भारतकोश सम्पादकीय 3 मार्च 2012  

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कौऔं का वायरस -आदित्य चौधरी


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        एक बहुत ही सयाना कौआ अपने तीन बच्चों को दुनियादारी की ट्रेनिंग देते हुए गूढ़-ज्ञान की बातें बता रहा था। "सुनो ध्यान से! भगवान ने हमको ही सबसे ज़्यादा चालाक बनाया हो ऐसा नहीं है। असल में दूसरी तरह के कौए हमसे भी ज़्यादा चालाक हैं और हमको चैन से खाने-पीने और जीने नहीं देते। हमारी जान इसीलिए बची हुई है कि हमने जान बचाने की आदत डाल रखी है। इन ख़तरनाक कौऔं से बचने के लिए एक बहुत ज़रूरी आदत तुमको डालनी ही होगी। हमेशा-हमेशा याद रखो! अगर इस दुनिया में सरवाइव करना है तो जान बचाने की आदत डाल लेनी चाहिए, तो जान बचाने के लिए... "

"ओ.के. डॅडी! हम समझ गए! इतना डिटेल में क्यों जा रहे हैं? सीधे-सीधे काम की बात बताइए, वो कौन सी आदत है?" बच्चे ने बात बीच में ही काटी।

"अबे ओ 'थ्री ईडियट्‌स' के 'रॅन्चो'!" कौआ 'प्रिंसीपल वायरस' की तरह ही दहाड़ा "चुपचाप बात समझने की कोशिश करो..." कौए ने बच्चों को ग़ुस्से से घूरा और फिर दूर से उनकी ओर आते हुए एक आदमी की ओर इशारा किया और आगे बोला-

"वो जो तुम दो पैरों पर चलता हुआ कौआ देख रहे हो। वो हमसे ज़्यादा चालाक कौआ है। कौए की इस नस्ल को 'आदमी' कहते हैं। अब जैसे ही ये पत्थर उठाने के लिए नीचे झुके तो तुमको फ़ौरन उड़ जाना चाहिए वरना गए जान से... समझ गये!"

"लेकिन डॅडी! अगर वो आदमी पहले ही से हाथ में पत्थर छुपाकर ला रहा हो और हमें पत्थर मार दे तो?" थ्री ईडियट्‌स में से एक बोला और यह कहकर उड़ गया। उसके पीछे-पीछे कौआ और उसके दोनों बच्चे भी उड़ गये। साथ-साथ उड़ते हुए कौए ने अपने बच्चों से कहा-

"तुमको किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं है... कमबख़्तों! तुम इस आदत को अण्डे से ही लेकर आए हो।"

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'इमोशनल इंटेलीजेन्स' लेखक- डेनियल गोलमॅन

  2. 'द बुक ऑफ़ लिस्ट्स' लेखक- इरविंग वॉलिस आदि
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