बुल्ले शाह  

साहित्यिक देन

बुल्ले शाह जी ने पंजाबी मुहावरे में अपने आपको अभिव्यक्त किया। जबकि अन्य हिन्दी और सधुक्कड़ी भाषा में अपना संदेश देते थे। पंजाबी सूफियों ने न केवल ठेठ पंजाबी भाषा की छवि को बनाए रखा बल्कि उन्होंने पंजाबियत व लोक संस्कृति को सुरक्षित रखा। बुल्ले शाह ने अपने विचारों व भावों को काफियों के रूप में व्यक्त किया है। काफ़ी भक्तों के पदों से मिलता जुलता काव्य रूप है। काफिया भक्तों के भावों को गेय रूप में प्रस्तुत करती हैं इसलिए इनमे बहुत-से रागों की बंदिश मिलती है। जन साधारण भी सूफी दरवेशों के तकियों पर जमा होते थे और मिल कर भक्ति में विभोर होकर काफियां गाते थे। काफियों की भाषा बहुत सादी व आम लोगों के समझने योग्य हैं। बुल्ले शाह लोक दिल पर इस तरह राज कर रहे थे कि उन्होंने बुल्ले शाह की रचनाओं को अपना ही समझ लिया। वह बुल्ले शाह की काफियों को इस तरह गाते थे जैसे वह स्वयं ही इसके रचयिता हों। इनकी काफियों में अरबी, फारसी के शब्द और इस्लामी धर्म ग्रंथो के मुहावरे भी मिलते हैं। लेकिन कुल मिलाकर उसमे स्थानीय भाषा, मुहावरे और सदाचार का रंग ही प्रधान है।[3]

निधन

विद्वानों के द्वारा बुल्ले शाह का निधन 1758 ई. में माना जाता हैं परंतु कुछ विद्वान् इनकी मृत्यु 1759 ई. को भी मानते हैं।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 हिन्दी कविता, बाबा बुल्ले शाह (हिंदी) www.hindi-kavita.com। अभिगमन तिथि: 16 फ़रवरी, 2017।
  2. बुल्ला की जाणां मैं कौन? - बुल्ले शाह पर विशेष प्रस्तुति (हिंदी) podcast.hindyugm.com। अभिगमन तिथि: 17 फ़रवरी, 2017।
  3. बुल्ले शाह (हिंदी) superzindagi.in। अभिगमन तिथि: 17 फ़रवरी, 2017।

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=बुल्ले_शाह&oldid=601311" से लिया गया