भद्राचलम  

भद्राचलम
श्रीराम मन्दिर, भद्राचलम का विहंगम दृश्य
विवरण 'भद्राचलम' प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है, जहाँ भगवान राम ने पर्णकुटी बनाकर वनवास का लंबा समय व्यतीत किया था तथा इस पुण्य क्षेत्र को "दक्षिण की अयोध्या" भी कहा जाता है।
राज्य आन्ध्र प्रदेश
ज़िला खम्मम ज़िले
निर्माता अबुल हसन
भौगोलिक स्थिति 17° 40′ 12″ उत्तर, 80° 52′ 48″ पूर्व
प्रसिद्धि हिन्दू धार्मिक स्थल
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
संबंधित लेख आन्ध्र प्रदेश, खम्मम ज़िले, श्रीराम, रावण, सीताजी, रामनवमी, कबीर, हैदराबाद, विजयवाडा, दिल्ली, चेन्नई
अन्य जानकारी वनवासी भी परंपरागत रूप से भद्राचलम को अपना आस्था का केन्द्र मानते हैं और 'रामनवमी' को भारी संख्या में यहाँ राम के सुप्रसिद्ध मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

भद्राचलम भगवान श्रीराम से जुड़ा और हिन्दुओं की आस्था का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जो आन्ध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले में स्थित है। इस पुण्य क्षेत्र को "दक्षिण की अयोध्या" भी कहा जाता है। यह स्थान अगणित भक्तों का श्रद्धा केन्द्र है। मान्यता है कि यह वही स्थान है, जहाँ राम ने पर्णकुटी बनाकर वनवास का लंबा समय व्यतीत किया था। भद्राचलम से कुछ ही दूरी पर स्थित 'पर्णशाला' में भगवान श्रीराम अपनी पर्णकुटी बनाकर रहे थे। यहीं पर कुछ ऐसे शिलाखंड भी हैं, जिनके बारे में यह विश्वास किया जाता है कि सीताजी ने वनवास के दौरान यहाँ वस्त्र सुखाए थे। एक विश्वास यह भी किया जाता है कि रावण द्वारा सीताजी का अपहरण भी यहीं से हुआ था।

वनवासी बहुल क्षेत्र

भद्राचलम की एक विशेषता यह भी है कि यह वनवासी बहुल क्षेत्र है और राम वनवासियों के पूज्य हैं। वनवासी भी परंपरागत रूप से भद्राचलम को अपना आस्था का केन्द्र मानते हैं और 'रामनवमी' को भारी संख्या में यहाँ राम के सुप्रसिद्ध मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। वनवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण 'ईसाई मिशनरी' यहाँ मतांतरण षड्यंत्र चलाने की कोशिश में वर्षों जुटे रहे, किंतु कई प्रयासों के बाद भी यहाँ उनका मतांतरण जोर नहीं पकड़ पाया। स्थानीय वनवासी उनका प्रखर विरोध भी करते रहे हैं।[1]

जनश्रुति

यहाँ के मंदिर के आविर्भाव के विषय में एक जनश्रुति वनवासियों से जुड़ी हुई है। इसके अनुसार, एक राम भक्त वनवासी महिला दम्मक्का भद्रिरेड्डीपालेम ग्राम में रहा करती थी। इस वृद्धा ने राम नामक एक लड़के को गोद लेकर उसका पालन-पोषण किया। एक दिन राम वन में गया और वापस नहीं लौटा। पुत्र को खोजते-खोजते दम्मक्का जंगल में पहुँच गई और "राम-राम" पुकारते हुए भटकने लगी। तभी उसे एक गुफ़ा के अंदर से आवाज़ आई कि "माँ, मैं यहाँ हूँ"। खोजने पर वहाँ सीता, राम और लक्ष्मण की प्रतिमाएँ मिलीं। उन्हें देखकर दम्मक्का भक्ति भाव से सराबोर हो गई। इतने में उसने अपने पुत्र को भी सामने खड़ा पाया। दम्मक्का ने उसी जगह पर देव प्रतिमाओं की स्थापना का संकल्प लिया और बाँस की छत बनाकर एक अस्थाई मंदिर बनाया। धीरे-धीरे स्थानीय वनवासी समुदाय 'भद्रगिरि' या 'भद्राचलम' नामक उस पहाड़ी पर श्रीराम की पूजा करने लगे। आगे चलकर भगवान ने भद्राचलम को वनवासियों-नगरवासियों के मिलन हेतु एक सेतु बना दिया।[1]

श्रीराम मन्दिर, भद्राचलम

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 भद्राचलम का राम मन्दिर (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 27 फ़रवरी, 2013।
  2. वर्तमान हैदराबाद
  3. तेलुगू में इसे पच्चला पतकम् कहा जाता है
  4. चिंताकु पतकम्
  5. कलिकि तुराई

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