वाणिज्य  

वाणिज्य धनप्राप्ति के उद्देश्य से वस्तुओं का क्रय विक्रय करना है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति की कई आवश्यकताएँ होती हैं। उनको प्राप्त करने के लिए वह आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। इनमें से कुछ वस्तुएँ तो वह स्वयं बना लेता है और अधिकांश वस्तुएँ उसे बाज़ार से ख़रीदनी पड़ती हैं। वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए उसे धन की आवश्यकता पड़ती है, और इस धन को प्राप्त करने के लिए या तो वह दूसरों की सेवा करता है अथवा ऐसी वस्तुएँ तैयार करता है या क्रय विक्रय करता है जो दूसरों के लिए उपयोगी हों। वस्तुओं का रूप बदलकर उनको अधिक उपयोगी बनाने का कार्य उद्योग माना जाता है। वाणिज्य में वे सब कार्य सम्मिलित रहते हैं जो वस्तुओं के क्रय विक्रय में सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं। जो व्यक्ति वाणिज्य संबंधी कोई कार्य करता है उसे वणिक कहते हैं।

वाणिज्य के अंग

वाणिज्य के दो प्रधान अंग हैं- दुकानदार और व्यापार। जब वस्तुओं का क्रय-विक्रय किसी एक स्थान या दुकान से होता है, तब उस संबंध के सब कार्य दुकानदारी के अंदर आते हैं। जब वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान भेजकर विक्रय किया जाता है, तब उस संबंध के सब कार्य व्यापार के अंदर समझे जाते हैं। देशी व्यापार में वस्तुओं का क्रय-विक्रय एक ही देश के अंदर होता है। विदेशी व्यापार में वस्तुओं का क्रय-विक्रय दूसरे देशों के साथ होता है। बड़े पैमाने पर दूर दूर के देशों से व्यापार के लिए बड़ी पूँजी की आवश्यकता होती है जो सम्मिलित पूँजीवादी कंपनियों और वाणिज्य बैंकों द्वारा प्राप्त होती है।

वाणिज्य विधि

संसार के भिन्न भिन्न देशों में विश्वव्यापी वाणिज्य में लगे हुए व्यक्तियों ने मिलकर प्रत्येक देश में वाणिज्य मंडलों की स्थापना की है। इन मंडलों का प्रधान कार्य देश के वाणिज्य के हितों की सम्मिलित रूप से रक्षा करना और सरकार द्वारा रक्षा करना है। वाणिज्य संबंधी कार्यों का उचित रूप से नियंत्रण करने के लिए प्रत्येक देश की सरकार जो क़ानून बनाती हैं, वे वाणिज्य विधि कहलाते हैं।

'वाणिज्य और वणिक वाणिज्य में सफलता प्राप्त करने के लिए वणिक को विक्रय कला का व्यावहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। उसे हिसाब रखने की पद्धति को भी ठीक तरह से जानना और उपयोग में लाना पड़ता है। अपने कार्यों की जोखिम कम करने के लिए उसे अपने माल का बीमा कराना होता है। इसलिए उसे इस विषय का ज्ञान भी प्राप्त करना पड़ता है। अपने व्यापार को दूर दूर तक देशों में फैलाने के लिए उसे पत्र व्यवहार और विज्ञापन कला का उचित उपयोग करना पड़ता है। वाणिज्य में स्वतंत्र बुद्धि और दृढ़ विश्वास की अत्यंत आवश्यकता होती है। ईमानदारी द्वारा ही वणिक अपने कार्य की प्रसिद्धि प्राप्त करता है। उसकी बात की सच्चाई उसकी साख को बढ़ाती है, जिससे वह आवश्यक पूँजी आसानी से प्राप्त कर लेता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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