।&lt;br /&gt;
*वर्षा ऋतु (जून से [[अक्टूबर]]) में इस इलाक़े में कृत्रिम रूप से निर्मित उच्चभूमि पर बसाए गए गाँव कई फ़ीट पानी में डूब जाते हैं। इस मौसम में इन बस्तियों के बीच आवागमन का एकमात्र साधन नौकाएँ ही होती हैं।&lt;br /&gt;
*समूचे डेल्टा क्षेत्र का समुद्रतटीय इलाक़ा दलदली है। यह पूरा क्षेत्र सुन्दरवन कहलाता है और [[भारत]] व [[बांग्लादेश]], दोनों ने इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर रखा है।&lt;br /&gt;
*इस डेल्टा के कुछ हिस्सों में जंगली वनस्पतियों तथा धान से निर्मित पीट की परतें हैं। अनेक प्राकृतिक खाइयों (बिलों) में उस पीट के बनने की क्रिया जारी है। जिसका उपयोग स्थानीय किसान खाद, सुखाकर घरेलू तथा औद्योगिक ईधन के रूप में करते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gaumukh-Gangotri-Glacier.jpg|thumb|250px|left|[[गंगोत्री]] हिमनद में [[गौमुख]]&amp;lt;br /&amp;gt;Gomukh in Gangotri Himnad]] &lt;br /&gt;
====जलवायु====&lt;br /&gt;
गंगा के बेसिन में इस उपमहाद्वीप की विशालतम नदी प्रणाली स्थित है। यहाँ [[जल]] की आपूर्ति मुख्यत: [[जुलाई]] से [[अक्टूबर]] के बीच दक्षिण-पश्चिमी मानसून तथा अप्रॅल से जून के बीच ग्रीष्म ऋतु के दौरान पिघलने वाली [[हिमालय]] की बर्फ़ से होती है। नदी के बेसिन में मानसून के उन कटिबंधीय तूफ़ानों से भी वर्षा होती है, जो जून से अक्टूबर के बीच बंगाल की खाड़ी में पैदा होते हैं। [[दिसम्बर]] और [[जनवरी]] में बहुत कम मात्रा में वर्षा होती है। औसत वार्षिक वर्षा बेसिन के पश्चिमी सिरे में 760 मिलीमीटर से लेकर पूर्वी सिरे पर 2,286 मिलीमीटर के बीच होती है ([[उत्तर प्रदेश]] में गंगा के ऊपरी कछार में जहाँ औसत वर्षा 762 से 1,016 मिलीमीटर होती है, वहीं बिहार के मध्यवर्ती मैदान में यह औसत 1,016 से 1,524 मिलीमीटर तथा डेल्टा क्षेत्र में 1,524 से 2,540 मिलीमीटर के बीच है)। डेल्टा क्षेत्र में मानसून के प्रारम्भ ([[मार्च]] से [[मई]]) तथा मानसून के अन्त ([[सितम्बर]] से [[अक्टूबर]]) में ज़ोरदार चक्रवाती समुद्री तूफ़ान आते हैं। इनसे काफ़ी बड़ी मात्रा में मानव जीवन, सम्पत्ति, फ़सलों तथा पशुओं का नुक़सान होता है। ऐसा ही एक भीषण विनाशकारी तूफ़ान [[नवम्बर]], [[1970]] में आया था, जिसमें कम से कम दो लाख और अधिक से अधिक पाँच लाख लोगों की मौत हुई थी। चूँकि गंगा के मैदान में उतार-चढ़ाव लगभग न के बराबर है, अत: नदी प्रवाह की गति धीमी है। [[दिल्ली]] में [[यमुना नदी]] से लेकर बंगाल की खाड़ी के 1,609 किलोमीटर के सम्पूर्ण फ़ासले में भूतल की ऊँचाई में मात्र 213 मीटर की कमी आती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान का कुल विस्तार 7,77,000 वर्ग किलोमीटर है। इस मैदान में मिट्टी की सतह, जो कहीं-कहीं 1,829 मीटर से भी ज़्यादा है, सम्भवत: 10 हज़ार वर्ष से अधिक पुरानी नहीं है।&lt;br /&gt;
====वनस्पति====&lt;br /&gt;
गंगा-यमुना के इलाक़े में कभी घने जंगल हुआ करते थे। ऐतिहासिक ग्रन्थों से पता चलता है कि 16वीं और 17वीं सदी तक यहाँ जंगली [[हाथी]], गौर, [[बारहसिंगा]], गैंडा, [[बाघ]] तथा [[सिंह|शेर]] का शिकार होता था। गंगा के सम्पूर्ण बेसिन से वहाँ की मूल प्राकृतिक वनस्पतियाँ लुप्त हो गई हैं और वहाँ अब लगातार बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए व्यापक रूप में खेती की जाती है। हिरन, जंगली सूअर, जंगली बिल्लियाँ तथा कुछ भेड़िए, भालू, सियार और लोमड़ी को छोड़कर जंगली जानवर बहुत कम हैं। डेल्टा के सुन्दरवन इलाक़े में बंगाल टाइगर (शेर), मगरमच्छ तथा दलदली हिरन अब भी मिल जाते हैं। नदियों में, ख़ासतौर से डेल्टा क्षेत्र में मछलियाँ विपुल मात्रा में पाई जाती हैं और स्थानीय निवासियों के भोजन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ पर मैना, तोता, कौआ, चील, तीतर और मुर्ग़ाबी जैसे पक्षियों की भी कई क़िस्में पाई जाती हैं। जाड़े के मौसम में बत्तख़ और चाहा पक्षी ऊँचे हिमालय को पार करके दक्षिण में पानी से घिरे क्षेत्रों की तरफ़ प्रवास करते हैं। बंगाल के इलाक़े में आमतौर से पाई जाने वाली मछलियों में फ़ेदर बैक (नोटोप्टेरिडी), वॉकिंग कैटफ़िश, गोरामि (एनाबैंटिडी) तथा मिल्कफ़िश (चैनिडी), बार्ब (सिप्राइनिडी) आदि प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
====जनजीवन====&lt;br /&gt;
गंगा के बेसिन के निवासी नृजातीय रूप से मिश्रित मूल के हैं। पश्चिम और मध्य बेसिन में वे मूलत: [[आर्य]] पूर्वजों की सन्तान थे। बाद में तुर्क, [[मंगोल]], अफ़ग़ानी, फ़ारसी तथा अरब लोग पश्चिम से आय और अंतमिश्रित हो गए। पूरब और दक्षिण, ख़ासतौर से बंगाल के इलाक़े में तिब्बती, बर्मी तथा विविध नस्ल के पहाड़ी लोग भी मिलते हैं। इनसे भी बाद में आने वाले यूरोपीय लोग यहाँ न तो बसे और न ही स्थानीय लोगों के साथ [[विवाह]] सम्बन्ध बनाये।&lt;br /&gt;
====गंगा का मैदान====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Garwhal-Gangotri-Waterfall.jpg|thumb|180px|[[गंगोत्री]] झरना, [[गढ़वाल]]&amp;lt;br /&amp;gt;Gangotri Waterfall, Garhwal]]&lt;br /&gt;
गंगा, इलाहाबाद (प्रयाग) हरिद्वार से लगभग 800 किलोमीटर मैदानी यात्रा करते हुए [[गढ़मुक्तेश्वर]],सोरों, [[फ़र्रुख़ाबाद]], [[कन्नौज]], [[बिठूर]], [[कानपुर]] होते हुए पहुँचती है। यहाँ इसका संगम [[यमुना नदी|यमुना]] नदी से होता है। यह संगम स्थल हिन्दुओं का एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। इसे तीर्थराज प्रयाग कहा जाता है। इसके बाद हिन्दू धर्म की प्रमुख मोक्षदायिनी नगरी [[काशी]] ([[वाराणसी]]) में गंगा एक वक्र लेती है, जिससे यह यहाँ उत्तरवाहिनी कहलाती है। यहाँ से [[मिर्ज़ापुर]], [[पटना]], [[भागलपुर]] होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें बहुत-सी सहायक नदियाँ, जैसे [[सोन नदी|सोन]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[घाघरा नदी|घाघरा]], [[कोसी नदी|कोसी]] आदि मिल जाती हैं। [[भागलपुर]] में राजमहल की पहाड़ियों से यह दक्षिणवर्ती होती है। पश्चिम बंगाल के [[मुर्शिदाबाद ज़िला|मुर्शिदाबाद ज़िले]] के गिरिया स्थान के पास गंगा नदी दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है-भागीरथी और पद्मा। [[भागीरथी नदी]] गिरिया से दक्षिण की ओर बहने लगती है जबकि पद्मा नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती फरक्का बैराज ([[1974]] निर्मित) से छनते हुई बंगला देश में प्रवेश करती है। यहाँ से गंगा का डेल्टाई भाग शुरू हो जाता है। मुर्शिदाबाद शहर से हुगली शहर तक गंगा का नाम भागीरथी नदी तथा हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम [[हुगली नदी]] है। गंगा का यह मैदान मूलत: एक भू-अभिनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वतमाला निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में लगभग 6-4 करोड़ वर्ष पहले हुआ था। तब से इसे हिमालय और प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ लाए हुए अवसादों से पाट रही हैं। इन मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000 मीटर है। इस मैदान में नदी की प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और निक्षेपण स्थलाकॄतियाँ, जैसे- बालू-रोधका, विसर्प, गोखुर झीलें और गुंफित नदियाँ पाई जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://vimi.wordpress.com/2009/02/22/bharat_sanrachana/|title=भारत की भौतिक संरचना|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=पर्यावरण के विभिन्न घटक|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
=====गंगा के तट पर बसे नगर=====&lt;br /&gt;
गंगा के मैदान में अनेक नगर बसे, जिनमें मुख्य रूप से रूड़की, [[सहारनपुर]], [[मेरठ]], आगरा (मशहूर मक़बरे [[ताजमहल]] का शहर), [[मथुरा]] (भगवान [[श्रीकृष्ण]] की जन्मस्थली के रूप में पूजनीय), [[अलीगढ़]], कानपुर, [[बरेली]], [[लखनऊ]], [[इलाहाबाद]], [[वाराणसी]] (पवित्र शहर बनारस), [[पटना]], [[भागलपुर]], राजशाही, मुर्शिदाबाद, बर्दवान (वर्द्धमान), कलकत्ता, हावड़ा, ढाका, खुलना और बारीसाल उल्लेखनीय हैं। डेल्टा क्षेत्र में कलकत्ता और उसके उपनगर हुगली के दोनों किनारों पर लगभग 80 किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं व भारत के जनसंख्या, व्यापार तथा उद्योग को दृष्टि से सबसे घने बसे हुए इलाक़ों में गिने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====सुंदरवन डेल्टा====&lt;br /&gt;
{{Main|सुंदरवन}}&lt;br /&gt;
हुगली नदी [[कोलकाता]], हावड़ा होते हुए [[सुंदरवन]] के भारतीय भाग में सागर से संगम करती है। पद्मा में [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] से निकली शाखा नदी [[जमुना नदी]] एवं मेघना नदी मिलती हैं। अंततः ये 350 किलोमीटर चौड़े सुंदरवन डेल्टा में जाकर [[बंगाल की खाड़ी]] में सागर-संगम करती है। यह डेल्टा गंगा एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई नवीन जलोढ़ से 1,000 वर्षों में निर्मित समतल एवं निम्न मैदान है। यहाँ गंगा और बंगाल की खाड़ी के संगम पर एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है जिसे गंगा-सागर-संगम कहते हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;इंडियानेट&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url= http://www.indianetzone.com/2/ganga_river.htm|title= गंगा रिवर|accessmonthday=[[14 जून]]|accessyear=[[2009]]|format= एचटीएम|publisher=इण्डिया नेट ज़ोन |language=[[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt; विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा (सुंदरवन) बहुत सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध [[बाघ|बंगाल टाईगर]] का निवास स्थान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;इंडियानेट&amp;quot;/&amp;gt; [[चित्र:Haridwar1.jpg|250px|thumb|left|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt;Ganga River, Haridwar]] यह डेल्टा धीरे धीरे सागर की ओर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले कोलकाता सागर तट पर ही स्थित था और सागर का विस्तार राजमहल तथा सिलहट तक था, परन्तु अब यह तट से 15-20 मील (24-32 किलोमीटर) दूर स्थित लगभग 1,80,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। जब डेल्टा का सागर की ओर निरन्तर विस्तार होता है तो उसे प्रगतिशील डेल्टा कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिहं |first=सविन्द्र |title= भौतिक भूगोल |year=जुलाई 2002 |publisher=वसुन्धरा प्रकाशन |location=गोरखपुर |id= |page=247-248 |accessday= 3|accessmonth= जून|accessyear= 2009}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीव-जन्तु==&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि 16वीं तथा 17वीं शताब्दी तक गंगा-यमुना प्रदेश घने वनों से ढका हुआ था। इन वनों में जंगली [[हाथी]], भैंस, गेंडा, शेर, [[बाघ]] तथा गवल का शिकार होता था। गंगा का तटवर्ती क्षेत्र अपने शांत व अनुकूल पर्यावरण के कारण रंग-बिरंगे पक्षियों का संसार अपने आंचल में संजोए हुए है। इसमें मछलियों की 140 प्रजातियाँ, 35 सरीसृप तथा इसके तट पर 42 स्तनधारी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://jajbat.blogspot.com/2008_05_01_archive.html|title=हमारी नदियों पर मंडराता ख़तरा |accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=एच.टी.एम.एल|publisher=जज़्बात|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ की उत्कृष्ट पारिस्थितिकी संरचना में कई प्रजाति के वन्य जीवों जैसे नीलगाय, सांभर, खरगोश, नेवला, चिंकारा के साथ सरीसृप-वर्ग के जीव-जन्तुओं को भी आश्रय मिला हुआ है। इस इलाके में ऐसे कई जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ हैं जो दुर्लभ होने के कारण संरक्षित घोषित की जा चुकी हैं। गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू,  लोमड़ी, चीते, बर्फीले चीते, हिरण, भौंकने वाले हिरण, सांभर, कस्तूरी मृग, सेरो, बरड़ मृग, साही, तहर आदि काफ़ी संख्या में मिलते हैं। विभिन्न रंगों की तितलियां तथा कीट भी यहाँ पाए जाते हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या के दबाव में धीरे-धीरे वनों का लोप होने लगा है और गंगा की घाटी में सर्वत्र कृषि होती है फिर भी गंगा के मैदानी भाग में हिरण, जंगली सूअर, जंगली बिल्लियाँ, भेड़िया, गीदड़, लोमड़ी की अनेक प्रजातियाँ काफ़ी संख्या में पाए जाते हैं। डालफिन की दो प्रजातियाँ गंगा में पाई जाती हैं। जिन्हें [[गंगा डालफिन]] और इरावदी डालफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा गंगा में पाई जाने वाले [[शार्क]] की वजह से भी गंगा की प्रसिद्धि है जिसमें बहते हुये पानी में पाई जानेवाली शार्क के कारण विश्व के वैज्ञानिकों की काफ़ी रुचि है।  इस नदी और बंगाल की खाड़ी के मिलन स्थल पर बनने वाले मुहाने को सुंदरवन के नाम से जाना जाता है जो विश्व की बहुत-सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का गृहक्षेत्र है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://sujalam.blogspot.com/2007/10/blog-post_131.html|title=गंगा|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=सुजलामा|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा में [[मछली|मछलियों]] तथा [[सर्प|सर्पों]] की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं और मीठे पानी वाले दुर्लभ [[गंगा डाल्फ़िन|डालफिन]] भी पाए जाते हैं। यह [[कृषि]], [[पर्यटन]], साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित ज़रूरतों  को पूरा करती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में [[बैक्टीरियोफेज]] नामक [[विषाणु]] होते हैं, जो [[जीवाणु|जीवाणुओं]] व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावज़ूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफ़ाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर, 2008 में [[भारत]] सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.bihartodayonline.com/2008/11/jagran-yahoo-report_04.html|title= गंगा को भारत की राष्ट्रीय नदी |accessmonthday=[[नवंबर]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= बिहार टुडे|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.voanews.com/hindi/archive/2008-11/2008-11-04-voa24.cfm|title= गंगा -भारत की राष्ट्रीय नदी |accessmonthday=[[4 नवंबर]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= वॉयस ऑफ अमेरिका|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last= |first=|title= समकालीन भारत |year=अप्रॅल 2003 |publisher=राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद |location=नई दिल्ली |id= |page=247-248 |accessday= 23|accessmonth= जून|accessyear= 2009}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सहायक नदियाँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Junction-Of-Gange-And-Yamuna-Allahabad.jpg|thumb|350px|मानचित्र में गंगा और [[यमुना नदी|यमुना]] का संगम, [[इलाहाबाद]] ([[1885]])]]&lt;br /&gt;
गंगा में उत्तर की ओर से आकर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियाँ यमुना, रामगंगा, करनाली (घाघरा), ताप्ती, गंडक, कोसी और काक्षी हैं तथा दक्षिण के पठार से आकर इसमें मिलने वाली प्रमुख नदियाँ चंबल, सोन, बेतवा, केन, दक्षिणी टोस आदि हैं। यमुना गंगा की सबसे प्रमुख सहायक नदी है जो हिमालय की बन्दरपूँछ चोटी के आधार पर यमुनोत्री हिमखण्ड से निकली है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://bharat.gov.in/knowindia/rivers.php|title=भारत के बारे में जानो|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारत सरकार|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; हिमालय के ऊपरी भाग में इसमें टोंस&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://hindi.indiawaterportal.org/?q=content/उत्तराखंड-की-प्रमुख-नदियाँ |title=उत्तराखंड की प्रमुख नदियाँ|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=इंडिया वाटर पोर्टल |language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा बाद में लघु हिमालय में आने पर इसमें गिरि और आसन नदियाँ मिलती हैं। चम्बल, बेतवा, शारदा और केन यमुना की सहायक नदियाँ हैं। चम्बल इटावा के पास तथा बेतवा [[हमीरपुर उत्तर प्रदेश|हमीरपुर]] के पास यमुना में मिलती हैं। [[यमुना नदी|यमुना]] [[इलाहाबाद]] के निकट बायीं ओर से गंगा नदी में जा मिलती है। रामगंगा मुख्य हिमालय के दक्षिणी भाग [[नैनीताल]] के निकट से निकलकर [[बिजनौर]] से बहती हुई [[कन्नौज]] के पास गंगा में मिलती है। करनाली नदी मप्सातुंग नामक हिमनद से निकलकर [[अयोध्या]], फैजाबाद होती हुई बलिया ज़िले की सीमा के पास गंगा में मिल जाती है। इस नदी को पर्वतीय भाग में कौरियाला तथा मैदानी भाग में [[घाघरा नदी|घाघरा]] कहा जाता है। [[गंडक नदी|गंडक]] हिमालय से निकलकर [[नेपाल]] में शालीग्राम नाम से बहती हुई मैदानी भाग में नारायणी नदी का नाम पाती है। यह काली गंडक और त्रिशूल नदियों का जल लेकर प्रवाहित होती हुई सोनपुर के पास गंगा में मिलती है। कोसी की मुख्यधारा अरुण है जो गोसाई धाम के उत्तर से निकलती है। ब्रह्मपुत्र के बेसिन के दक्षिण से सर्पाकार रूप में अरुण नदी बहती है जहाँ यारू नामक नदी इससे मिलती है। इसके बाद [[हिमालय]] के [[कंचनजंगा]] शिखरों के बीच से बहती हुई यह दक्षिण की ओर 90 किलोमीटर बहती है जहाँ पश्चिम से सूनकोसी तथा पूरब से तामूर कोसी नामक नदियाँ इसमें मिलती हैं। इसके बाद कोसी नदी के नाम से यह [[शिवालिक पर्वतश्रेणी|शिवालिक]] को पार करके मैदान में उतरती है तथा बिहार राज्य से बहती हुई गंगा में मिल जाती है। [[अमरकंटक]] पहाड़ी से निकलकर [[सोन नदी]] [[पटना]] के पास गंगा में मिलती है। मध्य-प्रदेश के मऊ के निकट जनायाब पर्वत से निकलकर [[चम्बल नदी]] [[इटावा]] से 38 किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी में मिलती है। [[बेतवा नदी]] मध्य प्रदेश में [[भोपाल]] से निकलकर उत्तर हमीरपुर के निकट यमुना में मिलती है। भागीरथी नदी के दायें किनारे से मिलने वाली अनेक नदियों में [[बांसलोई नदी|बाँसलई]], द्वारका, मयूराक्षी, रूपनारायण, कंसावती और रसूलपुर प्रमुख हैं। जलांगी और माथा भाँगा या चूनीं बायें किनारे से मिलती हैं जो अतीत काल में गंगा या पद्मा की शाखा नदियाँ थीं। किन्तु ये वर्तमान समय में गंगा से पृथक होकर वर्षाकालीन नदियाँ बन गई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रदूषण एवं पर्यावरण == &lt;br /&gt;
गंगा नदी विश्व भर में अपनी शुद्धीकरण क्षमता के कारण जानी जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धीकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में [[बैक्टीरियोफेज]] नामक [[विषाणु]] होते हैं, जो [[जीवाणु]]ओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। नदी के जल में प्राणवायु ([[ऑक्सीजन]]) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है। एक राष्ट्रीय सार्वजनिक रेडियो कार्यक्रम के अनुसार इस कारण हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का ख़तरा बहुत ही कम हो जाता है, जिससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;बैक्टीरियोफेज का स्व-शुद्धिकरण प्रभाव, ऑक्सीजन रिटेन्शन रहस्य: [http://www.npr.org/templates/story/story.php?storyId=17134270 मिस्ट्री फ़ैक्टर गिव्स गैन्जेस ए क्लीन रेप्युटेशन] जूलियन क्रैन्डा-2 हॉल्लिक. नेशनल पब्लिक रेडियो। &amp;lt;/ref&amp;gt; लेकिन गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य। गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अन्त।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.patrika.com/article.aspx?id=10912|title=खतरे में गंगा का अस्तित्व|accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=एएसपीएक्स| publisher=पत्रिका|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घड़ियालों की मदद ली जा रही है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4126070.cms|title=गंगा को प्रदूषण से बचाएंगे 71 घड़ियाल&lt;br /&gt;
|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=नवभारत टाइम्स|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; शहर की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए क़ानून बने हैं। इसी क्रम में गंगा को राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित कर दिया गया है और गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना लागू की गई हैं। हांलांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.lokmanch.com/cms/index.php/culture/4089-ganga-pollution-state-government-responsible|title=अब गंगा प्रदूषण मामला राज्य सरकार जिम्मेवार |accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=|publisher=लोकमंच|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://josh18.in.com/hindi/-moneylife/319321/0|title=अब मूर्ति विसर्जन से नहीं होगी गंगा मैली |accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=|publisher=जोश|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इतना सबकुछ होने के बावज़ूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। 2007 की एक [[संयुक्त राष्ट्र]] रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा। &amp;lt;ref&amp;gt; [http://www.boston.com/news/world/asia/articles/2007/06/24/global_warming_threatens_to_dry_up_ganges/ बोस्टन.कॉम पर] देखें- वैश्विक ऊष्मीकरण का [[उत्तर प्रदेश]] की गंगा पर प्रभाव।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक रूप से गंगा के मैदान से ही हिन्दुस्तान का हृदय स्थल निर्मित है और वही बाद में आने वाली विभिन्न सभ्यताओं का पालना बना। [[अशोक]] के ई. पू. के साम्राज्य का केन्द्र पाटलिपुत्र ([[पटना]]), बिहार में गंगा के तट पर बसा हुआ था। महान [[मुग़ल साम्राज्य]] के केन्द्र दिल्ली और [[आगरा]] भी गंगा के बेसिन की पश्चिमी सीमाओं पर स्थित थे। सातवीं सदी के मध्य में [[कानपुर]] के उत्तर में गंगा तट पर स्थित [[कन्नौज]], जिसमें अधिकांश उत्तरी भारत आता था, हर्ष के सामन्तकालीन साम्राज्य का केन्द्र था। मुस्लिम काल के दौरान, यानी 12वीं सदी से [[मुसलमान|मुसलमानों]] का शासन न केवल मैदान, बल्कि बंगाल तक फैला हुआ था। डेल्टा क्षेत्र के ढाका और [[मुर्शिदाबाद]] मुस्लिम सत्ता के केन्द्र थे। [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] ने 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुगली के तट पर कलकत्ता (वर्तमान [[कोलकाता]]) की स्थापना करने के बाद धीरे-धीरे अपने पैर गंगा की घाटी में फैलाए और 19वीं सदी के मध्य में दिल्ली तक जा पहुँचे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा की इस घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ जिसका प्राचीन इतिहास अत्यन्त गौरवमयी और वैभवशाली है। जहाँ ज्ञान, धर्म, अध्यात्म व सभ्यता-संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। पाषाण या प्रस्तर युग का जन्म और विकास यहाँ होने के अनेक साक्ष्य मिले हैं। इसी घाटी में [[रामायण]] और [[महाभारत]] कालीन युग का उद्भव और विलय हुआ। [[शतपथ ब्राह्मण]], [[पंचविंश ब्राह्मण]], [[गोपथ ब्राह्मण]], [[ऐतरेय आरण्यक]], कौशितकी आरण्यक, सांख्यायन आरण्यक, वाजसनेयी संहिता और [[महाभारत]] इत्यादि में वर्णित घटनाओं से उत्तर वैदिककालीन गंगा घाटी की जानकारी मिलती है। प्राचीन [[मगध महाजनपद ]] का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ जहाँ से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का वह स्वर्ण युग विकसित हुआ जब [[मौर्य वंश|मौर्य]] और [[गुप्त वंश|गुप्त]] वंशीय राजाओं ने यहाँ शासन किया।&lt;br /&gt;
==आर्थिक महत्त्व==	&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-Varanasi.jpg|thumb|250px|[[वाराणसी]] में गंगा नदी के घाट&amp;lt;br /&amp;gt; Ghats of Ganga River in Varanasi]]&lt;br /&gt;
गंगा अपनी उपत्यकाओं में [[भारत]] और [[बांग्लादेश]] के कृषि आधारित अर्थ में भारी सहयोग तो करती ही है, यह अपनी सहायक नदियों सहित बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई के बारहमासी स्रोत भी हैं। इन क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रधान उपज में मुख्यतः [[धान]], [[गन्ना]], [[दाल]], [[तिलहन]], [[आलू]] एवं [[गेहूँ]] हैं। जो भारत की कृषि आज का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा के तटीय क्षेत्रों में दलदल एवं झीलों के कारण यहाँ लेग्यूम, मिर्च, सरसों, तिल, गन्ना और जूट की अच्छी फ़सल होती है। नदी में मत्स्य उद्योग भी बहुत ज़ोरों पर चलता है। गंगा नदी प्रणाली भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है। इसमें लगभग 375 मत्स्य प्रजातियाँ उपलब्ध हैं। वैज्ञानिकों द्वारा [[उत्तर प्रदेश]] व [[बिहार]] में 111 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता बतायी गयी है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://fisheries.up.nic.in/manual.htm|title= प्रशिक्षण एवं प्रसार संबंधी मैनुअल|accessmonthday= |accessyear= |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= 2007|month= |format= एचटीएम|work= |publisher= मत्स्य विभाग, उत्तर प्रदेश |pages= |language=|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt; फरक्का बांध बन जाने से गंगा नदी में हिल्सा मछली के बीजोत्पादन में सहायता मिली है। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.cifri.ernet.in/technology.html|title= हिल्सा ब्रीडिंग एण्ड हिल्साह हैचेरी|accessmonthday= |accessyear= |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= |month= |format= |work= |publisher= सी.आई.एफ.आर.आई.|pages= |language= अंग्रेज़ी|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा का महत्त्व पर्यटन पर आधारित आय के कारण भी है। इसके तट पर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कई पर्यटन स्थल है जो राष्ट्रीय आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा नदी पर रैफ्टिंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है। जो साहसिक खेलों और पर्यावरण द्वारा भारत के आर्थिक सहयोग में सहयोग करते हैं। गंगा तट के तीन बड़े शहर [[हरिद्वार]], [[इलाहाबाद]] एवं [[वाराणसी]] जो तीर्थ स्थलों में विशेष स्थान रखते हैं। इस कारण यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। गर्मी के मौसम में जब पहाड़ों से बर्फ़ पिघलती है, तब नदी में पानी की मात्रा व बहाव अच्छा होता है, इस समय उत्तराखंड में ऋषिकेश - बद्रीनाथ मार्ग पर कौडियाला से ऋषिकेश के मध्य रैफ्टिंग, क्याकिंग व कैनोइंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है, जो साहसिक खोलों के शौक़ीनों और पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित कर के भारत के आर्थिक सहयोग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.uttara.in/hindi/gmvn/tourist/adv_sports/rafting.html|title= राफ्टिंग |accessmonthday=22 जून |accessyear=2009 |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= 2007|month= |format= एचटीएमएल|work= |publisher=उत्तराखंड पोर्टल|pages= |language=|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====बाँध एवं नदी परियोजनाएँ====&lt;br /&gt;
गंगा नदी पर निर्मित अनेक बाँध भारतीय जन-जीवन तथा अर्थ व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनमें प्रमुख हैं फ़रक्का बाँध, टिहरी बाँध, तथा भीमगोडा बाँध। फ़रक्का बांध (बैराज) भारत के [[पश्चिम बंगाल]] प्रान्त में स्थित गंगा नदी पर बनाया गया है। इस बाँध का निर्माण [[कोलकाता]] बंदरगाह को गाद (सिल्ट) से मुक्त कराने के लिये किया गया था जो कि 1950 से 1960 तक इस बंदरगाह की प्रमुख समस्या थी। कोलकाता [[हुगली नदी]] पर स्थित एक प्रमुख बंदरगाह है। ग्रीष्म ऋतु में हुगली नदी के बहाव को निरंतर बनाये रखने के लिये गंगा नदी के जल के एक बड़े हिस्से को फ़रक्का बाँध के द्वारा हुगली नदी में मोड़ दिया जाता है। गंगा पर निर्मित दूसरा प्रमुख बाँध टिहरी बाँध टिहरी विकास परियोजना का एक प्राथमिक बाँध है जो [[उत्तराखंड]] प्रान्त के टिहरी ज़िले में स्थित है। यह बाँध गंगा नदी की प्रमुख सहयोगी नदी [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] पर बनाया गया है। टिहरी बाँध की ऊँचाई 261 मीटर है जो इसे विश्व का पाँचवाँ सबसे ऊँचा बाँध बनाती है। इस बाँध से 2400 मेगावाट विद्युत उत्पादन, 270,000 हेक्टर क्षेत्र की सिंचाई और प्रतिदिन 102.20 करोड़ लीटर पेयजल दिल्ली, उत्तर-प्रदेश एवं उत्तरांचल को उपलब्ध कराना प्रस्तावित है। तीसरा प्रमुख बाँध भीमगोडा बाँध [[हरिद्वार]] में स्थित है जिसको सन 1840 में अंग्रेजो ने गंगा नदी के पानी को विभाजित कर ऊपरी गंगा नहर में मोड़ने के लिये बनवाया था। यह नहर हरिद्वार के भीमगोडा नामक स्‍थान से गंगा नदी के दाहिने तट से निकलती है। प्रारम्‍भ में इस नहर में जलापूर्ति गंगा नदी में एक अस्‍थायी बॉंध बनाकर की जाती थी। वर्षाकाल प्रारम्‍भ होते ही अस्‍थायी बॉंध टूट जाया करता था तथा मानसून अवधि में नहर में पानी चलाया जाता था। इस प्रकार इस नहर से केवल रबी की फ़सलों की ही सिंचाई हो पाती थी। अस्‍थायी बॉंध निर्माण स्‍थल के डाउनस्‍ट्रीम में वर्ष 1978-1984 की अवधि में भीमगोडा बैराज का निर्माण करवाया गया। इसके बन जाने के बाद ऊपरी गंगा नहर प्रणाली से खरीफ की फ़सल में भी पानी दिया जाने लगा।&lt;br /&gt;
====सिंचाई====&lt;br /&gt;
सिंचाई के लिए गंगा के पानी का उपयोग, चाहे बाढ़ का पानी हो या फिर नहरों का, पुरातन काल से ही प्रचलित है। इस तरह की सिंचाई का उल्लेख धर्मग्रन्थों तथा 2,000 से भी ज़्यादा वर्ष पहले लिखे [[पुराण|पुराणों]] में मिलता है। चौथी सदी में [[यूनान]] से भारत आए राजदूत [[मेगस्थनीज़]] ने यहाँ सिंचाई के उपयोग का उल्लेख किया है। 12वीं सदी से मुस्लिम काल में सिंचाई प्रणाली बहुत विकसित थी और [[मुग़ल]] बादशाहों ने बाद में बहुत सी नहरों का निर्माण किया। बाद में ब्रिटिश शासकों ने सिंचाई प्रणाली का और भी विस्तार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश और [[बिहार]] स्थित गंगा घाटी के [[कृषि]] क्षेत्रों को सिंचाई नहरों की प्रणाली से बहुत लाभ हुआ है। ख़ासतौर से इस विकसित सिंचाई प्रणाली के कारण [[गन्ना]], कपास और तिलहन जैसी नक़दी फ़सलों की पैदावार में वृद्धि सम्भव हुई। पुरानी नहरें मुख्यत: गंगा-यमुना के दौआब इलाक़े में हैं। ऊपरी गंगा नहर [[हरिद्वार]] से शुरू होती है और अपनी सहायक नहरों सहित 9,524 किलोमीटर लम्बी है। निचली गंगा नहर की लम्बाई अपनी सहायक नहरों सहित 8,238 किलोमीटर है और यह नरोरा से प्रारम्भ होती है। [[शारदा नहर]] से उत्तर प्रदेश में [[अयोध्या]] की भूमि सींची जाती है। गंगा के उत्तर में भूमि की ऊँचाई अधिक होने से नहरों के द्वारा सिंचाई करना कठिन होने के कारण भूमिगत जल पम्प द्वारा खींचकर सतह पर लाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के काफ़ी बड़े इलाक़े में हाथ से खोदे हुए [[कुआँ|कुओं]] से निकली नहरों के द्वारा सिंचाई की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बांग्लादेश]] में गंगा-कबाडाक योजना मुख्यत: सिंचाई के लिए ही है और उसमें खुलना, जेशोर और कुश्तिया ज़िलों के वे हिस्से आते हैं, जो डेल्टा के कमज़ोर हिस्से हैं, जहाँ नदियों का मार्ग गाद और घनी झाड़ियों के कारण अवरुद्ध हो चुका है। इस इलाक़े में कुल वार्षिक वर्षा सामान्यत: 1,524 मिलीमीटर से कम होती है तथा शीत ऋतु तुलनात्मक रूप से शुष्क रहती है। यहाँ की सिंचाई प्रणाली भी नहरों तथा भूमिगत जल खींचने वाले विद्युतचालित उपकरणों पर आधारित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नौकायन====&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में गंगा और इसकी कुछ सहायक नदियाँ, ख़ासतौर से पूरब में, नौकायन के उपयुक्त थीं। मेगस्थनीज़ के अनुसार, चौथी शताब्दी ई. पू. में गंगा और इसकी प्रमुख सहायक नदियों में नौकायन होता था। गंगा के बेसिन में अंतर्देशीय नदी नौकायन 14वीं शताब्दी तक भी फल-फूल रहा था। 19वीं सदी के आते-आते सिंचाई तथा नौकायन के लिए उपयुक्त नहरों की जल परिवहन प्रणाली के प्रमुख मार्ग बन चुके थे। पैंडल स्टीमरों के आगमन से अंतर्देशीय परिवहन में भी जो क्रान्ति आई, उससे बंगाल और बिहार के नील उद्योग को बहुत बढ़ावा मिला। गंगा में कलकत्ता से इलाहाबाद और उससे आगे यमुना में आगरा तक तथा उधर [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] तक नियमित स्टीमर सेवाएँ चलने लगीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं सदी के मध्य में रेलमार्गों के बनने से बड़े पैमाने पर जल परिवहन में गिरावट शुरू हो गई। सिंचाई हेतु पानी बहुत अधिक मात्रा में खींच लिए जाने से भी नौकायन विपरीत रूप से प्रभावित हुआ। अब तो नौकायन केवल इलाहाबाद के आसपास के मध्य गंगा बेसिन तक ही सीमित होकर रह गया है, जिसमें से अधिकांश देसी नौकाओं पर आधारित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्चिम बंगाल तथा बांग्लादेश अब भी [[जूट]], घास, [[चाय]], अनाज तथा अन्य कृषि और ग्रामीण उत्पादों के परिवहन के लिए जलमार्गों पर निर्भर हैं। बांग्लादेश में चालना, खुलना, बारीसाल, चाँदपुर, नारायणगंज, ग्वालंदो घाट, सिरसागंज, भैरव बाज़ार तथा फेंचूगंज और भारत में कोलकाता, गोलपाड़ा, [[धुबुरी]] और डिब्रूगढ़ प्रमुख नदी बंदरगाह हैं। [[1947]] में भारत के विभाजन से बड़े दूरगामी परिवर्तन हुए। कलकत्ता से [[असम]] तक अंतर्देशीय जलमार्गों के द्वारा पहले बड़े पैमाने पर होने वाला व्यापार लगभग बन्द ही हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बांग्लादेश में अंतर्देशीय जल परिवहन की ज़िम्मेदारी अंतर्देशीय जल परिवहन प्राधिकरण की है। भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों का नीति निर्धारण केन्द्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन मण्डल (सेंट्रल वॉटर ट्रांसपोर्ट बोर्ड) करता है। लेकिन राष्ट्रीय जलमार्गों की व्यापक प्रणाली का विकास एवं रख-रखाव अंतर्देशीय जलमार्ग (इनलैंड वॉटरवेज़ अथॉरिटी) प्राधिकरण करता है। गंगा के बेसिन में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया तक लगभग 1,607 किलोमीटर लम्बा जलमार्ग इस प्रणाली में शामिल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डेल्टा के मुख पर भारत की सीमा के ठीक भीतर फ़रक्का बाँध का निर्माण बांग्लादेश और भारत के बीच विवाद का कारण बन गया है। भारत का कहना है कि गाद के जमने तथा खारा पानी घुस आने की वजह से कोलकाता बंदरगाह का पतन हो गया है। कोलकाता की स्थिति में सुधार के लिए खारे पानी को निकालकर और जलस्तर को बढ़ाकर भारत ने फ़रक्का बैराज से गंगा को मोड़कर ताज़ा पानी हासिल करने की कोशिश की है। अब एक बड़ी नहर द्वारा पानी [[भागीरथी नदी]] में लाया जाता है, जो कोलकाता से परे [[हुगली नदी]] में समाहित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बांग्लादेश का कहना है कि नदियों के तटवर्ती देशों की परस्पर समृद्धि के लिए यह ज़रूरी है कि अंतर्देशीय नदियों के पानी पर उनका संयुक्त नियंत्रण होना चाहिए। सिंचाई, नौकायन तथा खारे पानी की रोकथाम के लिए गंगा का पानी बांग्लादेश में भी उतना ही आवश्यक है, जितना भारत के लिए। बांग्लादेश के अनुसार, फ़रक्का बाँध ने उसे पानी के एक ऐसे बहुमूल्य स्रोत से वंचित कर दिया है, जो कि उसकी समृद्धि के लिए आवश्यक है। दूसरी तरफ़ [[भारत]] गंगाजल की समस्या के बारे में द्विपक्षीय रवैया अपनाये जाने के पक्ष में है। दोनों देशों के बीच कई अंतरिम समझौते हुए हैं, लेकिन अभी तक इस विवाद का कोई स्थायी हल नहीं निकल पाया है। भारत के असम में ब्रह्मपुत्र के पानी को बांग्लादेश से होकर एक नहर द्वारा गंगा में मोड़ने के प्रस्ताव के जवाब में बांग्लादेश ने सुझाया है कि पूर्वी [[नेपाल]], पश्चिम बंगाल होते हुए एक नहर बांग्लादेश तक बनाई जाए। किसी भी प्रस्ताव को सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। [[1987]] तथा [[1988]] में बांग्लादेश में आई प्रलयंकारी बाढ़ों, जिसमें 1988 की बाढ़ उस देश के इतिहास की सर्वाधिक विनाशकारी बाढ़ थी, इसको देखते हुए विश्व बैंक ने इस क्षेत्र के लिए अब बाढ़ नियंत्रण की एक दूरगामी योजना बनाई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पनबिजली योजना====&lt;br /&gt;
गंगा की लगभग 130 लाख किलोवाट की अनुमानित जलविद्युत क्षमता का 2/5 हिस्सा भारत में तथा शेष नेपाल में है। इस क्षमता में से कुछ का दोहन भारत ने [[चंबल नदी|चंबल]] और रिहंद नदियों द्वारा किया है।&lt;br /&gt;
गंगा का मैदान दुनिया की सबसे घनी आबादी वाला तथा उपजाऊ इलाक़ों में से एक है। चूँकि इस मैदानी क्षेत्र में अवरोध न के बराबर है, इसीलिए गंगा की धारा अधिकांश इलाक़े में चौड़ी व धीमी गति से प्रवाहित है। उसके कुल अपवाह बेसिन का 9,75,900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल, यानी भारत के कुल क्षेत्र का लगभग चौथाई हिस्सा है और उस पर लगभग 50 करोड़ की आबादी निर्भर करती है। इस बेसिन की भूमि पर गहन खेती होती है। गंगा प्रणाली की जलापूर्ति आंशिक रूप से जुलाई से अक्टूबर के बीच होने वाली मानसून की वर्षा और अप्रॅल से जून के बीच [[हिमालय]] पर गर्मी से पिघलने वाली बर्फ़ पर निर्भर करती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय उपमहाद्वीप का यह विस्तृत उत्तर-मध्य खण्ड, जिसे उत्तर भारतीय मैदान भी कहा जाता है, पश्चिम में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी और गंगा के डेल्टा से लेकर [[सिंधु नदी|सिंधु नदी घाटी]] तक फैला हुआ है। इस इलाक़े में इस उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध और सघन जनसंख्या वाले क्षेत्र हैं। इस मैदान का अधिकांश हिस्सा गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के द्वारा पूर्व में सिंध नदी द्वारा पश्चिम में बहकर लाई गई कछारी मिट्टी से बना हुआ है। मैदान के पूर्वी हिस्सों में कम बारिश या सर्दियाँ शुष्क होती हैं। किन्तु मानसून की वर्षा इतनी अधिक होती है कि बड़े-बड़े इलाक़ों में दलदल या उथली झीलें बन जाती हैं। ज्यों-ज्यों पश्चिम की ओर बढ़ते हैं, यह मैदान शुष्क होता चला जाता है और अन्त में थार के रेगिस्तान में बदल जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धार्मिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
[[भारत]] की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को [[देवी]] के रूप में निरुपित किया गया है। बहुत से पवित्र [[तीर्थस्थल]] गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं जिनमें [[वाराणसी]] और [[हरिद्वार]] सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं यह मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://hbash.blogspot.com/2008/11/blog-post.html |title=भारत की मुख्य नदियाँ|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=हिन्दी ब्लाग|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; मरने के बाद लोग गंगा में अपनी राख विसर्जित करना [[मोक्ष]] प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या [[अंतिम संस्कार]] की इच्छा भी रखते हैं। [[चित्र:Kumbh mela.jpg|thumb|280px|[[कुम्भ मेला]], [[इलाहाबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kumb Fair, Allahabad]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके घाटों पर लोग [[पूजा]] अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए [[मकर संक्राति]], [[कुम्भ मेला|कुंभ]] और [[गंगा दशहरा]] के समय गंगा में नहाना या केवल दर्शन ही कर लेना बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर गंगा के तट पर ही बने हुए हैं। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हज़ार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिंह|first=डॉ. राजकुमार  |title=विचार विमर्श|year=जुलाई   |publisher=सागर प्रकाशन|location=मथुरा |id= |page=13-23  |accessday=22 |accessmonth=जून|accessyear=2009 }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  गंगा को लक्ष्य करके अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं। जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्रम्&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=6127|title= श्रीगंगासहस्त्रनामस्तोत्रम|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;  और आरती&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://bhavishyawani.mywebdunia.com/2009/02/25/gangaji_ki_aarti.html|title= श्रीगंगाजी की आरती|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=वेबदुनया|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; सबसे लोकप्रिय हैं। अनेक लोग अपने दैनिक जीवन में श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग करते हैं। गंगोत्री तथा अन्य स्थानों पर गंगा के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जिनके दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। [[उत्तराखंड]] के [[पंच प्रयाग]] तथा [[प्रयाग]]राज जो इलाहाबाद में स्थित है गंगा के वे प्रसिद्ध संगम स्थल हैं जहाँ वह अन्य नदियों से मिलती हैं। ये सभी संगम धार्मिक दृष्टि से पूज्य माने गए हैं। गंगा नदी का धार्मिक महत्व सम्भवत: विश्व की किसी भी अन्य नदी से ज़्यादा है। आदिकाल से ही यह पूजी जाती रही है और आज भी [[हिंदू|हिन्दुओं]] के लिए यह सबसे पवित्र नदी है। इसे देवी स्वरूप माना जाता है। एक किंवदन्ती के अनुसार, महान तपस्वी [[भगीरथ]] की प्रार्थना पर देवी गंगा को स्वयं भगवान [[विष्णु]] ने इस धरती पर भेजा। लेकिन गंगा जिस [[वेग]] से धरती पर अवतरित हुईं, उससे उनके मार्ग में आने वाली हर वस्तु के जलप्लावित होने का ख़तरा था। इसीलिए भगवान [[शिव]] ने पहले ही उन्हें अपनी जटाओं में लपेटकर उनके वेग को नियंत्रित और शान्त किया। मुक्ति चाहने वाले उसके बाद ही उसमें स्नान कर पाए। हिन्दुओं के तीर्थस्थल वैसे तो समूचे उपमहाद्वीप में फैल हुए हैं, तथापि गंगा तट पर बसे तीर्थ हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इनमें प्रमुख हैं, इलाहाबाद में गंगा और यमुना का संगम, जहाँ एक निश्चित अन्तराल पर जनवरी-फ़रवरी में [[कुम्भ मेला]] आयोजित होता है। इस अनुष्ठान के समय लाखों तीर्थयात्री गंगा में स्नान करते हैं। पवित्र स्नान की दृष्टि से अन्य तीर्थ हैं, [[वाराणसी]], [[काशी]] और [[हरिद्वार]]। कलकत्ता में [[हुगली नदी]] भी पवित्र मानी जाती है। तीर्थयात्रा की दृष्टि से गंगा तट पर [[गंगोत्री]] और [[अलकनन्दा नदी|अलकनन्दा]] और [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] का संगम भी महत्त्वपूर्ण है। हिन्दू अपने मृतकों की भस्म एवं अस्थियाँ यह मानते हुए यहाँ विसर्जित करते हैं कि ऐसा करने से मृतक सीधे स्वर्ग में जाता है। इसीलिए गंगा के तट पर कई स्थानों पर शवदाह हेतु विशेष घाट बने हुए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा पुनीततम नदी है और इसके तटों पर हरिद्वार, कनखल, [[प्रयाग]] एवं काशी जैसे परम प्रसिद्ध तीर्थ अवस्थित हैं। प्रसिद्ध नदीसूक्त&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]] 10, 75, 5-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में सर्वप्रथम गंगा का ही आह्वान किया गया है। [[ऋग्वेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]] (6|45|31&amp;lt;/ref&amp;gt; में ‘गंगय’ शब्द आया है जिसका सम्भवत: अर्थ है ‘गंगा पर वृद्धि करता हुआ।’&amp;lt;ref&amp;gt;अधि बृबु: पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्। उरु:कक्षो न गाङग्य:।। [[ऋग्वेद]] (6|45|31)। अन्तिम पद का अर्थ है ‘गंगा के तटों पर उगी हुई घास या झाड़ी के समान।’&amp;lt;/ref&amp;gt; [[शतपथ ब्राह्मण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शतपथ ब्राह्मण]] (13|5|4|11 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[ऐतरेय ब्राह्मण]] &amp;lt;ref&amp;gt;[[ऐतरेय ब्राह्मण]] (39, 9&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा एवं यमुना के किनारे पर भरत दौष्यंति की विजयों एवं यज्ञों का उल्लेख हुआ है। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;[[शतपथ ब्राह्मण]] (13, 5, 4,11 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt; में एक प्राचीन गाथा का उल्लेख है- ‘नाडपित् पर अप्सरा शकुन्तला ने भरत को गर्भ में धारण किया, जिसने सम्पूर्ण [[पृथ्वी]] को जीतने के उपरान्त [[इन्द्र]] के पास [[यज्ञ]] के लिए एक सहस्र से अधिक अश्व भेजे।’ [[महाभारत]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]] (अनुशासन. 26|26-103&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[पुराण|पुराणों]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[पुराण]]  ([[नारद पुराण|नारदीय]], उत्तरार्ध, अध्याय 38-45 एवं 51|1-48; [[पद्म पुराण]]  5|60|1-127; अग्नित्र अध्याय 110; [[मत्स्य पुराण]], अध्याय 180-185; पद्म पुराण, आदिखण्ड, अध्याय 33-37&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा की महत्ता एवं पवित्रीकरण के विषय में सैकड़ों प्रशस्तिजनक श्लोक हैं। [[स्कन्द पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[स्कन्द पुराण]] (काशीखण्ड, अध्याय 33-37&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा के एक सहस्र नामों का उल्लेख है। यहाँ पर उपर्युक्त ग्रन्थों में दिये गये वर्णनों का थोड़ा अंश भी देना सम्भव नहीं है। अधिकांश भारतीयों के मन में गंगा जैसी नदियों एवं हिमालय जैसे पर्वतों के दो स्वरूप घर कर बैठे हैं-&lt;br /&gt;
#भौतिक &lt;br /&gt;
#आध्यात्मिक&lt;br /&gt;
विशाल नदियों के साथ दैवी जीवन की प्रगाढ़ता संलग्न हो ही जाती है। टायलर ने अपने ग्रन्थ ‘प्रिमिटिव कल्चर’&amp;lt;ref&amp;gt;प्रिमिटिव कल्चर (द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 477&amp;lt;/ref&amp;gt; में लिखा है- &amp;lt;blockquote&amp;gt;‘जिन्हें हम निर्जीव पदार्थ कहते हैं, यथा नदियाँ, पत्थर, वृक्ष, अस्त्र-शस्त्र आदि। वे जीवित, बुद्धिशाली हो उठते हैं, उनसे बातें की जाती हैं, उन्हें प्रसन्न किया जाता है और यदि वे हानि पहुँचाते हैं तो उन्हें दण्डित भी किया जाता है।’&amp;lt;/blockquote&amp;gt; गंगा के महात्म्य एवं उसकी तीर्थयात्रा के विषय में पृथक-पृथक ग्रन्थ प्रणीत हुए हैं। यथा- गणेश्वर (1350 ई.) का गंगापत्तलक, मिथिला के राजा पद्मसिंह की रानी विश्वासदेवी की [[गंगावाक्यावली]], गणपति की [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] एवं वर्धमान की [[गंगाकृत्यविवेक]]। इन ग्रन्थों की तिथियाँ इस महाग्रन्थ के अन्त में दी हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गंगा स्नान विधि====&lt;br /&gt;
गंगा स्नान के लिए संकल्प करने के विषय में निबन्धों ने कई विकल्प दिये हैं। [[प्रायश्चित्ततत्त्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (पृष्ठ 497-498&amp;lt;/ref&amp;gt; में विस्तृत संकल्प दिया हुआ है। [[गंगावाक्यावली]]&amp;lt;ref&amp;gt;अद्यामुके मासि अमुकपक्षे अमुकतिथौ सद्य:पापप्रणाशपूर्वकं सर्वपुण्यप्राप्तिकामोगंगाया स्नानमहं करिष्ये। [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 141)। और देखिए तीर्थचि. (पृष्ठ 206-207), जहाँ गंगास्नान के पूर्वक लिंक संकल्पों के कई विकल्प दिये हुए हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] (102&amp;lt;/ref&amp;gt; में जो स्नान विधि दी हुई है वह सभी वर्णों एवं [[वेद]] के विभिन्न शाखानुयायियों के लिए समान है। मत्स्यपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्यपुराण]] (अध्याय 102&amp;lt;/ref&amp;gt; के वर्णन का निष्कर्ष यों है- बिना स्नान और शरीर की शुद्धि एवं शुद्ध विचारों का अस्तित्व नहीं होता। इसी से मन को शुद्ध करने के लिए सर्वप्रथम स्नान की व्याख्या होती है। कोई किसी कूप या धारा से पात्र में जल लेकर स्नान कर सकता है या बिना इस विधि से भी स्नान कर सकता है। ‘नमो नारायणाय’ मंत्र के साथ बुद्धिमान लोगों को तीर्थस्थल का ध्यान करना चाहिए। हाथ में दर्भ (कुश) लेकर, पवित्र एवं शुद्ध होकर आचमन करना चाहिए। चार वर्गहस्त स्थल को चुनना चाहिए और निम्न मंत्र के साथ गंगा का आवाहन करना चाहिए।&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;तुम विष्णु के चरण से उत्पन्न हुई हो, तुम विष्णु से भक्ति रखती हो, तुम विष्णु की पूजा करती हो, अत: जन्म से मरण तक किये गए पापों से मेरी रक्षा करो। स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी में 35 करोड़ तीर्थ हैं; हे जाह्नवी गंगा, ये सभी देव तुम्हारे हैं। देवों में तुम्हारा नाम नन्दिनी (आनन्द देने वाली) और नलिनी भी है तथा तुम्हारे अन्य नाम भी हैं, यथा- दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, शान्तिप्रदायिनी।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृतिचन्द्रिका (1, पृष्ठ 182) ने [[मत्स्य पुराण]] (102) के श्लोक (1-8) उद्धृत किये हैं। स्मृतिचन्द्रिका ने वहीं गंगा के 12 विभिन्न नाम दिए हैं। [[पद्म पुराण]] (4|81|17-19) में [[मत्स्य पुराण]] के नाम पाये जाते हैं। इस अध्याय के आरम्भ में गंगा के सहस्र नामों की ओर संकेत किया जा चुका है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; स्नान करते समय इन नामों का उच्चारण करना चाहिए। तब तीन लोकों में बहने वाली गंगा पास में चली आयेगी (भले ही व्यक्ति घर पर ही स्नान कर रहा हो)। व्यक्ति को उस जल को, जिस पर सात बार मंत्र पढ़ा गया हो, तीन या चार या पाँच या सात बार सिर पर छिड़कना चाहिए। नदी के नीचे की मिट्टी का मंत्र पाठ के साथ लेप करना चाहिए। इस प्रकार स्नान एवं आचमन करके व्यक्ति को बाहर आना चाहिए और दो श्वेत एवं पवित्र वस्त्र धारण करने चाहिए। &lt;br /&gt;
====तर्पण====&lt;br /&gt;
इसके उपरान्त उसे तीन लोकों के सन्तोष के लिए [[देवता|देवों]], [[ऋषि|ऋषियों]] एवं पितरों का यथाविधि तर्पण करना चाहिए। तर्पण के दो प्रकार हैं- &lt;br /&gt;
#प्रधान&lt;br /&gt;
#गौण &lt;br /&gt;
प्रधान विद्याध्ययन समाप्त किये हुए द्विजों द्वारा देवों, ऋषियों एवं पितरों के लिए प्रतिदिन किया जाता है। गौण स्नान के अंग के रूप में किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं स्नानमुच्यते। तर्पणं तु भवेत्तस्य अंगत्त्वेन प्रकीर्तितम्।। [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (गंगाभक्ति., 162&amp;lt;/ref&amp;gt; तर्पण स्नान एवं ब्रह्मयज्ञ दोनों का अंग है।  तर्पण अपनी वेद शाखा के अनुसार होता है। दूसरा नियम यह है कि तर्पण तिलयुक्त जल से किसी तीर्थस्थल, [[गया]] में, पितृपक्ष (आश्विन के कृष्णपक्ष) में किया जाता है। विधवा भी किसी तीर्थ में अपने पति या सम्बन्धी के लिए तर्पण कर सकती है। संन्यासी ऐसा नहीं करता। पिता वाला व्यक्ति भी तर्पण नहीं करता। किन्तु विष्णुपुराण के मत से वह तीन अंजिली देवों, तीन ऋषियों को एवं एक प्रजापति (‘देवास्तुप्यन्ताम्’ के रूप में) को देता है। एक अन्य नियम यह है कि-&amp;lt;blockquote&amp;gt;‘श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन दीयते। तर्पणे तूभयं कुर्यादिष एव विधि:स्मृत।।&amp;lt;ref&amp;gt;अर्थात एक हाथ (दाहिने) से [[श्राद्ध]] में या [[अग्नि]] में आहुति दी जाती है, किन्तु तर्पण में दोनों हाथों से जल स्नान करने वाली नदी में डाला जाता है या फिर भूमि पर छोड़ा जाता है। [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 57|62-63)’&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &amp;lt;blockquote&amp;gt;आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त देवर्षिपितृमानवा:। तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:।। अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मयुभ-नाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्।। &amp;lt;ref&amp;gt;अर्थात यदि कोई विस्तृत विधि से तर्पण न कर सके तो वह निम्न मंत्रों के साथ (जो [[वायु पुराण]], 110|21-22 में दिये हुए हैं) तिल एवं कुश से मिश्रित जल की तीन अंजलियाँ दे सकता है&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; इसके पश्चात [[सूर्य देवता|सूर्य]] को नमस्कार एवं तीन बार प्रदक्षिणा कर तथा किसी [[ब्राह्मण]], [[सोना]] एवं [[गाय]] का स्पर्श कर स्नानकर्ता को विष्णु मंदिर (या अपने घर, पाठांतर के अनुसार) में जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ यह ज्ञातव्य है कि मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण]] (102|2-31&amp;lt;/ref&amp;gt; के श्लोक, जिनका निष्कर्ष ऊपर दिया गया है, कुछ अन्तरों के साथ पद्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] (पातालखण्ड 81|12-42 एवं सृष्टिखण्ड 20|145-176&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पाये जाते हैं। प्रायश्चित्ततत्त्व&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रायश्चित्ततत्त्व]] पृष्ठ 502&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा स्नान के समय के मंत्र दिये हुए हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुपादाब्जसम्भूते गंगे त्रिपथगामिनि। धर्मव्रतेति विख्याते पापं में हर जाह्नवी।। श्रद्धया भक्तिसम्पन्ने श्रीमातर्देवि जाह्नवि। अमृतेनाम्बुना देवि भागीरथी पुनीह माम्।। स्मृतिचंद्रिका (1|131); [[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (502); त्वं देव सरितां नाथ त्वं देवि सरितां वरे। उभयो: संगमे स्नात्वा मुञ्चामि दुरितानि वै।। वही। और देखिए [[पद्म पुराण]] (सृष्टिखण्ड, 60|60&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पौराणिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। कुछ पुराणों ने गंगा को मन्दाकिनी के रूप में स्वर्ग में, गंगा के रूप में पृथ्वी पर और भोगवती के रूप में पाताल में प्रवाहित होते हुए वर्णित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] 6|267|47&amp;lt;/ref&amp;gt; [[विष्णु पुराण|विष्णु]] आदि पुराणों ने गंगा को [[विष्णु]] के बायें पैर के अँगूठे के नख से प्रवाहित माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;वामपादाम्बुजांगुष्ठनखस्रोतोविनिर्गताम्। विष्णोर्बभर्ति यां भक्त्या शिरसाहनिंशं ध्रुव:।। [[विष्णु पुराण]] (2|8|109); कल्पतरु (तीर्थ, पृष्ठ 161) ने ‘शिव:’ पाठान्तर दिया है। ‘नदी सा वैष्णवी प्रोक्ता विष्णुपादसमुदभवा।’ [[पद्म पुराण]]  (5|25|188)।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ पुराणों में ऐसा आया है कि [[शिव]] ने अपनी जटा से गंगा को सात धाराओं में परिवर्तित कर दिया, जिनमें तीन (नलिनी, ह्लदिनी एवं पावनी) पूर्व की ओर, तीन (सीता, चक्षुस एवं [[सिन्धु नदी|सिन्धु]]) पश्चिम की ओर प्रवाहित हुई और सातवीं धारा [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] हुई ([[मत्स्य पुराण]] 121|38-41; [[ब्रह्माण्ड पुराण]] 2|18|39-41 एवं 1|3|65-66)। [[कूर्म पुराण]] (1|46|30-31) एवं [[वराह पुराण]] (अध्याय 82, गद्य में) का कथन है कि गंगा सर्वप्रथम सीता, [[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]], सुचक्ष एवं भद्रा नामक चार विभिन्न धाराओं में बहती है। अलकनंदा दक्षिण की ओर बहती है, भारतवर्ष की ओर आती है और सप्तमुखों में होकर समुद्र में गिरती है।&amp;lt;ref&amp;gt;तथैवालकनंदा च दक्षिणादेत्य भारतम्। प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्तभेदा द्विजोत्तम:।। [[कूर्म पुराण]] (1|46|31)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (73|68-69) में गंगा को विष्णु के पाँव से एवं शिव के जटाजूट में अवस्थित माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दूसरे पौराणिक आख्यान के अनुसार गंगा [[हिमालय]] और मैना की पुत्री तथा उमा की भगिनी थीं। महाभारत की एक कथा उसे कुरुराज [[शान्तनु]] की पत्नी और [[भीष्म]] की माता बताती है। जिसमें भीष्म का दूसरा नाम गांगेय भी है। गंगा का सम्बन्ध [[कार्तिकेय]] के मातृत्व से भी है। [[हिंदू|हिन्दुओं]] के जितने तीर्थ इस नदी के तीर पर हैं, उतने कहीं पर नहीं और उसकी पवित्रता का प्रभाव तो भारतीयों पर इतना गहरा पड़ा कि उन्होंने अनेक दूसरी नदियों के नाम भी गंगा रख दिये। जहाँ-जहाँ भारतीय संस्कृति का विस्तार हुआ, वहाँ-वहाँ गंगा की पवित्रता का विविध रूप से उल्लेख हुआ। गंगा की मकर पर आरूढ़ चँवर अथवा कलश धारिणी मूर्तियाँ भी गुप्तकाल में बनने लगी थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]], अध्याय 12, 42, 47, 83-88, 90, 93, 95, 99, 107-109 आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[ऋग्वेद]] के नदीसूक्त में गंगा की स्तुति हुई है और [[पुराण|पुराणों]] ने उसकी महिमा का अनन्त बखान किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार विवद्गंगा, [[आकाशगंगा नदी|आकाशगंगा]] अथवा स्वर्गगंगा विष्णु के अँगूठे से निकली हैं, जिसका पृथ्वी पर अवतरण [[भगीरथ]] के स्तवन से [[कपिल मुनि]] द्वारा भस्मीकृत [[राजा सगर]] के 60,000 [[पुत्र|पुत्रों]] की अस्थियों को पवित्र करने के लिए हुआ। भगीरथ के साथ इसी संयोग के कारण गंगा का दूसरा नाम भागीरथी पड़ा। पौराणिक परम्परा है कि स्वर्ग से उतरने के कारण गंगा अत्यन्त कुपित हो उठी थीं और उसके कोप के कारण [[पृथ्वी]] पर उसकी धारा पड़ते ही उनके बहकर नष्ट हो जाने के भय से [[शिव]] ने अपनी जटा में उसे समेट लिया, जिससे उनकी जटाओं में उलझ जाने के कारण धारा पृथ्वी पर सीधी नहीं पड़ी और गंगा की गति मन्द हो गई। इसी सम्बन्ध में शिव का एक नाम गंगाधर भी पड़ा। गंगा का अवतरण तपस्वी जह्नु के यज्ञ के लिए घातक हुआ, जिससे क्रुद्ध होकर उस तापस ने गंगा को पी डाला और प्रार्थना के बाद उसने [[कान]] से गंगा की धारा निकाल दी, जिससे वह जाह्नवी कहलाई हैं। &lt;br /&gt;
====वन पर्व====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वन पर्व महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]] (अध्याय 85&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा की प्रशस्ति में कई श्लोक&amp;lt;ref&amp;gt;[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]] (श्लोक 88-97&amp;lt;/ref&amp;gt; दिये हैं, जिनमें से कुछ का अनुवाद इस प्रकार है- &amp;quot;जहाँ भी कहीं स्नान किया जाए, गंगा [[कुरुक्षेत्र]] के बराबर है। किन्तु कनखल की अपनी विशेषता है और प्रयाग में इसकी परम महत्ता है। यदि कोई सैकड़ों पापकर्म करके [[गंगाजल]] का अवसिंचन करता है तो गंगाजल उन दुष्कृत्यों को उसी प्रकार जला देता है, जिस प्रकार से [[अग्नि]] ईधन को जला देती है। [[सत युग]] में सभी स्थल पवित्र थे, [[त्रेता युग]] में [[पुष्कर]] सबसे अधिक पवित्र था, [[द्वापर युग]] में कुरुक्षेत्र एवं [[कलियुग]] में गंगा। नाम लेने पर गंगा पापी को पवित्र कर देती है। इसे देखने से सौभाग्य प्राप्त होता है। जब इसमें स्नान किया जाता है या इसका [[जल]] ग्रहण किया जाता है तो सात पीढ़ियों तक कुल पवित्र हो जाता है। जब तक किसी मनुष्य की अस्थि गंगा जल को स्पर्श करती रहती है, तब तक वह स्वर्गलोक में प्रसन्न रहता है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है और केशन के समान कोई देव। वह देश जहाँ गंगा बहती है और वह तपोवन जहाँ पर गंगा पाई जाती है, उसे सिद्धिक्षेत्र कहना चाहिए, क्योंकि वह गंगातीर को छूता रहता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====अनुशासन पर्व====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|अनुशासन पर्व महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt; [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]] (36|26, 30-31&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि वे [[महाजनपद|जनपद]] एवं देश, वे [[पर्वत]] एवं [[आश्रम]], जिनसे होकर गंगा बहती है, पुण्य का फल देने में महान हैं। वे लोग, जो जीवन के प्रथम भाग में पापकर्म करते हैं, यदि गंगा की ओर जाते हैं तो परम पद प्राप्त करते हैं। जो लोग गंगा में स्नान करते हैं उनका फल बढ़ता जाता है। वे पवित्रात्मा हो जाते हैं और ऐसा पुण्यफल पाते हैं जो सैकड़ों वैदिक यज्ञों के सम्पादन से भी नहीं प्राप्त होता। [[श्रीमद्भागवदगीता|भगवदगीता]] में भगवान [[श्रीकृष्ण]] ने कहा है कि धाराओं में मैं गंगा हूँ।&amp;lt;ref&amp;gt;स्रोतसामस्मि जाह्नवी, 10|31&amp;lt;/ref&amp;gt; मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु (8|92&amp;lt;/ref&amp;gt; ने साक्षी को सत्योच्चारण के लिए जो कहा है उससे प्रकट होता है कि [[मनुस्मृति]] के काल में गंगा एवं [[कुरुक्षेत्र]] सर्वोच्च पुनीत स्थल थे।&amp;lt;ref&amp;gt;यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदि स्थित:। तेन चेदविवादस्ते मा गंगा मा कुरून्गम:।। मनु (8|92)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Varanasi-2.jpg|thumb|250px|left|गंगा नदी, [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Varanasi]] &lt;br /&gt;
====विष्णु पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|विष्णु पुराण}}&lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु पुराण]] (2|8|120-121&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा की प्रशस्ति इस प्रकार की है- जब इसका नाम श्रवण किया जाता है, जब कोई इसके दर्शन की अभिलाषा करता है, जब यह देखी जाती है या स्पर्श की जाती है या जब इसका जल ग्रहण किया जाता है या जब कोई उसमें डुबकी लगाता है या जब इसका नाम लिया जाता है (या इसकी स्तुति की जाती है) तो गंगा दिन-प्रतिदिन प्राणियों को पवित्र करती है। जब सहस्रों योजन दूर रहने वाले लोग गंगा नाम का उच्चारण करते हैं, तो तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रुताभिलषिता दृष्टा स्पृष्टा पीतावगाहिता। या पावयति भूतानि कीर्तिता च दिने दिने।। गंगा गंगेति यैनमि योजनानां शतेष्वपि। स्थितैरुच्चारितं हन्ति पापं जन्मत्रयार्जितम्।। [[विष्णु पुराण]] (2|8|120-121); [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 110), तीर्थचि. (पृष्ठ 202), [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] (पृष्ठ 9)। दूसरा श्लोक [[पद्म पुराण]] (6|21|8 एवं 23|12) एवं [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (175|82) में कई प्रकार से पढ़ा गया है, यथा- गंगा........यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।। पद्य पुराण (1|31|77) में आया है......शतैरपि। नरो न नरकं याति किं तया सदृशं भवेत्।।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====भविष्य पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|भविष्य पुराण}}&lt;br /&gt;
भविष्य पुराण में भी ऐसा ही आया है।&amp;lt;ref&amp;gt;दर्शनार्त्स्शनात्पानात् तथा गंगेति कीर्तनात्। स्मरणदेव गंगाया: सद्य: पापै: प्रमुच्यते।। [[भविष्य पुराण]] (तीर्थचि. पृष्ठ 198; [[गंगावाक्यावली]] पृष्ठ 12 एवं [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] पृष्ठ 9)। प्रथम पाद [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]] (26|64) एवं [[अग्नि पुराण]] (110|6) में आया है। गच्छंस्तिष्ठञ् जपन्ध्यायन् भुञ्जञ् जाग्रत स्वपन् वदन्। य: स्मरेत् सततं गंगां सोऽपि मुच्येत बन्धनात्।। [[स्कन्द पुराण]] (काशीखण्ड, पूर्वार्ध 27|37) एवं [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 39|16-17)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण|मत्स्य]], [[कूर्म पुराण|कूर्म]], [[गरुड़ पुराण|गरुड़]] एवं [[पद्म  पुराण|पद्म]] पुराणों का कहना है कि गंगा में पहुँचना सब स्थानों में सरल है, केवल गंगाद्वार ([[हरिद्वार]]), [[प्रयाग]] एवं वहाँ जहाँ यह समुद्र में मिलती है, पहुँचना कठिन है। जो लोग यहाँ पर स्नान करते हैं, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है और जो लोग यहाँ पर मर जाते हैं, वे पुन: जन्म नहीं पाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वत्र सुलभा गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा। गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे।। तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवा:।। [[मत्स्य पुराण]] (106|54);[[कूर्म पुराण]] (1|37|34); [[गरुड़ पुराण]] (पूर्वार्ध, 81|1-2); [[पद्म  पुराण]] (5|60|120)। [[नारदीय पुराण]] (40|26-27) में ऐसा पाठान्तर है- ‘सर्वत्र दुर्लभा गंगा त्रिषु स्थानेषु चाधिका। गंगाद्वारे.......संगमे।। एषु स्नाता दिवं.......र्भवा:।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====नारद पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|नारद पुराण}}&lt;br /&gt;
नारद पुराण का कथन है कि गंगा सभी स्थानों में दुर्लभ है, किन्तु तीन स्थानों पर अत्यधिक दुर्लभ है। वह व्यक्ति जो चाहे या अनचाहे गंगा के पास पहुँच जाता है और मर जाता है, स्वर्ग जाता है और नरक नहीं देखता।&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] 107|4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====कूर्म पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|कूर्म पुराण}}&lt;br /&gt;
कूर्म पुराण का कथन है कि गंगा [[वायु पुराण]] द्वारा घोषित स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी में स्थित 35 करोड़ पवित्र स्थलों के बराबर है और वह उनका प्रतिनिधित्व करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;तिस्र: कोट्योर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्। दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तत्सर्व जाह्नवी स्मृता।। [[कूर्म पुराण]] (1|39|8); [[पद्म पुराण]] (1|47|7 एवं 5|60|59); [[मत्स्य पुराण]] (102|5, तानि ते सन्ति जाह्नवि)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====पद्म पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पद्म पुराण}}&lt;br /&gt;
पद्मपुराण ने प्रश्न किया है- ‘बहुत धन के व्यय वाले [[यज्ञ|यज्ञों]] एवं कठिन तपों से क्या लाभ, जब कि सुलभ रूप से प्राप्त होने वाली एवं स्वर्ग मोक्ष देने वाली गंगा उपस्थित है!’ नारदीय पुराणों में भी आया है-‘आठ अंगों वाले योग, तपों एवं यज्ञों से क्या लाभ? गंगा का निवास इन सभी से उत्तम है।’&amp;lt;ref&amp;gt;किं यज्ञैर्बहुवित्ताढ्यै: किं तपोभि: सुदुष्करै:। स्वर्ग्मोक्षप्रदा गंगा सुखसौभाग्यपूजिता।। [[पद्म पुराण]] (5|60|39); किमष्टांगेन योगेन किं तपोभि: किमध्वरै:। वास एव हि गंगायां सर्वतोपि विशिष्यते।। [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 38|38); तीर्थचि. (पृष्ठ 194, गंगायां ब्रह्मज्ञानस्य कारणम्); [[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (पृष्ठ 494)।&amp;lt;/ref&amp;gt; पद्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] (सृष्टि. 60|65&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि [[विष्णु]] सभी देवों का प्रतिनिधित्व करते हैं और गंगा विष्णु का। इसमें गंगा की प्रशस्ति इस प्रकार की गई है-‘[[पिता]], [[पति]], मित्रों एवं सम्बन्धियों के व्यभिचारी, पतित, दुष्ट, चाण्डाल एवं गुरुघाती हो जाने पर या सभी प्रकार के पापों एवं द्रोहों से संयुक्त होने पर क्रम से [[पुत्र]], पत्नियाँ, मित्र एवं सम्बन्धि उनका त्याग कर देते हैं, किन्तु गंगा उन्हें परित्यक्त नहीं करती&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]], सृष्टिखण्ड, 60|25-26)।’&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मत्स्य पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|मत्स्य पुराण}}&lt;br /&gt;
मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] (104|14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; के दो श्लोक यहाँ वर्णन के योग्य हैं- &amp;quot;पाप करने वाला व्यक्ति भी सहस्रों योजन दूर रहता हुआ गंगा स्मरण से परम पद प्राप्त कर लेता है। गंगा के नाम-स्मरण एवं उसके दर्शन से व्यक्ति क्रम से पापमुक्त हो जाता है एवं सुख पाता है। उसमें स्नान करने एवं जल के पान से वह सात पीढ़ियों तक अपने कुल को पवित्र कर देता है।&amp;quot; काशीखण्ड&amp;lt;ref&amp;gt;काशीखण्ड (27|69&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है कि गंगा के तट पर सभी काल शुभ हैं, सभी देश शुभ हैं और सभी लोग दान ग्रहण करने के योग्य हैं।&lt;br /&gt;
====वराह पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वराह पुराण}}&lt;br /&gt;
वराह पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[वराह पुराण]] (अध्याय 82&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा की व्युत्पत्ति ‘गां गता’ (जो पृथ्वी की ओर गई हो) है। पद्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]](सृष्टि खण्ड, 60|64-65&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा के विषय में निम्न मूलमंत्र दिया है-&amp;lt;poem&amp;gt;‘ओं नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम:।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====पुराणों में गंगा के पुनीत स्थल का विस्तार====&lt;br /&gt;
कुछ पुराणों में गंगा के पुनीत स्थल के विस्तार के विषय में व्यवस्था दी हुई है। नारद पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[नारद पुराण]]  (उत्तर, 43|119-120&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- गंगा के तीर से एक गव्यूति तक क्षेत्र कहलाता है, इसी क्षेत्र सीमा के भीतर रहना चाहिए, किन्तु तीर पर नहीं, गंगातीर का वास ठीक नहीं है। क्षेत्र सीमा दोनों तीरों से एक योजन की होती है अर्थात् प्रत्येक तीर से दो कोस तक क्षेत्र का विस्तार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। तीरं वसेत्क्षेत्रे तीरे वासो न चेष्यते।। एकयोजनविस्तीर्णा क्षेत्रसीमा तटद्वयात्। [[नारद पुराण]] (उत्तर, 43|119-120)। प्रथम को तीर्थचि. (पृष्ठ 266) ने [[स्कन्द पुराण]] से उदधृत किया है और व्याख्या की है-‘उभयतटे प्रत्येकं कोशदयं क्षेत्रम्।’ अन्तिम पाद को तीर्थचि. (पृष्ठ 267) एवं [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 136) ने [[भविष्य पुराण]] से उदधृत किया है। ‘गव्यूति’ दूरी या लम्बाई की माप है जो सामान्यत: दो क्रोश (कोस) के बराबर है। लम्बाई के मापों के विषय में कुछ अन्तर है। अमरकोश के अनुसार ‘गव्यूति’ दो क्रोश के बराबर है, यथा- ‘गव्यूति: स्त्री क्रोशयुगम्।’ [[वायु पुराण]] (8|105 एवं 101|122-123) एवं [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (2|7|96-101) के अनुसार 24 अंगुल=एक हस्त, 96 अंगुल=एक धनु (अर्थात् ‘दण्ड’, ‘युग’ या ‘नाली’); 2000 धनु (या दण्ड या युग या नालिका)=गव्यूति एवं 8000 धनु=योजन। [[मार्कण्डेय पुराण]] (46|37-40) के अनुसार 4 हस्त=धनु या दण्ड या युग या नालिका; 2000 धनु=क्रोश, 4 क्रोश=गव्यूति (जो योजन के बराबर है)। और देखिए इस ग्रन्थ का खण्ड 3, अध्याय 5।&amp;lt;/ref&amp;gt; यम ने एक सामान्य नियम यह दिया है कि वनों, पर्वतों, पवित्र नदियों एवं तीर्थों के स्वामी नहीं होते, इन पर किसी का भी प्रभुत्व (स्वामी रूप से) नहीं हो सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मपुराण का कथन है कि नदियों से चार हाथ की दूरी तक नारायण का स्वामित्व होता है और मरते समय भी (कण्ठगत प्राण होने पर भी) किसी को भी उस क्षेत्र में दान नहीं लेना चाहिए। गंगाक्षेत्र के गर्भ (अन्तर्वत्त), तीर एवं क्षेत्र में अन्तर प्रकट किया गया है। गर्भ वहाँ तक विस्तृत हो जाता है, जहाँ तक भाद्रपद के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक धारा पहुँच जाती है और उसके आगे तीर होता है, जो गर्भ से 150 हाथ तक फैला हुआ रहता है तथा प्रत्येक तीर से दो कोस तक क्षेत्र विस्तृत रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====आठ वसुओं की माँ====&lt;br /&gt;
गंगा-यमुना के मध्य का समस्त भूभाग ययाति ने पुरु को दिया था। गंगा आठ वसुओं की माँ हैं। वसुओं ने गंगा से कहा था कि [[शान्तनु]] से उनके गर्भ धारण करने के उपरान्त उनके जन्मते ही जल में प्रवाहित कर देना। गंगा ने शान्तनु से उत्पन्न सात वसु जल में प्रवाहित कर दिए। आठवें वसु ([[भीष्म]]) को शान्तनु ने बचा लिया। &amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]], अध्याय 2, 3, 61, 63, 67, 70, 87, 95-10।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==साहित्यिक उल्लेख==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Aarti.jpg|आरती, गंगा नदी, [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Aarti, Ganga River, Varanasi|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जल ही नहीं, अपितु भारत और हिन्दी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/hindikavyameganganadii.htm|title=हिन्दी काव्य में गंगा नदी|accessmonthday=[[30 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=अभिव्यक्ति|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में 'श्रीगंगालहरी'&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://sujalam.blogspot.com/2007/11/blog-post_73.html|title=गंगा की उपस्थिति |accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=सुजलाम्|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि महाकाव्य [[पृथ्वीराज रासो]]&amp;lt;ref&amp;gt;इंदो किं अंदोलिया अमी ए चक्कीवं गंगा सिरे। .................एतने चरित्र ते गंग तीरे&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा वीसलदेव रास&amp;lt;ref&amp;gt;कइ रे हिमालइ माहिं गिलउं। कइ तउ झंफघडं गंग-दुवारि।..................बहिन दिवाऊँ राइ की। थारा ब्याह कराबुं गंग नइ पारि&amp;lt;/ref&amp;gt;नरपति नाल्ह) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रंथ जगनिक रचित [[आल्हाखण्ड]]&amp;lt;ref&amp;gt;प्रागराज सो तीरथ ध्यावौं। जहँ पर गंग मातु लहराय।। / एक ओर से जमुना आई। दोनों मिलीं भुजा फैलाय।। / सरस्वती नीचे से निकली। तिरबेनी सो तीर्थ कहाय।।&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा, [[यमुना नदी|यमुना]] और [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। श्रृंगारी कवि विद्यापति,&amp;lt;ref&amp;gt;कज्जल रूप तुअ काली कहिअए, उज्जल रूप तुअ बानी। / रविमंडल परचण्डा कहिअए, गंगा कहिअए पानी।।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कबीर]] वाणी और [[जायसी]] के पद्मावत में भी गंगा का उल्लेख है, किन्तु [[सूरदास]],&amp;lt;ref&amp;gt;सुकदेव कह्यो सुनौ नरनाह। गंगा ज्यौं आई जगमाँह।। / कहौं सो कथा सुनौ चितलाइ। सुनै सो भवतरि हरि पुर जाइ।।&amp;lt;/ref&amp;gt; और [[तुलसीदास]] ने भक्ति भावना से गंगा-माहात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड में ‘श्री गंगा माहात्म्य’ का वर्णन तीन छन्दों में किया है- इन छन्दों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है।&amp;lt;poem&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा कहुँ कोटि उधारे। / देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ विमान सवाँरे।&lt;br /&gt;
पूजा को साजु विरंचि रचैं तुलसी जे महातम जानि तिहारे। / ओक की लोक परी हरि लोक विलोकत गंग तरंग तिहारे।।(कवितावली-उत्तरकाण्ड 145)&lt;br /&gt;
ब्रह्म जो व्यापक वेद कहैं, गमनाहिं गिरा गुन-ग्यान-गुनी को। / जो करता, भरता, हरता, सुर साहेबु, साहेबु दीन दुखी को।&lt;br /&gt;
सोइ भयो द्रव रूप सही, जो है नाथ विरंचि महेस मुनी को। / मानि प्रतीति सदा तुलसी, जगु काहे न सेवत देव धुनी को।।(कवितावली-उत्तरकाण्ड 146)&lt;br /&gt;
बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसें पद पापु लहौंगो। / ईस ह्वै सीस धरौं पै डरौं, प्रभु की समताँ बड़े दोष दहौंगो।&lt;br /&gt;
बरु बारहिं बार सरीर धरौं, रघुबीर को ह्वै तव तीर रहौंगो।  / भागीरथी बिनवौं कर ज़ोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो।।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; रीतिकाल में [[सेनापति]] और पद्माकर का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए गंगालहरी&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/bund0016.htm|title=बुन्देली काव्य का ऐतिहासिक संदर्भ &lt;br /&gt;
|accessmonthday=[[23 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=टीडीआईएल|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक ग्रंथ की रचना की है। सेनापति&amp;lt;ref&amp;gt;पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार, जहाँ मरि पापी होत सुरपुर पति है।  / देखत ही जाकौ भलो घाट पहचानियत, एक रूप बानी जाके पानी की रहति है।&amp;lt;/ref&amp;gt; कवित्त रत्नाकर में गंगा माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार सी सुशोभित है। [[रसखान]], [[रहीम]]&amp;lt;ref&amp;gt;अच्युत चरण तरंगिणी, शिव सिर मालति माल। हरि न बनायो सुरसरी, कीजौ इंदव भाल।।--रहीम&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में जगन्नाथदास रत्नाकर के ग्रंथ गंगावतरण में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए [[भगीरथ]] की 'भगीरथ-तपस्या' से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह सर्गों में विभक्त और रोला छन्द में निबद्ध है। अन्य कवियों में [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]], [[सुमित्रानन्दन पन्त]] और श्रीधर पाठक आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिंह|first=डॉ. राजकुमार  |title=विचार विमर्श|year=जुलाई   |publisher=सागर प्रकाशन|location=मथुरा |id= |page=13-23  |accessday=22 |accessmonth=जून|accessyear=2009 }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_/_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4|title=नौका-विहार / सुमित्रानंदन पंत|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=कविताकोश|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; में ग्रीष्म कालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/snp/ganga.htm|title=गंगा|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=अनुभूति|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ''भारत एक खोज'' (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;The Ganga, especially, is the river of India, beloved of her people, round which are interwined her memories, her hopes and fears, her songs of triumph, her victories and her defeats. She has been a symbol of India's age long culture and civilization, ever changing , ever flowing, and yet ever the same Ganga.&amp;quot; -जवाहरलाल नेहरू&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा की पौराणिक कहानियों को महेन्द्र मित्तल अपनी कृति ''माँ गंगा'' में संजोया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=3944|title=माँ गंगा|accessmonthday=[[30 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Seealso|गंगा चालीसा|गंगा माता जी की आरती}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Sunrise.jpg|सूर्योदय के समय गंगा नदी&lt;br /&gt;
चित्र:Haridwar2.jpg|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&lt;br /&gt;
चित्र:Kachla-Ghat.jpg|गंगा नदी, कछला घाट&lt;br /&gt;
चित्र:Devprayag-Bhagirathi-River.jpg|[[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]] और [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] का संगम देवप्रयाग, [[उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Devi-Delhi-Crafts-Museum-2.jpg|[[गंगा|गंगा देवी]] का भित्ति चित्र, हस्त शिल्पकला संग्रहालय, [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Devi-Delhi-Crafts-Museum.jpg|[[गंगा|गंगा देवी]] का भित्ति चित्र, हस्त शिल्पकला संग्रहालय, [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-National-Museum-Delhi.jpg|गंगा देवी प्रतिमा, [[राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय संग्रहालय]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=H7nhCTmEq5s&amp;amp;feature=player_embedded गंगा आरती विडियो]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
{{गंगा नदी}}{{राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक}}{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक]]&lt;br /&gt;
[[Category:गंगा नदी]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>खुशी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=217183</id>
		<title>गंगा नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=217183"/>
		<updated>2011-09-13T12:35:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;खुशी: Adding category :Category:प्रांगण हेतु चयनित लेख (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा नदी&lt;br /&gt;
|चित्र=Ganga-River-Varanasi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=गंगा नदी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|देश=[[भारत]], [[नेपाल]] और [[बांग्लादेश]]&lt;br /&gt;
|राज्य=[[हिमाचल प्रदेश]], [[उत्तराखंड]], [[उत्तर प्रदेश]], [[मध्य प्रदेश]], [[बिहार]] और [[पश्चिम बंगाल]]&lt;br /&gt;
|प्रमुख नगर=[[हरिद्वार]], [[कन्नौज]], [[कानपुर]], [[वाराणसी]], [[भागलपुर]] और [[मुर्शिदाबाद ज़िला]]&lt;br /&gt;
|प्रवाह समय=&lt;br /&gt;
|उद्गम स्थल=[[गंगोत्री]], [[उत्तराखंड]] &lt;br /&gt;
|विसर्जन स्थल=&lt;br /&gt;
|लम्बाई=2,510 किमी&lt;br /&gt;
|अधिकतम गहराई=&lt;br /&gt;
|अधिकतम चौड़ाई=&lt;br /&gt;
|इससे जुड़ी नहरें=&lt;br /&gt;
|जलचर=&lt;br /&gt;
|सहायक नदियाँ=[[यमुना]], [[रामगंगा नदी|रामगंगा]], [[घाघरा नदी|घाघरा]], [[ताप्ती नदी|ताप्ती]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[कोसी नदी|कोसी]] आदि&lt;br /&gt;
|पौराणिक उल्लेख=[[ब्रह्माण्ड पुराण]] के अनुसार गंगा को [[विष्णु]] के पाँव से एवं [[शिव]] के जटाजूट में अवस्थित माना गया है। &lt;br /&gt;
|धार्मिक महत्त्व=[[भारत]] की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। &lt;br /&gt;
|ऐतिहासिक महत्त्व=ऐतिहासिक रूप से गंगा के मैदान से ही हिन्दुस्तान का हृदय स्थल निर्मित है और वही बाद में आने वाली विभिन्न सभ्यताओं का पालना बना। [[अशोक]] के साम्राज्य का केन्द्र पाटलिपुत्र ([[पटना]]), [[बिहार]] में गंगा के तट पर बसा हुआ था। &lt;br /&gt;
|गूगल मानचित्र=[http://maps.google.co.in/maps?q=Ganga+River,+Varanasi,+Uttar+Pradesh&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=25.165795,82.959137&amp;amp;spn=0.424462,0.727158&amp;amp;sll=27.624803,81.604944&amp;amp;sspn=13.273661,23.269043&amp;amp;t=h&amp;amp;z=11&amp;amp;iwloc=A गंगा नदी]&lt;br /&gt;
|वर्तमान स्थिति=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=17:13, 5 अगस्त 2011 (IST)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा, उत्तर भारत के मैदानों की विशाल नदी है। गंगा भारत और [[बांग्लादेश]] में मिलकर 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई [[उत्तरांचल]] में [[हिमालय]] से निकलकर [[बंगाल की खाड़ी]] में भारत के लगभग एक-चौथाई भूक्षेत्र को अपवाहित करती है तथा अपने बेसिन में बसे विराट जनसमुदाय के जीवन का आधार बनती है। जिस गंगा के मैदान से होकर यह प्रवाहित होती है, वह इस क्षेत्र का हृदय स्थल है, जिसे हिन्दुस्तान कहते हैं। यहाँ तीसरी सदी में [[अशोक|अशोक महान]] के साम्राज्य से लेकर 16वीं सदी में स्थापित [[मुग़ल साम्राज्य]] तक सारी सभ्यताएँ विकसित हुईं। गंगा नदी अपना अधिकांश सफ़र भारतीय इलाक़े में ही तय करती है, लेकिन उसके विशाल डेल्टा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा बांग्लादेश में है। गंगा के प्रवाह की सामान्यत: दिशा उत्तर-पश्चिमोत्तर से दक्षिण-पूर्व की तरफ है और डेल्टा क्षेत्र में प्रवाह आमतौर से दक्षिण मुखी है।&lt;br /&gt;
====नामकरण====&lt;br /&gt;
भारतीय [[भाषा|भाषाओं]] में तथा अधिकृत रूप से गंगा नदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके अंग्रेज़ीकृत नाम ‘द गैंगीज़’ से ही जाना जाता है। गंगा सहस्राब्दियों से [[हिन्दू|हिन्दुओं]] की पवित्र तथा पूजनीय नदी रही है। अपने अधिकांश मार्ग में गंगा एक चौड़ी व मंद धारा है और विश्व के सबसे ज़्यादा उपजाऊ और घनी आबादी वाले इलाक़ों से होकर बहती है। इतने महत्व के बावज़ूद इसकी लम्बाई 2,510 किलोमीटर है, जो एशिया या विश्व स्तर की तुलना में कोई बहुत ज़्यादा नहीं है।&lt;br /&gt;
====पतितपावनी नदी====&lt;br /&gt;
भारत की पावन नदी, जिसकी जलधारा में स्नान से पापमुक्ति और जलपान से शुद्धि होती है। यह प्रसिद्ध नदी, [[हिमाचल प्रदेश]] में [[गंगोत्री]] से निकलकर [[मध्यदेश]] से होती हुई [[पश्चिम बंगाल]] के परे गंगासागर में मिलती है। गंगा की घाटी संसार की उर्वरतम घाटियों में से एक है और [[सरयू नदी|सरयू]], [[यमुना नदी|यमुना]], [[सोन नदी|सोन]] आदि अनेक नदियाँ उससे आ मिलती हैं। उसकी घाटी भारतीय सभ्यता के विकास में अन्यतम रही हैं। गंगा को [[संस्कृति|भारतीय संस्कृति]] में विशिष्ट योगदान के कारण ही उसे असाधारण महिमा मिली है, जिससे वह ‘पतितपावनी’ कहलाती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gangotri.jpg|thumb|[[गंगोत्री]]|left|250px]]&lt;br /&gt;
==उद्गम स्थल==&lt;br /&gt;
3900 मीटर ऊँचा गौमुख ([[गंगोत्री]]) गंगा का उदगम स्थल है। जो [[उत्तराखंड]] राज्य में स्थित है। गंगोत्री में गंगा का उदगम स्रोत यहाँ से लगभग 24 किलोमीटर दूर गंगोत्री ग्लेशियर में 4,225 मीटर की ऊँचाई पर होने का अनुमान है। गंगा की धारा, जो पहाड़ों में मंदाकिनी और [[अलकनन्दा नदी|अलकनन्दा]] की धाराओं के सम्मिलन से बनती है, हिमालय में अत्यन्त क्षीण है और [[हरिद्वार]] के ऊपर कनखल के समीप उत्तरी मैदान में प्रशस्त होकर बहती है और बरसात में उसके [[जल]] का [[वेग]] भयावह हो उठता है। गंगा नदी देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। 2,071 किलोमीटर तक भारत तथा उसके बाद [[बांग्लादेश]] में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31 मीटर) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। अपने सौंदर्य और महत्त्व के कारण एक ओर जहाँ [[पुराण और साहित्य में गंगा|पुराण और साहित्य में इसका उल्लेख]] बार-बार मिलता है, वहीं विदेशी साहित्य में भी गंगा नदी के प्रति प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णनों की कमी नहीं।&lt;br /&gt;
==भौतिक विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
====भू-आकृति====&lt;br /&gt;
गंगा का उद्गम दक्षिणी [[हिमालय]] में [[तिब्बत]] सीमा के भारतीय हिस्से से होता है। इसकी पाँच आरम्भिक धाराओं [[भागीरथी नदी|भागीरथी]], अलकनन्दा, मंदाकिनी, धौलीगंगा तथा पिंडर का उद्गम [[उत्तराखण्ड]] क्षेत्र, जो [[उत्तर प्रदेश]] का एक संभाग था (वर्तमान उत्तरांचल राज्य) में होता है। दो प्रमुख धाराओं में बड़ी अलकनन्दा का उद्गम हिमालय के [[नंदा देवी पर्वत|नंदा देवी शिखर]] से 48 किलोमीटर दूर तथा दूसरी भागीरथी का उद्गम हिमालय की गंगोत्री नामक [[हिमनद]] के रूप में 3, 050 मीटर की ऊँचाई पर बर्फ़ की गुफ़ा में होता है। गंगोत्री हिन्दुओं का एक तीर्थ स्थान है। वैसे गंगोत्री से 21 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व स्थित गोमुख को गंगा का वास्तविक उद्गम स्थल माना जाता है। [[चित्र:Haridwar.jpg|300px|thumb|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt;Ganga River, Haridwar]]  गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है जो [[कुमाऊँ]] में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनद से निकलती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;टीडीआईएल&amp;quot;/&amp;gt; गंगा के इस उद्गम स्थल की ऊँचाई 3140 मीटर है। यहाँ गंगा जी को समर्पित एक मंदिर भी है। [[गंगोत्री]] तीर्थ, शहर से 19 किलोमीटर उत्तर की ओर 3892 मीटर (12,770 फीट) की ऊँचाई पर इस हिमनद का मुख है। यह हिमनद 25 किलोमीटर लंबा व 4 किलोमीटर चौड़ा और लगभग 40 मीटर ऊँचा है। इसी ग्लेशियर से भागीरथी एक छोटे से गुफ़ानुमा मुख पर अवतरित होती है। इसका जल स्रोत 5000 मीटर ऊँचाई पर स्थित एक बेसिन है। इस बेसिन का मूल पश्चिमी ढलान की संतोपंथ की चोटियों में है। गौमुख के रास्ते में 3600 मीटर ऊँचे चिरबासा ग्राम से विशाल गोमुख हिमनद के दर्शन होते हैं। इस हिमनद में [[नंदा देवी पर्वत]], [[कामत पर्वत]] एवं त्रिशूल पर्वत का हिम पिघल कर आता है। [[अलकनंदा नदी]] की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। धौली गंगा का अलकनंदा से विष्णु प्रयाग में संगम होता है। यह 1372 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। फिर 2805 मीटर ऊँचे नंद प्रयाग में अलकनन्दा का नंदाकिनी नदी से संगम होता है। इसके बाद कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा का कर्ण गंगा या पिंडर नदी से संगम होता है। फिर [[ऋषिकेश]] से 139 किलोमीटर दूर स्थित रुद्र प्रयाग में अलकनंदा मंदाकिनी से मिलती है। इसके बाद भागीरथी व अलकनन्दा 1500 फीट पर स्थित देव प्रयाग में संगम करती हैं यहाँ से यह सम्मिलित जल-धारा गंगा नदी के नाम से आगे प्रवाहित होती है। इन पांच प्रयागों को सम्मिलित रूप से पंच प्रयाग कहा जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;टीडीआईएल&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url= http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/utrn0078.htm|title= उत्तरांचल-एक परिचय|accessmonthday=[[28 अप्रॅल]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= टीडीआईएल|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार 200 किलोमीटर का संकरा पहाड़ी रास्ता तय करके गंगा नदी [[ऋषिकेश]] होते हुए प्रथम बार मैदानों का स्पर्श [[हरिद्वार]] में करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होने के बाद यह गंगा के रूप में दक्षिण [[हिमालय]] से ऋषिकेश के निकट बाहर आती है और हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। हरिद्वार भी हिन्दुओं का तीर्थ स्थान है। नदी के प्रवाह में मौसम के अनुसार आने वाले थोड़े बहुत परिवर्तन के बावज़ूद इसके [[जल]] की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि तब होती है, जब इसमें अन्य सहायक नदियाँ मिलती हैं तथा यह अधिक वर्षा वाले इलाक़े में प्रवेश करती है। एक तरफ [[अप्रॅल]] से [[जून]] के बीच हिमालय में पिघलने वाली बर्फ़ से इसका पोषण होता है, वहीं दूसरी ओर [[जुलाई]] से [[सितम्बर]] के बीच का मानसून इसमें आने वाली बाढ़ों का कारण बनता है। उत्तर प्रदेश राज्य में इसके दाहिने तट की सहायक नदियाँ, यमुना राजधानी [[दिल्ली]] होते हुए [[इलाहाबाद]] में गंगा में शामिल होती हैं तथा टोन्स नदी हैं, जो [[मध्य प्रदेश]] के [[विंध्याचल पर्वत|विंध्याचल]] से निकलकर उत्तर की तरफ़ प्रवाहित होती है और शीघ्र ही गंगा में शामिल हो जाती हैं। उत्तर प्रदेश में बाईं तरफ़ की सहायक नदियाँ [[रामगंगा नदी|रामगंगा]], [[गोमती नदी|गोमती]] तथा [[घाघरा नदी|घाघरा]] हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद गंगा [[बिहार]] राज्य में प्रवेश करती है, जहाँ इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हिमालय क्षेत्र की तरफ़ से  [[गंडक नदी|गंडक]], [[गंडक नदी|बूढ़ी गंडक]], [[कोसी नदी|कोसी]] तथा घुघरी हैं। दक्षिण की तरफ़ से इसकी मुख्य सहायक नदी [[सोन नदी|सोन]] है। यहाँ से यह नदी राजमहल पहाड़ियों का चक्कर लगाती हुई दक्षिण-पूर्व में फरक्का तक पहुँचती है, जो इस डेल्टा का सर्वोच्च बिन्दु है। यहाँ से गंगा भारत में अन्तिम राज्य [[पश्चिम बंगाल]] में प्रवेश करती है, जहाँ उत्तर की तरफ़ से इसमें महानंदा मिलती है (समूचे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में स्थानीय आबादी गंगा को [[पद्मा नदी|पद्मा]] कहकर पुकारती है)। गंगा के डेल्टा की सुदूर पश्चिमी शाखा [[हुगली नदी|हुगली]] है, जिसके तट पर महानगर [[कोलकाता]] (भूतपूर्व कलकत्ता) बसा हुआ है। स्वयं हुगली में पश्चिम से आकर उसकी दो सहायक नदियाँ [[दामोदर नदी|दामोदर]] व रूपनारायण शामिल होती हैं। बांग्लादेश में ग्वालंदो घाट के निकट गंगा में विशाल [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] शामिल होती है (इन दोनों के संगम के 241 किलोमीटर पहले तक इसे फिर यमुना के नाम से बुलाया जाता है)। गंगा और ब्रह्मपुत्र की संयुक्त धारा ही पद्मा कहलाने लगती है और चाँदपुर के निकट वह मेघना में शामिल हो जाती है। इसके बाद यह विराट जलराशि अनेक प्रवाहों में विभाजित होकर [[बंगाल की खाड़ी]] में समा जाती है। बांग्लादेश की राजधानी ढाका धालेश्वदी नदी की सहायक नदी बूढ़ी गंगा के तट पर स्थित है। जिन नदी शाखाओं से गंगा का डेल्टा बनता है, उसकी हुगली और मेघना के अलावा अन्य शाखाएँ पश्चिम बंगाल में जलांगी और बांग्लादेश में मातागंगा, भैरब, काबाडक, गराई-मधुमती तथा अरियल खान हैं।&lt;br /&gt;
*डेल्टा क्षेत्र में स्थित गंगा की सभी सहायक नदियाँ और शाखाएँ मौसम में परिवर्तनों के कारण अक्सर अपना रास्ता बदल लेती हैं। ये परिवर्तन विशेषकर 1750 ई. के बाद से ज़्यादा होने लगे हैं। ब्रह्मपुत्र 1785 ई. तक मैमनसिंह शहर के पास से बहती थी, अब यह वहाँ से 64 किलोमीटर पश्चिम में गंगा में मिलती है।&lt;br /&gt;
*गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की नदी घाटियों से बहकर आई हुई गाद से बने डेल्टा का क्षेत्रफल 60,000 वर्ग किलोमीटर है तथा उसका निर्माण [[मिट्टी]], रेत तथा [[खड़िया]] की क्रमिक परतों से हुआ है। यहाँ पर सड़ी-गली वनस्पति (पीट) लिग्नाइट (भूरे कोयले) की परतें भी उन इलाक़ों में मिलती हैं, जहाँ पहले घने वन हुआ करते थे। डेल्टा में नहरों के आसपास बाद में प्राकृतिक रूप से बहुत-सा खादर भी जमा हुआ है।&lt;br /&gt;
*गंगा डेल्टा की दक्षिणी सतह का निर्माण तेज़ गति से तथा तुलनात्मक रूप से हाल में बहकर आई गाद की भारी मात्रा से हुआ है। पूरब में समुद्र की तरफ़ इसी गाद के कारण बड़ी तेज़ी से नए-नए भूक्षेत्र (नदी द्वीप) बनते जा रहे हैं, जिन्हें ‘चार’ कहते हैं। वैसे डेल्टा का पश्चिमी समुद्री तट 18वीं सदी के बाद से लगभग अपरिवर्तित है।&lt;br /&gt;
*पश्चिम बंगाल की नदियों का प्रवाह बहुत धीमा है और उनसे काफ़ी कम पानी समुद्र में प्रवाहित होता है। बांग्लादेशी डेल्टा क्षेत्र में नदियाँ चौड़ी तथा गतिमान हैं और उनमें पानी विपुल मात्रा में बहता है। ये नदियाँ अनेक संकरी पहाड़ियों से परस्पर जुड़ी हुई हैं।&lt;br /&gt;
*वर्षा ऋतु (जून से [[अक्टूबर]]) में इस इलाक़े में कृत्रिम रूप से निर्मित उच्चभूमि पर बसाए गए गाँव कई फ़ीट पानी में डूब जाते हैं। इस मौसम में इन बस्तियों के बीच आवागमन का एकमात्र साधन नौकाएँ ही होती हैं।&lt;br /&gt;
*समूचे डेल्टा क्षेत्र का समुद्रतटीय इलाक़ा दलदली है। यह पूरा क्षेत्र सुन्दरवन कहलाता है और [[भारत]] व [[बांग्लादेश]], दोनों ने इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर रखा है।&lt;br /&gt;
*इस डेल्टा के कुछ हिस्सों में जंगली वनस्पतियों तथा धान से निर्मित पीट की परतें हैं। अनेक प्राकृतिक खाइयों (बिलों) में उस पीट के बनने की क्रिया जारी है। जिसका उपयोग स्थानीय किसान खाद, सुखाकर घरेलू तथा औद्योगिक ईधन के रूप में करते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gaumukh-Gangotri-Glacier.jpg|thumb|250px|left|[[गंगोत्री]] हिमनद में [[गौमुख]]&amp;lt;br /&amp;gt;Gomukh in Gangotri Himnad]] &lt;br /&gt;
====जलवायु====&lt;br /&gt;
गंगा के बेसिन में इस उपमहाद्वीप की विशालतम नदी प्रणाली स्थित है। यहाँ [[जल]] की आपूर्ति मुख्यत: [[जुलाई]] से [[अक्टूबर]] के बीच दक्षिण-पश्चिमी मानसून तथा अप्रॅल से जून के बीच ग्रीष्म ऋतु के दौरान पिघलने वाली [[हिमालय]] की बर्फ़ से होती है। नदी के बेसिन में मानसून के उन कटिबंधीय तूफ़ानों से भी वर्षा होती है, जो जून से अक्टूबर के बीच बंगाल की खाड़ी में पैदा होते हैं। [[दिसम्बर]] और [[जनवरी]] में बहुत कम मात्रा में वर्षा होती है। औसत वार्षिक वर्षा बेसिन के पश्चिमी सिरे में 760 मिलीमीटर से लेकर पूर्वी सिरे पर 2,286 मिलीमीटर के बीच होती है ([[उत्तर प्रदेश]] में गंगा के ऊपरी कछार में जहाँ औसत वर्षा 762 से 1,016 मिलीमीटर होती है, वहीं बिहार के मध्यवर्ती मैदान में यह औसत 1,016 से 1,524 मिलीमीटर तथा डेल्टा क्षेत्र में 1,524 से 2,540 मिलीमीटर के बीच है)। डेल्टा क्षेत्र में मानसून के प्रारम्भ ([[मार्च]] से [[मई]]) तथा मानसून के अन्त ([[सितम्बर]] से [[अक्टूबर]]) में ज़ोरदार चक्रवाती समुद्री तूफ़ान आते हैं। इनसे काफ़ी बड़ी मात्रा में मानव जीवन, सम्पत्ति, फ़सलों तथा पशुओं का नुक़सान होता है। ऐसा ही एक भीषण विनाशकारी तूफ़ान [[नवम्बर]], [[1970]] में आया था, जिसमें कम से कम दो लाख और अधिक से अधिक पाँच लाख लोगों की मौत हुई थी। चूँकि गंगा के मैदान में उतार-चढ़ाव लगभग न के बराबर है, अत: नदी प्रवाह की गति धीमी है। [[दिल्ली]] में [[यमुना नदी]] से लेकर बंगाल की खाड़ी के 1,609 किलोमीटर के सम्पूर्ण फ़ासले में भूतल की ऊँचाई में मात्र 213 मीटर की कमी आती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान का कुल विस्तार 7,77,000 वर्ग किलोमीटर है। इस मैदान में मिट्टी की सतह, जो कहीं-कहीं 1,829 मीटर से भी ज़्यादा है, सम्भवत: 10 हज़ार वर्ष से अधिक पुरानी नहीं है।&lt;br /&gt;
====वनस्पति====&lt;br /&gt;
गंगा-यमुना के इलाक़े में कभी घने जंगल हुआ करते थे। ऐतिहासिक ग्रन्थों से पता चलता है कि 16वीं और 17वीं सदी तक यहाँ जंगली [[हाथी]], गौर, [[बारहसिंगा]], गैंडा, [[बाघ]] तथा [[सिंह|शेर]] का शिकार होता था। गंगा के सम्पूर्ण बेसिन से वहाँ की मूल प्राकृतिक वनस्पतियाँ लुप्त हो गई हैं और वहाँ अब लगातार बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए व्यापक रूप में खेती की जाती है। हिरन, जंगली सूअर, जंगली बिल्लियाँ तथा कुछ भेड़िए, भालू, सियार और लोमड़ी को छोड़कर जंगली जानवर बहुत कम हैं। डेल्टा के सुन्दरवन इलाक़े में बंगाल टाइगर (शेर), मगरमच्छ तथा दलदली हिरन अब भी मिल जाते हैं। नदियों में, ख़ासतौर से डेल्टा क्षेत्र में मछलियाँ विपुल मात्रा में पाई जाती हैं और स्थानीय निवासियों के भोजन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ पर मैना, तोता, कौआ, चील, तीतर और मुर्ग़ाबी जैसे पक्षियों की भी कई क़िस्में पाई जाती हैं। जाड़े के मौसम में बत्तख़ और चाहा पक्षी ऊँचे हिमालय को पार करके दक्षिण में पानी से घिरे क्षेत्रों की तरफ़ प्रवास करते हैं। बंगाल के इलाक़े में आमतौर से पाई जाने वाली मछलियों में फ़ेदर बैक (नोटोप्टेरिडी), वॉकिंग कैटफ़िश, गोरामि (एनाबैंटिडी) तथा मिल्कफ़िश (चैनिडी), बार्ब (सिप्राइनिडी) आदि प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
====जनजीवन====&lt;br /&gt;
गंगा के बेसिन के निवासी नृजातीय रूप से मिश्रित मूल के हैं। पश्चिम और मध्य बेसिन में वे मूलत: [[आर्य]] पूर्वजों की सन्तान थे। बाद में तुर्क, [[मंगोल]], अफ़ग़ानी, फ़ारसी तथा अरब लोग पश्चिम से आय और अंतमिश्रित हो गए। पूरब और दक्षिण, ख़ासतौर से बंगाल के इलाक़े में तिब्बती, बर्मी तथा विविध नस्ल के पहाड़ी लोग भी मिलते हैं। इनसे भी बाद में आने वाले यूरोपीय लोग यहाँ न तो बसे और न ही स्थानीय लोगों के साथ [[विवाह]] सम्बन्ध बनाये।&lt;br /&gt;
====गंगा का मैदान====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Garwhal-Gangotri-Waterfall.jpg|thumb|180px|[[गंगोत्री]] झरना, [[गढ़वाल]]&amp;lt;br /&amp;gt;Gangotri Waterfall, Garhwal]]&lt;br /&gt;
गंगा, इलाहाबाद (प्रयाग) हरिद्वार से लगभग 800 किलोमीटर मैदानी यात्रा करते हुए [[गढ़मुक्तेश्वर]],सोरों, [[फ़र्रुख़ाबाद]], [[कन्नौज]], [[बिठूर]], [[कानपुर]] होते हुए पहुँचती है। यहाँ इसका संगम [[यमुना नदी|यमुना]] नदी से होता है। यह संगम स्थल हिन्दुओं का एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। इसे तीर्थराज प्रयाग कहा जाता है। इसके बाद हिन्दू धर्म की प्रमुख मोक्षदायिनी नगरी [[काशी]] ([[वाराणसी]]) में गंगा एक वक्र लेती है, जिससे यह यहाँ उत्तरवाहिनी कहलाती है। यहाँ से [[मिर्ज़ापुर]], [[पटना]], [[भागलपुर]] होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें बहुत-सी सहायक नदियाँ, जैसे [[सोन नदी|सोन]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[घाघरा नदी|घाघरा]], [[कोसी नदी|कोसी]] आदि मिल जाती हैं। [[भागलपुर]] में राजमहल की पहाड़ियों से यह दक्षिणवर्ती होती है। पश्चिम बंगाल के [[मुर्शिदाबाद ज़िला|मुर्शिदाबाद ज़िले]] के गिरिया स्थान के पास गंगा नदी दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है-भागीरथी और पद्मा। [[भागीरथी नदी]] गिरिया से दक्षिण की ओर बहने लगती है जबकि पद्मा नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती फरक्का बैराज ([[1974]] निर्मित) से छनते हुई बंगला देश में प्रवेश करती है। यहाँ से गंगा का डेल्टाई भाग शुरू हो जाता है। मुर्शिदाबाद शहर से हुगली शहर तक गंगा का नाम भागीरथी नदी तथा हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम [[हुगली नदी]] है। गंगा का यह मैदान मूलत: एक भू-अभिनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वतमाला निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में लगभग 6-4 करोड़ वर्ष पहले हुआ था। तब से इसे हिमालय और प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ लाए हुए अवसादों से पाट रही हैं। इन मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000 मीटर है। इस मैदान में नदी की प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और निक्षेपण स्थलाकॄतियाँ, जैसे- बालू-रोधका, विसर्प, गोखुर झीलें और गुंफित नदियाँ पाई जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://vimi.wordpress.com/2009/02/22/bharat_sanrachana/|title=भारत की भौतिक संरचना|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=पर्यावरण के विभिन्न घटक|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
=====गंगा के तट पर बसे नगर=====&lt;br /&gt;
गंगा के मैदान में अनेक नगर बसे, जिनमें मुख्य रूप से रूड़की, [[सहारनपुर]], [[मेरठ]], आगरा (मशहूर मक़बरे [[ताजमहल]] का शहर), [[मथुरा]] (भगवान [[श्रीकृष्ण]] की जन्मस्थली के रूप में पूजनीय), [[अलीगढ़]], कानपुर, [[बरेली]], [[लखनऊ]], [[इलाहाबाद]], [[वाराणसी]] (पवित्र शहर बनारस), [[पटना]], [[भागलपुर]], राजशाही, मुर्शिदाबाद, बर्दवान (वर्द्धमान), कलकत्ता, हावड़ा, ढाका, खुलना और बारीसाल उल्लेखनीय हैं। डेल्टा क्षेत्र में कलकत्ता और उसके उपनगर हुगली के दोनों किनारों पर लगभग 80 किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं व भारत के जनसंख्या, व्यापार तथा उद्योग को दृष्टि से सबसे घने बसे हुए इलाक़ों में गिने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====सुंदरवन डेल्टा====&lt;br /&gt;
{{Main|सुंदरवन}}&lt;br /&gt;
हुगली नदी [[कोलकाता]], हावड़ा होते हुए [[सुंदरवन]] के भारतीय भाग में सागर से संगम करती है। पद्मा में [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] से निकली शाखा नदी [[जमुना नदी]] एवं मेघना नदी मिलती हैं। अंततः ये 350 किलोमीटर चौड़े सुंदरवन डेल्टा में जाकर [[बंगाल की खाड़ी]] में सागर-संगम करती है। यह डेल्टा गंगा एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई नवीन जलोढ़ से 1,000 वर्षों में निर्मित समतल एवं निम्न मैदान है। यहाँ गंगा और बंगाल की खाड़ी के संगम पर एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है जिसे गंगा-सागर-संगम कहते हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;इंडियानेट&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url= http://www.indianetzone.com/2/ganga_river.htm|title= गंगा रिवर|accessmonthday=[[14 जून]]|accessyear=[[2009]]|format= एचटीएम|publisher=इण्डिया नेट ज़ोन |language=[[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt; विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा (सुंदरवन) बहुत सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध [[बाघ|बंगाल टाईगर]] का निवास स्थान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;इंडियानेट&amp;quot;/&amp;gt; [[चित्र:Haridwar1.jpg|250px|thumb|left|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt;Ganga River, Haridwar]] यह डेल्टा धीरे धीरे सागर की ओर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले कोलकाता सागर तट पर ही स्थित था और सागर का विस्तार राजमहल तथा सिलहट तक था, परन्तु अब यह तट से 15-20 मील (24-32 किलोमीटर) दूर स्थित लगभग 1,80,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। जब डेल्टा का सागर की ओर निरन्तर विस्तार होता है तो उसे प्रगतिशील डेल्टा कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिहं |first=सविन्द्र |title= भौतिक भूगोल |year=जुलाई 2002 |publisher=वसुन्धरा प्रकाशन |location=गोरखपुर |id= |page=247-248 |accessday= 3|accessmonth= जून|accessyear= 2009}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीव-जन्तु==&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि 16वीं तथा 17वीं शताब्दी तक गंगा-यमुना प्रदेश घने वनों से ढका हुआ था। इन वनों में जंगली [[हाथी]], भैंस, गेंडा, शेर, [[बाघ]] तथा गवल का शिकार होता था। गंगा का तटवर्ती क्षेत्र अपने शांत व अनुकूल पर्यावरण के कारण रंग-बिरंगे पक्षियों का संसार अपने आंचल में संजोए हुए है। इसमें मछलियों की 140 प्रजातियाँ, 35 सरीसृप तथा इसके तट पर 42 स्तनधारी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://jajbat.blogspot.com/2008_05_01_archive.html|title=हमारी नदियों पर मंडराता ख़तरा |accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=एच.टी.एम.एल|publisher=जज़्बात|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ की उत्कृष्ट पारिस्थितिकी संरचना में कई प्रजाति के वन्य जीवों जैसे नीलगाय, सांभर, खरगोश, नेवला, चिंकारा के साथ सरीसृप-वर्ग के जीव-जन्तुओं को भी आश्रय मिला हुआ है। इस इलाके में ऐसे कई जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ हैं जो दुर्लभ होने के कारण संरक्षित घोषित की जा चुकी हैं। गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू,  लोमड़ी, चीते, बर्फीले चीते, हिरण, भौंकने वाले हिरण, सांभर, कस्तूरी मृग, सेरो, बरड़ मृग, साही, तहर आदि काफ़ी संख्या में मिलते हैं। विभिन्न रंगों की तितलियां तथा कीट भी यहाँ पाए जाते हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या के दबाव में धीरे-धीरे वनों का लोप होने लगा है और गंगा की घाटी में सर्वत्र कृषि होती है फिर भी गंगा के मैदानी भाग में हिरण, जंगली सूअर, जंगली बिल्लियाँ, भेड़िया, गीदड़, लोमड़ी की अनेक प्रजातियाँ काफ़ी संख्या में पाए जाते हैं। डालफिन की दो प्रजातियाँ गंगा में पाई जाती हैं। जिन्हें [[गंगा डालफिन]] और इरावदी डालफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा गंगा में पाई जाने वाले [[शार्क]] की वजह से भी गंगा की प्रसिद्धि है जिसमें बहते हुये पानी में पाई जानेवाली शार्क के कारण विश्व के वैज्ञानिकों की काफ़ी रुचि है।  इस नदी और बंगाल की खाड़ी के मिलन स्थल पर बनने वाले मुहाने को सुंदरवन के नाम से जाना जाता है जो विश्व की बहुत-सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का गृहक्षेत्र है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://sujalam.blogspot.com/2007/10/blog-post_131.html|title=गंगा|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=सुजलामा|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा में [[मछली|मछलियों]] तथा [[सर्प|सर्पों]] की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं और मीठे पानी वाले दुर्लभ [[गंगा डाल्फ़िन|डालफिन]] भी पाए जाते हैं। यह [[कृषि]], [[पर्यटन]], साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित ज़रूरतों  को पूरा करती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में [[बैक्टीरियोफेज]] नामक [[विषाणु]] होते हैं, जो [[जीवाणु|जीवाणुओं]] व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावज़ूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफ़ाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर, 2008 में [[भारत]] सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.bihartodayonline.com/2008/11/jagran-yahoo-report_04.html|title= गंगा को भारत की राष्ट्रीय नदी |accessmonthday=[[नवंबर]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= बिहार टुडे|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.voanews.com/hindi/archive/2008-11/2008-11-04-voa24.cfm|title= गंगा -भारत की राष्ट्रीय नदी |accessmonthday=[[4 नवंबर]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= वॉयस ऑफ अमेरिका|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last= |first=|title= समकालीन भारत |year=अप्रॅल 2003 |publisher=राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद |location=नई दिल्ली |id= |page=247-248 |accessday= 23|accessmonth= जून|accessyear= 2009}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सहायक नदियाँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Junction-Of-Gange-And-Yamuna-Allahabad.jpg|thumb|350px|मानचित्र में गंगा और [[यमुना नदी|यमुना]] का संगम, [[इलाहाबाद]] ([[1885]])]]&lt;br /&gt;
गंगा में उत्तर की ओर से आकर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियाँ यमुना, रामगंगा, करनाली (घाघरा), ताप्ती, गंडक, कोसी और काक्षी हैं तथा दक्षिण के पठार से आकर इसमें मिलने वाली प्रमुख नदियाँ चंबल, सोन, बेतवा, केन, दक्षिणी टोस आदि हैं। यमुना गंगा की सबसे प्रमुख सहायक नदी है जो हिमालय की बन्दरपूँछ चोटी के आधार पर यमुनोत्री हिमखण्ड से निकली है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://bharat.gov.in/knowindia/rivers.php|title=भारत के बारे में जानो|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारत सरकार|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; हिमालय के ऊपरी भाग में इसमें टोंस&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://hindi.indiawaterportal.org/?q=content/उत्तराखंड-की-प्रमुख-नदियाँ |title=उत्तराखंड की प्रमुख नदियाँ|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=इंडिया वाटर पोर्टल |language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा बाद में लघु हिमालय में आने पर इसमें गिरि और आसन नदियाँ मिलती हैं। चम्बल, बेतवा, शारदा और केन यमुना की सहायक नदियाँ हैं। चम्बल इटावा के पास तथा बेतवा [[हमीरपुर उत्तर प्रदेश|हमीरपुर]] के पास यमुना में मिलती हैं। [[यमुना नदी|यमुना]] [[इलाहाबाद]] के निकट बायीं ओर से गंगा नदी में जा मिलती है। रामगंगा मुख्य हिमालय के दक्षिणी भाग [[नैनीताल]] के निकट से निकलकर [[बिजनौर]] से बहती हुई [[कन्नौज]] के पास गंगा में मिलती है। करनाली नदी मप्सातुंग नामक हिमनद से निकलकर [[अयोध्या]], फैजाबाद होती हुई बलिया ज़िले की सीमा के पास गंगा में मिल जाती है। इस नदी को पर्वतीय भाग में कौरियाला तथा मैदानी भाग में [[घाघरा नदी|घाघरा]] कहा जाता है। [[गंडक नदी|गंडक]] हिमालय से निकलकर [[नेपाल]] में शालीग्राम नाम से बहती हुई मैदानी भाग में नारायणी नदी का नाम पाती है। यह काली गंडक और त्रिशूल नदियों का जल लेकर प्रवाहित होती हुई सोनपुर के पास गंगा में मिलती है। कोसी की मुख्यधारा अरुण है जो गोसाई धाम के उत्तर से निकलती है। ब्रह्मपुत्र के बेसिन के दक्षिण से सर्पाकार रूप में अरुण नदी बहती है जहाँ यारू नामक नदी इससे मिलती है। इसके बाद [[हिमालय]] के [[कंचनजंगा]] शिखरों के बीच से बहती हुई यह दक्षिण की ओर 90 किलोमीटर बहती है जहाँ पश्चिम से सूनकोसी तथा पूरब से तामूर कोसी नामक नदियाँ इसमें मिलती हैं। इसके बाद कोसी नदी के नाम से यह [[शिवालिक पर्वतश्रेणी|शिवालिक]] को पार करके मैदान में उतरती है तथा बिहार राज्य से बहती हुई गंगा में मिल जाती है। [[अमरकंटक]] पहाड़ी से निकलकर [[सोन नदी]] [[पटना]] के पास गंगा में मिलती है। मध्य-प्रदेश के मऊ के निकट जनायाब पर्वत से निकलकर [[चम्बल नदी]] [[इटावा]] से 38 किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी में मिलती है। [[बेतवा नदी]] मध्य प्रदेश में [[भोपाल]] से निकलकर उत्तर हमीरपुर के निकट यमुना में मिलती है। भागीरथी नदी के दायें किनारे से मिलने वाली अनेक नदियों में [[बांसलोई नदी|बाँसलई]], द्वारका, मयूराक्षी, रूपनारायण, कंसावती और रसूलपुर प्रमुख हैं। जलांगी और माथा भाँगा या चूनीं बायें किनारे से मिलती हैं जो अतीत काल में गंगा या पद्मा की शाखा नदियाँ थीं। किन्तु ये वर्तमान समय में गंगा से पृथक होकर वर्षाकालीन नदियाँ बन गई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रदूषण एवं पर्यावरण == &lt;br /&gt;
गंगा नदी विश्व भर में अपनी शुद्धीकरण क्षमता के कारण जानी जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धीकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में [[बैक्टीरियोफेज]] नामक [[विषाणु]] होते हैं, जो [[जीवाणु]]ओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। नदी के जल में प्राणवायु ([[ऑक्सीजन]]) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है। एक राष्ट्रीय सार्वजनिक रेडियो कार्यक्रम के अनुसार इस कारण हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का ख़तरा बहुत ही कम हो जाता है, जिससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;बैक्टीरियोफेज का स्व-शुद्धिकरण प्रभाव, ऑक्सीजन रिटेन्शन रहस्य: [http://www.npr.org/templates/story/story.php?storyId=17134270 मिस्ट्री फ़ैक्टर गिव्स गैन्जेस ए क्लीन रेप्युटेशन] जूलियन क्रैन्डा-2 हॉल्लिक. नेशनल पब्लिक रेडियो। &amp;lt;/ref&amp;gt; लेकिन गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य। गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अन्त।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.patrika.com/article.aspx?id=10912|title=खतरे में गंगा का अस्तित्व|accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=एएसपीएक्स| publisher=पत्रिका|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घड़ियालों की मदद ली जा रही है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4126070.cms|title=गंगा को प्रदूषण से बचाएंगे 71 घड़ियाल&lt;br /&gt;
|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=नवभारत टाइम्स|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; शहर की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए क़ानून बने हैं। इसी क्रम में गंगा को राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित कर दिया गया है और गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना लागू की गई हैं। हांलांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.lokmanch.com/cms/index.php/culture/4089-ganga-pollution-state-government-responsible|title=अब गंगा प्रदूषण मामला राज्य सरकार जिम्मेवार |accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=|publisher=लोकमंच|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://josh18.in.com/hindi/-moneylife/319321/0|title=अब मूर्ति विसर्जन से नहीं होगी गंगा मैली |accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=|publisher=जोश|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इतना सबकुछ होने के बावज़ूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। 2007 की एक [[संयुक्त राष्ट्र]] रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा। &amp;lt;ref&amp;gt; [http://www.boston.com/news/world/asia/articles/2007/06/24/global_warming_threatens_to_dry_up_ganges/ बोस्टन.कॉम पर] देखें- वैश्विक ऊष्मीकरण का [[उत्तर प्रदेश]] की गंगा पर प्रभाव।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक रूप से गंगा के मैदान से ही हिन्दुस्तान का हृदय स्थल निर्मित है और वही बाद में आने वाली विभिन्न सभ्यताओं का पालना बना। [[अशोक]] के ई. पू. के साम्राज्य का केन्द्र पाटलिपुत्र ([[पटना]]), बिहार में गंगा के तट पर बसा हुआ था। महान [[मुग़ल साम्राज्य]] के केन्द्र दिल्ली और [[आगरा]] भी गंगा के बेसिन की पश्चिमी सीमाओं पर स्थित थे। सातवीं सदी के मध्य में [[कानपुर]] के उत्तर में गंगा तट पर स्थित [[कन्नौज]], जिसमें अधिकांश उत्तरी भारत आता था, हर्ष के सामन्तकालीन साम्राज्य का केन्द्र था। मुस्लिम काल के दौरान, यानी 12वीं सदी से [[मुसलमान|मुसलमानों]] का शासन न केवल मैदान, बल्कि बंगाल तक फैला हुआ था। डेल्टा क्षेत्र के ढाका और [[मुर्शिदाबाद]] मुस्लिम सत्ता के केन्द्र थे। [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] ने 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुगली के तट पर कलकत्ता (वर्तमान [[कोलकाता]]) की स्थापना करने के बाद धीरे-धीरे अपने पैर गंगा की घाटी में फैलाए और 19वीं सदी के मध्य में दिल्ली तक जा पहुँचे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा की इस घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ जिसका प्राचीन इतिहास अत्यन्त गौरवमयी और वैभवशाली है। जहाँ ज्ञान, धर्म, अध्यात्म व सभ्यता-संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। पाषाण या प्रस्तर युग का जन्म और विकास यहाँ होने के अनेक साक्ष्य मिले हैं। इसी घाटी में [[रामायण]] और [[महाभारत]] कालीन युग का उद्भव और विलय हुआ। [[शतपथ ब्राह्मण]], [[पंचविंश ब्राह्मण]], [[गोपथ ब्राह्मण]], [[ऐतरेय आरण्यक]], कौशितकी आरण्यक, सांख्यायन आरण्यक, वाजसनेयी संहिता और [[महाभारत]] इत्यादि में वर्णित घटनाओं से उत्तर वैदिककालीन गंगा घाटी की जानकारी मिलती है। प्राचीन [[मगध महाजनपद ]] का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ जहाँ से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का वह स्वर्ण युग विकसित हुआ जब [[मौर्य वंश|मौर्य]] और [[गुप्त वंश|गुप्त]] वंशीय राजाओं ने यहाँ शासन किया।&lt;br /&gt;
==आर्थिक महत्त्व==	&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-Varanasi.jpg|thumb|250px|[[वाराणसी]] में गंगा नदी के घाट&amp;lt;br /&amp;gt; Ghats of Ganga River in Varanasi]]&lt;br /&gt;
गंगा अपनी उपत्यकाओं में [[भारत]] और [[बांग्लादेश]] के कृषि आधारित अर्थ में भारी सहयोग तो करती ही है, यह अपनी सहायक नदियों सहित बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई के बारहमासी स्रोत भी हैं। इन क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रधान उपज में मुख्यतः [[धान]], [[गन्ना]], [[दाल]], [[तिलहन]], [[आलू]] एवं [[गेहूँ]] हैं। जो भारत की कृषि आज का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा के तटीय क्षेत्रों में दलदल एवं झीलों के कारण यहाँ लेग्यूम, मिर्च, सरसों, तिल, गन्ना और जूट की अच्छी फ़सल होती है। नदी में मत्स्य उद्योग भी बहुत ज़ोरों पर चलता है। गंगा नदी प्रणाली भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है। इसमें लगभग 375 मत्स्य प्रजातियाँ उपलब्ध हैं। वैज्ञानिकों द्वारा [[उत्तर प्रदेश]] व [[बिहार]] में 111 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता बतायी गयी है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://fisheries.up.nic.in/manual.htm|title= प्रशिक्षण एवं प्रसार संबंधी मैनुअल|accessmonthday= |accessyear= |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= 2007|month= |format= एचटीएम|work= |publisher= मत्स्य विभाग, उत्तर प्रदेश |pages= |language=|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt; फरक्का बांध बन जाने से गंगा नदी में हिल्सा मछली के बीजोत्पादन में सहायता मिली है। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.cifri.ernet.in/technology.html|title= हिल्सा ब्रीडिंग एण्ड हिल्साह हैचेरी|accessmonthday= |accessyear= |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= |month= |format= |work= |publisher= सी.आई.एफ.आर.आई.|pages= |language= अंग्रेज़ी|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा का महत्त्व पर्यटन पर आधारित आय के कारण भी है। इसके तट पर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कई पर्यटन स्थल है जो राष्ट्रीय आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा नदी पर रैफ्टिंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है। जो साहसिक खेलों और पर्यावरण द्वारा भारत के आर्थिक सहयोग में सहयोग करते हैं। गंगा तट के तीन बड़े शहर [[हरिद्वार]], [[इलाहाबाद]] एवं [[वाराणसी]] जो तीर्थ स्थलों में विशेष स्थान रखते हैं। इस कारण यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। गर्मी के मौसम में जब पहाड़ों से बर्फ़ पिघलती है, तब नदी में पानी की मात्रा व बहाव अच्छा होता है, इस समय उत्तराखंड में ऋषिकेश - बद्रीनाथ मार्ग पर कौडियाला से ऋषिकेश के मध्य रैफ्टिंग, क्याकिंग व कैनोइंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है, जो साहसिक खोलों के शौक़ीनों और पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित कर के भारत के आर्थिक सहयोग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.uttara.in/hindi/gmvn/tourist/adv_sports/rafting.html|title= राफ्टिंग |accessmonthday=22 जून |accessyear=2009 |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= 2007|month= |format= एचटीएमएल|work= |publisher=उत्तराखंड पोर्टल|pages= |language=|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====बाँध एवं नदी परियोजनाएँ====&lt;br /&gt;
गंगा नदी पर निर्मित अनेक बाँध भारतीय जन-जीवन तथा अर्थ व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनमें प्रमुख हैं फ़रक्का बाँध, टिहरी बाँध, तथा भीमगोडा बाँध। फ़रक्का बांध (बैराज) भारत के [[पश्चिम बंगाल]] प्रान्त में स्थित गंगा नदी पर बनाया गया है। इस बाँध का निर्माण [[कोलकाता]] बंदरगाह को गाद (सिल्ट) से मुक्त कराने के लिये किया गया था जो कि 1950 से 1960 तक इस बंदरगाह की प्रमुख समस्या थी। कोलकाता [[हुगली नदी]] पर स्थित एक प्रमुख बंदरगाह है। ग्रीष्म ऋतु में हुगली नदी के बहाव को निरंतर बनाये रखने के लिये गंगा नदी के जल के एक बड़े हिस्से को फ़रक्का बाँध के द्वारा हुगली नदी में मोड़ दिया जाता है। गंगा पर निर्मित दूसरा प्रमुख बाँध टिहरी बाँध टिहरी विकास परियोजना का एक प्राथमिक बाँध है जो [[उत्तराखंड]] प्रान्त के टिहरी ज़िले में स्थित है। यह बाँध गंगा नदी की प्रमुख सहयोगी नदी [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] पर बनाया गया है। टिहरी बाँध की ऊँचाई 261 मीटर है जो इसे विश्व का पाँचवाँ सबसे ऊँचा बाँध बनाती है। इस बाँध से 2400 मेगावाट विद्युत उत्पादन, 270,000 हेक्टर क्षेत्र की सिंचाई और प्रतिदिन 102.20 करोड़ लीटर पेयजल दिल्ली, उत्तर-प्रदेश एवं उत्तरांचल को उपलब्ध कराना प्रस्तावित है। तीसरा प्रमुख बाँध भीमगोडा बाँध [[हरिद्वार]] में स्थित है जिसको सन 1840 में अंग्रेजो ने गंगा नदी के पानी को विभाजित कर ऊपरी गंगा नहर में मोड़ने के लिये बनवाया था। यह नहर हरिद्वार के भीमगोडा नामक स्‍थान से गंगा नदी के दाहिने तट से निकलती है। प्रारम्‍भ में इस नहर में जलापूर्ति गंगा नदी में एक अस्‍थायी बॉंध बनाकर की जाती थी। वर्षाकाल प्रारम्‍भ होते ही अस्‍थायी बॉंध टूट जाया करता था तथा मानसून अवधि में नहर में पानी चलाया जाता था। इस प्रकार इस नहर से केवल रबी की फ़सलों की ही सिंचाई हो पाती थी। अस्‍थायी बॉंध निर्माण स्‍थल के डाउनस्‍ट्रीम में वर्ष 1978-1984 की अवधि में भीमगोडा बैराज का निर्माण करवाया गया। इसके बन जाने के बाद ऊपरी गंगा नहर प्रणाली से खरीफ की फ़सल में भी पानी दिया जाने लगा।&lt;br /&gt;
====सिंचाई====&lt;br /&gt;
सिंचाई के लिए गंगा के पानी का उपयोग, चाहे बाढ़ का पानी हो या फिर नहरों का, पुरातन काल से ही प्रचलित है। इस तरह की सिंचाई का उल्लेख धर्मग्रन्थों तथा 2,000 से भी ज़्यादा वर्ष पहले लिखे [[पुराण|पुराणों]] में मिलता है। चौथी सदी में [[यूनान]] से भारत आए राजदूत [[मेगस्थनीज़]] ने यहाँ सिंचाई के उपयोग का उल्लेख किया है। 12वीं सदी से मुस्लिम काल में सिंचाई प्रणाली बहुत विकसित थी और [[मुग़ल]] बादशाहों ने बाद में बहुत सी नहरों का निर्माण किया। बाद में ब्रिटिश शासकों ने सिंचाई प्रणाली का और भी विस्तार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश और [[बिहार]] स्थित गंगा घाटी के [[कृषि]] क्षेत्रों को सिंचाई नहरों की प्रणाली से बहुत लाभ हुआ है। ख़ासतौर से इस विकसित सिंचाई प्रणाली के कारण [[गन्ना]], कपास और तिलहन जैसी नक़दी फ़सलों की पैदावार में वृद्धि सम्भव हुई। पुरानी नहरें मुख्यत: गंगा-यमुना के दौआब इलाक़े में हैं। ऊपरी गंगा नहर [[हरिद्वार]] से शुरू होती है और अपनी सहायक नहरों सहित 9,524 किलोमीटर लम्बी है। निचली गंगा नहर की लम्बाई अपनी सहायक नहरों सहित 8,238 किलोमीटर है और यह नरोरा से प्रारम्भ होती है। [[शारदा नहर]] से उत्तर प्रदेश में [[अयोध्या]] की भूमि सींची जाती है। गंगा के उत्तर में भूमि की ऊँचाई अधिक होने से नहरों के द्वारा सिंचाई करना कठिन होने के कारण भूमिगत जल पम्प द्वारा खींचकर सतह पर लाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के काफ़ी बड़े इलाक़े में हाथ से खोदे हुए [[कुआँ|कुओं]] से निकली नहरों के द्वारा सिंचाई की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बांग्लादेश]] में गंगा-कबाडाक योजना मुख्यत: सिंचाई के लिए ही है और उसमें खुलना, जेशोर और कुश्तिया ज़िलों के वे हिस्से आते हैं, जो डेल्टा के कमज़ोर हिस्से हैं, जहाँ नदियों का मार्ग गाद और घनी झाड़ियों के कारण अवरुद्ध हो चुका है। इस इलाक़े में कुल वार्षिक वर्षा सामान्यत: 1,524 मिलीमीटर से कम होती है तथा शीत ऋतु तुलनात्मक रूप से शुष्क रहती है। यहाँ की सिंचाई प्रणाली भी नहरों तथा भूमिगत जल खींचने वाले विद्युतचालित उपकरणों पर आधारित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नौकायन====&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में गंगा और इसकी कुछ सहायक नदियाँ, ख़ासतौर से पूरब में, नौकायन के उपयुक्त थीं। मेगस्थनीज़ के अनुसार, चौथी शताब्दी ई. पू. में गंगा और इसकी प्रमुख सहायक नदियों में नौकायन होता था। गंगा के बेसिन में अंतर्देशीय नदी नौकायन 14वीं शताब्दी तक भी फल-फूल रहा था। 19वीं सदी के आते-आते सिंचाई तथा नौकायन के लिए उपयुक्त नहरों की जल परिवहन प्रणाली के प्रमुख मार्ग बन चुके थे। पैंडल स्टीमरों के आगमन से अंतर्देशीय परिवहन में भी जो क्रान्ति आई, उससे बंगाल और बिहार के नील उद्योग को बहुत बढ़ावा मिला। गंगा में कलकत्ता से इलाहाबाद और उससे आगे यमुना में आगरा तक तथा उधर [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] तक नियमित स्टीमर सेवाएँ चलने लगीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं सदी के मध्य में रेलमार्गों के बनने से बड़े पैमाने पर जल परिवहन में गिरावट शुरू हो गई। सिंचाई हेतु पानी बहुत अधिक मात्रा में खींच लिए जाने से भी नौकायन विपरीत रूप से प्रभावित हुआ। अब तो नौकायन केवल इलाहाबाद के आसपास के मध्य गंगा बेसिन तक ही सीमित होकर रह गया है, जिसमें से अधिकांश देसी नौकाओं पर आधारित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्चिम बंगाल तथा बांग्लादेश अब भी [[जूट]], घास, [[चाय]], अनाज तथा अन्य कृषि और ग्रामीण उत्पादों के परिवहन के लिए जलमार्गों पर निर्भर हैं। बांग्लादेश में चालना, खुलना, बारीसाल, चाँदपुर, नारायणगंज, ग्वालंदो घाट, सिरसागंज, भैरव बाज़ार तथा फेंचूगंज और भारत में कोलकाता, गोलपाड़ा, [[धुबुरी]] और डिब्रूगढ़ प्रमुख नदी बंदरगाह हैं। [[1947]] में भारत के विभाजन से बड़े दूरगामी परिवर्तन हुए। कलकत्ता से [[असम]] तक अंतर्देशीय जलमार्गों के द्वारा पहले बड़े पैमाने पर होने वाला व्यापार लगभग बन्द ही हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बांग्लादेश में अंतर्देशीय जल परिवहन की ज़िम्मेदारी अंतर्देशीय जल परिवहन प्राधिकरण की है। भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों का नीति निर्धारण केन्द्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन मण्डल (सेंट्रल वॉटर ट्रांसपोर्ट बोर्ड) करता है। लेकिन राष्ट्रीय जलमार्गों की व्यापक प्रणाली का विकास एवं रख-रखाव अंतर्देशीय जलमार्ग (इनलैंड वॉटरवेज़ अथॉरिटी) प्राधिकरण करता है। गंगा के बेसिन में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया तक लगभग 1,607 किलोमीटर लम्बा जलमार्ग इस प्रणाली में शामिल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डेल्टा के मुख पर भारत की सीमा के ठीक भीतर फ़रक्का बाँध का निर्माण बांग्लादेश और भारत के बीच विवाद का कारण बन गया है। भारत का कहना है कि गाद के जमने तथा खारा पानी घुस आने की वजह से कोलकाता बंदरगाह का पतन हो गया है। कोलकाता की स्थिति में सुधार के लिए खारे पानी को निकालकर और जलस्तर को बढ़ाकर भारत ने फ़रक्का बैराज से गंगा को मोड़कर ताज़ा पानी हासिल करने की कोशिश की है। अब एक बड़ी नहर द्वारा पानी [[भागीरथी नदी]] में लाया जाता है, जो कोलकाता से परे [[हुगली नदी]] में समाहित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बांग्लादेश का कहना है कि नदियों के तटवर्ती देशों की परस्पर समृद्धि के लिए यह ज़रूरी है कि अंतर्देशीय नदियों के पानी पर उनका संयुक्त नियंत्रण होना चाहिए। सिंचाई, नौकायन तथा खारे पानी की रोकथाम के लिए गंगा का पानी बांग्लादेश में भी उतना ही आवश्यक है, जितना भारत के लिए। बांग्लादेश के अनुसार, फ़रक्का बाँध ने उसे पानी के एक ऐसे बहुमूल्य स्रोत से वंचित कर दिया है, जो कि उसकी समृद्धि के लिए आवश्यक है। दूसरी तरफ़ [[भारत]] गंगाजल की समस्या के बारे में द्विपक्षीय रवैया अपनाये जाने के पक्ष में है। दोनों देशों के बीच कई अंतरिम समझौते हुए हैं, लेकिन अभी तक इस विवाद का कोई स्थायी हल नहीं निकल पाया है। भारत के असम में ब्रह्मपुत्र के पानी को बांग्लादेश से होकर एक नहर द्वारा गंगा में मोड़ने के प्रस्ताव के जवाब में बांग्लादेश ने सुझाया है कि पूर्वी [[नेपाल]], पश्चिम बंगाल होते हुए एक नहर बांग्लादेश तक बनाई जाए। किसी भी प्रस्ताव को सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। [[1987]] तथा [[1988]] में बांग्लादेश में आई प्रलयंकारी बाढ़ों, जिसमें 1988 की बाढ़ उस देश के इतिहास की सर्वाधिक विनाशकारी बाढ़ थी, इसको देखते हुए विश्व बैंक ने इस क्षेत्र के लिए अब बाढ़ नियंत्रण की एक दूरगामी योजना बनाई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पनबिजली योजना====&lt;br /&gt;
गंगा की लगभग 130 लाख किलोवाट की अनुमानित जलविद्युत क्षमता का 2/5 हिस्सा भारत में तथा शेष नेपाल में है। इस क्षमता में से कुछ का दोहन भारत ने [[चंबल नदी|चंबल]] और रिहंद नदियों द्वारा किया है।&lt;br /&gt;
गंगा का मैदान दुनिया की सबसे घनी आबादी वाला तथा उपजाऊ इलाक़ों में से एक है। चूँकि इस मैदानी क्षेत्र में अवरोध न के बराबर है, इसीलिए गंगा की धारा अधिकांश इलाक़े में चौड़ी व धीमी गति से प्रवाहित है। उसके कुल अपवाह बेसिन का 9,75,900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल, यानी भारत के कुल क्षेत्र का लगभग चौथाई हिस्सा है और उस पर लगभग 50 करोड़ की आबादी निर्भर करती है। इस बेसिन की भूमि पर गहन खेती होती है। गंगा प्रणाली की जलापूर्ति आंशिक रूप से जुलाई से अक्टूबर के बीच होने वाली मानसून की वर्षा और अप्रॅल से जून के बीच [[हिमालय]] पर गर्मी से पिघलने वाली बर्फ़ पर निर्भर करती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय उपमहाद्वीप का यह विस्तृत उत्तर-मध्य खण्ड, जिसे उत्तर भारतीय मैदान भी कहा जाता है, पश्चिम में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी और गंगा के डेल्टा से लेकर [[सिंधु नदी|सिंधु नदी घाटी]] तक फैला हुआ है। इस इलाक़े में इस उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध और सघन जनसंख्या वाले क्षेत्र हैं। इस मैदान का अधिकांश हिस्सा गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के द्वारा पूर्व में सिंध नदी द्वारा पश्चिम में बहकर लाई गई कछारी मिट्टी से बना हुआ है। मैदान के पूर्वी हिस्सों में कम बारिश या सर्दियाँ शुष्क होती हैं। किन्तु मानसून की वर्षा इतनी अधिक होती है कि बड़े-बड़े इलाक़ों में दलदल या उथली झीलें बन जाती हैं। ज्यों-ज्यों पश्चिम की ओर बढ़ते हैं, यह मैदान शुष्क होता चला जाता है और अन्त में थार के रेगिस्तान में बदल जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धार्मिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
[[भारत]] की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को [[देवी]] के रूप में निरुपित किया गया है। बहुत से पवित्र [[तीर्थस्थल]] गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं जिनमें [[वाराणसी]] और [[हरिद्वार]] सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं यह मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://hbash.blogspot.com/2008/11/blog-post.html |title=भारत की मुख्य नदियाँ|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=हिन्दी ब्लाग|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; मरने के बाद लोग गंगा में अपनी राख विसर्जित करना [[मोक्ष]] प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या [[अंतिम संस्कार]] की इच्छा भी रखते हैं। [[चित्र:Kumbh mela.jpg|thumb|280px|[[कुम्भ मेला]], [[इलाहाबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kumb Fair, Allahabad]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके घाटों पर लोग [[पूजा]] अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए [[मकर संक्राति]], [[कुम्भ मेला|कुंभ]] और [[गंगा दशहरा]] के समय गंगा में नहाना या केवल दर्शन ही कर लेना बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर गंगा के तट पर ही बने हुए हैं। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हज़ार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिंह|first=डॉ. राजकुमार  |title=विचार विमर्श|year=जुलाई   |publisher=सागर प्रकाशन|location=मथुरा |id= |page=13-23  |accessday=22 |accessmonth=जून|accessyear=2009 }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  गंगा को लक्ष्य करके अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं। जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्रम्&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=6127|title= श्रीगंगासहस्त्रनामस्तोत्रम|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;  और आरती&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://bhavishyawani.mywebdunia.com/2009/02/25/gangaji_ki_aarti.html|title= श्रीगंगाजी की आरती|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=वेबदुनया|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; सबसे लोकप्रिय हैं। अनेक लोग अपने दैनिक जीवन में श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग करते हैं। गंगोत्री तथा अन्य स्थानों पर गंगा के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जिनके दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। [[उत्तराखंड]] के [[पंच प्रयाग]] तथा [[प्रयाग]]राज जो इलाहाबाद में स्थित है गंगा के वे प्रसिद्ध संगम स्थल हैं जहाँ वह अन्य नदियों से मिलती हैं। ये सभी संगम धार्मिक दृष्टि से पूज्य माने गए हैं। गंगा नदी का धार्मिक महत्व सम्भवत: विश्व की किसी भी अन्य नदी से ज़्यादा है। आदिकाल से ही यह पूजी जाती रही है और आज भी [[हिंदू|हिन्दुओं]] के लिए यह सबसे पवित्र नदी है। इसे देवी स्वरूप माना जाता है। एक किंवदन्ती के अनुसार, महान तपस्वी [[भगीरथ]] की प्रार्थना पर देवी गंगा को स्वयं भगवान [[विष्णु]] ने इस धरती पर भेजा। लेकिन गंगा जिस [[वेग]] से धरती पर अवतरित हुईं, उससे उनके मार्ग में आने वाली हर वस्तु के जलप्लावित होने का ख़तरा था। इसीलिए भगवान [[शिव]] ने पहले ही उन्हें अपनी जटाओं में लपेटकर उनके वेग को नियंत्रित और शान्त किया। मुक्ति चाहने वाले उसके बाद ही उसमें स्नान कर पाए। हिन्दुओं के तीर्थस्थल वैसे तो समूचे उपमहाद्वीप में फैल हुए हैं, तथापि गंगा तट पर बसे तीर्थ हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इनमें प्रमुख हैं, इलाहाबाद में गंगा और यमुना का संगम, जहाँ एक निश्चित अन्तराल पर जनवरी-फ़रवरी में [[कुम्भ मेला]] आयोजित होता है। इस अनुष्ठान के समय लाखों तीर्थयात्री गंगा में स्नान करते हैं। पवित्र स्नान की दृष्टि से अन्य तीर्थ हैं, [[वाराणसी]], [[काशी]] और [[हरिद्वार]]। कलकत्ता में [[हुगली नदी]] भी पवित्र मानी जाती है। तीर्थयात्रा की दृष्टि से गंगा तट पर [[गंगोत्री]] और [[अलकनन्दा नदी|अलकनन्दा]] और [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] का संगम भी महत्त्वपूर्ण है। हिन्दू अपने मृतकों की भस्म एवं अस्थियाँ यह मानते हुए यहाँ विसर्जित करते हैं कि ऐसा करने से मृतक सीधे स्वर्ग में जाता है। इसीलिए गंगा के तट पर कई स्थानों पर शवदाह हेतु विशेष घाट बने हुए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा पुनीततम नदी है और इसके तटों पर हरिद्वार, कनखल, [[प्रयाग]] एवं काशी जैसे परम प्रसिद्ध तीर्थ अवस्थित हैं। प्रसिद्ध नदीसूक्त&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]] 10, 75, 5-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में सर्वप्रथम गंगा का ही आह्वान किया गया है। [[ऋग्वेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]] (6|45|31&amp;lt;/ref&amp;gt; में ‘गंगय’ शब्द आया है जिसका सम्भवत: अर्थ है ‘गंगा पर वृद्धि करता हुआ।’&amp;lt;ref&amp;gt;अधि बृबु: पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्। उरु:कक्षो न गाङग्य:।। [[ऋग्वेद]] (6|45|31)। अन्तिम पद का अर्थ है ‘गंगा के तटों पर उगी हुई घास या झाड़ी के समान।’&amp;lt;/ref&amp;gt; [[शतपथ ब्राह्मण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शतपथ ब्राह्मण]] (13|5|4|11 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[ऐतरेय ब्राह्मण]] &amp;lt;ref&amp;gt;[[ऐतरेय ब्राह्मण]] (39, 9&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा एवं यमुना के किनारे पर भरत दौष्यंति की विजयों एवं यज्ञों का उल्लेख हुआ है। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;[[शतपथ ब्राह्मण]] (13, 5, 4,11 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt; में एक प्राचीन गाथा का उल्लेख है- ‘नाडपित् पर अप्सरा शकुन्तला ने भरत को गर्भ में धारण किया, जिसने सम्पूर्ण [[पृथ्वी]] को जीतने के उपरान्त [[इन्द्र]] के पास [[यज्ञ]] के लिए एक सहस्र से अधिक अश्व भेजे।’ [[महाभारत]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]] (अनुशासन. 26|26-103&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[पुराण|पुराणों]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[पुराण]]  ([[नारद पुराण|नारदीय]], उत्तरार्ध, अध्याय 38-45 एवं 51|1-48; [[पद्म पुराण]]  5|60|1-127; अग्नित्र अध्याय 110; [[मत्स्य पुराण]], अध्याय 180-185; पद्म पुराण, आदिखण्ड, अध्याय 33-37&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा की महत्ता एवं पवित्रीकरण के विषय में सैकड़ों प्रशस्तिजनक श्लोक हैं। [[स्कन्द पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[स्कन्द पुराण]] (काशीखण्ड, अध्याय 33-37&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा के एक सहस्र नामों का उल्लेख है। यहाँ पर उपर्युक्त ग्रन्थों में दिये गये वर्णनों का थोड़ा अंश भी देना सम्भव नहीं है। अधिकांश भारतीयों के मन में गंगा जैसी नदियों एवं हिमालय जैसे पर्वतों के दो स्वरूप घर कर बैठे हैं-&lt;br /&gt;
#भौतिक &lt;br /&gt;
#आध्यात्मिक&lt;br /&gt;
विशाल नदियों के साथ दैवी जीवन की प्रगाढ़ता संलग्न हो ही जाती है। टायलर ने अपने ग्रन्थ ‘प्रिमिटिव कल्चर’&amp;lt;ref&amp;gt;प्रिमिटिव कल्चर (द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 477&amp;lt;/ref&amp;gt; में लिखा है- &amp;lt;blockquote&amp;gt;‘जिन्हें हम निर्जीव पदार्थ कहते हैं, यथा नदियाँ, पत्थर, वृक्ष, अस्त्र-शस्त्र आदि। वे जीवित, बुद्धिशाली हो उठते हैं, उनसे बातें की जाती हैं, उन्हें प्रसन्न किया जाता है और यदि वे हानि पहुँचाते हैं तो उन्हें दण्डित भी किया जाता है।’&amp;lt;/blockquote&amp;gt; गंगा के महात्म्य एवं उसकी तीर्थयात्रा के विषय में पृथक-पृथक ग्रन्थ प्रणीत हुए हैं। यथा- गणेश्वर (1350 ई.) का गंगापत्तलक, मिथिला के राजा पद्मसिंह की रानी विश्वासदेवी की [[गंगावाक्यावली]], गणपति की [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] एवं वर्धमान की [[गंगाकृत्यविवेक]]। इन ग्रन्थों की तिथियाँ इस महाग्रन्थ के अन्त में दी हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गंगा स्नान विधि====&lt;br /&gt;
गंगा स्नान के लिए संकल्प करने के विषय में निबन्धों ने कई विकल्प दिये हैं। [[प्रायश्चित्ततत्त्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (पृष्ठ 497-498&amp;lt;/ref&amp;gt; में विस्तृत संकल्प दिया हुआ है। [[गंगावाक्यावली]]&amp;lt;ref&amp;gt;अद्यामुके मासि अमुकपक्षे अमुकतिथौ सद्य:पापप्रणाशपूर्वकं सर्वपुण्यप्राप्तिकामोगंगाया स्नानमहं करिष्ये। [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 141)। और देखिए तीर्थचि. (पृष्ठ 206-207), जहाँ गंगास्नान के पूर्वक लिंक संकल्पों के कई विकल्प दिये हुए हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] (102&amp;lt;/ref&amp;gt; में जो स्नान विधि दी हुई है वह सभी वर्णों एवं [[वेद]] के विभिन्न शाखानुयायियों के लिए समान है। मत्स्यपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्यपुराण]] (अध्याय 102&amp;lt;/ref&amp;gt; के वर्णन का निष्कर्ष यों है- बिना स्नान और शरीर की शुद्धि एवं शुद्ध विचारों का अस्तित्व नहीं होता। इसी से मन को शुद्ध करने के लिए सर्वप्रथम स्नान की व्याख्या होती है। कोई किसी कूप या धारा से पात्र में जल लेकर स्नान कर सकता है या बिना इस विधि से भी स्नान कर सकता है। ‘नमो नारायणाय’ मंत्र के साथ बुद्धिमान लोगों को तीर्थस्थल का ध्यान करना चाहिए। हाथ में दर्भ (कुश) लेकर, पवित्र एवं शुद्ध होकर आचमन करना चाहिए। चार वर्गहस्त स्थल को चुनना चाहिए और निम्न मंत्र के साथ गंगा का आवाहन करना चाहिए।&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;तुम विष्णु के चरण से उत्पन्न हुई हो, तुम विष्णु से भक्ति रखती हो, तुम विष्णु की पूजा करती हो, अत: जन्म से मरण तक किये गए पापों से मेरी रक्षा करो। स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी में 35 करोड़ तीर्थ हैं; हे जाह्नवी गंगा, ये सभी देव तुम्हारे हैं। देवों में तुम्हारा नाम नन्दिनी (आनन्द देने वाली) और नलिनी भी है तथा तुम्हारे अन्य नाम भी हैं, यथा- दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, शान्तिप्रदायिनी।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृतिचन्द्रिका (1, पृष्ठ 182) ने [[मत्स्य पुराण]] (102) के श्लोक (1-8) उद्धृत किये हैं। स्मृतिचन्द्रिका ने वहीं गंगा के 12 विभिन्न नाम दिए हैं। [[पद्म पुराण]] (4|81|17-19) में [[मत्स्य पुराण]] के नाम पाये जाते हैं। इस अध्याय के आरम्भ में गंगा के सहस्र नामों की ओर संकेत किया जा चुका है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; स्नान करते समय इन नामों का उच्चारण करना चाहिए। तब तीन लोकों में बहने वाली गंगा पास में चली आयेगी (भले ही व्यक्ति घर पर ही स्नान कर रहा हो)। व्यक्ति को उस जल को, जिस पर सात बार मंत्र पढ़ा गया हो, तीन या चार या पाँच या सात बार सिर पर छिड़कना चाहिए। नदी के नीचे की मिट्टी का मंत्र पाठ के साथ लेप करना चाहिए। इस प्रकार स्नान एवं आचमन करके व्यक्ति को बाहर आना चाहिए और दो श्वेत एवं पवित्र वस्त्र धारण करने चाहिए। &lt;br /&gt;
====तर्पण====&lt;br /&gt;
इसके उपरान्त उसे तीन लोकों के सन्तोष के लिए [[देवता|देवों]], [[ऋषि|ऋषियों]] एवं पितरों का यथाविधि तर्पण करना चाहिए। तर्पण के दो प्रकार हैं- &lt;br /&gt;
#प्रधान&lt;br /&gt;
#गौण &lt;br /&gt;
प्रधान विद्याध्ययन समाप्त किये हुए द्विजों द्वारा देवों, ऋषियों एवं पितरों के लिए प्रतिदिन किया जाता है। गौण स्नान के अंग के रूप में किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं स्नानमुच्यते। तर्पणं तु भवेत्तस्य अंगत्त्वेन प्रकीर्तितम्।। [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (गंगाभक्ति., 162&amp;lt;/ref&amp;gt; तर्पण स्नान एवं ब्रह्मयज्ञ दोनों का अंग है।  तर्पण अपनी वेद शाखा के अनुसार होता है। दूसरा नियम यह है कि तर्पण तिलयुक्त जल से किसी तीर्थस्थल, [[गया]] में, पितृपक्ष (आश्विन के कृष्णपक्ष) में किया जाता है। विधवा भी किसी तीर्थ में अपने पति या सम्बन्धी के लिए तर्पण कर सकती है। संन्यासी ऐसा नहीं करता। पिता वाला व्यक्ति भी तर्पण नहीं करता। किन्तु विष्णुपुराण के मत से वह तीन अंजिली देवों, तीन ऋषियों को एवं एक प्रजापति (‘देवास्तुप्यन्ताम्’ के रूप में) को देता है। एक अन्य नियम यह है कि-&amp;lt;blockquote&amp;gt;‘श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन दीयते। तर्पणे तूभयं कुर्यादिष एव विधि:स्मृत।।&amp;lt;ref&amp;gt;अर्थात एक हाथ (दाहिने) से [[श्राद्ध]] में या [[अग्नि]] में आहुति दी जाती है, किन्तु तर्पण में दोनों हाथों से जल स्नान करने वाली नदी में डाला जाता है या फिर भूमि पर छोड़ा जाता है। [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 57|62-63)’&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &amp;lt;blockquote&amp;gt;आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त देवर्षिपितृमानवा:। तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:।। अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मयुभ-नाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्।। &amp;lt;ref&amp;gt;अर्थात यदि कोई विस्तृत विधि से तर्पण न कर सके तो वह निम्न मंत्रों के साथ (जो [[वायु पुराण]], 110|21-22 में दिये हुए हैं) तिल एवं कुश से मिश्रित जल की तीन अंजलियाँ दे सकता है&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; इसके पश्चात [[सूर्य देवता|सूर्य]] को नमस्कार एवं तीन बार प्रदक्षिणा कर तथा किसी [[ब्राह्मण]], [[सोना]] एवं [[गाय]] का स्पर्श कर स्नानकर्ता को विष्णु मंदिर (या अपने घर, पाठांतर के अनुसार) में जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ यह ज्ञातव्य है कि मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण]] (102|2-31&amp;lt;/ref&amp;gt; के श्लोक, जिनका निष्कर्ष ऊपर दिया गया है, कुछ अन्तरों के साथ पद्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] (पातालखण्ड 81|12-42 एवं सृष्टिखण्ड 20|145-176&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पाये जाते हैं। प्रायश्चित्ततत्त्व&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रायश्चित्ततत्त्व]] पृष्ठ 502&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा स्नान के समय के मंत्र दिये हुए हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुपादाब्जसम्भूते गंगे त्रिपथगामिनि। धर्मव्रतेति विख्याते पापं में हर जाह्नवी।। श्रद्धया भक्तिसम्पन्ने श्रीमातर्देवि जाह्नवि। अमृतेनाम्बुना देवि भागीरथी पुनीह माम्।। स्मृतिचंद्रिका (1|131); [[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (502); त्वं देव सरितां नाथ त्वं देवि सरितां वरे। उभयो: संगमे स्नात्वा मुञ्चामि दुरितानि वै।। वही। और देखिए [[पद्म पुराण]] (सृष्टिखण्ड, 60|60&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पौराणिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। कुछ पुराणों ने गंगा को मन्दाकिनी के रूप में स्वर्ग में, गंगा के रूप में पृथ्वी पर और भोगवती के रूप में पाताल में प्रवाहित होते हुए वर्णित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] 6|267|47&amp;lt;/ref&amp;gt; [[विष्णु पुराण|विष्णु]] आदि पुराणों ने गंगा को [[विष्णु]] के बायें पैर के अँगूठे के नख से प्रवाहित माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;वामपादाम्बुजांगुष्ठनखस्रोतोविनिर्गताम्। विष्णोर्बभर्ति यां भक्त्या शिरसाहनिंशं ध्रुव:।। [[विष्णु पुराण]] (2|8|109); कल्पतरु (तीर्थ, पृष्ठ 161) ने ‘शिव:’ पाठान्तर दिया है। ‘नदी सा वैष्णवी प्रोक्ता विष्णुपादसमुदभवा।’ [[पद्म पुराण]]  (5|25|188)।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ पुराणों में ऐसा आया है कि [[शिव]] ने अपनी जटा से गंगा को सात धाराओं में परिवर्तित कर दिया, जिनमें तीन (नलिनी, ह्लदिनी एवं पावनी) पूर्व की ओर, तीन (सीता, चक्षुस एवं [[सिन्धु नदी|सिन्धु]]) पश्चिम की ओर प्रवाहित हुई और सातवीं धारा [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] हुई ([[मत्स्य पुराण]] 121|38-41; [[ब्रह्माण्ड पुराण]] 2|18|39-41 एवं 1|3|65-66)। [[कूर्म पुराण]] (1|46|30-31) एवं [[वराह पुराण]] (अध्याय 82, गद्य में) का कथन है कि गंगा सर्वप्रथम सीता, [[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]], सुचक्ष एवं भद्रा नामक चार विभिन्न धाराओं में बहती है। अलकनंदा दक्षिण की ओर बहती है, भारतवर्ष की ओर आती है और सप्तमुखों में होकर समुद्र में गिरती है।&amp;lt;ref&amp;gt;तथैवालकनंदा च दक्षिणादेत्य भारतम्। प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्तभेदा द्विजोत्तम:।। [[कूर्म पुराण]] (1|46|31)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (73|68-69) में गंगा को विष्णु के पाँव से एवं शिव के जटाजूट में अवस्थित माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दूसरे पौराणिक आख्यान के अनुसार गंगा [[हिमालय]] और मैना की पुत्री तथा उमा की भगिनी थीं। महाभारत की एक कथा उसे कुरुराज [[शान्तनु]] की पत्नी और [[भीष्म]] की माता बताती है। जिसमें भीष्म का दूसरा नाम गांगेय भी है। गंगा का सम्बन्ध [[कार्तिकेय]] के मातृत्व से भी है। [[हिंदू|हिन्दुओं]] के जितने तीर्थ इस नदी के तीर पर हैं, उतने कहीं पर नहीं और उसकी पवित्रता का प्रभाव तो भारतीयों पर इतना गहरा पड़ा कि उन्होंने अनेक दूसरी नदियों के नाम भी गंगा रख दिये। जहाँ-जहाँ भारतीय संस्कृति का विस्तार हुआ, वहाँ-वहाँ गंगा की पवित्रता का विविध रूप से उल्लेख हुआ। गंगा की मकर पर आरूढ़ चँवर अथवा कलश धारिणी मूर्तियाँ भी गुप्तकाल में बनने लगी थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]], अध्याय 12, 42, 47, 83-88, 90, 93, 95, 99, 107-109 आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[ऋग्वेद]] के नदीसूक्त में गंगा की स्तुति हुई है और [[पुराण|पुराणों]] ने उसकी महिमा का अनन्त बखान किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार विवद्गंगा, [[आकाशगंगा नदी|आकाशगंगा]] अथवा स्वर्गगंगा विष्णु के अँगूठे से निकली हैं, जिसका पृथ्वी पर अवतरण [[भगीरथ]] के स्तवन से [[कपिल मुनि]] द्वारा भस्मीकृत [[राजा सगर]] के 60,000 [[पुत्र|पुत्रों]] की अस्थियों को पवित्र करने के लिए हुआ। भगीरथ के साथ इसी संयोग के कारण गंगा का दूसरा नाम भागीरथी पड़ा। पौराणिक परम्परा है कि स्वर्ग से उतरने के कारण गंगा अत्यन्त कुपित हो उठी थीं और उसके कोप के कारण [[पृथ्वी]] पर उसकी धारा पड़ते ही उनके बहकर नष्ट हो जाने के भय से [[शिव]] ने अपनी जटा में उसे समेट लिया, जिससे उनकी जटाओं में उलझ जाने के कारण धारा पृथ्वी पर सीधी नहीं पड़ी और गंगा की गति मन्द हो गई। इसी सम्बन्ध में शिव का एक नाम गंगाधर भी पड़ा। गंगा का अवतरण तपस्वी जह्नु के यज्ञ के लिए घातक हुआ, जिससे क्रुद्ध होकर उस तापस ने गंगा को पी डाला और प्रार्थना के बाद उसने [[कान]] से गंगा की धारा निकाल दी, जिससे वह जाह्नवी कहलाई हैं। &lt;br /&gt;
====वन पर्व====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वन पर्व महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]] (अध्याय 85&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा की प्रशस्ति में कई श्लोक&amp;lt;ref&amp;gt;[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]] (श्लोक 88-97&amp;lt;/ref&amp;gt; दिये हैं, जिनमें से कुछ का अनुवाद इस प्रकार है- &amp;quot;जहाँ भी कहीं स्नान किया जाए, गंगा [[कुरुक्षेत्र]] के बराबर है। किन्तु कनखल की अपनी विशेषता है और प्रयाग में इसकी परम महत्ता है। यदि कोई सैकड़ों पापकर्म करके [[गंगाजल]] का अवसिंचन करता है तो गंगाजल उन दुष्कृत्यों को उसी प्रकार जला देता है, जिस प्रकार से [[अग्नि]] ईधन को जला देती है। [[सत युग]] में सभी स्थल पवित्र थे, [[त्रेता युग]] में [[पुष्कर]] सबसे अधिक पवित्र था, [[द्वापर युग]] में कुरुक्षेत्र एवं [[कलियुग]] में गंगा। नाम लेने पर गंगा पापी को पवित्र कर देती है। इसे देखने से सौभाग्य प्राप्त होता है। जब इसमें स्नान किया जाता है या इसका [[जल]] ग्रहण किया जाता है तो सात पीढ़ियों तक कुल पवित्र हो जाता है। जब तक किसी मनुष्य की अस्थि गंगा जल को स्पर्श करती रहती है, तब तक वह स्वर्गलोक में प्रसन्न रहता है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है और केशन के समान कोई देव। वह देश जहाँ गंगा बहती है और वह तपोवन जहाँ पर गंगा पाई जाती है, उसे सिद्धिक्षेत्र कहना चाहिए, क्योंकि वह गंगातीर को छूता रहता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====अनुशासन पर्व====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|अनुशासन पर्व महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt; [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]] (36|26, 30-31&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि वे [[महाजनपद|जनपद]] एवं देश, वे [[पर्वत]] एवं [[आश्रम]], जिनसे होकर गंगा बहती है, पुण्य का फल देने में महान हैं। वे लोग, जो जीवन के प्रथम भाग में पापकर्म करते हैं, यदि गंगा की ओर जाते हैं तो परम पद प्राप्त करते हैं। जो लोग गंगा में स्नान करते हैं उनका फल बढ़ता जाता है। वे पवित्रात्मा हो जाते हैं और ऐसा पुण्यफल पाते हैं जो सैकड़ों वैदिक यज्ञों के सम्पादन से भी नहीं प्राप्त होता। [[श्रीमद्भागवदगीता|भगवदगीता]] में भगवान [[श्रीकृष्ण]] ने कहा है कि धाराओं में मैं गंगा हूँ।&amp;lt;ref&amp;gt;स्रोतसामस्मि जाह्नवी, 10|31&amp;lt;/ref&amp;gt; मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु (8|92&amp;lt;/ref&amp;gt; ने साक्षी को सत्योच्चारण के लिए जो कहा है उससे प्रकट होता है कि [[मनुस्मृति]] के काल में गंगा एवं [[कुरुक्षेत्र]] सर्वोच्च पुनीत स्थल थे।&amp;lt;ref&amp;gt;यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदि स्थित:। तेन चेदविवादस्ते मा गंगा मा कुरून्गम:।। मनु (8|92)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Varanasi-2.jpg|thumb|250px|left|गंगा नदी, [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Varanasi]] &lt;br /&gt;
====विष्णु पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|विष्णु पुराण}}&lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु पुराण]] (2|8|120-121&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा की प्रशस्ति इस प्रकार की है- जब इसका नाम श्रवण किया जाता है, जब कोई इसके दर्शन की अभिलाषा करता है, जब यह देखी जाती है या स्पर्श की जाती है या जब इसका जल ग्रहण किया जाता है या जब कोई उसमें डुबकी लगाता है या जब इसका नाम लिया जाता है (या इसकी स्तुति की जाती है) तो गंगा दिन-प्रतिदिन प्राणियों को पवित्र करती है। जब सहस्रों योजन दूर रहने वाले लोग गंगा नाम का उच्चारण करते हैं, तो तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रुताभिलषिता दृष्टा स्पृष्टा पीतावगाहिता। या पावयति भूतानि कीर्तिता च दिने दिने।। गंगा गंगेति यैनमि योजनानां शतेष्वपि। स्थितैरुच्चारितं हन्ति पापं जन्मत्रयार्जितम्।। [[विष्णु पुराण]] (2|8|120-121); [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 110), तीर्थचि. (पृष्ठ 202), [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] (पृष्ठ 9)। दूसरा श्लोक [[पद्म पुराण]] (6|21|8 एवं 23|12) एवं [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (175|82) में कई प्रकार से पढ़ा गया है, यथा- गंगा........यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।। पद्य पुराण (1|31|77) में आया है......शतैरपि। नरो न नरकं याति किं तया सदृशं भवेत्।।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====भविष्य पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|भविष्य पुराण}}&lt;br /&gt;
भविष्य पुराण में भी ऐसा ही आया है।&amp;lt;ref&amp;gt;दर्शनार्त्स्शनात्पानात् तथा गंगेति कीर्तनात्। स्मरणदेव गंगाया: सद्य: पापै: प्रमुच्यते।। [[भविष्य पुराण]] (तीर्थचि. पृष्ठ 198; [[गंगावाक्यावली]] पृष्ठ 12 एवं [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] पृष्ठ 9)। प्रथम पाद [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]] (26|64) एवं [[अग्नि पुराण]] (110|6) में आया है। गच्छंस्तिष्ठञ् जपन्ध्यायन् भुञ्जञ् जाग्रत स्वपन् वदन्। य: स्मरेत् सततं गंगां सोऽपि मुच्येत बन्धनात्।। [[स्कन्द पुराण]] (काशीखण्ड, पूर्वार्ध 27|37) एवं [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 39|16-17)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण|मत्स्य]], [[कूर्म पुराण|कूर्म]], [[गरुड़ पुराण|गरुड़]] एवं [[पद्म  पुराण|पद्म]] पुराणों का कहना है कि गंगा में पहुँचना सब स्थानों में सरल है, केवल गंगाद्वार ([[हरिद्वार]]), [[प्रयाग]] एवं वहाँ जहाँ यह समुद्र में मिलती है, पहुँचना कठिन है। जो लोग यहाँ पर स्नान करते हैं, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है और जो लोग यहाँ पर मर जाते हैं, वे पुन: जन्म नहीं पाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वत्र सुलभा गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा। गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे।। तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवा:।। [[मत्स्य पुराण]] (106|54);[[कूर्म पुराण]] (1|37|34); [[गरुड़ पुराण]] (पूर्वार्ध, 81|1-2); [[पद्म  पुराण]] (5|60|120)। [[नारदीय पुराण]] (40|26-27) में ऐसा पाठान्तर है- ‘सर्वत्र दुर्लभा गंगा त्रिषु स्थानेषु चाधिका। गंगाद्वारे.......संगमे।। एषु स्नाता दिवं.......र्भवा:।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====नारद पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|नारद पुराण}}&lt;br /&gt;
नारद पुराण का कथन है कि गंगा सभी स्थानों में दुर्लभ है, किन्तु तीन स्थानों पर अत्यधिक दुर्लभ है। वह व्यक्ति जो चाहे या अनचाहे गंगा के पास पहुँच जाता है और मर जाता है, स्वर्ग जाता है और नरक नहीं देखता।&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] 107|4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====कूर्म पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|कूर्म पुराण}}&lt;br /&gt;
कूर्म पुराण का कथन है कि गंगा [[वायु पुराण]] द्वारा घोषित स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी में स्थित 35 करोड़ पवित्र स्थलों के बराबर है और वह उनका प्रतिनिधित्व करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;तिस्र: कोट्योर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्। दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तत्सर्व जाह्नवी स्मृता।। [[कूर्म पुराण]] (1|39|8); [[पद्म पुराण]] (1|47|7 एवं 5|60|59); [[मत्स्य पुराण]] (102|5, तानि ते सन्ति जाह्नवि)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====पद्म पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पद्म पुराण}}&lt;br /&gt;
पद्मपुराण ने प्रश्न किया है- ‘बहुत धन के व्यय वाले [[यज्ञ|यज्ञों]] एवं कठिन तपों से क्या लाभ, जब कि सुलभ रूप से प्राप्त होने वाली एवं स्वर्ग मोक्ष देने वाली गंगा उपस्थित है!’ नारदीय पुराणों में भी आया है-‘आठ अंगों वाले योग, तपों एवं यज्ञों से क्या लाभ? गंगा का निवास इन सभी से उत्तम है।’&amp;lt;ref&amp;gt;किं यज्ञैर्बहुवित्ताढ्यै: किं तपोभि: सुदुष्करै:। स्वर्ग्मोक्षप्रदा गंगा सुखसौभाग्यपूजिता।। [[पद्म पुराण]] (5|60|39); किमष्टांगेन योगेन किं तपोभि: किमध्वरै:। वास एव हि गंगायां सर्वतोपि विशिष्यते।। [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 38|38); तीर्थचि. (पृष्ठ 194, गंगायां ब्रह्मज्ञानस्य कारणम्); [[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (पृष्ठ 494)।&amp;lt;/ref&amp;gt; पद्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] (सृष्टि. 60|65&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि [[विष्णु]] सभी देवों का प्रतिनिधित्व करते हैं और गंगा विष्णु का। इसमें गंगा की प्रशस्ति इस प्रकार की गई है-‘[[पिता]], [[पति]], मित्रों एवं सम्बन्धियों के व्यभिचारी, पतित, दुष्ट, चाण्डाल एवं गुरुघाती हो जाने पर या सभी प्रकार के पापों एवं द्रोहों से संयुक्त होने पर क्रम से [[पुत्र]], पत्नियाँ, मित्र एवं सम्बन्धि उनका त्याग कर देते हैं, किन्तु गंगा उन्हें परित्यक्त नहीं करती&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]], सृष्टिखण्ड, 60|25-26)।’&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मत्स्य पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|मत्स्य पुराण}}&lt;br /&gt;
मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] (104|14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; के दो श्लोक यहाँ वर्णन के योग्य हैं- &amp;quot;पाप करने वाला व्यक्ति भी सहस्रों योजन दूर रहता हुआ गंगा स्मरण से परम पद प्राप्त कर लेता है। गंगा के नाम-स्मरण एवं उसके दर्शन से व्यक्ति क्रम से पापमुक्त हो जाता है एवं सुख पाता है। उसमें स्नान करने एवं जल के पान से वह सात पीढ़ियों तक अपने कुल को पवित्र कर देता है।&amp;quot; काशीखण्ड&amp;lt;ref&amp;gt;काशीखण्ड (27|69&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है कि गंगा के तट पर सभी काल शुभ हैं, सभी देश शुभ हैं और सभी लोग दान ग्रहण करने के योग्य हैं।&lt;br /&gt;
====वराह पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वराह पुराण}}&lt;br /&gt;
वराह पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[वराह पुराण]] (अध्याय 82&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा की व्युत्पत्ति ‘गां गता’ (जो पृथ्वी की ओर गई हो) है। पद्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]](सृष्टि खण्ड, 60|64-65&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा के विषय में निम्न मूलमंत्र दिया है-&amp;lt;poem&amp;gt;‘ओं नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम:।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====पुराणों में गंगा के पुनीत स्थल का विस्तार====&lt;br /&gt;
कुछ पुराणों में गंगा के पुनीत स्थल के विस्तार के विषय में व्यवस्था दी हुई है। नारद पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[नारद पुराण]]  (उत्तर, 43|119-120&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- गंगा के तीर से एक गव्यूति तक क्षेत्र कहलाता है, इसी क्षेत्र सीमा के भीतर रहना चाहिए, किन्तु तीर पर नहीं, गंगातीर का वास ठीक नहीं है। क्षेत्र सीमा दोनों तीरों से एक योजन की होती है अर्थात् प्रत्येक तीर से दो कोस तक क्षेत्र का विस्तार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। तीरं वसेत्क्षेत्रे तीरे वासो न चेष्यते।। एकयोजनविस्तीर्णा क्षेत्रसीमा तटद्वयात्। [[नारद पुराण]] (उत्तर, 43|119-120)। प्रथम को तीर्थचि. (पृष्ठ 266) ने [[स्कन्द पुराण]] से उदधृत किया है और व्याख्या की है-‘उभयतटे प्रत्येकं कोशदयं क्षेत्रम्।’ अन्तिम पाद को तीर्थचि. (पृष्ठ 267) एवं [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 136) ने [[भविष्य पुराण]] से उदधृत किया है। ‘गव्यूति’ दूरी या लम्बाई की माप है जो सामान्यत: दो क्रोश (कोस) के बराबर है। लम्बाई के मापों के विषय में कुछ अन्तर है। अमरकोश के अनुसार ‘गव्यूति’ दो क्रोश के बराबर है, यथा- ‘गव्यूति: स्त्री क्रोशयुगम्।’ [[वायु पुराण]] (8|105 एवं 101|122-123) एवं [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (2|7|96-101) के अनुसार 24 अंगुल=एक हस्त, 96 अंगुल=एक धनु (अर्थात् ‘दण्ड’, ‘युग’ या ‘नाली’); 2000 धनु (या दण्ड या युग या नालिका)=गव्यूति एवं 8000 धनु=योजन। [[मार्कण्डेय पुराण]] (46|37-40) के अनुसार 4 हस्त=धनु या दण्ड या युग या नालिका; 2000 धनु=क्रोश, 4 क्रोश=गव्यूति (जो योजन के बराबर है)। और देखिए इस ग्रन्थ का खण्ड 3, अध्याय 5।&amp;lt;/ref&amp;gt; यम ने एक सामान्य नियम यह दिया है कि वनों, पर्वतों, पवित्र नदियों एवं तीर्थों के स्वामी नहीं होते, इन पर किसी का भी प्रभुत्व (स्वामी रूप से) नहीं हो सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मपुराण का कथन है कि नदियों से चार हाथ की दूरी तक नारायण का स्वामित्व होता है और मरते समय भी (कण्ठगत प्राण होने पर भी) किसी को भी उस क्षेत्र में दान नहीं लेना चाहिए। गंगाक्षेत्र के गर्भ (अन्तर्वत्त), तीर एवं क्षेत्र में अन्तर प्रकट किया गया है। गर्भ वहाँ तक विस्तृत हो जाता है, जहाँ तक भाद्रपद के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक धारा पहुँच जाती है और उसके आगे तीर होता है, जो गर्भ से 150 हाथ तक फैला हुआ रहता है तथा प्रत्येक तीर से दो कोस तक क्षेत्र विस्तृत रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====आठ वसुओं की माँ====&lt;br /&gt;
गंगा-यमुना के मध्य का समस्त भूभाग ययाति ने पुरु को दिया था। गंगा आठ वसुओं की माँ हैं। वसुओं ने गंगा से कहा था कि [[शान्तनु]] से उनके गर्भ धारण करने के उपरान्त उनके जन्मते ही जल में प्रवाहित कर देना। गंगा ने शान्तनु से उत्पन्न सात वसु जल में प्रवाहित कर दिए। आठवें वसु ([[भीष्म]]) को शान्तनु ने बचा लिया। &amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]], अध्याय 2, 3, 61, 63, 67, 70, 87, 95-10।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==साहित्यिक उल्लेख==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Aarti.jpg|आरती, गंगा नदी, [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Aarti, Ganga River, Varanasi|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जल ही नहीं, अपितु भारत और हिन्दी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/hindikavyameganganadii.htm|title=हिन्दी काव्य में गंगा नदी|accessmonthday=[[30 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=अभिव्यक्ति|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में 'श्रीगंगालहरी'&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://sujalam.blogspot.com/2007/11/blog-post_73.html|title=गंगा की उपस्थिति |accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=सुजलाम्|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि महाकाव्य [[पृथ्वीराज रासो]]&amp;lt;ref&amp;gt;इंदो किं अंदोलिया अमी ए चक्कीवं गंगा सिरे। .................एतने चरित्र ते गंग तीरे&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा वीसलदेव रास&amp;lt;ref&amp;gt;कइ रे हिमालइ माहिं गिलउं। कइ तउ झंफघडं गंग-दुवारि।..................बहिन दिवाऊँ राइ की। थारा ब्याह कराबुं गंग नइ पारि&amp;lt;/ref&amp;gt;नरपति नाल्ह) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रंथ जगनिक रचित [[आल्हाखण्ड]]&amp;lt;ref&amp;gt;प्रागराज सो तीरथ ध्यावौं। जहँ पर गंग मातु लहराय।। / एक ओर से जमुना आई। दोनों मिलीं भुजा फैलाय।। / सरस्वती नीचे से निकली। तिरबेनी सो तीर्थ कहाय।।&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा, [[यमुना नदी|यमुना]] और [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। श्रृंगारी कवि विद्यापति,&amp;lt;ref&amp;gt;कज्जल रूप तुअ काली कहिअए, उज्जल रूप तुअ बानी। / रविमंडल परचण्डा कहिअए, गंगा कहिअए पानी।।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कबीर]] वाणी और [[जायसी]] के पद्मावत में भी गंगा का उल्लेख है, किन्तु [[सूरदास]],&amp;lt;ref&amp;gt;सुकदेव कह्यो सुनौ नरनाह। गंगा ज्यौं आई जगमाँह।। / कहौं सो कथा सुनौ चितलाइ। सुनै सो भवतरि हरि पुर जाइ।।&amp;lt;/ref&amp;gt; और [[तुलसीदास]] ने भक्ति भावना से गंगा-माहात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड में ‘श्री गंगा माहात्म्य’ का वर्णन तीन छन्दों में किया है- इन छन्दों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है।&amp;lt;poem&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा कहुँ कोटि उधारे। / देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ विमान सवाँरे।&lt;br /&gt;
पूजा को साजु विरंचि रचैं तुलसी जे महातम जानि तिहारे। / ओक की लोक परी हरि लोक विलोकत गंग तरंग तिहारे।।(कवितावली-उत्तरकाण्ड 145)&lt;br /&gt;
ब्रह्म जो व्यापक वेद कहैं, गमनाहिं गिरा गुन-ग्यान-गुनी को। / जो करता, भरता, हरता, सुर साहेबु, साहेबु दीन दुखी को।&lt;br /&gt;
सोइ भयो द्रव रूप सही, जो है नाथ विरंचि महेस मुनी को। / मानि प्रतीति सदा तुलसी, जगु काहे न सेवत देव धुनी को।।(कवितावली-उत्तरकाण्ड 146)&lt;br /&gt;
बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसें पद पापु लहौंगो। / ईस ह्वै सीस धरौं पै डरौं, प्रभु की समताँ बड़े दोष दहौंगो।&lt;br /&gt;
बरु बारहिं बार सरीर धरौं, रघुबीर को ह्वै तव तीर रहौंगो।  / भागीरथी बिनवौं कर ज़ोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो।।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; रीतिकाल में [[सेनापति]] और पद्माकर का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए गंगालहरी&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/bund0016.htm|title=बुन्देली काव्य का ऐतिहासिक संदर्भ &lt;br /&gt;
|accessmonthday=[[23 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=टीडीआईएल|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक ग्रंथ की रचना की है। सेनापति&amp;lt;ref&amp;gt;पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार, जहाँ मरि पापी होत सुरपुर पति है।  / देखत ही जाकौ भलो घाट पहचानियत, एक रूप बानी जाके पानी की रहति है।&amp;lt;/ref&amp;gt; कवित्त रत्नाकर में गंगा माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार सी सुशोभित है। [[रसखान]], [[रहीम]]&amp;lt;ref&amp;gt;अच्युत चरण तरंगिणी, शिव सिर मालति माल। हरि न बनायो सुरसरी, कीजौ इंदव भाल।।--रहीम&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में जगन्नाथदास रत्नाकर के ग्रंथ गंगावतरण में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए [[भगीरथ]] की 'भगीरथ-तपस्या' से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह सर्गों में विभक्त और रोला छन्द में निबद्ध है। अन्य कवियों में [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]], [[सुमित्रानन्दन पन्त]] और श्रीधर पाठक आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिंह|first=डॉ. राजकुमार  |title=विचार विमर्श|year=जुलाई   |publisher=सागर प्रकाशन|location=मथुरा |id= |page=13-23  |accessday=22 |accessmonth=जून|accessyear=2009 }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_/_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4|title=नौका-विहार / सुमित्रानंदन पंत|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=कविताकोश|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; में ग्रीष्म कालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/snp/ganga.htm|title=गंगा|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=अनुभूति|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ''भारत एक खोज'' (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;The Ganga, especially, is the river of India, beloved of her people, round which are interwined her memories, her hopes and fears, her songs of triumph, her victories and her defeats. She has been a symbol of India's age long culture and civilization, ever changing , ever flowing, and yet ever the same Ganga.&amp;quot; -जवाहरलाल नेहरू&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा की पौराणिक कहानियों को महेन्द्र मित्तल अपनी कृति ''माँ गंगा'' में संजोया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=3944|title=माँ गंगा|accessmonthday=[[30 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Seealso|गंगा चालीसा|गंगा माता जी की आरती}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Sunrise.jpg|सूर्योदय के समय गंगा नदी&lt;br /&gt;
चित्र:Haridwar2.jpg|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&lt;br /&gt;
चित्र:Kachla-Ghat.jpg|गंगा नदी, कछला घाट&lt;br /&gt;
चित्र:Devprayag-Bhagirathi-River.jpg|[[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]] और [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] का संगम देवप्रयाग, [[उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Devi-Delhi-Crafts-Museum-2.jpg|[[गंगा|गंगा देवी]] का भित्ति चित्र, हस्त शिल्पकला संग्रहालय, [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Devi-Delhi-Crafts-Museum.jpg|[[गंगा|गंगा देवी]] का भित्ति चित्र, हस्त शिल्पकला संग्रहालय, [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-National-Museum-Delhi.jpg|गंगा देवी प्रतिमा, [[राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय संग्रहालय]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=H7nhCTmEq5s&amp;amp;feature=player_embedded गंगा आरती विडियो]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>खुशी</name></author>
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