वीरेन डंगवाल  

साहित्यिक परिचय

वीरेन डंगवाल एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने जिंदगी को उसकी पूरी लय के साथ जिया। पिछले कुछ समय से वे मुंह के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझते रहे थे। 'राम सिंह' कविता से कविता जगत में मजबूत पहचान बनाने वाले वीरेन डंगवाल के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं- इसी दुनिया में, दुष्चक्र में स्रष्टा और अंत में स्याही ताल। बीमारी के दिनों में भी उनका सृजन कर्म जारी रहा और उनकी कई कविताएं प्रकाशित भी हुई। दिल्ली में जब भी संभव हुआ, वह धरना-प्रदर्शन, कविता पाठ, सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल होते रहे और अपनी धीमी ही सही लेकिन मजबूत आवाज़ में साहित्य की दुनिया में अपना योगदान देते रहे। उनका फक्कड़ स्वभाव उनकी रचनाओं में भी साफ छलकता है। उन्होंने कुछ बेहद दुर्लभ अनुवाद भी किए, जिसमें पाब्लो नेरूदा, बर्तोल्त ब्रेख्त, वास्को पोपा और नाज़िम हिकमत की रचनाओं के तर्जुमे खासे चर्चित हुए। वीरेन डंगवाल की कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। उन्होंने उच्च स्तरीय संस्मरण भी लिखे, जिसमें शमशेर बहादुर सिंह, चंद्रकांत देवताले पर उनके आलेखों की गूंज रही। वीरेन जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे।[1]

मुख्य रचनाएँ

  • इसी दुनिया में
  • दुष्चक्र में स्रष्टा
  • कवि ने कहा
  • स्याही ताल

सम्मान एवं पुरस्कार

निधन

वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार डॉ. वीरेन डंगवाल का 68 साल की आयु में सोमवार 28 सितम्बर, 2015 की सुबह बरेली, उत्तर प्रदेश में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। बरेली के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। कैंसर होने के आने के बाद भी वह कई साल से लेखन में सक्रिय थे। कुछ समय पहले वह दिल्ली से बरेली आए थे और तबियत बिगड़ने के बाद उनको अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। उनके परिवार में पत्नी डॉ. रीता डंगवाल, बेटे प्रफुल्ल और प्रशांत हैं।



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. नहीं रहे कवि डॉ. वीरेन डंगवाल (हिन्दी) समय लाइव। अभिगमन तिथि: 28 सितम्बर, 2015।

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