1857 क्रांति कथा -राही मासूम रज़ा  

1857 क्रांति कथा -राही मासूम रज़ा
1857 क्रांति कथा उपन्यास का आवरण पृष्ठ
लेखक राही मासूम रज़ा
मूल शीर्षक 1857 क्रांति कथा
प्रकाशक वाणी प्रकाशन
प्रकाशन तिथि 1965
ISBN 81-7055-659-7
देश भारत
पृष्ठ: 227
भाषा हिंदी
विषय सामाजिक और देशभक्ति
प्रकार उपन्यास
विशेष यह '1857' नाम से लिखा गया उर्दू महाकाव्य है, जो बाद में हिन्दी में '1857 क्रांति कथा' नाम से प्रकाशित हुआ।
उर्दू में एक महाकाव्य '1857' जो बाद में हिन्दी में 'क्रांति कथा' नाम से प्रकाशित हुआ। जब खुद को उर्दू का कर्ता-धर्ता मानने वाले कुछ लोगों से इस बात पर बहस हो गई कि यह हिन्दुस्तानी ज़बान सिर्फ फारसी रस्मुलखत में ही लिखी जा सकती है तो राही ने देवनागरी लिपि में लिखना शुरू किया और अंतिम समय तक वे इसी लिपि में ही लिखते रहे।
परिस्थितियाँ

क्रान्ति-कथा उर्फ 1957 में जब प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शताब्दी समारोह मनाया गया उस अवसर पर राही मासूम रज़ा का महाकाव्य ‘अठारह सौ सत्तावन’ प्रकाशित हुआ था। उस समय इतिहासकारों में 1857 के चरित्र को लेकर बहुत विवाद था। बहुत से इतिहासकार उसे सामन्ती व्यवस्था की पुनःस्थापना का आन्दोलन मान रहे थे। उनमें कुछ तो इस सीमा तक बात कर रहे थे कि भारतीय सामन्त अपने खोये हुए राज्यों को प्राप्त करने की लड़ाई लड़ रहे थे। उन्होंने भारतीय सिपाहियों और किसानों को धार्मिक नारे देकर अपने साथ किया। 1857 के बारे में यह एक सतही और यांत्रिक समझ थी। वास्तव में वह अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय जनता का महासंग्राम था। इस आन्दोलन में किसान और कारीगर अपने हितों की लड़ाई लड़ रहे थे। इतिहासकार ऐरिक स्टोक ने लिखा है कि मूल किसान भावना कर वसूल करने वालों के विरुद्ध थी। उनसे मुक्ति पाने की थी। चाहे उनका कोई रूप, रंग या राष्ट्रीयता हो।[1] जहाँ-जहाँ ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ था, वहाँ सत्ता विद्रोही जमींदारों और किसानों के हाथों में पहुँच गयी। किसान इस सत्ता में बराबर के शरीक थे। इसके साथ ही भारतीय कारीगरों की माँगें भी इस विद्रोह के घोषणा-पत्र में शामिल थीं। अगस्त 1857 के घोषणा-पत्र में विद्रोही राजकुमार फ़िरोजशाह ने स्पष्ट करते हुए कहा था - 'भारत में अंग्रेजी वस्तुओं को लाकर यूरोप के लोगों ने जुलाहों, दर्जियों, बढ़ई, लुहारों और जूता बनाने वालों को रोज़गार से बाहर कर दिया है और उनके पेशों को हड़प लिया है। इस प्रकार प्रत्येक देशी दस्तकार भिखारी की दशा में पहुँच गया है।'[2]

उद्देश्य

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. द पीजेंट एंड द राज, कैंब्रिज
  2. एस.ए.ए.रिज्ची - फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश-1, लखनऊ

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