बड़ा तालाब, भोपाल  

महत्त्व

11वीं शताब्दी में इस विशाल तालाब का निर्माण किया गया और भोपाल शहर इसके आस-पास ही विकसित होना शुरू हुआ। इन दोनों बड़ी-छोटी झीलों को केन्द्र में रखकर भोपाल का निर्माण हुआ था। भोपाल शहर के निवासी धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से इन दोनों झीलों से गहराई तक जुड़े हैं। रोज़मर्रा की आम ज़रूरतों का पानी उन्हें इन्हीं झीलों से मिलता है, इसके अलावा आस-पास के गाँवों में रहने वाले लोग इसमें कपड़े भी धोते हैं। हालांकि यह इन झीलों की सेहत के लिये खतरनाक है। सिंघाड़े की खेती भी इस तालाब में की जाती है। स्थानीय प्रशासन की रोक और मना करने के बावजूद विभिन्न त्यौहारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ इन तालाबों में विसर्जित की जाती हैं। बड़े तालाब के बीच में 'तकिया द्वीप' है, जिसमें शाहअली शाह रहमतुल्लाह का मकबरा भी बना हुआ है, जो कि अभी भी धार्मिक और पुरातात्विक महत्व रखता है।

व्यवसाय व मनोरंजन

बड़े तालाब में मछलियाँ पकड़ने हेतु 'भोपाल नगर निगम' ने मछुआरों की सहकारी समिति को लम्बे समय तक एक इलाका किराये पर दिया हुआ है। इस सहकारी समिति में लगभग 500 मछुआरे हैं, जो कि इस तालाब के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में मछलियाँ पकड़कर जीवन यापन करते हैं। इस झील से बड़ी मात्रा में सिंचाई भी की जाती है। इस झील के आस-पास लगे हुए 87 गाँव और सीहोर ज़िले के भी कुछ गाँव इसके पानी से खेतों में सिंचाई करते हैं। इस इलाके में रहने वाले ग्रामीणों का मुख्य काम खेती और पशुपालन ही है। इनमें कुछ बड़े और कुछ बहुत ही छोटे-छोटे किसान भी हैं। भोपाल का यह बड़ा तालाब स्थानीय और बाहरी पर्यटकों को भी बहुत आकर्षित करता है। यहाँ बोट क्लब पर भारत का पहला 'राष्ट्रीय सेलिंग क्लब' भी स्थापित किया जा चुका है। इस क्लब की सदस्यता हासिल करके पर्यटक कायाकिंग, कैनोइंग, राफ़्टिंग, वाटर स्कीइंग और पैरासेलिंग आदि का मजा उठा सकते हैं। विभिन्न निजी और सरकारी बोटों से पर्यटकों को बड़ी झील में भ्रमण करवाया जाता है। इस झील के दक्षिणी हिस्से में स्थापित 'वन विहार राष्ट्रीय उद्यान' भी पर्यटकों के आकर्षण का एक और केन्द्र है। चौड़ी सड़क के एक तरफ़ प्राकृतिक वातावरण में पलते जंगली पशु-पक्षी और सड़क के दूसरी तरफ़ प्राकृतिक सुन्दरता मन मोह लेती है।[2]

जैव विविधता

बड़े तालाब और इसके निकट ही छोटे तालाब में जैव-विविधता के कई रंग देखने को मिलते हैं। वनस्पति और विभिन्न जल आधारित प्राणियों के जीवन और वृद्धि के लिये यह जल संरचना एक आदर्श स्थल मानी जा सकती है। प्रकृति आधारित वातावरण और जल के चरित्र की वजह से एक उन्नत किस्म की जैव-विविधता का विकास हो चुका है। प्रतिवर्ष यहाँ पक्षियों की लगभग 20,000 प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं, जिनमें मुख्य हैं- व्हाईट स्टॉर्क, काले गले वाले सारस, हंस आदि। कुछ प्रजातियाँ तो लगभग विलुप्त हो चुकी थीं, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता अब वे पुनः दिखाई देने लगी हैं। हाल ही में यहाँ भारत का विशालतम पक्षी 'सारस क्रेन' भी देखा गया था, जो कि अपने आकार और उड़ान के लिये प्रसिद्ध है।

अपने लगभग एक हजार वर्ष के अस्तित्व काल में बड़ा तालाब एक प्राकृतिक नमभूमि में बदल गया है। वोट क्लब पर टहलते हुए जब भी लोग तकिया टापू के पीछे सूर्य को डूबते हुए देखते है, तो वे इस तालाब के सौंदर्य से अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाते। यद्यपि आज भोपाल के 'बड़ा तालाब' और 'छोटा तालाब' के इर्द-गिर्द अनेक आधुनिक संरचनाएँ बना दी गई हैं फिर भी तालाब को आस्तित्व प्रदान करने वाली प्रमुख संरचना वही मिट्टी का पुराना बांध है, जिसे राजा भोज ने बनवाया था। निश्चित ही राजा भोज में गजब की दूरदृष्टि थी, क्योंकि 11वीं सदी में निर्मित यह जलाशय आज 21वीं शताब्दी में भी भोपाल शहर की 40 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति कर रहा है। इसका श्रेय निश्चय की उस समय की बेजोड़ जल-अभियांत्रिकी क्षमता को जाता है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 प्राचीन जल अभियांत्रिकी का बेजोड़ नमूना है भोपाल ताल (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2013।
  2. 2.0 2.1 भोपाल का बड़ा तालाब (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 19 जुलाई, 2013।

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